श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 921–930

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930

पृष्ठ 921

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* * उत्तरकाण्ड ९ १ ९ [ इधर] सासुओंने जानकीजीको आदरके साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अङ्ग - अङ्गमें दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये ( पहना दिये ) ॥ ११ ( क ) ॥

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि ।

देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ॥ ११ ( ख ) ॥

श्रीरामके बायीं ओर रूप और गुणोंकी खान रमा ( श्रीजानकीजी ) शोभित हो रही हैं । उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म ( जीवन ) सफल समझकर हर्षित हुईं ॥ ११ ( ख ) ॥

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बूंद ।

चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद ॥ ११ ( ग ) ॥

[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये; उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियोंके समूह तथा विमानोंपर चढ़कर सब देवता आनन्दकन्द भगवान्‌के दर्शन करनेके लिये आये ॥ ११ ( ग ) ॥

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा । तुरत दिब्य सिंघासन मागा ॥

रबि सम तेज सो बरनि न जाई । बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई ॥

प्रभुको देखकर मुनि वसिष्ठजीके मनमें प्रेम भर आया । उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्यके समान था । उसका सौन्दर्य वर्णन नहीं किया जा सकता । ब्राह्मणोंको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी उसपर विराज गये ॥ १ ॥

जनकसुता समेत रघुराई ॥ पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई ॥

बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे । नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे ॥

श्रीजानकीजीके सहित श्रीरघुनाथजीको देखकर मुनियोंका समुदाय अत्यन्त ही हर्षित हुआ । तब ब्राह्मणोंने वेदमन्त्रोंका उच्चारण किया । आकाशमें देवता और मुनि 'जय हो, जय हो ' ऐसी पुकार करने लगे ॥२ ॥

प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा । पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा ॥

सुत बिलोकि हरषीं महतारी । बार बार आरती उतारी ॥

[सबसे ] पहले मुनि वसिष्ठजीने तिलक किया । फिर उन्होंने सब ब्राह्मणोंको [तिलक करनेकी ] आज्ञा दी । पुत्रको राजसिंहासनपर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और उन्होंने बार- बार आरती उतारी ॥३ ॥

बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे । जाचक सकल अजाचक कीन्हे ॥

सिंघासन पर त्रिभुअन साईं । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं ॥

पृष्ठ 922

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*:*९२० रामचरितमानस उन्होंने ब्राह्मणोंको अनेकों प्रकारके दान दिये और सम्पूर्ण याचकोंको अयाचक बना दिया ( मालामाल कर दिया ) । त्रिभुवनके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीको [ अयोध्याके ] सिंहासनपर [ विराजित ] देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये ॥४ ॥

छं० - नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं ।

नाचहिं अपछरा बूंद परमानंद सुर मुनि पावहीं ॥

भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते ।

गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते ॥

आकाशमें बहुत- से नगाड़े बज रहे हैं । गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं । अप्सराओंके झुंड- के- झुंड नाच रहे हैं । देवता और मुनि परमानन्द प्राप्त कर रहे हैं । भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नजी, विभीषण, अङ्गद, हनुमान् और सुग्रीव आदिसहित क्रमशः छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिये हुए सुशोभित हैं ॥१ ॥

श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई ।

नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ॥

मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे ।

अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ॥

श्रीसीताजीसहित सूर्यवंशके विभूषण श्रीरामजीके शरीरमें अनेकों कामदेवोंकी छबि शोभा दे रही है । नवीन जलयुक्त मेघोंके समान सुन्दर श्याम शरीरपर पीताम्बर देवताओंके मनको भी मोहित कर रहा है । मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अङ्ग अङ्गमें सजे हुए हैं । कमलके समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं; जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं ॥ २ ॥

दो० – वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस ।

बरनहिं सारद से श्रुति सो रस जान महेस ॥ १२ ( क ) ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता । सरस्वतीजी, शेषजी और वेद निरन्तर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस ( आनन्द ) महादेवजी ही जानते हैं ॥ १२ ( क ) ॥

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम ।

बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम ॥ १२ ( ख ) ॥

सब देवता अलग - अलग स्तुति करके अपने - अपने लोकको चले गये । तब भाटोंका रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आये जहाँ श्रीरामजी थे ॥ १२ ( ख) ॥

प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान ।

लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान ॥ १२ ( ग ) ॥

पृष्ठ 923

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* उत्तरकाण्ड * ९ २१ कृपानिधान सर्वज्ञ प्रभुने [उन्हें पहचानकर ] उनका बहुत ही आदर किया । इसका भेद किसीने

कुछ भी नहीं जाना । वेद गुणगान करने लगे ॥ १२ ( ग ) ॥

छं० -जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने ।

दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुजबल हने ॥

अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे ।

जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे ॥

हे सगुण और निर्गुणरूप! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त! हे राजाओंके शिरोमणि! आपकी जय हो । आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरोंको अपनी भुजाओंके बलसे मार डाला । आपने मनुष्य- अवतार लेकर संसारके भारको नष्ट करके अत्यन्त कठोर दुःखोंको भस्म कर दिया । हे दयालु! हे शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो । मैं शक्ति ( सीताजी ) -सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ॥१ ॥

तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे ।

भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे ॥

जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे ।

भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे ॥

हे हरे! आपकी दुस्तर मायाके वशीभूत होनेके कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल, कर्म और गुणोंसे भरे हुए ( उनके वशीभूत हुए) दिन-रात अनन्त भव ( आवागमन ) के मार्गमें भटक रहे हैं । हे नाथ! इनमेंसे जिनको आपने कृपा करके ( कृपादृष्टिसे ) देख लिया, वे [ मायाजनित ] तीनों प्रकारके दुःखोंसे छूट गये । हे जन्म-मरणके श्रमको काटनेमें

कुशल श्रीरामजी! हमारी रक्षा कीजिये । हम आपको नमस्कार करते हैं ॥२ ॥

जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी ।

ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥

बिस्वास कर सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे ।

जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे ॥

जिन्होंने मिथ्या ज्ञानके अभिमानमें विशेषरूपसे मतवाले होकर जन्म- मृत्यु [ के भय ] को हरनेवाली आपकी भक्तिका आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देवदुर्लभ ( देवताओंको भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, ब्रह्मा आदिके ) पदको पाकर भी हम उस पदसे नीचे गिरते देखते हैं । [ परन्तु ] जो सब आशाओंको छोड़कर आपपर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर

बिना ही परिश्रम भवसागरसे तर जाते हैं । हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं ॥३ ॥

पृष्ठ 924

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*:*९२२ रामचरितमानस

जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी ।

नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी ॥

ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे ।

पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे ॥

जो चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणोंकी कल्याणमयी रजका स्पर्श पाकर [ शिला बनी हुई ] गौतम ऋषिकी पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणोंके नखसे मुनियोंद्वारा वन्दित, त्रैलोक्यको पवित्र करनेवाली देवनदी गङ्गाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल, इन चिह्नोंसे युक्त जिन चरणोंमें वनमें फिरते समय काँटे चुभ जानेसे घट्टे पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलोंको नित्य भजते रहते हैं ॥४ ॥

अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने ।

षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥

फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे ।

पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे ॥

वेद- शास्त्रोंने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त ( प्रकृति) है; जो [ प्रवाहरूपसे ] अनादि है; जिसके चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत - से फूल हैं; जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकारके फल लगे हैं; जिसपर एक ही बेल है, जो उसीके आश्रित रहती है; जिसमें नित्य नये पत्ते और फूल निकलते रहते हैं; ऐसे संसारवृक्षस्वरूप ( विश्वरूपमें प्रकट ) आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ ५ ॥

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन पर ध्यावहीं ।

ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥

करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं ।

मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥

ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभवसे ही जाना जाता है और मनसे परे है -जो [ इस प्रकार कहकर उस ] ब्रह्मका ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किन्तु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं । हे करुणाके धाम प्रभो! हे सद्गुणोंकी खान! हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्मसे विकारोंको त्यागकर आपके चरणोंमें ही प्रेम करें ॥ ६ ॥

दो० – सब के देखत बेदह बिनती कीन्हि उदार ।

अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार ॥ १३ ( क ) ॥

पृष्ठ 925

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* उत्तरकाण्ड * ९ २३ वेदोंने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की । फिर वे अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मलोकको चले गये ॥ १३ ( क ) ॥

बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर ।

बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर ॥ १३ ( ख ) ॥

[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं- ] हे गरुड़जी! सुनिये, तब शिवजी वहाँ आये जहाँ श्रीरघुवीर थे और गद्गद वाणीसे स्तुति करने लगे । उनका शरीर पुलकावलीसे पूर्ण हो गया— ॥ १३ ( ख ) ॥

छं०– जय राम रमारमनं समनं । भवताप भयाकुल पाहि जनं ॥

अवधेस सुरेस रमेस बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥

हे राम! हे रमारमण ( लक्ष्मीकान्त )! हे जन्म- मरणके संतापका नाश करनेवाले! आपकी जय हो; आवागमनके भयसे व्याकुल इस सेवककी रक्षा कीजिये । हे अवधपति! हे देवताओंके स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये ॥ १ ॥

दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ॥

रजनीचर बूंद पतंग रहे । सर पावक तेज प्रचंड दहे ॥

हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावणका विनाश करके पृथ्वीके सब महान् रोगों ( कष्टों ) को दूर करनेवाले श्रीरामजी! राक्षससमूहरूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाणरूपी अग्नि प्रचण्ड तेजसे भस्म हो गये ॥२ ॥

महि मंडल मंडन चारुतरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ॥

मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥

आप पृथ्वीमण्डलके अत्यन्त सुन्दर आभूषण हैं; आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किये हुए हैं । महान् मद, मोह और ममतारूपी रात्रिके अन्धकारसमूहके नाश करनेके लिये आप सूर्यके तेजोमय किरणसमूह हैं ॥३ ॥

मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ॥

हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावर भूलि परे ॥

कामदेवरूपी भीलने मनुष्यरूपी हिरनोंके हृदयमें कुभोगरूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है । हे नाथ! हे [ पाप -तापका हरण करनेवाले ] हरे! उसे मारकर विषयरूपी वनमें भूले पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४ ॥

बहु रोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥

भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥

पृष्ठ 926

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* *९ २४ रामचरितमानस लोग बहुत - से रोगों और वियोगों ( दुःखों ) से मारे हुए हैं । ये सब आपके चरणोंके निरादरके फल हैं । जो मनुष्य आपके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें पड़े हैं ॥५ ॥

अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं ॥

अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें । प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥

जिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन ( उदास ) और दु:खी रहते हैं । और जिन्हें आपकी लीला-कथाका आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं ॥ ६ ॥

नहिं राग न लोभ न मान मदा । तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥

एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥

उनमें न राग ( आसक्ति) है, न लोभ; न मान है, न मद । उनको सम्पत्ति ( सुख) और विपत्ति (दुःख ) समान है । इसीसे मुनिलोग योग ( साधन ) का भरोसा सदाके लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नताके साथ आपके सेवक बन जाते हैं ॥ ७ ॥

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥

सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हृदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदरको समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वीपर विचरते हैं ॥८ ॥

मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ॥

तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥

हे मुनियोंके मनरूपी कमलके भ्रमर! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्रीरघुवीर! मैं आपको भजता हूँ ( आपकी शरण ग्रहण करता हूँ) । हे हरि! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता गुनहूँ । आपसीलजन्म- मरणरूपीकृपारोगकीपरमायतनंमहान् औषध। औरप्रनमामिअभिमानके शत्रुनिरंतरहैं ॥९ ॥ श्रीरमनं ॥

रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनंघनं । महिपाल बिलोकय दीनजनं ॥

आप गुण, शील और कृपाके परम स्थान हैं । आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ । हे रघुनन्दन! [ आप जन्म- मरण, सुख-दु:ख, राग-द्वेषादि ] द्वन्द्व- समूहोंका नाश कीजिये । हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले राजन्! इस दीन जनकी ओर भी दृष्टि डालिये ॥१० ॥

