श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 931–940
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940
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* * उत्तरकाण्ड ९२९ और बार- बार दण्डवत् - प्रणाम करते हैं । मनमें ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहनेको कह दें । वे श्रीरामजीके देखनेकी, बोलनेकी, चलनेकी तथा हँसकर मिलनेकी रीतिको याद कर- करके सोचते हैं ( दुखी होते हैं ) ॥२ ॥
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी । चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥
अति आदर सब कपि पहुँचाए । भाइन्ह सहित भरत पुनि आए । किन्तु प्रभुका रुख देखकर, बहुत-से विनयवचन कहकर तथा हृदयमें चरण- कमलोंको रखकर वे चले । अत्यन्त आदरके साथ सब वानरोंको पहुँचाकर भाइयोंसहित भरतजी लौट आये ॥ ३ ॥
तब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥
दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥
तब हनुमान्जीने सुग्रीवके चरण पकड़कर अनेक प्रकारसे विनती की और कहा— हे देव! दस (कुछ ) दिन श्रीरघुनाथजीकी चरणसेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणोंके दर्शन करूँगा ॥४ ॥
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा । सेवहु जाइजाइ कृपाकृपा आगारा ॥
अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनहु हनुमंता ॥
[ सुग्रीवने कहा- ] हे पवनकुमार! तुम पुण्यकी राशि हो [जो भगवान्ने तुमको अपनी सेवामें
रख लिया ] । जाकर कृपाधाम श्रीरामजीकी सेवा करो । सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े ।
अङ्गदने कहा—हे हनुमान्! सुनो- ॥ ५ ॥
दो० – कहेहु दंडवत प्रभु मैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि ।
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥ १ ९ ( क ) ॥
मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभुसे मेरी दण्डवत् कहना और श्रीरघुनाथजीको बार- बार मेरी याद कराते रहना ॥ १ ९ ( क ) ॥
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत ।
तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत ॥ १ ९ ( ख ) ॥
ऐसा कहकर बालिपुत्र अङ्गद चले, तब हनुमान्जी लौट आये और आकर प्रभुसे उनका प्रेम वर्णन किया । उसे सुनकर भगवान् प्रेममग्न हो गये ॥ १ ९ ( ख ) ॥
कुलिस चाहि कठोर अति कोमल कुसुम चाहि ।
चित्त खगेस राम कर समुझि पर कहु काहि ॥। १ ९ ( ग ) ॥
[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे गरुड़जी! श्रीरामजीका चित्त वज्रसे भी अत्यन्त कठोर और
फूलसे भी अत्यन्त कोमल है । तब कहिये, वह किसकी समझमें आ सकता है? ॥ १ ९ ( ग ) ॥
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*:*९३० रामचरितमानस पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा ॥ दीन्हे भूषन बसन प्रसादा ॥
जाहु भवन मम सुमिरन करेहू । मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू ॥
फिर कृपालु श्रीरामजीने निषादराजको बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसादमें दिये । [ फिर कहा— ] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा कर्मसे धर्मके अनुसार चलना ॥ १ ॥
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता । सदा रहेहु पुर आवत जाता ॥
बचन सुनत उपजा सुख भारी । परेउ चरन भरि लोचन बारी ॥
तुम मेरे मित्र हो और भरतके समान भाई हो । अयोध्यामें सदा आते -जाते रहना । यह वचन सुनते ही उसको भारी सुख उत्पन्न हुआ । नेत्रोंमें [ आनन्द और प्रेमके आँसुओंका ] जल भरकर वह चरणोंमें गिर पड़ा ॥२ ॥
चरन नलिन उर धरि गृह आवा । प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा ॥
रघुपति चरित देखि पुरबासी । पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी ॥
फिर भगवान्के चरणकमलोंको हृदयमें रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियोंको उसने प्रभुका स्वभाव सुनाया । श्रीरघुनाथजीका यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार- बार कहते हैं कि सुखकी राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं ॥ ३ ॥
राम राज बैठें त्रैलोका । हरषित भए गए सब सोका ॥
बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे । कोई किसीसे वैर नहीं करता । श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता ( आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी ॥४ ॥
दो० – बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग ।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥ २० ॥
सब लोग अपने - अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद - मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं । उन्हें न किसी बातका भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है ॥ २० ॥
दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥
' राम- राज्य ' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते । सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति ( मर्यादा ) में तत्पर रहकर अपने - अपने धर्मका पालन करते हैं ॥१ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९ ३१
चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥
राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥
धर्म अपने चारों चरणों ( सत्य, शौच, दया और दान ) से जगत्में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है । पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति ( मोक्ष ) के अधिकारी हैं ॥२ ॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा । सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥
छोटी अवस्थामें मृत्यु नहीं होती, न किसीको कोई पीड़ा होती है । सभीके शरीर सुन्दर और नीरोग हैं । न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है । न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है ॥ ३ ॥
नर अरु नारि चतुर सब गुनी ॥सब निर्दभनिर्दभ धर्मरत पुनी ।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी । सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ॥
सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं । पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं । सभी गुणोंका आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं । सभी कृतज्ञ ( दूसरेके किये हुए उपकारको माननेवाले ) हैं, कपट-चतुराई ( धूर्तता ) किसीमें नहीं है ॥४ ॥
दो० – राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं ।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ॥ २१ ॥
[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये । श्रीरामके राज्यमें जड़, चेतन सारे जगत्में काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे उत्पन्न हुए दुःख किसीको भी नहीं होते ( अर्थात् इनके बन्धनमें कोई नहीं है ) ॥२१ ॥
भूमि सप्त सागर मेखला । एक भूप रघुपति कोसला ॥
भुअन अनेक रोम प्रति जासू । यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥
अयोध्यामें श्रीरघुनाथजी सात समुद्रोंकी मेखला ( करधनी ) -वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं । जिनके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपोंकी यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है ॥१ ॥
सो महिमा समुझत प्रभु केरी । यह बरनत हीनता घनेरी ॥
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी । फिरिएहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी ॥
बल्कि प्रभुकी उस महिमाको समझ लेनेपर तो यह कहनेमें [कि वे सात समुद्रोंसे घिरी हुई सप्तद्वीपमयी पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट्हैं ] उनकी बड़ी हीनता होती है । परन्तु हे गरुड़जी! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीलामें बड़ा प्रेम मानते हैं ॥२ ॥
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* *९३२ रामचरितमानस
सोउ जाने कर फल यह लीला । कहहिं महा मुनिबर दमसीला ॥
राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ॥
क्योंकि उस महिमाको भी जाननेका फल यह लीला ( इस लीलाका अनुभव ) ही है, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं । रामराज्यकी सुख-सम्पत्तिका वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते ॥ ३ ॥
सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
सभी नर- नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक हैं । सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं । इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं ॥ ४ ॥
दो० - दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र के राज ॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें दण्ड केवल संन्यासियोंके हाथोंमें है और भेद नाचनेवालोंके नृत्यसमाजमें है और ‘ जीतो ' शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही सुनायी पड़ता है ( अर्थात् राजनीतिमें शत्रुओंको जीतने तथा चोर- डाकुओं आदिको दमन करनेके लिये साम, दान, दण्ड और भेद– ये चार उपाय किये जाते हैं । रामराज्यमें कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिये ' जीतो ' शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही कहा जाता है । कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिये दण्ड किसीको नहीं होता; ' दण्ड ' शब्द केवल संन्यासियोंके हाथमें रहनेवाले दण्डके लिये ही रह गया है । तथा सभी अनुकूल होनेके कारण भेदनीतिकी आवश्यकता ही नहीं रह गयी; ' भेद ' शब्द केवल सुर- तालके भेदके लिये ही कामोंमें आता है । ) ॥ २२ ॥
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ॥
वनोंमें वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं । हाथी और सिंह [ वैर भूलकर ] एक साथ रहते हैं । पक्षी और पशु सभीने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढ़ा लिया है ॥१ ॥
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा । अभय चरहिं बन करहिं अनंदा ॥
सीतल सुरभि पवन बह मंदा । गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ॥
पक्षी कूजते ( मीठी बोली बोलते ) हैं, भाँति- भाँतिके पशुओंके समूह वनमें निर्भय विचरते और आनन्द करते हैं । शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है । भौरे पुष्पोंका रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं ॥२ ॥
लता बिटप मागें मधु चवहीं ॥ मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं ॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी । त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९ ३३ बेलें और वृक्ष माँगनेसे ही मधु ( मकरन्द ) टपका देते हैं । गौएँ मनचाहा दूध देती हैं । धरती
सदा खेतीसे भरी रहती है । त्रेतामें सत्ययुगकी करनी ( स्थिति ) हो गयी ॥३ ॥
प्रगटीं गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी ॥
सरिता सकल बहहिं बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी ॥
समस्त जगत्के आत्मा भगवान्को जगत्का राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खानें प्रकट कर दीं । सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं ॥ ४ ॥
सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं ॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा ॥
समुद्र अपनी मर्यादामें रहते हैं । वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं । सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं । दसों दिशाओंके विभाग ( अर्थात् सभी प्रदेश ) अत्यन्त प्रसन्न हैं ॥ ५ ॥
दो० - बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज ।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज ॥ २३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें चन्द्रमा अपनी [ अमृतमयी ] किरणोंसे पृथ्वीको पूर्ण कर देते हैं । सूर्य उतना ही तपते हैं जितनेकी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही ] जल देते हैं ॥२३ ॥
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे ॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर । गुनातीत अरु भोग पुरंदर ॥
प्रभु श्रीरामजीने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनेकों दान दिये । श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्गके पालनेवाले, धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, [ प्रकृतिजन्य सत्त्व, रज और तम ] तीनों गुणोंसे अतीत और भोगों ( ऐश्वर्य ) में इन्द्रके समान हैं ॥१ ॥
पति अनुकूल सदा रह सीता । सोभा खानि सुसील बिनीता ॥
जानति कृपासिंधु प्रभुताई । सेवति चरन कमल मन लाई ॥
शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पतिके अनुकूल रहती हैं । वे कृपासागर श्रीरामजीकी प्रभुता ( महिमा ) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं ॥२ ॥
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी । बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी ॥
निज कर गृह परिचरजा करई । रामचंद्र आयसु अनुसरई ॥
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* *९३४ रामचरितमानस यद्यपि घरमें बहुत - से ( अपार ) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवाकी विधिमें कुशल हैं, तथापि [ स्वामीकी सेवाका महत्त्व जाननेवाली ] श्रीसीताजी घरकी सब सेवा अपने ही हाथोंसे करती हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका अनुसरण करती हैं ॥ ३ ॥
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ । सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं । सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं ॥
कृपासागर श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकारसे सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवाकी विधिको जाननेवाली हैं । घरमें कौसल्या आदि सभी सासुओंकी सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बातका अभिमान और मद नहीं है ॥ ४ ॥
उमा( शिवजीरमाकहते हैंब्रह्मादि— ) हे उमा! बंदिताजगज्जननी ।रमाजगदंबा( सीताजी ) ब्रह्मा आदि देवताओंसेसंततमनिंदितावन्दित और॥ सदा अनिन्दित ( सर्वगुणसम्पन्न ) हैं ॥५ ॥
दो० – जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ ॥ २४ ॥
देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परन्तु वे उनकी ओर देखतीं भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी ( जानकीजी ) अपने [ महामहिम ] स्वभावको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दमें प्रीति करती हैं ॥ २४ ॥
सेवहिं सानकूल सब भाई । राम चरन रति अति अधिकाई ॥
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं । कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं ॥
सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं । श्रीरामजीके चरणोंमें उनकी अत्यन्त अधिक प्रीति है । वे सदा प्रभुका मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्रीरामजी कभी हमें कुछ सेवा करनेको कहें ॥१ ॥
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ॥
हरषित रहहिं नगर के लोगा । करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा ॥
श्रीरामचन्द्रजी भी भाइयोंपर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकारकी नीतियाँ सिखलाते हैं । नगरके लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकारके देवदुर्लभ ( देवताओंको भी कठिनतासे प्राप्त होने योग्य ) भोग भोगते हैं ॥२ ॥
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं । श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं ॥
दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए । लव कुस बेद पुरानन्ह गाए ॥
वे दिन- रात ब्रह्माजीको मनाते रहते हैं और [उनसे ] श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रीति चाहते हैं । सीताजीके लव और कुश -ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणोंने वर्णन किया है ॥ ३ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९३५
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर । हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर ॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे । भए रूप गुन सील घनेरे ॥
वे दोनों ही विजयी ( विख्यात योद्धा ), नम्र और गुणोंके धाम हैं और अत्यन्त सुन्दर हैं, मानो श्रीहरिके प्रतिबिम्ब ही हों । दो - दो पुत्र सभी भाइयोंके हुए, जो बड़े ही सुन्दर, गुणवान् और सुशील थे ॥ ४ ॥
दो० – ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार ।
सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥ २५ ॥
जो [ बौद्धिक ] ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे परे और अजन्मा हैं तथा माया, मन और गुणोंके परे हैं, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ॥२५ ॥
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन । बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन ॥
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥
प्रात: काल सरयूजीमें स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभामें बैठते हैं । वसिष्ठजी वेद और पुराणोंकी कथाएँ वर्णन करते हैं और श्रीरामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं ॥१ ॥
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं । देखि सकल जननीं सुख भरहीं ॥
भरत सत्रुहन दोनउ भाई । सहित पवनसुत उपबन जाई ॥
वे भाइयोंको साथ लेकर भोजन करते हैं । उन्हें देखकर सभी माताएँ आनन्दसे भर जाती हैं । भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमान्जीसहित उपवनोंमें जाकर, ॥ २ ॥
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा । कह हनुमान सुमति अवगाहा ॥
सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं । बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं ॥
वहाँ बैठकर श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछते हैं और हनुमान्जी अपनी सुन्दर बुद्धिसे उन गुणोंमें गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं । श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणोंको सुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार- बार कहलवाते हैं ॥ ३ ॥
सब कें गृह गृह होहिं पुराना । राम चरित पावन बिधि नाना ॥
नर अरु नारि राम गुन गानहिं । करहिं दिवस निसि जात न जानहिं ॥
सबके यहाँ घर- घरमें पुराणों और अनेक प्रकारके पवित्र रामचरित्रोंकी कथा होती है । पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजीका गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन- रातका बीतना भी नहीं जान पाते ॥४ ॥
दो० – अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज ।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज ॥ २६ ॥
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*• * ९ ३६ रामचरितमानस जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-सम्पत्तिके समुदायका वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥ २६ ॥
नारदादि सनकादि मुनीसा । दरसन लागि कोसलाधीसा ॥
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं । देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं ॥
नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलराज श्रीरामजीके दर्शनके लिये प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस [दिव्य ] नगरको देखकर वैराग्य भुला देते हैं ॥१ ॥
जातरूप मनि रचित अटारीं । नाना रंग रुचिर गच ढारीं ॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर । रचे कँगूरा रंग रंग बर ॥
[ दिव्य ] स्वर्ण और रत्नोंसे बनी हुई अटारियाँ हैं । उनमें [ मणि- रत्नोंकी ] अनेक रंगोंकी सुन्दर ढली हुई फर्रों हैं । नगरके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर परकोटा बना है, जिसपर सुन्दर रंग- बिरंगे कँगूरे बने हैं ॥२ ॥
नव ग्रह निकर अनीक बनाई । जनु घेरी अमरावति आई ॥
महि बहु रंग रचित गच काँचा । जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा ॥
मानो नवग्रहोंने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावतीको आकर घेर लिया हो । पृथ्वी ( सड़कों ) पर अनेकों रंगोंके ( दिव्य ) काँचों (रत्नों ) की गच बनायी ( ढाली ) गयी है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियोंके भी मन नाच उठते हैं ॥३ ॥
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत । कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत ॥
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं । गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं ॥
उज्वल महल ऊपर आकाशको चूम ( छू) रहे हैं । महलोंपरके कलश [ अपने दिव्य प्रकाशसे ] मानो सूर्य, चन्द्रमाके प्रकाशकी भी निन्दा ( तिरस्कार) करते हैं । [ महलोंमें ] बहुत -सी मणियोंसे रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घरमें मणियोंके दीपक शोभा पा रहे हैं ॥४ ॥
छं० – मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची ।
मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची ॥
सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे ।
प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे ॥
घरोंमें मणियोंके दीपक शोभा दे रहे हैं । मूँगोंकी बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं । मणियों ( रत्नों ) के खम्भे हैं । मरकतमणियों ( पन्नों ) से जड़ी हुई सोनेकी दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्माने खास तौरसे बनायी हों । महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं । उनमें सुन्दर स्फटिकके आँगन बने हैं । प्रत्येक द्वारपर बहुत-से खरादे हुए हीरोंसे जड़े हुए सोनेके किंवाड़ हैं ।
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* उत्तरकाण्ड * ९३७
दो०–चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ ।
राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ ॥ २७ ॥
घर - घरमें सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्रीरामजीके चरित्र बड़ी सुन्दरताके साथ सँवारकर अङ्कित किये हुए हैं । जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्तको चुरा लेते हैं ॥ २७ ॥
सुमन बाटिका सबहिं लगाईं । बिबिध भाँति करि जतन बनाईं ॥
लता ललित बहु जाति सुहाई । फूलहिं सदा बसंत कि नाईं ॥
सभी लोगोंने भिन्न - भिन्न प्रकारकी पुष्पोंकी वाटिकाएँ यत्न करके लगा रखी हैं, जिनमें बहुत जातियोंकी सुन्दर और ललित लताएँ सदा वसंतकी तरह फूलती रहती हैं ॥१ ॥
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर । मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर ॥
नाना खग बालकन्हि जिआए । बोलत मधुर उड़ात सुहाए ॥
भौरे मनोहर स्वरसे गुंजार करते हैं । सदा तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहती रहती है । बालकोंने बहुत -से पक्षी पाल रखे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़नेमें सुन्दर लगते हैं ॥२ ॥
मोर हंस सारस पारावत । भवननि पर सोभा अति पावत ॥
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं । बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं ॥
मोर, हंस, सारस और कबूतर घरोंके ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं । वे पक्षी [ मणियोंकी दीवारोंमें और छतमें ] जहाँ -तहाँ अपनी परछाईं देखकर [ वहाँ दूसरे पक्षी समझकर ] बहुत प्रकारसे मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं ॥३ ॥
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक । कहहु राम रघुपति जनपालक ॥
राज दुआर सकल बिधि चारू । बीथीं चौहट रुचिर बजारू ॥
बालक तोता - मैनाको पढ़ाते हैं कि कहो–' राम ' ' रघुपति ' ' जनपालक ' । राजद्वार सब प्रकारसे सुन्दर है । गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुन्दर हैं ॥४ ॥
छं० – बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए ।
जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए ॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते ।
सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे ॥
सुन्दर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता; वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं । जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँकी सम्पत्तिका वर्णन कैसे किया जाय? बजाज ( कपड़ेका व्यापार करनेवाले ), सराफ ( रुपये - पैसेका लेन- देन करनेवाले ) आदि वणिक् ( व्यापारी ) बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों । स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुन्दर हैं ।
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* *९३८ रामचरितमानस
दो० - उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर ।
बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर ॥ २८ ॥
नगरके उत्तर दिशामें सरयूजी बह रही हैं, जिनका जल निर्मल और गहरा है । मनोहर घाट बँधे हुए हैं, किनारेपर जरा भी कीचड़ नहीं है ॥२८ ॥
दूरि फराक रुचिर सो घाटा । जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा ॥
पनिघट परम मनोहर नाना । तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना ॥
अलग कुछ दूरीपर वह सुन्दर घाट है, जहाँ घोड़ों और हाथियोंके ठट्ट -के - ठट्ट जल पिया करते हैं । पानी भरनेके लिये बहुत - से [ जनाने ] घाट हैं, जो बड़े ही मनोहर हैं । वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते ॥ १ ॥
राजघाट सब बिधि सुंदर बर । मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर ॥
तीर तीर देवन्ह के मंदिर । चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर ॥
राजघाट सब प्रकारसे सुन्दर और श्रेष्ठ है, जहाँ चारों वर्णोंके पुरुष स्नान करते हैं । सरयूजीके किनारे - किनारे देवताओंके मन्दिर हैं, जिनके चारों ओर सुन्दर उपवन ( बगीचे ) हैं ॥ २ ॥
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी । बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी ॥
तीर तीर तुलसिका सुहाई । बूंद बूंद बहु मुनिन्ह लगाई ॥
नदीके किनारे कहीं -कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं । सरयूजीके किनारे - किनारे सुन्दर तुलसीजीके झुंड के झुंड बहुत- से पेड़ मुनियोंने लगा रखे हैं ॥ ३ ॥
पुर सोभा कछु बरनि न जाई । बाहेर नगर परम रुचिराई ॥
देखत पुरी अखिल अघ भागा । बन उपबन बापिका तड़ागा ॥
नगरकी शोभा तो कुछ कही नहीं जाती । नगरके बाहर भी परम सुन्दरता है । श्रीअयोध्यापुरीके दर्शन करते ही सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं । [ वहाँ] वन, उपवन, बावलियाँ और तालाब सुशोभित हैं ॥४ ॥
छं० - बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं ।
सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं ॥
बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं ।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं ॥
अनुपम बावलियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुन्दर [ रत्नोंकी ] सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनितक मोहित हो जाते हैं । [ तालाबोंमें ] अनेक रंगोंके कमल खिल रहे हैं, अनेकों पक्षी कूज रहे हैं और भौरे गुंजार कर रहे हैं । [ परम ] रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियोंकी [ सुन्दर बोलीसे ] मानो राह चलनेवालोंको बुला रहे हैं ।