श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 841–850
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850
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* * लङ्काकाण्ड ८३९ [ वे कहने लगे— ] यह राक्षस दुर्भिक्षके समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें पड़ना चाहता है । हे कृपारूपी जलके धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खरके शत्रु! हे शरणागतके दुःख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये! ॥२ ॥
सकरुन बचन सुनत भगवाना । चले सुधारि सरासन बाना ॥
राम सेन निज पाछें घाली । चले सकोप महा बलसाली ॥
करुणाभरे वचन सुनते ही भगवान् धनुष- बाण सुधारकर चले । महाबलशाली श्रीरामजीने सेनाको अपने पीछे कर लिया और वे [ अकेले ] क्रोधपूर्वक चले ( आगे बढ़े ) ॥ ३ ॥
खैचि धनुष सर सत संधाने । छूटे तीर सरीर समाने ॥
लागत सर धावा रिस भरा । कुधर डगमगत डोलति धरा ॥
उन्होंने धनुषको खींचकर सौ बाण सन्धान किये । बाण छूटे और उसके शरीरमें समा गये । बाणोंके लगते ही वह क्रोधमें भरकर दौड़ा । उसके दौड़नेसे पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी ॥४ ॥
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी । रघुकुलतिलक भुजा सोइ काटी ॥
धावा बाम बाहु गिरि धारी । प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी ॥
उसने एक पर्वत उखाड़ लिया । रघुकुलतिलक श्रीरामजीने उसकी वह भुजा ही काट दी । तब वह बायें हाथमें पर्वतको लेकर दौड़ा । प्रभुने उसकी वह भुजा भी काटकर पृथ्वीपर गिरा दी ॥५ ॥
काटें भुजा सोह खल कैसा । पच्छहीन मंदर गिरि जैसा ॥
उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका । ग्रसन चहत मानहुँ त्रैलोका ॥
भुजाओंके कट जानेपर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंखका मन्दराचल पहाड़ हो । उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा । मानो तीनों लोकोंको निगल जाना चाहता हो ॥६ ॥
दो० – करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि ।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥ ७० ॥
वह बड़े जोरसे चिग्घाड़ करके मुँह फैलाकर दौड़ा । आकाशमें सिद्ध और देवता डरकर हा! हा! हा! इस प्रकार पुकारने लगे ॥७० ॥
सभय देव करुनानिधि जान्यो । श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो ॥
बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ । तदपि महाबल भूमि न परेऊ ॥
करुणानिधान भगवान्ने देवताओंको भयभीत जाना । तब उन्होंने धनुषको कानतक तानकर
राक्षसके मुखको बाणोंके समूहसे भर दिया । तो भी वह महाबली पृथ्वीपर न गिरा ॥१ ॥
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* *८४० रामचरितमानस
सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा । काल त्रोन सजीव जनु आवा ॥
तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा । धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा ॥
मुखमें बाण भरे हुए वह [ प्रभुके ] सामने दौड़ा । मानो कालरूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो । तब प्रभुने क्रोध करके तीक्ष्ण बाण लिया और उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥२ ॥
सो सिर परेउ दसानन आगें । बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें ॥
धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा ॥
वह सिर रावणके आगे जा गिरा । उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणिके छूट जानेपर सर्प । कुम्भकर्णका प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी । तब प्रभुने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये ॥३ ॥
परे भूमि जिमि नभ तें भूधर । हेठ दाबि कपि भालु निसाचर ॥
तासु तेज प्रभु बदन समाना । सुर मुनि सबहिं अचंभव माना ॥
वानर- भालू और निशाचरोंको अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वीपर ऐसे पड़े जैसे आकाशसे दो पहाड़ गिरे हों । उसका तेज प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके मुखमें समा गया । [ यह देखकर ] देवता और मुनि सभीने आश्चर्य माना ॥ ४ ॥
सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं । अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं ॥
करि बिनती सुर सकल सिधाए । तेही समय देवरिषि आए ॥
देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए बहुत-से फूल बरसा रहे हैं । विनती
करके सब देवता चले गये । उसी समय देवर्षि नारद आये ॥५ ॥
गगनोपरि हरि गुन गन गाए । रुचिर बीररस प्रभु मन भाए ॥
बेगि हतहु खल कहि मुनि गए । राम समर महि सोभत भए ॥
आकाशके ऊपरसे उन्होंने श्रीहरिके सुन्दर वीररसयुक्त गुणसमूहका गान किया, जो प्रभुके मनको बहुत ही भाया । मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावणको शीघ्र मारिये । [ उस समय ] श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें आकर [ अत्यन्त ] सुशोभित हुए ॥६ ॥
छं० - संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी ।
श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी ॥
भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने ।
कह दास तुलसी कहिन सक छबि सेष जेहि आनन घने ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८४१ अतुलनीय बलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमिमें सुशोभित हैं । मुखपर पसीनेकी बूँदें हैं, कमलके समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं । शरीरपर रक्तके कण हैं, दोनों हाथोंसे धनुष-बाण फिरा रहे हैं । चारों ओर रीछ- वानर सुशोभित हैं । तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छबिका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते जिनके बहुत-से (( हजार) मुख हैं I
