श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 681–690
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
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* अरण्यकाण्ड * ६७९
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते । कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते ॥
सदा मेरी लीलाओंको गाते- सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरोंके हितमें लगे रहनेवाले होते हैं । हे मुनि! सुनो, संतोंके जितने गुण हैं, उनको सरस्वती और वेद भी नहीं कह सकते ॥ ४ ॥
छं० — कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे ।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे ॥
सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए । ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए । ' शेष और शारदा भी नहीं कह सकते ' यह सुनते ही नारदजीने श्रीरामजीके चरणकमल पकड़ लिये । दीनबन्धु कृपालु प्रभुने इस प्रकार अपने श्रीमुखसे अपने भक्तोंके गुण कहे । भगवान्के चरणोंमें बार- बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मलोकको चले गये । तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल श्रीहरिके रंगमें रँग गये हैं ।
दो० – रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग ।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग ॥ ४६ ( क ) ॥
जो लोग रावणके शत्रु श्रीरामजीका पवित्र यश गावेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योगके बिना ही श्रीरामजीकी दृढ़ भक्ति पावेंगे ॥ ४६ ( क ) ॥
दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग ।
हि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥ ४६ ( ख) ॥
युवती स्त्रियोंका शरीर दीपककी लौके समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन । काम और मदको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर और सदा सत्संग कर ॥ ४६ ( ख ) ॥ मासपारायण, बाईसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीयः सोपानः समाप्तः । कलियुग सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह तीसरा सोपान समाप्त हुआ । ( अरण्यकाण्ड समाप्त )
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भगवान् रामकी सुग्रीवसे मैत्री
सखा सोच त्यागहु बल मोरें । सब बिधि घटब काज मैं तोरें ॥
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस चतुर्थ सोपान किष्किन्धाकाण्ड
श्लोक
कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ । मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ॥ १ ॥
कुन्दपुष्प और नील कमलके समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान्, विज्ञानके धाम, शोभासम्पन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदोंके द्वारा वन्दित, गौ एवं ब्राह्मणोंके समूहके प्रिय [ अथवा प्रेमी ], मायासे मनुष्यरूप धारण किये हुए, श्रेष्ठ धर्मके लिये कवचस्वरूप, सबके हितकारी, श्रीसीताजीकी खोजमें लगे हुए, पथिकरूप रघुकुलके श्रेष्ठ श्रीरामजी और श्रीलक्ष्मणजी दोनों भाई निश्चय ही हमें भक्तिप्रद हों ॥ १ ॥
ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा । संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्॥ २ ॥
वे सुकृती ( पुण्यात्मा पुरुष ) धन्य हैं जो वेदरूपी समुद्र [ के मथने ] से उत्पन्न हुए कलियुगके मलको सर्वथा नष्ट कर देनेवाले, अविनाशी, भगवान् श्रीशम्भुके सुन्दर एवं श्रेष्ठ मुखरूपी चन्द्रमामें सदा शोभायमान, जन्म- मरणरूपी रोगके औषध, सबको सुख देनेवाले और श्रीजानकीजीके जीवनस्वरूप श्रीरामनामरूपी अमृतका निरन्तर पान करते रहते हैं ॥ २ ॥
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* *६८२ रामचरितमानस
सो० - मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर ।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न ॥
जहाँ श्रीशिव- पार्वती बसते हैं, उस काशीको मुक्तिकी जन्मभूमि, ज्ञानकी खान और पापोंका नाश करनेवाली जानकर उसका सेवन क्यों न किया जाय?
जरत सकल सुर बूंद बिषम गरल जेहिं पान किय ।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस ॥
जिस भीषण हलाहल विषसे सब देवतागण जल रहे थे उसको जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, रे मन्द मन! तू उन शङ्करजीको क्यों नहीं भजता? उनके समान कृपालु [ और] कौन है?
