श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 701–710
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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* * किष्किन्धाकाण्ड ६ ९९ भौरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, तथा पक्षियोंके नाना प्रकारके सुन्दर शब्द हो रहे हैं । रात्रि देखकर चकवेके मनमें वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरेकी सम्पत्ति देखकर दुष्टको होता है ॥ २ ॥
चातक रटत तृषा अति ओही । जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही ॥
सरदातप निसि ससि अपहरई । संत दरस जिमि पातक टरई ॥
पपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशङ्करजीका द्रोही सुख नहीं पाता ( सुखके लिये झीखता रहता है ) । शरद् ऋतुके तापको रातके समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतोंके दर्शनसे पाप दूर हो जाते हैं ॥ ३ ॥
देखि इंदु चकोर समुदाई । चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई ॥
मसक दंस बीते हिम त्रासा । जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा ॥
चकोरोंके समुदाय चन्द्रमाको देखकर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्को पाकर उनके [ निर्निमेष नेत्रोंसे ] दर्शन करते हैं । मच्छर और डाँस जाड़ेके डरसे इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मणके साथ वैर करनेसे कुलका नाश हो जाता है ॥ ४ ॥
दो० – भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ ।
सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ ॥ १७ ॥
[ वर्षा ऋतुके कारण ] पृथ्वीपर जो जीव भर गये थे, वे शरद् ऋतुको पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्गुरुके मिल जानेपर सन्देह और भ्रमके समूह नष्ट हो जाते हैं ॥१७ ॥
बरषा गत निर्मल रितु आई । सुधि न तात सीता कै पाई ॥
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं । कालहु जीति निमिष महुँ आनौं ।
वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद् ऋतु आ गयी । परन्तु हे तात! सीताकी कोई खबर नहीं मिली ।
एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो कालको भी जीतकर पलभरमें जानकीको ले आऊँ ॥१ ॥
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई । तात जतन कर आनउँ सोई ॥
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी । पावा राज कोस पुर नारी ॥
कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा । राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिये सुग्रीवने भी मेरी सुधि भुला दी ॥२ ॥
जेहिं सायक मारा मैं बाली । तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली ॥
जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा । ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा ॥
जिस बाणसे मैंने बालिको मारा था, उसी बाणसे कल उस मूढ़को मारूँ! [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! जिनकी कृपासे मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्नमें भी क्रोध हो सकता है? [ यह तो लीलामात्र है ] ॥ ३ ॥
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* *७०० रामचरितमानस
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी । जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी ॥
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना । धनुष चढ़ाई गहे कर बाना ॥
ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रीति मान ली है ( जोड़ ली है ), वे ही इस चरित्र ( लीलारहस्य ) को जानते हैं । लक्ष्मणजीने जब प्रभुको क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथमें ले लिये ॥४ ॥
दो० – तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव ।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव ॥ १८ ॥
तब दयाकी सीमा श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको समझाया कि हे तात! सखा सुग्रीवको केवल भय दिखलाकर ले आओ [उसे मारनेकी बात नहीं है ] ॥ १८ ॥
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा । राम काजु सुग्रीवँ बिसारा ॥
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा । चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा ॥
यहाँ ( किष्किन्धानगरीमें ) पवनकुमार श्रीहनुमान्जीने विचार किया कि सुग्रीवने श्रीरामजीके कार्यको भुला दिया । उन्होंने सुग्रीवके पास जाकर चरणोंमें सिर नवाया । [ साम, दान, दण्ड, भेद ] चारों प्रकारकी नीति कहकर उन्हें समझाया ॥१ ॥
