श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 821–830
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830
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* * लङ्काकाण्ड ८१ ९
माल्यवंत अति जरठ निसाचर । रावन मातु पिता मंत्री बर ॥
बोला बचन नीति अति पावन । सुनहु तात कछु मोर सिखावन ॥
माल्यवंत [ नामका एक] अत्यन्त बूढ़ा राक्षस था । वह रावणकी माताका पिता ( अर्थात् उसका नाना ) और श्रेष्ठ मन्त्री था । वह अत्यन्त पवित्र नीतिके वचन बोला -हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो — ॥३ ॥
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी । असगुन होहिं न जाहिं बखानी ॥
बेद पुरान जासु जसु गायो । राम बिमुख काहुँ न सुख पायो ॥
जबसे तुम सीताको हर लाये हो, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किये जा सकते । वेद- पुराणोंने जिनका यश गाया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर किसीने सुख नहीं पाया ॥ ४ ॥
दो० – हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान ।
जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥ ४८ ( क ) ॥
भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान् मधु -कैटभको जिन्होंने मारा था, वे ही कृपाके समुद्र भगवान् [ रामरूपसे ] अवतरित हुए हैं ॥ ४८ ( क) ॥ मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध ।
सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध ॥ ४८ ( ख ) ॥
जो कालस्वरूप हैं, दुष्टोंके समूहरूपी वनके भस्म करनेवाले [ अग्नि ] हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानघन हैं, एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा? ॥ ४८ ( ख ) ॥
परिहरि बयरुबयरु देहुदेहु बैदेही । भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥
ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे ॥
[ अत: ] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजीका भजन करो । रावणको उसके वचन बाणके समान लगे । [ वह बोला– ] अरे अभागे! मुँह काला करके [ यहाँसे ] निकल जा ॥१ ॥
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही । अब जनि नयन देखावसि मोही ॥
तेहिं अपने मन अस अनुमाना । बध्यो चहत एहि कृपानिधाना ॥
तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता । अब मेरी आँखोंको अपना मुँह न दिखला । रावणके ये वचन सुनकर उसने ( माल्यवान्ने ) अपने मनमें ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं ॥ २ ॥
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* * ८२० रामचरितमानस
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा । तब सकोप बोलेउ घननादा ॥
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा । करिहउँ बहुत कहौं का थोरा ॥
वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया । तब मेघनाद क्रोधपूर्वक बोला– सबेरे मेरी करामात देखना । मैं बहुत कुछ करूँगा; थोड़ा क्या कहूँ? (जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा) ॥ ३ ॥
सुनि सुत बचन भरोसा आवा । प्रीति समेत अंक बैठावा ॥
करत बिचार भयउ भिनुसारा । लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा ॥
पुत्रके वचन सुनकर रावणको भरोसा आ गया । उसने प्रेमके साथ उसे गोदमें बैठा लिया । विचार
करते -करते ही सबेरा हो गया । वानर फिर चारों दरवाजोंपर जा लगे ॥४ ॥
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ घेरा । नगर कोलाहलु भयउ घनेरा ॥
बिबिधायुध धर निसिचर धाए । गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए ॥
वानरोंने क्रोध करके दुर्गम किलेको घेर लिया । नगरमें बहुत ही कोलाहल ( शोर ) मच गया । राक्षस बहुत तरहके अस्त्र- शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किलेपरसे पहाड़ोंके शिखर ढहाये ॥५ ॥
छं० – ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले ।
घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले ॥
मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए ।
गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए ॥
उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकारसे गोले चलने लगे । वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे वज्रपात हुआ हो ( बिजली गिरी हो ) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकालके बादल हों । विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं ( घायल हो जाते हैं ), उनके शरीर जर्जर ( चलनी ) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत नहीं हारते) । वे पहाड़ उठाकर उसे किलेपर फेंकते हैं । राक्षस जहाँ - के - तहाँ (जो जहाँ होते हैं वहीं ) मारे जाते हैं ।
दो० – मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ ।
उतरयो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ ॥ ४ ९ ॥
मेघनादने कानोंसे ऐसा सुना कि वानरोंने आकर फिर किलेको घेर लिया है । तब वह वीर किलेसे उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला ॥ ४ ९ ॥
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता । धन्वी सकल लोक बिख्याता ॥
कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा । अंगद हनूमंत बल सींवा ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८२१ [ मेघनादने पुकारकर कहा- ] समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बलकी सीमा अङ्गद और हनुमान् कहाँ हैं? ॥१ ॥
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही । आजु सबहि हठि मारउँ ओही ॥
अस कहि कठिन बान संधाने । अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने ॥
भाईसे द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सबको और उस दुष्टको तो हठपूर्वक ( अवश्य ही ) मारूँगा । ऐसा कहकर उसने धनुषपर कठिन बाणोंका सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके उसे कानतक खींचा ॥ २ ॥
सर समूह सो छाड़ै लागा । जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा ॥
जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर । सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर ॥
वह बाणोंके समूह छोड़ने लगा । मानो बहुत-से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों । जहाँ- तहाँ वानर
गिरते दिखायी पड़ने लगे । उस समय कोई भी उसके सामने न हो सके ॥३ ॥
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा । बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा ॥
सो कपि भालु न रन महँ देखा । कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा ॥
रीछ- वानर जहाँ - तहाँ भाग चले । सबको युद्धकी इच्छा भूल गयी । रणभूमिमें ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो ( अर्थात् जिसके केवल प्राणमात्र ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सारा जाता न रहा हो ) ॥४ ॥
दो० - दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर ।
सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर ॥ ५० ॥
फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर पृथ्वीपर गिर पड़े । बलवान् और धीर मेघनाद सिंहके समान नाद करके गरजने लगा ॥५० ॥
देखि पवनसुत कटक बिहाला । क्रोधवंत जनु धायउ काला ॥
महासैल एक तुरत उपारा । अति रिस मेघनाद पर डारा ॥
सारी सेनाको बेहाल ( व्याकुल ) देखकर पवनसुत हनुमान् क्रोध करके ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ा आता हो । उन्होंने तुरंत एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़ लिया और बड़े ही क्रोधके साथ उसे मेघनादपर छोड़ा ॥१ ॥
आवत देखि गयउ नभ सोई । रथ सारथी तुरग सब खोई ॥
। निकट न आव मरमु सो जाना ॥बार बार पचार हनुमाना
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* *८२२ रामचरितमानस पहाड़को आते देखकर वह आकाशमें उड़ गया । [ उसके ] रथ, सारथि और घोड़े सब नष्ट हो गये ( चूर- चूर हो गये) । हनुमान्जी उसे बार- बार ललकारते हैं । पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि वह उनके बलका मर्म जानता था ॥ २ ॥
रघुपति निकट गयउ घननादा ॥ नाना भाँति करेसि दुर्बादा ॥
अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे । कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे ॥
[ तब ] मेघनाद श्रीरघुनाथजीके पास गया और उसने [ उनके प्रति ] अनेकों प्रकारके दुर्वचनोंका प्रयोग किया । [ फिर ] उसने उनपर अस्त्र-शस्त्र तथा और सब हथियार चलाये । प्रभुने खेलमें ही सबको काटकर अलग कर दिया ॥३ ॥
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना । करै लाग माया बिधि नाना ॥
जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला । डरपावै गहि स्वल्प सपेला ॥
श्रीरामजीका प्रताप ( सामर्थ्य ) देखकर वह मूर्ख लज्जित हो गया और अनेकों प्रकारकी माया करने लगा । जैसे कोई व्यक्ति छोटा-सा साँपका बच्चा हाथमें लेकर गरुड़को डरावे और उससे खेल करे ॥४ ॥
दो० - जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट ।
ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट ॥ ५१ ॥
शिवजी और ब्रह्माजीतक बड़े-छोटे [ सभी ] जिनकी अत्यन्त बलवान् मायाके वशमें हैं, नीचबुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है ॥५१ ॥
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा । महि ते प्रगट होहिं जलधारा ॥
नाना भाँति पिसाच पिसाची । मारु काटु धुनि बोलहिं नाची ॥
आकाशमें [ ऊँचे ] चढ़कर वह बहुत-से अंगारे बरसाने लगा । पृथ्वीसे जलकी धाराएँ प्रकट होने लगीं । अनेक प्रकारके पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच - नाचकर ' मारो, काटो ' की आवाज करने लगीं ॥१ ॥
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा । बरष कबहुँ उपल बहु छाड़ा ॥
बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा । सूझ न आपन हाथ पसारा ॥
वह कभी तो विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता था और कभी बहुत- से पत्थर फेंके देता था । फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि अपना ही पसारा हुआ हाथ नहीं सूझता था ॥२ ॥
कपि अकुलाने माया देखें । सब कर मरन बना एहि लेखें ॥
