श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 881–890
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890
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* * लङ्काकाण्ड ८७९
नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जिअत रावनु बल ताकें ॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥
इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है । हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है । विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये ॥३ ॥
असुभ होन लागे तब नाना । रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना ॥
बोलहिं खग जग आरति हेतू । प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू ॥
उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे । बहुत से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे । जगत्के दुःख ( अशुभ ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे । आकाशमें जहाँ-तहाँ केतु ( पुच्छल तारे ) प्रकट हो गये ॥ ४ ॥
दस दिसि दाह होन अति लागा । भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥
मंदोदरि उर कंपति भारी । प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी ॥
दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा ( आग लगने लगी ) । बिना ही पर्व ( योग ) के सूर्यग्रहण होने लगा । मन्दोदरीका हृदय बहुत काँपने लगा । मूर्तियाँ नेत्र- मार्गसे जल बहाने लगीं ॥५ ॥
छं० – प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही ।
बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही ॥
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिंजय जए ।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥
मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे । इस प्रकार इतने अधिक अमङ्गल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाशमें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे । देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण सन्धान करने लगे ।
दो० – खँचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस ।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥
कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस बाण छोड़े । वे श्रीरामचन्द्रजीके बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों ॥१०२ ॥
सायक एक नाभि सर सोषा । अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥
लै सिर बाहु चले नाराचा । सिर भुज हीन रुंड महि नाचा ॥
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* * ८८० रामचरितमानस एक बाणने नाभिके अमृतकुण्डको सोख लिया । दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओंमें लगे । बाण सिरों और भुजाओंको लेकर चले । सिरों और भुजाओंसे रहित रुण्ड ( धड़ ) पृथ्वीपर नाचने लगा ॥ १ ॥
धरनि धसई धर धाव प्रचंडा । तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा ॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी । कहाँ रामु रन हतौं पचारी ॥
धड़ प्रचण्ड वेगसे दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी । तब प्रभुने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये । मरते समय रावण बड़े घोर शब्दसे गरजकर बोला- राम कहाँ हैं? मैं ललकारकर उनको युद्धमें मारूँ! ॥२ ॥
डोली भूमि गिरत दसकंधर । छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर ॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई । चापि भालु मर्कट समुदाई ॥
रावणके गिरते ही पृथ्वी हिल गयी । समुद्र, नदियाँ, दिशाओंके हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे । रावण धड़के दोनों टुकड़ोंको फैलाकर भालू और वानरोंके समुदायको दबाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥३ ॥
मंदोदरि आगें भुज सीसा । धरि सर चले जहाँ जगदीसा ॥
प्रबिसे सब निषंग महुँ जाई । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई ॥
रावणकी भुजाओं और सिरोंको मन्दोदरीके सामने रखकर राम- बाण वहाँ चले, जहाँ जगदीश्वर श्रीरामजी थे । सब बाण जाकर तरकसमें प्रवेश कर गये । यह देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये ॥ ४ ॥
तासु तेज समान प्रभु आनन । हरषे देखि संभु चतुरानन ॥
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा । जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा ॥
रावणका तेज प्रभुके मुखमें समा गया । यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए । ब्रह्माण्डभरमें जय- जयकी ध्वनि भर गयी । प्रबल भुजदण्डोंवाले श्रीरघुवीरकी जय हो ॥५ ॥
बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा । जय कृपाल जय जयति मुकुंदा ॥
देवता और मुनियोंके समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं - कृपालुकी जय हो, मुकुन्दकी जय हो, जय हो!॥ ६ ॥
छं० – जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो ॥
खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो ॥
सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही ।
संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८८१ हे कृपाके कन्द! हे मोक्षदाता मुकुन्द! हे [ राग- द्वेष, हर्ष- शोक, जन्म- मृत्यु आदि ] द्वन्द्वोंके हरनेवाले! हे शरणागतको सुख देनेवाले प्रभो! हे दुष्ट-दलको विदीर्ण करनेवाले! हे कारणोंके भी परम कारण! हे सदा करुणा करनेवाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो । देवता हर्षमें भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं । रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके अङ्गोंने बहुत- से कामदेवोंकी शोभा प्राप्त की ॥ १ ॥
सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं ।
जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं ॥
भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने ।
जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने ॥
सिरपर जटाओंका मुकुट है, जिसके बीच- बीचमें अत्यन्त मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं । मानो नीले पर्वतपर बिजलीके समूहसहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं । श्रीरामजी अपने भुजदण्डोंसे बाण और धनुष फिरा रहे हैं । शरीरपर रुधिरके कण अत्यन्त सुन्दर लगते हैं । मानो तमालके वृक्षपर बहुत- सी ललमुनियाँ चिड़ियाँ अपने महान् सुखमें मग्न हुई निश्चल बैठी हों ॥ २ ॥
दो० - कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बूंद ।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ १०३ ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपादृष्टिकी वर्षा करके देवसमूहको निर्भय कर दिया । वानर- भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्दकी जय हो, ऐसा पुकारने लगे ॥ १०३ ॥
पति सिर देखत मंदोदरी । मुरुछित बिकल धरनि खसि परी ॥
जुबति बूंद रोवत उठि धाईं । तेहि उठाइ रावन पहिं आईं ॥
पतिके सिर देखते ही मन्दोदरी व्याकुल और मूच्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी । स्त्रियाँ रोती हुई उठ दौड़ीं और उस ( मन्दोदरी ) को उठाकर रावणके पास आयीं ॥१ ॥
पति गति देखि ते करहिं पुकारा । छूटे कच नहिं बपुष सँभारा ॥
उर ताड़ना करहिं बिधि नाना । रोवत करहिं प्रताप बखाना ॥
पतिकी दशा देखकर वे पुकार- पुकारकर रोने लगीं । उनके बाल खुल गये, देहकी सँभाल नहीं रही । वे अनेकों प्रकारसे छाती पीटती हैं और रोती हुई रावणके प्रतापका बखान करती हैं ॥ २ ॥
तव बल नाथ डोल नित धरनी । तेज हीन पावक ससि तरनी ॥
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा । सो तनु भूमि परेउ भरि छारा ॥
[ वे कहती हैं— ] हे नाथ! तुम्हारे बलसे पृथ्वी सदा काँपती रहती थी । अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे । शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूलमें भरा हुआ पृथ्वीपर पड़ा है! ॥३ ॥
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* *८८२ रामचरितमानस
बरुन कुबेर सुरेस समीरा । रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा ॥
भुजबल जितेहु काल जम साईं । आजु परेहु अनाथ की नाईं ॥
वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु, इनमेंसे किसीने भी रणमें तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया । हे स्वामी! तुमने अपने भुजबलसे काल और यमराजको भी जीत लिया था । वही तुम आज अनाथकी तरह पड़े हो ॥४ ॥
जगत बिदित तुम्हारि प्रभुताई । सुत परिजन बल बरनि न जाई ॥
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥
तुम्हारी प्रभुता जगत्भरमें प्रसिद्ध है । तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियोंके बलका हाय! वर्णन ही नहीं हो सकता । श्रीरामचन्द्रजीके विमुख होनेसे ही तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुलमें कोई रोनेवाला भी न रह गया ॥ ५ ॥
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा । सभय दिसिप नित नावहिं माथा ॥
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं । राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥
हे नाथ! विधाताकी सारी सृष्टि तुम्हारे वशमें थी । लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे । किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओंको गीदड़ खा रहे हैं । रामविमुखके लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है ( अर्थात् उचित ही है ) ॥६ ॥
काल बिबस पति कहा न माना । अग जग नाथु मनुज करि जाना ॥
हे पति! कालके पूर्ण वशमें होनेसे तुमने [ किसीका ] कहना नहीं माना और चराचरके नाथ परमात्माको मनुष्य करके जाना ॥७ ॥
छं० – जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं ।
जेहि नमत सिवब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥
आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं ।
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥
दैत्यरूपी वनको जलानेके लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरिको तुमने मनुष्य करके जाना । शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा । तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर तथा पापसमूहमय रहा! इतनेपर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजीने तुमको अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ ।
दो० – अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन ।
