श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 801–810
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810
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* * लङ्काकाण्ड ७९९
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा । भूप सुजस खल मोहि सुनावा ॥
जौं पै समर सुभट तव नाथा । पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा ॥
अरे दुष्ट! मैंने दिक्पालोंतकसे जल भरवाया और तू एक राजाका मुझे सुयश सुनाता है! यदि तेरा मालिक, जिसकी गुणगाथा तू बार- बार कह रहा है, संग्राममें लड़नेवाला योद्धा है- ॥३ ॥
तौ बसीठ पठवत केहि काजा । रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा ॥
हरगिरि मथन निरखु मम बाहू । पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू ॥
तो [ फिर] वह दूत किसलिये भेजता है? शत्रुसे प्रीति ( सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती? [ पहले ] कैलासका मथन करनेवाली मेरी भुजाओंको देख । फिर अरे मूर्ख वानर! अपने मालिककी सराहना करना ॥ ४ ॥
दो० - सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस ।
हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस ॥२८ ॥
रावणके समान शूरवीर कौन है? जिसने अपने ही हाथोंसे सिर काट- काटकर अत्यन्त हर्षके साथ बहुत बार उन्हें अग्निमें होम दिया! स्वयं गौरीपति शिवजी इस बातके साक्षी हैं ॥ २८ ॥
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला । बिधि के लिखे अंक निज भाला ॥
नर कें कर आपन बध बाँची । हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची ॥
मस्तकोंके जलते समय जब मैंने अपने ललाटोंपर लिखे हुए विधाताके अक्षर देखे, तब मनुष्यके हाथसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी ( लेखको ) असत्य जानकर मैं हँसा ॥१ ॥
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें I। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें ॥
आन बीर बल सठ मम आगें । पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें ॥
उस बातको समझकर ( स्मरण करके ) भी मेरे मनमें डर नहीं है । [ क्योंकि मैं समझता हूँ कि ] बूढ़े ब्रह्माने बुद्धिभ्रमसे ऐसा लिख दिया है । अरे मूर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार- बार दूसरे वीरका बल कहता है! ॥ २ ॥
कह अंगद सलज्ज जग माहीं । रावन तोहि समान कोउ नाहीं ॥
लाजवंत तव सहज सुभाऊ । निज मुख निज गुन कहसि न काऊ ॥
अंगदने कहा — अरे रावण! तेरे समान लज्जावान् जगत्में कोई नहीं है । लज्जाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है । तू अपने मुँहसे अपने गुण कभी नहीं कहता ॥ ३ ॥
सिर अरु सैल कथा चित रही । ताते बार बीस तैं कही ॥
सो भुजबल राखेहु उर घाली । जीतेहु सहसबाहु बलि बाली ॥
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* *८०० रामचरितमानस सिर काटने और कैलास उठानेकी कथा चित्तमें चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा । भुजाओंके उस बलको तो तूने हृदयमें ही टाल ( छिपा) रखा है, जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और बालिको जीता था ॥ ४ ॥
सुनु मतिमंद देहि अब पूरा । काटें सीस कि होइअ सूरा ॥
इंद्रजालि कहुँ कहिअ न बीरा । काटइ निज कर सकल सरीरा ॥
अरे मन्दबुद्धि! सुन, अब बस कर । सिर काटनेसे भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है? इन्द्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है! ॥५ ॥
दो० -जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बूंद ।
ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद ॥ २ ९ ॥
अरे मन्दबुद्धि! समझकर देख | पतंगे मोहवश आगमें जल मरते हैं, गदहोंके झुंड बोझ लादकर चलते हैं; पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते ॥२ ९ ॥
अब जनि बतबढ़ाव खल करही । सुनु मम बचन मान परिहरही ॥
दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ । अस बिचारि रघुबीर पठायउँ ॥
अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर; मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूतकी तरह [ सन्धि करने ] नहीं आया हूँ । श्रीरघुवीरने ऐसा विचारकर मुझे भेजा है- ॥ १ ॥
बार बार अस कहइ कृपाला । नहिं गजारि जसु बधें काला ॥
मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे । सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे ॥
कृपालु श्रीरामजी बार- बार ऐसा कहते हैं कि स्यारके मारनेसे सिंहको यश नहीं मिलता । अरे मूर्ख! प्रभुके [ उन ] वचनोंको मनमें समझकर ( याद करके ) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे हैं ॥२ ॥
नाहिं त करि मुख भंजन तोरा । लै जातेउँ सीतहि बरजोरा ॥
जानेउँ तव बल अधम सुरारी । सूनें हरि आनिहि परनारी ॥
नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीताजीको जबरदस्ती ले जाता । अरे अधम! देवताओंके शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया जब तू सूनेमें परायी स्त्रीको हर ( चुरा) लाया ॥ ३ ॥
तैं निसिचरपति गर्ब बहूता । मैं रघुपति सेवक कर दूता ॥
जौं न राम अपमानहि डरऊँ । तोहि देखत अस कौतुक करऊँ ॥
तू राक्षसोंका राजा और बड़ा अभिमानी है । परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजीके सेवक ( सुग्रीव ) का दूत ( सेवकका भी सेवक ) हूँ । यदि मैं श्रीरामजीके अपमानसे न डरूँ तो तेरे देखते- देखते ऐसा तमाशा करूँ कि—॥४ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८०१
दो० –- तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ ।
तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ ॥ ३० ॥
तुझे जमीनपर पटककर, तेरी सेनाका संहारकर और तेरे गाँवको चौपट [ नष्ट - भ्रष्ट ] करके, अरे मूर्ख! तेरी युवती स्त्रियोंसहित जानकीजीको ले जाऊँ॥३० ॥
जौं अस करौं तदपि न बड़ाई । मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई ॥
कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा । अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा ॥
यदि ऐसा करूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई नहीं है । मरे हुएको मारनेमें कुछ भी पुरुषत्व ( बहादुरी ) नहीं है । वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा, ॥ १ ॥
सदा रोगबस संतत क्रोधी । बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी ॥
तनु पोषक निंदक अघ खानी । जीवत सव सम चौदह प्रानी ॥
नित्यका रोगी, निरन्तर क्रोधयुक्त रहनेवाला, भगवान् विष्णुसे विमुख, वेद और संतोंका विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करनेवाला, परायी निन्दा करनेवाला और पापकी खान ( महान् पापी ) –ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदेके समान हैं ॥२ ॥
अस बिचारि खल बधउँ न तोही । अब जनि रिस उपजावसि मोही ॥
सुनि सकोप कह निसिचर नाथा । अधर दसन दसि मीजत हाथा ॥
अरे दुष्ट! ऐसा विचारकर मैं तुझे नहीं मारता । अब तू मुझमें क्रोध न पैदा कर ( मुझे गुस्सा न दिला ) । अङ्गदके वचन सुनकर राक्षसराज रावण दाँतोंसे होठ काटकर, क्रोधित होकर हाथ मलता हुआ बोला—॥३ ॥
रे कपि अधम मरन अब चहसी । छोटे बदन बात बड़ि कहसी ॥
कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें । बल प्रताप बुधि तेज न ताकें ॥
अरे नीच बंदर! अब तू मरना ही चाहता है! इसीसे छोटे मुँह बड़ी बात कहता है । अरे मूर्ख बंदर! तू जिसके बलपर कडुए वचन बक रहा है, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि अथवा तेज कुछ भी नहीं है ॥४ ॥
दो० - अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास ।
सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन ममत्रास ॥ ३१ ( क ) ॥
उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिताने वनवास दे दिया । उसे एक तो वह ( उसका ) दुःख, उसपर युवती स्त्रीका विरह और फिर रात -दिन मेरा डर बना रहता है ॥ ३१ ( क) ॥
जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक ।
खाहिं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक ॥ ३१ ( ख ) ॥
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* *८०२ रामचरितमानस जिनके बलका तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्योंको तो राक्षस रात -दिन खाया करते हैं । अरे मूढ़! जिद्द छोड़कर समझ ( विचार कर ) ॥ ३१ ( ख ) ॥
जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा । क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा ॥
हरि हर निंदा सुनइ जो काना । होइ पाप गोघात समाना ॥
