श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 861–870

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870

पृष्ठ 861

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* * लङ्काकाण्ड ८५९

दो० –- सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार ।

जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार ॥ ८६ ॥

[ भगवान्की ] शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलोंकी अपार वर्षा करने लगे । और शोभा, शक्ति और गुणोंके धाम करुणानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो [ऐसा पुकारने लगे ] ॥८६ ॥

एहीं बीच निसाचर अनी । कसमसात आई अति घनी ॥

देखि चले सन्मुख कपि भट्टा । प्रलयकाल के जनु घन घट्टा ॥

इसी बीचमें निशाचरोंकी अत्यन्त घनी सेना कसमसाती हुई ( आपसमें टकराती हुई ) आयी । उसे देखकर वानर योद्धा इस प्रकार [उसके ] सामने चले जैसे प्रलयकालके बादलोंके समूह हों ॥१ ॥

बहु कृपान तरवारि चमंकहिं । जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं ॥

गज रथ तुरग चिकार कठोरा । गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा ॥

बहुत -से कृपाण और तलवारें चमक रही हैं । मानो दसों दिशाओंमें बिजलियाँ चमक रही हों । हाथी, रथ और घोड़ोंका कठोर चिग्घाड़ ऐसा लगता है मानो बादल भयंकर गर्जन कर रहे हों ॥२ ॥

कपि लंगूर बिपुल नभ छाए । मनहुँ इंद्रधनुइंद्रधनु उएउए सुहाए ॥

उठइ धूरि मानहुँ जलधारा । बान बुंद भै बृष्टि अपारा ॥

वानरोंकी बहुत - सी पूँछें आकाशमें छायी हुई हैं । [वे ऐसी शोभा दे रही हैं ] मानो सुन्दर इन्द्रधनुष उदय हुए हों । धूल ऐसी उठ रही है मानो जलकी धारा हो । बाणरूपी बूँदोंकी अपार वृष्टि हुई ॥ ३ ॥

दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा । बज्रपात जनु बारहिं बारा ॥

रघुपति कोपि बान झरि लाई । घायल भै निसिचर समुदाई ॥

दोनों ओरसे योद्धा पर्वतोंका प्रहार करते हैं । मानो बारंबार वज्रपात हो रहा हो । श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके बाणोंकी झड़ी लगा दी, [जिससे ] राक्षसोंकी सेना घायल हो गयी ॥४ ॥

लागत बान बीर चिक्करहीं । घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं ॥

स्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी । सोनित सरि कादर भयकारी ॥

बाण लगते ही वीर चीत्कार कर उठते हैं और चक्कर खा-खाकर जहाँ- तहाँ पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं । उनके शरीरोंसे ऐसे खून बह रहा है मानो पर्वतके भारी झरनोंसे जल बह रहा हो । इस प्रकार डरपोकोंको भय उत्पन्न करनेवाली रुधिरकी नदी बह चली ॥ ५ ॥

पृष्ठ 862

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* *८६० रामचरितमानस

छं० — कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी ।

दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥

जलजंतु गज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने ।

सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥

डरपोकोंको भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली । दोनों दल उसके दोनों किनारे हैं । रथ रेत है और पहिये भँवर हैं । वह नदी बहुत भयावनी बह रही है । हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन करे, नदीके जलजन्तु हैं । बाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं; धनुष तरंगें हैं और ढाल बहुत- से कछुवे हैं ।

दो० - बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन ।

कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन ॥ ८७ ॥

वीर पृथ्वीपर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी- किनारेके वृक्ष ढह रहे हों । बहुत-सी मज्जा बह रही है, वही फेन है । डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम योद्धाओंके मनमें सुख होता है ॥८७ ॥

मज्जहिं भूत पिसाच बेताला । प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥

काक कंक लै भुजा उड़ाहीं । एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥

भूत, पिशाच और बैताल, बड़े - बड़े झोटोंवाले महान् भयङ्कर झोटिंग और प्रमथ ( शिवगण ) उस नदीमें स्नान करते हैं । कौए और चील भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और एक दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं ॥१ ॥

एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई । सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥

कहँरत भट घायल तट गिरे । जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे ॥

एक ( कोई ) कहते हैं, अरे मूर्खो! ऐसी सस्ती ( बहुतायत ) है, फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती? घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ - तहाँ अर्धजल ( वे व्यक्ति जो मरने समय आधे जलमें रखे जाते हैं ) पड़े हों ॥ २ ॥

खैंचहिं गीध आँत तट भए । जनु बंसी खेलत चित दए ॥

बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं । जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं ॥

गीध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी -तटपरसे चित्त लगाये हुए ( ध्यानस्थ होकर) बंसी खेल रहे हों ( बंसीसे मछली पकड़ रहे हों ) । बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उनपर चढ़े चले जा रहे हैं । मानो वे नदीमें नावरि ( नौकाक्रीड़ा ) खेल रहे हों ॥३ ॥

पृष्ठ 863

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* * लङ्काकाण्ड ८६१

जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं । भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं ॥

भट कपाल करताल बजावहिं । चामुंडा नाना बिधि गावहिं ॥

योगिनियाँ खप्परोंमें भर- भरकर खून जमा कर रही हैं । भूत- पिशाचोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं । चामुण्डाएँ योद्धाओंकी खोपड़ियोंका करताल बजा रही हैं और नाना प्रकारसे गा रही हैं ॥४ ॥

जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं । खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं ॥

कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं । सीस परे महि जय जय बोल्लहिं ॥

गीदड़ोंके समूह कट- कट शब्द करते हुए मुरदोंको काटते, खाते, हुआँ- हुआँ करते और पेट भर जानेपर एक दूसरेको डाँटते हैं । करोड़ों धड़ बिना सिरके घूम रहे हैं और सिर पृथ्वीपर पड़े जय-जय बोल रहे हैं ॥५ ॥

छं० — बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं ।

खप्परन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं ॥

बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए ।

संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए ॥

मुण्ड ( कटे सिर ) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रुण्ड ( धड़ ) बिना सिरके दौड़ते हैं । पक्षी खोपड़ियोंमें उलझ-उलझकर परस्पर लड़े मरते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओंको ढहा रहे हैं । श्रीरामचन्द्रजीके बलसे दर्पित हुए वानर राक्षसोंके झुण्डोंको मसले डालते हैं । श्रीरामजीके बाणसमूहोंसे मरे हुए योद्धा लड़ाईके मैदानमें सो रहे हैं ।

दो० – रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार ।

मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥ ८८ ॥

रावणने हृदयमें विचारा कि राक्षसोंका नाश हो गया है । मैं अकेला हूँ और वानर- भालू बहुत हैं, इसलिये मैं अब अपार माया रचूँ॥ ८८ ॥

उपजा उर अति छोभ बिसेषा ॥देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा ।

सुरपति निज रथ तुरत पठावा । हरष सहित मातलि लै आवा ॥

देवताओंने प्रभुको पैदल ( बिना सवारीके युद्ध करते) देखा, तो उनके हृदयमें बड़ा भारी क्षोभ (दुःख ) उत्पन्न हुआ । [फिर क्या था] इन्द्रने तुरंत अपना रथ भेज दिया । [ उसका सारथि ] मातलि हर्षके साथ उसे ले आया ॥१ ॥

तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा । हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा ॥

चंचल तुरग मनोहर चारी । अजर अमर मन सम गतिकारी ॥

पृष्ठ 864

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* *८६२ रामचरितमानस उस दिव्य अनुपम और तेजके पुञ्ज ( तेजोमय) रथपर कोसलपुरीके राजा श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर चढ़े । उसमें चार चञ्चल, मनोहर, अजर, अमर और मनकी गतिके समान शीघ्र चलनेवाले ( देवलोकके ) घोड़े जुते थे ॥ २ ॥

। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥रथारूढ़ रघुनाथहि देखी

सही न जाइ कपिन्ह कै मारी । तब रावन माया बिस्तारी ॥

श्रीरघुनाथजीको रथपर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े । वानरोंकी मार सही नहीं जाती । तब रावणने माया फैलायी ॥ ३ ॥

॥ लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची ॥सो माया रघुबीरहि बाँची

देखी कपिन्ह निसाचर अनी । अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥

एक श्रीरघुवीरके ही वह माया नहीं लगी । सब वानरोंने और लक्ष्मणजीने भी उस मायाको सच मान लिया । वानरोंने राक्षसी सेनामें भाई लक्ष्मणजीसहित बहुत-से रामोंको देखा ॥४ ॥

छं० – बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे ।

जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे ॥

निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसलधनी ।

माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥

बहुत- से राम- लक्ष्मण देखकर वानर- भालू मनमें मिथ्या डरसे बहुत ही डर गये । लक्ष्मणजीसहित वे मानो चित्रलिखे -से जहाँ-के -तहाँ खड़े देखने लगे । अपनी सेनाको आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान् हरि ( दुःखोंके हरनेवाले श्रीरामजी ) ने हँसकर धनुषपर बाण चढ़ाकर, पलभरमें सारी माया हर ली । वानरोंकी सारी सेना हर्षित हो गयी ।

दो० - बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गंभीर ।

द्वंदजुद्ध देख सकल श्रमित भए अति बीर ॥ ८ ९ ॥

फिर श्रीरामजी सबकी ओर देखकर गम्भीर वचन बोले - हे वीरो! तुम सब बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब [ मेरा और रावणका ] द्वन्द्वयुद्ध देखो ॥ ८९ ॥

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । बिप्र चरन पंकज सिरु नावा ॥

तब लंकेस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सन्मुख धावा ॥

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें सिर नवाया और फिर रथ चलाया । तब रावणके हृदयमें क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा ॥१ ॥

पृष्ठ 865

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* * लङ्काकाण्ड ८६३

जीतेहु जे भट संजुग माहीं । सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं ॥

रावन नाम जगत जस जाना । लोकप जाकें बंदीखाना ॥

[ उसने कहा— ] अरे तपस्वी! सुनो, तुमने युद्धमें जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत् जानता है, लोकपालतक जिसके कैदखानेमें पड़े हैं ॥ २ ॥

खर दूषन बिराध तुम्ह मारा । बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा ॥

निसिचर निकर सुभट संघारेहु । कुंभकरन घननादहि मारेहु ॥

तुमने खर, दूषण और विराधको मारा । बेचारे बालिका व्याधकी तरह वध किया । बड़े - बड़े राक्षस योद्धाओंके समूहका संहार किया और कुम्भकर्ण तथा मेघनादको भी मारा ॥३ ॥

आजु बरु सबु लेउँ निबाही । जौं रन भूप भाजि नहिं जाही ॥

आजु करउँ खलु काल हवाले । परेहु कठिन रावन के पाले ॥

अरे राजा! यदि तुम रणसे भाग न गये तो आज मैं [ वह ] सारा वैर निकाल लूँगा । आज मैं

तुम्हें निश्चय ही कालके हवाले कर दूँगा । तुम कठिन रावणके पाले पड़े हो ॥४ ॥

सुनि दुर्बचन कालबस जाना । बिहँसि बचन कह कृपानिधाना ॥

सत्य सत्य सब तव प्रभुताई । जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई ॥

रावणके दुर्वचन सुनकर और उसे कालवश जान कृपानिधान श्रीरामजीने हँसकर यह वचन कहा– तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है । पर अब व्यर्थ बकवाद न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ ॥५ ॥

छं० — जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा ।

संसार महँ पूरुष त्रिविध पाटल रसाल पनस समा ॥

एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं ।

एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं ॥

व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो । क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं - पाटल ( गुलाब ), आम और कटहलके समान । एक ( पाटल ) फूल देते हैं, एक ( आम) फूल और फल दोनों देते हैं और एक ( कटहल ) में केवल फल ही लगते हैं । इसी प्रकार [ पुरुषोंमें ] एक कहते हैं [ करते नहीं ], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक ( तीसरे ) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं ।

