श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 901–910
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910
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* * लङ्काकाण्ड ८ ९९ प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है । पर आपके वचन सुनकर हमको मोह होता है । हे रघुनाथजी! आप तीनों लोकोंके ईश्वर हैं । हम वानरोंको दीन जानकर ही आपने सनाथ ( कृतार्थ ) किया है ॥४ ॥
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं । मसक कहूँ खगपति हित करहीं ॥
देखि राम रुख बानर रीछा । प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा ॥
प्रभुके ( ऐसे ) वचन सुनकर हम लाजके मारे मरे जा रहे हैं । कहीं मच्छर भी गरुड़का हित कर सकते हैं? श्रीरामजीका रुख देखकर रीछ-वानर प्रेममें मग्न हो गये । उनकी घर जानेकी इच्छा नहीं है ॥५ ॥
दो० - प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि ।
हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि ॥ ११८ ( क ) ॥
परन्तु प्रभुकी प्रेरणा ( आज्ञा ) से सब वानर- भालू श्रीरामजीके रूपको हृदयमें रखकर और अनेकों प्रकारसे विनती करके हर्ष और विषादसहित घरको चले ॥ ११८ ( क ) ॥
कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान ।
सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान ॥ ११८ ( ख ) ॥
वानरराज सुग्रीव, नील, ऋक्षराज जाम्बवान्, अंगद, नल और हनुमान् तथा विभीषणसहित और जो बलवान् वानर सेनापति हैं, ॥ ११८ ( ख) ॥
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि ।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि ॥ ११८ ( ग ) ॥
वे कुछ कह नहीं सकते; प्रेमवश नेत्रोंमें जल भर- भरकर, नेत्रोंका पलक मारना छोड़कर ( टकटकी लगाये ) सम्मुख होकर श्रीरामजीकी ओर देख रहे हैं ॥ ११८ ( ग ) ॥
अतिसय प्रीति देखि रघुराई । लीन्हे सकल बिमान चढ़ाई ॥
मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो । उत्तर दिसिहि बिमान चलायो ॥
श्रीरघुनाथजीने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमानपर चढ़ा लिया । तदनन्तर मन-ही-मन विप्रचरणोंमें सिर नवाकर उत्तर दिशाकी ओर विमान चलाया ॥१ ॥
चलत बिमान कोलाहल होई । जय रघुबीर कहइ सबु कोई ॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर । श्री समेत प्रभु बैठे ता पर ॥
विमानके चलते समय बड़ा शोर हो रहा है । सब कोई श्रीरघुवीरकी जय कह रहे हैं । विमानमें एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है । उसपर सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हो गये ॥ २ ॥
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* *९०० रामचरितमानस
राजत रामु सहित भामिनी । मेरु संग जनु घन दामिनी ॥
रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर । कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर ॥
पत्नीसहित श्रीरामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सुमेरुके शिखरपर बिजलीसहित श्याम मेघ हो । सुन्दर विमान बड़ी शीघ्रतासे चला । देवता हर्षित हुए और उन्होंने फूलोंकी वर्षा की ॥ ३ ॥
परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी । सागर सर सरि निर्मल बारी ॥
सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा । मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा ॥
अत्यन्त सुख देनेवाली तीन प्रकारकी ( शीतल, मन्द, सुगन्धित) वायु चलने लगी । समुद्र, तालाब और नदियोंका जल निर्मल हो गया । चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगे । सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं ॥४ ॥
कह रघुबीर देखु रन सीता । लछिमन इहाँ हत्यो इंद्रजीता ॥
हनूमान अंगद के मारे । रन महि परे निसाचर भारे ॥
श्रीरघुवीरने कहा -हे सीते! रणभूमि देखो । लक्ष्मणने यहाँ इन्द्रको जीतनेवाले मेघनादको मारा था । हनुमान् और अंगदके मारे हुए ये भारी- भारी निशाचर रणभूमिमें पड़े हैं ॥५ ॥
कुंभकरन रावन द्वौ भाई । इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई ॥
देवताओं और मुनियोंको दुःख देनेवाले कुम्भकर्ण और रावण दोनों भाई यहाँ मारे गये ॥६ ॥
दो० – इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम ।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम ॥ ११ ९ ( क ) ॥
