श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 831–840

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840

पृष्ठ 831

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* * लङ्काकाण्ड ८२९

तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥

कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥

[ भरतजी बोले— ] हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुखनिधान श्रीरामजीकी कुशल कहो । वानर ( हनुमान्जी ) ने संक्षेपमें सब कथा कही । सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछताने लगे ॥१ ॥

अहह दैव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥

जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥

हा दैव! मैं जगत्में क्यों जन्मा? प्रभुके एक भी काम न आया । फिर कुअवसर ( विपरीत समय ) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्जीसे बोले— ॥२ ॥

तात गहरु होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥

चढ़ मम सायक सैल समेता । पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता ॥

हे तात! तुमको जानेमें देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जायगा । [ अतः ] तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं ॥ ३ ॥

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना । मोरें भार चलिहि किमि बाना ।

राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥

भरतजीकी यह बात सुनकर [एक बार तो ] हनुमान्जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे बाण कैसे चलेगा? [ किन्तु ] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले—॥४ ॥

दो० – तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत ।

अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६० ( क ) ॥

हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा । ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हनुमान्जी चले ॥ ६० ( क ) ॥

भरत बाहुबल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।

मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६० ( ख ) ॥

भरतजीके बाहुबल, शील ( सुन्दर स्वभाव ), गुण और प्रभुके चरणोंमें अपार प्रेमकी मन- ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमान्जी चले जा रहे हैं ॥ ६० ( ख ) ॥

उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥

अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥

पृष्ठ 832

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* *८३० रामचरितमानस वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्योंके अनुसार ( समान) वचन बोले — आधी रात बीत चुकी, हनुमान् नहीं आये । यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥

मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु बिपिन हिम आप बाता ॥

[ और बोले— ] हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे । तुम्हारा स्वभाव सदासे ही कोमल था । मेरे हितके लिये तुमने माता- पिताको भी छोड़ दिया और वनमें जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया ॥२ ॥

सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ॥

जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥

हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वनमें भाईका विछोह होगा तो मैं पिताका वचन [जिसका मानना मेरे लिये परम कर्तव्य था ] उसे भी न मानता ॥३ ॥

सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥

अस बिचारि जियँ जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥

पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार- ये जगत् में बार- बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्में सहोदर

भाई बार- बार नहीं मिलता । हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात! जागो ॥४ ॥

जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥

अस मम जिवन बंधु बिनु तोही । जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥

जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड़ बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा ॥ ५ ॥

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥

बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं । नारि हानि बिसेष छत नाहीं ॥

स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर, मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा? मैं जगत्में बदनामी भले ही सह लेता ( कि राममें कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्रीको खो बैठे ) । स्त्रीकी हानिसे [ इस हानिको देखते ] कोई विशेष क्षति नहीं थी ॥६ ॥

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा । सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥

निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥

पृष्ठ 833

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* * लङ्काकाण्ड ८३१ अब तो हे पुत्र! मेरा निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा । हे तात! तुम अपनी माताके एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो ॥७ ॥

सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी । सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥

उतरु काह दैहउँ तेहि जाई । उठि किन मोहि सिखावहु भाई ॥

सब प्रकारसे सुख देनेवाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था । मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते ( समझाते) क्यों नहीं? ॥ ८ ॥

बहु'बिधि सोचत सोच बिमोचन । स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन ॥

उमा एक अखंड रघुराई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥

सोचसे छुड़ानेवाले श्रीरामजी बहुत प्रकारसे सोच कर रहे हैं । उनके कमलकी पँखुड़ीके समान नेत्रोंसे [ विषादके आँसुओंका ] जल बह रहा है । [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! श्रीरघुनाथजी एक ( अद्वितीय ) और अखण्ड ( वियोगरहित ) हैं | भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान्ने [ लीला करके ] मनुष्यकी दशा दिखलायी है॥९॥