सुनि सुग्रीवँ परम भय माना । बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना ॥
अब मारुतसुत दूत समूहा । पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा ॥
हनुमान्जीके वचन सुनकर सुग्रीवने बहुत ही भय माना । [ और कहा- ] विषयोंने मेरे ज्ञानको हर लिया । अब हे पवनसुत! जहाँ- तहाँ वानरोंके यूथ रहते हैं; वहाँ दूतोंके समूहोंको भेजो ॥ २ ॥
कहहु पाख महुँ आव न जोई । मोरें कर ता कर बध होई ॥
तब हनुमंत बोलाए दूता । सब कर करि सनमान बहूता ॥
और कहला दो कि एक पखवाड़ेमें ( पंद्रह दिनोंमें ) जो न आ जायगा, उसका मेरे हाथों वध होगा । तब हनुमान्जीने दूतोंको बुलाया और सबका बहुत सम्मान करके —॥३ ॥
भय अरु प्रीति नीति देखराई । चले सकल चरनन्हि सिर नाई ॥
एहि अवसर लछिमन पुर आए । क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए ॥
सबको भय, प्रीति और नीति दिखलायी । सब बंदर चरणोंमें सिर नवाकर चले । इसी समय
लक्ष्मणजी नगरमें आये । उनका क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे ॥४ ॥
दो०- धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार ।
ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणजीने धनुष चढ़ाकर कहा कि नगरको जलाकर अभी राख कर दूँगा ।
तब नगरभरको व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगदजी उनके पास आये ॥ १ ९ ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ७०१
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही । लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही ॥
क्रोधवंत लछिमन सुनि काना । कह कपीस अति भयँ अकुलाना ॥
अंगदने उनके चरणोंमें सिर नवाकर विनती की ( क्षमायाचना की) । तब लक्ष्मणजीने उनको अभय बाँह दी ( भुजा उठाकर कहा कि डरो मत ) । सुग्रीवने अपने कानोंसे लक्ष्मणजीको क्रोधयुक्त सुनकर भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर कहा—॥१ ॥
सुनु हनुमंत संग लै तारा । करि बिनती समुझाउ कुमारा ॥
तारा सहित जाइ हनुमाना । चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना ॥
हे हनुमान्! सुनो, तुम ताराको साथ ले जाकर विनती करके राजकुमारको समझाओ ( समझा- बुझाकर शान्त करो ) । हनुमान्जीने तारासहित जाकर लक्ष्मणजीके चरणोंकी वन्दना की और प्रभुके सुन्दर यशका बखान किया ॥ २ ॥
करि बिनती मंदिर लै आए । चरन पखारि पलँग बैठाए ॥
तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा । गहि भुज लछिमन कंठ लगावा ॥
वे विनती करके उन्हें महलमें ले आये तथा चरणोंको धोकर उन्हें पलंगपर बैठाया । तब वानरराज सुग्रीवने उनके चरणोंमें सिर नवाया और लक्ष्मणजीने हाथ पकड़कर उनको गलेसे लगा लिया ॥३ ॥
नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं । मुनि मन मोह करइ छन माहीं ॥
सुनत बिनीत बचन सुख पावा । लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा ॥
[ सुग्रीवने कहा— ] हे नाथ! विषयके समान और कोई मद नहीं है । यह मुनियोंके मनमें भी क्षणमात्रमें मोह उत्पन्न कर देता है [ फिर मैं तो विषयी जीव ही ठहरा ] । सुग्रीवके विनययुक्त वचन सुनकर लक्ष्मणजीने सुख पाया और उनको बहुत प्रकारसे समझाया ॥ ४ ॥
पवन तनय सब कथा सुनाई । जेहि बिधि गए दूत समुदाई ॥
तब पवनसुत हनुमान्जीने जिस प्रकार सब दिशाओंमें दूतोंके समूह गये थे वह सब हाल सुनाया ॥ ५ ॥
दो० - हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ ।
रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ ॥२०॥ २० ॥॥
तब अंगद आदि वानरोंको साथ लेकर और श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणजीको आगे करके ( अर्थात् उनके पीछे - पीछे ) सुग्रीव हर्षित होकर चले और जहाँ रघुनाथजी थे वहाँ आये ॥ २० ॥
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी । नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी ॥
अतिसय प्रबल देव तव माया । छूटइ राम करहु जौं दाया ॥
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* *७०२ रामचरितमानस श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीवने कहा- हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है । हे देव! आपकी माया अत्यन्त ही प्रबल है । आप जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छूटती है ॥ १ ॥
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी । मैं पावँर पसु कपि अति कामी ॥
नारि नयन सर जाहि न लागा । घोर क्रोध तम निसि जो जागा ॥