कौतुक देखि राम मुसुकाने । भए सभीत सकल कपि जाने ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८२३ माया देखकर वानर अकुला उठे । वे सोचने लगे कि इस हिसाबसे ( इसी तरह रहा ) तो सबका मरण आ बना । यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये । उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं ॥३ ॥
एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥
तब श्रीरामजीने एक ही बाणसे सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है । तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिसे वानर- भालुओंकी ओर देखा, [जिससे ] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं रुकते थे ॥४ ॥
दो० - आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ ॥ ५२ ॥
श्रीरामजीसे आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरोंके साथ हाथोंमें धनुष-बाण लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी क्रुद्ध होकर चले ॥५२ ॥
छतज नयन उर बाहु बिसाला । हिमगिरिनिभ तनु कछु एक लाला ॥
इहाँ दसानन सुभट पठाए । नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए ॥
उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं । हिमाचल पर्वतके समान उज्ज्वल ( गौरवर्ण ) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है । इधर रावणने भी बड़े - बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र- शस्त्र लेकर दौड़े ॥१ ॥
भूधर नख बिटपायुध धारी । धाए कपि जय राम पुकारी ॥
भिरे सकल जोरिहि सन जोरी । इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥
पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर ' श्रीरामचन्द्रजीकी जय ' पुकारकर दौड़े । वानर और राक्षस सब जोड़ीसे जोड़ी भिड़ गये । इधर और उधर दोनों ओर जयकी इच्छा कम न थी ( अर्थात् प्रबल थी ) ॥२ ॥
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं । कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥
मारु मारु धरु धरु धरु मारू । सीस तोरि गहि भुजा उपारू ॥
वानर उनको घूँसों और लातोंसे मारते हैं, दाँतोंसे काटते हैं । विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं । ‘ मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो’॥३ ॥
असि रव पूरि रही नव खंडा । धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा ॥
देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा । कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा ॥
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* *८२४ रामचरितमानस नवों खण्डोंमें ऐसी आवाज भर रही है । प्रचण्ड रुण्ड ( धड़ ) जहाँ -तहाँ दौड़ रहे हैं । आकाशमें
देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं । उन्हें कभी खेद होता है और कभी आनन्द ॥४ ॥
दो० – रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाई ।
जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ ॥ ५३ ॥
खून गड्ढोंमें भर- भरकर जम गया है और उसपर धूल उड़कर पड़ रही है [ वह दृश्य ऐसा है ] मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छा रही हो ॥५३ ॥
घायल बीर बिराजहिं कैसे । कुसुमित किंसुक के तरु जैसे ॥
लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा । भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा ॥
घायल वीर कैसे शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलासके पेड़ । लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोध करके एक- दूसरेसे भिड़ते हैं ॥ १ ॥
एकहि एक सकइ नहिं जीती । निसिचर छल बल करइ अनीती ॥
क्रोधवंत तब भयउ अनंता । भंजेउ रथ सारथी तुरंता ॥
एक- दूसरेको ( कोई किसीको ) जीत नहीं सकता । राक्षस छल- बल ( माया ) और अनीति ( अधर्म ) करता है, तब भगवान् अनन्तजी ( लक्ष्मणजी ) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथको तोड़ डाला और सारथिको टुकड़े -टुकड़े कर दिये! ॥२ ॥
नाना बिधि प्रहार कर सेषा । राच्छस भयउ प्रान अवसेषा ॥
रावन सुत निज मन अनुमाना । संकठ भयउ हरिहि मम प्राना ॥
शेषजी ( लक्ष्मणजी ) उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे । राक्षसके प्राणमात्र शेष रह गये । रावणपुत्र मेघनादने मनमें अनुमान किया कि अब तो प्राणसंकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे ॥ ३ ॥
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी । तेजपुंज लछिमन उर लागी ॥
मुरुछा भई सक्ति के लागें । तब चलि गयउ निकट भय त्यागें ॥
तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलायी । वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजीकी छातीमें लगी । शक्तिके
लगनेसे उन्हें मूर्छा आ गयी । तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया ॥४ ॥
दो० – मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ ।
जगदाधार सेष किमि उठे चले खिसिआइ ॥ ५४ ॥
मेघनादके समान सौ करोड़ ( अगणित ) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं । परन्तु जगत्के आधार श्रीशेषजी ( लक्ष्मणजी ) उनसे कैसे उठते? तब वे लजाकर चले गये ॥ ५४ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८२५ सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू ॥ जारइ भुवन चारिदस आसू॥
