श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 671–680
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680
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* अरण्यकाण्ड * ६६ ९ सब कथा कहकर भगवान्के मुखके दर्शन कर, हृदयमें उनके चरणकमलोंको धारण कर लिया और योगाग्निसे देहको त्यागकर ( जलाकर ) वह उस दुर्लभ हरिपदमें लीन हो गयी, जहाँसे लौटना नहीं होता । तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकारके कर्म, अधर्म और बहुत-से मत– ये सब शोकप्रद हैं; हे मनुष्यो! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम करो ।
दो० – जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि ।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥ ३६ ॥
जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्रीको भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन! तू ऐसे प्रभुको भूलकर सुख चाहता है? ॥३६ ॥
चले राम त्यागा बन सोऊ । अतुलित बल नर केहरि दोऊ ॥
बिरही इव प्रभु करत बिषादा । कहत कथा अनेक संबादा ॥
श्रीरामचन्द्रजीने उस वनको भी छोड़ दिया और वे आगे चले । दोनों भाई अतुलनीय बलवान् और मनुष्योंमें सिंहके समान हैं । प्रभु विरहीकी तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं— ॥ १ ॥
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा । देखत केहि कर मन नहिं छोभा ॥
नारि सहित सब खग मृग बृंदा । मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा ॥
हे लक्ष्मण! जरा वनकी शोभा तो देखो । इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध नहीं होगा? पक्षी
और पशुओंके समूह सभी स्त्रीसहित हैं । मानो वे मेरी निन्दा कर रहे हैं ॥२ ॥
हमहि देखि मृग निकर पराहीं । मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं ॥
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए । कंचन मृग खोजन ए आए ॥
हमें देखकर [ जब डरके मारे ] हिरनोंके झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं— तुमको भय नहीं है । तुम तो साधारण हिरनोंसे पैदा हुए हो, अत: तुम आनन्द करो । ये तो सोनेका हिरन खोजने आये हैं ॥३ ॥
संग लाइ करिनीं करि लेहीं । मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं ॥
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ । भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ ॥
हाथी हथिनियोंको साथ लगा लेते हैं । वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [ कि स्त्रीको कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये ] । भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रको भी बार -बार देखते रहना चाहिये । अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजाको वशमें नहीं समझना चाहिये ॥४ ॥
राखिअ नारि जदपि उर माहीं । जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ॥
देखहु ताततात बसंत सुहावा । प्रिया हीन मोहि भय उपजावा ॥
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* * ६७० रामचरितमानस और स्त्रीको चाहे हृदयमें ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसीके वशमें नहीं रहते । हे तात! इस सुन्दर वसन्तको तो देखो । प्रियाके बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है ॥५ ॥
दो० –- बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल ।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल ॥ ३७ ( क ) ॥
मुझे विरहसे व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेवने वन, भौंरों और पक्षियोंको साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया ॥ ३७ ( क ) ॥
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात ।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात ॥ ३७ ( ख ) ॥
परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाईके साथ हूँ ( अकेला नहीं हूँ ), तब उसकी बात सुनकर कामदेवने मानो सेनाको रोककर डेरा डाल दिया है ॥ ३७ (ख ) ॥
बिटप बिसाल लता अरुझानी । बिबिध बितान दिए जनु तानी ॥
कदलि ताल बर धुजा पताका । देखि न मोह धीर मन जाका ॥
विशाल वृक्षोंमें लताएँ उलझी हुई ऐसी मालूम होती हैं मानो नाना प्रकारके तंबू तान दिये गये हैं । केला और ताड़ सुन्दर ध्वजा-पताकाके समान हैं । इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता जिसका मन धीर है ॥ १ ॥
बिबिध भाँति फूले तरु नाना । जनु बानैत बने बहु बाना ॥
कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए । जनु भट बिलग बिलग होइ छाए ॥
अनेकों वृक्ष नाना प्रकारसे फूले हुए हैं । मानो अलग-अलग बाना ( वर्दी) धारण किये हुए बहुत - से तीरंदाज हों । कहीं - कहीं सुन्दर वृक्ष शोभा दे रहे हैं । मानो योद्धालोग अलग- अलग होकर छावनी डाले हों ॥२ ॥
कूजत पिक मानहुँ गज माते । ढेक महोख ऊँट बिसराते ॥
मोर चकोर कीर बर बाजी । पारावत मराल सब ताजी ॥
कोयलें कूज रही हैं, वही मानो मतवाले हाथी [चिग्घाड़ रहे ] हैं । ढेक और महोख पक्षी मानो ऊँट और खच्चर हैं । मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानो सब सुन्दर ताजी ( अरबी ) घोड़े हैं ॥३ ॥
तीतिर लावक पदचर जूथा । बरनि न जाइ मनोज बरूथा ॥
रथ गिरि सिला दुंदुभीं झरना । चातक बंदी गुन गन बरना ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६७१ तीतर और बटेर पैदल सिपाहियोंके झुंड हैं । कामदेवकी सेनाका वर्णन नहीं हो सकता । पर्वतोंकी शिलाएँ रथ और जलके झरने नगाड़े हैं । पपीहे भाट हैं, जो गुणसमूह ( विरदावली ) का वर्णन करते हैं ॥४ ॥
मधुकर मुखर भेरि सहनाई । त्रिबिध बयारि बसीठीं आई ॥
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें । बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें ॥
भौंरोंकी गुंजार भेरी और शहनाई है । शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा मानो दूतका काम लेकर आयी है । इस प्रकार चतुरङ्गिणी सेना साथ लिये कामदेव मानो सबको चुनौती देता हुआ विचर रहा है ॥५ ॥
लछिमन देखत काम अनीका । रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका ॥
एहि कें एक परम बल नारी । तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी ॥
हे लक्ष्मण! कामदेवकी इस सेनाको देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगत्में उन्हींकी [ वीरोंमें ] प्रतिष्ठा होती है । इस कामदेवके एक स्त्रीका बड़ा भारी बल है । उससे जो बच जाय, वही श्रेष्ठ योद्धा है ॥६ ॥
दो० – तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ॥ ३८ ( क ) ॥
हे तात! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं । ये विज्ञानके धाम मुनियोंके भी मनोंको पलभरमें क्षुब्ध कर देते हैं ॥ ३८ ( क ) ॥
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि ।
क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥ ३८ ( ख) ॥
लोभको इच्छा और दम्भका बल है, कामको केवल स्त्रीका बल है और क्रोधको कठोर वचनोंका बल है; श्रेष्ठ मुनि विचारकर ऐसा कहते हैं ॥ ३८ ( ख) ॥
गुनातीत सचराचर स्वामी । राम उमा सब अंतरजामी ॥
कामिन्ह कै दीनता देखाई ॥ धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई ॥
[ शिवजी कहते हैं— ] हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी गुणातीत ( तीनों गुणोंसे परे), चराचर जगत्के स्वामी और सबके अन्तरकी जाननेवाले हैं । [ उपर्युक्त बातें कहकर ] उन्होंने कामी लोगोंकी दीनता ( बेबसी ) दिखलायी है और धीर ( विवेकी ) पुरुषोंके मनमें वैराग्यको दृढ़ किया है ॥१ ॥
क्रोध मनोज लोभ मद माया । छूटहिं सकल राम कीं दाया ॥
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला । जा पर होइ सो नट अनुकूला ॥
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* *६७२ रामचरितमानस क्रोध, काम, लोभ, मद और माया-ये सभी श्रीरामजीकी दयासे छूट जाते हैं । वह नट ( नटराजभगवान् ) जिसपर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इन्द्रजाल ( माया ) में नहीं भूलता ॥ २ ॥
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा । पंपा नाम सुभग गंभीरा ॥
हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ-हरिका भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न [ की भाँति झूठा] है । फिर प्रभु श्रीरामजी पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवरके तीरपर गये ॥३ ॥
संत हृदय जस निर्मल बारी । बाँधे घाट मनोहर चारी ॥
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा । जनु उदार गृह जाचक भीरा ॥
