श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 891–900

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900

पृष्ठ 891

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* * लङ्काकाण्ड ८८९

तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी । सदा एकरस सहज उदासी ॥

अकल अगुन अज अनघ अनामय । अजित अमोघसक्ति करुनामय ॥

आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभावसे ही उदासीन ( शत्रु - मित्र - भावरहित ), अखण्ड, निर्गुण ( मायिक गुणोंसे रहित ), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति ( जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं ॥३ ॥

मीन कमठ सूकर नरहरी ॥ बामन परसुराम बपु धरी ॥

जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो । नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो ॥

आपने ही मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन और परशुरामके शरीर धारण किये । हे नाथ! जब-जब देवताओंने दुःख पाया, तब- तब अनेकों शरीर धारण करके आपने ही उनका दुःख नाश किया ॥४ ॥

यह खल मलिन सदा सुरद्रोही । काम लोभ मद रत अति कोही ॥

अधम सिरोमनि तव पद पावा । यह हमरें मन बिसमय आवा ॥

यह दुष्ट मलिनहृदय, देवताओंका नित्य शत्रु, काम, लोभ और मदके परायण तथा अत्यन्त क्रोधी था । ऐसे अधमोंके शिरोमणिने भी आपका परमपद पा लिया । इस बातका हमारे मनमें आश्चर्य हुआ ॥ ५ ॥

हम देवता परम अधिकारी । स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी ॥

भव प्रबाहँ संतत हम परे । अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥

हम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्तिको भुलाकर निरन्तर भवसागरके प्रवाह ( जन्म- मृत्युके चक्र) में पड़े हैं । अब हे प्रभो! हम आपकी शरणमें आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये ॥ ६ ॥

दो० – करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि ।

अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि ॥ ११० ॥

विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ- के - तहाँ हाथ जोड़े खड़े रहे । तब अत्यन्त प्रेमसे पुलकितशरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे— ॥ ११० ॥

छं०– जय राम सदा सुखधाम हरे । रघुनायक सायक चाप धरे ॥

भव बारन दारन सिंह प्रभो । गुन सागर नागर नाथ बिभो ॥

हे नित्य सुखधाम और [ दुःखोंको हरनेवाले ] हरि! हे धनुष- बाण धारण किये हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो । हे प्रभो! आप भव ( जन्म - मरण ) रूपी हाथीको विदीर्ण करनेके लिये सिंहके समान हैं । हे नाथ! हे सर्वव्यापक! आप गुणोंके समुद्र और परम चतुर हैं ॥१ ॥

तन काम अनेक अनूप छबी । गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी ॥

जसु पावन रावन नाग महा । खगनाथ जथा करि कोप गहा ॥

पृष्ठ 892

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८९० * रामचरितमानस * आपके शरीरकी अनेकों कामदेवोंके समान, परन्तु अनुपम छवि है । सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं । आपका यश पवित्र है । आपने रावणरूपी महासर्पको गरुड़की तरह क्रोध करके पकड़ लिया ॥२ ॥

जन रंजन भंजन सोक भयं । गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं ॥

अवतार उदार अपार गुनं । महि भार बिभंजन ग्यानघनं ॥ ३ ॥

हे प्रभो! आप सेवकोंको आनन्द देनेवाले, शोक और भयका नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं । आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वीका भार उतारनेवाला और ज्ञानका समूह है ॥ ३ ॥

अज ब्यापकमेकमनादिसदा । करुनाकर राम नमामि मुदा ॥

रघुबंस बिभूषन दूषन हा । कृत भूप बिभीषन दीन रहा ॥ ४ ॥

[ किन्तु अवतार लेनेपर भी ] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक ( अद्वितीय ) और अनादि हैं । हे करुणाकी खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्षके साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुलके आभूषण! हे दूषण राक्षसको मारनेवाले तथा समस्त दोषोंको हरनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने [ लंकाका ] राजा बना दिया ॥ ४ ॥

गुन ग्यान निधान अमान अजं । नित राम नमामि बिभुं बिरजं ॥

भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं । खल बूंद निकंद महा कुसलं ॥ ५ ॥

हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारोंसे रहित हे गुण और ज्ञान भण्डार! हे मानरहित! श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ । आपके भुजदण्डोंका प्रताप और बल प्रचण्ड है । दुष्टसमूहके नाश करनेमें आप परम निपुण हैं ॥ ५ ॥

बिनु कारन दीन दयाल हितं । छबि धाम नमामि रमा सहितं ॥

भव तारन कारन काज परं । मन संभव दारुन दोष हरं ॥ ६ ॥

हे बिना ही कारण दीनोंपर दया तथा उनका हित करनेवाले और शोभाके धाम! मैं श्रीजानकीजीसहित आपको नमस्कार करता हूँ । आप भवसागरसे तारनेवाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनोंसे परे हैं और मनसे उत्पन्न होनेवाले कठिन दोषोंको हरनेवाले हैं ॥६ ॥

सर चाप मनोहर त्रोन धरं । जलजारुन लोचन भूपबरं ॥

सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं । मद मार मुधा ममता समनं ॥ ७ ॥

आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले हैं । [ लाल ] कमलके समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं । आप राजाओंमें श्रेष्ठ, सुखके मन्दिर, सुन्दर, श्री ( लक्ष्मीजी ) के वल्लभ तथा मद ( अहङ्कार ), काम और झूठी ममताके नाश करनेवाले हैं ॥७ ॥

पृष्ठ 893

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* * लङ्काकाण्ड ८ ९ १

अनवद्य अखंड न गोचर गो । सब रूप सदा सब होइ न गो ॥

इति बेद बदंति न दंतकथा । रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥ ८ ॥

आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं । सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं । यह [कोई ] दन्तकथा ( कोरी कल्पना ) नहीं है । जैसे सूर्य और सूर्यका प्रकाश अलग- अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसारसे भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं ॥८ ॥

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए । निरखंति तवानन सादर ए ॥

धिग जीवन देव सरीर हरे । तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥ ९ ॥

हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं । [ और ] हे हरे! हमारे [ अमर ] जीवन और देव ( दिव्य ) शरीरको धिक्कार है, जो हम आपकी भक्तिसे रहित हुए संसारमें ( सांसारिक विषयोंमें ) भूले पड़े हैं ॥ ९ ॥

अब दीनदयाल दया करिऐ । मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ ।

जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ । दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ ॥ १० ॥

हे दीनदयालु! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेद उत्पन्न करनेवाली बुद्धिको हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्दसे विचरता हूँ॥१० ॥

खल खंडन मंडन रम्य छमा । पद पंकज सेवित संभु उमा ॥

नृप नायक दे बरदानमिदं । चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं ॥ ११ ॥

आप दुष्टोंका खण्डन करनेवाले और पृथ्वीके रमणीय आभूषण हैं । आपके चरणकमल श्रीशिव- पार्वतीद्वारा सेवित हैं । हे राजाओंके महाराज! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें सदा मेरा कल्याणदायक [अनन्य ] प्रेम हो ॥ ११ ॥

दो० - बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात ।

सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात ॥ १११ ॥

इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यन्त प्रेम- पुलकित शरीरसे विनती की । शोभाके समुद्र श्रीरामजीके दर्शन करते - करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे ॥१११ ॥

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए । तनय बिलोकि नयन जल छाए ॥

अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा । आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा ॥

उसी समय दशरथजी वहाँ आये । पुत्र ( श्रीरामजी ) को देखकर उनके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल छा गया । छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभुने उनकी वन्दना की और तब पिताने उनको आशीर्वाद दिया ॥ १ ॥

पृष्ठ 894

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* *८ ९ २ रामचरितमानस

तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ । जीत्यों अजय निसाचर राऊ ॥

सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी । नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी ॥

[ श्रीरामजीने कहा— ] हे तात! यह सब आपके पुण्योंका प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराजको जीत लिया । पुत्रके वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी I। नेत्रोंमें जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी ॥२ ॥

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना । चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना ॥

ताते उमा मोच्छ नहिं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥

श्रीरघुनाथजीने पहलेके ( जीवित कालके ) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया । हे उमा! दशरथजीने भेद - भक्तिमें अपना मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [ कैवल्य ] मोक्ष नहीं पाया ॥३ ॥