दो० – निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम ।
गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥ ७१ ॥
[ शिवजी कहते हैं— ] हे गिरिजे! कुम्भकर्ण, जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उसे भी श्रीरामजीने अपना परमधाम दे दिया! अतः वे मनुष्य [निश्चय ही ] मन्दबुद्धि हैं जो उन श्रीरामजीको नहीं भजते ॥७१ ॥
दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी । समर भई सुभटन्ह श्रम घनी ॥
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा ॥
दिनका अन्त होनेपर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं । [ आजके युद्धमें ] योद्धाओंको बड़ी थकावट हुई; परन्तु श्रीरामजीकी कृपासे वानरसेनाका बल उसी प्रकार बढ़ गया जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है ॥१ ॥
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती । निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥
बहु बिलाप दसकंधर करई । बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥
उधर राक्षस दिन - रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं । रावण बहुत विलाप कर रहा है । बार- बार भाई ( कुम्भकर्ण ) का सिर कलेजेसे लगाता है ॥२ ॥
रोवहिं नारि हृदय हति पानी । तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥
मेघनाद तेहि अवसर आयउ । कहि बहु कथा पिता समुझायउ ॥
स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बलको बखान करके हाथोंसे छाती पीट- पीटकर रो रही हैं । उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत-सी कथाएँ कहकर पिताको समझाया ॥३ ॥
देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करौं बड़ाई ॥
इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ । सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥
[ और कहा— ] कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा । अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ पाया था वह बल [ और रथ ] अबतक आपको नहीं दिखलाया था ॥४ ॥
एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना । चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥
इत कपि भालु काल सम बीरा । उत रजनीचर अति रनधीरा ॥
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* *८४२ रामचरितमानस इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया । लंकाके चारों दरवाजोंपर बहुत से वानर आ डटे । इधर कालके समान वीर वानर- भालू हैं और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस ॥५ ॥
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू । बरनि न जाइ समर खगकेतू॥
दोनों ओरके योद्धा अपनी - अपनी जयके लिये लड़ रहे हैं । हे गरुड़! उनके युद्धका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ६ ॥
दो० – मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास ।
गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास ॥७२ ॥
मेघनाद उसी ( पूर्वोक्त) मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरोंकी सेनामें भय छा गया ॥७२ ॥
सक्ति सूल तरवारि कृपाना । अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना ॥
डारइ परसु परिघ पाषाना । लागेउ बृष्टि करै बहु बाना । वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र शस्त्र एवं वज्र आदि बहुत - से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत-से बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥१ ॥
दस दिसि रहे बान नभ छाई । मानहुँ मघा मेघ झरि लाई ॥
धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना । जो मारइ तेहि कोउ न जाना ॥
आकाशमें दसों दिशाओंमें बाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके बादलोंने झड़ी लगा दी हो । ' पकड़ो, पकड़ो, मारो ' ये शब्द कानोंसे सुनायी पड़ते हैं । पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता ॥ २ ॥
गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं । देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं ॥
अवघट घाट बाट गिरि कंदर । माया बल कीन्हेसि सर पंजर ॥
पर्वत और वृक्षोंको लेकर वानर आकाशमें दौड़कर जाते हैं । पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं - मेघनादने मायाके बलसे अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओंको बाणोंके पिंजरे बना दिये ( बाणोंसे छा दिया ) ॥ ३ ॥
जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर । सुरपति बंदि परे जनु मंदर ॥
मारुतसुत अंगद नल नीला । कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला ॥
अब कहाँ जायँ, यह सोचकर ( रास्ता न पाकर ) वानर व्याकुल हो गये । मानो पर्वत इन्द्रकी कैदमें पड़े हों । मेघनादने मारुति हनुमान्, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया ॥४ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८४३
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन । सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन ॥
पुनि रघुपति सैं जूझै लागा । सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा ॥
फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषणको बाणोंसे मारकर उनके शरीरोंको चलनी कर दिया । फिर वह श्रीरघुनाथजीसे लड़ने लगा । वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं ॥ ५ ॥
