श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 811–820
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820
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* * लङ्काकाण्ड ८०९ काल दण्ड ( लाठी ) लेकर किसीको नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि और विचारको हर लेता है । हे स्वामी! जिसका काल ( मरण-समय ) निकट आ जाता है, उसे आपहीकी तरह भ्रम हो जाता है ॥४ ॥
दो० – दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु ।
कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु ॥ ३७ ॥
आपके दो पुत्र मारे गये और नगर जल गया । [जो हुआ सो हुआ ] हे प्रियतम! अब भी [ इस भूलकी ] पूर्ति ( समाप्ति ) कर दीजिये ( श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये ), और हे नाथ! कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीको भजकर निर्मल यश लीजिये ॥ ३७ ॥
नारि बचन सुनि बिसिख समाना । सभाँ गयउ उठि होत बिहाना ॥
बैठ जाइ सिंघासन फूली । अति अभिमान त्रास सब भूली ॥
स्त्रीके बाणके समान वचन सुनकर वह सबेरा होते ही उठकर सभामें चला गया और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमानमें फूलकर सिंहासनपर जा बैठा ॥१ ॥
इहाँ राम अंगदहि बोलावा । आइ चरन पंकज सिरु नावा ॥
अति आदर समीप बैठारी । बोले बिहँसि कृपाल खरारी ॥
यहाँ ( सुबेल पर्वतपर ) श्रीरामजीने अंगदको बुलाया । उन्होंने आकर चरण- कमलोंमें सिर नवाया । बड़े आदरसे उन्हें पास बैठाकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजी हँसकर बोले ॥२ ॥
बालितनय कौतुक अति मोही । तात सत्य कहु पूछउँ तोही ॥
रावनु जातुधान कुल टीका । भुज बल अतुल जासु जग लीका ॥
हे बालिके पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल है । हे तात! इसीसे मैं तुमसे पूछता हूँ, सत्य कहना । जो रावण राक्षसोंके कुलका तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबलकी जगत्भरमें धाक है, ॥ ३ ॥
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए । कहहु तात कवनी बिधि पाए ॥
सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी । मुकुट न होहिं भूप गुन चारी ॥
उसके चार मुकुट तुमने फेंके । हे तात! बताओ, तुमने उनको किस प्रकारसे पाया! [ अंगदने कहा ] हे सर्वज्ञ! हे शरणागतको सुख देनेवाले! सुनिये । वे मुकुट नहीं हैं । वे तो राजाके चार गुण हैं ॥ ४ ॥
साम दान अरु दंड बिभेदा । नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ॥
नीति धर्म के चरन सुहाए । अस जियँ जानि नाथ पहिं आए ॥
हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद– ये चारों राजाके हृदयमें बसते हैं । ये नीति- धर्मके चार सुन्दर चरण हैं । [ किन्तु रावणमें धर्मका अभाव है ] ऐसा जीमें जानकर ये नाथके पास आ गये हैं ॥ ५ ॥
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* *८१० रामचरितमानस
दो० - धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस ।
तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस ॥ ३८ ( क ) ॥
दशशीश रावण धर्महीन, प्रभुके पदसे विमुख और कालके वशमें है । इसलिये हे कोसलराज! सुनिये, वे गुण रावणको छोड़कर आपके पास आ गये हैं ॥ ३८ ( क ) ॥
परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार ।
समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार ॥ ३८ ( ख ) ॥
अंगदकी परम चतुरता [ पूर्ण उक्ति ] कानोंसे सुनकर उदार श्रीरामचन्द्रजी हँसने लगे । फिर बालिपुत्रने किलेके ( लङ्काके ) सब समाचार कहे ॥ ३८ ( ख ) ॥
रिपु के समाचार जब पाए । राम सचिव सब निकट बोलाए ॥
लंका बाँके चारि दुआरा । केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा ॥
जब शत्रुके समाचार प्राप्त हो गये, तब श्रीरामचन्द्रजीने सब मन्त्रियोंको पास बुलाया [ और कहा— ] लङ्काके चार बड़े विकट दरवाजे हैं । उनपर किस तरह आक्रमण किया जाय, इसपर विचार करो ॥१ ॥
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन । सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन ॥
करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा । चारि अनी कपि कटकु बनावा ॥
