श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 711–720

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720

पृष्ठ 711

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** किष्किन्धाकाण्ड * ७०९ [ उन्होंने कहा— ] त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यशरीर धारण करेंगे । उनकी स्त्रीको राक्षसोंका राजा हर ले जायगा । उसकी खोजमें प्रभु दूत भेजेंगे । उनसे मिलनेपर तू पवित्र हो जायगा ॥४ ॥

जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता ॥

मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू॥

और तेरे पंख उग आयेंगे; चिन्ता न कर । उन्हें तू सीताजीको दिखा देना । मुनिकी वह वाणी आज सत्य हुई । अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभुका कार्य करो ॥ ५ ॥

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका ॥

तहँ असोक उपबन जहँ रहई । सीता बैठि सोच रत अहई ॥

त्रिकूट पर्वतपर लङ्का बसी हुई है । वहाँ स्वभावहीसे निडर रावण रहता है । वहाँ अशोक नामका उपवन ( बगीचा ) है, जहाँ सीताजी रहती हैं । [ इस समय भी ] वे सोचमें मग्न बैठी हैं ॥६ ॥

दो० – मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार ।

बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार ॥ २८ ॥

मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते; क्योंकि गीधकी दृष्टि अपार होती है ( बहुत दूरतक जाती है ) । क्या करूँ? मैं बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता ॥२८ ॥

जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ॥

मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा ॥

जो सौ योजन ( चार सौ कोस ) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजीका कार्य कर सकेगा । [ निराश होकर घबराओ मत ] मुझे देखकर मनमें धीरज धरो । देखो, श्रीरामजीकी कृपासे [ देखते-ही - देखते ] मेरा शरीर कैसा हो गया ( बिना पाँखका बेहाल था, पाँख उगनेसे सुन्दर हो गया )! ॥१ ॥

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं । अति अपार भवसागर तरहीं ॥

तासु दूत तुम्ह तजि कदराई । राम हृदयँ धरि करहु उपाई ॥

पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागरसे तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजीको हृदयमें धारण करके उपाय करो ॥२ ॥

अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ । तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ ॥

निज निज बल सब काहूँ भाषा । पार जाइ कर संसय राखा ॥

[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं - ] हे गरुड़जी! इस प्रकार कहकर जब गीध चला गया, तब उन ( वानरों ) के मनमें अत्यन्त विस्मय हुआ । सब किसीने अपना- अपना बल कहा! पर समुद्रके पार जानेमें सभीने सन्देह प्रकट किया ॥ ३ ॥

पृष्ठ 712

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*:*७१० रामचरितमानस

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा । नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा ॥

जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी । तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी ॥

ऋक्षराज जाम्बवान् कहने लगे- मैं अब बूढ़ा हो गया । शरीरमें पहलेवाले बलका लेश भी नहीं रहा । जब खरारि ( खरके शत्रु श्रीराम ) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझमें बड़ा बल था ॥ ४ ॥

दो०- बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ ।

उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ ॥ २ ९ ॥

बलिके बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीरका वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ीमें दौड़कर [ उस शरीरकी ] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं ॥ २ ९ ॥

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा । जियँ संसय कछु फिरती बारा ॥

जामवंत कह तुम्ह सब लायक । पठइअ किमि सबही कर नायक ॥

अंगदने कहा— मैं पार तो चला जाऊँगा । परन्तु लौटते समयके लिये हृदयमें कुछ सन्देह है । जाम्बवान्ने कहा— तुम सब प्रकारसे योग्य हो । परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय? ॥ १ ॥

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना । का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥

पवन तनय बल पवन समाना । बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥

ऋक्षराज जाम्बवान्ने श्रीहनुमान्जीसे कहा - हे हनुमान्! हे बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवनके पुत्र हो और बलमें पवनके समान हो । तुम बुद्धि- विवेक और विज्ञानकी खान हो ॥ २ ॥

कवन सो काज कठिन जग माहीं । जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ॥

राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्बताकारा ॥

जगत्में कौन- सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके । श्रीरामजीके कार्यके लिये ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है । यह सुनते ही हनुमान्जी पर्वतके आकारके ( अत्यन्त विशालकाय ) हो गये ॥३ ॥

कनक बरन तन तेज बिराजा । मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा ॥

सिंहनाद करि बारहिं बारा । लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा ॥

उनका सोनेका- सा रंग है, शरीरपर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो । हनुमान्जीने बार - बार सिंहनाद करके कहा- मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ॥ ४ ॥

सहित सहाय रावनहि मारी । आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ॥

जामवंत मैंमैं पूँछउँ तोही । उचित सिखावनु दीजहु मोही ॥

और सहायकोंसहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ । हे जाम्बवान्! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [ कि मुझे क्या करना चाहिये ] ॥५ ॥