ब्याल पास बस भए खरारी । स्वबस अनंत एक अबिकारी ॥
नट इव कपट चरित कर नाना । सदा स्वतंत्र एक भगवाना ॥
जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक ( अखण्ड ) और निर्विकार हैं, वे खरके शत्रु श्रीरामजी [ लीलासे ] नागपाशके वशमें हो गये ( उससे बँध गये ) । श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र, एक, ( अद्वितीय ) भगवान् हैं । वे नटकी तरह अनेकों प्रकारके दिखावटी चरित्र करते हैं ॥६ ॥
रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो । नागपास देवन्ह भय पायो ॥
रणकी शोभाके लिये प्रभुने अपनेको नागपाशमें बँधा लिया; किन्तु उससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ७ ॥
दो० - गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास ।
सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास ॥ ७३ ॥
[ शिवजी कहते हैं— ] हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव ( जन्म- मृत्यु ) की फाँसीको काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास ( विश्वके आधार) प्रभु कहीं बन्धनमें आ सकते हैं? ॥७३ ॥
चरित राम के सगुन भवानी । तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥
अस बिचारि जे तग्य बिरागी । रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी ॥
हे भवानी! श्रीरामजीकी इन सगुण लीलाओंके विषयमें बुद्धि और वाणीके बलसे तर्क ( निर्णय ) नहीं किया जा सकता । ऐसा विचारकर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं वे सब तर्क ( शंका ) छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही करते हैं ॥१ ॥
ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा । पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा ॥
जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा । सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा ॥
मेघनादने सेनाको व्याकुल कर दिया । फिर वह प्रकट हो गया और दुर्वचन कहने लगा । इसपर
जाम्बवान्ने कहा—- अरे दुष्ट! खड़ा रह । यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध बढ़ा ॥२ ॥
बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही । लागेसि अधम पचारै मोही ॥
अस कहि तरल त्रिसूल चलायो । जामवंत कर गहि सोइ धायो ॥
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* *८४४ रामचरितमानस अरे मूर्ख! मैंने बूढ़ा जानकर तुझको छोड़ दिया था । अरे अधम! अब तू मुझीको ललकारने लगा है? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया । जाम्बवान् उसी त्रिशूलको हाथसे पकड़कर दौड़ा ॥३ ॥
मारिसि मेघनाद कै छाती । परा भूमि घुर्मित सुरघाती ॥
पुनि रिसान गहि चरन फिरायो । महि पछारि निज बल देखरायो ॥
और उसे मेघनादकी छातीपर दे मारा । वह देवताओंका शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । जाम्बवान्ने फिर क्रोधमें भरकर पैर पकड़कर उसको घुमाया और पृथ्वीपर पटककर उसे अपना बल दिखलाया ॥४ ॥
बर प्रसाद सो मरइ न मारा । तब गहि पद लंका पर डारा ॥
। राम समीप सपदि सो आयो ॥इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो [ किन्तु ] वरदानके प्रतापसे वह मारे नहीं मरता । तब जाम्बवान्ने उसका पैर पकड़कर उसे लंकापर फेंक दिया । इधर देवर्षि नारदजीने गरुड़को भेजा । वे तुरंत ही श्रीरामजीके पास आ पहुँचे ॥ ५ ॥
दो०- खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ ।
माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ ॥ ७४ ( क) ॥
पक्षिराज गरुड़जी सब माया- सर्पोंके समूहोंको पकड़कर खा गये । तब सब वानरोंके झुंड मायासे रहित होकर हर्षित हुए ॥ ७४ ( क ) ॥
गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ ।
चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ ॥ ७४ ( ख ) ॥
पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किये वानर क्रोधित होकर दौड़े । निशाचर विशेष व्याकुल होकर भाग चले और भागकर किलेपर चढ़ गये ॥ ७४ ( ख) ॥ मेघनाद कै मुरछा जागी ॥ पितहि बिलोकि लाज अति लागी ॥
तुरत गयउ गिरिबर कंदरा । करौं अजय मख अस मन धरा ॥
मेघनादकी मूर्च्छा छूटी, [ तब ] पिताको देखकर उसे बड़ी शर्म लगी । मैं अजय ( अजेय होनेको) यज्ञ करूँ, ऐसा मनमें निश्चय करके वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वतकी गुफामें चला गया ॥१ ॥
इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा । सुनहु नाथ बल अतुल उदारा ॥
मेघनाद मख करइ अपावन । खल मायावी देव सतावन ॥
यहाँ विभीषणने यह सलाह विचारी [और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा- ] हे अतुलनीय बलवान् उदार प्रभो! देवताओंको सतानेवाला दुष्ट, मायावी मेघनाद अपवित्र यज्ञ कर रहा है ॥२ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८४५
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि । नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ॥
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना । बोले अंगदादि कपि नाना ॥
हे प्रभो! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पायेगा तो हे नाथ! फिर मेघनाद जल्दी जीता न जा सकेगा । यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत-से वानरोंको बुलाया [ और कहा– ] ॥३ ॥
लछिमन संग जाहु सब भाई । करहु बिधंस जग्य कर जाई ॥
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही । देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥
हे भाइयो! सब लोग लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर यज्ञको विध्वंस करो । हे लक्ष्मण!
संग्राममें तुम उसे मारना । देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है ॥४ ॥
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई । जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई ॥
जामवंत सुग्रीव बिभीषन । सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥
हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धिके उपायसे मारना, जिससे निशाचरका नाश हो ।
हे जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों जने सेनासमेत [इनके ] साथ रहना ॥५ ॥
जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन । कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥
प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा । बोले घन इव गिरा गंभीरा ॥
[इस प्रकार ] जब श्रीरघुवीरने आज्ञा दी, तब कमरमें तरकस कसकर और धनुष सजाकर ( चढ़ाकर ) रणधीर श्रीलक्ष्मणजी प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करके मेघके समान गम्भीर वाणी बोले—॥६ ॥
जौं हि आजु बधें बिनु आवौं । तौ रघुपति सेवक न कहावौं ॥
जौं सत संकर करहिं सहाई । तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई ॥
यदि मैं आज उसे बिना मारे आऊँ, तो श्रीरघुनाथजीका सेवक न कहलाऊँ । यदि सैकड़ों शङ्कर भी उसकी सहायता करें तो भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है; आज मैं उसे मार ही डालूँगा ॥७ ॥
दो० - रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत ॥
अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ॥ ७५ ॥
श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर शेषावतार श्रीलक्ष्मणजी तुरंत चले । उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान् आदि उत्तम योद्धा थे ॥७५ ॥
जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा । आहुति देत रुधिर अरु भैंसा ॥
कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा । जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा ॥
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* *८४६ रामचरितमानस वानरोंने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और भैंसेकी आहुति दे रहा है । वानरोंने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया । फिर भी जब वह नहीं उठा, तब वे उसकी प्रशंसा करने लगे ॥१ ॥
तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई । लातन्हि हति हति चले पराई ॥
लै त्रिसूल धावा कपि भागे । आए जहँ रामानुज आगे ॥
इतनेपर भी वह न उठा, [ तब ] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़े और लातोंसे मार-मारकर वे भाग चले । वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे ॥२ ॥
आवा परम क्रोध कर मारा । गर्ज घोर रव बारहिं बारा ॥
कोपि मरुतसुत अंगद धाए । हति त्रिसूल उर धरनि गिराए ॥
वह अत्यन्त क्रोधका मारा हुआ आया और बार- बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा । मारुति ( हनुमान्) और अंगद क्रोध करके दौड़े । उसने छातीमें त्रिशूल मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया ॥३ ॥
प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा । सर हति कृत अनंत जुग खंडा ॥
उठि बहोरि मारुति जुबराजा । हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा ॥
फिर उसने प्रभु श्रीलक्ष्मणजीपर प्रचण्ड त्रिशूल छोड़ा । अनन्त ( श्रीलक्ष्मणजी ) ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये । हनुमानजी और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, पर उसे चोट न लगी ॥४ ॥
फिरे बीर रिपु मरइ न मारा । तब धावा करि घोर चिकारा ॥
आवत देखि क्रुद्ध जनु काला । लछिमन छाड़े बिसिख कराला ॥
शत्रु ( मेघनाद ) मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिग्घाड़ करके दौड़ा । उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणजीने भयानक बाण छोड़े ॥५ ॥
देखेसि आवत पबि सम बाना । तुरत भयउ खल अंतरधाना ॥
बिबिध बेष धरि करइ लराई । कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई ॥
वज्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर भाँति- भाँतिके रूप धारण करके युद्ध करने लगा । वह कभी प्रकट होता था और कभी छिप जाता था ॥ ६ ॥
देखि अजय रिपु डरपे कीसा । परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा ॥
लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा । एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८४७ शत्रुको पराजित न होता देखकर वानर डरे । तब सर्पराज शेषजी ( लक्ष्मणजी ) बहुत ही क्रोधित हुए । लक्ष्मणजीने मनमें यह विचार दृढ़ किया कि इस पापीको मैं बहुत खेला चुका [ अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त ही कर देना चाहिये । ] ॥ ७ ॥
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा । सर संधान कीन्ह करि दापा ॥
छाड़ा बान माझ उर लागा । मरती बार कपटु सब त्यागा ॥