सो०- प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर ।

आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस ॥ ६१ ॥

प्रभुके [ लीलाके लिये किये गये ] प्रलापको कानोंसे सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो गये । [ इतनेमें ही ] हनुमान्जी आ गये, जैसे करुणरस [ के प्रसङ्ग ] में वीररस [ का प्रसङ्ग ] आ गया हो ॥ ६१ ॥

हरषि राम भेटेउ हनुमाना । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥

तुरत बैद तब कीन्हि उपाई । उठि बैठे लछिमन हरषाई ॥

श्रीरामजी हर्षित होकर हनुमान्जीसे गले लगकर मिले । प्रभु परम सुजान ( चतुर ) और अत्यन्त ही कृतज्ञ हैं । तब वैद्य ( सुषेण ) ने तुरंत उपाय किया, [जिससे ] लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे ॥ १ ॥

हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता । हरषे सकल भालु कपि ब्राता ॥

कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा । जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ॥

प्रभु भाईको हृदयसे लगाकर मिले । भालू और वानरोंके समूह सब हर्षित हो गये । फिर हनुमान्जीने वैद्यको उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया जिस प्रकार वे उस बार ( पहले ) उसे ले आये थे ॥२ ॥

पृष्ठ 834

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* *८३२ रामचरितमानस

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ । अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥

ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा । बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥

यह समाचार जब रावणने सुना, तब उसने अत्यन्त विषादसे बार-बार सिर पीटा । वह व्याकुल होकर कुम्भकर्णके पास गया और बहुत से उपाय करके उसने उसको जगाया ॥३ ॥

जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥

कुंभकरन बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई ॥

कुम्भकर्ण जगा ( उठ बैठा ) । वह कैसा दिखायी देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो । कुम्भकर्णने पूछा– हे भाई! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं? ॥४ ॥

कथा कही सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥

तात कपिन्ह सब निसिचर मारे । महा महा जोधा संघारे ॥

उस अभिमानी ( रावण ) -ने उससे जिस प्रकारसे वह सीताको हर लाया था [ तबसे अबतककी ] सारी कथा कही । [ फिर कहा— ] हे तात! वानरोंने सब राक्षस मार डाले । बड़े - बड़े योद्धाओंका भी संहार कर डाला ॥५ ॥

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ॥

अपर महोदर आदिक बीरा ।। परे समर महि सब रनधीरा ॥

दुर्मुख, देवशत्रु ( देवान्तक ), मनुष्यभक्षक ( नरान्तक ), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे गये ॥ ६ ॥

दो० - सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान ।

जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥

तब रावणके वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर ( दुखी होकर ) बोला- अरे मूर्ख! जगज्जननी जानकीको हर लाकर अब तू कल्याण चाहता है? ॥६२ ॥

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा । अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥

अजहूँ तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना ॥

हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया । अब आकर मुझे क्या जगाया? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा ॥ १ ॥

हैं दससीस मनुज रघुनायक । जाके हनूमान से पायक ॥

अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई । प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥

हे रावण! जिनके हनुमान्- सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया ॥ २ ॥

पृष्ठ 835

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* * लङ्काकाण्ड ८३३

कीन्हेहु प्रभु बिरोध तेहि देवक । सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥

नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा । कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥

हे स्वामी! तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं । नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता; पर अब तो समय जाता रहा ॥ ३ ॥

अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई । लोचन सुफल करौं मैं जाई ॥

स्याम गात सरसीरुह लोचन । देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥

हे भाई! अब तो [ अन्तिम बार ] अँकवार भरकर मुझसे मिल ले । मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ । तीनों तापोंको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामजीके जाकर दर्शन करूँ॥४ ॥

दो० – राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक ।

रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया । फिर रावणने करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाये ॥ ६३ ॥

महिष खाइ करि मदिरा पाना । गर्जा बज्राघात समाना ॥

कुंभकरन दुर्मद रन रंगा । चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥

भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्रघात ( बिजली गिरने ) के समान गरजा । मदसे चूर,

रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला । सेना भी साथ नहीं ली ॥१ ॥