उसका जल संतोंके हृदय-जैसा निर्मल है । मनको हरनेवाले सुन्दर चार घाट बँधे हुए हैं । भाँति - भाँतिके पशु जहाँ-तहाँ जल पी रहे हैं । मानो उदार दानी पुरुषोंके घर याचकोंकी भीड़ लगी हो! ॥४ ॥
दो०–- पुरइनि सघन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म ।
मायाछन्न न देखिऐ जैसें निर्गुन ब्रह्म ॥ ३ ९ ( क ) ॥
घनी पुरइनों ( कमलके पत्तों ) -की आड़में जलका जल्दी पता नहीं मिलता । जैसे मायासे ढके रहनेके कारण निर्गुण ब्रह्म नहीं दीखता ॥ ३ ९ ( क) ॥
सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं ।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं ॥ ३ ९ ( ख ) ॥
उस सरोवरके अत्यन्त अथाह जलमें सब मछलियाँ सदा एकरस (एक समान ) सुखी रहती हैं । जैसे धर्मशील पुरुषोंके सब दिन सुखपूर्वक बीतते हैं ॥ ३ ९ (ख) ॥
बिकसे सरसिज नाना रंगा । मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा ॥
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा । प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा ॥
उसमें रंग- बिरंगे कमल खिले हुए हैं । बहुत-से भौरे मधुर स्वरसे गुंजार कर रहे हैं । जलके मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, मानो प्रभुको देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों ॥१ ॥
चक्रबाक बक खग समुदाई । देखत बनइ बरनि नहिं जाई ॥
सुंदर खग गन गिरा सुहाई । जात पथिक जनु लेत बोलाई ॥
चक्रवाक, बगुले आदि पक्षियोंका समुदाय देखते ही बनता है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता । सुन्दर पक्षियोंकी बोली बड़ी सुहावनी लगती है, मानो [ रास्तेमें ] जाते हुए पथिकको
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* अरण्यकाण्ड * ६७३ बुलाये लेती हो ॥२ ॥
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए । चहु दिसि कानन बिटप सुहाए ॥
चंपक बकुल कदंब तमाला । पाटल पनस परास रसाला ॥
उस झील ( पंपासरोवर ) के समीप मुनियोंने आश्रम बना रखे हैं । उसके चारों ओर वनके सुन्दर वृक्ष हैं । चम्पा, मौलसिरी, कदम्ब, तमाल, पाटल, कटहल, ढाक और आम आदि— ॥३ ॥
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना । चंचरीक पटली कर गाना ॥
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ ॥ संतत बहइ मनोहर बाऊ ॥
बहुत प्रकारके वृक्ष नये - नये पत्तों और [ सुगन्धित ] पुष्पोंसे युक्त हैं, [जिनपर ] भौंरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं । स्वभावसे ही शीतल, मन्द, सुगन्धित एवं मनको हरनेवाली हवा सदा बहती रहती है ॥४ ॥
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं । सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं ॥
कोयलें ‘ कुहू ' ‘ कुहू ' का शब्द कर रही हैं । उनकी रसीली बोली सुनकर मुनियोंका भी ध्यान टूट जाता है ॥५ ॥
दो०– फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ ।
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ ॥ ४० ॥
फलोंके बोझसे झुककर सारे वृक्ष पृथ्वीके पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर [ विनयसे ] झुक जाते हैं ॥ ४० ॥
देखि राम अति रुचिर तलावा । मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा ॥
देखी सुंदर तरुबर छाया । बैठे अनुज सहित रघुराया ॥
श्रीरामजीने अत्यन्त सुन्दर तालाब देखकर स्नान किया और परम सुख पाया । एक सुन्दर उत्तम वृक्षकी छाया देखकर श्रीरघुनाथजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित बैठ गये ॥ १ ॥
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए । अस्तुति करि निज धाम सिधाए ॥
बैठे परम प्रसन्न कृपाला । कहत अनुज सन कथा रसाला ॥
फिर वहाँ सब देवता और मुनि आये और स्तुति करके अपने - अपने धामको चले गये । कृपालु श्रीरामजी परम प्रसन्न बैठे हुए छोटे भाई लक्ष्मणजीसे रसीली कथाएँ कह रहे हैं ॥२ ॥
बिरहवंत भगवंतहि देखी । नारद मन भा सोच बिसेषी ॥
मोर साप करि अंगीकारा । सहत राम नाना दुख भारा ॥
भगवान्को विरहयुक्त देखकर नारदजीके मनमें विशेषरूपसे सोच हुआ । [ उन्होंने विचार किया कि ] मेरे ही शापको स्वीकार करके श्रीरामजी नाना प्रकारके दुःखोंका भार सह रहे हैं
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* *६७४ रामचरितमानस (दुःख उठा रहे हैं ) ॥ ३ ॥
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई । पुनि न बनिहि अस अवसरु आई ॥