आगें चले बहुरि रघुराया । रिष्यमूक पर्बत निअराया ॥
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा । आवत देखि अतुल बल सींवा ॥
श्रीरघुनाथजी फिर आगे चले । ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया । वहाँ ( ऋष्यमूक पर्वतपर ) मन्त्रियोंसहित सुग्रीव रहते थे । अतुलनीय बलकी सीमा श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजीको आते देखकर—॥१ ॥
अति सभीत कह सुनु हनुमाना । पुरुष जुगल बल रूप निधाना ॥
धरि बटु रूप देखु तैं जाई । कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई । सुग्रीव अत्यन्त भयभीत होकर बोले- हे हनुमान्! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूपके निधान हैं । तुम ब्रह्मचारीका रूप धारण करके जाकर देखो । अपने हृदयमें उनकी यथार्थ बात जानकर मुझे इशारेसे समझाकर कह देना ॥२ ॥
पठए बालि होहिं मन मैला । भागौं तुरत तजौं यह सैला ॥
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ । माथ नाइ पूछत अस भयऊ ॥
यदि वे मनके मलिन बालिके भेजे हुए हों तो मैं तुरंत ही इस पर्वतको छोड़कर भाग जाऊँ । [ यह सुनकर ] हनुमान्जी ब्राह्मणका रूप धरकर वहाँ गये और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे—॥३ ॥
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा । छत्री रूप फिरहु बन बीरा ॥
कठिन भूमि कोमल पद गामी । कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी ॥
हे वीर! साँवले और गोरे शरीरवाले आप कौन हैं, जो क्षत्रियके रूपमें वनमें फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमिपर कोमल चरणोंसे चलनेवाले आप किस कारण वनमें विचर रहे हैं? ॥४ ॥
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* * किष्किन्धाकाण्ड ६८३
मृदुल मनोहर सुंदर गाता । सहत दुसह बन आतप बाता ॥
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ ॥ नर नारायन की तुम्ह दोऊ ॥
मनको हरण करनेवाले आपके सुन्दर, कोमल अंग हैं, और आप वनके दु:सह धूप और वायुको सह रहे हैं । क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश – इन तीन देवताओंमेंसे कोई हैं, या आप दोनों नर और नारायण हैं ॥ ५ ॥
दो० – जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार ।
की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार ॥१ ॥
अथवा आप जगत्के मूल कारण और सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी स्वयं भगवान् हैं, जिन्होंने लोगोंको भवसागरसे पार उतारने तथा पृथ्वीका भार नष्ट करनेके लिये मनुष्य-रूपमें अवतार लिया है? ॥ १ ॥
कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए ॥
नाम राम लछिमन दोउ भाई । संग नारि सुकुमारि सुहाई ॥
[ श्रीरामचन्द्रजीने कहा— ] हम कोसलराज दशरथजीके पुत्र हैं और पिताका वचन मानकर वन आये हैं । हमारे राम- लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं । हमारे साथ सुन्दर सुकुमारी स्त्री थी ॥१ ॥
इहाँ हरी निसिचर बैदेही । बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही ॥
आपन चरित कहा हम गाई । कहहु बिप्र निज कथा बुझाई ॥
यहाँ ( वनमें ) राक्षसने [मेरी पत्नी ] जानकीको हर लिया । हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते
हैं । हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया । अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिये ॥२ ॥
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना । सो सुख उमा जाइ नहिं बरना ॥
पुलकित तन मुख आव न बचना । देखत रुचिर बेष कै रचना ॥
प्रभुको पहचानकर हनुमान्जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े ( उन्होंने साष्टाङ्ग दण्डवत् - प्रणाम किया) । [ शिवजी कहते हैं - ] हे पार्वती! वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता । शरीर पुलकित है, मुखसे वचन नहीं निकलता । वे प्रभुके सुन्दर वेषकी रचना देख रहे हैं! ॥३ ॥
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही । हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही ॥
मोर न्याउ मैं पूछा साईं । तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं ॥
फिर धीरज धरकर स्तुति की । अपने नाथको पहचान लेनेसे हृदयमें हर्ष हो रहा है । [ फिर हनुमान्जीने कहा— ] हे स्वामी! मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था, [ वर्षोंके बाद आपको देखा, वह भी तपस्वीके वेषमें और मेरी वानरी-बुद्धि, इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थितिके अनुसार मैंने आपसे पूछा] परन्तु आप मनुष्यकी तरह कैसे पूछ रहे हैं? ॥४ ॥