देखि बिभीषनु आगे आयउ । परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥

अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो । रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥

उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया । छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त जानकर वे उसके मनको प्रिय लगे ॥२ ॥

तात लात रावन मोहि मारा । कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥

तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ । देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥

[ विभीषणने कहा- ] हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी । उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया । दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [ बहुत ] प्रिय लगा ॥ ३ ॥

पृष्ठ 836

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*:*८३४ रामचरितमानस

सुनु सुत भयउ कालबस रावन । सो कि मान अब परमसिखावन ॥

धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन । भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥

[ कुम्भकर्णने कहा— ] हे पुत्र! सुन, रावण तो कालके वश हो गया है ( उसके सिरपर मृत्यु नाच रही है ) । वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है । हे तात! तू राक्षसकुलका भूषण हो गया ॥४ ॥

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर । भजेहु राम सोभा सुख सागर॥

हे भाई! तूने अपने कुलको देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुखके समुद्र श्रीरामजीको भजा ॥५ ॥

दो० – बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ।

जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ॥६४ ॥

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना । हे भाई! मैं काल ( मृत्यु ) -के वश हो गया हूँ, मुझे अपना पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ ॥ ६४ ॥

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन । आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन ॥

नाथ भूधराकार सरीरा । कुंभकरन आवत रनधीरा ॥

भाईके वचन सुनकर विभीषण लौट गये और वहाँ आये जहाँ त्रिलोकीके भूषण श्रीरामजी थे । [ विभीषणने कहा— ] हे नाथ! पर्वतके समान [ विशाल ] देहवाला रणधीर कुम्भकर्ण आ रहा है ॥ १ ॥

एतना कपिन्ह सुना जब काना । किलकिलाइ धाए बलवाना ॥

लिए उठाइ बिटप अरु भूधर । कटकटाइ डारहिं ता ऊपर ॥

वानरोंने जब कानोंसे इतना सुना, तब वे बलवान् किलकिलाकर ( हर्षध्वनि करके ) दौड़े । वृक्ष और पर्वत [ उखाड़कर] उठा लिये और [ क्रोधसे ] दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे ॥२ ॥

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा । करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥

मुस्यो न मनु तनु टस्यो न टारयो । जिमि गज अर्क फलनि को मारयो ॥

रीछ - वानर एक- एक बारमें ही करोड़ों पहाड़ोंके शिखरोंसे उसपर प्रहार करते हैं; परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा ( विचलित हुआ ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीपर कुछ भी असर नहीं होता! ॥३ ॥

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो । पस्यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो ॥

पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता । घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ॥

पृष्ठ 837

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* * लङ्काकाण्ड ८३५ तब हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा; जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा । फिर उसने उठकर हनुमान्जीको मारा! वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥४ ॥

पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि । जहँ तहँ पटक पटक भट डारेसि ॥

चली बलीमुख सेन पराई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥

फिर उसने नल- नीलको पृथ्वीपर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ- तहाँ पटक- पटककर डाल दिया । वानरसेना भाग चली । सब अत्यन्त भयभीत हो गये, कोई सामने नहीं आता ॥५ ॥

दो० – अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव ।

काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव ॥ ६५ ॥

सुग्रीवसमेत अंगदादि वानरोंको मूर्च्छित करके फिर वह अपरिमित बलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दाबकर चला ॥ ६५ ॥

उमा करत रघुपति नरलीला । खेल गरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥

भृकुटि भंग जो कालहि खाई । ताहि कि सोहइ ऐसि लराई ॥

(शिवजी कहते हैं— ) हे उमा! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं जैसे गरुड़ सर्पोंके समूहमें मिलकर खेलता हो । जो भौंहके इशारेमात्रसे ( बिना परिश्रमके ) कालको भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है? ॥१ ॥

जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं । गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं ॥