यह बिचारि नारद कर बीना । गए जहाँ प्रभु सुख आसीना ॥
ऐसे ( भक्तवत्सल ) प्रभुको जाकर देखूँ । फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा । यह विचारकर नारदजी हाथमें वीणा लिये हुए वहाँ गये, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे ॥४ ॥
गावत राम चरित मृदु बानी । प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ॥
करत दंडवत लिए उठाई । राखे बहुत बार उर लाई ॥
वे कोमल वाणीसे प्रेमके साथ बहुत प्रकारसे बखान-बखानकर रामचरितका गान कर [ते हुए चले आ ] रहे थे । दण्डवत् करते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने नारदजीको उठा लिया और बहुत देरतक हृदयसे लगाये रखा ॥५ ॥
स्वागत पूँछि निकट बैठारे । लछिमन सादर चरन पखारे ॥
फिर स्वागत ( कुशल) पूछकर पास बैठा लिया । लक्ष्मणजीने आदरके साथ उनके चरण धोये ॥ ६ ॥
दो० -– नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि ।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि ॥ ४१ ॥
बहुत प्रकारसे विनती करके और प्रभुको मनमें प्रसन्न जानकर तब नारदजी कमलके समान हाथोंको जोड़कर वचन बोले—॥४१ ॥
सुनहु उदार सहज रघुनायक । सुंदर अगम सुगम बर दायक ॥
देहु एक बर मागउँ स्वामी । जद्यपि जानत अंतरजामी ॥
हे स्वभावसे ही उदार श्रीरघुनाथजी! सुनिये | आप सुन्दर अगम और सुगम वरके देनेवाले हैं । हे स्वामी! मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिये, यद्यपि आप अन्तर्यामी होनेके नाते सब जानते ही हैं ॥१ ॥
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ । जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ ॥
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी । जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ॥
[ श्रीरामजीने कहा— ] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो । क्या मैं अपने भक्तोंसे कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ! तुम नहीं माँग सकते? ॥२ ॥
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें । अस बिस्वास तजहु जनि भोरें ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६७५
तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई ॥
मुझे भक्तके लिये कुछ भी अदेय नहीं है । ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ो । तब नारदजी हर्षित होकर बोले — मैं ऐसा वर माँगता हूँ, यह धृष्टता करता हूँ- ॥३ ॥
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कह अधिक एक तें एका ॥
राम सकल नामन्ह तें अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ॥
यद्यपि प्रभुके अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक-से -एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामोंसे बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियोंके समूहके लिये यह वधिकके समान हो ॥४ ॥
दो० – राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम ।
अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम ॥ ४२ ( क ) ॥
आपकी भक्ति पूर्णिमाकी रात्रि है; उसमें ' राम ' नाम यही पूर्ण चन्द्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें निवास करें ॥ ४२ ( क ) ॥
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ ॥ ४२ ( ख ) ॥
कृपासागर श्रीरघुनाथजीने मुनिसे ' एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो ) कहा । तब नारदजीने मनमें अत्यन्त हर्षित होकर प्रभुके चरणोंमें मस्तक नवाया ॥ ४२ ( ख ) ॥
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी । पुनि नारद बोले मृदु बानी ॥
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया । मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ॥
श्रीरघुनाथजीको अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारदजी फिर कोमल वाणी बोले-हे रामजी! हे रघुनाथजी! सुनिये, जब आपने अपनी मायाको प्रेरित करके मुझे मोहित किया था, ॥ १ ॥
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा । प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ॥
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा । भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ॥
