श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 731–740

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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* * सुन्दरकाण्ड ७२९ राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग्निके समान हैं । हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और राक्षसोंको जला ही समझो ॥ १५ ॥

जौं रघुबीर होति सुधि पाई । करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥

राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥

श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते । हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है? ॥१ ॥

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई । प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ॥

कछुक दिवस जननी धरु धीरा । कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥

हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु ( उन ) की आज्ञा नहीं है । [ अतः ] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो । श्रीरामचन्द्रजी वानरोंसहित यहाँ आवेंगे ॥२ ॥

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं । तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ॥

हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना ॥

और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे । नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे । [ सीताजीने कहा- ] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान ( नन्हें - नन्हें-से ) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥३ ॥

मोरें हृदय परम संदेहा । सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥

कनक भूधराकार सरीरा । समर भयंकर अतिबल बीरा ॥

अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [ कि तुम-जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे! ] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना शरीर प्रकट किया । सोनेके पर्वत ( सुमेरु ) के आकारका ( अत्यन्त विशाल ) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥४ ॥

सीता मन भरोस तब भयऊ । पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥

तब ( उसे देखकर ) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ । हनुमान्जीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥५ ॥

दो० – सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल ।

प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल ॥१६ ॥

हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती । परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है ( अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्‌को मार सकता है ) ॥१६ ॥

पृष्ठ 732

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* *७३० रामचरितमानस

मन संतोष सुनत कपि बानी । भगति प्रताप तेज बल सानी ॥

आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना । होहु तात बल सील निधाना ॥

भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमान्जीकी वाणी सुनकर सीताजीके मनमें सन्तोष हुआ । उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय जानकर हनुमान्जीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शीलके निधान होओ ॥ १ ॥

अजर अमर गुननिधि सुत होहू । करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना । निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥

हे पुत्र! तुम अजर ( बुढ़ापेसे रहित ), अमर और गुणोंके खजाने होओ । श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें । ' प्रभु कृपा करें ' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेममें मग्न हो गये ॥२ ॥

बार बार नासि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा ॥

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता । आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥

हनुमान्जीने बार - बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा- हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया । आपका आशीर्वाद अमोघ ( अचूक ) है, यह बात प्रसिद्ध है ॥ ३ ॥

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा । लागि देखि सुंदर फल रूखा ॥

सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी । परम सुभट रजनीचर भारी ॥

हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आयी है । [ सीताजीने कहा- ] हे बेटा! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वनकी रखवाली करते हैं ॥४ ॥

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं । जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ॥

[ हनुमान्जीने कहा— ] हे माता! यदि आप मनमें सुख मानें ( प्रसन्न होकर आज्ञा दें ) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है ॥५ ॥

दो० — देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु ।

रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु ॥ १७ ॥

हनुमान्जीको बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजीने कहा-जाओ । हे तात! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण करके मीठे फल खाओ ॥१७ ॥

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा । फल खाएसि तरु तोरैं लागा ॥

रहे तहाँ बहु भट रखवारे । कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥

वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये । फल खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे । वहाँ बहुत - से योद्धा रखवाले थे । उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार की— ॥ १ ॥

पृष्ठ 733

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* * सुन्दरकाण्ड ७३१

नाथ एक आवा कपि भारी । तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥

खाएसि फल अरु बिटप उपारे । रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥

[ और कहा— ] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है । उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली ।

फल खाये, वृक्षोंको उखाड़ डाला और रखवालोंको मसल मसलकर जमीनपर डाल दिया ॥२ ॥

सुनि रावन पठए भट नाना । तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ॥

सब रजनीचर कपि संघारे । गए पुकारत कछु अधमारे ॥

यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे । उन्हें देखकर हनुमान्जीने गर्जना की । हनुमान्जीने सब राक्षसोंको मार डाला, कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये ॥३ ॥

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा । चला संग लै सुभट अपारा ॥

आवत देखि बिटप गहि तर्जा । ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥

फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा । वह असंख्य श्रेष्ठ योद्धाओंको साथ लेकर चला । उसे आते देखकर हनुमान्जीने एक वृक्ष [ हाथमें ] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि ( बड़े जोर ) से गर्जना की ॥४ ॥