जब उसने श्रीरामजीकी निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए । क्योंकि [ शास्त्र ऐसा कहते हैं कि] जो अपने कानोंसे भगवान् विष्णु और शिवकी निन्दा सुनता है, उसे गोवधके समान पाप होता है ॥१ ॥
कटकटान कपिकुंजर भारी । दुहु भुजदंड तमकि महि मारी ॥
डोलत धरनि सभासद खसे । चले भाजि भय मारुत ग्रसे ॥
वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोरसे कटकटाये ( शब्द किया ) और उन्होंने तमककर ( जोरसे ) अपने दोनों भुजदण्डोंको पृथ्वीपर दे मारा । पृथ्वी हिलने लगी, [ जिससे बैठे हुए ] सभासद् गिर पड़े और भयरूपी पवन ( भूत ) से ग्रस्त होकर भाग चले ॥ २ ॥
गिरत सँभारि उठा दसकंधर । भूतल परे मुकुट अति सुंदर ॥
कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे । कछु अंगद प्रभु पास पबारे ॥
रावण गिरते - गिरते सँभलकर उठा । उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वीपर गिर पड़े । कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरोंपर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगदने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास फेंक दिये ॥ ३ ॥
आवत मुकुट देखि कपि भागे । दिनहीं लूक परन बिधि लागे ॥
की रावन करि कोप चलाए । कुलिस चारि आवत अति धाए ॥
मुकुटोंको आते देखकर वानर भागे । [ सोचने लगे ] विधाता! क्या दिनमें ही उल्कापात होने लगा ( तारे टूटकर गिरने लगे )? अथवा क्या रावणने क्रोध करके चार वज्र चलाये हैं, जो बड़े धायेके साथ ( वेगसे ) आ रहे हैं? ॥ ४ ॥
कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू । लूक न असनि केतु नहिं राहू॥
ए किरीट दसकंधर केरे । आवत बालितनय के प्रेरे ॥
प्रभुने [ उनसे ] हँसकर कहा- मनमें डरो नहीं । ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं । अरे भाई! ये तो रावणके मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगदके फेंके हुए आ रहे हैं ॥५ ॥
दो० – तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास ।
कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास ॥ ३२ ( क ) ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८०३ पवनपुत्र श्रीहनुमान्जीने उछलकर उनको हाथसे पकड़ लिया और लाकर प्रभुके पास रख
दिया । रीछ और वानर तमाशा देखने लगे । उनका प्रकाश सूर्यके समान था ॥३२ ( क ) ॥
उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ ।
धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ ॥ ३२ ( ख ) ॥
वहाँ ( सभामें ) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि- बंदरको पकड़ लो और पकड़कर मार डालो । अंगद यह सुनकर मुसकराने लगे ॥३२ ( ख) ॥
एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु । खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु ॥
मर्कटहीन करहु महि जाई । जिअत धरहु तापस द्वौ भाई ॥
[ रावण फिर बोला— ] इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ- कहीं रीछ- वानरोंको पाओ, वहीं खा डालो । पृथ्वीको बंदरोंसे रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों ( राम- लक्ष्मण) को जीते -जी पकड़ लो ॥ १ ॥
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा । गाल बजावत तोहि न लाजा ॥
मरु गर काटि निलज कुलघाती । बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती ॥
[ रावणके ये कोपभरे वचन सुनकर ] तब युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले - तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज्ज! अरे कुलनाशक! गला काटकर ( आत्महत्या करके ) मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती! ॥२ ॥
रे त्रिय चोर कुमारग गामी । खल मल रासि मंदमति कामी ॥
सन्यपात जल्पसि दुर्बादा । भएसि कालबस खल मनुजादा ॥
अरे स्त्रीके चोर! अरे कुमार्गपर चलनेवाले! अरे दुष्ट, पापकी राशि, मन्दबुद्धि और कामी! तू सन्निपातमें क्या दुर्वचन बक रहा है? अरे दुष्ट राक्षस! तू कालके वश हो गया है! ॥३ ॥
याको फलु पावहिगो आगें । बानर भालु चपेटन्हि लागें ॥
रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तव रसना अभिमानी ॥
इसका फल तू आगे वानर और भालुओंके चपेटे लगनेपर पावेगा । राम मनुष्य हैं, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी! तेरी जीभें नहीं गिर पड़तीं? ॥४ ॥
गिरिहहिं रसना संसय नाहीं । सिरन्हि समेत समर महि माहीं ॥