जोगि बूंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥ १०४ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८८३ अहह! नाथ! श्रीरघुनाथजीके समान कृपाका समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन भगवान्ने तुमको वह गति दी जो योगिसमाजको भी दुर्लभ है ॥ १०४ ॥
मंदोदरी बचन सुनि काना । सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना ॥
।अज महेस नारद सनकादी । जे मुनिबर परमारथबादी मन्दोदरीके वचन कानोंसे सुनकर देवता, मुनि और सिद्ध सभीने सुख माना । ब्रह्मा, महादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी ( परमात्माके तत्त्वको जानने और कहनेवाले ) श्रेष्ठ मुनि थे ॥१ ॥
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी । प्रेम मगन सब भए सुखारी ॥
रुदन करत देखीं सब नारी । गयउ बिभीषनु मन दुख भारी ॥
वे सभी श्रीरघुनाथजीको नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्न हो गये और अत्यन्त सुखी हुए । अपने घरकी सब स्त्रियोंको रोती हुई देखकर विभीषणजीके मनमें बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये ॥ २ ॥
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा । तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा ॥
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो । बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो ॥
उन्होंने भाईकी दशा देखकर दुःख किया । तब प्रभु श्रीरामजीने छोटे भाईको आज्ञा दी [ कि जाकर विभीषणको धैर्य बँधाओ ] | लक्ष्मणजीने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया तब विभीषण प्रभु पास लौट आये ॥ ३ ॥
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका । करहु क्रिया परिहरि सब सोका ॥
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी । बिधिवत देस काल जियँ जानी ॥
प्रभुने उनको कृपापूर्ण दृष्टिसे देखा [ और कहा- ] सब शोक त्यागकर रावणकी अन्त्येष्टि क्रिया करो । प्रभुकी आज्ञा मानकर और हृदयमें देश और कालका विचार करके विभीषणजीने विधिपूर्वक सब क्रिया की ॥ ४ ॥
दो० –- मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि ।
भवन गईं रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥ १०५ ॥
मन्दोदरी आदि सब स्त्रियाँ उसे ( रावणको ) तिलाञ्जलि देकर मनमें श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका वर्णन करती हुई महलको गयीं ॥१०५ ॥
आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो । कृपासिंधु तब अनुज बोलायो ॥
तुम्ह कपीस अंगद नल नीला । जामवंत मारुति नयसीला ॥
सब मिलि जाहु बिभीषन साथा । सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा ॥
पिता बचन मैं नगर न आवउँ । आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ ॥
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*:*८८४ रामचरितमानस सब क्रिया - कर्म करनेके बाद विभीषणने आकर पुनः सिर नवाया । तब कृपाके समुद्र श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको बुलाया । श्रीरघुनाथजीने कहा कि तुम, वानरराज सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्बवान् और मारुति सब नीतिनिपुण लोग मिलकर विभीषणके साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो । पिताजीके वचनोंके कारण मैं नगरमें नहीं आ सकता । पर अपने ही समान वानर और छोटे भाईको भेजता हूँ ॥ १-२ ॥
तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना । कीन्ही जाइ तिलक की रचना ॥
तिलक सारि अस्तुति अनुसारी ॥सादर सिंहासन बैठारी ।
प्रभुके वचन सुनकर वानर तुरंत चले और उन्होंने जाकर राजतिलककी सारी व्यवस्था की ।
आदरके साथ विभीषणको सिंहासनपर बैठाकर राजतिलक किया और स्तुति की ॥ ३ ॥
जोरि पानि सबहीं सिर नाए । सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए ॥
तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे । कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे ॥
सभीने हाथ जोड़कर उनको सिर नवाये । तदनन्तर विभीषणजीसहित सब प्रभुके पास आये ।
तब श्रीरघुवीरने वानरोंको बुला लिया और प्रिय वचन कहकर सबको सुखी किया ॥४ ॥
छं० – किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो ।
पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ।
मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं ।
संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं ॥
भगवान्ने अमृतके समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही बलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया । इसके कारण तुम्हारा यश तीनों लोकोंमें नित्य नया बना रहेगा । जो लोग मेरेसहित तुम्हारी शुभ कीर्तिको परम प्रेमके साथ गायेंगे वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसारसागरका पार पा जायँगे ।
दो० - प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज ।
बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज ॥ १०६ ॥
प्रभुके वचन कानोंसे सुनकर वानर-समूह तृप्त नहीं होते । वे सब बार- बार सिर नवाते हैं और चरणकमलोंको पकड़ते हैं ॥१०६ ॥
पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना । लंका जाहु कहेउ भगवाना ॥
समाचार जानकिहि सुनावहु । तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु ॥
फिर प्रभुने हनुमान्जीको बुला लिया । भगवान्ने कहा– तुम लङ्का जाओ । जानकीको सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल-समाचार लेकर तुम चले आओ ॥ १ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८८५