दो० – कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि ।

कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ १८ ॥

उन्होंने सेनामें कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया । कुछने फिर जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है ॥१८ ॥

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना । पठएसि मेघनाद बलवाना ॥

मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही । देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥

पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [ अपने जेठे पुत्र ] बलवान् मेघनादको भेजा । ( उससे कहा कि- ) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना । उस बंदरको देखा जाय कि कहाँका है ॥१ ॥

चला इंद्रजित अतुलित जोधा । बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥

कपि देखा दारुन भट आवा । कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥

इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला । भाईका मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया । हनुमान्जीने देखा कि अबकी भयानक योद्धा आया है । तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े ॥२ ॥

पृष्ठ 734

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* *७३२ रामचरितमानस

अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ॥

रहे महाभट ताके संगा । गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा ॥

उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके प्रहारसे ] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया (रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया ) । उसके साथ जो बड़े- बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्जी अपने शरीरसे मसलने लगे ॥३ ॥

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा । भिरे जुगल मानहुँ गजराजा ॥

मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई । ताहि एक छन मुरुछा आई ॥

उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे । [ लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे ] मानो दो गजराज ( श्रेष्ठ हाथी ) भिड़ गये हों । हनुमान्जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े । उसको क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी ॥४ ॥

उठ बहोरि कीन्हिसि बहु माया । जीति न जाइ प्रभंजन जाया ॥

फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे जीते नहीं जाते ॥५ ॥

दो० - ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार ।

जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ॥ १ ९ ॥

अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान ( प्रयोग) किया, तब हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी ॥ १ ९ ॥

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा । परतिहुँ बार कटकु संघारा ॥

तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ ॥

उसने हनुमान्जीको ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे वृक्षसे नीचे गिर पड़े ] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत सी सेना मार डाली । जब उसने देखा कि हनुमान्जी मूर्छित हो गये हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया ॥१ ॥

जासु नाम जप सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ॥

तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥

[ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी ( विवेकी ) मनुष्य संसार ( जन्म- मरण ) के बन्धनको काट डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया ॥२ ॥

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए । कौतुक लागि सभाँ सब आए ॥

दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥

पृष्ठ 735

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* * सुन्दरकाण्ड ७३३ बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये ( तमाशा देखनेके लिये ) सब सभामें आये । हनुमान्जीने जाकर रावणकी सभा देखी । उसकी अत्यन्त प्रभुता ( ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती ॥ ३ ॥

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥

देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥

देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं । ( उसका रुख देख रहे हैं । ) उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ । वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे जैसे सर्पोंके समूहमें गरुड़ निःशङ्क ( निर्भय ) रहते हैं ॥४ ॥

दो० - कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद ।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ॥ २० ॥

हनुमान्जीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा । फिर पुत्र - वधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया ॥ २० ॥

कह लंकेस कवन तैं कीसा । केहि कें बल घालेहि बन खीसा ॥

की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही ॥

लङ्कापति रावणने कहा—रे वानर! तू कौन है? किसके बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला? क्या तूने कभी मुझे ( मेरा नाम और यश ) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ॥ १ ॥

मारे निसिचर केहिं अपराधा । कहु सठ तोहि न प्रान कई बाधा ॥

सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया । पाइ जासु बल बिरचति माया ॥

तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है? [ हनुमान्जीने कहा— ] हे रावण! सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी रचना करती है; ॥२ ॥

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ॥

जा बल सीस धरत सहसानन । अंडकोस समेत गिरि कानन ॥

जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश ( क्रमशः ) सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बलसे सहस्रमुख ( फणों ) वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं; ॥ ३ ॥

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता । तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता ॥

हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा । तेहि समेत नृप दल मद गंजा ॥

पृष्ठ 736

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* * ७३४ रामचरितमानस जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते हैं और जो तुम्हारे - जैसे मूर्खोको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया ॥४ ॥

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली । बधे सकल अतुलित बल साली ॥

जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिको मार डाला, जो सब-के-- 5- सब अतुलनीय बलवान् थे; ॥५ ॥

