श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 851–860

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860

पृष्ठ 851

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* * लङ्काकाण्ड ८४९ अत्यन्त गर्वके कारण वह शकुन -अशकुनका विचार नहीं करता । हथियार हाथोंसे गिर रहे हैं । योद्धा रथसे गिर पड़ते हैं । घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिग्घाड़ते हुए भाग जाते हैं । स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं । बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं । उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो कालके दूत हों ( मृत्युका संदेशा सुना रहे हों ) ।

दो० – ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम ।

भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥ ७८ ॥

जो जीवोंके द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्नमें भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्तकी शान्ति हो सकती है? ॥७८ ॥

चलेउ निसाचर कटकु अपारा । चतुरंगिनी अनी बहु धारा ॥

बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना । बिपुल बरन पताक ध्वज नाना ॥

राक्षसोंकी अपार सेना चली । चतुरंगिणी सेनाकी बहुत-सी टुकड़ियाँ हैं । अनेकों प्रकारके वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत-से रंगोंकी अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं ॥१ ॥

चले मत्त गज जूथ घनेरे । प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे ॥

बरन बरन बिरदैत निकाया । समर सूर जानहिं बहु माया ॥

मतवाले हाथियोंके बहुत - से झुंड चले । मानो पवनसे प्रेरित हुए वर्षा ऋतु बादल हों । रंग- बिरंगे बाना धारण करनेवाले वीरोंके समूह हैं, जो युद्धमें बड़े शूरवीर हैं और बहुत प्रकारकी माया जानते हैं ॥ २ ॥

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी । बीर बसंत सेन जनु साजी ॥

चलत कटक दिगसिंधुर डगहीं । छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं ॥

अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है । मानो वीर वसन्तने सेना सजायी हो । सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे ॥३ ॥

उठी रेनु रबि गयउ छपाई । मरुत थकित बसुधा अकुलाई ॥

पनव निसान घोर रव बाजहिं । प्रलय समय के घन जनु गाजहिं ॥

इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये । [फिर सहसा ] पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी ।

ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं; जैसे प्रलयकालके बादल गरज रहे हों ॥४ ॥

भेरि नफीरि बाज सहनाई । मारू राग सुभट सुखदाई ॥

केहरि नाद बीर सब करहीं । निज निज बल पौरुष उच्चरहीं ॥

भेरी, नफीरी ( तुरही ) और शहनाईमें योद्धाओंको सुख देनेवाला मारू राग बज रहा है । सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने -अपने बल -पौरुषका बखान कर रहे हैं ॥ ५ ॥

पृष्ठ 852

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*:*८५० रामचरितमानस

कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा । मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा ॥

हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई । अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई ॥

रावणने कहा—हे उत्तम योद्धाओ! सुनो । तुम रीछ-वानरोंके ठट्टको मसल डालो । और मैं दोनों

राजकुमार भाइयोंको मारूँगा । ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलायी ॥६ ॥

यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई । धाए करि रघुबीर दोहाई ॥

जब सब वानरोंने यह खबर पायी, तब वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़े ॥७ ॥

छं० - धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते ।

मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बूंद नाना बान ते ॥

नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं ।

जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं ॥

वे विशाल और कालके समान कराल वानर- भालू दौड़े । मानो पंखवाले पर्वतोंके समूह उड़ रहे हों । वे अनेक वर्णोंके हैं । नख, दाँत, पर्वत और बड़े - बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं । वे बड़े बलवान् हैं और किसीका भी डर नहीं मानते । रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामजीका जय-जयकार करके वे उनके सुन्दर यशका बखान करते हैं ।

दो० - दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि ।

भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि ॥ ७ ९ ॥

दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जान ( चुन ) -कर इधर श्रीरघुनाथजीका और उधर रावणका बखान करके परस्पर भिड़ गये ॥७९ ॥