इसमें सन्देह नहीं है कि तेरी जीभें [अकेले नहीं वरं ] सिरोंके साथ रणभूमिमें गिरेंगी ॥५ ॥
सो० –- सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर ।
बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़ ॥ ३३ ( क ) ॥
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* *८०४ रामचरितमानस रे दशकन्ध! जिसने एक ही बाणसे बालिको मार डाला, वह मनुष्य कैसे है? अरे कुजाति,
अरे जड! बीस आँखें होनेपर भी तू अन्धा है । तेरे जन्मको धिक्कार है ॥३३ ( क ) ॥
तव सोनित कीं प्यास तृषित राम सायक निकर ।
तजउँ तोहि तेहित्रास कटु जल्पक निसिचर अधम ॥ ३३ ( ख ) ॥
श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमूह तेरे रक्तकी प्याससे प्यासे हैं । [वे प्यासे ही रह जायँगे ] इस डरसे, अरे कड़वी बकवाद करनेवाले नीच राक्षस! मैं तुझे छोड़ता हूँ ॥३३ ( ख ) ॥
मैं तव दसन तोरिबे लायक । आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥
असि रिस होति दसउ मुख तोरौं । लंका गहि समुद्र महँ बोरौं ॥
मैं तेरे दाँत तोड़नेमें समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्रीरघुनाथजीने मुझे आज्ञा नहीं दी । ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और [ तेरी ] लङ्काको पकड़कर समुद्रमें डुबा दूँ॥१ ॥
गूलर फल समान तव लंका । बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका ॥
मैं बानर फल खात न बारा । आयसु दीन्ह न राम उदारा ॥
तेरी लङ्का गूलरके फलके समान है । तुम सब कीड़े उसके भीतर [ अज्ञानवश ] निडर होकर बस रहे हो । मैं बंदर हूँ, मुझे इस फलको खाते क्या देर थी? पर उदार ( कृपालु ) श्रीरामचन्द्रजीने वैसी आज्ञा नहीं दी ॥ २ ॥
जुगुति सुनत रावन मुसुकाई । मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई ॥
बालि न कबहुँ गाल अस मारा । मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा ॥
अंगदकी युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [और बोला– ] अरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ सीखा? बालिने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा | जान पड़ता है तू तपस्वियोंसे मिलकर लबार हो गया है ॥३ ॥
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा । जौं न उपारिउँ तव दस जीहा ॥
समुझि राम प्रताप कपि कोपा । सभा माझ पन करि पद रोपा ॥
[ अंगदने कहा— ] अरे बीस भुजावाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ । श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापको समझकर ( स्मरण करके ) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावणकी सभामें प्रण करके ( दृढ़ताके साथ ) पैर रोप दिया ॥ ४ ॥
जौं मम चरन सकसि सठ टारी । फिरहिं रामु सीता मैं हारी ॥
सुनहु सुभट सब कह दससीसा । पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८०५ [और कहा– ] अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जायँगे, मैं सीताजीको हार गया । रावणने कहा-हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदरको पृथ्वीपर पछाड़ दो ॥५ ॥
इंद्रजीत आदिक बलवाना । हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना ॥
झपटहिं करि बल बिपुल उपाई । पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई ॥
इन्द्रजीत ( मेघनाद ) आदि अनेकों बलवान् योद्धा जहाँ- तहाँसे हर्षित होकर उठे । वे पूरे बलसे बहुत-से उपाय करके झपटते हैं । पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने - अपने स्थानपर जा बैठ जाते हैं ॥६ ॥
पुनि उठि झपटहिं सुर आराती । टरइ न कीस चरन एहि भाँती ॥
पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी । मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी ॥
[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं- ] वे देवताओंके शत्रु ( राक्षस ) फिर उठकर झपटते हैं । परन्तु हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! अङ्गदका चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी ( विषयी ) पुरुष मोहरूपी वृक्षको नहीं उखाड़ सकते ॥७ ॥
दो० - कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ ।
झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ ॥ ३४ ( क ) ॥
