श्रीगणेशाय नमः।
श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 791–800
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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* * लङ्काकाण्ड ७८९ उसने अंगदपर लात उठायी । अंगदने [ वही ] पैर पकड़कर उसे घुमाकर जमीनपर दे पटका ( मार गिराया ) । राक्षसके समूह भारी योद्धा देखकर जहाँ- तहाँ [ भाग ] चले, वे डरके मारे पुकार भी न मचा सके ॥ ३ ॥
एक एक सन मरमु न कहहीं । समुझि तासु बध चुप करि रहहीं ॥
भयउ कोलाहल नगर मझारी । आवा कपि लंका जेहिं जारी ॥
एक- दूसरेको मर्म ( असली बात ) नहीं बतलाते, उस ( रावणके पुत्र ) का वध समझकर सब चुप मारकर रह जाते हैं । [ रावण- पुत्रकी मृत्यु जानकर और राक्षसोंको भयके मारे भागते देखकर] नगरभरमें कोलाहल मच गया कि जिसने लङ्का जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है ॥४ ॥
अब धौं कहा करिहि करतारा । अति सभीत सब करहिं बिचारा ॥
बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई । जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई ॥
सब अत्यन्त भयभीत होकर विचार करने लगे कि विधाता अब न जाने क्या करेगा । वे बिना पूछे ही अंगदको [ रावणके दरबारकी ] राह बता देते हैं । जिसे ही वे देखते हैं वही डरके मारे सूख जाता है ॥५ ॥
दो० - गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज ।
सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज ॥ १८ ॥
श्रीरामजीके चरणकमलोंका स्मरण करके अंगद रावणकी सभाके द्वारपर गये । और वे धीर, वीर और बलकी राशि अंगद सिंहकी-सी ऐंड़ ( शान ) से इधर- उधर देखने लगे ॥१८ ॥
तुरत निसाचर एक पठावा । समाचार रावनहि जनावा ॥
सुनत बिहँसि बोला दससीसा । आनहु बोलि कहाँ कर कीसा ॥
तुरंत ही उन्होंने एक राक्षसको भेजा और रावणको अपने आनेका समाचार सूचित किया । सुनते ही रावण हँसकर बोला - बुला लाओ, [ देखें ] कहाँका बंदर है ॥ १ ॥
आयसु पाइ दूत बहु धाए । कपिकुंजरहि बोलि लै आए ॥
अंगद दीख दसाननदसानन बैसें । सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें ॥
आज्ञा पाकर बहुत -से दूत दौड़े और वानरोंमें हाथीके समान अंगदको बुला लाये । अंगदने रावणको ऐसे बैठे हुए देखा जैसे कोई प्राणयुक्त ( सजीव ) काजलका पहाड़ हो! ॥२ ॥
भुजा बिटप सिर संग समाना । रोमावली लता जनु नाना ॥
मुख नासिका नयन अरु काना । गिरि कंदरा खोह अनुमाना ॥
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* *७९० रामचरितमानस भुजाएँ वृक्षोंके और सिर पर्वतोंके शिखरोंके समान हैं । रोमावली मानो बहुत- सी लताएँ हैं । मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वतकी कन्दराओं और खोहोंके बराबर हैं ॥३ ॥
गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा । बालितनय अतिबल बाँकुरा ॥
उठे सभासद कपि कहुँ देखी । रावन उर भा क्रोध बिसेषी ॥
अत्यन्त बलवान् बाँके वीर बालिपुत्र अंगद सभामें गये, वे मनमें जरा भी नहीं झिझके । अंगदको
देखते ही सब सभासद् उठ खड़े हुए । यह देखकर रावणके हृदयमें बड़ा क्रोध हुआ ॥४ ॥
दो० – जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ ।
राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ ॥१ ९ ॥
जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडमें सिंह [निःशङ्क होकर ] चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजीके प्रतापका हृदयमें स्मरण करके वे [ निर्भय ] सभामें सिर नवाकर बैठ गये ॥१ ९ ॥
कह दसकंठ कवन तैं बंदर । मैं रघुबीर दूत दसकंधर ॥
मम जनकहि तोहि रही मिताई । तव हित कारन आयउँ भाई ॥