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि बिभीषन भयउ अधीरा ॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा । बंदि चरन कह सहित सनेहा ॥

रावणको रथपर और श्रीरघुवीरको बिना रथके देखकर विभीषण अधीर हो गये । प्रेम अधिक होनेसे उनके मनमें सन्देह हो गया [कि वे बिना रथके रावणको कैसे जीत सकेंगे ] । श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वे स्नेहपूर्वक कहने लगे ॥१ ॥

नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना । केहि बिधिजितब बीर बलवाना ॥

सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥

हे नाथ! आपके न रथ है, न तनकी रक्षा करनेवाला कवच है और न जूते ही हैं । वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जायगा? कृपानिधान श्रीरामजीने कहा– हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ॥२ ॥

पृष्ठ 853

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* * लङ्काकाण्ड ८५१

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥

बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

शौर्य और धैर्य उस रथके पहिये हैं । सत्य और शील ( सदाचार ) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं । बल, विवेक, दम ( इन्द्रियोंका वशमें होना ) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े हुए हैं ॥३ ॥

ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥

दान पर बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥

ईश्वरका भजन ही [ उस रथको चलानेवाला ] चतुर सारथि है । वैराग्य ढाल है और सन्तोष तलवार है । दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है ॥४ ॥

अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥

निर्मल ( पापरहित ) और अचल ( स्थिर ) मन तरकसके समान है । शम ( मनका वशमें होना ), [ अहिंसादि] यम और [ शौचादि ] नियम- ये बहुत -से बाण हैं । ब्राह्मणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है । इसके समान विजयका दूसरा उपाय नहीं है ॥५ ॥

सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥

हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही नहीं है ॥ ६ ॥

दो० - महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर ।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ॥ ८० ( क ) ॥

हे धीरबुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार ( जन्म - मृत्यु ) -रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [ रावणकी तो बात ही क्या है ] ॥ ८० ( क ) ॥

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज ।

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥ ८० ( ख) ॥

प्रभुके वचन सुनकर विभीषणजीने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये [ और कहा- ] हे कृपा और सुखके समूह श्रीरामजी! आपने इसी बहाने मुझे [ महान् ] उपदेश दिया ॥ ८० (ख) ॥ उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान । लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन ॥। ८० ( ग) । उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अगंद और हनुमान् । राक्षस और रीछ- वानर अपने - अपने स्वामीकी दुहाई देकर लड़ रहे हैं ॥ ८० ( ग ) ॥

पृष्ठ 854

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* * ८५२ रामचरितमानस

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना । देखत रन नभ चढ़े बिमाना ॥

हमहू उमा रहे तेहिं संगा । देखत राम चरित रन रंगा ॥

ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानोंपर चढ़े हुए आकाशसे युद्ध देख रहे हैं । [शिवजी कहते हैं- ] हे उमा! मैं भी उस समाजमें था और श्रीरामजीके रण-रंग (रणोत्साह ) की लीला देख रहा था ॥ १ ॥

सुभट समर रस दुहु दिसि माते । कपि जयसील राम बल ताते ॥

एक एक सन भिरहिं पचारहिं । एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं ॥

दोनों ओरके योद्धा रण-रसमें मतवाले हो रहे हैं । वानरोंको श्रीरामजीका बल है, इससे वे जयशील हैं ( जीत रहे हैं ) । एक दूसरेसे भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरेको मसल- मसलकर पृथ्वीपर डाल देते हैं ॥२ ॥

मारहिं काहिं धरहिं पछारहिं । सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं ॥

उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं । गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं ॥

वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरोंसे दूसरोंको मारते हैं । पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओंको पैर पकड़कर पृथ्वीपर पटक देते हैं ॥३ ॥

निसिचर भट महि गाड़हिं भालू । ऊपर ढारि देहिं बहु बालू ॥

बीर बलीमुख जुद्ध बिरुद्धे । देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे ॥