मुरुछा गइ मारुतसुत जागा । सुग्रीवहि तब खोजन लागा ॥

भगवान् [ इसके द्वारा ] जगत्को पवित्र करनेवाली वह कीर्ति फैलायेंगे जिसे गा- गाकर मनुष्य भवसागरसे तर जायँगे । मूर्च्छा जाती रही, तब मारुति हनुमान्जी जागे और फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे ॥ २ ॥

सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती ॥ निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥

काटेसि दसन नासिका काना । गरज अकास चलेउ तेहिं जाना ॥

सुग्रीवक भी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे [ मुर्दे - से होकर ] खिसक गये ( काँखसे नीचे गिर पड़े ) । कुम्भकर्णने उनको मृतक जाना । उन्होंने कुम्भकर्णके नाक-कान दाँतोंसे काट लिये और फिर गरजकर आकाशकी ओर चले, तब कुम्भकर्णने जाना ॥३ ॥

गहेउ चरन गहि भूमि पछारा । अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥

पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना ॥

उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उनको पृथ्वीपर पछाड़ दिया । फिर सुग्रीवने बड़ी फुर्तीसे उठकर उसको मारा । और तब बलवान् सुग्रीव प्रभुके पास आये और बोले— कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो ॥ ४ ॥

पृष्ठ 838

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* *८३६ रामचरितमानस

नाक कान काटे जियँ जानी । फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥

सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा । देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥

नाक- कान काटे गये, ऐसा मनमें जानकर बड़ी ग्लानि हुई; और वह क्रोध करके लौटा । एक तो वह स्वभाव ( आकृति) -से ही भयंकर था और फिर बिना नाक कानका होनेसे और भी भयानक हो गया । उसे देखते ही वानरोंकी सेनामें भय उत्पन्न हो गया ॥५ ॥

दो० –जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह ।

एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह ॥ ६६ ॥

' रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो ' ऐसा पुकारकर वानर हूह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उसपर पहाड़ और वृक्षोंके समूह छोड़े ॥६६ ॥

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा । सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा ॥

कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई । जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई ॥

रणके उत्साहमें कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर [ उनके ] सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो । वह करोड़ - करोड़ वानरोंको एक साथ पकड़ - पकड़कर खाने लगा । [ वे उसके मुँहमें इस तरह घुसने लगे ] मानो पर्वतकी गुफामें टिड्डियाँ समा रही हों ॥१ ॥

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा । कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा ॥

मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा । निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा ॥

करोड़ों ( वानरों ) -को पकड़कर उसने शरीरसे मसल डाला । करोड़ोंको हाथोंसे मलकर पृथ्वीकी धूलमें मिला दिया । [ पेटमें गये हुए ] भालू और वानरोंके ठट्ट -के - ठट्ट उसके मुख, नाक और कानोंकी राहसे निकल निकलकर भाग रहे हैं ॥ २ ॥

रन मद मत्त निसाचर दर्पा । बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा ॥

मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे । सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे ॥

रणके मदमें मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाताने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा । सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाये भी नहीं लौटते । आँखोंसे उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारनेसे सुनते नहीं! ॥३ ॥

कुंभकरन कपि फौज बिडारी ॥ सुनि धाई रजनीचर धारी ॥

देखी राम बिकल कटकाई । रिपु अनीक नाना बिधि आई ॥

पृष्ठ 839

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* * लङ्काकाण्ड ८३७ कुम्भकर्णने वानर- सेनाको तितर-बितर कर दिया । यह सुनकर राक्षस- सेना भी दौड़ी । श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारकी सेना आ गयी है ॥ ४ ॥

दो० –- सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन ।

मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन ॥६७ ॥

तब कमलनयन श्रीरामजी बोले - हे सुग्रीव! हे विभीषण! और हे लक्ष्मण! सुनो, तुम सेनाको सँभालना । मैं इस दुष्टके बल और सेनाको देखता हूँ॥६७ ॥

कर सारंग साजि कटि भाथा । अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥

प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टँकोरा । रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा ॥