पृष्ठ 713

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* किष्किन्धाकाण्ड * ७११

एतना करहु तात तुम्ह जाई । सीतहि देखि कहहु सुधि आई ॥

तब निज भुजबल राजिवनैना । कौतुक लागि संग कपि सेना ॥

[ जाम्बवान्ने कहा- ] हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजीको देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो । फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबलसे [ ही राक्षसोंका संहार कर सीताजीको ले आयेंगे, केवल ] खेलके लिये ही वे वानरोंकी सेना साथ लेंगे ॥६ ॥

छं० – कपि सेन संग सँघारि निसिचर राम सीतहि आनिहैं ।

त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं ॥

जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई ।

रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई ॥

वानरोंकी सेना साथ लेकर राक्षसोंका संहार करके श्रीरामजी सीताजीको ले आयेंगे । तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्‌के तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले सुन्दर यशका बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझनेसे मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीरके चरणकमलका मधुकर ( भ्रमर ) तुलसीदास गाता है ।

दो० - भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिंजे नर अरु नारि ।

तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥ ३० ( क ) ॥

श्रीरघुवीरका यश भव ( जन्म- मरण ) -रूपी रोगकी [ अचूक ] दवा है । जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिराके शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथोंको सिद्ध करेंगे ॥ ३० ( क ) ॥

सो० – नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक ।

सुनिअ तासु गुनग्राम जासु नाम अघ खग बधिक ॥ ३० ( ख ) ॥

जिनका नीले कमलके समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियोंको मारनेके लिये बधिक ( व्याध ) के समान है, उन श्रीरामके गुणोंके समूह ( लीला ) को अवश्य सुनना चाहिये ॥३० ( ख ) ॥ मासपारायण, तेईसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने चतुर्थः सोपानः समाप्तः । कलियुगके समस्त पापोंके नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह चौथा सोपान समाप्त हुआ । ( किष्किन्धाकाण्ड समाप्त )

पृष्ठ 714

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लङ्कादहन ODE अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ॥

पृष्ठ 715

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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस पञ्चम सोपान सुन्दरकाण्ड

श्लोक

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥ १ ॥

शान्त, सनातन, अप्रमेय ( प्रमाणोंसे परे ), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित, वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बड़े, मायासे मनुष्यरूपमें दीखनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले, करुणाकी खान, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥

हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं ( सब जानते ही हैं ) कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई इच्छा नहीं है । हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा ( पूर्ण ) भक्ति दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये ॥ २ ॥

पृष्ठ 716

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* *७१४ रामचरितमानस अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् । सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥

अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत ( सुमेरु ) के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [ को ध्वंस करने ] के लिये अग्निरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणोंके निधान, वानरोंके स्वामी, श्रीरघुनाथजीके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३ ॥

जामवंत के बचन सुहाए । सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥

जाम्बवान्‌के सुन्दर वचन सुनकर हनुमान्जीके हृदयको बहुत ही भाये । [ वे बोले– ] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द-मूल -फल खाकर तबतक मेरी राह देखना ॥१ ॥

जब लगि आवौं सीतहि देखी । होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥

जबतक मैं सीताजीको देखकर [ लौट] न आऊँ । काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है । यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदयमें श्रीरघुनाथजीको धारण करके हनुमान्जी हर्षित होकर चले ॥२ ॥

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ॥

बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥

समुद्रके तीरपर एक सुन्दर पर्वत था । हनुमान्जी खेलसे ही ( अनायास ही ) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार- बार श्रीरघुवीरका स्मरण करके अत्यन्त बलवान् हनुमान्जी उसपरसे बड़े वेगसे उछले ॥३ ॥

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता । चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥

जिस पर्वतपर हनुमान्जी पैर रखकर चले (जिसपरसे वे उछले ), वह तुरंत ही पातालमें धँस गया । जैसे श्रीरघुनाथजीका अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमान्जी चले ॥४ ॥

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी ॥ तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥ समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजीका दूत समझकर मैनाक पर्वतसे कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला हो ( अर्थात् अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे ) ॥५ ॥

पृष्ठ 717

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* * सुन्दरकाण्ड ७१५

दो० -हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥१ ॥

हनुमान्जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ? ॥१ ॥

जात पवनसुत देवन्ह देखा । जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता । पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥

देवताओंने पवनपुत्र हनुमान्जीको जाते हुए देखा । उनकी विशेष बल--बुद्धिको जाननेके लिये ( परीक्षार्थ ) उन्होंने सुरसा नामक सर्पोंकी माताको भेजा, उसने आकर हनुमान्जीसे यह बात कही— ॥१ ॥

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा । सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥

राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥

आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है । यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान्जीने कहा— श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ, ॥ २ ॥

तब तव बदन पैठिहउँ आई । सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥

कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना । ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥

तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [ तुम मुझे खा लेना ] । हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे । जब किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्जीने कहा- तो फिर मुझे खा न ले ॥३ ॥

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा । कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ । तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥

उसने योजनभर ( चार कोसमें ) मुँह फैलाया । तब हनुमान्जीने अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया । उसने सोलह योजनका मुख किया । हनुमान्जी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये ॥४ ॥

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा । तासु दून कपि रूप देखावा ॥

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा । अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥

जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान्जी उसका दूना रूप दिखलाते थे । उसने सौ योजन ( चार सौ कोसका) मुख किया । तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया ॥ ५ ॥

पृष्ठ 718

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* *७१६ रामचरितमानस

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा । मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मैं पावा ॥

और वे उसके मुखमें घुसकर [ तुरंत ] फिर बाहर निकल आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे । [ उसने कहा- ] मैंने तुम्हारे बुद्धि--बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने मुझे भेजा था ॥६ ॥

दो० - राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमानहनुमान ॥२॥ २ ॥॥

तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल- बुद्धिके भण्डार हो । यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमान्जी हर्षित होकर चले ॥२ ॥

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई । करि माया नभु के खग गहई ॥

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥

समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी । वह माया करके आकाशमें उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी । आकाशमें जो जीव-जन्तु उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाईं देखकर ॥१ ॥

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥

उस परछाईंको पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते थे [ और जलमें गिर पड़ते थे ] इस प्रकार वह सदा आकाशमें उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी । उसने वही छल हनुमान्जीसे भी किया । हनुमान्जीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया ॥२ ॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥

तहाँ जाइ देखी बन सोभा । गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥

पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमान्जी उसको मारकर समुद्रके पार गये । वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी । मधु ( पुष्परस ) के लोभसे भौंरे गुञ्जार कर रहे थे ॥३ ॥

नाना तरु फल फूल सुहाए । खग मृग बूंद देखि मन भाए ॥

सैल बिसाल देखि एक आगें । ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें ॥

अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं । पक्षी और पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [ बहुत ही ] प्रसन्न हुए । सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमानजी भय त्यागकर उसपर दौड़कर जा चढ़े ॥ ४ ॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई । प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥

गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥

पृष्ठ 719

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* * सुन्दरकाण्ड ७१७ [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्की कुछ बड़ाई नहीं है । यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता है । पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी । बहुत ही बड़ा किला है, कुछ कहा नहीं जाता ॥ ५ ॥

अति उतंग जलनिधि चहु पासा । कनक कोट कर परम प्रकासा ॥

वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है । सोनेके परकोटे ( चहारदीवारी ) का परम प्रकाश हो रहा है ॥६ ॥

छं० – कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना ।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै I बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥ विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके अंदर बहुत-से सुन्दर - सुन्दर घर हैं । चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है । हाथी, घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन गिन सकता है! अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती ॥ १ ॥

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं ।

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं ।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥

वन, बाग, उपवन ( बगीचे ), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और बावलियाँ सुशोभित हैं । मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं । कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल ( पहलवान) गरज रहे हैं । वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं ॥२ ॥

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं ।

कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही ।

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥

पृष्ठ 720

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* *७१८ रामचरितमानस भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके ( बड़ी सावधानीसे ) नगरकी चारों दिशाओंमें ( सब ओरसे ) रखवाली करते हैं । कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे हैं । तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको त्यागकर परमगति पावेंगे ॥३ ॥

दो० - पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार ।

अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार ॥ ३ ॥

नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय नगरमें प्रवेश करूँ ॥३ ॥

मसक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥

नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥

हनुमान्जी मच्छड़के समान ( छोटा-सा ) रूप धारण कर नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके लङ्काको चले । [ लङ्काके द्वारपर ] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी रहती थी । वह बोली– मेरा निरादर करके ( बिना मुझसे पूछे ) कहाँ चला जा रहा है? ॥१ ॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥

मुठिका एक महा कपि हनी । रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँतक (जितने ) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं । महाकपि हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी ॥२ ॥

पुनि संभारि उठी सो लंका । जोरि पानि कर बिनय ससंका ॥

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा । चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥

वह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी । [ वह बोली— ] रावणको जब ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि- ॥३ ॥

बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संघारे ॥

तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउँ नयन राम कर दूता ॥

जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका संहार हुआ जान लेना । हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्रीरामचन्द्रजीके दूत ( आप ) को नेत्रोंसे देख पायी ॥४ ॥

दो० – तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥४ ॥