श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 911–920

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920

पृष्ठ 911

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* उत्तरकाण्ड * ९० ९ तब हनुमान्जीने भरतजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजीकी सारी गुणगाथा कही । [ भरतजीने पूछा- ] हे हनुमान्! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दासकी तरह याद भी करते हैं? ॥ ८ ॥

छं० — निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन करयो ।

सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि परयो ॥

रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो ।

काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो ॥

रघुवंशके भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं? भरतजीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमान्जी पुलकित शरीर होकर उनके चरणोंपर गिर पड़े [ और मनमें विचारने लगे कि] जो चराचरके स्वामी हैं वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुखसे जिनके गुणसमूहोंका वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणोंके समुद्र क्यों न हों?

दो० –- राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात ।

पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ॥ २ ( क ) ॥

[ हनुमान्जीने कहा— ] हे नाथ! आप श्रीरामजीको प्राणोंके समान प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है । यह सुनकर भरतजी बार-बार मिलते हैं, हृदयमें हर्ष समाता नहीं है ॥ २ ( क ) ॥

सो० – भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं ।

कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ॥ २ ( ख ) ॥

फिर भरतजीके चरणोंमें सिर नवाकर हनुमान्जी तुरंत ही श्रीरामजीके पास [ लौट ] गये और

जाकर उन्होंने सब कुशल कही । तब प्रभु हर्षित होकर विमानपर चढ़कर चले ॥ २ ( ख ) ॥

हरषि भरत कोसलपुर आए । समाचार सब गुरहि सुनाए ।

पुनि मंदिर महँ बात जनाई । आवत नगर कुसल रघुराई ॥

इधर भरतजी भी हर्षित होकर अयोध्यापुरीमें आये और उन्होंने गुरुजीको सब समाचार सुनाया । फिर राजमहलमें खबर जनायी कि श्रीरघुनाथजी कुशलपूर्वक नगरको आ रहे हैं ॥१ ॥

सुनत सकल जननीं उठि धाईं । कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥

समाचार पुरबासिन्ह पाए । नर अरु नारि हरषि सब धाए ॥

खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं । भरतजीने प्रभुकी कुशल कहकर सबको समझाया ।

नगरनिवासियोंने यह समाचार पाया, तो स्त्री- पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े ॥२ ॥

दधि दुर्बा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मंगल मूला ॥

भरि भरि हेम थार भामिनी । गावत चलिं सिंधुरगामिनी ॥

पृष्ठ 912

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* *९१० रामचरितमानस [ श्रीरामजीके स्वागतके लिये ] दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मङ्गलके मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोनेके थालोंमें भर- भरकर हथिनीकी-सी चालवाली सौभाग्यवती स्त्रियाँ [उन्हें लेकर ] गाती हुई चलीं ॥३ ॥

जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं । बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं ॥

एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई । तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥

जो जैसे हैं ( जहाँ जिस दशामें हैं ) वे वैसे ही ( वहींसे उसी दशामें ) उठ दौड़ते हैं । [ देर हो जानेके डरसे ] बालकों और बूढ़ोंको कोई साथ नहीं लाते । एक दूसरेसे पूछते हैं - भाई! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजीको देखा है? ॥४ ॥

अवधपुरी प्रभु आवत जानी । भई सकल सोभा कै खानी ॥

बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा । भइ सरजू अति निर्मल नीरा ॥

प्रभुको आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओंकी खान हो गयी । तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहने लगी । सरयूजी अति निर्मल जलवाली हो गयीं ( अर्थात् सरयूजीका जल अत्यन्त निर्मल हो गया) ॥ ५ ॥

दो० - हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बूंद समेत ।

चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत ॥ ३ ( क ) ॥

गुरु वसिष्ठजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणोंके समूहके साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यन्त प्रेमपूर्ण मनसे कृपाधाम श्रीरामजीके सामने ( अर्थात् उनकी अगवानीके लिये ) चले ॥ ३ ( क ) ॥

बहुतक चढ़ीं अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान ।

देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥ ३ ( ख ) ॥

बहुत- सी स्त्रियाँ अटारियोंपर चढ़ीं आकाशमें विमान देख रही हैं और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वरसे सुन्दर मङ्गलगीत गा रही हैं ॥ ३ ( ख) ॥

राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान ।

बढ्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ॥ ३ ( ग ) ॥

श्रीरघुनाथजी पूर्णिमाके चन्द्रमा हैं, तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचन्द्रको देखकर हर्षित हो रहा है और शोर करता हुआ बढ़ रहा है [ इधर- उधर दौड़ती हुई ] स्त्रियाँ उसकी तरङ्गोंके समान लगती हैं ॥ ३ ( ग ) ॥

इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर । कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ॥

सुनु कपीस अंगद लंकेसा । पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥

पृष्ठ 913

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* उत्तरकाण्ड * ९ ११ यहाँ ( विमानपरसे ) सूर्यकुलरूपी कमलके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजी वानरोंको मनोहर नगर दिखला रहे हैं । [ वे कहते हैं — ] हे सुग्रीव! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण! सुनो । यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर है ॥ १ ॥

जद्यपि सब बैकुंठ बखाना । बेद पुरान बिदित जग जाना ॥

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ । यह प्रसंग जान कोउ कोऊ ॥

यद्यपि सबने वैकुण्ठकी बड़ाई की है - यह वेद- पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है, परन्तु अवधपुरीके समान मुझे वह भी प्रिय नहीं है । यह बात ( भेद ) कोई- कोई ( विरले ही ) जानते हैं ॥ २ ॥

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥

जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा । मम समीप नर पावहिं बासा ॥

यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है । इसके उत्तर दिशामें [ जीवोंको ] पवित्र करनेवाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करनेसे मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास ( सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं ॥ ३ ॥

अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी । मम धामदा पुरी सुख रासी ॥

हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी । धन्य अवध जो राम बखानी ॥

यहाँके निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं । यह पुरी सुखकी राशि और मेरे परमधामको देनेवाली है । प्रभुकी वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [और कहने लगे कि] जिस अवधकी स्वयं श्रीरामजीने बड़ाई की, वह [अवश्य ही ] धन्य है ॥ ४ ॥

दो० – आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान ।

नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान ॥ ४ ( क ) ॥

कृपासागर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने सब लोगोंको आते देखा, तो प्रभुने विमानको नगरके समीप

उतरनेकी प्रेरणा की । तब वह पृथ्वीपर उतरा ॥ ४ ( क) ॥

उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु ।

प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु ॥ ४ ( ख ) ॥

विमानसे उतरकर प्रभुने पुष्पकविमानसे कहा कि तुम अब कुबेरके पास जाओ । श्रीरामजीकी प्रेरणासे वह चला; उसे [ अपने स्वामीके पास जानेका ] हर्ष है और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीसे अलग होनेका अत्यन्त दुःख भी ॥४ ( ख ) ॥

आए भरत संग सब लोगा । कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा ।

बामदेव बसिष्ट मुनिनायक । देखे प्रभु महि धरि धनु सायक ॥

भरतजीके साथ सब लोग आये । श्रीरघुवीरके वियोगसे सबके शरीर दुबले हो रहे हैं । प्रभुने वामदेव, वसिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठोंको देखा, तो उन्होंने धनुष -बाण पृथ्वीपर रखकर– ॥१ ॥

पृष्ठ 914

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* *९ १२ रामचरितमानस

धाइ धरे गुर चरन सरोरुह । अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ॥

भेंटि कुसल बूझी मुनिराया । हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया ॥

छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित दौड़कर गुरुजीके चरणकमल पकड़ लिये; उनके रोम- रोम अत्यन्त पुलकित हो रहे हैं । मुनिराज वसिष्ठजीने [ उठाकर ] उन्हें गले लगाकर कुशल पूछी । [ प्रभुने कहा— ] आपहीकी दयामें हमारी कुशल है ॥२ ॥

सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा । धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा ॥

हे भरत पुनि प्रभु पद पंकज । नमतजिन्हहि सुर मुनि संकर अज ॥

धर्मकी धुरी धारण करनेवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामजीने सब ब्राह्मणोंसे मिलकर उन्हें मस्तक नवाया । फिर भरतजीने प्रभुके वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देवता, मुनि, शङ्करजी और ब्रह्माजी [ भी ] नमस्कार करते हैं ॥३ ॥

परे भूमि नहिं उठत उठाए । बर करि कृपासिंधु उर लाए ॥

स्यामल गात रोम भए ठाढ़े । नव राजीव नयन जल बाढ़े ॥

भरतजी पृथ्वीपर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं । तब कृपासिंधु श्रीरामजीने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया । [ उनके ] साँवले शरीरपर रोएँ खड़े हो गये । नवीन कमलके समान नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंके ] जलकी बाढ़ आ गयी ॥४ ॥

छं० - राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी ।

अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ॥

प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही ।

जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही ॥

कमलके समान नेत्रोंसे जल बह रहा है । सुन्दर शरीरमें पुलकावली [ अत्यन्त ] शोभा दे रही है । त्रिलोकीके स्वामी प्रभु श्रीरामजी छोटे भाई भरतजीको अत्यन्त प्रेमसे हृदयसे लगाकर मिले । भाईसे मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जातीT। मानो प्रेम और शृंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभाको प्राप्त हुए ॥१ ॥

बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई ।

सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ॥

अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो ।

बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ॥

पृष्ठ 915

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* उत्तरकाण्ड * ९ १३ कृपानिधान श्रीरामजी भरतजीसे कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजीके मुखसे वचन शीघ्र नहीं निकलते । [ शिवजीने कहा- ] हे पार्वती! सुनो, वह सुख ( जो उस समय भरतजीको मिल रहा था ) वचन और मनसे परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है । [ भरतजीने कहा– ] हे कोसलनाथ! आपने आर्त्त ( दु: खी ) जानकर दासको दर्शन दिये, इससे अब कुशल I विरहसमुद्रमें डूबते हुए मुझको कृपानिधानने हाथ पकड़कर बचा लिया! ॥२ ॥

दो० – पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ ।

लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ॥ ५ ॥

फिर प्रभु हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगाकर उनसे मिले । तब लक्ष्मणजी और भरतजी दोनों भाई परम प्रेमसे मिले ॥५ ॥

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे । दुसह बिरह संभव दुख मेटे ॥

सीता चरन भरत सिरु नावा । अनुज समेत परम सुख पावा ॥

फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्नजीसे गले लगकर मिले और इस प्रकार विरहसे उत्पन्न दुःसह दुःखका नाश किया । फिर भाई शत्रुघ्नजीसहित भरतजीने सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और परम सुख प्राप्त किया ॥१ ॥

प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी । जनित बियोग बिपति सब नासी ॥

प्रेमातुर सब लोग निहारी । कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी ॥

प्रभुको देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए । वियोगसे उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गये । सब लोगोंको प्रेमविह्वल [ और मिलनेके लिये अत्यन्त आतुर ] देखकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजीने एक चमत्कार किया ॥ २ ॥

अमित रूप प्रगटे तेहि काला । जथा जोग मिले सबहि कृपाला ॥

कृपादृष्टि रघुबीररघुबीर बिलोकी । किए सकल नर नारि बिसोकी ॥

उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपोंमें प्रकट हो गये और सबसे [ एक ही साथ ] यथायोग्य मिले । श्रीरघुवीरने कृपाकी दृष्टिसे देखकर सब नर- नारियोंको शोकसे रहित कर दिया ॥ ३ ॥

छन महिं सबहि मिले भगवाना । उमा मरम यह काहुँ न जाना ॥

एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा । आगें चले सील गुन धामा ॥

भगवान् क्षणमात्रमें सबसे मिल लिये । हे उमा! यह रहस्य किसीने नहीं जाना । इस प्रकार शील और गुणोंके धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे बढ़े ॥४ ॥

कौसल्यादि मातु सबसब धाई । निरख बच्छ जनु धेनु लवाई ॥

कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने बछड़ोंको देखकर दौड़ी हों ॥ ५ ॥

पृष्ठ 916

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* *९ १४ रामचरितमानस

छं० — जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं ।

दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भई ॥

अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे ।

गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे ॥

मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने छोटे बछड़ोंको घरपर छोड़ परवश होकर वनमें चरने गयी हों और दिनका अन्त होनेपर [ बछड़ोंसे मिलनेके लिये ] हुंकार करके थनसे दूध गिराती हुई नगरकी ओर दौड़ी हों । प्रभुने अत्यन्त प्रेमसे सब माताओंसे मिलकर उनसे बहुत प्रकारके कोमल वचन कहे । वियोगसे उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने [ भगवान्से मिलकर और उनके वचन सुनकर] अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किये ।

दो० –- भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि ।

रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि ॥ ६ ( क ) ॥

सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजीकी श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति जानकर उनसे मिलीं । श्रीरामजीसे मिलते समय कैकेयीजी हृदयमें बहुत सकुचायीं ॥ ६ ( क ) ॥

लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ ।

कैकड़ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ ॥ ६ ( ख) ॥

लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए । वे कैकेयीजीसे बार-बार मिले, परन्तु उनके मनका क्षोभ ( रोष) नहीं जाता ॥६ ( ख ) ॥

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लागि हरषु अति तेही ॥

देहिं असीस बूझि कुसलाता । होइ अचल तुम्हार अहिवाता ॥

जानकीजी सब सासुओंसे मिलीं और उनके चरणों लगकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ । सासुएँ कुशल पूछकर आशिष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो ॥ १ ॥

सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं । मंगल जानि नयन जल रोकहिं ॥

कनक थार आरती उतारहिं । बार बार प्रभु गात निहारहिं ॥

सब माताएँ श्रीरघुनाथजीका कमल-सा मुखड़ा देख रही हैं । [ नेत्रोंसे प्रेमके आँसू उमड़े आते हैं, परन्तु ] मङ्गलका समय जानकर वे आँसुओंके जलको नेत्रोंमें ही रोक रखती हैं । सोनेके थालसे आरती उतारती हैं और बार- बार प्रभुके श्रीअङ्गोंकी ओर देखती हैं ॥ २ ॥

नाना भाँति निछावरि करहीं । परमानंद हरष उर भरहीं ॥

कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि । चितवति कृपासिंधु रनधीरहि ॥

पृष्ठ 917

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* उत्तरकाण्ड * ९१५ अनेकों प्रकारसे निछावरें करती हैं और हृदयमें परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं । कौसल्याजी बार- बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीरको देख रही हैं ॥३ ॥

हृदयँ बिचारति बारहिं बारा । कवन भाँति लंकापति मारा ॥

अति सुकुमार जुगल मेरे बारे । निसिचर सुभट महाबल भारे ॥

वे बार - बार हृदयमें विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावणको कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महान् बली थे ॥४ ॥

दो० – लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु ।

परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु ॥७ ॥

लक्ष्मणजी और सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको माता देख रही हैं । उनका मन परमानन्दमें मग्न है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है ॥७ ॥

लंकापति कपीस नल नीला । जामवंत अंगद सुभसीला ॥

हनुमदादि सब बानर बीरा । धरे मनोहर मनुज सरीरा ॥

लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद तथा हनुमान्जी आदि सभी उत्तम स्वभाववाले वीर वानरोंने मनुष्योंके मनोहर शरीर धारण कर लिये ॥१ ॥

भरत सनेह सील ब्रत नेमा । सादर सब बरनहिं अति प्रेमा ॥

देखि नगरबासिन्ह कै रीती । सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती ॥

वे सब भरतजीके प्रेम, सुन्दर स्वभाव, [ त्यागके ] व्रत और नियमोंकी अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं । और नगरनिवासियोंकी [ प्रेम, शील और विनयसे पूर्ण ] रीति देखकर वे सब प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेमकी सराहना कर रहे हैं ॥ २ ॥

पुनि रघुपति सब सखा बोलाए । मुनि पद लागहु सकल सिखाए ॥

गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे । इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ॥

फिर श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया और सबको सिखाया कि मुनिके चरणोंमें लगो । ये गुरु वसिष्ठजी हमारे कुलभरके पूज्य हैं । इन्हींकी कृपासे रणमें राक्षस मारे गये हैं ॥३ ॥

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे । भए समर सागर कहँ बेरे ॥

मम हित लागि जन्म इन्ह हारे । भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ॥

[ फिर गुरुजीसे कहा- ] हे मुनि! सुनिये । ये सब मेरे सखा हैं । ये संग्रामरूपी समुद्रमें मेरे लिये बेड़े ( जहाज ) के समान हुए । मेरे हितके लिये इन्होंने अपने जन्मतक हार दिये ( अपने प्राणोंतकको होम दिया ) । ये मुझे भरतसे भी अधिक प्रिय हैं ॥४ ॥

पृष्ठ 918

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** *९१६ रामचरितमानस

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । निमिष निमिष उपजत सुख नए ॥

प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्दमें मग्न हो गये । इस प्रकार पल- पलमें उन्हें नये- नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं ॥५ ॥

दो० - कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ ।

आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ॥ ८ ( क ) ॥

फिर उन लोगोंने कौसल्याजीके चरणोंमें मस्तक नवाये । कौसल्याजीने हर्षित होकर आशिषें दीं [ और कहा— ] तुम मुझे रघुनाथके समान प्यारे हो ॥८ ( क ) ॥ सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद ॥८ ( ख ) ॥ आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महलको चले, आकाश फूलोंकी वृष्टिसे छा गया । नगरके स्त्री- पुरुषोंके समूह अटारियोंपर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं ॥ ८ (ख ) ॥ कंचनबंदनवारकलसपताकाबिचित्र सँवारेकेतू ॥ सबहिंसबन्हि धरेबनाएसजि निजमंगलनिज द्वारेहेतू॥॥ सोनेके कलशोंको विचित्र रीतिसे [ मणि- रत्नादिसे ] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने- अपने दरवाजोंपर रख लिया । सब लोगोंने मङ्गलके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं ॥ १ ॥

बीथीं सकल सुगंध सिंचाईं । गजमनि रचि बहु चौक पुराईं ॥

नाना भाँति सुमंगल साजे । हरषि नगर निसान बहु बाजे ॥

सारी गलियाँ सुगन्धित द्रवोंसे सिंचायी गयीं । गजमुक्ताओंसे रचकर बहुत- सी चौकें पुरायी गयीं । अनेकों प्रकारके सुन्दर मङ्गल- साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत- से डंके बजने लगे ॥२ ॥

जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं । देहिं असीस हरष उर भरहीं ॥

कंचन थार आरतीं नाना । जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना ॥

स्त्रियाँ जहाँ - तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदयमें हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं । बहुत- सी युवती [ सौभाग्यवती ] स्त्रियाँ सोनेके थालोंमें अनेकों प्रकारकी आरती सजकर मङ्गलगान कर रही हैं ॥ ३ ॥

करहिं आरती आरतिहर कें । रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें ॥