तब वानरराज सुग्रीव, ऋक्षपति जाम्बवान् और विभीषणने हृदयमें सूर्यकुलके भूषण श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया और विचार करके उन्होंने कर्तव्य निश्चित किया । वानरोंकी सेनाके चार दल बनाये ॥ २ ॥ ।जथाजोग सेनापति कीन्हे जूथप सकल बोलि तब लीन्हे ॥
प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए । सुनि कपि सिंघनाद करि धाए ॥
और उनके लिये यथायोग्य ( जैसे चाहिये वैसे ) सेनापति नियुक्त किये । फिर सब यूथपतियोंको बुला लिया और प्रभुका प्रताप कहकर सबको समझाया, जिसे सुनकर वानर सिंहके समान गर्जना करके दौड़े ॥३ ॥
हरषित राम चरन सिर नावहिं । गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं ॥
गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा । जय रघुबीर कोसलाधीसा ॥
वे हर्षित होकर श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाते हैं और पर्वतोंके शिखर ले - लेकर सब वीर दौड़ते हैं । ‘ कोसलराज श्रीरघुवीरजीकी जय हो ' पुकारते हुए भालू और वानर गरजते और ललकारते हैं ॥४ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८११
जानत परम दुर्ग अति लंका । प्रभु प्रताप कपि चले असंका ॥
घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी । मुखहिं निसान बजावहिं भेरी ॥
लङ्काको अत्यन्त श्रेष्ठ ( अजेय ) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे निडर होकर चले । चारों ओरसे घिरी हुई बादलोंकी घटाकी तरह लङ्काको चारों दिशाओंसे घेरकर वे मुँहसे ही डंके और भेरी बजाने लगे ॥ ५ ॥
दो० – जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव ।
गर्जहिं सिंहनाद कपि भालु महा बल सींव ॥ ३ ९ ॥
महान् बलकी सीमा वे वानर- भालू सिंहके समान ऊँचे स्वरसे ' श्रीरामजीकी जय ', ‘ लक्ष्मणजीकी जय ', ‘ वानरराज सुग्रीवकी जय ' ऐसी गर्जना करने लगे ॥३ ९ ॥
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी । सुना दसानन अति अहँकारी ॥
बिहँसि निसार सेन बोलाई ॥देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई । लङ्कामें बड़ा भारी कोलाहल ( कोहराम मच गया । अत्यन्त अहङ्कारी रावणने उसे सुनकर कहा – वानरोंकी ढिठाई तो देखो! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसोंकी सेना बुलायी ॥ १ ॥
आए कीस काल के प्रेरे । छुधावंत सब निसिचर मेरे ॥
अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा । गृह बैठें अहार बिधि दीन्हा ॥
बंदर कालकी प्रेरणासे चले आये हैं । मेरे राक्षस सभी भूखे हैं । विधाताने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया । ऐसा कहकर उस मूर्खने अट्टहास किया ( वह बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसा ) ॥२ ॥
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू । धरि धरि भालु कीस सब खाहू ॥
उमा रावनहि अस अभिमाना । जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना ॥
[ और बोला- ] हे वीरो! सब लोग चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ- वानर सबको पकड़- पकड़कर खाओ । [ शिवजी कहते हैं - ] हे उमा! रावणको ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपरकी ओर करके सोता है [मानो आकाशको थाम लेगा ] ॥ ३ ॥
चले निसाचर आयसु मागी । गहि कर भिंडिपाल बर साँगी ॥
तोमर मुद्गर परसु प्रचंडा । सूल कृपान परिघ गिरिखंडा ॥
आज्ञा माँगकर और हाथोंमें उत्तम भिंदिपाल, साँगी ( बरछी ), तोमर, मुद्गर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर राक्षस चले ॥४ ॥
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* *८१२ रामचरितमानस
जिमि अरुनोपल निकर निहारी । धावहिं सठ खग मांस अहारी ॥
चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा । तिमि धाए मनुजाद अबूझा ॥
जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरोंका समूह देखकर उसपर टूट पड़ते हैं, [ पत्थरोंपर लगनेसे ] चोंच टूटनेका दुःख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ राक्षस दौड़े ॥५ ॥
दो० – नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर ।
कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर ॥ ४० ॥
अनेकों प्रकारके अस्त्र- शस्त्र और धनुष - बाण धारण किये करोड़ों बलवान् और रणधीर राक्षस वीर परकोटेके कँगूरोंपर चढ़ गये ॥४० ॥