करोड़ों वीर योद्धा जो बलमें मेघनादके समान थे, हर्षित होकर उठे । वे बार- बार झपटते हैं, पर वानरका चरण नहीं उठता, तब लज्जाके मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं ॥ ३४ ( क ) ॥
भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग ।
कोटि बिन ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥ ३४ ( ख ) ॥
जैसे करोड़ों विघ्न आनेपर भी संतका मन नीतिको नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर ( अंगद ) -का
चरण पृथ्वीको नहीं छोड़ता । यह देखकर शत्रु ( रावण) -का मद दूर हो गया! ॥ ३४ (ख) ॥
कपि बल देखि सकल हियँ हारे । उठा आपु कपि कें परचारे ॥
गहत चरन कह बालिकुमारा । मम पद गहें न तोर उबारा ॥
अङ्गदका बल देखकर सब हृदयमें हार गये । तब अङ्गदके ललकारनेपर रावण स्वयं उठा । जब वह अङ्गदका चरण पकड़ने लगा, तब बालिकुमार अङ्गदने कहा- मेरा चरण पकड़नेसे तेरा बचाव नहीं होगा! ॥१ ॥
गहसि न राम चरन सठ जाई । सुनत फिरा मन अति सकुचाई ॥
भयउ तेजहत श्री सब गई । मध्य दिवस जिमि ससि सोहई ॥
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८०६ * रामचरितमानस * अरे मूर्ख! तू जाकर श्रीरामजीके चरण क्यों नहीं पकड़ता? यह सुनकर वह मनमें बहुत ही सकुचाकर लौट गया । उसकी सारी श्री जाती रही । वह ऐसा तेजहीन हो गया जैसे मध्याह्नमें चन्द्रमा दिखायी देता है ॥२ ॥
सिंघासन बैठेउ सिर नाई । मानहुँ संपति सकल गँवाई ॥
जगदातमा प्रानपति रामा । तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा ॥
वह सिर नीचा करके सिंहासनपर जा बैठा । मानो सारी सम्पत्ति गँवाकर बैठा हो । श्रीरामचन्द्रजी जगत्भरके आत्मा और प्राणोंके स्वामी हैं । उनसे विमुख रहनेवाला शान्ति कैसे पा सकता है? ॥ ३ ॥
उमा राम की भृकुटि बिलासा । होइ बिस्व पुनि पावइ नासा ॥
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई । तासु दूत पन कहु किमि टरई ॥
[शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! जिन श्रीरामचन्द्रजीके भ्रूविलास ( भौंहके इशारे ) - से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाशको प्राप्त होता है; जो तृणको वज्र और वज्रको तृण बना देते हैं ( अत्यन्त निर्बलको महान् प्रबल और महान् प्रबलको अत्यन्त निर्बल कर देते हैं ), उनके दूतका प्रण, कहो, कैसे टल सकता है? ॥४ ॥
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना । मान न ताहि कालु निअराना ॥
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो । यह कहि चल्यो बालि नृप जायो ॥
फिर अंगदने अनेकों प्रकारसे नीति कही । पर रावणने नहीं माना; क्योंकि उसका काल निकट आ गया था । शत्रुके गर्वको चूर करके अंगदने उसको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका सुयश सुनाया और फिर वह राजा बालिका पुत्र यह कहकर चल दिया— ॥५ ॥
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई । तोहि अबहिं का करौं बड़ाई ॥
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा । सो सुनि रावन भयउ दुखारा ॥
रणभूमिमें तुझे खेला - खेलाकर न मारूँ तबतक अभी [ पहलेसे ] क्या बड़ाई करूँ । अंगदने पहले ही ( सभामें आनेसे पूर्व ही ) उसके पुत्रको मार डाला था । वह संवाद सुनकर रावण दुखी हो गया ॥ ६ ॥
भय ब्याकुल सब भए बिसेषी ॥जातुधान अंगद पन देखी ।
अंगदका प्रण [ सफल ] देखकर सब राक्षस भयसे अत्यन्त ही व्याकुल हो गये ॥७ ॥
दो० –- रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज ।
पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज ॥ ३५ ( क ) ॥
शत्रुके बलका मर्दन कर, बलकी राशि बालिपुत्र अंगदजीने हर्षित होकर आकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये । उनका शरीर पुलकित है और नेत्रोंमें [ आनन्दाश्रुओंका ] जल भरा है ॥ ३५ ( क ) ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८०७
साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ ।
मंदोदरीं रावनहि बहुरि कहा समुझाइ ॥ ३५ ( ख ) ॥
सन्ध्या हो गयी जानकर दशग्रीव विलखता हुआ (उदास होकर) महलमें गया । मन्दोदरीने रावणको समझाकर फिर कहा- ॥ ३५ ( ख ) ॥
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही । सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही ॥
रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ नहिं नाहु असि मनुसाई ॥