मैंने यहाँ पुल बाँधा ( बँधवाया) और सुखधाम श्रीशिवजीकी स्थापना की । तदनन्तर कृपानिधान श्रीरामजीने सीताजीसहित श्रीरामेश्वर महादेवको प्रणाम किया ॥ ११ ९ ( क ) ॥
जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम ।
सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम ॥ ११ ९ ( ख ) ॥
वनमें जहाँ- जहाँ करुणासागर श्रीरामचन्द्रजीने निवास और विश्राम किया था, वे सब स्थान प्रभुने जानकीजीको दिखलाये और सबके नाम बतलाये ॥ ११ ९ ( ख ) ॥
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा । दंडक बन जहँ परम सुहावा ॥
कुंभजादि मुनिनायक नाना । गए रामु सब कें अस्थाना ॥
विमान शीघ्र ही वहाँ चला आया जहाँ परम सुन्दर दण्डकवन था, और अगस्त्य आदि बहुत-से मुनिराज रहते थे । श्रीरामजी इन सबके स्थानोंमें गये ॥१ ॥
।सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा चित्रकूट आए जगदीसा ॥
तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा । चला बिमानु तहाँ ते चोखा ॥
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* * लङ्काकाण्ड ९०१ सम्पूर्ण ऋषियोंसे आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्रीरामजी चित्रकूट आये । वहाँ मुनियोंको सन्तुष्ट किया । [फिर] विमान वहाँसे आगे तेजीके साथ चला ॥ २ ॥
बहुरि राम जानकिहि देखाई । जमुना कलि मल हरनि सुहाई ॥
पुनि देखी सुरसरी पुनीता । राम कहा प्रनाम करु सीता ॥
फिर श्रीरामजीने जानकीजीको कलियुगके पापोंका हरण करनेवाली सुहावनी यमुनाजीके दर्शन कराये । फिर पवित्र गङ्गाजीके दर्शन किये । श्रीरामजीने कहा- हे सीते! इन्हें प्रणाम करो ॥ ३ ॥
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा । निरखत जन्म कोटि अघ भागा ॥
देखु परम पावनि पुनि बेनी । हरनि सोक हरि लोक निसेनी ॥
पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि । त्रिविध ताप भव रोग नसावनि ॥
फिर तीर्थराज प्रयागको देखो, जिसके दर्शनसे ही करोड़ों जन्मोंके पाप भाग जाते हैं । फिर परम पवित्र त्रिवेणीजीके दर्शन करो, जो शोकोंको हरनेवाली और श्रीहरिके परम धाम [ पहुँचने ] के लिये सीढ़ीके समान है । फिर अत्यन्त पवित्र अयोध्यापुरीके दर्शन करो, जो तीनों प्रकारके तापों और भव ( आवागमनरूपी ) रोगका नाश करनेवाली है ॥४-५ ॥
दो० - सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम ।
सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम ॥ १२० ( क ) ॥
यों कहकर कृपालु श्रीरामजीने सीताजीसहित अवधपुरीको प्रणाम किया । सजलनेत्र और पुलकितशरीर होकर श्रीरामजी बार- बार हर्षित हो रहे हैं ॥ १२० ( क ) ॥
पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह ।
कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह ॥ १२० (ख ) ॥
फिर त्रिवेणीमें आकर प्रभुने हर्षित होकर स्नान किया और वानरोंसहित ब्राह्मणोंको अनेकों प्रकारके दान दिये ॥ १२० ( ख) ॥
प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई । धरि बटु रूप अवधपुर जाई ॥
भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु । समाचार लै तुम्ह चलि आएहु ॥
तदनन्तर प्रभुने हनुमान्जीको समझाकर कहा- तुम ब्रह्मचारीका रूप धरकर अवधपुरीको जाओ । भरतको हमारी कुशल सुनाना और उनका समाचार लेकर चले आना ॥१ ॥
तुरत पवनसुत गवनत भयऊ । तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ ॥
नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही । अस्तुति करि पुनि आसिष दीन्ही ॥
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* *९०२ रामचरितमानस पवनपुत्र हनुमान्जी तुरंत ही चल दिये । तब प्रभु भरद्वाजजीके पास गये । मुनिने [ इष्टबुद्धिसे ] उनकी अनेकों प्रकारसे पूजा की और स्तुति की और फिर [ लीलाकी दृष्टिसे ] आशीर्वाद दिया ॥२ ॥
मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी । चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी ॥
इहाँ निषाद सुना प्रभु आए । नाव नाव कहँ लोग बोलाए ॥
दोनों हाथ जोड़कर तथा मुनिके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु विमानपर चढ़कर फिर ( आगे ) चले । यहाँ जब निषादराजने सुना कि प्रभु आ गये, तब उसने ' नाव कहाँ है? नाव कहाँ है? ' पुकारते हुए लोगोंको बुलाया ॥३ ॥
सुरसरि नाघि जान तब आयो । उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो ॥
तब सीताँ पूजी सुरसरी । बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी ॥