दो० - राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान ।

बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान ॥ ९ ० ॥

पृष्ठ 866

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* *८६४ रामचरितमानस श्रीरामजीके वचन सुनकर वह खूब हँसा ( और बोला- ) मुझे ज्ञान सिखाते हो? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं॥९० ॥

कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर । कुलिस समान लाग छाँड़ै सर ॥

। दिसि अरु बिदिसि गगन महि छाए ॥नानाकार सिलीमुख धाए दुर्वचन कहकर रावण क्रुद्ध होकर वज्रके समान बाण छोड़ने लगा । अनेकों आकारके बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वीमें, सब जगह छा गये ॥१ ॥

पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा । छन महुँ जरे निसाचर तीरा ॥

छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई । बान संग प्रभु फेरि चलाई ॥

श्रीरघुवीरने अग्निबाण छोड़ा, [जिससे ] रावणके सब बाण क्षणभरमें भस्म हो गये । तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी । [ किन्तु ] श्रीरामचन्द्रजीने उसको बाणके साथ वापस भेज दिया ॥२ ॥

कोटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारै । बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै ॥

निफल होहिं रावन सर कैसें । खल के सकल मनोरथ जैसें ॥

वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परन्तु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं । रावणके बाण किस प्रकार निष्फल होते हैं जैसे दुष्ट मनुष्यके सब मनोरथ! ॥३ ॥

तब सत बान सारथी मारेसि । परेउ भूमि जय राम पुकारेसि ॥

राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा ॥

तब उसने श्रीरामजीके सारथिको सौ बाण मारे । वह श्रीरामजीकी जय पुकारकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । श्रीरामजीने कृपा करके सारथिको उठाया । तब प्रभु अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुए ॥ ४ ॥

छं० – भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे ।

कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे ॥

मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर बसे । चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे । युद्धमें शत्रुके विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकसमें बाण कसमसाने लगे ( बाहर निकलनेको आतुर होने लगे) । उनके धनुषका अत्यन्त प्रचण्ड शब्द ( टङ्कार ) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये ( अत्यन्त भयभीत हो गये ) । मन्दोदरीका हृदय काँप उठा; समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्वत डर गये । दिशाओंके हाथी पृथ्वीको दाँतोंसे पकड़कर चिग्घाड़ने लगे । यह कौतुक देखकर देवता हँसे ।

पृष्ठ 867

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* * लङ्काकाण्ड ८६५

दो० –- तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल ।

राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल॥९ १ ॥

धनुषको कानतक तानकर श्रीरामचन्द्रजीने भयानक बाण छोड़े । श्रीरामजीके बाणसमूह ऐसे चले मानो सर्प लहलहाते ( लहराते ) हुए जा रहे हों ॥ ९ १ ॥

चले बान सपच्छ जनु उरगा । प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा ॥

रथ बिभंजि हति केतु पताका । गर्जा अति अंतर बल थाका ॥

बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों । उन्होंने पहले सारथि और घोड़ोंको मार डाला । फिर रथको चूर- चूर करके ध्वजा और पताकाओंको गिरा दिया । तब रावण बड़े जोरसे गरजा, पर भीतरसे उसका बल थक गया था ॥१ ॥

तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना । अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना ॥

बिफल होहिं सब उद्यम ताके । जिमि परद्रोह निरत मनसा के ॥

तुरंत दूसरे रथपर चढ़कर खिसियाकर उसने नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र छोड़े । उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो रहे हैं जैसे परद्रोहमें लगे हुए चित्तवाले मनुष्यके होते हैं ॥ २ ॥

तब रावन दस सूल चलावा । बाजि चारि महि मारि गिरावा ॥

तुरग उठाइ कोपि रघुनायक । खैचि सरासन छाँड़े सायक ॥

तब रावणने दस त्रिशूल चलाये और श्रीरामजीके चारों घोड़ोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया । घोड़ोंको उठाकर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुष खींचकर बाण छोड़े ॥३ ॥

रावन सिर सरोज बनचारी । चलि रघुबीर सिलीमुख धारी ॥

दस दस बान भाल दस मारे । निसरि गए चले रुधिर पनारे ॥

रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरण करनेवाले श्रीरघुवीरके बाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चली । श्रीरामचन्द्रजीने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण मारे, जो आर- पार हो गये और सिरोंसे रक्तके पनाले बह चले ॥४ ॥

स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना । प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना ॥

तीस तीर रघुबीर पबारे । भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥

रुधिर बहते हुए ही बलवान् रावण दौड़ा । प्रभुने फिर धनुषपर बाण सन्धान किया । श्रीरघुवीरने तीस बाण मारे और बीसों भुजाओंसमेत दसों सिर काटकर पृथ्वीपर गिरा दिये ॥५ ॥

काटतहीं पुनि भए नबीने । राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥

प्रभु बहु बार बाहु सिर हए । कटत झटिति पुनि नूतन भए ॥

पृष्ठ 868

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* * ८६६ रामचरितमानस [ सिर और हाथ ] काटते ही फिर नये हो गये । श्रीरामजीने फिर भुजाओं और सिरोंको काट गिराया । इस तरह प्रभुने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे । परन्तु काटते ही वे तुरन्त फिर नये हो गये ॥६ ॥

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा । अति कौतुकी कोसलाधीसा ॥

रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू । मानहुँ अमित केतु अरु राहू ॥

प्रभु बार- बार उसकी भुजा और सिरोंको काट रहे हैं; क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी हैं । आकाशमें सिर और बाहु ऐसे छा गये हैं, मानो असंख्य केतु और राहु हों ॥ ७ ॥

छं० -जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं ।

रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं ॥

एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं ।

जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं ॥

मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाशमार्गसे दौड़ रहे हों । श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाणोंके [ बार- बार ] लगनेसे वे पृथ्वीपर गिरने नहीं पाते । एक-एक बाणसे समूह -के- समूह सिर छिदे हुए आकाशमें उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं मानो सूर्यकी किरणें क्रोध करके जहाँ- तहाँ राहुओंको पिरो रही हों ।

दो० –जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार ।

सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार ॥ ९ २ ॥

जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते हैं, वैसे - ही - वैसे वे अपार होते जाते हैं । जैसे विषयोंका सेवन करनेसे काम ( उन्हें भोगनेकी इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है॥९ २ ॥

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी । बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी ॥

गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी । धायउ दसहु सरासन तानी ॥

सिरोंकी बाढ़ देखकर रावणको अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ । वह महान् अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषोंको तानकर दौड़ा ॥१ ॥

समर भूमि दसकंधर कोप्यो । बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो ॥

दंड एक रथ देखि न परेऊ । जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ ॥

रणभूमिमें रावणने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजीके रथको ढक दिया । एक दण्ड ( घड़ी ) तक रथ दिखलायी न पड़ा, मानो कुहरेमें सूर्य छिप गया हो ॥२ ॥

पृष्ठ 869

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* * लङ्काकाण्ड ८६७

हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा । तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा ॥

सर निवारि रिपु के सिर काटे । ते दिसि बिदिसि गगन महि पाटे ॥

जब देवताओंने हाहाकार किया, तब प्रभुने क्रोध करके धनुष उठाया । और शत्रुके बाणोंको हटाकर उन्होंने शत्रुके सिर काटे और उनसे दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी सबको पाट दिया ॥३ ॥

काटे सिर नभ मारग धावहिं । जय जय धुनि करि भय उपजावहिं ॥

कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा । कहँ रघुबीर कोसलाधीसा ॥

काटे हुए सिर आकाशमार्गसे दौड़ते हैं और जय-जयकी ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं ।

' लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं? ' ॥ ४ ॥

छं० - कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले ।

संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले ॥

सिर मालिका कर कालिका गहि बूंद बूंदन्हि बहु मिलीं ।

करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं ॥

' राम कहाँ हैं? ' यह कहकर सिरोंके समूह दौड़े, उन्हें देखकर वानर भाग चले । तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्रीरामजीने हँसकर बाणोंसे उन सिरोंको भलीभाँति बेध डाला । हाथोंमें मुण्डोंकी मालाएँ लेकर बहुत-सी कालिकाएँ झुंड-की-झुंड मिलकर इकट्ठी हुईं और वे रुधिरकी नदीमें स्नान करके चलीं, मानो संग्रामरूपी वटवृक्षकी पूजा करने जा रही हों ।

दो० - पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड ।

चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड ॥९ ३ ॥

फिर रावणने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी । वह विभीषणके सामने ऐसी चली जैसे काल ( यमराज ) का दण्ड हो॥९ ३ ॥

आवत देखि सक्ति अति घोरा । प्रनतारति भंजन पन मोरा ॥

तुरत बिभीषन पाछें मेला । सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला ॥

अत्यन्त भयानक शक्तिको आती देख और यह विचारकर कि मेरा प्रण शरणागतके दुःखका नाश करना है, श्रीरामजीने तुरंत ही विभीषणको पीछे कर लिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली ॥ १ ॥

लागि सक्ति मुरुछा कछु भई । प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई ॥

देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो । गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो ॥

पृष्ठ 870

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* * ८६८ रामचरितमानस शक्ति लगनेसे उन्हें कुछ मूर्च्छा हो गयी । प्रभुने तो यह लीला की, पर देवताओंको व्याकुलता हुई । प्रभुको श्रम ( शारीरिक कष्ट) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथमें गदा लेकर दौड़े ॥ २ ॥

रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे । तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे ॥

सादर सिव कहूँ सीस चढ़ाए । एक एक के कोटिन्ह पाए ॥

[ और बोले— ] अरे अभागे! मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, नाग सभीसे विरोध

किया । तूने आदरसहित शिवजीको सिर चढ़ाये । इसीसे एक-एकके बदलेमें करोड़ों पाये ॥३ ॥

तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो । अब तव कालु सीस पर नाच्यो ॥

राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ॥

उसी कारणसे अरे दुष्ट! तू अबतक बचा है । [किन्तु ] अब काल तेरे सिरपर नाच रहा है । अरे मूर्ख! तू रामविमुख होकर सम्पत्ति ( सुख ) चाहता है? ऐसा कहकर विभीषणने रावणकी छातीके बीचो - बीच गदा मारी ॥ ४ ॥

छं० – उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पस्यो ।

दस बदन सोनित स्रवत पुनि संभारि धायो रिस भयो ।

द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै ।

रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै ॥

बीच छातीमें कठोर गदाकी घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसके दसों मुखोंसे रुधिर बहने लगा; वह अपनेको फिर सँभालकर क्रोधमें भरा हुआ दौड़ा । दोनों अत्यन्त बलवान् योद्धा भिड़ गये और मल्लयुद्धमें एक दूसरेके विरुद्ध होकर मारने लगे । श्रीरघुवीरके बलसे गर्वित विभीषण उसको ( रावण-जैसे जगद्विजयी योद्धाको ) पासंगके बराबर भी नहीं समझते ।

दो० - उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ ।

सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥ ९ ४ ॥

[शिवजी कहते हैं - ] हे उमा! विभीषण क्या कभी रावणके सामने आँख उठाकर भी देख सकता था? परन्तु अब वही कालके समान उससे भिड़ रहा है । यह श्रीरघुवीरका ही प्रभाव है॥९४ ॥

देखा श्रमित बिभीषनु भारी ॥ धायउ हनूमान गिरि धारी ॥

रथ तुरंग सारथी निपाता । हृदय माझ तेहि मारेसि लाता ॥

विभीषणको बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमानजी पर्वत धारण किये हुए दौड़े । उन्होंने उस पर्वतसे रावणके रथ, घोड़े और सारथिका संहार कर डाला और उसके सीनेपर लात मारी ॥ १ ॥