सक संग्राम जीति को ताही । सेवहिं सुर नर अग जग जाही ॥
[ शिवजी कहते हैं— ] हे गिरिजे! सुनो, [ प्रलयकालमें ] जिन ( शेषनाग) -के क्रोधकी अग्नि चौदहों भुवनोंको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर [ जीव ] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है? ॥१ ॥
यह कौतूहल जानइ सोई । जा पर कृपा राम कै होई ॥
संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी । लगे सँभारन निज निज अनी ॥
इस लीलाको वही जान सकता है जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो । सन्ध्या होनेपर दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ीं; सेनापति अपनी- अपनी सेनाएँ सँभालने लगे ॥२ ॥
ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर । लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर ॥
तब लगि लै आयउ हनुमाना । अनुज देखि प्रभु अति दुख माना ॥
व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके ईश्वर और करुणाकी खान श्रीरामचन्द्रजीने पूछा— लक्ष्मण कहाँ हैं? तबतक हनुमान् उन्हें ले आये । छोटे भाईको [ इस दशामें ] देखकर प्रभुने बहुत ही दुःख माना ॥३ ॥
जामवंत कहकह बैदबैद सुषेना । लंकाँ रहइ को पठई लेना ॥
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता । आनेउ भवन समेत तुरंता ॥
जाम्बवान्ने कहा – लङ्कामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आनेके लिये किसको भेजा जाय? हनुमान्जी छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत तुरंत ही उठा लाये ॥४ ॥
दो० – राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन ।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥ ५५ ॥
सुषेणने आकर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंमें सिर नवाया । उसने पर्वत और औषधका नाम बताया, ( और कहा कि) हे पवनपुत्र! ओषधि लेने जाओ ॥ ५५ ॥
राम चरन सरसिज उर राखी । चला प्रभंजनसुत बल भाषी ॥
उहाँ दूत एक मरमु जनावा । रावनु कालनेमि गृह आवा ॥
श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर पवनपुत्र हनुमान्जी अपना बल बखानकर ( अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर ) चले । उधर एक गुप्तचरने रावणको इस रहस्यकी खबर दी । तब रावण कालनेमिके घर आया ॥१ ॥
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना । पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना ॥
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा । तासु पंथ को रोकन पारा ॥
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* *८२६ रामचरितमानस रावणने उसको सारा मर्म ( हाल) बतलाया । कालनेमिने सुना और बार- बार सिर पीटा ( खेद प्रकट किया ) । [ उसने कहा- ] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है? ॥२ ॥
भजु रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना ॥
नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥
श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो । हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो ।
नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रखो ॥३ ॥
। महा मोह निसि सूतत जागू ॥मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू
काल ब्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥
मैं - तू ( भेद - भाव ) और ममतारूपी मूढ़ताको त्याग दो । महामोह ( अज्ञान) -रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो । जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं स्वप्नमें भी वह रणमें जीता जा सकता है? ॥ ४ ॥
दो० - सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार ।
राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥
उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ । तब कालनेमिने मनमें विचार किया कि [ इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा ] श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है । यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है ॥ ५६ ॥
अस कहि चला रचिसि मग माया । सर मंदिर बर बाग बनाया ॥
मारुतसुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥
वह मन- ही- मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची । तालाब, मन्दिर और सुन्दर बाग बनाया । हनुमान्जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय ॥१ ॥
राच्छस कपट बेष तहँ सोहा । मायापति दूतहि चह मोहा ॥
जाइ पवनसुत नायउ माथा । लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥
राक्षस वहाँ कपट [ से मुनि ] का वेष बनाये विराजमान था । वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था । मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया । वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा ॥२ ॥
होत महा रन रावन रामहिं । जितिहहिं राम न संसय या महिं ॥
इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई । ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८२७ [ वह बोला— ] रावण और राममें महान् युद्ध हो रहा है । रामजी जीतेंगे इसमें सन्देह नहीं है । हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ । मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है ॥ ३ ॥
मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल । कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ॥
सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥
हनुमान्जीने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया । हनुमान्जीने कहा-- थोड़े जलसे मैं तृप्त नहीं होनेका । तब वह बोला- तालाबमें स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हें दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो ॥४ ॥
दो० – सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान ।
मारी सो धरि दिब्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥ ५७ ॥
तालाबमें प्रवेश करते ही एक मगरीने अकुलाकर उसी समय हनुमान्जीका पैर पकड़ लिया । हनुमान्जीने उसे मार डाला । तब वह दिव्य देह धारण करके विमानपर चढ़कर आकाशको चली ॥ ५७ ॥
कपि तव दरस भइउँ निष्पापा । मिटा तात मुनिबर कर सापा ॥
मुनि न होइ यह निसिचर घोरा । मानहु सत्य बचन कपि मोरा ॥
[ उसने कहा— ] हे वानर! मैं तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो गयी । हे तात! श्रेष्ठ मुनिका शाप
मिट गया । हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है । मेरा वचन सत्य मानो ॥१ ॥
अस कहि गई अपछरा जबहीं । निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ॥
कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू । पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू ॥
ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमान्जी निशाचरके पास गये । हनुमान्जीने
कहा—हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये । पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा ॥२ ॥
सिर लंगूर लपेटि पछारा । निज तनु प्रगटेसि मरती बारा ॥
राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ॥
हनुमान्जीने उसके सिरको पूँछमें लपेटकर उसे पछाड़ दिया । मरते समय उसने अपना ( राक्षसी ) शरीर प्रकट किया । उसने राम- राम कहकर प्राण छोड़े । यह ( उसके मुँहसे राम- नामका उच्चारण ) सुनकर हनुमानजी मनमें हर्षित होकर चले ॥३ ॥
देखा सैल न औषध चीन्हा । सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥
गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ । अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ ॥
उन्होंने पर्वतको देखा, पर औषध न पहचान सके । तब हनुमान्जीने एकदमसे पर्वतको ही उखाड़ लिया । पर्वत लेकर हनुमान्जी रातहीमें आकाशमार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गये ॥ ४ ॥
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*:*८२८ रामचरितमानस
दो० – देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि ।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥ ५८ ॥
भरतजीने आकाशमें अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मनमें अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है । उन्होंने कानतक धनुषको खींचकर बिना फलका एक बाण मारा ॥ ५८ ॥
परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक ॥
सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए । कपि समीप अति आतुर आए ॥
बाण लगते ही हनुमान्जी ' राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । प्रिय वचन ( रामनाम ) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावलीसे हनुमान्जीके पास आये ॥१ ॥
बिकल बिलोकि कीस उर लावा । जागत नहिं बहु भाँति जगावा ॥
मुख मलीन मन भए दुखारी । कहत बचन भरि लोचन बारी ॥
हनुमान्जीको व्याकुल देखकर उन्होंने हृदयसे लगा लिया । बहुत तरहसे जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजीका मुख उदास हो गया । वे मनमें बड़े दुखी हुए और नेत्रोंमें [ विषादके आँसुओंका ] जल भरकर ये वचन बोले- ॥२ ॥
जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा । तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा ॥
जौं मोरें मन बच अरु काया । प्रीति राम पद कमल अमाया ॥
जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने फिर यह भयानक दुःख भी दिया । यदि मन, वचन और शरीरसे श्रीरामजीके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो, ॥ ३ ॥
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला । जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥
और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमान्जी ' कोसलपति श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जय हो ' कहते हुए उठ बैठे ॥४ ॥
सो० — लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल ।
प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥ ५ ९ ॥
भरतजीने वानर ( हनुमान्जी ) को हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ आनन्द तथा प्रेमके आँसुओंका ] जल भर आया । रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके भरतजीके हृदयमें प्रीति समाती न थी ॥ ५ ९ ॥