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं । तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं ॥

बार बार करि प्रभुहि प्रनामा । दसरथ हरषि गए सुरधामा ॥

[ मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त ] सगुणस्वरूपकी उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकारका मोक्ष लेते भी नहीं । उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं । प्रभुको [ इष्टबुद्धिसे ] बार- बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोकको चले गये ॥४ ॥

दो० – अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस ।

सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस ॥ ११२ ॥

छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीशकी शोभा देखकर देवराज– इन्द्र मनमें हर्षित होकर स्तुति करने लगे- ॥ ११२ ॥छं० जय राम सोभा धाम । दायक प्रनत बिश्राम ॥

धृत त्रोन बर सर चाप । भुजदंड प्रबल प्रताप ॥१ ॥

शोभाके धाम, शरणागतको विश्राम देनेवाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और बाण धारण किये हुए, प्रबल प्रतापीजयभुजदण्डोंवालेदूषनारिश्रीरामचन्द्रजीकीखरारिजय। मर्दनहो! ॥१ ॥ निसाचर धारि ॥

यह दुष्ट मारेउ नाथ । भए देव सकल सनाथ ॥२ ॥

हे खर और दूषणके शत्रु और राक्षसोंकी सेनाके मर्दन करनेवाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपनेजय इसहरनदुष्टको धरनीमारा, जिससेभारसब। देवतामहिमासनाथ ( सुरक्षितउदार) हो गयेअपार॥२ ॥ ॥

जय रावनारि कृपाल ॥ किए जातुधान बिहाल ॥ ३ ॥

पृष्ठ 895

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* * लङ्काकाण्ड ८ ९ ३ हे भूमिका भार हरनेवाले! हे अपार श्रेष्ठ महिमावाले! आपकी जय हो । हे रावणके

शत्रु! हे कृपालु! आपकी जय हो । आपने राक्षसोंको बेहाल ( तहस नहस) कर दिया ॥ ३ ॥

लंकेस अति बल गर्ब । किए बस्य सुर गंधर्व ॥

मुनि सिद्ध नर खग नाग । हठि पंथ सब कें लाग ॥४ ॥

लंकापति रावणको अपने बलका बहुत घमंड था । उसने देवता और गन्धर्व सभीको अपने वशमें कर लिया था और वह मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग आदि सभीके हठपूर्वक ( हाथ धोकर ) पीछे पड़ गया था ॥ ४ ॥

परद्रोह रत अति दुष्ट । पायो सो फलु पापिष्ट ॥

अब सुनहु दीन दयाल । राजीव नयन बिसाल ॥ ५ ॥

वह दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर और अत्यन्त दुष्ट था । उस पापीने वैसा ही फल पाया । अब हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले! सुनिये ॥ ५ ॥

मोहि रहा अति अभिमान । नहिं कोउ मोहि समान ॥

अब देखि प्रभु पद कंज । गत मान प्रद दुख पुंज ॥ ६ ॥

मुझे अत्यन्त अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है, पर अब प्रभु ( आप ) के चरणकमलोंके दर्शन करनेसे दुःख-समूहका देनेवाला मेरा वह अभिमान जाता रहा ॥ ६ ॥

को ब्रह्म निर्गुन ध्याव । अब्यक्त जेहि श्रुति गाव ॥

मोहि भाव कोसल भूप । श्रीराम सगुन सरूप ॥७ ॥

कोई उन निर्गुन ब्रह्मका ध्यान करते हैं जिन्हें वेद अव्यक्त ( निराकार) कहते हैं । परन्तु हे रामजी! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है ॥७ ॥

बैदेहि अनुज समेत । मम हृदयँ करहु निकेत ॥

मोहि जानिऐ निज दास । दे भक्ति रमानिवास ॥ ८ ॥

श्रीजानकीजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मेरे हृदयमें अपना घर बनाइये । हे रमानिवास! मुझे अपना दास समझिये और अपनी भक्ति दीजिये ॥८ ॥