दो० - बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।

पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥ १९ ४ ( क ) ॥

पृष्ठ 927

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* उत्तरकाण्ड * ९ २५ मैं आपसे बार - बार यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलोंकी अचलभक्ति और आपके भक्तोंका सत्सङ्ग सदा प्राप्त हो । हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिये ॥ १४ ( क ) ॥

बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास ।

तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥ १४ ( ख ) ॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलासको चले गये । तब प्रभुने वानरोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले डेरे दिलवाये ॥ १४ ( ख ) ॥

सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिविध ताप भव भय दावनी ॥

महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥

हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [ सबको ] पवित्र करनेवाली है, [ दैहिक, दैविक, भौतिक ] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म- मृत्युके भयका नाश करनेवाली है । महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [निष्कामभावसे ] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥

जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥

सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥

और जो मनुष्य सकामभावसे सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं । वे जगत्में देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकालमें श्रीरघुनाथजीके परमधामको जाते हैं ॥ २ ॥

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥

खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥

इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [क्रमश: ] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति ( नित्य नये भोग ) पाते हैं । हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [ जन्म- मरणके ] भय और दुःखको हरनेवाली है ॥३ ॥

बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहँ सुंदर तरनी ॥

नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥

यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [ पार करनेके ] लिये सुन्दर नाव है । अवधपुरीमें नित नये मङ्गलोत्सव होते हैं । सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं ॥४ ॥

नित नइ प्रीति राम पद पंकज । सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥

मंगन बहु प्रकार पहिराए । द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥

श्रीरामजीके चरणकमलोंमें-जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं— सबकी नित्य नवीन प्रीति है । भिक्षुकोंको बहुत प्रकारके वस्त्राभूषण पहनाये गये और ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके दान पाये ॥ ५ ॥

पृष्ठ 928

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* *९ २६ रामचरितमानस

दो० – ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति ।

जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति ॥ १५ ॥

वानर सब ब्रह्मानन्दमें मग्न हैं । प्रभुके चरणोंमें सबका प्रेम है! उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और [ बात- की- बातमें ] छः महीने बीत गये ॥१५ ॥

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं । जिमि परद्रोह संत मन माहीं ॥

तब रघुपति सब सखा बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिरु नाए ॥

उन लोगोंको अपने घर भूल ही गये । [ जाग्रत्की तो बात ही क्या ] उन्हें स्वप्नमें भी घरकी सुध ( याद ) नहीं आती, जैसे संतोंके मनमें दूसरोंसे द्रोह करनेकी बात कभी नहीं आती । तब

श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया । सबने आकर आदरसहित सिर नवाया ॥१ ॥

परम प्रीतिप्रीति समीप बैठारे । भगत सुखद मृदु बचन उचारे ॥

तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई । मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई ॥

बड़े ही प्रेमसे श्रीरामजीने उनको अपने पास बैठाया और भक्तोंको सुख देनेवाले कोमल वचन कहे — तुमलोगोंने मेरी बड़ी सेवा की है । मुँहपर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ? ॥२ ॥

ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे । मम हित लागि भवन सुख त्यागे ॥

अनुज राज संपति बैदेही । देह गेह परिवार सनेही ॥

मेरे हितके लिये तुमलोगोंने घरोंको तथा सब प्रकारके सुखोंको त्याग दिया । इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो । छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र- ॥३ ॥

सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना । मृषा न कहउँ मोर यह बाना ।

सब कें प्रिय सेवक यह नीती । मोरें अधिक दास पर प्रीती ॥

ये सभी मुझे प्रिय हैं, परंतु तुम्हारे समान नहीं । मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है । सेवक सभीको प्यारे लगते हैं, यह नीति ( नियम ) है । [ पर ] मेरा तो दासपर [ स्वाभाविक ही] विशेष प्रेम है ॥४ ॥

दो० – अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम ।

सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम ॥ १६ ॥

हे सखागण! अब सब लोग घर जाओ; वहाँ दृढ़ नियमसे मुझे भजते रहना । मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करनेवाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना ॥१६ ॥

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । को हम कहाँ बिसरि तन गए ।

एकटक रहे जोरि कर आगे । सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे ॥

पृष्ठ 929

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* उत्तरकाण्ड * ९२७ प्रभुके वचन सुनकर सब -के - सब प्रेममग्न हो गये । हम कौन हैं और कहाँ हैं? यह देहकी सुध भी भूल गयी । वे प्रभुके सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये । अत्यन्त प्रेमके कारण कुछ कह नहीं सकते ॥१ ॥

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा ॥

प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं । पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥

प्रभुने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [ तब ] उन्हें अनेकों प्रकारसे विशेष ज्ञानका उपदेश दिया ।

प्रभुके सम्मुख वे कुछ कह नहीं सकते । बार- बार प्रभुके चरणकमलोंको देखते हैं ॥२ ॥

तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए ॥

सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए । बसन भरत निज हाथ बनाए ॥

तब प्रभुने अनेक रंगोंके अनुपम और सुन्दर गहने - कपड़े मँगवाये । सबसे पहले भरतजीने अपने हाथसे सँवारकर सुग्रीवको वस्त्राभूषण पहनाये ॥३ ॥

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए । लंकापति रघुपति मन भाए ॥

अंगद बैठ रहा नहिं डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥

फिर प्रभुकी प्रेरणासे लक्ष्मणजीने विभीषणजीको गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे । अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगहसे हिलेतक नहीं । उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभुने उनको नहीं बुलाया ॥ ४ ॥

दो० –जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ ।

हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ ॥ १७ ( क ) ॥

जाम्बवान् और नील आदि सबको श्रीरघुनाथजीने स्वयं भूषण- वस्त्र पहनाये । वे सब अपने हृदयोंमें श्रीरामचन्द्रजीके रूपको धारण करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले ॥ १७ ( क ) ॥

तब अंगद उठिनाइ सिरु सजल नयन कर जोरि ।

अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥ १७ ( ख ) ॥

तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रोंमें जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेमके रसमें डुबोये हुए ( मधुर ) वचन बोले ॥ १७ ( ख ) ॥

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो । दीन दयाकर आरत बंधो ॥

मरती बेर नाथ मोहि बाली । गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली ॥

हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुखके समुद्र! हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे आर्तोंके बन्धु! सुनिये । हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोदमें डाल गया था ॥१ ॥

पृष्ठ 930

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* *९२८ रामचरितमानस असरन सरन बिरदु संभारी ॥ मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ॥

मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता । जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता ॥

अतः हे भक्तोंके हितकारी! अपना अशरण- शरण विरद ( बाना ) याद करके मुझे त्यागिये नहीं । मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता, सब कुछ आप ही हैं । आपके चरणकमलोंको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? ॥२ ॥

तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा ॥

बालक ग्यान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ॥

हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु ( आप ) को छोड़कर घरमें मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बलसे हीन बालक तथा दीन सेवकको शरणमें रखिये ॥३ ॥

नीच टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ ॥

अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही ॥

मैं घरकी सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलोंको देख-देखकर भवसागरसे तर जाऊँगा । ऐसा कहकर वे श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े [ और बोले- ] हे प्रभो!

मेरी रक्षा कीजिये । हे नाथ! अब यह न कहिये कि तू घर जा ॥४ ॥

दो० – अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव ।

प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव ॥ १८ ( क ) ॥

अङ्गदके विनम्र वचन सुनकर करुणाकी सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजीने उनको उठाकर हृदयसे लगा लिया । प्रभुके नेत्रकमलोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया ॥ १८ ( क ) ॥

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ ।

बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥ १८ ( ख ) ॥

तब भगवान्ने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि ( रत्नोंके आभूषण) बालि- पुत्र अङ्गदको पहनाकर और बहुत प्रकारसे समझाकर उनकी विदाई की ॥ १८ ( ख ) ॥

भरत अनुज सौमित्रि समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥

अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा । फिरिफिरि चितव राम कीं ओरा ॥

भक्तकी करनीको याद करके भरतजी छोटे भाई शत्रुघ्नजी और लक्ष्मणजीसहित उनको पहुँचाने चले । अङ्गदके हृदयमें थोड़ा प्रेम नहीं है ( अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है ) । वे फिर-फिरकर श्रीरामजीकी ओर देखते हैं, ॥१ ॥

बार बार कर दंड प्रनामा । मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥

राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