कोसलपति श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणजीने वीरोचित दर्प करके बाणका सन्धान किया । बाण छोड़ते ही उसकी छातीके बीचमें लगा । मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया ॥ ८ ॥
दो० - रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान ।
धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ॥ ७६ ॥
रामके छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिये । अंगद और हनुमान् कहने लगे- तेरी माता धन्य है, धन्य है, [ जो तू लक्ष्मणजीके हाथों मरा और मरते समय श्रीराम- लक्ष्मणको स्मरण करके तूने उनके नामोंका उच्चारण किया । ] ॥७६ ॥
बिनु प्रयास हनुमान उठायो । लंका द्वार राखि पुनि आयो ॥
तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा । चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा ॥
हनुमान्जीने उसको बिना ही परिश्रमके उठा लिया और लङ्काके दरवाजेपर रखकर वे लौट आये । उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व आदि सब विमानोंपर चढ़कर आकाशमें आये ॥ १ ॥
बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं । श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं ॥
जय अनंत जय जगदाधारा । तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा ॥
वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश गाते हैं । हे अनन्त! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो । हे प्रभो! आपने सब देवताओंका [ महान् विपत्तिसे ] उद्धार किया ॥ २ ॥
अस्तुति कर सुरसिद्ध सिधाए । लछिमन कृपासिंधु पहिं आए ॥
सुत बध सुना दसानन जबहीं । मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं ॥
देवता और सिद्ध स्तुति करके चले गये, तब लक्ष्मणजी कृपाके समुद्र श्रीरामजीके पास आये । रावणने ज्यों ही पुत्रवधका समाचार सुना, त्यों ही वह मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥३ ॥
मंदोदरी रुदन कर भारी । उर ताड़न बहु भाँति पुकारी ॥
नगर लोग सब ब्याकुल सोचा । सकल कहहिं दसकंधर पोचा ॥
मन्दोदरी छाती पीट- पीटकर और बहुत प्रकारसे पुकार- पुकारकर बड़ा भारी विलाप करने
लगी । नगरके सब लोग शोकसे व्याकुल हो गये । सभी रावणको नीच कहने लगे ॥४ ॥
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* *८४८ रामचरितमानस
दो० – तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाईं सब नारि ।
नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि ॥ ७७ ॥
तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेकों प्रकारसे समझाया कि समस्त जगत्का यह ( दृश्य ) रूप नाशवान् है, हृदयमें विचारकर देखो ॥ ७७ ॥
तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन । आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥
पर उपदेस कुसल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥
रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया । वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा ( बातें ) शुभ और पवित्र है । दूसरोंको उपदेश देनेमें तो बहुत लोग निपुण होते हैं । पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं ॥१ ॥
निसा सिरानि भयउ भिनुसारा । लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥
सुभट बोलाइ दसानन बोला । रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥
रात बीत गयी, सबेरा हुआ । रीछ-वानर [ फिर] चारों दरवाजोंपर जा डटे । योद्धाओंको बुलाकर दशमुख रावणने कहा--लड़ाईमें शत्रुके सम्मुख जिसका मन डाँवाडोल हो, ॥ २ ॥
सो अबहीं बरु जाउ पराई । संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥
निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा । देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा ॥
अच्छा है वह अभी भाग जाय । युद्धमें जाकर विमुख होने ( भागने ) में भलाई नहीं है । मैंने अपनी भुजाओंके बलपर वैर बढ़ाया है । जो शत्रु चढ़ आया है, उसको मैं [ अपने ही ] उत्तर दे लूँगा ॥३ ॥
अस कहि मरुत बेग रथ साजा । बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥
चले बीर सब अतुलित बली । जनु कज्जल कै आँधी चली ॥
ऐसा कहकर उसने पवनके समान तेज चलनेवाला रथ सजाया । सारे जुझाऊ ( लड़ाईके ) बाजे बजने लगे । सब अतुलनीय बलवान् वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी चली हो ॥४ ॥
असगुन अमित होहिं तेहि काला । गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला ॥
उस समय असंख्य अशकुन होने लगे । पर अपनी भुजाओंके बलका बड़ा गर्व होनेसे रावण उन्हें गिनता नहीं है ॥५ ॥
छं० — अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते ।
भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते ॥
गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने ।
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने ॥