श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 691–700
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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** * किष्किन्धाकाण्ड ६८ ९
उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ॥
सुख संपति परिवार बड़ाई । सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ॥
जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा मन स्थिर हो गया । सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई ( बड़प्पन ) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा ॥८ ॥
ए सब राम भगति के बाधक । कहहिं संत तव पद अवराधक ॥
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं । मायाकृत परमारथ नाहीं ॥
क्योंकि आपके चरणोंकी आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब ( सुख -सम्पत्ति आदि ) रामभक्तिके विरोधी हैं । जगत्में जितने भी शत्रु -मित्र और सुख-दुःख [ आदि द्वन्द्व ] हैं, सब - के-सब मायारचित हैं, परमार्थतः ( वास्तवमें ) नहीं हैं॥९॥
बालि परम हित जासु प्रसादा । मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा ॥
सपनें जेहि सन होइ लराई । जागें समुझत मन सकुचाई ॥
हे श्रीरामजी! बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपासे शोकका नाश करनेवाले आप मुझे मिले और जिसके साथ अब स्वप्नमें भी लड़ाई हो तो जागनेपर उसे समझकर मनमें संकोच होगा [ कि स्वप्नमें भी मैं उससे क्यों लड़ा ] ॥ १० ॥
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती । सब तजि भजनु करौं दिन राती ॥
सुनि बिराग संजुत कपि बानी । बोले बिहँसि रामु धनुपानी ॥
हे प्रभो! अब तो इस प्रकार कृपा कीजिये कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूँ । सुग्रीवकी वैराग्ययुक्त वाणी सुनकर ( उसके क्षणिक वैराग्यको देखकर ) हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी मुसकराकर बोले- ॥ ११ ॥
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई । सखा बचन मम मृषा न होई ॥
नट मरकट इव सबहि नचावत । रामु खगेस बेद अस गावत ॥
तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है; परन्तु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता ( अर्थात् बालि मारा जायगा और तुम्हें राज्य मिलेगा) । [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि— ] हे पक्षियोंके राजा गरुड़! नट ( मदारी ) के बंदरकी तरह श्रीरामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं ॥१२ ॥
लै सुग्रीव संग रघुनाथा । चले चाप सायक गहि हाथा ॥
तब रघुपति सुग्रीवसुग्रीव पठावा । गर्जेसि जाइ निकट बल पावा ॥
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* *६ ९० रामचरितमानस तदनन्तर सुग्रीवको साथ लेकर और हाथोंमें धनुष-बाण धारण करके श्रीरघुनाथजी चले । तब श्रीरघुनाथजीने सुग्रीवको बालिके पास भेजा । वह श्रीरामजीका बल पाकर बालिके निकट जाकर गरजा ॥ १३ ॥
सुनत बालि क्रोधातुर धावा । गहि कर चरन नारि समुझावा ॥
सुनु पतिजिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा । ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा ॥
बालि सुनते ही क्रोधमें भरकर वेगसे दौड़ा । उसकी स्त्री ताराने चरण पकड़कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिये, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बलकी सीमा हैं ॥ १४ ॥
कोसलेस सुत लछिमन रामा । कालहु जीति सकहिं संग्रामा ॥
वे कोसलाधीश दशरथजीके पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राममें कालको भी जीत सकते हैं ॥ १५ ॥
दो० – कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ ।
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ ॥७ ॥
बालिने कहा — हे भीरु! ( डरपोक ) प्रिये! सुनो, श्रीरघुनाथजी समदर्शी हैं । जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा ( परमपद पा जाऊँगा) ॥ ७ ॥
अस कहि चला महा अभिमानी । तृन समान सुग्रीवहि जानी ॥
भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा ॥
ऐसा कहकर वह महान् अभिमानी बालि सुग्रीवको तिनकेके समान जानकर चला । दोनों भिड़ गये । बालिने सुग्रीवको बहुत धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोरसे गरजा ॥१ ॥
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा । मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा ॥
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला । बंधु न होइ मोर यह काला ॥
तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा । घूँसेकी चोट उसे वज्रके समान लगी । [ सुग्रीवने आकर कहा— ] हे कृपालु रघुवीर! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं है, काल है ॥२ ॥
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ । तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ ॥
कर परसा सुग्रीव सरीरा । तनु भा कुलिस गई सब पीरा ॥
[ श्रीरामजीने कहा— ] तुम दोनों भाइयोंका एक-सा ही रूप है । इसी भ्रमसे मैंने उसको नहीं मारा । फिर श्रीरामजीने सुग्रीवके शरीरको हाथसे स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्रके समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही ॥ ३ ॥
मेली कंठ सुमन कै माला । पठवा पुनि बल देइ बिसाला ॥
पुनि नाना बिधि भई लराई । बिटप ओट देखहिं रघुराई ॥
तब श्रीरामजीने सुग्रीवके गलेमें फूलोंकी माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा । दोनोंमें पुनः अनेक प्रकारसे युद्ध हुआ । श्रीरघुनाथजी वृक्षकी आड़से देख रहे थे ॥४ ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ६९ १
दो० - बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि ।
मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि ॥ ८ ॥
सुग्रीवने बहुत -से छल-बल किये, किन्तु [ अन्तमें ] भय मानकर हृदयसे हार गया । तब श्रीरामजीने तानकर बालिके हृदयमें बाण मारा ॥ ८ ॥
परा बिकल महि सर के लागें । पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें ॥
स्याम गात सिर जटा बनाएँ । अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ ॥
बाणके लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । किन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको आगे देखकर वह फिर उठ बैठा । भगवान्का श्याम शरीर है, सिरपर जटा बनाये हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिये हैं और धनुष चढ़ाये हैं ॥१ ॥
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा । सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा ॥
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा । बोला चितइ राम की ओरा ॥
बालिने बार- बार भगवान्की ओर देखकर चित्तको उनके चरणोंमें लगा दिया । प्रभुको पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना । उसके हृदयमें प्रीति थी, पर मुखमें कठोर वचन थे । वह श्रीरामजीकी ओर देखकर बोला-॥२ ॥
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं । मारेहु मोहि ब्याध की नाईं ॥
मैं बैरीबैरी सुग्रीव पिआरा । अवगुन कवन नाथ मोहि मारा ॥
हे गोसाईं! आपने धर्मकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और मुझे व्याधकी तरह ( छिपकर ) मारा? मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोषसे आपने मुझे मारा? ॥ ३ ॥
अनुज बधू भगिनी सुत नारी । सुनु सठ कन्या सम ए चारी ॥
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई । ताहि बधें कछु पाप न होई ॥
[ श्रीरामजीने कहा- ] हे मूर्ख! सुन, छोटे भाईकी स्त्री, बहिन, पुत्रकी स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं । इनको जो कोई बुरी दृष्टिसे देखता है, उसे मारनेमें कुछ भी पाप नहीं होता ॥ ४ ॥
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना । नारि सिखावन करसि न काना ॥
मम भुजबल आश्रित तेहि जानी । मारा चहसि अधम अभिमानी ॥
हे मूढ़! तुझे अत्यन्त अभिमान है । तूने अपनी स्त्रीकी सीखपर भी कान ( ध्यान ) नहीं दिया । सुग्रीवको मेरी भुजाओंके बलका आश्रित जानकर भी अरे अधम अभिमानी! तूने उसको मारना चाहा! ॥ ५ ॥
दो० – सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि ।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥९॥
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* *६ ९ २ रामचरितमानस [ बालिने कहा- ] हे श्रीरामजी! सुनिये, स्वामी ( आप ) से मेरी चतुराई नहीं चल सकती । हे प्रभो! अन्तकालमें आपकी गति ( शरण ) पाकर मैं अब भी पापी ही रहा? ॥ १ ॥
सुनत राम अति कोमल बानी । बालि सीस परसेउ निज पानी ॥
अचल करौं तनु राखहु प्राना । बालि कहा सुनु कृपानिधाना ॥
बालिकी अत्यन्त कोमल वाणी सुनकर श्रीरामजीने उसके सिरको अपने हाथसे स्पर्श किया [ और कहा— ] मैं तुम्हारे शरीरको अचल कर दूँ, तुम प्राणोंको रखो । बालिने कहा––हे कृपानिधान! सुनिये —॥१ ॥
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं । अंत राम कहि आवत नाहीं ॥
जासु नाम बल संकर कासी । देत सबहि सम गति अबिनासी ॥
मुनिगण जन्म- जन्ममें ( प्रत्येक जन्ममें ) [ अनेकों प्रकारका ] साधन करते रहते हैं । फिर भी अन्तकालमें उन्हें ' राम ' नहीं कह आता ( उनके मुखसे रामनाम नहीं निकलता) । जिनके नाम बलसे शङ्करजी काशीमें सबको समानरूपसे अविनाशिनी गति ( मुक्ति ) देते हैं ॥२ ॥