दो० – जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि ।

तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥२१ ॥

जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्‌को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [ चोरीसे ] हर लाये हो, मैं उन्हींका दूत हूँ ॥२१ ॥

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई । सहसबाहु सन परी लराई ॥

समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥

मैं तुम्हारी प्रभुताको खूब जानता हूँ, सहस्रबाहुसे तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था । हनुमान्जीके [ मार्मिक ] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात टाल दी ॥१ ॥

खायउँ फल प्रभु लागी भूखा । कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥

सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥

हे [ राक्षसोंके ] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, ( इसलिये ) मैंने फल खाये और वानर- स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े । हे ( निशाचरोंके ) मालिक! देह सबको परम प्रिय है । कुमार्गपर चलनेवाले ( दुष्ट ) राक्षस जब मुझे मारने लगे ॥२ ॥

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे I। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे ॥

मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥

तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा । उसपर तुम्हारे पुत्रने मुझको बाँध लिया । [ किन्तु ] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ भी लज्जा नहीं है । मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ ॥३ ॥

बिनती करउँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥

देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥

हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो । तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके देखो और भ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्‌को भजो ॥ ४ ॥

पृष्ठ 737

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* * सुन्दरकाण्ड ७३५

जाकें डर अति काल डेराई । जो सुर असुर चराचर खाई ॥

तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै । मोरे कहें जानकी दीजै ॥

जो देवता, राक्षस और समस्त चराचरको खा जाता है, वह काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो ॥ ५ ॥

दो० – प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि ।

गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥२२ ॥

खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके समुद्र हैं । शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें अपनी शरणमें रख लेंगे ॥२२ ॥

राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राजु तुम्ह करहू ॥

रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका । तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ॥

तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करो और लङ्काका अचल राज्य करो । ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल चन्द्रमाके समान है । उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो ॥ १ ॥

राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥

बसन हीन नहिं सोह सुरारी । सब भूषन भूषित बर नारी ॥

रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़, विचारकर देखो । हे देवताओंके शत्रु! सब गहनोंसे सजी हुई सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना ( नंगी ) शोभा नहीं पाती ॥ २ ॥

राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ॥

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं । बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं ॥

रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पानेके समान है । जिन नदियोंके मूलमें कोई जलस्रोत नहीं है ( अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका ही आसरा है ) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं ॥३ ॥

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी । बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ॥

संकर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥

हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है । हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥४ ॥

दो० - मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।

भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥२३ ॥

पृष्ठ 738

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* *७३६ रामचरितमानस मोह ही जिसका मूल है ऐसे ( अज्ञानजनित ), बहुत पीड़ा देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ २३ ॥

जदपि कही कपि अति हित बानी । भगति बिबेक बिरति नय सानी ॥

बोला बिहसि महा अभिमानी । मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ॥

यद्यपि हनुमान्जीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी रावण बहुत हँसकर ( व्यंगसे ) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला! ॥ १ ॥

मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही ॥

उलटा होइहि कह हनुमाना । मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ॥

रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है । अधम! मुझे शिक्षा देने चला है । हनुमान्जीने कहा— इससे उलटा ही होगा ( अर्थात् मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं ) | यह तेरा मतिभ्रम ( बुद्धिका फेर ) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है ॥ २ ॥

सुनि कपि बचन बहुतखिसिआना । बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना ॥

सुनत निसाचर मारन धाए । सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ॥

हनुमान्जीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया [ और बोला– ] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े । उसी समय मन्त्रियोंके साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे ॥३ ॥

नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति बिरोध न मारिअ दूता ॥

आन दंड कछु करिअ गोसाँई । सबहीं कहा मंत्र भल भाई ॥

उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है । हे गोसाईं! कोई दूसरा दण्ड दिया जाय । सबने कहा- भाई! यह सलाह उत्तम है ॥४ ॥

सुनत बिहसि बोला दसकंधर । अंग भंग करि पठइअ बंदर ॥

यह सुनते ही रावण हँसकर बोला- अच्छा तो, बंदरको अंग- भंग करके भेज ( लौटा) दिया जाय ॥ ५ ॥

दो० – कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ॥२४ ॥

मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर होती है । अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर फिर आग लगा दो ॥२४ ॥