छं० –दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं ।

सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं ॥

सुर बूंद रंजन द्वंद भंजन मनुजतनु अतुलितबलं ।

ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं ॥

पृष्ठ 896

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* *८ ९४ रामचरितमानस हे रमानिवास! हे शरणागतके भयको हरनेवाले और उसे सब प्रकारका सुख देनेवाले! मुझे अपनी भक्ति दीजिये । हे सुखके धाम! हे अनेकों कामदेवोंकी छबिवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । हे देवसमूहको आनन्द देनेवाले, [ जन्म- मृत्यु, हर्ष-विषाद, सुख- दुःख आदि ] द्वन्द्वोंके नाश करनेवाले, मनुष्यशरीरधारी, अतुलनीय बलवाले, ब्रह्मा और शिव आदिसे सेवनीय, करुणासे कोमल श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।

दो० - अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल ।

काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल ॥ ११३ ॥

हे कृपालु! अब मेरी ओर कृपा करके (कृपादृष्टिसे ) देखकर आज्ञा दीजिये कि मैं क्या [ सेवा ] करूँ! इन्द्रके ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीरामजी बोले- ॥ ११३ ॥

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे । परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे ॥

मम हित लागि तजे इन्ह प्राना । सकल जिआउ सुरेस सुजाना ॥

हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरोंने मार डाला है, पृथ्वीपर पड़े हैं । इन्होंने

मेरे हितके लिये अपने प्राण त्याग दिये । हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो ॥१ ॥

सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी ॥ अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी ॥

प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई । केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई । [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं - ] हे गरुड़! सुनिये, प्रभुके ये वचन अत्यन्त गहन ( गूढ़ ) हैं । ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं । प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकीको मारकर जिला सकते हैं । यहाँ तो उन्होंने केवल इन्द्रको बड़ाई दी है ॥ २ ॥

सुधा बरषि कपि भालु जिआए । हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए ॥

सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर । जिए भालु कपि नहिं रजनीचर ॥

इन्द्रने अमृत बरसाकर वानर- भालुओंको जिला दिया । सब हर्षित होकर उठे और प्रभुके पास आये । अमृतकी वर्षा दोनों ही दलोंपर हुई । पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं ॥ ३ ॥

रामाकार भए तिन्ह के मन । मुक्त भए छूटे भव बंधन ॥

सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा । जिए सकल रघुपति कीं ईछा ॥

क्योंकि राक्षसोंके मन तो मरते समय रामाकार हो गये थे । अतः वे मुक्त हो गये, उनके भव-बन्धन छूट गये । किन्तु वानर और भालू तो सब देवांश ( भगवान्की लीलाके परिकर ) थे । इसलिये वे सब श्रीरघुनाथजीकी इच्छासे जीवित हो गये ॥४ ॥

राम सरिस को दीन हितकारी । कीन्हे मुकुत निसाचर झारी ॥

खल मल धाम कामरत रावन । गति पाई जो मुनिबर पाव न ॥

पृष्ठ 897

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* * लङ्काकाण्ड ८ ९ ५ श्रीरामचन्द्रजीके समान दीनोंका हित करनेवाला कौन है? जिन्होंने सारे राक्षसोंको मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापोंके घर और कामी रावणने भी वह गति पायी जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते ॥ ५ ॥

दो० - सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान ।

देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान ॥ ११४ ( क ) ॥

फूलोंकी वर्षा करके सब देवता सुन्दर विमानोंपर चढ़-चढ़कर चले । तब सुअवसर जानकर सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास आये— ॥ ११४ ( क ) ॥

परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि ।

पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि॥ ११४ ( ख ) ॥

और परम प्रेमसे दोनों हाथ जोड़कर, कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित शरीर और गद्गद वाणीसे त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे- ॥ ११४ ( ख ) ॥

छं० —मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ॥

मोह महा घन पटल प्रभंजन । संसय बिपिन अनल सुर रंजन ॥

हे रघुकुलके स्वामी! सुन्दर हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये । आप महामोहरूपी मेघसमूहके [ उड़ानेके ] लिये प्रचण्ड पवन हैं, संशयरूपी वनके [ भस्म करनेके ] लिये अग्नि हैं और देवताओंको आनन्द देनेवाले हैं ॥१ ॥

अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ॥

काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ॥

आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुन्दर हैं । भ्रमरूपी अन्धकारके [ नाशके ] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं । काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंके [ वधके ] लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें निरन्तर निवास कीजिये ॥ २ ॥

बिषय मनोरथ पुंज कंज बन । प्रबल तुषार उदार पार मन ॥

भव बारिधि मंदर परमं दर । बारय तारय संसृति दुस्तर ॥

विषयकामनाओंके समूहरूपी कमलवनके [ नाशके ] लिये आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मनसे परे हैं । भवसागर [को मथने ] के लिये आप मन्दराचल पर्वत हैं | आप हमारे परम भयको दूर कीजिये और हमें दुस्तर संसारसागरसे पार कीजिये ॥३ ॥

स्याम गात राजीव बिलोचन । दीन बंधु प्रनतारति मोचन ॥

अनुज जानकी सहित निरंतर । बसहु राम नृप मम उर अंतर ॥

मुनि रंजन महि मंडल मंडन । तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन ॥

पृष्ठ 898

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* *८ ९६ रामचरितमानस हे श्यामसुन्दर - शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबन्धु! हे शरणागतको दुःखसे छुड़ानेवाले! हे राजा रामचन्द्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजीसहित निरन्तर मेरे हृदयके अंदर निवास कीजिये । आप मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीमण्डलके भूषण, तुलसीदासके प्रभु और भयका नाश करनेवाले हैं ॥ ४-५ ॥

दो० – नाथ जबहिं कोसलपुरी होइहि तिलक तुम्हार ।

कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार ॥ ११५ ॥

हे नाथ! जब अयोध्यापुरीमें आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा ॥ ११५ ॥

करि बिनती जब संभु सिधाए । तब प्रभु निकट बिभीषनु आए ।

नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी । बिनय सुनहु प्रभु सारंगपानी ॥

जब शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभुके पास आये और चरणोंमें सिर नवाकर कोमल वाणीसे बोले- हे शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले प्रभो! मेरी विनती सुनिये - ॥ १ ॥

सकुल सदल प्रभु रावन मारयो । पावन जस त्रिभुवन बिस्तारयो ॥

दीन मलीन हीन मति जाती । मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती ॥

आपने कुल और सेनासहित रावणका वध किया, त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीनपर बहुत प्रकारसे कृपा की ॥२ ॥

अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे । मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे ॥

देखि कोस मंदिर संपदा । देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा ॥

अब हे प्रभु! इस दासके घरको पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर स्नान कीजिये, जिससे युद्धकी थकावट दूर हो जाय । हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्तिका निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरोंको दीजिये ॥ ३ ॥

सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ । पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ ॥

सुनत बचन मृदु दीनदयाला । सजल भए द्वौ नयन बिसाला ॥

हे नाथ! मुझे सब प्रकारसे अपना लीजिये और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरीको पधारिये । विभीषणजीके कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभुके दोनों विशाल नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया ॥ ४ ॥

दो० – तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात ।

भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात ॥ ११६ ( क ) ॥

पृष्ठ 899

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* * लङ्काकाण्ड ८ ९७ [ श्रीरामजीने कहा— ] हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह बात सच है । पर भरतकी दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्पके समान बीत रहा है ॥ ११६ ( क ) ॥

तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि ।

देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि ॥ ११६ ( ख ) ॥

तपस्वीके वेषमें कृश ( दुबले ) शरीरसे निरन्तर मेरा नाम जप कर रहे हैं । हे सखा! वही उपाय करो जिससे मैं जल्दी-से-जल्दी उन्हें देख सकूँ । मैं तुमसे निहोरा ( अनुरोध ) करता हूँ॥ ११६ ( ख ) ॥

बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर ।

सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर ॥ ११६ ( ग ) ॥

यदि अवधि बीत जानेपर जाता हूँ तो भाईको जीता न पाऊँगा । छोटे भाई भरतजीकी प्रीतिका स्मरण करके प्रभुका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है । ११६ ( ग ) ॥

करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं ।

पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं ॥ ११६ ( घ ) ॥

[ श्रीरामजीने फिर कहा- ] हे विभीषण! तुम कल्पभर राज्य करना, मनमें मेरा निरन्तर स्मरण करते रहना । फिर तुम मेरे उस धामको पा जाओगे जहाँ सब संत जाते हैं ॥ ११६ ( घ ) ॥