हे स्वामी! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयोंके वशमें हैं । फिर मैं तो पामर पशु और पशुओंमें भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्रीका नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयङ्कर क्रोधरूपी अँधेरी रातमें भी जागता रहता है (क्रोधान्ध नहीं होता) ॥ २ ॥
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया । सो नर तुम्ह समान रघुराया ॥
यह गुन साधन तें नहिं होई । तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ॥
और लोभकी फाँसीसे जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आपहीके समान है । ये गुण साधनसे नहीं प्राप्त होते । आपकी कृपासे ही कोई- कोई इन्हें पाते हैं ॥३ ॥
तब रघुपति बोले मुसुकाई ॥ तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई ॥
अब सोइ जतनु करहु मन लाई । जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई ॥
तब श्रीरघुनाथजी मुसकराकर बोले- हे भाई! तुम मुझे भरतके समान प्यारे हो । अब मन लगाकर वही उपाय करो जिस उपायसे सीताकी खबर मिले ॥ ४ ॥
दो० - एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ ।
नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरूथ ॥२१ ॥
इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरोंके यूथ ( झुंड ) आ गये । अनेक रंगोंके वानरोंके दल सब दिशाओंमें दिखायी देने लगे ॥ २१ ॥
बानर कटक उमा मैं देखा । सो मूरुख जो करन चह लेखा ॥
आइ राम पद नावहिं माथा । निरखि बदनु सब होहिं सनाथा ॥
[शिवजी कहते हैं - ] हे उमा! वानरोंकी वह सेना मैंने देखी थी । उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान् मूर्ख है । सब वानर आ-आकर श्रीरामजीके चरणोंमें मस्तक नवाते हैं और [ सौन्दर्य- माधुर्यनिधि ] श्रीमुखके दर्शन करके कृतार्थ होते हैं ॥१ ॥
अस कपि एक न सेना माहीं । राम कुसल जेहि पूछी नाहीं ॥
यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई । बिस्वरूप ब्यापक रघुराई ॥
सेनामें एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे श्रीरामजीने कुशल न पूछी हो । प्रभुके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि श्रीरघुनाथजी विश्वरूप तथा सर्वव्यापक हैं ( सारे रूपों और सब स्थानोंमें हैं ) ॥ २ ॥
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* * किष्किन्धाकाण्ड ७०३
ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई । कह सुग्रीव सबहि समुझाई ॥
राम काजु अरु मोर निहोरा । बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा ॥
आज्ञा पाकर सब जहाँ - तहाँ खड़े हो गये । तब सुग्रीवने सबको समझाकर कहा कि हे वानरोंके समूहो! यह श्रीरामचन्द्रजीका कार्य है और मेरा निहोरा ( अनुरोध ) है; तुम चारों ओर जाओ ॥३ ॥
जनकसुता कहुँ खोजहु जाई । मास दिवस महँ आएहु भाई ॥
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ । आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ ॥
और जाकर जानकीजीको खोजो । हे भाई! महीनेभरमें वापस आ जाना । जो [ महीनेभरकी ] अवधि बिताकर बिना पता लगाये ही लौट आवेगा उसे मेरे द्वारा मरवाते ही बनेगा ( अर्थात् मुझे उसका वध करवाना ही पड़ेगा ) ॥४ ॥
दो० - बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।
तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत ॥ २२ ॥
सुग्रीवके वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहाँ-तहाँ ( भिन्न-भिन्न दिशाओंमें ) चल दिये । तब सुग्रीवने अंगद, नल, हनुमान् आदि प्रधान-प्रधान योद्धाओंको बुलाया [ और कहा— ] ॥ २२ ॥
सुनहु नील अंगद हनुमाना । जामवंत मतिधीर सुजाना ॥
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू । सीता सुधि पूँछेहु सब काहू ॥
हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान्! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशाको जाओ और सब किसीसे सीताजीका पता पूछना ॥१ ॥
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु ॥ रामचंद्र कर काजु सँवारेहु ॥
भानु पीठि सेइअ उर आगी । स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी ॥
मन, वचन तथा कर्मसे उसीका ( सीताजीका पता लगानेका ) उपाय सोचना । श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सम्पन्न ( सफल ) करना । सूर्यको पीठसे और अग्निको हृदयसे ( सामनेसे ) सेवन करना चाहिये । परन्तु स्वामीकी सेवा तो छल छोड़कर सर्वभावसे ( मन, वचन, कर्मसे ) करनी चाहिये ॥ २ ॥
तजि माया सेइअ परलोका । मिटहिं सकल भवसंभव सोका ॥
देह धरे कर यह फलु भाई । भजिअ राम सब काम बिहाई ॥