पुर सोभा संपति कल्याना । निगम सेष सारदा बखाना ॥

वे आर्तिहर ( दुःखोंको हरनेवाले ) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजीकी आरती कर रही हैं । नगरकी शोभा, सम्पत्ति और कल्याणका वेद, शेषजी और सरस्वतीजी वर्णन करते हैं - ॥४ ॥

पृष्ठ 919

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* उत्तरकाण्ड * ९ १७

ते यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं ॥

परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे- से रह जाते हैं ( स्तम्भित हो रहते हैं ) । [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं ॥५ ॥

दो० – नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस ।

अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस ॥ ९ ( क ) ॥

स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [ इस विरह - सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं ] । अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं ॥ ९ ( क ) ॥

होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान ।

पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान ॥ ९ ( ख ) ॥

अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं । नगरके पुरुषों और स्त्रियोंको सनाथ ( दर्शनद्वारा कृतार्थ ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महलको चले॥९ ( ख ) ॥

प्रभु जानी कैकई लजानी । प्रथम तासु गृह गए भवानी ॥

ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥

[ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं । [ इसलिये ] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा- बुझाकर बहुत सुख दिया । फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया ॥ १ ॥

पुर नर नारि सुखी सब भए ॥कृपासिंधु जब मंदिर गए ।

गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई । आजु सुघरी सुदिन समुदाई ॥

कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महलको गये, तब नगरके स्त्री - पुरुष सब सुखी हुए । गुरु वसिष्ठजीने ब्राह्मणोंको बुला लिया [ और कहा- ] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं ॥ २ ॥

सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥

मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥

आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों । वसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे ॥ ३ ॥

कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥

अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै । महाराज कहँ तिलक करीजै ॥

वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला है । हे मुनिश्रेष्ठ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये ॥४ ॥

पृष्ठ 920

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९ १८ * रामचरितमानस *

दो० – तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ ।

रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ ॥ १० ( क ) ॥

तब मुनिने सुमन्त्रजीसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले । उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये;॥ १० ( क ) ॥

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रव्य मगाइ ।

हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ ॥ १० ( ख ) ॥

और जहाँ - तहाँ [ सूचना देनेवाले ] दूतोंको भेजकर माङ्गलिक वस्तुएँ मँगाकर फिर हर्षके साथ आकर वसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया ॥१० ( ख ) ॥ नवाह्नपारायण, आठवाँ विश्राम

अवधपुरी अति रुचिर बनाई । देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई ॥

राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई ॥

अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी । देवताओंने पुष्पोंकी वर्षाकी झड़ी लगा दी । श्रीरामचन्द्रजीने सेवकोंको बुलाकर कहा कि तुमलोग जाकर पहले मेरे सखाओंको स्नान कराओ ॥ १ ॥

सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए । सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए ॥

पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे । निज कर राम जटा निरुआरे ॥

भगवान्के वचन सुनते ही सेवक जहाँ - तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादिको स्नान कराया । फिर करुणानिधान श्रीरामजीने भरतजीको बुलाया और उनकी जटाओंको अपने हाथोंसे सुलझाया ॥ २ ॥

अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई । भगत बछल कृपाल रघुराई ॥

भरत भाग्य प्रभु कोमलताई । सेष कोटि सत सकहिं न गाई ॥

तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरघुनाथजीने तीनों भाइयोंको स्नान कराया । भरतजीका भाग्य और प्रभुकी कोमलताका वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

पुनि निज जटा राम बिबराए । गुर अनुसासन मागि नहाए ॥

करि मज्जन प्रभु भूषन साजे । अंग अनंग देखि सत लाजे ॥

फिर श्रीरामजीने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजीकी आज्ञा माँगकर स्नान किया । स्नान करके प्रभुने आभूषण धारण कियेT। उनके [ सुशोभित] अङ्गोंको देखकर सैकड़ों ( असंख्य ) कामदेव लजा गये ॥४ ॥

दो० – सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ ।

दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ ॥ ११ ( क ) ॥