तब हनुमंत नगर महुँ आए । सुनि निसिचरी निसार धाए ॥
बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही । जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही ॥
तब हनुमान्जी नगरमें आये । यह सुनकर राक्षस-राक्षसी [ उनके सत्कारके लिये ] दौड़े । उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमान्जीकी पूजा की और फिर श्रीजानकीजीको दिखला दिया ॥२ ॥
दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा । रघुपति दूत जानकी चीन्हा ॥
कहहु तात प्रभु कृपानिकेता । कुसल अनुज कपि सेन समेता ॥
हनुमान्जीने [ सीताजीको ] दूरसे ही प्रणाम किया । जानकीजीने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजीका दूत है [ और पूछा- ] हे तात! कहो, कृपाके धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरोंकी सेनासहित कुशलसे तो हैं? ॥३ ॥
सब बिधि कुसल कोसलाधीसा । मातु समर जीत्यो दससीसा ॥
अविचल राजु बिभीषन पायो । सुनि कपि बचन हरष उर छायो ॥
[ हनुमान्जीने कहा- ] हे माता! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकारसे सकुशल हैं । उन्होंने
संग्राममें दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अचल राज्य प्राप्त किया है ।
हनुमान्जीके वचन सुनकर सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया ॥४ ॥
छं० – अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा ।
का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा ॥
सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं ।
रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं ॥
श्रीजानकीजीके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हुआ । उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ आनन्दाश्रुओंका ] जल छा गया । वे बार- बार कहती हैं - हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी ( समाचार ) के समान तीनों लोकोंमें और कुछ भी नहीं है! [ हनुमान्जीने कहा- ] हे माता! सुनिये, मैंने आज निःसन्देह सारे जगत्का राज्य पा लिया, जो मैं रणमें शत्रुसेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामजीको देख रहा हूँ ।
दो० –- सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत ।
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत ॥ १०७ ॥
[ जानकीजीने कहा— ] हे पुत्र! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदयमें बसें और हे हनुमान्! शेष ( लक्ष्मणजी ) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें ॥ १०७ ॥
अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता । देखौं नयन स्याम मृदु गाता ॥
तब हनुमान राम पहिं जाई । जनकसुता कै कुसल सुनाई ॥
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* *८८६ रामचरितमानस हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीरके दर्शन करूँ । तब श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर हनुमान्जीने जानकीजीका कुशल-समाचार सुनाया ॥ १ ॥
सुनि संदेसु भानुकुलभूषन । बोलि लिए जुबराज बिभीषन ॥
मारुतसुत के संग सिधावहु । सादर जनकसुतहि लै आवहु ॥
सूर्यकुलभूषण श्रीरामजीने सन्देश सुनकर युवराज अंगद और विभीषणको बुला लिया [ और कहा- ] पवनपुत्र हनुमान्के साथ जाओ और जानकीको आदरके साथ ले आओ ॥ २ ॥
तुरतहिं सकल गए जहँ सीता । सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता ॥
बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो । तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो ॥
वे सब तुरंत ही वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं । सब-की--सब राक्षसियाँ नम्रतापूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं । विभीषणजीने शीघ्र ही उन लोगोंको समझा दिया । उन्होंने बहुत प्रकारसे सीताजीको स्नान कराया, ॥ ३ ॥
बहु प्रकार भूषन पहिराए । सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए ॥
ता पर हरषि चढ़ी बैदेही । सुमिरि राम सुखधाम सनेही ॥
बहुत प्रकारके गहने पहनाये और फिर वे एक सुन्दर पालकी सजाकर ले आये । सीताजी प्रसन्न होकर सुखके धाम प्रियतम श्रीरामजीका स्मरण करके उसपर हर्षके साथ चढ़ीं ॥४ ॥
बेतपानि रच्छक चहु पासा । चले सकल मन परम हुलासा ॥
देखन भालु कीस सब आए । रच्छक कोपि निवारन धाए ॥
चारों ओर हाथोंमें छड़ी लिये रक्षक चले । सबके मनोंमें परम उल्लास ( उमंग ) है ।
रीछ -वानर सब दर्शन करनेके लिये आये, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े ॥ ५ ॥
कह रघुबीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादें आनहु ॥
देखहुँ कपि जननी की नाईं । बिहसि कहा रघुनाथ गोसाईं ॥
श्रीरघुवीरने कहा— हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीताको पैदल ले आओ, जिससे वानर
उसको माताकी तरह देखें । गोसाईं श्रीरामजीने हँसकर ऐसा कहा ॥६ ॥
सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे । नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरवे ॥
सीता प्रथम अनल महुँ राखी । प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी ॥