इतनेमें ही विमान गङ्गाजीको लाँघकर [इस पार] आ गया और प्रभुकी आज्ञा पाकर वह किनारेपर उतरा । तब सीताजी बहुत प्रकारसे गङ्गाजीकी पूजा करके फिर उनके चरणोंपर गिरीं ॥ ४ ॥
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा । सुंदरि तव अहिवात अभंगा ॥
सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल । आयउ निकट परम सुख संकुल ॥
गङ्गाजीने मनमें हर्षित होकर आशीर्वाद दिया- हे सुन्दरी! तुम्हारा सुहाग अखण्ड हो । भगवान्के तटपर उतरनेकी बात सुनते ही निषादराज गुह प्रेममें विह्वल होकर दौड़ा । परम सुखसे परिपूर्ण होकर वह प्रभुके समीप आया, ॥ ५ ॥
प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही । परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही ॥
प्रीति परम बिलोकि रघुराई । हरषि उठाइ लियो उर लाई ॥
और श्रीजानकीजीसहित प्रभुको देखकर वह [ आनन्द-समाधिमें मग्न होकर] पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे शरीरकी सुधि न रही । श्रीरघुनाथजीने उसका परम प्रेम देखकर उसे उठाकर हर्षके साथ हृदयसे लगा लिया ॥६ ॥
छं० —लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती ।
बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती ॥
अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे ।
सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते ॥
सुजानोंके राजा ( शिरोमणि ), लक्ष्मीकान्त, कृपानिधान भगवान्ने उसको हृदयसे लगा लिया और अत्यन्त निकट बैठाकर कुशल पूछी । वह विनती करने लगा- आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शङ्करजीसे सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूँ । हे सुखधाम! हे पूर्णकाम श्रीरामजी!, मैं आपको नमस्कार करता हूँ नमस्कार करता ॥१ ॥
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* * लङ्काकाण्ड ९ ०३
सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो ।
मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो ॥
यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा ।
कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा ॥
सब प्रकारसे नीच उस निषादको भगवान्ने भरतजीकी भाँति हृदयसे लगा लिया । तुलसीदासजी कहते हैं —इस मन्दबुद्धिने ( मैंने ) मोहवश उस प्रभुको भुला दिया । रावणके शत्रुका यह पवित्र करनेवाला चरित्र सदा ही श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न करनेवाला । यह कामादि विकारोंका हरनेवाला और [ भगवान्के स्वरूपका] विशेष ज्ञान उत्पन्न करनेवाला है । देवता, सिद्ध और मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं ॥ २ ॥
दो० - समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान ।
बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान ॥ १२१ ( क ) ॥
जो सुजान लोग श्रीरघुवीरकी समरविजयसम्बन्धी लीलाको सुनते हैं, उनको भगवान् नित्य विजय, विवेक और विभूति ( ऐश्वर्य) देते हैं ॥ १२१ ( क ) ॥
यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार ।
श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार ॥ १२१ ( ख ) ॥
अरे मन! विचार करके देख! यह कलिकाल पापोंका घर है । इसमें श्रीरघुनाथजीके नामको छोड़कर [ पापोंसे बचनेके लिये ] दूसरा कोई आधार नहीं है । १२१ ( ख ) ॥ मासपारायण, सत्ताईसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने षष्ठः सोपानः समाप्तः । कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह छठा सोपान समाप्त हुआ । ( लङ्काकाण्ड समाप्त )
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गुरु -वन्दन 20000
धरे गुर चरन सरोरुह । अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ॥
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस सप्तम सोपान उत्तरकाण्ड
श्लोक
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम् । पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् ॥१ ॥
मोरके कण्ठकी आभाके समान ( हरिताभ ) नीलवर्ण, देवताओंमें श्रेष्ठ, ब्राह्मण ( भृगुजी ) के चरणकमलके चिह्नसे सुशोभित, शोभासे पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमलनेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथोंमें बाण और धनुष धारण किये हुए, वानरसमूहसे युक्त, भाई लक्ष्मणजीसे सेवित, स्तुति किये जाने योग्य, श्रीजानकीजीके पति, रघुकुलश्रेष्ठ, पुष्पकविमानपर सवार श्रीरामचन्द्रजीको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ ॥१ ॥