राक्षस योद्धाओंको भालू पृथ्वीमें गाड़ देते हैं और ऊपरसे बहुत-सी बालू डाल देते हैं । युद्धमें शत्रुओंसे विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रोधित काल हों ॥४ ॥

छं० - क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं ।

मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं ॥

मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं ।

चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं ॥

क्रोधित हुए कालके समान वे वानर खून बहते हुए शरीरोंसे शोभित हो रहे हैं । वे बलवान् वीर राक्षसोंकी सेनाके योद्धाओंको मसलते और मेघकी तरह गरजते हैं । डाँटकर चपेटोंसे मारते, दाँतोंसे काटकर लातोंसे पीस डालते हैं । वानर- भालू चिग्घाड़ते और ऐसा छल- बल करते हैं जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायँ ॥१ ॥

पृष्ठ 855

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* * लङ्काकाण्ड ८५३

धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं ।

प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं ॥

धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही ।

जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तून सही ॥

वे राक्षसोंके गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अँतड़ियाँ निकालकर गलेमें डाल लेते हैं । वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रह्लादके स्वामी श्रीनृसिंहभगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्धके मैदानमें क्रीड़ा कर रहे हों । पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वीमें भर (छा ) गये हैं । श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो सचमुच तृणसे वज्र और वज्रसे तृण कर देते हैं ( निर्बलको सबल और सबलको निर्बल कर देते हैं ) ॥ २ ॥

दो० – निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप ।

रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप ॥ ८१ ॥

अपनी सेनाको विचलित होते हुए देखा, तब बीस भुजाओंमें दस धनुष लेकर रावण रथपर चढ़कर गर्व करके ' लौटो ', ' लौटो ' कहता हुआ चला ॥ ८१ ॥

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर । सन्मुख चले हूह दै बंदर ॥

गहि कर पादप उपल पहारा । डारेन्हि ता पर एकहिं बारा ॥

रावण अत्यन्त क्रोधित होकर दौड़ा । वानर हुंकार करते हुए [ लड़नेके लिये ] उसके सामने चले । उन्होंने हाथोंमें वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावणपर एक ही साथ डाले ॥ १ ॥

लागहिं सैल बज्र तन तासू । खंड खंड होइ फूटहिं आसू॥

चला न अचल रहा रथ रोपी । रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥

पर्वत उसके वज्रतुल्य शरीरमें लगते ही तुरंत टुकड़े -टुकड़े होकर फूट जाते हैं । अत्यन्त क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, [ अपने स्थानसे ] जरा भी नहीं हिला ॥ २ ॥

इत उत झपटि दपटि कपि जोधा । मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा ॥

चले पराइ भालु कपि नाना । त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना ॥

उसे बहुत ही क्रोध हुआ । वह इधर-उधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओंको मसलने लगा । अनेकों वानर - भालू ' हे अंगद! हे हनुमान्! रक्षा करो, रक्षा करो ' [ पुकारते हुए ] भाग चले ॥३ ॥

पाहि पाहि रघुबीर गोसाईं । यह खल खाइ काल की नाईं ॥

तेहिं देखे कपि सकल पराने । दसहुँ चाप सायक संधाने ॥

पृष्ठ 856

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* *८५४ रामचरितमानस हे रघुवीर! हे गोसाईं! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । यह दुष्ट कालकी भाँति हमें खा रहा है । उसने देखा कि सब वानर भाग छूटे । तब [ रावणने ] दसों धनुषोंपर बाण सन्धान किये ॥ ४ ॥

छं० – संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं ।

रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं ॥

भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे ।

रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे ॥

उसने धनुषपर सन्धान करके बाणोंके समूह छोड़े । वे बाण सर्पकी तरह उड़कर जा लगते थे । पृथ्वी - आकाश और दिशा- विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं । वानर भागें तो कहाँ? अत्यन्त कोलाहल मच गया । वानर- भालुओंकी सेना व्याकुल होकर आर्त पुकार करने लगी— हे रघुवीर! हे करुणासागर! हे पीड़ितोंके बन्धु! हे सेवकोंकी रक्षा करके उनके दुःख हरनेवाले हरि!