मम लोचन गोचर सोइ आवा । बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा ॥
वह श्रीरामजी स्वयं मेरे नेत्रोंके सामने आ गये हैं । हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा? ॥३ ॥
छं० –- सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं ।
जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं ॥
मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही ।
अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही ॥
श्रुतियाँ ' नेति- नेति ' कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मनको जीतकर एवं इन्द्रियोंको [ विषयोंके रससे सर्वथा ] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यानमें जिनकी कभी क्वचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु ( आप ) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं । आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो । परन्तु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्षको काटकर उससे बबूरके बाड़ लगावेगा ( अर्थात् पूर्णकाम बना देनेवाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीरकी रक्षा चाहेगा )? ॥ १ ॥
अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ ।
जेहिं जोनि जन्म कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ ॥
यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ ।
गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ६ ९३ हे नाथ! अब मुझपर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये । मैं कर्मवश जिस योनिमें जन्म लूँ, वहीं श्रीरामजी ( आप ) के चरणोंमें प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बलमें मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये । और हे देवता और मनुष्योंके नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइये ॥ २ ॥
दो० – राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग ।
सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग ॥ १० ॥
श्रीरामजीके चरणोंमें दृढ़ प्रीति करके बालिने शरीरको वैसे ही ( आसानीसे ) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गलेसे फूलोंकी मालाका गिरना न जाने ॥१० ॥
राम बालि निज धाम पठावा । नगर लोग सब ब्याकुल धावा ॥
नाना बिधि बिलाप कर तारा । छूटे केस न देह सँभारा ॥
श्रीरामचन्द्रजीने बालिको अपने परम धाम भेज दिया । नगरके सब लोग व्याकुल होकर दौड़े । बालिकी स्त्री तारा अनेकों प्रकारसे विलाप करने लगी । उसके बाल बिखरे हुए हैं और देहकी सँभाल नहीं है ॥ १ ॥
तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया ॥
छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा ॥
ताराको व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजीने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया ( अज्ञान ) हर ली । [ उन्होंने कहा— ] पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु – इन पाँच तत्त्वोंसे यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है ॥ २ ॥
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥
उपजा ग्यान चरन तब लागी । लीन्हेसि परम भगति बर मागी ॥
वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है । फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्के चरणों लगी और उसने परम भक्तिका वर माँग लिया ॥ ३ ॥
उमा दारु जोषित की नाईं । सबहि नचावत रामु गोसाईं ।
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा । मृतक कर्म बिधिवत सब कीन्हा ॥
[शिवजी कहते हैं - ] हे उमा! स्वामी श्रीरामजी सबको कठपुतलीकी तरह नचाते हैं । तदनन्तर श्रीरामजीने सुग्रीवको आज्ञा दी और सुग्रीवने विधिपूर्वक बालिका सब मृतक- कर्म किया ॥४ ॥
।राम कहा अनुजहि समुझाई राज देहु सुग्रीवहि जाई ॥
रघुपति चरन नाइ करि माथा । चले सकल प्रेरित रघुनाथा ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने छोटे भाई लक्ष्मणको समझाकर कहा कि तुम जाकर सुग्रीवको राज्य दे दो । श्रीरघुनाथजीकी प्रेरणा ( आज्ञा ) से सब लोग श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले ॥ ५ ॥
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६ ९४ * रामचरितमानस:*
दो० – लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज ।
राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज ॥ ११ ॥
लक्ष्मणजीने तुरंत ही सब नगरनिवासियोंको और ब्राह्मणोंके समाजको बुला लिया और [ उनके सामने ] सुग्रीवको राज्य और अंगदको युवराज- पद दिया ॥ ११ ॥