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* *६८४ रामचरितमानस
तव माया बस फिरउँ भुलाना । ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना ॥
मैं तो आपकी मायाके वश भूला फिरता हूँ; इसीसे मैंने अपने स्वामी ( आप) को नहीं पहचाना ॥ ५ ॥
दो० – एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान ।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान ॥ २ ॥
एक तो मैं यों ही मन्द हूँ, दूसरे मोहके वशमें हूँ, तीसरे हृदयका कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर हे दीनबन्धु भगवान्! प्रभु ( आप ) ने भी मुझे भुला दिया! ॥ २ ॥
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें । सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें ॥
नाथ जीव तव मायाँ मोहा । सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ॥
हे नाथ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामीकी विस्मृतिमें न पड़े ( आप उसे न भूल जायँ ) हे नाथ! जीव आपकी मायासे मोहित है । वह आपहीकी कृपासे निस्तार पा सकता है ॥१ ॥
ता पर मैं रघुबीर दोहाई ॥ जानउँ नहिं कछु भजन उपाई ॥
सेवक सुत पति मातु भरोसें । रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ॥
उसपर हे रघुवीर! मैं आपकी दुहाई ( शपथ ) करके कहता हूँ कि मैं भजन -साधन कुछ नहीं जानता । सेवक स्वामीके और पुत्र माताके भरोसे निश्चिन्त रहता है । प्रभुको सेवकका पालन-पोषण करते ही बनता है ( करना ही पड़ता है ) ॥ २ ॥
अस कहि परेउ चरन अकुलाई । निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई ॥
तब रघुपति उठाइ उर लावा । निज लोचन जल सींचि जुड़ावा ॥
ऐसा कहकर हनुमान्जी अकुलाकर प्रभुके चरणोंपर गिर पड़े, उन्होंने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया । उनके हृदयमें प्रेम छा गया । तब श्रीरघुनाथजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया और अपने नेत्रोंके जलसे सींचकर शीतल किया ॥ ३ ॥
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना । तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ॥
समदरसी मोहि कह सब कोऊ । सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ ॥
[ फिर कहा— ] हे कपि! सुनो, मनमें ग्लानि मत मानना ( मन छोटा न करना ) । तुम मुझे लक्ष्मणसे भी दूने प्रिय हो । सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं ( मेरे लिये न कोई प्रिय है न अप्रिय ) पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है ( मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता ) ॥४ ॥
दो० – सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ॥३ ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ६८५ और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर ( जड - चेतन ) जगत् मेरे स्वामी भगवान्का रूप है ॥ ३ ॥
देखि पवनसुत पति अनुकूला । हृदयँ हरष बीती सब सूला ॥
नाथ सैल पर कपिपति रहई । सो सुग्रीव दास तव अहई ॥
स्वामीको अनुकूल ( प्रसन्न ) देखकर पवनकुमार हनुमान्जीके हृदयमें हर्ष छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे । [ उन्होंने कहा— ] हे नाथ! इस पर्वतपर वानरराज सुग्रीव रहता है, वह आपका दास है ॥१ ॥
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे । दीन जानि तेहि अभय करीजे ॥
सो सीता कर खोज कराइहि । जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि ॥
हे नाथ! उससे मित्रता कीजिये और उसे दीन जानकर निर्भय कर दीजिये । वह सीताजीकी खोज करावेगा और जहाँ- तहाँ करोड़ों वानरोंको भेजेगा ॥२ ॥
एहि बिधि सकल कथा समुझाई । लिए दुआ जन पीठि चढ़ाई ॥
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा । अतिसय जन्म धन्य करि लेखा ॥
इस प्रकार सब बातें समझाकर हनुमान्जीने ( श्रीराम- लक्ष्मण ) दोनों जनोंको पीठपर चढ़ा लिया । जब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीको देखा तो अपने जन्मको अत्यन्त धन्य समझा ॥३ ॥
सादर मिलेउ नाइ पद माथा । भेंटेउ अनुज सहित रघुनाथा ॥
कपि कर मन बिचार एहि रीती । करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती ॥
सुग्रीव चरणोंमें मस्तक नवाकर आदरसहित मिले । श्रीरघुनाथजी भी छोटे भाईसहित उनसे गले लगकर मिले । सुग्रीव मनमें इस प्रकार सोच रहे हैं कि हे विधाता! क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे? ॥ ४ ॥
दो० - तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ ।
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाई ॥ ४ ॥
तब हनुमान्जीने दोनों ओरकी सब कथा सुनाकर अग्निको साक्षी देकर परस्पर दृढ़ करके प्रीति जोड़ दी ( अर्थात् अग्निकी साक्षी देकर प्रतिज्ञापूर्वक उनकी मैत्री करवा दी ) ॥४ ॥
कीन्हि प्रीति कछु बीच न राखा । लछिमन राम चरित सब भाषा ॥
कह सुग्रीव नयन भरि बारी । मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी ॥
दोनोंने [ हृदयसे ] प्रीति की, कुछ भी अन्तर नहीं रखा । तब लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीका सारा इतिहास कहा । सुग्रीवने नेत्रोंमें जल भरकर कहा-हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकीजी मिल जायँगी ॥१ ॥
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* *६८६ रामचरितमानस
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा । बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा ॥
गगन पंथ देखी मैं जाता । परबस परी बहुत बिलपाता ॥
मैं एक बार यहाँ मन्त्रियोंके साथ बैठा हुआ कुछ विचार कर रहा था । तब मैंने पराये ( शत्रु ) के वशमें पड़ी बहुत विलाप करती हुई सीताजीको आकाशमार्गसे जाते देखा था ॥२ ॥
राम राम हा राम पुकारी । हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी ॥
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा । पट उर लाइ सोच अति कीन्हा ॥
हमें देखकर उन्होंने ‘ राम! राम! हा राम! ' पुकारकर वस्त्र गिरा दिया था । श्रीरामजीने उसे माँगा, तब सुग्रीवने तुरंत ही दे दिया । वस्त्रको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीने बहुत ही सोच किया ॥३ ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा । तजहु सोच मन आनहु धीरा ॥
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई । जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई ॥
सुग्रीवने कहा— हे रघुवीर! सुनिये, सोच छोड़ दीजिये और मनमें धीरज लाइये । मैं सब प्रकारसे आपकी सेवा करूँगा, जिस उपायसे जानकीजी आकर आपको मिलें ॥४ ॥
दो० – सखा बचन सुनि हरषे कृपासिंधु बलसींव ।
कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ॥५ ॥
कृपाके समुद्र और बलकी सीमा श्रीरामजी सखा सुग्रीवके वचन सुनकर हर्षित हुए । [ और बोले- ] हे सुग्रीव! मुझे बताओ, तुम वनमें किस कारण रहते हो? ॥५ ॥
नाथ बालि अरु मैं द्वौ भाई । प्रीति रही कछु बरनि न जाई ॥
मयसुत मायावी तेहि नाऊँ । आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ ॥
[ सुग्रीवने कहा- ] हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं । हम दोनोंमें ऐसी प्रीति थी कि वर्णन नहीं की जा सकती । हे प्रभो! मय दानवका एक पुत्र था, उसका नाम मायावी था । एक बार वह हमारे गाँवमें आया ॥१ ॥
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा । बाली रिपु बल सहइ न पारा ॥
धावा बालि देखि सो भागा । मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा ॥
उसने आधी रातको नगरके फाटकपर आकर पुकारा ( ललकारा) । बालि शत्रुके बल ( ललकार ) को सह नहीं सका । वह दौड़ा, उसे देखकर मायावी भागा । मैं भी भाईके सङ्ग लगा चला गया ॥ २ ॥
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई । तब बालीं मोहि कहा बुझाई ॥
परिखेसु मोहि एक पखवारा । नहिं आवौं तब जानेसु मारा ॥
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*• * किष्किन्धाकाण्ड ६८७ वह मायावी एक पर्वतकी गुफामें जा घुसा । तब बालिने मुझे समझाकर कहा—तुम एक पखवाड़े ( पंद्रह दिन ) तक मेरी बाट देखना । यदि मैं उतने दिनोंमें न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया ॥३ ॥
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी । निसरी रुधिर धार तहँ भारी ॥
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई । सिला देइ तहँ चलेउँ पराई ॥
हे खरारि! मैं वहाँ महीनेभरतक रहा । वहाँ ( उस गुफामेंसे) रक्तकी बड़ी भारी धारा निकली । तब [ मैंने समझा कि ] उसने बालिको मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा । इसलिये मैं वहाँ ( गुफा द्वारपर) एक शिला लगाकर भाग आया ॥ ४ ॥
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं । दीन्हेउ मोहि राज बरिआईं ॥
बाली ताहि मारि गृह आवा । देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा ॥