दो० – निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ ।

लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ ॥८२ ॥

अपनी सेनाको व्याकुल देखकर कमरमें तरकस कसकर और हाथमें धनुष लेकर श्रीरघुनाथजी चरणोंपर मस्तक नवाकर लक्ष्मणजी क्रोधित होकर चले ॥ ८२ ॥

रे खल का मारसि कपि भालू । मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥

खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती । आजु निपाति जुड़ावउँ छाती ॥

[ लक्ष्मणजीने पास जाकर कहा- ] अरे दुष्ट! वानर- भालुओंको क्या मार रहा है? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ? [ रावणने कहा- ] अरे मेरे पुत्रके घातक! मैं तुझीको ढूँढ़ रहा था । आज तुझे मारकर [ अपनी ] छाती ठंडी करूँगा ॥ १ ॥

अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा । लछिमन किए सकल सत खंडा ॥

कोटिन्ह आयुध रावन डारे । तिल प्रवान करि काटि निवारे ॥

ऐसा कहकर उसने प्रचण्ड बाण छोड़े । लक्ष्मणजीने सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले । रावणने करोड़ों अस्त्र-शस्त्र चलाये । लक्ष्मणजीने उनको तिलके बराबर करके काटकर हटा दिया ॥ २ ॥

पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा । स्यंदनु भंजि सारथी मारा ॥

सत सत सर मारे दस भाला । गिरि संगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला ॥

फिर अपने बाणोंसे [ उसपर ] प्रहार किया और [ उसके ] रथको तोड़कर सारथिको मार डाला । [ रावणके ] दसों मस्तकोंमें सौ - सौ बाण मारे । वे सिरोंमें ऐसे पैठ गये मानो पहाड़के शिखरोंमें सर्प प्रवेश कर रहे हों ॥ ३ ॥

पृष्ठ 857

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* * लङ्काकाण्ड ८५५

पुनि सत सर मारा उर माहीं । परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं ॥

उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी । छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी ॥

फिर सौ बाण उसकी छातीमें मारे । वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा । फिर मूर्च्छा छूटनेपर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्माजीने उसे दी थी ॥४ ॥

छं० - सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही ।

परयो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही ॥

ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी ।

तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी ॥

वह ब्रह्माकी दी हुई प्रचण्ड शक्ति लक्ष्मणजीकी ठीक छातीमें लगी । वीर लक्ष्मणजी व्याकुल होकर गिर पड़े । तब रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसके अतुलित बलकी महिमा यों ही रह गयी (व्यर्थ हो गयी, वह उन्हें उठा न सका) । जिनके एक ही सिरपर ब्रह्माण्डरूपी भवन धूलके एक कणके समान विराजता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है! वह तीनों भुवनोंके स्वामी लक्ष्मणजीको नहीं जानता ।

दो०-देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर ।

आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर ॥ ८३ ॥

यह देखकर पवनपुत्र हनुमानजी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े । हनुमान्जीके आते ही रावणने उनपर अत्यन्त भयङ्कर घूँसेका प्रहार किया ॥ ८३ ॥

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा । उठा सँभारि बहुत रिस भरा ॥

मुठिका एक ताहि कपि मारा । परेड सैल जनु बज्र प्रहारा ॥

हनुमान्जी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वीपर गिरे नहीं । और फिर क्रोधसे भरे हुए सँभालकर उठे । हनुमानजीने रावणको एक घूँसा मारा । वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्रकी मारसे पर्वत गिरा हो ॥१ ॥

मुरुछा गै बहोरि सो जागा । कपि बल बिपुल सराहन लागा ॥

धिग धिग मम पौरुष धिग मोही । जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही ॥