पृष्ठ 739

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* * सुन्दरकाण्ड ७३७

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि । तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ॥

जिन्ह के कीन्हिसि बहुत बड़ाई । देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई ॥

जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ ( अपने स्वामीके पास ) जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा । जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता ( सामर्थ्य ) तो देखूँ! ॥१ ॥

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना । भइ सहाय सारद मैं जाना ॥

जातुधान सुनि रावन बचना । लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ॥

यह वचन सुनते ही हनुमान्जी मनमें मुसकराये [और मन-ही- मन बोले कि ] मैं जान गया, सरस्वतीजी [ इसे ऐसी बुद्धि देनेमें ] सहायक हुई हैं । रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही ( पूँछमें आग लगानेकी ) तैयारी करने लगे ॥ २ ॥

रहा न नगर बसन घृत तेला । बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ॥

कौतुक कहँ आए पुरबासी । मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ॥

[ पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी -तेल लगा कि] नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया । हनुमान्जीने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी ( लंबी हो गयी ) । नगरवासीलोग तमाशा देखने आये । वे हनुमानजीको पैरसे ठोकर मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं ॥३ ॥

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी । नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ॥

पावक जरत देखि हनुमंता ॥ भयउ परम लघुरूप तुरंता ॥

ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं । हनुमानजीको नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी । अग्निको जलते हुए देखकर हनुमान्जी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये ॥ ४ ॥

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं । भईं सभीत निसाचर नारीं ॥

बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े । उनको देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं ॥५ ॥

दो० – हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास ।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ॥ २५ ॥

उस समय भगवान्की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे । हनुमान्जी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे ॥२५ ॥

देह बिसाल परमपरम हरुआईहरुआई ।। मंदिरमंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ॥

जरइ नगर भा लोग बिहाला । झपट लपट बहु कोटि कराला ॥

पृष्ठ 740

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* *७३८ रामचरितमानस देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली ) है । वे दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं । नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गये हैं । आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं ॥१ ॥

तात मातु हा सुनिअ पुकारा । एहिं अवसर को हमहि उबारा ॥

हम जो कहा यह कपि नहिं होई । बानर रूप धरें सुर कोई ॥

हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा? [ चारों ओर ] यही पुकार सुनायी पड़ रही है । हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता है! ॥ २ ॥

साधु अवग्या कर फलु ऐसा । जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥

जारा नगरु निमिष एक माहीं । एक बिभीषन कर गृह नाहीं ॥

साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी तरह जल रहा है । हनुमान्जीने एक

ही क्षणमें सारा नगर जला डाला । एक विभीषणका घर नहीं जलाया ॥३ ॥

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा । जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥

उलट पलट लंका सब जारी । कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ॥

[ शिवजी कहते हैं— ] हे पार्वती! जिन्होंने अग्निको बनाया, हनुमान्जी उन्हींके दूत हैं । इसी कारण वे अग्निसे नहीं जले । हनुमान्जीने उलट- पलटकर ( एक ओरसे दूसरी ओरतक ) सारी लङ्का जला दी । फिर वे समुद्रमें कूद पड़े ॥ ४ ॥

दो० - पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि ।

जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥ २६ ॥

पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा-सा रूप धारण कर हनुमान्जी श्रीजानकीजीके सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए ॥ २६ ॥

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा । जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥

चूड़ामनि उतारि तब दयऊ । हरष समेत पवनसुत लयऊ ॥

[ हनुमान्जीने कहा- ] हे माता! मुझे कोई चिह्न ( पहचान) दीजिये, जैसे श्रीरघुनाथजीने मुझे दिया था । तब सीताजीने चूड़ामणि उतारकर दी । हनुमान्जीने उसको हर्षपूर्वक ले लिया ॥ १ ॥

कहेहु तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥

दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी ॥

[ जानकीजीने कहा— ] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना–हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकारसे पूर्णकाम हैं ( आपको किसी प्रकारकी कामना नहीं है ), तथापि दीनों ( दुखियों ) पर दया करना आपका विरद है [ और मैं दीन हूँ ] अतः उस विरदको याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकटको दूर कीजिये ॥ २ ॥