उमा राम सम हित जग माहीं । गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं ॥
सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥
हे पार्वती! जगत्में श्रीरामजीके समान हित करनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है । देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थके लिये ही सब प्रीति करते हैं ॥ १ ॥
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती । तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती ॥
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ । अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ ॥
जो सुग्रीव दिन - रात बालिके भयसे व्याकुल रहता था, जिसके शरीरमें बहुत -से घाव हो गये थे और जिसकी छाती चिन्ताके मारे जला करती थी, उसी सुग्रीवको उन्होंने वानरोंका राजा बना दिया । श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव अत्यन्त ही कृपालु है ॥२ ॥
जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं । काहे न बिपति जाल नर परहीं ॥
पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई । बहु प्रकार नृपनीति सिखाई ॥
जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभुको त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्तिके जालमें फँसें? फिर श्रीरामजीने सुग्रीवको बुला लिया और बहुत प्रकारसे उन्हें राजनीतिकी शिक्षा दी ॥ ३ ॥
कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा । पुर न जाउँ दस चारि बरीसा ॥
गत ग्रीषम बरषा रितु आई । रहिहउँ निकट सैल पर छाई ॥
फिर प्रभुने कहा— हे वानरपति सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वर्षतक गाँव ( बस्ती ) में नहीं जाऊँगा ।
ग्रीष्म ऋतु बीतकर वर्षा -ऋतु आ गयी । अतः मैं यहाँ पास ही पर्वतपर टिक रहूँगा ॥४ ॥
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू । संतत हृदयँ धरेहु मम काजू॥
जब सुग्रीव भवन फिरि आए । रामु प्रबरषन गिरि पर छाए ॥
तुम अंगदसहित राज्य करो । मेरे कामका हृदयमें सदा ध्यान रखना । तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आये, तब श्रीरामजी प्रवर्षण पर्वतपर जा टिके ॥ ५ ॥
दो० – प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ ।
राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ ॥ १२ ॥
देवताओंने पहलेसे ही उस पर्वतकी एक गुफाको सुन्दर बना ( सजा ) रखा था । उन्होंने सोच रखा था कि कृपाकी खान श्रीरामजी कुछ दिन यहाँ आकर निवास करेंगे ॥१२ ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ६ ९५
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा । गुंजत मधुप निकर मधु लोभा ॥
कंद मूल फल पत्र सुहाए । भए बहुत जब ते प्रभु आए ॥
सुन्दर वन फूला हुआ अत्यन्त सुशोभित है । मधुके लोभसे भौंरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं । जबसे प्रभु आये, तबसे वनमें सुन्दर कन्द, मूल, फल और पत्तोंकी बहुतायत हो गयी ॥१ ॥
देखि मनोहर सैल अनूपा । रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा ॥
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा । करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा ॥
मनोहर और अनुपम पर्वतको देखकर देवताओंके सम्राट् श्रीरामजी छोटे भाईसहित वहाँ रह गये । देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओंके शरीर धारण करके प्रभुकी सेवा करने लगे ॥२ ॥
मंगलरूप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते ॥
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई । सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई ॥
जबसे रमापति श्रीरामजीने वहाँ निवास किया तबसे वन मङ्गलस्वरूप हो गया । सुन्दर स्फटिकमणिकी एक अत्यन्त उज्ज्वल शिला है, उसपर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान हैं ॥ ३ ॥
कहत अनुज सन कथा अनेका । भगति बिरति नृपनीति बिबेका ॥
बरषा काल मेघ नभ छाए । गरजत लागत परम सुहाए ॥
श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसे भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञानकी अनेकों कथाएँ कहते हैं । वर्षाकालमें आकाशमें छाये हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं ॥४ ॥
दो० – लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि ।
गृही बिरतिरत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि ॥ १३ ॥
[ श्रीरामजी कहने लगे- ] हे लक्ष्मण! देखो, मोरोंके झुंड बादलोंको देखकर नाच रहे हैं । जैसे वैराग्यमें अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्तको देखकर हर्षित होते हैं ॥ १३ ॥
घन घमंड नभ गरजत घोरा । प्रिया हीन डरपत मन मोरा ॥
दामिनि दमक रह न घन माहीं । खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं ॥
आकाशमें बादल घुमड़ -घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया ( सीताजी ) के बिना मेरा मन डर रहा है । बिजलीकी चमक बादलोंमें ठहरती नहीं, जैसे दुष्टकी प्रीति स्थिर नहीं रहती ॥ १ ॥
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ । जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ ॥
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें । खल के बचन संत सह जैसें ॥
बादल पृथ्वीके समीप आकर ( नीचे उतरकर ) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं । बूँदोंकी चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टोंके वचन संत सहते हैं ॥२ ॥
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* *६ ९६ रामचरितमानस
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई । जस थोरेहुँ धन खल इतराई ॥
भूमि परत भा ढाबर पानी । जनु जीवहि माया लपटानी ॥
छोटी नदियाँ भरकर [ किनारोंको ] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धनसे भी दुष्ट इतरा जाते हैं ( मर्यादाका त्याग कर देते हैं ) । पृथ्वीपर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीवके माया लिपट गयी हो ॥ ३ ॥
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा । जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा ॥
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई । होइ अचल जिमिजिव हरि पाई ॥
जल एकत्र हो -होकर तालाबोंमें भर रहा है, जैसे सद्गुण [ एक -एककर ] सज्जनके पास चले आते हैं । नदीका जल समुद्रमें जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरिको पाकर अचल ( आवागमनसे मुक्त) हो जाता है ॥४ ॥
दो० - हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ॥१४ ॥
पृथ्वी घाससे परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते । जैसे पाखण्ड- मतके प्रचारसे सद्ग्रन्थ गुप्त ( लुप्त ) हो जाते हैं ॥१४ ॥
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई । बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई ॥
नव पल्लव भए बिटप अनेका । साधक मन जस मिलें बिबेका ॥
चारों दिशाओंमें मेढकोंकी ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियोंके समुदाय वेद पढ़ रहे हों । अनेकों वृक्षोंमें नये पत्ते आ गये हैं, जिससे वे ऐसे हरे - भरे एवं सुशोभित हो गये हैं जैसे साधकका मन विवेक ( ज्ञान ) प्राप्त होनेपर हो जाता है ॥ १ ॥
अर्क जवास पात बिनु भयऊ । जस सुराज खल उद्यम गयऊ ॥
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी । करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी ॥
मदार और जवासा बिना पत्तेके हो गये ( उनके पत्ते झड़ गये ) । जैसे श्रेष्ठ राज्यमें दुष्टोंका उद्यम जाता रहा ( उनकी एक भी नहीं चलती ) । धूल कहीं खोजनेपर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्मको दूर कर देता है ( अर्थात् क्रोधका आवेश होनेपर धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता) ॥२ ॥
ससि संपन्न सोह महि कैसी । उपकारी कै संपति जैसी ॥
निसि तम घन खद्योत बिराजा । जनु दभिन्ह कर मिला समाजा ॥
अन्नसे युक्त ( लहलहाती हुई खेतीसे हरी - भरी ) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुषकी सम्पत्ति । रातके घने अन्धकारमें जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियोंका समाज आ जुटा हो ॥३ ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ६ ९७
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं ॥
कृषी निरावहिं चतुर किसाना । जिमि बुध तजहिं मोह मद माना ॥
भारी वर्षासे खेतोंकी क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होनेसे स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं । चतुर किसान खेतोंको निरा रहे हैं ( उनमेंसे घास आदिको निकालकर फेंक रहे हैं ) । जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मानका त्याग कर देते हैं ॥४ ॥
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं । कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं ॥
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा । जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा ॥
चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुगको पाकर धर्म भाग जाते हैं । ऊसरमें वर्षा होती है, पर वहाँ घासतक नहीं उगती । जैसे हरिभक्तके हृदयमें काम नहीं उत्पन्न होता ॥ ५ ||
