श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 871–880

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880

पृष्ठ 871

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* * लङ्काकाण्ड ८६ ९

ठाढ़ रहा अति कंपित गाता । गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता ॥

पुनि रावन कपि हतेउ पचारी । चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी ॥

रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यन्त काँपने लगा । विभीषण वहाँ गये जहाँ सेवकोंके रक्षक श्रीरामजी थे । फिर रावणने ललकारकर हनुमान्जीको मारा । वे पूँछ फैलाकर आकाशमें चले गये ॥२ ॥

गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना । पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना ॥

लरत अकास जुगल सम जोधा । एकहि एकु हनत करि क्रोधा ॥

रावणने पूँछ पकड़ ली, हनुमान्जी उसको साथ लिये हुए ऊपर उड़े । फिर लौटकर महाबलवान् हनुमान्जी उससे भिड़ गये । दोनों समान योद्धा आकाशमें लड़ते हुए एक- दूसरेको क्रोध करके मारने लगे ॥३ ॥

सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं । कज्जलगिरि सुमेरु जनु लरहीं ॥

बुधि बल निसिचर परइ न पारयो । तब मारुतसुत प्रभु संभारयो ॥

दोनों बहुत- से छल- बल करते हुए आकाशमें ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कज्जलगिरि और सुमेरु पर्वत लड़ रहे हों । जब बुद्धि और बलसे राक्षस गिराये न गिरा तब मारुति श्रीहनुमान्जीने प्रभुको स्मरण किया ॥ ४ ॥

छं० - संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो ।

महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो ॥

हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले ।

रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले ॥

श्रीरघुवीरका स्मरण करके धीर हनुमान्जीने ललकारकर रावणको मारा । वे दोनों पृथ्वीपर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं; देवताओंने दोनोंकी 'जय जय ' पुकारी । हनुमान्जीपर सङ्कट देखकर वानर- भालू क्रोधातुर होकर दौड़े । किन्तु रण-मद-माते रावणने सब योद्धाओंको अपने प्रचण्ड भुजाओंके बलसे कुचल और मसल डाला ।

–दो० तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड ।

कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड ॥ ९ ५ ॥

तब श्रीरघुवीरके ललकारनेपर प्रचण्ड वीर वानर दौड़े । वानरोंके प्रबल दलको देखकर रावणने माया प्रकट की॥९ ५ ॥

अंतरधान भयउ छन एका । पुनि प्रगटे खल रूप अनेका ॥

रघुपति कटक भालु कपि जेते । जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते ॥

पृष्ठ 872

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* *८७० रामचरितमानस क्षण भरके लिये वह अदृश्य हो गया । फिर उस दुष्टने अनेकों रूप प्रकट किये । श्रीरघुनाथजीकी सेनामें जितने रीछ - वानर थे, उतने ही रावण जहाँ-तहाँ ( चारों ओर ) प्रकट हो गये ॥ १ ॥

देखे कपिन्ह अमित दससीसा । जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा ॥

भागे बानर धरहिं न धीरा । त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा ॥

वानरोंने अपरिमित रावण देखे । भालू और वानर सब जहाँ- तहाँ ( इधर- उधर ) भाग चले । वानर धीरज नहीं धरते । हे लक्ष्मणजी! हे रघुवीर! बचाइये, बचाइये, यों पुकारते हुए वे भागे जा रहे हैं ॥२ ॥

दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन । गर्जहिं घोर कठोर भयावन ॥

डरे सकल सुर चले पराई । जय कै आस तजहु अब भाई ॥

दसों दिशाओंमें करोड़ों रावण दौड़ते हैं और घोर, कठोर भयानक गर्जन कर रहे हैं । सब देवता डर गये और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई! अब जयकी आशा छोड़ दो! ॥ ३ ॥

सब सुर जिते एक दसकंधर । अब बहु भए तकहु गिरि कंदर ॥

रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी । जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी ॥

एक ही रावणने सब देवताओंको जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं । इससे अब पहाड़की गुफाओंका आश्रय लो ( अर्थात् उनमें छिप रहो) । वहाँ ब्रह्मा, शम्भु और ज्ञानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभुकी कुछ महिमा जानी थी ॥४ ॥

–जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे ।

-0चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे ॥

हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे ।

मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे ॥

जो प्रभुका प्रताप जानते थे, वे निर्भय डटे रहे । वानरोंने शत्रुओं ( बहुत-से रावणों ) को सच्चा ही मान लिया । [ इससे ] सब वानर- भालू विचलित होकर ' हे कृपालु! रक्षा कीजिये ' [ यों पुकारते हुए ] भयसे व्याकुल होकर भाग चले । अत्यन्त बलवान् रणबांकुरे हनुमान्जी, अंगद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमिसे अङ्कुरकी भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा रावणोंको मसलते हैं ।

दो० - सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस ।

सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस ॥९ ६ ॥

देवताओं और वानरोंको विकल देखकर कोसलपति श्रीरामजी हँसे और शार्ङ्गधनुषपर एक बाण चढ़ाकर [ मायाके बने हुए ] सब रावणोंको मार डाला॥९ ६ ॥

पृष्ठ 873

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* * लङ्काकाण्ड ८७१

प्रभु छन महुँ माया सब काटी । जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी ॥

रावनु एकु देखि सुर हरषे । फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरवे ॥

प्रभुने क्षणभरमें सब माया काट डाली । जैसे सूर्यके उदय होते ही अन्धकारकी राशि फट जाती है ( नष्ट हो जाती है ) । अब एक ही रावणको देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभुपर बहुत -से पुष्प बरसाये ॥१ ॥

भुज उठाइ रघुपति कप फेरे । फिरे एक एकन्ह तब टेरे ॥

प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए । तरल तमकि संजुग महि आए ॥

श्रीरघुनाथजीने भुजा उठाकर सब वानरोंको लौटाया । तब वे एक दूसरेको पुकार – पुकारकर लौट आये । प्रभुका बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े । जल्दीसे कूदकर वे रणभूमिमें आ गये ॥२ ॥

अस्तुति करत देवतन्हि देखें । भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें ॥

सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल । अस कहि कोपि गगन पर धायल ॥

देवताओंको श्रीरामजीकी स्तुति करते देखकर रावणने सोचा, मैं इनकी समझमें एक हो गया । [ परन्तु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिये मैं एक ही बहुत हूँ ] और कहा - अरे मूर्खो! तुम तो सदाके ही मेरे मरैल ( मेरी मार खानेवाले) हो । ऐसा कहकर वह क्रोध करके आकाशपर [देवताओंकी ओर ] दौड़ा ॥३ ॥

हाहाकार करत सुर भागे । खलहु जाहु कहँ मोरें आगे ॥

देखि बिकल सुर अंगद धायो । कूदि चरन गहि भूमि गिरायो ॥

देवता हाहाकार करते हुए भागे । [ रावणने कहा- ] दुष्टो! मेरे आगेसे कहाँ जा सकोगे? देवताओंको व्याकुल देखकर अंगद दौड़े और उछलकर रावणका पैर पकड़कर [ उन्होंने ] उसको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४ ॥

छं० – गहि भूमि पारयो लात मारयो बालिसुत प्रभु पहिं गयो ।

संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो ।

करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरई ।

किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई ॥

उसे पकड़कर पृथ्वीपर गिराकर लात मारकर बालिपुत्र अंगद प्रभुके पास चले गये । रावण सँभलकर उठा और बड़े भयङ्कर कठोर शब्दसे गरजने लगा । वह दर्प करके दसों धनुष चढ़ाकर उनपर बहुत -से बाण सन्धान करके बरसाने लगा । उसने सब योद्धाओंको घायल और भयसे व्याकुल कर दिया और अपना बल देखकर वह हर्षित होने लगा ।

पृष्ठ 874

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*:*८७२ रामचरितमानस

दो० – तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप ।

काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप ॥ ९७ ॥

तब श्रीरघुनाथजीने रावणके सिर, भुजाएँ, बाण और धनुष काट डाले । पर वे फिर बहुत बढ़ गये, जैसे तीर्थमें किये हुए पाप बढ़ जाते हैं ( कई गुना अधिक भयानक फल उत्पन्न करते हैं )!॥ ९७ ॥

सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी । भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी ॥

मरत न मूढ़ कटेहुँ भुज सीसा । धाए कोपि भालु भट कीसा ॥

शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़ती देखकर रीछ-वानरोंको बहुत ही क्रोध हुआ । यह मूर्ख भुजाओंके और सिरोंके कटनेपर भी नहीं मरता, [ ऐसा कहते हुए ] भालू और वानर योद्धा क्रोध करके दौड़े ॥१ ॥

बालितनय मारुति नल नीला । बानरराज दुबिद बलसीला ॥

बिटप महीधर करहिं प्रहारा । सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा ॥

बालिपुत्र अंगद, मारुति हनुमान्जी, नल, नील, वानरराज सुग्रीव और द्विविद आदि बलवान् उसपर वृक्ष और पर्वतोंका प्रहार करते हैं । वह उन्हीं पर्वतों और वृक्षोंको पकड़कर वानरोंको मारता है ॥२ ॥

एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी । भागि चलहिं एक लातन्ह मारी ॥

तब नल नील सिरन्हि चढि गयऊ । नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ ॥

कोई एक वानर नखोंसे शत्रुके शरीरको फाड़कर भाग जाते हैं, तो कोई उसे लातोंसे मारकर । तब नल और नील रावणके सिरोंपर चढ़ गये और नखोंसे उसके ललाटको फाड़ने लगे ॥३ ॥

रुधिर देखि बिषाद उर भारी । तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी ॥

गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं । जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं ॥

खून देखकर उसे हृदयमें बड़ा दुःख हुआ । उसने उनको पकड़नेके लिये हाथ फैलाये, पर वे पकड़में नहीं आते, हाथोंके ऊपर-ऊपर ही फिरते हैं मानो दो भौरे कमलोंके वनमें विचरण कर रहे हों ॥४ ॥

कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी । महि पटकत भजे भुजा मरोरी ॥

पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे । सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे ॥

पृष्ठ 875

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* * लङ्काकाण्ड ८७३ तब उसने क्रोध करके उछलकर दोनोंको पकड़ लिया । पृथ्वीपर पटकते समय वे उसकी भुजाओंको मरोड़कर भाग छूटे । उसने क्रोध करके हाथोंमें दसों धनुष लिये और वानरोंको बाणोंसे मारकर घायल कर दिया ॥५ ॥

हनुमदादि मुरुछित करि बंदर । पाइ प्रदोष हरष दसकंधर ॥

मुरुछित देखि सकल कपि बीरा । जामवंत धायउ रनधीरा ॥

हनुमान्जी आदि सब वानरोंको मूर्च्छित करके और सन्ध्याका समय पाकर रावण हर्षित हुआ ।

समस्त वानर- वीरोंको मूर्च्छित देखकर रणधीर जाम्बवान् दौड़े ॥६ ॥

संग भालु भूधर तरु धारी । मारन लगे पचारि पचारी ॥

भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना । गहि पद महि पटकइ भट नाना ॥

जाम्बवान्के साथ जो भालू थे, वे पर्वत और वृक्ष धारण किये रावणको ललकार- ललकारकर मारने लगे । बलवान् रावण क्रोधित हुआ और पैर पकड़ - पकड़कर वह अनेकों योद्धाओंको पृथ्वीपर पटकने लगा ॥७ ॥

देखि भालुपति निज दल घाता । कोपि माझ उर मारेसि लाता ॥

जाम्बवान्ने अपने दलका विध्वंस देखकर क्रोध करके रावणकी छातीमें लात मारी ॥ ८ ॥

छं० — उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा ।

गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा ॥

मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो । निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतन करत भयो । छातीमें लातका प्रचण्ड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसने बीसों हाथोंमें भालुओंको पकड़ रखा था । [ ऐसा जान पड़ता था ] मानो रात्रिके समय भौरे कमलोंमें बसे हुए हों । उसे मूर्च्छित देखकर, फिर लात मारकर ऋक्षराज जाम्बवान् प्रभुके पास चले गये । रात्रि जानकर सारथि रावणको रथमें डालकर उसे होशमें लानेका उपाय करने लगा ।

दो० –- मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास ।

निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास ॥ ९८ ॥

मूर्च्छा दूर होनेपर सब रीछ-वानर प्रभुके पास आये । उधर सब राक्षसोंने बहुत ही भयभीत होकर रावणको घेर लिया ॥९ ८ ॥ मासपारायण, छब्बीसवाँ विश्राम

तेही निसि सीता पहिं जाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥

सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी । सीता उर भइ त्रास घनेरी ॥

पृष्ठ 876

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* *८७४ रामचरितमानस उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर उन्हें सब कथा कह सुनायी । शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़तीका संवाद सुनकर सीताजीके हृदयमें बड़ा भय हुआ ॥१ ॥

मुख मलीन उपजी मन चिंता । त्रिजटा सन बोली तब सीता ॥

होइहि कहा कहसि किन माता । केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता ॥

[ उनका ] मुख उदास हो गया, मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी । तब सीताजी त्रिजटासे बोलीं- हे माता! बताती क्यों नहीं? क्या होगा? सम्पूर्ण विश्वको दुःख देनेवाला यह किस प्रकार मरेगा? ॥२ ॥

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥

मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिं ह्रौं हरि पद कमल बिछोही ॥

श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता । विधाता सारे चरित्र विपरीत ( उलटे ) ही कर रहा है । [ सच बात तो यह है कि ] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान्‌के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है ॥ ३ ॥

जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा । अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा ॥

जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए । लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए ॥

जिसने कपटका झूठा स्वर्णमृग बनाया था, वही दैव अब भी मुझपर रूठा हुआ है । जिस विधाताने मुझसे दुःसह दुःख सहन कराये और लक्ष्मणको कडुवे वचन कहलाये, ॥ ४॥

रघुपति बिरह सबिष सर भारी । तकि तकि मार बार बहु मारी ॥

ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना । सोइ बिधि ताहिजिआव न आना ॥

जो श्रीरघुनाथजीके विरहरूपी बड़े विषैले बाणोंसे तक-तककर मुझे बहुत बार मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःखमें भी जो मेरे प्राणोंको रख रहा है, वही विधाता उस ( रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं ॥ ५ ॥

बहु बिधि र बिलाप जानकी । करि करि सुरति कृपानिधान की ॥

कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी । उर सर लागत मरइ सुरारी ॥

कृपानिधान श्रीरामजीकी याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं । त्रिजटाने कहा — हे राजकुमारी! सुनो, देवताओंका शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ॥६ ॥

प्रभु ताते उर हतइ न तेही । एहि के हृदयँ बसति बैदेही ॥

परन्तु प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमें जानकीजी ( आप ) बसती हैं ॥७ ॥

पृष्ठ 877

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* * लङ्काकाण्ड ८७५

छं० – एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है ।

मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ॥

सुनि बचन हरष बिषाद मन अतिदेखि पुनि त्रिजटाँ कहा ।

अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ॥

[वे यही सोचकर रह जाते हैं कि] इसके हृदयमें जानकीका निवास है, जानकीके हृदयमें मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भुवन हैं । अतः रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा । यह वचन सुनकर, सीताजीके मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ देखकर त्रिजटाने फिर कहा-हे सुन्दरी! महान् सन्देहका त्याग कर दो; अब सुनो, शत्रु इस

प्रकार मरेगा-दो० – काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान ।

तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान ॥९९ ॥

सिरोंके बार- बार काटे जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदयसे तुम्हारा ध्यान छूट जायगा, तब सुजान ( अन्तर्यामी ) श्रीरामजी रावणके हृदयमें बाण मारेंगे ॥ ९९ ॥

अस कहि बहुत भाँति समुझाई । पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई ॥

राम सुभाउ सुमिरि बैदेही । उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥

ऐसा कहकर और सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाकर फिर त्रिजटा अपने घर चली गयी । श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण करके जानकीजीको अत्यन्त विरहव्यथा उत्पन्न हुई ॥ १ ॥

निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती । जुग सम भई सिराति न राती ॥

करति बिलाप मनहिं मन भारी । राम बिरहँ जानकी दुखारी ॥

वे रात्रिकी और चन्द्रमाकी बहुत प्रकारसे निन्दा कर रही हैं [ और कह रही हैं— ] रात युगके समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं । जानकीजी श्रीरामजीके विरहमें दुःखी होकर मन-ही- मन भारी विलाप कर रही हैं ॥२ ॥

जब अति भयउ बिरह उर दाहू । फरकेउ बाम नयन अरु बाहू॥

सगुन बिचारि धरी मन धीरा । अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा ॥

जब विरहके मारे हृदयमें दारुण दाह हो गया, तब उनका बायाँ नेत्र और बाहु फड़क उठे । शकुन समझकर उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया कि अब कृपालु श्रीरघुवीर अवश्य मिलेंगे ॥३ ॥

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा । निज सारथि सन खीझन लागा ॥

सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही । धिग धिग अधम मंदमति तोही ॥

पृष्ठ 878

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* *८७६ रामचरितमानस यहाँ आधी रातको रावण [ मूर्च्छासे ] जगा और अपने सारथिपर रुष्ट होकर कहने लगा- अरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया । अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है! ॥४ ॥

तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा । भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा ॥

सुनि आगवनु दसानन केरा । कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥

सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया । सबेरा होते ही वह रथपर चढ़कर फिर दौड़ा । रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी ॥५ ॥

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी । धाए कटकटाइ भट भारी ॥

वे भारी योद्धा जहाँ - तहाँसे पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [ क्रोधसे ] दाँत कटकटाकर दौड़े ॥ ६ ॥

छं० - धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा ।

अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा ॥

बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो । चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो । विकट और विकराल वानर- भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े । वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं । उनके मारनेसे राक्षस भाग चले । बलवान् वानरोंने शत्रुकी सेनाको विचलित करके फिर रावणको घेर लिया । चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोंसे शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया ।

दो० —देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार ।

अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार ॥ १०० ॥

वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी ॥ १०० ॥

छं० – जब कीन्ह तेहिं पाषंड । भए प्रगट जंतु प्रचंड ।

बेताल भूत पिसाच । कर धरें धनु नाराच॥१ ॥

जब उसने पाखण्ड ( माया) रचा, तब भयङ्कर जीव प्रकट हो गये । बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष- बाण लिये प्रकट हुए! ॥ १ ॥

जोगिनि गहें करबाल । एक हाथ मनुज कपाल ।

करि सद्य सोनित पान । नाचहिं करहिं बहु गान ॥ २ ॥

योगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरहके गीत गाने लगीं ॥२ ॥

पृष्ठ 879

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* * लङ्काकाण्ड ८७७

धरु मारु बोलहिं घोर । रहि पूरि धुनि चहुँ ओर ।

मुख बाइ धावहिं खान । तब लगे कीस परान ॥ ३ ॥

वे ‘ पकड़ो, मारो ' आदि घोर शब्द बोल रही हैं । चारों ओर ( सब दिशाओंमें ) यह ध्वनि भर

गयी । वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं । तब वानर भागने लगे ॥ ३ ॥

जहँ जाहिं मर्कट भागि । तहँ बरत देखहिं आगि ।

भए बिकल बानर भालु । पुनि लाग बरषै बालु ॥ ४ ॥

वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं । वानर- भालू व्याकुल हो गये । फिर रावण बालू बरसाने लगा ॥४ ॥

जहँ तहँ थकित कर कीस । गर्जेउ बहुरि दससीस ।

लछिमन कपीस समेत । भए सकल बीर अचेत ॥ ५ ॥

वानरोंको जहाँ- तहाँ थकित ( शिथिल ) कर रावण फिर गरजा । लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी वीर अचेत हो गये ॥ ५ ॥ । हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मीजहिं हाथ

एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥ ६ ॥

हा राम! हा रघुनाथ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते ( पछताते ) हैं । इस प्रकार सबका बल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची ॥६ ॥

प्रगटेसि बिपुल हनुमान । धाए गहे पाषान ॥ चहुँ दिसि बरूथ बनाइ ॥७ ॥ तिन्ह रामु घेरे जाइ

उसने बहुत- से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े । उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा ॥७ ॥

मारहु धरहु जनि जाइ । कटकटहिं पूँछ उठाइ ।

दहँ दिसि लँगूर बिराज । तेहिं मध्य कोसलराज ॥ ८ ॥

वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, ' मारो, पकड़ो, जाने न पावे । ' उनके लंगूर ( पूँछ ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं ॥ ८ ॥

छं० — तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही ।

जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही ॥

प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी ।

रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी ॥

पृष्ठ 880

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* *८७८ रामचरितमानस उनके बीचमें कोसलराजका सुन्दर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊँचे तमाल वृक्षके लिये अनेक इन्द्रधनुषोंकी श्रेष्ठ बाड़ ( घेरा ) बनायी गयी हो । प्रभुको देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदयसे ‘ जय, जय, जय ' ऐसा बोलने लगे । तब श्रीरघुवीरने क्रोध करके एक ही बाणसे निमेषमात्रमें रावणकी सारी माया हर ली ॥१ ॥

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे ।

सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे ॥

श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं ।

सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं ॥

माया दूर हो जानेपर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले- लेकर सब लौट पड़े । श्रीरामजीने बाणोंके समूह छोड़े, जिनसे रावणके हाथ और सिर फिर कट- कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े । श्रीरामजी और रावणके युद्धका चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी वे उसका पार नहीं पा सकते ॥ २ ॥

दो० – ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास ।

जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़ड़ अकास ॥ १०१ क ॥

उसी चरित्रके कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने पुरुषार्थके अनुसार आकाशमें उड़ती है ॥ १०१ ( क ) ॥

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस ।

प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस ॥ १०१ ख ॥

सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं । फिर भी वीर रावण मरता नहीं । प्रभु तो खेल कर रहे हैं; परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेशको देखकर ( प्रभुको क्लेश पाते समझकर ) व्याकुल हैं ॥ १०१ ( ख) ॥

काटत बढ़हिं सीस समुदाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ॥

मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा । राम बिभीषन तन तब देखा ॥

काटते ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है । शत्रु मरता नहीं

और परिश्रम बहुत हुआ । तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा ॥१ ॥

उमा काल मर जाकीं ईछा । सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥

सुनु सरबग्य चराचर नायक । प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥

[शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं । [विभीषणजीने कहा-- ] हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये - ॥२ ॥