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे । मेरु के संगनि जनु घन बैसे ॥
बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ । सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥
वे परकोटेके कँगूरोंपर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरुके शिखरोंपर बादल बैठे हों । जुझाऊ ढोल और डंके आदि बज रहे हैं, [ जिनकी ] ध्वनि सुनकर योद्धाओंके मनमें [ लड़नेका] चाव होता है ॥१ ॥
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा । सुनि कादर उर जाहिं दरारा ॥
देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा । अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा ॥
अगणित नफीरी और भेरी बज रही है, [जिन्हें ] सुनकर कायरोंके हृदयमें दरारें पड़ जाती हैं । उन्होंने जाकर अत्यन्त विशाल शरीरवाले महान् योद्धा वानर और भालुओंके ठट्ट ( समूह ) देखे ॥२ ॥
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा । पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा ॥
कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं । दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं ॥
[ देखा कि ] वे रीछ - वानर दौड़ते हैं; औघट ( ऊँची - नीची, विकट) घाटियोंको कुछ नहीं गिनते । पकड़कर पहाड़ोंको फोड़कर रास्ता बना लेते हैं । करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं । दाँतोंसे ओंठ काटते और खूब डपटते हैं ॥ ३ ॥
उत रावन इत राम दोहाई । जयति जयति जय परी लराई ॥
निसिचर सिखर समूह ढहावहिं । कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं ॥
उधर रावणकी और इधर श्रीरामजीकी दोहाई बोली जा रही है । ' जय ' ' जय ' ' जय ' की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी । राक्षस पहाड़ोंके ढेर- के - ढेर शिखरोंको फेंकते हैं । वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और वापस उन्हींकी ओर चलाते हैं ॥४ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८१३
छं० – धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं ।
झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं ॥
अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ गए । कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए । प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतोंके टुकड़े ले- लेकर किलेपर डालते हैं । वे झपटते हैं और राक्षसोंके पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वीपर पटककर भाग चलते हैं और फिर ललकारते हैं । बहुत ही चञ्चल और बड़े तेजस्वी वानर- भालू बड़ी फुर्तीसे उछलकर किलेपर चढ़ - चढ़कर गये और जहाँ- तहाँ महलोंमें घुसकर श्रीरामजीका यश गाने लगे ।
दो० – एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ ।
ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ ॥ ४१ ॥
फिर एक-एक राक्षसको पकड़कर वे वानर भाग चले । ऊपर आप और नीचे [ राक्षस ] योद्धा — इस प्रकार वे [किलेपरसे ] धरतीपर आ गिरते हैं ॥ ४१ ॥
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा । मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा ॥
चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर । जय रघुबीर प्रताप दिवाकर ॥
श्रीरामजीके प्रतापसे प्रबल वानरोंके झुंड राक्षस योद्धाओंके समूह के समूह योद्धाओंको मसल रहे हैं । वानर फिर जहाँ - तहाँ किलेपर चढ़ गये और प्रतापमें सूर्यके समान श्रीरघुवीरकी जय बोलने लगे ॥१ ॥
चले निसाचर निकर पराई । प्रबल पवन जिमि घन समुदाई ॥
हाहाकार भयउ पुर भारी । रोहिं बालक आतुर नारी ॥
राक्षसोंके झुंड वैसे ही भाग चले जैसे जोरकी हवा चलनेपर बादलोंके समूह तितर- बितर हो जाते हैं । लङ्का नगरीमें बड़ा भारी हाहाकार मच गया । बालक, स्त्रियाँ और रोगी [ असमर्थताके कारण] रोने लगे ॥२ ॥
सब मिलि देहिं रावनहि गारी । राज करत एहिं मृत्यु हँकारी ॥
निज दल बिचल सुनी तेहिं काना । फेरि सुभट लंकेस रिसाना ॥
सब मिलकर रावणको गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्युको बुला लिया । रावणने जब अपनी सेनाका विचलित होना कानोंसे सुना, तब [ भागते हुए ] योद्धाओंको लौटाकर वह क्रोधित होकर बोला— ॥३ ॥
