श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 721–730
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730
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* * सुन्दरकाण्ड ७१ ९ हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [ दूसरे पलड़ेपर रखे हुए ] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव ( क्षण) - मात्रके सत्सङ्गसे होता है ॥४ ॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥
अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें प्रवेश करके सब काम कीजिये । उसके लिये विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है ॥ १ ॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना । पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥
और हे गरुड़जी! सुमेरु पर्वत उसके लिये रजके समान हो जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने एक बार कृपा करके देख लिया । तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान्का स्मरण करके नगरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा । देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥
। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥गयउ दसानन मंदिर माहीं उन्होंने एक- एक ( प्रत्येक ) महलकी खोज की । जहाँ -तहाँ असंख्य योद्धा देखे । फिर वे रावणके महलमें गये । वह अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता ॥३ ॥
सयन किएँ देखा कपि तेही । मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा । हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥
हनुमान्जीने उस ( रावण ) को शयन किये देखा; परन्तु महलमें जानकीजी नहीं दिखायी दीं । फिर एक सुन्दर महल दिखायी दिया । वहाँ ( उसमें ) भगवान्का एक अलग मन्दिर बना हुआ था ॥ ४ ॥
दो० – रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।
नव तुलसिका बूंद तहँ देखि हरष कपिराइ ॥ ५ ॥
वह महल श्रीरामजीके आयुध ( धनुष -बाण ) के चिह्नोंसे अङ्कित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती । वहाँ नवीन नवीन तुलसीके वृक्ष-समूहोंको देखकर कपिराज श्रीहनुमान्जी हर्षित हुए ॥५ ॥
लंका निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥
मन महुँ तरक करें कपि लागा । तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥
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* *७२० रामचरितमानस लङ्का तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है । यहाँ सज्जन ( साधु पुरुष ) का निवास कहाँ?
हनुमान्जी मनमें इस प्रकार तर्क करने लगे । उसी समय विभीषणजी जागे ॥१ ॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी । साधु ते होइ न कारज हानी ॥
उन्होंने ( विभीषणने ) रामनामका स्मरण ( उच्चारण) किया । हनुमान्जीने उन्हें सज्जन जाना और हृदयमें हर्षित हुए । [ हनुमानजीने विचार किया कि] इनसे हठ करके ( अपनी ओरसे ही ) परिचय करूँगा, क्योंकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ ही होता है ] ॥२ ॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए । सुनत बिभीषन उठि तहँ आए ॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥
ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमान्जीने उन्हें वचन सुनाये ( पुकारा) । सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये । प्रणाम करके कुशल पूछी [ और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिये ॥ ३ ॥
की तुम्ह हरि दासह महँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी । आयहु मोहि करन बड़भागी ॥
क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है । अथवा क्या आप दीनोंसे प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने ( घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने ) आये हैं? ॥ ४ ॥
दो० – तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥ ६ ॥
तब हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना नाम बताया । सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और आनन्दमें ] मग्न हो गये ॥६ ॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी । जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा । करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥
[ विभीषणजीने कहा— ] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो । मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतोंके बीचमें बेचारी जीभ । हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी मुझपर कृपा करेंगे? ॥१ ॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं ॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७२१ मेरा तामसी ( राक्षस ) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है । परन्तु हे हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते ॥२ ॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती । करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥
जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके ( अपनी ओरसे ) दर्शन दिये हैं । [ हनुमान्जीने कहा— ] हे विभीषणजी! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा ही प्रेम किया करते हैं ॥३ ॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥
भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [जातिका ] चञ्चल वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ । प्रात: काल जो हमलोगों ( बंदरों ) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले ॥४ ॥
दो० - अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥ ७ ॥
हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो मुझपर भी कृपा ही की है । भगवान्के गुणोंका स्मरण करके हनुमान्जीके दोनों नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया ॥ ७ ॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी ( श्रीरघुनाथजी ) को भुलाकर [ विषयोंके पीछे ] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय ( परम ) शान्ति प्राप्त की ॥ १ ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही । जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता । देखी चहउँ जानकी माता ॥
फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ ( लङ्कामें ) रहती थीं, वह सब कथा कही । तब हनुमान्जीने कहा—-हे भाई! सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ ॥२ ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई । चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ ॥
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* *७२२ रामचरितमानस विभीषणजीने [ माताके दर्शनकी ] सब युक्तियाँ ( उपाय ) कह सुनायीं । तब हनुमानजी विदा लेकर चले । फिर वही ( पहलेका मसक- सरीखा ) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें ( वनके जिस भागमें ) सीताजी रहती थीं ॥ ३ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥
सीताजीको देखकर हनुमानजीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया । उन्हें बैठे - ही - बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं । शरीर दुबला हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी ( लट ) है । हृदयमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप ( स्मरण ) करती रहती हैं ॥४ ॥
दो० – निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ ८ ॥
श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं ( नीचेकी ओर देख रही हैं ) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है । जानकीजीको दीन ( दुखी ) देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत ही दुखी हुए ॥८ ॥
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौं का भाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा । संग नारि बहु किएँ बनावा ॥
हनुमान्जी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि हे भाई! क्या करूँ ( इनका दुःख कैसे दूर करूँ )? उसी समय बहुत - सी स्त्रियोंको साथ लिये सज- धजकर रावण वहाँ आया ॥१ ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी ॥
उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया । साम, दान, भय और भेद दिखलाया । रावणने
कहा- हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो । मन्दोदरी आदि सब रानियोंको—॥२ ॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ॥
तन धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है । तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ ( परदा ) करके कहने लगीं—॥३ ॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥
अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७२३ हे दशमुख! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं— तू [ अपने लिये भी ] ऐसा ही मनमें समझ ले । रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर नहीं है ॥४ ॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही । अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥
रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है । रे अधम! निर्लज्ज! तुझे लज्जा नहीं आती? ॥५ ॥
दो० – आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ॥ ९ ॥
अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला— ॥९ ॥
सीता तैं मम कृत अपमाना । कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना ॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी । सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥
सीता! तूने मेरा अपमान किया है । मैं तेरा सिर इस कठोर कृपाणसे काट डालूँगा । नहीं तो [ अब भी ] जल्दी मेरी बात मान ले । हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा! ॥ १ ॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥
[ सीताजीने कहा— ] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [ पुष्ट तथा विशाल ] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही । रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है ॥२ ॥
चंद्रहास हरु मममम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा ॥
सीताजी कहती हैं — हे चन्द्रहास ( तलवार)! श्रीरघुनाथजीके विरहकी अग्निसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले । हे तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है ( अर्थात् तेरी धारा ठंढी और तेज है ), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले ॥३ ॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रास जाई ॥
सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा । तब मय दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया । तब रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ ॥ ४ ॥
मास दिवस महुँ कहा न माना । तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ॥
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* *७२४ रामचरितमानस यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा ॥ ५ ॥
- भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बूंद ।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ॥ १० ॥
[ यों कहकर ] रावण घर चला गया । यहाँ राक्षसियोंके समूह बहुत- से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे ॥१० ॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥
उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी । उसकी श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक ( ज्ञान ) में निपुण थी । उसने सबोंको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा--सीताजीकीर सेवा करके अपना कल्याण कर लो ॥१ ॥
सपनें बानर लंका जारी । जातुधान सेनासेना सब मारी ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा । मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥
स्वप्नमें [ मैंने देखा कि ] एक बंदरने लङ्का जला दी । राक्षसोंकी सारी सेना मार डाली गयी । रावण नङ्गा है और गदहेपर सवार है । उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं ॥ २ ॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई । लंका मनहुँ बिभीषनबिभीषन पाई ॥
नगर फिरी रघुबीररघुबीर दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥
इस प्रकारसे वह दक्षिण ( यमपुरीकी ) दिशाको जा रहा है और मानो लङ्का विभीषणने पायी है । नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई फिर गयीT। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा ॥ ३ ॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी । होइहि सत्य गएँ दिन चारी ॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं । जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥
मैं पुकारकर ( निश्चयके साथ ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार ( कुछ ही ) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा । उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥४ ॥
दो० –- जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच ।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥ ११ ॥
तब ( इसके बाद ) वे सब जहाँ- तहाँ चली गयीं । सीताजी मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा ॥११ ॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी । मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ॥
तजौं देह करु बेगि उपाई । दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७२५ सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं- हे माता! तू मेरी विपत्तिकी संगिनी है । जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ । विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता ॥१ ॥
आनि काठ रचु चिता बनाई । मातु अनल पुनि देहि लगाई ॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥
काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे । हे माता! फिर उसमें आग लगा दे । हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे । रावणकी शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने? ॥२ ॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि । प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी । अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥
सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया । [ उसने कहा- ] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी । ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी ॥ ३ ॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला । मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा । अवनि न आवत एकउ तारा ॥
सीताजी [ मन -ही-मन] कहने लगीं- [ क्या करूँ] विधाता ही विपरीत हो गया । न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी । आकाशमें अङ्गारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता ॥४ ॥
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी । मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका । सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता । हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना [ अशोक ] नाम सत्य कर ॥ ५ ॥
नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥
तेरे नये - नये कोमल पत्ते अनिके समान हैं । अग्नि दे, विरह -रोगका अन्त मत कर ( अर्थात् विरह - रोगको बढ़ाकर सीमातक न पहुँचा ) । सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान्जीको कल्पके समान बीता ॥६ ॥