तब मैं विवाह करना चाहता था । हे प्रभु! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया? [ प्रभु बोले- ] हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्षके साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा- भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं, ॥२ ॥
करउँ सदा तिन्ह के रखवारी । जिमि बालक राखड़ महतारी ॥
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई । तहँ राखड़ जननी अरगाई ॥
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* *६७६ रामचरितमानस मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालककी रक्षा करती है । छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँपको पकड़ने जाता है तो वहाँ माता उसे [ अपने हाथों ] अलग करके बचा लेती है ॥ ३ ॥
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता । प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ॥
मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी । बालक सुत सम दास अमानी ॥
सयाना हो जानेपर उस पुत्रपर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती ( अर्थात् मातृपरायण शिशुकी तरह फिर उसको बचानेकी चिन्ता नहीं करती; क्योंकि वह मातापर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है ) । ज्ञानी मेरे प्रौढ़ ( सयाने ) पुत्रके समान है और [ तुम्हारे-जैसा] अपने बलका मान न करनेवाला सेवक मेरे शिशु पुत्रके समान है ॥४ ॥
जनहि मोर बल निज बल ताही । दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ॥
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं । पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं ॥
मेरे सेवकको केवल मेरा ही बल रहता है और उसे ( ज्ञानीको ) अपना बल होता है । पर काम- क्रोधरूपी शत्रु तो दोनोंके लिये हैं । [ भक्तके शत्रुओंको मारनेकी जिम्मेवारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बलको माननेवाले ज्ञानीके शत्रुओंका नाश करनेकी जिम्मेवारी मुझपर नहीं है । ] ऐसा विचारकर पण्डितजन ( बुद्धिमान् लोग ) मुझको ही भजते हैं । वे ज्ञान प्राप्त होनेपर भी भक्तिको नहीं छोड़ते ॥ ५ ॥
दो० - काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह के धारि ।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥४३ ॥
काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह ( अज्ञान ) की प्रबल सेना है । इनमें मायारूपिणी ( मायाकी साक्षात् मूर्ति) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है ॥ ४३ ॥
सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता । मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता ॥
जप तप नेम जलाश्रय झारी । होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी ॥
हे मुनि! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन [ को विकसित करने ] के लिये स्त्री वसन्त ऋतुके समान है । जप, तप, नियमरूपी सम्पूर्ण जलके स्थानोंको स्त्री ग्रीष्मरूप होकर सर्वथा सोख लेती है ॥१ ॥
काम क्रोध मद मत्सर भेका । इन्हहि हरषप्रद बरषा एका ॥
।दुर्बासना कुमुद समुदाई तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई ॥
काम, क्रोध, मद और मत्सर ( डाह ) आदि मेढक हैं । इनको वर्षा ऋतु होकर हर्ष प्रदान करनेवाली एकमात्र यही ( स्त्री ) है । बुरी वासनाएँ कुमुदोंके समूह हैं । उनको सदैव सुख देनेवाली यह शरद् ऋतु है ॥ २ ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६७७
धर्म सकल सरसीरुह बंदा । होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा ॥
पुनि ममता जवास बहुताई । पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई ॥
समस्त धर्म कमलोंके झुंड हैं । यह नीच ( विषयजन्य ) सुख देनेवाली स्त्री हिम-ऋतु होकर उन्हें जला डालती है । फिर ममतारूपी जवासका समूह ( वन ) स्त्रीरूपी शिशिर ऋतुको पाकर हरा- भरा हो जाता है ॥ ३ ॥
पाप उलूक निकर सुखकारी । नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी ॥
बुधि बल सील सत्य सब मीना । बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना ॥
पापरूपी उल्लुओंके समूहके लिये यह स्त्री सुख देनेवाली घोर अन्धकारमयी रात्रि है । बुद्धि, बल, शील और सत्य- ये सब मछलियाँ हैं और उन [को फँसाकर नष्ट करने ] के लिये स्त्री बंसीके समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं ॥४ ॥