माया ( विषयोंकी ममता-आसक्ति ) को छोड़कर परलोकका सेवन ( भगवान्के दिव्य धामकी प्राप्तिके लिये भगवत्सेवारूप साधन ) करना चाहिये, जिससे भव ( जन्म- मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायँ । हे भाई! देह धारण करनेका यही फल है कि सब कामों ( कामनाओं ) को छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही किया जाय ॥ ३ ॥
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* *७०४ रामचरितमानस
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी ॥
आयसु मागि चरन सिरु नाई । चले हरषि सुमिरत रघुराई ॥
सद्गुणोंको पहचाननेवाला ( गुणवान् ) तथा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेमी है । आज्ञा माँगकर और चरणोंमें फिर सिर नवाकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले ॥ ४॥
पाछें पवन तनय सिरु नावा । जानि काज प्रभु निकट बोलावा ॥
परसा सीस सरोरुह पानी । करमुद्रिका दीन्हि जन जानी ॥
सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमान्जीने सिर नवाया । कार्यका विचार करके प्रभुने उन्हें अपने पास बुलाया । उन्होंने अपने कर-कमलसे उनके सिरका स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथकी अँगूठी उतारकर दी ॥५ ॥
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु । कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु ॥
हनुमत जन्म सुफल करि माना । चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना ॥
[ और कहा- ] बहुत प्रकारसे सीताको समझाना और मेरा बल तथा विरह ( प्रेम ) कहकर तुम शीघ्र लौट आना । हनुमान्जीने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभुको हृदयमें धारण करके वे चले ॥६ ॥
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता । राजनीति राखत सुरत्राता ॥
यद्यपि देवताओंकी रक्षा करनेवाले प्रभु सब बात जानते हैं, तो भी वे राजनीतिकी रक्षा कर रहे हैं । ( नीतिकी मर्यादा रखनेके लिये सीताजीका पता लगानेको जहाँ-तहाँ वानरोंको भेज रहे हैं ) ॥७ ॥
दो०–- चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह ।
राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह ॥ २३ ॥
सब वानर वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतोंकी कन्दराओंमें खोजते हुए चले जा रहे हैं ।
मन श्रीरामजीके कार्यमें लवलीन है । शरीरतकका प्रेम ( ममत्व) भूल गया है ॥ २३ ॥
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेंटा । प्रान लेहिं एक एक चपेटा ॥
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं । कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिं ॥
कहीं किसी राक्षससे भेंट हो जाती है, तो एक-एक चपतमें ही उसके प्राण ले लेते हैं । पर्वतों और वनोंको बहुत प्रकारसे खोज रहे हैं । कोई मुनि मिल जाता है तो पता पूछनेके लिये उसे सब घेर लेते हैं ॥१ ॥
लागि तृषा अतिसय अकुलाने । मिलइ न जल घन गहन भुलाने ॥
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना । मरन चहत सब बिनु जल पाना ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ७०५ इतनेमें ही सबको अत्यन्त प्यास लगी, जिससे सब अत्यन्त ही व्याकुल हो गये । किन्तु जल कहीं नहीं मिला । घने जंगलमें सब भुला गये । हनुमान्जीने मनमें अनुमान किया कि जल पिये बिना सब लोग मरना ही चाहते हैं ॥ २ ॥
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा । भूमि बिबर एक कौतुक पेखा ॥
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं । बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं ॥
उन्होंने पहाड़की चोटीपर चढ़कर चारों ओर देखा तो पृथ्वीके अंदर एक गुफामें उन्हें एक कौतुक ( आश्चर्य ) दिखायी दिया । उसके ऊपर चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं और बहुत-से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे हैं ॥ ३ ॥
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा । सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा ॥
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा I। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा ॥
पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतसे उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी ।
सबने हनुमान्जीको आगे कर लिया और वे गुफामें घुस गये, देर नहीं की॥४ ॥
दो० – दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज ।
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज ॥ २४ ॥
अंदर जाकर उन्होंने एक उत्तम उपवन ( बगीचा ) और तालाब देखा, जिसमें बहुत -से कमल खिले हुए हैं । वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है ॥२४ ॥
दूरि ते ताहि सबन्हि सिरु नावा । पूछें निज बृत्तांत सुनावा ॥
तेहिं तब कहा करहु जल पाना । खाहु सुरस सुंदर फल नाना ॥
दूरसे ही सबने उसे सिर नवाया और पूछनेपर अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया । तब उसने कहा— जलपान करो और भाँति- भाँतिके रसीले सुन्दर फल खाओ ॥ १ ॥
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए । तासु निकट पुनि सब चलि आए ।
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई । मैं अब जाब जहाँ रघुराई ॥
[ आज्ञा पाकर ] सबने स्नान किया, मीठे फल खाये और फिर सब उसके पास चले आये । तब उसने अपनी सब कथा कह सुनायी [ और कहा- ] मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं ॥ २ ॥
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू । पैहहु सीतहि जनि पछिताहू ॥
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा । ठाढ़े सकल सिंधु के तीरा ॥
तुमलोग आँखें मूँद लो और गुफाको छोड़कर बाहर जाओ । तुम सीताजीको पा जाओगे, पछताओ नहीं ( निराश न होओ) । आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्रके तीरपर खड़े हैं ॥३ ॥
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* *७०६ रामचरितमानस
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा । जाइ कमल पद नाएसि माथा ॥
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही । अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही ॥
और वह स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे । उसने जाकर प्रभुके चरणकमलोंमें मस्तक नवाया और बहुत प्रकारसे विनती की । प्रभुने उसे अपनी अनपायिनी ( अचल ) भक्ति दी ॥४ ॥
दो० – बदरीबन कहूँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस ।
उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस ॥ २५ ॥
प्रभुकी आज्ञा सिरपर धारणकर और श्रीरामजीके युगल चरणोंको, जिनकी ब्रह्मा और महेश भी वन्दना करते हैं, हृदयमें धारणकर वह ( स्वयंप्रभा ) बदरिकाश्रमको चली गयी ॥ २५ ॥
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं । बीती अवधि काज कछु नाहीं ॥
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता । बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता ॥
यहाँ वानरगण मनमें विचार कर रहे हैं कि अवधि तो बीत गयी; पर काम कुछ न हुआ । सब मिलकर आपसमें बात करने लगे कि हे भाई! अब तो सीताजीकी खबर लिये बिना लौटकर भी क्या करेंगे? ॥ १ ॥
कह अंगद लोचन भरि बारी । दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी ॥
इहाँ न सुधि सीता कै पाई ॥ उहाँ गएँ मारिहि कपिराई ॥
अंगदने नेत्रोंमें जल भरकर कहा कि दोनों ही प्रकारसे हमारी मृत्यु हुई । यहाँ तो सीताजीकी सुध नहीं मिली और वहाँ जानेपर वानरराज सुग्रीव मार डालेंगे ॥ २ ॥
पिता बधे पर मारत मोही । राखा राम निहोर न ओही ॥
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं । मरन भयउ कछु संसय नाहीं ॥
वे तो पिताके वध होनेपर ही मुझे मार डालते । श्रीरामजीने ही मेरी रक्षा की, इसमें सुग्रीवका कोई एहसान नहीं है । अंगद बार - बार सबसे कह रहे हैं कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥
अंगद बचन सुनत कपि बीरा । बोलि न सकहिं नयन बह नीरा ॥
छन एक सोच मगन होइ रहे । पुनि अस बचन कहत सब भए ॥
वानर वीर अंगदके वचन सुनते हैं; किन्तु कुछ बोल नहीं सकते । उनके नेत्रोंसे जल बह रहा
है । एक क्षणके लिये सब सोचमें मग्न हो रहे । फिर सब ऐसा वचन कहने लगे- ॥४ ॥
हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना । नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना ॥
अस कहि लवन सिंधु तट जाई । बैठे कपि सब दर्भ डसाई ॥
हे सुयोग्य युवराज! हमलोग सीताजीकी खोज लिये बिना नहीं लौटेंगे । ऐसा कहकर लवणसागरके तटपर जाकर सब वानर कुश बिछाकर बैठ गये ॥५ ॥
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** * किष्किन्धाकाण्ड ७०७
जामवंत अंगद दुख देखी । कहीं कथा उपदेस बिसेषी ॥
तात राम कहुँ नर जनि मानहु । निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु ॥
जाम्बवान्ने अंगदका दुःख देखकर विशेष उपदेशकी कथाएँ कहीं । [वे बोले– ] हे तात! श्रीरामजीको मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो ॥६ ॥
हम सब सेवक अति बड़भागी । संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी ॥
हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म ( श्रीरामजी ) प्रीति रखते हैं ॥७ ॥
दो० – निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि ।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥ २६ ॥
देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिये प्रभु अपनी इच्छासे [ किसी कर्मबन्धनसे नहीं ] अवतार लेते हैं । वहाँ सगुणोपासक [ भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य ] सब प्रकारके मोक्षोंको त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं ॥२६ ॥
एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती ॥ गिरि कंदराँ सुनी संपाती ॥
बाहेर होइ देखि बहु कीसा । मोहि अहार दीन्ह जगदीसा ॥
इस प्रकार जाम्बवान् बहुत प्रकारसे कथाएँ कह रहे हैं । इनकी बातें पर्वतकी कन्दरामें सम्पातीने सुनीं । बाहर निकलकर उसने बहुत से वानर देखे । [ तब वह बोला- ] जगदीश्वरने मुझको घर बैठे बहुत -सा आहार भेज दिया! ॥ १ ॥
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ । दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ ॥
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा । आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा ॥
आज इन सबको खा जाऊँगा । बहुत दिन बीत गये, भोजनके बिना मर रहा था । पेटभर भोजन कभी नहीं मिलता । आज विधाताने एक ही बारमें बहुत -सा भोजन दे दिया ॥ २ ॥
डरपे गीध बचन सुनि काना । अब भा मरन सत्य हम जाना ॥
कपि सब उठे गीध कहँ देखी । जामवंत मन सोच बिसेषी ॥
गीधके वचन कानोंसे सुनते ही सब डर गये कि अब सचमुच ही मरना हो गया, यह हमने जान लिया । फिर उस गीध ( सम्पाती ) को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए । जाम्बवान्के मनमें विशेष सोच हुआ ॥३ ॥
कह अंगद बिचारि मन माहीं । धन्य जटायू सम कोउ नाहीं ॥
राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़भागी ॥
अंगदने मनमें विचारकर कहा - अहा! जटायुके समान धन्य कोई नहीं है । श्रीरामजीके कार्यके लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान्के परमधामको चला गया ॥४ ॥
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* * ७०८ रामचरितमानस
सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी ॥
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई । कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई ॥
हर्ष और शोकसे युक्त वाणी ( समाचार ) सुनकर वह पक्षी ( सम्पाती ) वानरोंके पास आया । वानर डर गये । उनको अभय करके ( अभय- वचन देकर ) उसने पास जाकर जटायुका वृत्तान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी ॥ ५ ॥
सुनि संपाति बंधु कै करनी । रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी ॥
भाई जटायुकी करनी सुनकर सम्पातीने बहुत प्रकारसे श्रीरघुनाथजीकी महिमा वर्णन की ॥६ ॥
दो० –- मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।
बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि ॥ २७ ॥
[ उसने कहा— ] मुझे समुद्रके किनारे ले चलो, मैं जटायुको तिलाञ्जलि दे दूँ । इस सेवाके बदले मैं तुम्हारी वचनसे सहायता करूँगा ( अर्थात् सीताजी कहाँ हैं सो बतला दूँगा ) जिसे तुम खोज रहे हो उसे पा जाओगे ॥ २७ ॥
अनुज क्रिया करि सागर तीरा । कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा ॥
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उड़ाई ॥
समुद्रके तीरपर छोटे भाई जटायुकी क्रिया ( श्राद्ध आदि) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा- हे वीर वानरो! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानीमें एक बार आकाशमें उड़कर सूर्यके निकट चले गये ॥ १ ॥
तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मैं अभिमानी रबि निअरावा ॥
जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ॥
वह ( जटायु ) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया । ( किन्तु ) मैं अभिमानी था इसलिये सूर्यके पास चला गया । अत्यन्त अपार तेजसे मेरे पंख जल गये । मैं बड़े जोरसे चीख मारकर जमीनपर गिर पड़ा ॥२ ॥
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही । लागी दया देखि करि मोही ॥
बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा । देहजनित अभिमान छड़ावा ॥
वहाँ चन्द्रमा नामके एक मुनि थे । मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी । उन्होंने बहुत प्रकारसे मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित ( देहसम्बन्धी ) अभिमानको छुड़ा दिया ॥३ ॥
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही । तासु नारि निसिचर पति हरिही ॥
तासु खोज पठइहि प्रभु दूता । तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ॥