सो० –- कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥ १२ ॥
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* *७२६ रामचरितमानस तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [ सीताजीके सामने ] अँगूठी डाल दी, मानो अशोकने अङ्गारा दे दिया । [ यह समझकर ] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया ॥१२ ॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम नाम अंकित अति सुंदर ॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी । हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥
तब उन्होंने राम- नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी । अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं ॥ १ ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई ॥
सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥
[ वे सोचने लगीं— ] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी ( मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय ) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती । सीताजी
मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं । इसी समय हनुमान्जी मधुर वचन बोले- ॥ २ ॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥
वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके ] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया । वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं । हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥ ३ ॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई । कही सो प्रगट होति किन भाई ॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥
[ सीताजी बोलीं- ] जिसने कानोंके लिये अमृतरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान्जी पास चले गये । उन्हें देखकर सीताजी फिरकर ( मुख फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ ॥ ४ ॥
राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान की ॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी । दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥
[ हनुमान्जीने कहा— ] हे माता जानकी! मैं श्रीरामजीका दूत हूँ । करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ । हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ । श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥ ५ ॥
नर बानरहि संग कहु कैसें । कही कथा भइ संगति जैसें ॥
[ सीताजीने पूछा— ] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ? तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही ॥ ६ ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७२७
दो० – कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ॥ १३ ॥
हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया । उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्मसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है ॥१३ ॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी । सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना । भयहु तात मो कहुँ जलजाना ॥
भगवान्का जन ( सेवक ) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी । नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया । [ सीताजीने कहा- ] हे तात हनुमान्! विरहसागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए ॥१ ॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी । अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥
कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥कोमलचित कृपाल रघुराई । मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित खरके शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल - मङ्गल कहो । श्रीरघुनाथजी तो कोमलहृदय और कृपालु हैं । फिर हे हनुमान्! उन्होंने किस कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है? ॥२ ॥
सहज बानि सेवक सुखदायक । कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता । होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता ॥
सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है । वे श्रीरघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके कोमल साँवले अङ्गोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे? ॥ ३ ॥
बचनु न आव नयन भरे बारी । अहह नाथ हौं निपट बिसारी ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता । बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥
[ मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंमें [विरहके आँसुओंका ] जल भर आया । [ बड़े दुःखसे वे बोलीं– ] हा नाथ! आपने मुझे बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर हनुमान्जी कोमल और विनीत वचन बोले—॥४ ॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता । तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना । तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ॥
हे माता! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित [ शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःखसे दुखी हैं । हे माता! मनमें ग्लानि न मानिये ( मन छोटा करके दुःख न कीजिये ) । श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है ॥ ५ ॥
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* *७२८ रामचरितमानस
दो० - रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर ।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर ॥ १४ ॥
हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनिये । ऐसा कहकर हनुमान्जी प्रेमसे गद्गद हो गये । उनके नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया ॥१४ ॥
कहेउ राम बियोग तव सीता । मो कहूँ सकल भए बिपरीता ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥
[ हनुमान्जी बोले— ] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं । वृक्षोंके नये- नये कोमल पत्ते मानो अग्निके समान, रात्रि कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान ॥१ ॥
कुबलय बिपिन कुंतबन सरिसा । बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा । उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ॥
और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं । मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं । जो हित करनेवाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे हैं । त्रिविध ( शीतल, मन्द, सुगन्ध ) वायु साँपके श्वासके समान ( जहरीली और गरम) हो गयी है ॥ २ ॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई । काहि कहौं यह जान न कोई ॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥
मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है । पर कहूँ किससे? यह दु: ख कोई जानता नहीं । हे प्रिये! मेरे और तेरे प्रेमका तत्त्व ( रहस्य ) एक मेरा मन ही जानता है ॥ ३ ॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं । जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं ॥
प्रभु संदेसु सुनतसुनत बैदेही । मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है । बस, मेरे प्रेमका सार इतनेमें ही समझ ले । प्रभुका
सन्देश सुनते ही जानकीजी प्रेममें मग्न हो गयीं । उन्हें शरीरकी सुध न रही ॥४ ॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता । सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥
हनुमान्जीने कहा— हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो । श्रीरघुनाथजीकी प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दो ॥५ ॥
दो० – निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु ।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥ १५ ॥