हाथमें शार्ङ्गधनुष और कमरमें तरकस सजकर श्रीरघुनाथजी शत्रुसेनाको दलन करने चले । प्रभुने पहले तो धनुषका टंकार किया जिसकी भयानक आवाज सुनते ही शत्रुदल बहरा हो गया॥१ ॥

सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा । कालसर्प जनु चले सपच्छा ॥

जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा । लगे कटन भट बिकट पिसाचा ॥

फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामजीने एक लाख बाण छोड़े । वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल - सर्प चले हों । जहाँ- तहाँ बहुत- से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे ॥२ ॥

कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा । बहुतक बीर होहिं सत खंडा ॥

घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं । उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं ॥

उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं । बहुत -से वीरोंके सौ- सौ टुकड़े हो जाते हैं । घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वीपर पड़ रहे हैं । उत्तम योद्धा फिर सँभलकर उठते और लड़ते हैं ॥३ ॥

लागत बान जलद जिमि गाजहिं । बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं ॥

रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं । धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं ॥

बाण लगते ही वे मेघकी तरह गरजते हैं । बहुत-से तो कठिन बाणको देखकर ही भाग जाते हैं । बिना मुण्ड ( सिर ) के प्रचण्ड रुण्ड ( धड़ ) दौड़ रहे हैं और ' पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो ' का शब्द करते हुए गा ( चिल्ला ) रहे हैं ॥४ ॥

दो० – छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच ।

पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच ॥ ६८ ॥

प्रभुके बाणोंने क्षणमात्रमें भयानक राक्षसोंको काटकर रख दिया । फिर वे सब बाण लौटकर श्रीरघुनाथजीके तरकसमें घुस गये ॥६८ ॥

पृष्ठ 840

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* *८३८ रामचरितमानस

कुंभकरन मन दीख बिचारी । हति छन माझ निसाचर धारी ॥

भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा । कियो मृगनायक नाद गंभीरा ॥

कुम्भकर्णने मनमें विचारकर देखा कि श्रीरामजीने क्षणमात्रमें राक्षसी सेनाका संहार कर डाला । तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने गम्भीर सिंहनाद किया ॥१ ॥

कोपि महीधर लेइ उपारी । डारइ जहँ मर्कट भट भारी ॥

आवत देखि सैल प्रभु भारे । सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥

वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी - भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है । बड़े - बड़े पर्वतोंको आते देखकर प्रभुने उनको बाणोंसे काटकर धूलके समान ( चूर- चूर ) कर डाला ॥ २ ॥

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक । छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥

तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं । जिमि दामिनि घन माझ समाहीं ॥

फिर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुषको तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक बाण छोड़े । वे बाण कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर [ पीछेसे इस प्रकार] निकल जाते हैं [ कि उनका पता नहीं चलता ], जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं ॥३ ॥

सोनित स्रवत सोह तन कारे । जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे ॥

बिकल बिलोकि भालु कपि धाए । बिहँसा जबहिं निकट कपि आए ॥

उसके काले शरीरसे रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजलके पर्वतसे गेरूके पनाले बह रहे हों । उसे व्याकुल देखकर रीछ- वानर दौड़े । वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा ॥४ ॥

दो० - महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस ।

महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस ॥ ६ ९ ॥

और बड़ा घोर शब्द करके गरजा । तथा करोड़- करोड़ वानरोंको पकड़कर वह गजराजकी तरह उन्हें पृथ्वीपर पटकने लगा और रावणकी दुहाई देने लगा ॥ ६ ९ ॥

भागे भालु बलीमुख जूथा । बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा ॥

चले भाग कपि भालु भवानी । बिकल पुकारत आरत बानी ॥

यह देखकर रीछ - वानरोंके झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़ियेको देखकर भेड़ोंके झुंड । [शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! वानर- भालू व्याकुल होकर आर्तवाणीसे पुकारते हुए भाग चले ॥१ ॥

यह निसिचर दुकाल सम अहई । कपिकुल देस परन अब चहई ॥

कृपा बारिधर राम खरारी । पाहि पाहि प्रनतारति हारी ॥