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा । प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा ॥
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना । जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना ॥
पृथ्वी अनेक तरहके जीवोंसे भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजाकी वृद्धि होती है । जहाँ- तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रियाँ [शिथिल होकर विषयोंकी ओर जाना छोड़ देती हैं ] ॥ ६ ॥
दो० – कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं ।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं ॥ १५ ( क ) ॥
कभी- कभी वायु बड़े जोरसे चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं । जैसे कुपुत्रके उत्पन्न होनेसे कुलके उत्तम धर्म ( श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ( क ) ॥
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग ।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ॥ १५ ( ख ) ॥
कभी [ बादलोंके कारण ] दिनमें घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं । जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है ॥ १५ (ख) ॥
बरषा बिगत सरद रितु आई । लछिमन देखहु परम सुहाई ॥
फूलें कास सकल महि छाई । जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई ॥
हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गयी और परम सुन्दर शरद् ऋतु आ गयी । फूले हुए काससे सारी पृथ्वी छा गयी । मानो वर्षा - ऋतुने [ कासरूपी सफेद बालोंके रूपमें ] अपना बुढ़ापा प्रकट किया है ॥ १ ॥
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा । जिमि लोभहि सोषइ संतोषा ॥
सरिता सर निर्मल जल सोहा । संत हृदय जस गत मद मोहा ॥
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* *६ ९८ रामचरितमानस अगस्त्यके तारेने उदय होकर मार्गके जलको सोख लिया, जैसे सन्तोष लोभको सोख लेता है । नदियों और तालाबोंका निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोहसे रहित संतोंका हृदय! ॥ २ ॥
रस रस सूख सरित सर पानी । ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी ॥
जानि सरद रितु खंजन आए । पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए ॥
नदी और तालाबोंका जल धीरे - धीरे सूख रहा है । जैसे ज्ञानी ( विवेकी ) पुरुष ममताका त्याग करते हैं । शरद् ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये । जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं (पुण्य प्रकट हो जाते हैं ) ॥ ३ ॥
पंक न रेनु सोह असि धरनी । नीति निपुन नृप कै जसि करनी ॥
जल संकोच बिकल भइँ मीना । अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना ॥
न कीचड़ है न धूल; इससे धरती [ निर्मल होकर ] ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजाकी करनी! जलके कम हो जानेसे मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख ( विवेकशून्य ) कुटुम्बी ( गृहस्थ ) धनके बिना व्याकुल होता है ॥४ ॥
बिनु घन निर्मल सोह अकासा । हरिजन इव परिहरि सब आसा ॥
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी । कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी ॥
बिना बादलोंका निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओंको छोड़कर सुशोभित होते हैं । कहीं-कहीं ( विरले ही स्थानोंमें ) शरद् ऋतुकी थोड़ी -थोड़ी वर्षा हो रही है । जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं ॥५ ॥
दो० – चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि ।
जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि ॥ १६ ॥
[ शरद् - ऋतु पाकर ] राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी [क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षाके लिये ] हर्षित होकर नगर छोड़कर चले । जैसे श्रीहरिकी भक्ति पाकर चारों आश्रमवाले [ नाना प्रकारके साधनरूपी ] श्रमोंको त्याग देते हैं ॥१६ ॥
सुखी मीन जे नीर अगाधा । जिमि हरि सरन न एकउ बाधा ॥
फूलें कमल सोह सर कैसा । निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा ॥
जो मछलियाँ अथाह जलमें हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरिके शरणमें चले जानेपर एक भी बाधा नहीं रहती । कमलोंके फूलनेसे तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होनेपर शोभित होता है ॥१ ॥
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा । सुंदर खग रव नाना रूपा ॥
चक्रबाक मन दुख निसि पेखी । जिमि दुर्जन पर संपति देखी ॥