सुनत बिभीषन बचन राम के । हरषि गहे पद कृपाधाम के ॥

बानर भालु सकल हरषाने । गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने ॥

श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनते ही विभीषणजीने हर्षित होकर कृपाके धाम श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये । सभी वानर-भालू हर्षित हो गये और प्रभुके चरण पकड़कर उनके निर्मल गुणोंका बखान करने लगे ॥ १ ॥

बहुरि बिभीषन भवन सिधायो । मनि गन बसन बिमान भरायो ॥

लै पुष्पक प्रभु आगें राखा । हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा ॥

फिर विभीषणजी महलको गये और उन्होंने मणियोंके समूहों ( रत्नों) से और वस्त्रोंसे विमानको भर लिया । फिर उस पुष्पकविमानको लाकर प्रभुके सामने रखा । तब कृपासागर श्रीरामजीने हँसकर कहा—॥२ ॥

चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन । गगन जाइ बरषहु पट भूषन ॥

नभ पर जाइ बिभीषन तबही । बरषि दिए मनि अंबर सबही ॥

हे सखा विभीषण! सुनो, विमानपर चढ़कर, आकाशमें जाकर वस्त्रों और गहनोंको बरसा दो । तब ( आज्ञा सुनते ) ही विभीषणजीने आकाशमें जाकर सब मणियों और वस्त्रोंको बरसा दिया ॥३ ॥

पृष्ठ 900

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८९८ * रामचरितमानस *

जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं । मनि मुख मेल डारि कपि देहीं ॥

हँसे रामु श्री अनुज समेता । परम कौतुकी कृपा निकेता ॥

जिसके मनको जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है । मणियोंको मुँहमें लेकर वानर फिर उन्हें खानेकी चीज न समझकर उगल देते हैं । यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपाके धाम श्रीरामजी सीताजी और लक्ष्मणजीसहित हँसने लगे ॥४ ॥

दो० – मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद ।

कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद ॥। ११७ ( क ) ॥

जिनको मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद नेति नेति कहते हैं, वे ही कृपाके समुद्र श्रीरामजी वानरोंके साथ अनेकों प्रकारके विनोद कर रहे हैं । ११७ ( क ) ॥

उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम ।

राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम ॥ ११७ ( ख ) ॥

[शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! अनेकों प्रकारके योग, जप, दान, तप, यज्ञ, व्रत और नियम करनेपर भी श्रीरामचन्द्रजी वैसी कृपा नहीं करते जैसी अनन्य प्रेम होनेपर करते हैं ॥ ११७ ( ख ) ॥

भालु कपिन्ह पट भूषन पाए । पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए ॥

नाना जिनस देखि सब कीसा । पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा ॥

भालुओं और वानरोंने कपड़े- गहने पाये और उन्हें पहन-पहनकर वे श्रीरघुनाथजीके पास आये । अनेकों जातियोंके वानरोंको देखकर कोसलपति श्रीरामजी बार- बार हँस रहे हैं ॥ १ ॥

चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया । बोले मृदुल बचन रघुराया ॥

तुम्हरें बल मैं रावनु मारयो । तिलक बिभीषन कहँ पुनि सारयो ॥

श्रीरघुनाथजीने कृपादृष्टिसे देखकर सबपर दया की । फिर वे कोमल वचन बोले — हे भाइयो! तुम्हारे ही बलसे मैंने रावणको मारा और फिर विभीषणका राजतिलक किया ॥२ ॥

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू । सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू ॥

सुनत बचन प्रेमाकुल बानर । जोरि पानि बोले सब सादर ॥

अब तुम सब अपने - अपने घर जाओ । मेरा स्मरण करते रहना और किसीसे डरना नहीं । ये वचन सुनते ही सब वानर प्रेममें विह्वल होकर हाथ जोड़कर आदरपूर्वक बोले– ॥३ ॥

प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा । हमरें होत बचन सुनि मोहा ॥

दीन जानि कपि किए सनाथा । तुम्ह त्रैलोक ईस रघुनाथा ॥