प्रभुके वचन सुनकर रीछ- वानर हर्षित हो गये । आकाशसे देवताओंने बहुत- से फूल बरसाये । सीताजी [ के असली स्वरूप ] को पहले अग्निमें रखा था । अब भीतरके साक्षी भगवान् उनको प्रकट करना चाहते हैं ॥७ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ८८७
दो० – तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद ।
सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद ॥ १०८ ॥
इसी कारण करुणाके भण्डार श्रीरामजीने लीलासे कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं ॥१०८ ॥
प्रभु के बचन सीस धरि सीता । बोली मन क्रम बचन पुनीता ॥
लछिमन होहु धरम के नेगी । पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी ॥
प्रभुके वचनोंको सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्मसे पवित्र श्रीसीताजी बोलीं- हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्मके नेगी ( धर्माचरणमें सहायक ) बनो और तुरंत आग तैयार करो ॥१ ॥
सुनि लछिमन सीता कै बानी । बिरह बिबेक धरम निति सानी ॥
लोचन सजल जोरि कर दोऊ । प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ ॥
श्रीसीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजीके नेत्रोंमें [ विषादके आँसुओंका ] जल भर आया । वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे । वे भी प्रभुसे कुछ कह नहीं सकते ॥२ ॥
देखि राम रुख लछिमन धाए । पावक प्रगटि काठ बहु लाए ॥
पावक प्रबल देखि बैदेही ॥ हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही ॥
फिर श्रीरामजीका रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत-सी लकड़ी ले आये । अग्निको खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजीके हृदयमें हर्ष हुआ । उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ ॥३ ॥
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं । तजि रघुबीर आन गति नाहीं ॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना । मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना ॥
[ सीताजीने लीलासे कहा- ] यदि मन, वचन और कर्मसे मेरे हृदयमें श्रीरघुवीरको छोड़कर दूसरी गति ( अन्य किसीका आश्रय ) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मनकी गति जानते हैं, [ मेरे भी मनकी गति जानकर] मेरे लिये चन्दनके समान शीतल हो जायँ ॥४ ॥
छं०– श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली ।
जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली ॥
प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे ।
प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे ॥
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* *८८८ रामचरितमानस प्रभु श्रीरामजीका स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजीके द्वारा वन्दित हैं तथा जिनमें सीताजीकी अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपतिकी जय बोलकर जानकीजीने चन्दनके समान शीतल हुई अग्निमें प्रवेश किया । प्रतिबिम्ब ( सीताजीकी छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्निमें जल गये । प्रभुके इन चरित्रोंको किसीने नहीं जाना । देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाशमें खड़े देखते हैं ॥१ ॥
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो ।
जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो ॥
सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली ।
नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली ॥
तब अग्निने शरीर धारण करके वेदोंमें और जगत्में प्रसिद्ध वास्तविक श्री ( सीताजी ) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजीको वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागरने विष्णुभगवान्को लक्ष्मी समर्पित की थी । वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके वाम भागमें विराजित हुईं । उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है । मानो नये खिले हुए नीले कमलके पास सोनेके कमलकी कली सुशोभित हो ॥२ ॥
दो० - बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान ।
गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान ॥ १० ९ ( क ) ॥
देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे । आकाशमें डंके बजने लगे । किन्नर गाने लगे । विमानोंपर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ १० ९ ( क ) ॥
जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार ।
देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार ॥ १० ९ ( ख ) ॥
श्रीजानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ- वानर हर्षित हो गये और सुखके सार श्रीरघुनाथजीकी जय बोलने लगे ॥ १० ९ ( ख) ॥
तब रघुपति अनुसासन पाई । मातलि चलेउ चरन सिरु नाई ॥
आए देव सदा स्वारथी । बचन कहहिं जनु परमारथी ॥
तब श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रका सारथि मातलि चरणोंमें सिर नवाकर [ रथ लेकर ] चला गया । तदनन्तर सदाके स्वार्थी देवता आये । वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों ॥ १ ॥
दीन बंधु दयाल रघुराया । देव कीन्हि देवन्ह पर दाया ॥
बिस्व द्रोह रत यह खल कामी । निज अघ गयउ कुमारगगामी ॥
हे दीनबन्धु! हे दयालु रघुराज! हे परमदेव! आपने देवताओंपर बड़ी दया की । विश्वके द्रोहमें तत्पर यह दुष्ट, कामी और कुमार्गपर चलनेवाला रावण अपने ही पापसे नष्ट हो गया ॥ २ ॥