जो रन बिमुख सुना मैं काना । सो मैं हतब कराल कृपाना ॥
सर्बसु खाइ भोग करि नाना । समर भूमि भए बल्लभ प्राना ॥
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* *८१४ रामचरितमानस मैं जिसे रणसे पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुनूँगा, उसे स्वयं भयानक दुधारी तलवारसे मारूँगा । मेरा सब कुछ खाया, भाँति- भाँतिके भोग किये और अब रणभूमिमें प्राण प्यारे हो गये! ॥४ ॥
उग्र बचन सुनि सकल डेराने । चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥
सन्मुख मरन बीर कै सोभा । तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा ॥
रावणके उग्र ( कठोर ) वचन सुनकर सब वीर डर गये और लज्जित होकर क्रोध करके युद्धके लिये लौट चले । रणमें [ शत्रुके ] सम्मुख ( युद्ध करते हुए ) मरनेमें ही वीरकी शोभा है । [ यह सोचकर] तब उन्होंने प्राणोंका लोभ छोड़ दिया ॥५ ॥
दो० - बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि ।
ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि ॥ ४२ ॥
बहुत - से अस्त्र- शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार- ललकारकर भिड़ने लगे । उन्होंने परिघों और त्रिशूलोंसे मार- मारकर सब रीछ -वानरोंको व्याकुल कर दिया ॥ ४२ ॥
भय आतुर कपि भागन लागे । जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे ॥
कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता । कहँ नल नील दुबिद बलवंता ॥
[ शिवजी कहते हैं— ] वानर भयातुर होकर ( डरके मारे घबड़ाकर ) भागने लगे, यद्यपि हे उमा! आगे चलकर [ वे ही ] जीतेंगे । कोई कहता है - अंगद- हनुमान् कहाँ हैं? बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं? ॥१ ॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना । पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥
मेघनाद तहँ करइ लराई । टूट न द्वार परम कठिनाई ॥
हनुमान्जीने जब अपने दलको विकल ( भयभीत ) हुआ सुना, उस समय वे बलवान् पश्चिम द्वारपर थे । वहाँ उनसे मेघनाद युद्ध कर रहा था । वह द्वार टूटता न था, बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी ॥२ ॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा । गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥
कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा । गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा ॥
तब पवनपुत्र हनुमान्जीके मनमें बड़ा भारी क्रोध हुआ । वे कालके समान योद्धा बड़े जोरसे गरजे और कूदकर लङ्काके किलेपर आ गये और पहाड़ लेकर मेघनादकी ओर दौड़े ॥३ ॥
भंजेउ रथ सारथी निपाता । ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥
दुसरें सूत बिकल तेहि जाना । स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८१५ रथ तोड़ डाला, सारथिको मार गिराया और मेघनादकी छातीमें लात मारी । दूसरा सारथि मेघनादको व्याकुल जानकर, उसे रथमें डालकर, तुरंत घर ले आया ॥ ४ ॥
दो० - अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल ।
रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल ॥ ४३ ॥
इधर अंगदने सुना कि पवनपुत्र हनुमान् किलेपर अकेले ही गये हैं, तो रणमें बाँके बालिपुत्र वानरके खेलकी तरह उछलकर किलेपर चढ़ गये ॥ ४३ ॥
जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर । राम प्रताप सुमिरि उर अंतर ॥
रावन भवन चढ़े द्वौ धाई ॥ करहिं कोसलाधीस दोहाई ॥
युद्धमें शत्रुओंके विरुद्ध दोनों वानर क्रुद्ध हो गये । हृदयमें श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके दोनों दौड़कर रावणके महलपर जा चढ़े और कोसलराज श्रीरामजीकी दुहाई बोलने लगे ॥१ ॥
कलस सहित गहि भवनु ढहावा । देखि निसाचरपति भय पावा ॥
नारि बूंद कर पीटहिं छाती । अब दुइ कपि आए उतपाती ॥
उन्होंने कलशसहित महलको पकड़कर ढहा दिया । यह देखकर राक्षसराज रावण डर गया । सब स्त्रियाँ हाथोंसे छाती पीटने लगीं [और कहने लगीं– ] अबकी बार दो उत्पाती वानर [ एक साथ] आ गये ॥२ ॥
कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं । रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं ॥