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ ।
जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ ॥ २ ॥
कोसलपुरीके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर और कोमल दोनों चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं, श्रीजानकीजीके करकमलोंसे दुलराये हुए हैं और चिन्तन करनेवालेके मनरूपी भौरेके नित्य संगी हैं अर्थात् चिन्तन करनेवालोंका मनरूपी भ्रमर सदा उन चरणकमलोंमें बसा रहता है ॥ २ ॥
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् ।
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम्॥ ३ ॥
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* *९०६ रामचरितमानस कुन्दके फूल, चन्द्रमा और शङ्खके समान सुन्दर गौरवर्ण, जगज्जननी श्रीपार्वतीजीके पति, वाञ्छित फलके देनेवाले, [ दुःखियोंपर सदा ] दया करनेवाले, सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, कामदेवसे छुड़ानेवाले, [ कल्याणकारी ] श्रीशङ्करजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥३ ॥
दो० - रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग ।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग ॥
[ श्रीरामजीके लौटनेकी ] अवधिका एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव नगरके लोग बहुत आतुर ( अधीर ) हो रहे । रामके वियोगमें दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ- तहाँ सोच ( विचार ) कर रहे हैं [ कि क्या बात है, श्रीरामजी क्यों नहीं आये ] ।
सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर ।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर ॥
इतनेमें ही सब सुन्दर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गये । नगर भी चारों ओरसे रमणीक हो गया । मानो ये सब के सब चिह्न प्रभुके [ शुभ ] आगमनको जना रहे हैं ।
कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ ।
आयउ प्रभु श्री अनुजजुत कहन चहत अब कोइ ॥
कौसल्या आदि सब माताओंके मनमें ऐसा आनन्द हो रहा है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता है कि सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आ गये ।
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार ।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार ॥
भरतजीकी दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार- बार फड़क रही है । इसे शुभ शकुन जानकर उनके मनमें अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे—
रहेउ एक दिन अवधि अधारा । समुझत मन दुख भयउ अपारा ॥
कारन कवन नाथ नहिं आयउ । जानि कुटिल किधौं मोहि बिसराय ॥
प्राणोंकी आधाररूप अवधिका एक ही दिन शेष रह गया । यह सोचते ही भरतजीके मनमें अपार दुःख हुआ । क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये? प्रभुने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया? ॥१ ॥
अहह धन्य लछिमन बड़भागी । राम पदारबिंदु अनुरागी ॥
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा । ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ॥
अहा हा! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं, जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दके प्रेमी हैं ( अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए) । मुझे तो प्रभुने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसीसे नाथने मुझे साथ नहीं लिया! ॥ २ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९ ०७
जौं करनी समुझे प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥
[ बात भी ठीक ही है, क्योंकि] यदि प्रभु मेरी करनीपर ध्यान दें, तो सौ करोड़ ( असंख्य ) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार ( छुटकारा ) नहीं हो सकता । [ परन्तु आशा इतनी ही है कि ] प्रभु सेवकका अवगुण कभी नहीं मानते । वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभावके हैं ॥३ ॥
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना । अधम कवन जग मोहि समाना ॥
अतएव मेरे हृदयमें ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, [ क्योंकि ] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं । किन्तु अवधि बीत जानेपर यदि मेरे प्राण रह गये तो जगत्में मेरे समान नीच कौन होगा? ॥४ ॥