मूर्च्छा भंग होनेपर फिर वह जगा और हनुमान्जीके बड़े भारी बलको सराहने लगा । [ हनुमान्जीने कहा— ] मेरे पौरुषको धिक्कार है, धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है, जो हे देवद्रोही! तू अब भी जीता रह गया ॥२ ॥

पृष्ठ 858

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* *८५६ रामचरितमानस

अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो । देखि दसानन बिसमय पायो ॥

कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता । तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता ॥

ऐसा कहकर और लक्ष्मणजीको उठाकर हनुमान्जी श्रीरघुनाथजीके पास ले आये । यह देखकर रावणको आश्चर्य हुआ । श्रीरघुवीरने [ लक्ष्मणजीसे] कहा- हे भाई! हृदयमें समझो, तुम कालके भी भक्षक और देवताओंके रक्षक हो ॥ ३ ॥

सुनत बचन उठि बैठ कृपाला । गई गगन सो सकति कराला ॥

पुनि कोदंड बान गहि धाए । रिपु सन्मुख अति आतुर आए ॥

ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे । वह कराल शक्ति आकाशको चली गयी । लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रतासे शत्रुके सामने आ पहुँचे ॥४ ॥

छं० – आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो ।

गिर्यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो ।

सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो I।

रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो ॥

फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रतासे रावणके रथको चूर-चूरकर और सारथिको मारकर उसे ( रावणको ) व्याकुल कर दिया । सौ बाणोंसे उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । तब दूसरा सारथि उसे रथमें डालकर तुरंत ही लंकाको ले गया । प्रतापके समूह श्रीरघुवीरके भाई लक्ष्मणजीने फिर आकर प्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया ।

दो० – उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य ।

राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य ॥ ८४ ॥

वहाँ ( लंकामें ) रावण मूर्च्छासे जागकर कुछ यज्ञ करने लगा । वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठवश श्रीरघुनाथजीसे विरोध करके विजय चाहता है ॥८४ ॥

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई । सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई ॥

नाथ करइ रावन एक जागा । सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा ॥

यहाँ विभीषणजीने सब खबर पायी और तुरंत जाकर श्रीरघुनाथजीको कह सुनायी कि हे नाथ! रावण एक यज्ञ कर रहा है । उसके सिद्ध होनेपर वह अभागा सहज ही नहीं मरेगा ॥१ ॥

पृष्ठ 859

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* * लङ्काकाण्ड ८५७

पठवहु नाथ बेगि भट बंदर । करहिं बिधंस आव दसकंधर ॥

प्रात होत प्रभु सुभट पठाए । हनुमदादि अंगद सब धाए ॥

हे नाथ! तुरंत वानर योद्धाओंको भेजिये; जो यज्ञका विध्वंस करें, जिससे रावण युद्धमें आवे । प्रातःकाल होते ही प्रभुने वीर योद्धाओंको भेजा । हनुमान् और अंगद आदि सब [ प्रधान वीर ] दौड़े ॥२ ॥

कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका । पैठे रावन भवन असंका ॥

जग्य करत जबहीं सो देखा । सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा ॥

वानर खेलसे ही कूदकर लंकापर जा चढ़े और निर्भय रावणके महलमें जा घुसे । ज्यों ही उसको यज्ञ करते देखा, त्यों ही सब वानरोंको बहुत क्रोध हुआ ॥ ३ ॥

रन ते निलज भाजि गृह आवा । इहाँ आइ बक ध्यान लगावा ॥

अस कहि अंगद मारा लाता । चितव न सठ स्वारथ मन राता ॥

[ उन्होंने कहा— ] अरे ओ निर्लज्ज! रणभूमिसे घर भाग आया और यहाँ आकर बगुलेका- सा ध्यान लगाकर बैठा है? ऐसा कहकर अंगदने लात मारी । पर उसने इनकी ओर देखा भी नहीं, उस दुष्टका मन स्वार्थमें अनुरक्त था ॥४ ॥