पुनि कर गहि कंचन के खंभा । कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा ॥
वानरलीला करके ( घुड़की देकर ) दोनों उनको डराते हैं और श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनाते हैं । फिर सोनेके खंभोंको हाथोंसे पकड़कर उन्होंने [ परस्पर ] कहा कि अब उत्पात आरम्भ किया जाय ॥ ३ ॥
गर्जि परे रिपु कटक मझारी । लागे मर्दै भुज बल भारी ॥
काहुहि लात चपेटन्हि केहू । भजहु न रामहि सो फल लेहू ॥
वे गर्जकर शत्रुकी सेनाके बीचमें कूद पड़े और अपने भारी भुजबलसे उसका मर्दन करने लगे । किसीकी लातसे और किसीकी थप्पड़से खबर लेते हैं [ और कहते हैं कि] तुम श्रीरामजीको नहीं भजते, उसका यह फल लो ॥४ ॥
दो० – एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड ।
रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥ ४४ ॥
एकको दूसरेसे [रगड़कर ] मसल डालते हैं और सिरोंको तोड़कर फेंकते हैं । वे सिर जाकर रावणके सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं मानो दहीके कूँड़े फूट रहे हों ॥ ४४ ॥
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* *८१६ रामचरितमानस
महा महा मुखिआ जे पावहिं । ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं ॥
कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा । देहिं राम तिन्हहू निज धामा ॥
जिन बड़े - बड़े मुखियों ( प्रधान सेनापतियों ) -को पकड़ पाते हैं उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभुके पास फेंक देते हैं । विभीषणजी उनके नाम बतलाते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम ( परम पद ) दे देते हैं ॥१ ॥
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी । पावहिं गति जो जाचत जोगी ।
उमा राम मृदुचित करुनाकर । बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर ॥
ब्राह्मणोंका मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं [ परन्तु सहजमें नहीं पाते ] | [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! श्रीरामजी बड़े ही कोमलहृदय और करुणाकी खान हैं । [ वे सोचते हैं कि ] राक्षस मुझे वैरभावसे ही सही, स्मरण तो करते ही हैं ॥ २ ॥
देहिं परम गति सो जियँ जानी । अस कृपाल को कहहु भवानी ॥
अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी । नर मतिमंद ते परम अभागी ॥
ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति ( मोक्ष ) देते हैं । हे भवानी! कहो तो ऐसे कृपालु [ और ] कौन हैं? प्रभुका ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं ॥३ ॥
। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ॥अंगद अरुअरु हनुमंतहनुमंत प्रबेसा
लंका द्वौ कपि सोहहिं कैसें । मथहिं सिंधु दुइ मंदर जैसें ॥
श्रीरामजीने कहा कि अङ्गद और हनुमान् किलेमें घुस गये हैं । दोनों वानर लङ्कामें [ विध्वंस करते ] कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों ॥४ ॥
दो० - भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत ।
कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत ॥ ४५ ॥
भुजाओंके बलसे शत्रुकी सेनाको कुचलकर और मसलकर, फिर दिनका अन्त होता देखकर हनुमान् और अङ्गद दोनों कूद पड़े और श्रम ( थकावट ) रहित होकर वहाँ आ गये जहाँ भगवान् श्रीरामजी थे ॥४५ ॥
प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए । देखि सुभट रघुपति मन भाए ॥
राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम सुखारे ॥
उन्होंने प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाये । उत्तम योद्धाओंको देखकर श्रीरघुनाथजी मनमें बहुत प्रसन्न हुए । श्रीरामजीने कृपा करके दोनोंको देखा, जिससे वे श्रमरहित और परम सुखी हो गये ॥१ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८१७
गए जानि अंगद हनुमाना । फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥
जातुधान प्रदोष बल पाई । धाए करि दससीस दोहाई ॥
अङ्गद और हनुमान्को गये जानकर सभी भालू और वानर वीर लौट पड़े । राक्षसोंने प्रदोष ( सायं ) कालका बल पाकर रावणकी दुहाई देते हुए वानरोंपर धावा किया ॥२ ॥
निसिचर अनी देखि कपि फिरे । जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे ॥