दो० – अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि ।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि ॥४४ ॥
युवती स्त्री अवगुणोंकी मूल, पीड़ा देनेवाली और सब दुःखोंकी खान है । इसलिये हे मुनि! मैंने जीमें ऐसा जानकर तुमको विवाह करनेसे रोका था ॥४४ ॥
सुनि रघुपति के बचन सुहाए । मुनि तन पुलक नयन भरि आए ॥
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती । सेवक पर ममता अरु प्रीती ॥
श्रीरघुनाथजीके सुन्दर वचन सुनकर मुनिका शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [ प्रेमाश्रुओंके जलसे ] भर आये । [ वे मन-ही -मन कहने लगे- ] कहो तो किस प्रभुकी ऐसी रीति है, जिसका सेवकपर इतना ममत्व और प्रेम हो ॥ १ ॥
जेन भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी । ग्यान रंक नर मंद अभागी ॥
पुनि सादर बोले मुनि नारद । सुनहु राम बिग्यान बिसारद ॥
जो मनुष्य भ्रमको त्यागकर ऐसे प्रभुको नहीं भजते, वे ज्ञानके कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं । फिर नारद मुनि आदरसहित बोले - हे विज्ञान - विशारद श्रीरामजी! सुनिये —॥२ ॥
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भव भंजन भीरा ॥
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ । जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ॥
हे रघुवीर! हे भव भय ( जन्म- मरणके भय ) -का नाश करनेवाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतोंके लक्षण कहिये । [ श्रीरामजीने कहा- ] हे मुनि! सुनो, मैं संतोंके गुणोंको कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वशमें रहता हूँ॥३ ॥
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* *६७८ रामचरितमानस
षट बिकार जित अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥
अमित बोध अनीह मितभोगी । सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥
वे संत [ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर- इन ] छः विकारों ( दोषों ) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल ( स्थिरबुद्धि), अकिञ्चन ( सर्वत्यागी ), बाहर- भीतरसे पवित्र, सुखके धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान्, योगी, ॥४ ॥
सावधान मानद मदहीना । धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥
सावधान, दूसरोंको मान देनेवाले, अभिमानरहित, धैर्यवान्, धर्मके ज्ञान और आचरणमें अत्यन्त निपुण, ॥५ ॥
दो० – गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह ।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह ॥ ४५ ॥
गुणोंके घर, संसारके दुःखोंसे रहित और सन्देहोंसे सर्वथा छूटे हुए होते हैं । मेरे चरणकमलोंको छोड़कर उनको न देह ही प्रिय होती है, न घर ही ॥ ४५ ॥
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं । पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती । सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती ॥
कानोंसे अपने गुण सुननेमें सकुचाते हैं, दूसरोंके गुण सुननेसे विशेष हर्षित होते हैं । सम और शीतल हैं, न्यायका कभी त्याग नहीं करते । सरलस्वभाव होते हैं और सभीसे प्रेम रखते हैं ॥१ ॥
जप तप ब्रत दम संजम नेमा । गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाया । मुदिता मम पद प्रीति अमाया ॥
वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियममें रत रहते हैं और गुरु, गोविन्द तथा ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम रखते हैं । उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता ( प्रसन्नता) और मेरे चरणोंमें निष्कपट प्रेम होता है ॥२ ॥
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना । बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥
तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान ( परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) और वेद - पुराणका यथार्थ ज्ञान रहता है । वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते ॥३ ॥
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला । हेतु रहित परहित रत सीला ॥