मन्त्रियोंने नगरको बिना स्वामी ( राजा ) का देखा, तो मुझको जबर्दस्ती राज्य दे दिया । बालि उसे मारकर घर आ गया । मुझे [ राजसिंहासनपर ] देखकर उसने जीमें भेद बढ़ाया ( बहुत ही विरोध माना ) । [ उसने समझा कि यह राज्यके लोभसे ही गुफाके द्वारपर शिला दे आया था, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ; और यहाँ आकर राजा बन बैठा ] ॥ ५ ॥
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी । हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी ॥
ताकें भय रघुबीर कृपाला । सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला ॥
उसने मुझे शत्रुके समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्रीको भी छीन लिया । हे कृपालु रघुवीर! मैं उसके भयसे समस्त लोकोंमें बेहाल होकर फिरता रहा ॥६ ॥
इहाँ साप बस आवत नाहीं । तदपि सभीत रहउँ मन माहीं ॥
सुनि सेवक दुख दीनदयाला । फरक उठीं द्वै भुजा बिसाला ॥
वह शापके कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मनमें भयभीत रहता हूँ। सेवकका दुःख सुनकर दीनोंपर दया करनेवाले श्रीरघुनाथजीकी दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं ॥७ ॥
दो० – सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान ।
ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान ॥६ ॥
[ उन्होंने कहा— ] हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाणसे बालिको मार डालूँगा । ब्रह्मा और रुद्रकी शरणमें जानेपर भी उसके प्राण न बचेंगे ॥ ६ ॥
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना । मित्रक दुख रज मेरु समाना ॥
जो लोग मित्रके दुःखसे दुःखी नहीं होते, उन्हें देखनेसे ही बड़ा पाप लगता है । अपने पर्वतके समान दुःखको धूलके समान और मित्रके धूलके समान दुःखको सुमेरु ( बड़े भारी पर्वत ) के समान जाने ॥ १ ॥
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* * ६८८ रामचरितमानस
जिन्ह के असि मति सहज न आई । ते सठ कत हठि करत मिताई ॥
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा ॥
जिन्हें स्वभावसे ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसीसे मित्रता करते हैं? मित्रका धर्म है कि वह मित्रको बुरे मार्गसे रोककर अच्छे मार्गपर चलावे । उसके गुण प्रकट करे और अवगुणोंको छिपावे ॥२ ॥
देत लेत मन संक न धरई । बल अनुमान सदा हित करई ॥
बिपति काल कर सतगुन नेहा । श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ॥
देने- लेनेमें मनमें शंका न रखे । अपने बलके अनुसार सदा हित ही करता रहे । विपत्तिके समयमें तो सदा सौगुना स्नेह करे । वेद कहते हैं कि संत ( श्रेष्ठ ) मित्रके गुण ( लक्षण ) ये हैं ॥ ३ ॥
आगें कह मृदु बचन बनाई । पाछें अनहित मन कुटिलाई ॥
जाकर चित अहि गति सम भाई । अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ॥
जो सामने तो बना- बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ पीछे बुराई करता है तथा मनमें कुटिलता रखता है — हे भाई! [ इस तरह ] जिसका मन साँपकी चालके समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्रको तो त्यागनेमें ही भलाई है ॥४ ॥
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी । कपटी मित्र सूल सम चारी ॥
सखा सोच त्यागहु बल मोरें । सब बिधि घटब काज मैं तोरें ॥
मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र–ये चारों शूलके समान [ पीड़ा देनेवाले ] हैं । हे सखा! मेरे बलपर अब तुम चिन्ता छोड़ दो । मैं सब प्रकारसे तुम्हारे काम आऊँगा ( तुम्हारी सहायता करूँगा) ॥ ५ ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा । बालि महाबल अति रनधीरा ॥
दुंदुभि अस्थि ताल देखराए । बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए ॥
सुग्रीवने कहा- हे रघुवीर! सुनिये, बालि महान् बलवान् और अत्यन्त रणधीर है । फिर सुग्रीवने श्रीरामजीको दुन्दुभि राक्षसकी हड्डियाँ और तालके वृक्ष दिखलाये । श्रीरघुनाथजीने उन्हें बिना ही परिश्रमके ( आसानीसे ) ढहा दिया ॥ ६ ॥
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती । बालि बधब इन्ह भइ परतीती ॥
बार बार नावइ पद सीसा । प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा ॥
श्रीरामजीका अपरिमित बल देखकर सुग्रीवकी प्रीति बढ़ गयी और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालिका वध अवश्य करेंगे । वे बार- बार चरणोंमें सिर नवाने लगे । प्रभुको पहचानकर सुग्रीव मनमें हर्षित हो रहे थे ॥७ ॥