दो० - राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत ।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत ॥ १ ( क ) ॥
श्रीरामजीके विरह-समुद्रमें भरतजीका मन डूब रहा था, उसी समय पवनपुत्र हनुमान्जी ब्राह्मणका रूप धरकर इस प्रकार आ गये, मानो [ उन्हें डूबनेसे बचानेके लिये ] नाव आ गयी हो ॥ १ ( क ) ॥
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात ।
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात ॥ १ ( ख ) ॥
हनुमान्जीने दुर्बलशरीर भरतजीको जटाओंका मुकुट बनाये, राम! राम! रघुपति! जपते और कमलके समान नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहाते कुशके आसनपर बैठे देखा ॥१ ( ख ) ॥
देखत हनूमान अति हरषेउ । पुलक गात लोचन जल बरषेउ ॥
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी । बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी ॥
उन्हें देखते ही हनुमान्जी अत्यन्त हर्षित हुए । उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बरसने लगा । मनमें बहुत प्रकारसे सुख मानकर वे कानोंके लिये अमृतके समान वाणी बोले-॥१ ॥
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती । रटहु निरंतर गुन गन पाँती ॥
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता । आयउ कुसल देव मुनि त्राता ॥
जिनके विरहमें आप दिन-रात सोच करते ( घुलते) रहते हैं और जिनके गुण- समूहोंकी पंक्तियोंको आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुलके तिलक, सज्जनोंको सुख देनेवाले और देवताओं तथा मुनियोंके रक्षक श्रीरामजी सकुशल आ गये ॥ २ ॥
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*:*९०८ रामचरितमानस
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत । सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥
सुनत बचन बिसरे सब दूखा । तृषावंत जिमि पाइ पियूषा ॥
शत्रुको रणमें जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुन्दर यश गा रहे हैं । ये वचन सुनते ही [ भरतजीको ] सारे दुःख भूल गये । जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यासके दुःखको भूल जाय ॥३ ॥
को तुम्ह तात कहाँ ते आए । मोहि परम प्रिय बचन सुनाए ॥
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना । नामु मोर सुनु कृपानिधाना ॥
[ भरतजीने पूछा— ] हे तात! तुम कौन हो? और कहाँसे आये हो? [जो ] तुमने मुझको [ ये ] परम प्रिय ( अत्यन्त आनन्द देनेवाले ) वचन सुनाये । [ हनुमान्जीने कहा- ] हे कृपानिधान! सुनिये, मैं पवनका पुत्र और जातिका वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान् है ॥४ ॥
दीनबंधु रघुपति कर किंकर । सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ॥
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता । नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता ॥
मैं दीनोंके बन्धु श्रीरघुनाथजीका दास हूँ । यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्जीसे गले लगकर मिले । मिलते समय प्रेम हृदयमें नहीं समाता | नेत्रोंसे [ आनन्द और प्रेमके आँसुओंका ] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया ॥ ५ ॥
कपि तव दरस सकल दुख बीते । मिले आजु मोहि राम पिरीते ॥
बार बार बूझी कुसलाता । तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता ॥
[ भरतजीने कहा— ] हे हनुमान्! तुम्हारे दर्शनसे मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये (दुःखोंका अन्त हो गया ) । [ तुम्हारे रूपमें ] आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गये । भरतजीने बार - बार कुशल पूछी [और कहा- ] हे भाई! सुनो, [इस शुभ संवादके बदलेमें ] तुम्हें क्या दूँ? ॥६ ॥
एहि संदेस सरिस जग माहीं । करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ॥
नाहिन तात उरिन मैं तोही । अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ॥
इस सन्देशके समान ( इसके बदलेमें देने लायक पदार्थ ) जगत्में कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है । [ इसलिये ] हे तात! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उऋण नहीं हो सकता । अब मुझे प्रभुका चरित्र ( हाल ) सुनाओ ॥७ ॥
तब हनुमंत नाइ पद माथा । कहे सकल रघुपति गुन गाथा ।
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं । सुमिरहिं मोहि दास की नाईं ॥