हे कान्त! मनमें समझकर ( विचारकर ) कुबुद्धिको छोड़ दो । आपसे और श्रीरघुनाथजीसे युद्ध शोभा नहीं देता । उनके छोटे भाईने एक जरा- सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है ॥१ ॥
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा जाके दूत केर यह कामा ॥
कौतुक सिंधु नाघि तव लंका । आयउ कपि केहरी असंका ॥
हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राममें जीत पायेंगे, जिनके दूतका ऐसा काम है? खेलसे ही समुद्र लाँघकर वह वानरोंमें सिंह ( हनुमान् ) आपकी लंकामें निर्भय चला आया! ॥२ ॥
रखवारे हति बिपिन उजारा । देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा ॥
जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा । कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा ॥
रखवालोंको मारकर उसने अशोकवन उजाड़ डाला । आपके देखते- देखते उसने अक्षयकुमारको मार डाला और सम्पूर्ण नगरको जलाकर राख कर दिया । उस समय आपके बलका गर्व कहाँ चला गया था? ॥३ ॥
अब पति मृषा गाल जनि मारहु । मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु ॥
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु । अग जग नाथ अतुलबल जानहु ॥
अब हे स्वामी! झूठ ( व्यर्थ ) गाल न मारिये ( डींग न हाँकिये ) मेरे कहनेपर हृदयमें कुछ विचार कीजिये । हे पति! आप श्रीरघुपतिको [निरा ] राजा मत समझिये, बल्कि अग-जगनाथ ( चराचरके स्वामी ) और अतुलनीय बलवान् जानिये ॥ ४ ॥
बान प्रताप जान मारीचा । तासु कहा नहिं मानेहि नीचा ॥
जनक सभाँ अगनित भूपाला । रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला ॥
श्रीरामजीके बाणका प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था । परन्तु आपने उसका कहना भी नहीं माना । जनककी सभामें अगणित राजागण थे । वहाँ विशाल और अतुलनीय बलवाले आप भी थे ॥५ ॥
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* *८०८ रामचरितमानस
भंजि धनुष जानकी बिआही । तब संग्राम जितेहु किन ताही ॥
सुरपति सुत जानइ बल थोरा । राखा जिअत आँखि गहि फोरा ॥
वहाँ शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामजीने जानकीको ब्याहा, तब आपने उनको संग्राममें क्यों नहीं जीता? इन्द्रपुत्र जयन्त उनके बलको कुछ- कुछ जानता है । श्रीरामजीने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया ॥६ ॥
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी । तदपि हृदयँ नहिं लाज बिसेषी ॥
शूर्पणखाकी दशा तो आपने देख ही ली । तो भी आपके हृदयमें [ उनसे लड़नेकी बात सोचते ] विशेष ( कुछ भी ) लज्जा नहीं आती! ॥७ ॥
दो० - बधि बिराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध ।
बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध ॥ ३६ ॥
जिन्होंने विराध और खर- दूषणको मारकर लीलासे ही कबन्धको भी मार डाला; और जिन्होंने बालिको एक ही बाणसे मार दिया, हे दशकन्ध! आप उन्हें ( उनके महत्त्वको) समझिये! ॥ ३६ ॥
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला । उतरे प्रभु दल सहित सुबेला ॥
कारुनीक दिनकर कुल केतू । दूत पठायउ तव हित हेतू॥
जिन्होंने खेलसे ही समुद्रको बँधा लिया और जो प्रभु सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतर पड़े, उन सूर्यकुलके ध्वजास्वरूप ( कीर्तिको बढ़ानेवाले ) करुणामय भगवान्ने आपहीके हितके लिये दूत भेजा ॥ १ ॥
सभा माझ जेहिं तव बल मथा । करि बरूथ महुँ मृगपति जथा ॥
अंगद हनुमत अनुचर जाके । रन बाँकुरे बीर अति बाँके ॥
जिसने बीच सभामें आकर आपके बलको उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियोंके झुंडमें आकर सिंह [ उसे छिन्न- भिन्न कर डालता है ] । रणमें बाँके अत्यन्त विकट वीर अंगद और हनुमान् जिनके सेवक हैं, ॥ २ ॥
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू । मुधा मान ममता मद बहहू ॥
अहह कंत कृत राम बिरोधा । काल बिबस मन उपज न बोधा ॥
हे पति! उन्हें आप बार- बार मनुष्य कहते हैं । आप व्यर्थ ही मान, ममता और मदका बोझा ढो रहे हैं! हा प्रियतम! आपने श्रीरामजीसे विरोध कर लिया और कालके विशेष वश होनेसे आपके मनमें अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता ॥३ ॥
काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥
निकट काल जेहि आवत साईं । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं ॥