रावणने कहा— अरे बंदर! तू कौन है? [ अंगदने कहा- ] हे दशग्रीव! मैं श्रीरघुवीरका दूत हूँ । मेरे पितासे और तुमसे मित्रता थी । इसलिये हे भाई! मैं तुम्हारी भलाईके लिये ही आया हूँ॥१ ॥
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती । सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा । जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥
तुम्हारा उत्तम कुल है, पुलस्त्य ऋषिके तुम पौत्र हो । शिवजीकी और ब्रह्माजीकी तुमने बहुत प्रकारसे पूजा की है । उनसे वर पाये हैं और सब काम सिद्ध किये हैं । लोकपालों और सब राजाओंको तुमने जीत लिया है ॥२ ॥
नृप अभिमान मोह बस किंबा । हरि आनिहु सीता जगदंबा ॥
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा । सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा ॥
राजमदसे या मोहवश तुम जगज्जननी सीताजीको हर लाये हो । अब तुम मेरे शुभ वचन ( मेरी हितभरी सलाह ) सुनो! [ उसके अनुसार चलनेसे ] प्रभु श्रीरामजी तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे ॥३ ॥
दसन गहहु तून कंठ कुठारी । परिजन सहित संग निज नारी ॥
सादर जनकसुता करि आगें । एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें ॥
दाँतोंमें तिनका दबाओ, गलेमें कुल्हाड़ी डालो और कुटुम्बियोंसहित अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर, आदरपूर्वक जानकीजीको आगे करके, इस प्रकार सब भय छोड़कर चलो—॥४ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ७९१
दो० – प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि ।
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि ॥ २० ॥
और ‘ हे शरणागतके पालन करनेवाले रघुवंशशिरोमणि श्रीरामजी! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । ' [ इस प्रकार आर्त प्रार्थना करो । ] आर्त पुकार सुनते ही प्रभु तुमको निर्भय कर देंगे ॥ २० ॥
रे कपिपोत बोलु संभारी । मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी ॥
कहु निज नाम जनक कर भाई । केहि नातें मानिऐ मिताई ॥
[ रावणने कहा— ] अरे बंदरके बच्चे! सँभालकर बोल! मूर्ख! मुझ देवताओंके शत्रुको तूने जाना
नहीं? अरे भाई! अपना और अपने बापका नाम तो बता । किस नातेसे मित्रता मानता है? ॥१ ॥
अंगद नाम बालि कर बेटा । तासों कबहुँ भई ही भेटा ॥
अंगद बचन सुनत सकुचाना । रहा बालि बानर मैं जाना ॥
[ अंगदने कहा— ] मेरा नाम अंगद है, मैं बालिका पुत्र हूँ । उनसे कभी तुम्हारी भेंट हुई थी? अंगदका वचन सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया [ और बोला- ] हाँ, मैं जान गया ( मुझे याद आ गया ), बालि नामका एक बंदर था ॥२ ॥
अंगद तहीं बालि कर बालक । उपजेहु बंस अनल कुल घालक ॥
गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु ॥ निज मुख तापस दूत कहायहु ॥
अरे अंगद! तू ही बालिका लड़का है? अरे कुलनाशक! तू तो अपने कुलरूपी बाँसके लिये अग्निरूप ही पैदा हुआ! गर्भमें ही क्यों न नष्ट हो गया? तू व्यर्थ ही पैदा हुआ जो अपने ही मुँहसे तपस्वियोंका दूत कहलाया! ॥३ ॥
अब कहु कुसल बालि कहँ अहई । बिहँसि बचन तब अंगद कहई ॥
दिन दस गएँ बालि पहिं जाई । बूझेहु कुसल सखा उर लाई ॥
अब बालिकी कुशल तो बता, वह [ आजकल ] कहाँ है? तब अंगदने हँसकर कहा - दस ( कुछ ) दिन बीतनेपर [स्वयं ही] बालिके पास जाकर, अपने मित्रको हृदयसे लगाकर, उसीसे कुशल पूछ लेना ॥४ ॥
राम बिरोध कुसल जसि होई । सो सब तोहि सुनाइहि सोई ॥
सुनु सठ भेद होइ मन ताकें । श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें ॥
श्रीरामजीसे विरोध करनेपर जैसी कुशल होती है, वह सब तुमको वे सुनावेंगे । हे मूर्ख! सुन, भेद उसीके मनमें पड़ सकता है, ( भेदनीति उसीपर अपना प्रभाव डाल सकती है ) जिसके हृदयमें श्रीरघुवीर न हों ॥५ ॥
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७९२ * रामचरितमानस:*
दो० -– हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस ।
अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस ॥ २१ ॥
सच है, मैं तो कुलका नाश करनेवाला हूँ और हे रावण! तुम कुलके रक्षक हो । अंधे - बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते, तुम्हारे तो बीस नेत्र और बीस कान हैं! ॥ २१ ॥
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई । चाहत जासु चरन सेवकाई ॥
तासु दूत होइ हम कुल बोरा । अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा ॥
शिव, ब्रह्मा [ आदि ] देवता और मुनियोंके समुदाय जिनके चरणोंकी सेवा [ करना ] चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुलको डुबा दिया? अरे ऐसी बुद्धि होनेपर भी तुम्हारा हृदय फट नहीं जाता? ॥१ ॥
सुनि कठोर बानी कपि केरी । कहत दसानन नयन तरेरी ॥
खल तव कठिन बचन सब सहऊँ । नीति धर्म मैं जानत अहऊँ ॥
वानर ( अंगद ) की कठोर वाणी सुनकर रावण आँखें तरेरकर ( तिरछी करके ) बोला- अरे दुष्ट! मैं तेरे सब कठोर वचन इसीलिये सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्मको जानता हूँ ( उन्हींकी रक्षा कर रहा हूँ) ॥२ ॥
कह कपि धर्मसीलता तोरी । हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी ॥
देखी नयन दूत रखवारी । बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी ॥
अंगदने कहा- तुम्हारी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है । [ वह यह कि ] तुमने परायी स्त्रीकी चोरी की है! और दूतकी रक्षाकी बात तो अपनी आँखोंसे देख ली । ऐसे धर्मके व्रतको धारण ( पालन ) करनेवाले तुम डूबकर मर नहीं जाते! ॥३ ॥
कान नाक बिनु भगिनि निहारी । छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी ॥
धर्मसीलता तव जग जागी । पावा दरसु हमहुँ बड़भागी ॥
नाक- कानसे रहित बहिनको देखकर तुमने धर्म विचारकर ही तो क्षमा कर दिया था! तुम्हारी धर्मशीलता जग- जाहिर है । मैं भी बड़ा भाग्यवान् हूँ, जो मैंने तुम्हारा दर्शन पाया? ॥ ४ ॥
दो० – जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु ।
लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु ॥ २२ ( क) ॥
[ रावणने कहा— ] अरे जड जन्तु वानर! व्यर्थ बक -बक न कर; अरे मूर्ख! मेरी भुजाएँ तो देख । ये सब लोकपालोंके विशाल बलरूपी चन्द्रमाको ग्रसनेके लिये राहु हैं ॥ २२ ( क ) |
पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास ।
सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास ॥ २२ ( ख) ॥
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* * लङ्काकाण्ड ७९ ३ फिर [ तूने सुना ही होगा कि ] आकाशरूपी तालाबमें मेरी भुजाओंरूपी कमलोंपर बसकर शिवजीसहित कैलास हंसके समान शोभाको प्राप्त हुआ था! ॥ २२ ( ख ) ॥
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद । मो सन भिरिहि कवन जोधा बद ॥
तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना । अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥
अरे अंगद! सुन; तेरी सेनामें बता, ऐसा कौन योद्धा है जो मुझसे भिड़ सकेगा । तेरा मालिक तो स्त्रीके वियोगमें बलहीन हो रहा है । और उसका छोटा भाई उसीके दुःखसे दुःखी और उदास है ॥ १ ॥
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ । अनुज हमार भीरु अति सोऊ ॥
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा । सो कि होइ अब समरारूढ़ा ॥
तुम और सुग्रीव, दोनों [ नदी ] तटके वृक्ष हो । [रहा ] मेरा छोटा भाई विभीषण, [ सो ] वह भी बड़ा डरपोक है । मन्त्री जाम्बवान् बहुत बूढ़ा है । वह अब लड़ाईमें क्या चढ़ ( उद्यत हो) सकता है? ॥२ ॥
सिल्पिकर्म जानहिं नल नीला । है कपि एक महा बलसीला ॥
आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा । सुनत बचन कह बालिकुमारा ॥
नल- नील तो शिल्प -कर्म जानते हैं ( वे लड़ना क्या जानें? ) । हाँ, एक वानर जरूर महान् बलवान् है, जो पहले आया था, और जिसने लङ्का जलायी थी । यह वचन सुनते ही बालिपुत्र अंगदने कहा— ॥३ ॥
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा । साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा ॥
रावन नगर अल्प कपि दहई । सुनि अस बचन सत्य को कहई ॥
हे राक्षसराज! सच्ची बात कहो! क्या उस वानरने सचमुच तुम्हारा नगर जला दिया? रावण [ जैसे जगद्विजयी योद्धा ] का नगर एक छोटे- से वानरने जला दिया । ऐसे वचन सुनकर उन्हें सत्य कौन कहेगा? ॥४ ॥
जो अति सुभट सराहेहु रावन । सो सुग्रीव केर लघु धावन ॥
चलइ बहुत सो बीर न होई । पठवा खबरि लेन हम सोई ॥
हे रावण! जिसको तुमने बहुत बड़ा योद्धा कहकर सराहा है, वह तो सुग्रीवका एक छोटा-सा दौड़कर चलनेवाला हरकारा है । वह बहुत चलता है, वीर नहीं है । उसको तो हमने [ केवल ] खबर लेनेके लिये भेजा था ॥ ५ ॥
दो० – सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ ।
फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ ॥ २३ ( क) ॥
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* *७९४ रामचरितमानस क्या सचमुच ही उस वानरने प्रभुकी आज्ञा पाये बिना ही तुम्हारा नगर जला डाला? मालूम होता है, इसी डरसे वह लौटकर सुग्रीवके पास नहीं गया और कहीं छिप रहा! ॥ २३ ( क ) ॥
सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह ।
कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह ॥ २३ ( ख) ॥
हे रावण! तुम सब सत्य ही कहते हो, मुझे सुनकर कुछ भी क्रोध नहीं है । सचमुच हमारी सेनामें कोई भी ऐसा नहीं है जो तुमसे लड़नेमें शोभा पाये ॥ २३ (ख ) ॥
प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि ।
जौंमृगपतिबध मेडुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि ॥ २३ ( ग ) ॥
प्रीति और वैर बराबरीवालेसे ही करना चाहिये, नीति ऐसी ही है । सिंह यदि मेढकोंको मारे, तो क्या उसे कोई भला कहेगा? ॥ २३ ( ग ) ॥
जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष ।
तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष ॥ २३ ( घ ) ॥
यद्यपि तुम्हें मारनेमें श्रीरामजीकी लघुता है और बड़ा दोष भी है, तथापि हे रावण! सुनो, क्षत्रियजातिका क्रोध बड़ा कठिन होता है । २३ ( घ ) ॥ बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस । प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस ॥ २३ ( ङ) । वक्रोक्तिरूपी धनुषसे वचनरूपी बाण मारकर अंगदने शत्रुका हृदय जला दिया । वीर रावण उन बाणोंको मानो प्रत्युत्तररूपी सँड़सियोंसे निकाल रहा है ॥२३ ( ङ ) ॥
हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक ।
जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक ॥ २३ ( च ) ॥
तब रावण हँसकर बोला- बंदरमें यह एक बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है, उसका वह अनेकों उपायोंसे भला करनेकी चेष्टा करता है । २३ ( च) ॥
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा । जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा ॥
नाचि कूदि करि लोग रिझाई । पति हित करइ धर्म निपुनाई ॥
बंदरको धन्य है, जो अपने मालिकके लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है । नाच - कूदकर,
लोगोंको रिझाकर, मालिकका हित करता है । यह उसके धर्मकी निपुणता है ॥१ ॥
अंगद स्वामिभक्त तव जाती । प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती ॥
मैं गुन गाहक परम सुजाना । तव कटु रटनि करउँ नहिं काना ॥
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* * लङ्काकाण्ड ७ ९५ हे अंगद! तेरी जाति स्वामिभक्त है । [ फिर भला ] तू अपने मालिकके गुण इस प्रकार कैसे न बखानेगा? मैं गुणग्राहक ( गुणोंका आदर करनेवाला ) और परम सुजान ( समझदार ) हूँ, इसीसे तेरी जली - कटी बक- बकपर कान ( ध्यान ) नहीं देता ॥ २ ॥
कह कपि तव गुन गाहकताई । सत्य पवनसुत मोहि सुनाई ॥
बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा । तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा ॥
अंगदने कहा- तुम्हारी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमान्ने सुनायी थी । उसने अशोकवनको विध्वंस ( तहस- नहस ) करके, तुम्हारे पुत्रको मारकर नगरको जला दिया था । तो भी [ तुमने अपनी गुणग्राहकताके कारण यही समझा कि ] उसने तुम्हारा कुछ भी अपकार नहीं किया ॥३ ॥
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई । दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई ॥
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा । तुम्हरें लाज न रोष न माखा ॥
तुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशग्रीव! मैंने कुछ धृष्टता की है । हनुमान्ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है ॥४ ॥
जौं असि मति पितु खाए कीसा । कहि अस बचन हँसा दससीसा ॥
पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही । अबहीं समुझि परा कछु मोही ॥
[ रावण बोला- ] अरे वानर! जब तेरी ऐसी बुद्धि है तभी तो तू बापको खा गया । ऐसा वचन कहकर रावण हँसा । अंगदने कहा - पिताको खाकर फिर तुमको भी खा डालता । परन्तु अभी तुरंत कुछ और ही बात मेरी समझमें आ गयी! ॥ ५ ॥
बालि बिमल जस भाजन जानी । हतउँ न तोहि अधम अभिमानी ॥
कहु रावन रावन जग केते । मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते ॥
अरे नीच अभिमानी! बालिके निर्मल यशका पात्र ( कारण ) जानकर तुम्हें मैं नहीं मारता । रावण! यह तो बता कि जगत्में कितने रावण हैं? मैंने जितने रावण अपने कानोंसे सुन रखे हैं, उन्हें सुन—॥६ ॥
बलिहि जितन एक गयउ पताला । राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला ॥
खेलहिं बालक मारहिं जाई । दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई ॥
एक रावण तो बलिको जीतने पातालमें गया था, तब बच्चोंने उसे घुड़सालमें बाँध रखा । बालक खेलते थे और जा- जाकर उसे मारते थे । बलिको दया लगी, तब उन्होंने उसे छुड़ा दिया ॥ ७ ॥
एक बहोरि सहसभुज देखा । धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा ॥
कौतुक लागि भवन लै आवा । सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा ॥
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* *७९६ रामचरितमानस फिर एक रावणको सहस्रबाहुने देखा, और उसने दौड़कर उसको एक विशेष प्रकारके ( विचित्र ) जन्तुकी तरह [ समझकर ] पकड़ लिया । तमाशेके लिये वह उसे घर ले आया । तब पुलस्त्य मुनिने जाकर उसे छुड़ाया ॥८ ॥
दो० - एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि कीं काँख ।
इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख ॥२४ ॥
एक रावणकी बात कहनेमें तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है - वह [ बहुत दिनोंतक ] बालिकी काँखमें रहा था । इनमेंसे तुम कौन-से रावण हो? खीझना छोड़कर सच-सच बताओ ॥२४ ॥
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला । हरगिरि जान जासु भुज लीला ॥
जान उमापति जासु सुराई । पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई ॥
[ रावणने कहा— ] अरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान् रावण हूँ जिसकी भुजाओंकी लीला ( करामात ) कैलास पर्वत जानता है । जिसकी शूरता उमापति महादेवजी जानते हैं, जिन्हें अपने सिररूपी पुष्प चढ़ा- चढ़ाकर मैंने पूजा था ॥ १ ॥
सिर सरोज निज करन्हि उतारी । पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी ॥
भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला । सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला ॥
सिररूपी कमलोंको अपने हाथोंसे उतार- उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि शिवजीकी पूजा की है । अरे मूर्ख! मेरी भुजाओंका पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदयमें वह आज भी चुभ रहा है ॥ २ ॥
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई । जब जब भिरउँ जाइ बरिआई ॥
जिन्ह के दसन कराल न फूटे । उर लागत मूलक इव टूटे ॥
दिग्गज ( दिशाओंके हाथी ) मेरी छातीकी कठोरताको जानते हैं । जिनके भयानक दाँत, जब- जब जाकर मैं उनसे जबरदस्ती भिड़ा, मेरी छातीमें कभी नहीं फूटे ( अपना चिह्न भी नहीं बना सके ), बल्कि मेरी छातीसे लगते ही वे मूलीकी तरह टूट गये ॥ ३ ॥
जासु चलत डोलति इमि धरनी । चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी ॥
सोइ रावन जग बिदित प्रतापी । सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी ॥
जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है जैसे मतवाले हाथीके चढ़ते समय छोटी नाव! मैं वही जगत्प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ । अरे झूठी बकवाद करनेवाले! क्या तूने मुझको कानोंसे कभी नहीं सुना? ॥४ ॥
दो० – तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान ।
रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान ॥ २५ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ७९७ उस ( महान् प्रतापी और जगत्प्रसिद्ध ) रावणको ( मुझे ) तू छोटा कहता है और मनुष्यकी बड़ाई करता है? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर! अब मैंने तेरा ज्ञान जान लिया ॥ २५ ॥
सुनि अंगद सकोप कह बानी । बोलु सँभारि अधम अभिमानी ॥
सहसबाहु भुज गहन अपारा । दहन अनल सम जासु कुठारा ॥
रावणके ये वचन सुनकर अंगद क्रोधसहित वचन बोले- अरे नीच अभिमानी! सँभालकर ( सोच-समझकर ) बोल । जिनका फरसा सहस्रबाहुकी भुजाओंरूपी अपार वनको जलानेके लिये अग्निके समान था, ॥ १ ॥
जासु परसु सागर खर धारा । बूड़े नृप अगनित बहु बारा ॥
तासु गर्ब जेहि देखत भागा । सो नर क्यों दससीस अभागा ॥
जिनके फरसारूपी समुद्रकी तीव्र धारामें अनगिनत राजा अनेकों बार डूब गये, उन परशुरामजीका गर्व जिन्हें देखते ही भाग गया, अरे अभागे दशशीश! वे मनुष्य क्योंकर हैं? ॥ २ ॥
राम मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥
पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा । अन्न दान अरु रस पीयूषा ॥
क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड! श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य हैं? कामदेव भी क्या धनुर्धारी है? और गङ्गाजी क्या नदी हैं? कामधेनु क्या पशु है? और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है? अन्न भी क्या दान है? और अमृत क्या रस है? ॥ ३ ॥
बैनतेय खग अहि सहसानन । चिंतामनि पुनि उपल दसानन ॥
सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा । लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा ॥
गरुड़जी क्या पक्षी हैं? शेषजी क्या सर्प हैं? अरे रावण! चिन्तामणि भी क्या पत्थर है? अरे ओ मूर्ख! सुन, वैकुण्ठ भी क्या लोक है? और श्रीरघुनाथजीकी अखण्ड भक्ति क्या [ और लाभों-जैसा ही ] लाभ है? ॥ ४ ॥
दो० - सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि ।
कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि॥ २६ ॥
सेनासमेत तेरा मान मथकर, अशोकवनको उजाड़कर, नगरको जलाकर और तेरे पुत्रको मारकर जो लौट गये [ तू उनका कुछ भी न बिगाड़ सका], क्यों रे दुष्ट! वे हनुमानजी क्या वानर हैं? ॥२६ ॥
सुनु रावन परिहरि चतुराई । भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥
जौं खल भएसि राम कर द्रोही । ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥
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७९८ * रामचरितमानस * अरे रावण! चतुराई ( कपट ) छोड़कर सुन । कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीका तू भजन क्यों नहीं करता? अरे दुष्ट! यदि तू श्रीरामजीका वैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे ॥ १ ॥
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला । राम बयर अस होइहि हाला ॥
तव सिर निकर कपिन्ह के आगें । परिहहिं धरनि राम सर लागें ॥
हे मूढ़! व्यर्थ गाल न मार ( डींग न हाँक ) । श्रीरामजीसे वैर करनेपर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर- समूह श्रीरामजीके बाण लगते ही वानरोंके आगे पृथ्वीपर पड़ेंगे, ॥२ ॥
ते तव सिर कंदुक सम नाना । खेलिहहिं भालु कीस चौगाना ॥
जबहिं समर कोपिहि रघुनायक । छुटिहहिं अति कराल बहु सायक ॥
और रीछ- वानर तेरे उन गेंदके समान अनेकों सिरोंसे चौगान खेलेंगे । जब श्रीरघुनाथजी युद्धमें कोप करेंगे और उनके अत्यन्त तीक्ष्ण बहुत-से बाण छूटेंगे, ॥ ३ ॥
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा । अस बिचारि भजु राम उदारा ॥
सुनत बचन रावन परजरा । जरत महानल जनु घृत परा ॥
तब क्या तेरा ऐसा गाल चलेगा? ऐसा विचारकर उदार ( कृपालु ) श्रीरामजीको भज । अंगदके ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा । मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्निमें घी पड़ गया हो ॥ ४ ॥
दो० – कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि ।
मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि ॥ २७ ॥
[ वह बोला— अरे मूर्ख! ] कुम्भकर्ण- ऐसा मेरा भाई है, इन्द्रका शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड - चेतन जगत्को जीत लिया है!॥ २७ ॥
सठ साखामृग जोरि सहाई । बाँधा सिंधु इह प्रभुताई ॥
नाघहिं खग अनेक बारीसा । सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा ॥
रे दुष्ट! वानरोंकी सहायता जोड़कर रामने समुद्र बाँध लिया; बस, यही उसकी प्रभुता है । समुद्रको तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं । पर इसीसे वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते । अरे मूर्ख बंदर! सुन—॥१ ॥
मम भुज सागर बल जल पूरा । जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा ॥
बीस पयोधि अगाध अपारा । को अस बीर जो पाइहि पारा ॥
मेरी एक- एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जलसे पूर्ण है, जिसमें बहुत-से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं । [ बता, ] कौन ऐसा शूरवीर है जो मेरे इन अथाह और अपार बीस समुद्रोंका पार पा जायगा? ॥२ ॥