द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी । लरत सुभट नहिं मानहिं हारी ॥
राक्षसोंकी सेना आती देखकर वानर लौट पड़े और वे योद्धा जहाँ -तहाँ कटकटाकर भिड़ गये । दोनों ही दल बड़े बलवान् हैं । योद्धा ललकार- ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानते ॥ ३ ॥
महाबीर निसिचर सब कारे । नाना बरन बलीमुख भारे ॥
सबल जुगल दल समबल जोधा । कौतुक करत लरत करि क्रोधा ॥
सभी राक्षस महान् वीर और अत्यन्त काले हैं और वानर विशालकाय तथा अनेकों रंगोंके हैं । दोनों ही दल बलवान् हैं और समान बलवाले योद्धा हैं । वे क्रोध करके लड़ते हैं और खेल करते ( वीरता दिखलाते ) हैं ॥४ ॥
प्राबिट सरद पयोद घनेरे । लरत मनहु मारुत के प्रेरे ॥
अनिप अकंपन अरु अतिकाया । बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥
[ राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं ] मानो क्रमशः वर्षा और शरद् ऋतुके बहुत-से बादल पवनसे प्रेरित होकर लड़ रहे हों । अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियोंने अपनी सेनाको विचलित होते देखकर माया की ॥५ ॥
भयउ निमिष महँ अति अँधिआरा । बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा ॥
पलभरमें अत्यन्त अन्धकार हो गया । खून, पत्थर और राखकी वर्षा होने लगी ॥६ ॥
दो० —देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार ।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥ ४६ ॥
दसों दिशाओंमें अत्यन्त घना अन्धकार देखकर वानरोंकी सेनामें खलबली पड़ गयी । एकको एक ( दूसरा ) नहीं देख सकता और सब जहाँ- तहाँ पुकार कर रहे हैं ॥४६ ॥
सकल मरमु रघुनायक जाना । लिए बोलि अंगद हनुमाना ॥
समाचार सब कहि समुझाए । सुनत कोपि कपिकुंजर धाए ॥
श्रीरघुनाथजी सब रहस्य जान गये । उन्होंने अङ्गद और हनुमान्को बुला लिया और सब समाचार कहकर समझाया । सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े ॥ १ ॥
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* *८१८ रामचरितमानस
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा । पावक सायक सपदि चलावा ॥
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं । ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं ॥
फिर कृपालु श्रीरामजीने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया । जैसे ज्ञानके उदय होनेपर [ सब प्रकारके ] सन्देह दूर हो जाते हैं ॥२ ॥
भालु बलीमुख पाइ प्रकासा । धाए हरष बिगत श्रम त्रासा ॥
हनूमान अंगद रन गाजे । हाँक सुनत रजनीचर भाजे ॥
भालू और वानर प्रकाश पाकर श्रम और भयसे रहित तथा प्रसन्न होकर दौड़े । हनुमान् और
अङ्गद रणमें गरज उठे । उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग छूटे ॥ ३ ॥
भागत भट पटकहिं धरि धरनी । करहिं भालु कपि अद्भुत करनी ॥
गहि पद डारहिं सागर माहीं । मकर उरग झष धरि धरि खाहीं ॥
भागते हुए राक्षस योद्धाओंको वानर और भालू पकड़कर पृथ्वीपर दे मारते हैं । और अद्भुत ( आश्चर्यजनक ) करनी करते हैं ( युद्धकौशल दिखलाते हैं ) । पैर पकड़कर उन्हें समुद्रमें डाल देते हैं । वहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़- पकड़कर खा डालते हैं ॥४ ॥
दो० –- कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ ।
गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ ॥ ४७ ॥
कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़पर चढ़ गये । अपने बलसे शत्रुदलको विचलित करके रीछ और वानर [ वीर ] गरज रहे हैं ॥४७ ॥
निसा जानि कपि चारिउ अनी । आए जहाँ कोसला धनी ॥
राम कृपा करि चितवा सबही । भए बिगतश्रम बानर तबही ॥
रात हुई जानकर वानरोंकी चारों सेनाएँ ( टुकड़ियाँ ) वहाँ आयीं जहाँ कोसलपति श्रीरामजी थे । श्रीरामजीने ज्यों ही सबको कृपा करके देखा त्यों ही ये वानर श्रमरहित हो गये ॥१ ॥
उहाँ दसानन सचिव हँकारे । सब सन कहेसि सुभट जे मारे ॥
आधा कटकु कपिन्ह संघारा । कहहु बेगि का करिअ बिचारा ॥
वहाँ [ लङ्कामें ] रावणने मन्त्रियोंको बुलाया और जो योद्धा मारे गये थे उन सबको सबसे बताया । [ उसने कहा- ] वानरोंने आधी सेनाका संहार कर दिया! अब शीघ्र बताओ, क्या विचार ( उपाय ) करना चाहिये? ॥ २ ॥