छं० – नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं ।

धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं ॥

तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई ।

एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई ॥

जब उसने नहीं देखा, तब वानर क्रोध करके उसे दाँतोंसे पकड़कर [ काटने और ] लातोंसे मारने लगे । स्त्रियोंको बाल पकड़कर घरसे बाहर घसीट लाये, वे अत्यन्त ही दीन होकर पुकारने लगीं । तब रावण कालके समान क्रोधित होकर उठा और वानरोंको पैर पकड़कर पटकने लगा । इसी बीचमें वानरोंने यज्ञ विध्वंस कर डाला, यह देखकर वह मनमें हारने लगा ( निराश होने लगा ) ।

दो० - जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास ।

चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागिजिवन कै आस ॥ ८५ ॥

यज्ञ विध्वंस करके सब चतुर वानर रघुनाथजीके पास आ गये । तब रावण जीनेकी आशा छोड़कर क्रोधित होकर चला ॥ ८५ ॥

चलत होहिं अति असुभ भयंकर । बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर ॥

भयउ कालबस काहु न माना । कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना ॥

पृष्ठ 860

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* *८५८ रामचरितमानस चलते समय अत्यन्त भयङ्कर अमङ्गल ( अपशकुन ) होने लगे । गीध उड़ - उड़कर उसके सिरोंपर बैठने लगे । किन्तु वह कालके वश था, इससे किसी भी अपशकुनको नहीं मानता था । उसने कहा— युद्धका डंका बजाओ ॥ १ ॥

चली तमीचर अनी अपारा । बहु गज रथ पदाति असवारा ॥

प्रभु सन्मुख धाए खल कैसें । सलभ समूह अनल कहँ जैसें ॥

निशाचरोंकी अपार सेना चली । उसमें बहुत-से हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल हैं । वे दुष्ट प्रभुके सामने कैसे दौड़े, जैसे पतंगोंके समूह अग्निकी ओर [ जलनेके लिये ] दौड़ते हैं ॥२ ॥

इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही । दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही ॥

अब जनि राम खेलावहु एही । अतिसय दुखित होति बैदेही ॥

इधर देवताओंने स्तुति की कि हे श्रीरामजी! इसने हमको दारुण दु:ख दिये हैं । अब आप

इसे [ अधिक ] न खेलाइये । जानकीजी बहुत ही दुखी हो रही हैं ॥३ ॥

देव बचन सुनि प्रभु मुसुकाना । उठि रघुबीर सुधारे बाना ॥

जटा जूट दृढ़ बाँधें माथे । सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे ॥

देवताओंके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये । फिर श्रीरघुवीरने उठकर बाण सुधारे । मस्तकपर जटाओंके जूड़ेको कसकर बाँधे हुए हैं, उसके बीच- बीचमें पुष्प गूँथे हुए शोभित हो रहे हैं ॥४ ॥

अरुन नयन बारिद तनु स्यामा । अखिल लोक लोचनाभिरामा ॥

कटितट परिकर कस्यो निषंगा । कर कोदंड कठिन सारंगा ॥

लाल नेत्र और मेघके समान श्याम शरीरवाले और सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाले हैं । प्रभुने कमरमें फेंटा तथा तरकस कस लिया और हाथमें कठोर शार्ङ्गधनुष ले लिया ॥५ ॥

छं० – सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो ।

भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो ॥

कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे ।

ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे ॥

प्रभुने हाथमें शार्ङ्गधनुष लेकर कमरमें बाणोंकी खान ( अक्षय ) सुन्दर तरकस कस लिया । उनके भुजदण्ड पुष्ट हैं और मनोहर चौड़ी छातीपर ब्राह्मण ( भृगुजी ) के चरणका चिह्न शोभित है । तुलसीदासजी कहते हैं, ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हाथमें लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओंके हाथी, कच्छप, शेषजी, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे ।