श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 941–950
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950
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* उत्तरकाण्ड * ९३ ९
दो० – रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ ॥२ ९ ॥
स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् जहाँ राजा हों, उस नगरका कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और समस्त सुख-सम्पत्तियाँ अयोध्यामें छा रही हैं ॥२ ९ ॥
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं । बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥
भज प्रनत प्रतिपालक रामहि । सोभा सील रूप गुन धामहि ॥
लोग जहाँ - तहाँ श्रीरघुनाथजीके गुण गाते हैं और बैठकर एक- दूसरेको यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करनेवाले श्रीरामजीको भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजीको भजो ॥१ ॥
जलज बिलोचन स्यामल गातहि । पलक नयन इव सेवक त्रातहि ॥
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि । संत कंज बन रबि रनधीरहि ॥
कमलनयन और साँवले शरीरवालेको भजो । पलक जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने सेवकोंकी रक्षा करनेवालेको भजो । सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करने- वालेको भजो । संतरूपी कमलवनके [ खिलानेके ] लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजीको भजो ॥२ ॥
काल कराल ब्याल खगराजहि । नमत राम अकाम ममता जहि ॥
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि । मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥
कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो । निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजीको भजो । लोभ-मोहरूपी हरिनोंके समूहके नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो । कामदेवरूपी हाथीके लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो ॥ ३ ॥
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि । दनुज गहन घन दहन कृसानुहि ॥
जनकसुता समेत रघुबीरहि । कस न भजहु भंजन भव भीरहि ॥
संशय और शोकरूपी घने अन्धकारके नाश करनेवाले श्रीरामरूप सूर्यको भजो । राक्षसरूपी घने वनको जलानेवाले श्रीरामरूप अग्निको भजो । जन्म--मृत्युके भयको नाश करनेवाले श्रीजानकीजीसमेत श्रीरघुवीरको क्यों नहीं भजते? ॥४ ॥
बहु बासना मसक हिम रासिहि । सदा एकरस अज अबिनासिहि ॥
मुनि रंजन भंजन महि भारहि । तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि ॥
बहुत- सी वासनाओंरूपी मच्छरोंको नाश करनेवाले श्रीरामरूप हिमराशि ( बर्फके ढेर ) को भजो । नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजीको भजो । मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीका भार उतारनेवाले और तुलसीदासके उदार ( दयालु ) स्वामी श्रीरामजीको भजो ॥५ ॥
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* * ९४० रामचरितमानस
दो० - एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान ।
सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान ॥ ३० ॥
इस प्रकार नगरके स्त्री- पुरुष श्रीरामजीका गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्रीरामजी सदा सबपर अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं ॥ ३० ॥
जब ते राम प्रताप खगेसा । उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा ॥
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका । बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका ॥
[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं - ] हे पक्षिराज गरुड़जी! जबसे रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तबसे तीनों लोकोंमें पूर्ण प्रकाश भर गया है । इससे बहुतोंको सुख और बहुतोंके मनमें शोक हुआ ॥१ ॥
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी । प्रथम अबिद्या निसा नसानी ॥
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने । काम क्रोध कैरव सकुचाने ॥
जिन-जिनको शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ । [ सर्वत्र प्रकाश छा जानेसे ] पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हो गयी । पापरूपी उल्लू जहाँ - तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुँद गये ॥ २ ॥
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ । ए चकोर सुख लहहिं न काऊ ॥
मत्सर मान मोह मद चोरा । इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा ॥
भाँति- भाँतिके [ बन्धनकारक ] कर्म, गुण, काल और स्वभाव–- ये चकोर हैं, जो [ रामप्रतापरूपी सूर्यके प्रकाशमें ] कभी सुख नहीं पाते । मत्सर ( डाह ), मान, मोह और मदरूपी जो चोर हैं, उनका हुनर ( कला ) भी किसी ओर नहीं चल पाता ॥३ ॥
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना । ए पंकज बिकसे बिधि नाना ॥
सुख संतोष बिराग बिबेका । बिगत सोक ए कोक अनेका ॥
धर्मरूपी तालाबमें ज्ञान, विज्ञान-ये अनेकों प्रकारके कमल खिल उठे । सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक- ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गये ॥ ४ ॥
दो० – यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास ।
पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥ ३१ ॥
यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछेसे किया गया है, वे ( धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक ) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे ( अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाशको प्राप्त होते ( नष्ट हो जाते ) हैं ॥ ३१ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९४१
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥
सुंदर उपबनउपबन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥
एक बार भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमान्जीको साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये । वहाँके सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तोंसे युक्त थे ॥ १ ॥
जानि समय सनकादिक आए । तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥
ब्रह्मानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥
सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आये, जो तेजके पुञ्ज, सुन्दर गुण और शीलसे युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्दमें लवलीन रहते हैं । देखनेमें तो वे बालक लगते हैं, परन्तु हैं बहुत समयके ॥ २ ॥
रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥
मानो चारों वेद ही बालकरूप धारण किये हों । वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं । दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं । उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजीकी चरित्र- कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं ॥३ ॥
तहाँ रहे सनकादि भवानी । जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥
राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥
[ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गये थे ( वहींसे चले आ रहे थे ) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे । श्रेष्ठ मुनिने श्रीरामजीकी बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करनेमें उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ीसे अग्नि उत्पन्न होती है ॥४ ॥
दो० –- देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह ।
स्वागत पूँछ पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥ ३२ ॥
सनकादि मुनियोंको आते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने हर्षित होकर दण्डवत् की और स्वागत ( कुशल ) पूछकर प्रभुने [ उनके ] बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया ॥ ३२ ॥
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई । सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥
फिर हनुमान्जीसहित तीनों भाइयोंने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ । मुनि श्रीरघुनाथजीकी
अतुलनीय छबि देखकर उसीमें मग्न हो गये । वे मनको रोक न सके ॥१ ॥
स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥
एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥
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* *९४२ रामचरितमानस वे जन्म- मृत्यु [ के चक्र ] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरताके धाम श्रीरामजीको टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते । और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं ॥ २ ॥
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा ॥
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे ॥
उनकी [ प्रेमविह्वल ] दशा देखकर [ उन्हींकी भाँति ] श्रीरघुनाथजीके नेत्रोंसे भी [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया । तदनन्तर प्रभुने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियोंको बैठाया और परम मनोहर वचन कहे- ॥ ३ ॥
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा । तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा ॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा । बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा ॥
हे मुनीश्वरो! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ । आपके दर्शनोंहीसे [ सारे ] पाप नष्ट हो जाते हैं । बड़े ही भाग्यसे सत्संगकी प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म- मृत्युका चक्र नष्ट हो जाता है ॥४ ॥
दो० - संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ ।
कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥ ३३ ॥
संतका संग मोक्ष ( भव-बन्धनसे छूटने ) का और कामीका संग जन्म--मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है । संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [ आदि ] सभी सद्ग्रन्थ ऐसा कहते हैं ॥३३ ॥
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी । पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥
जय भगवंत अनंत अनामय । अनघ अनेक एक करुनामय ॥
प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीरसे स्तुति करने लगे-हे भगवन्! आपकी जय हो । आप अन्तरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक ( सब रूपोंमें प्रकट ), एक ( अद्वितीय ) और करुणामय हैं ॥१ ॥
जय निर्गुन जय जय गुन सागर । सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥
जय इंदिरा रमन जय भूधर । अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥
हे निर्गुण! आपकी जय हो । हे गुणके समुद्र! आपकी जय हो, जय हो । आप सुखके धाम, [ अत्यन्त ] सुन्दर और अति चतुर हैं । हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो । हे पृथ्वीके धारण करनेवाले! आपकी जय हो । आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और शोभाकी खान हैं ॥२ ॥
ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद ॥
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन । नाम अनेक अनाम निरंजन ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९४३ आप ज्ञानके भण्डार, [ स्वयं] मानरहित और [ दूसरोंको ] मान देनेवाले हैं । वेद और पुराण आपका पावन सुन्दर यश गाते हैं । आप तत्त्वके जाननेवाले, की हुई सेवाको माननेवाले और अज्ञानका नाश करनेवाले हैं । हे निरञ्जन ( मायारहित)! आपके अनेकों ( अनन्त ) नाम हैं और कोई नाम नहीं है ( अर्थात् आप सब नामोंके परे हैं ) ॥३ ॥
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय । बससि सदा हम कहुँ परिपालय ॥
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय । हृदि बसि राम काम मद गंजय ॥
आप सर्वरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं और सबके हृदयरूपी घरमें सदा निवास करते हैं; [ अत: ] आप हमारा परिपालन कीजिये । [ राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म- मृत्यु आदि ] द्वन्द्व, विपत्ति और जन्म- मृत्युके जालको काट दीजिये । हे रामजी! आप हमारे हृदयमें बसकर काम और मदका नाश कर दीजिये ॥ ४ ॥
दो० – परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम ।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥ ३४ ॥
आप परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम और मनकी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले हैं । हे श्रीरामजी! हमको अपनी अविचल प्रेमा-भक्ति दीजिये ॥ ३४ ॥
देहु भगति रघुपति अति पावनि । त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि ॥
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु । होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु ॥
हे रघुनाथजी! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकारके तापों और जन्म-मरणके क्लेशोंका नाश करनेवाली भक्ति दीजिये । हे शरणागतोंकी कामना पूर्ण करनेके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षरूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये ॥ १ ॥
भव बारिधि कुंभज रघुनायक । सेवत सुलभ सकल सुख दायक ॥
मन संभव दारुन दुख दारय । दीनबंधु समता बिस्तारय ॥
हे रघुनाथजी! आप जन्म- मृत्युरूप समुद्रको सोखनेके लिये अगस्त्य मुनिके समान हैं । आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं । हे दीनबन्धो! मनसे उत्पन्न दारुण दुःखोंका नाश कीजिये और [ हममें ] समदृष्टिका विस्तार कीजिये ॥२ ॥
आस त्रास इरिषादि निवारक । बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥
भूप मौलि मनि मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥
आप [ विषयोंकी ] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्यके विस्तार करनेवाले हैं । हे राजाओंके शिरोमणि एवं पृथ्वीके भूषण श्रीरामजी! संसृति ( जन्म- मृत्युके प्रवाह ) -रूपी नदीके लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये ॥३ ॥
मुनि मन मानस हंस निरंतर । चरन कमल बंदित अज संकर ॥
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक । काल करम सुभाउ गुन भच्छक ॥
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९४४ * रामचरितमानस * हे मुनियोंके मनरूपी मानसरोवरमें निरन्तर निवास करनेवाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं । आप रघुकुलके केतु, वेदमर्यादाके रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [ -रूप बन्धनों ] के भक्षक ( नाशक ) हैं ॥४ ॥
तारन तरन हरन सब दूषन । तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन ॥
आप तरन- तारन ( स्वयं तरे हुए और दूसरोंको तारनेवाले ) तथा सब दोषोंको हरनेवाले हैं । तीनों लोकोंके विभूषण आप ही तुलसीदासके स्वामी हैं ॥५ ॥
दो०- बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ ।
ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ ॥ ३५ ॥
प्रेमसहित बार- बार स्तुति करके और सिर नवाकर तथा अपना अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको गये ॥३५ ॥
सनकादिक बिधि लोकसिधाए । भ्रातन्ह राम चरन सिर नाए ॥
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं ॥
सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको चले गये । तब भाइयोंने श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाया । सब भाई
प्रभुसे पूछते सकुचाते हैं । [ इसलिये ] सब हनुमान्जीकी ओर देख रहे हैं ॥१ ॥
सुनी चहहिं प्रभु मुख कै बानी । जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी ॥
अंतरजामी प्रभु सभ जाना । बूझत कहहु काह हनुमाना ॥
वे प्रभुके श्रीमुखकी वाणी सुनना चाहते हैं, जिसे सुनकर सारे भ्रमोंका नाश हो जाता है । अन्तर्यामी प्रभु सब जान गये और पूछने लगे- कहो हनुमान्! क्या बात है? ॥२ ॥
जोरि पानि कह तब हनुमंता । सुनहु दीनदयाल भगवंता ॥
नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं । प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं ॥
तब हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले- हे दीनदयालु भगवान्! सुनिये । हे नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मनमें सकुचा रहे हैं ॥३ ॥
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ । भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ ॥
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना । सुनहु नाथ प्रनतारति हरना ॥
[भगवान्ने कहा- ] हनुमान्! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो । भरतके और मेरे बीचमें कभी भी कोई अन्तर ( भेद ) है? प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने उनके चरण पकड़ लिये [ और कहा— ] हे नाथ! हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! सुनिये ॥४ ॥
दो० – नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह ।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह ॥ ३६ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९४५ हे नाथ! न तो मुझे कुछ सन्देह है और न स्वप्नमें भी शोक और मोह है । हे कृपा और आनन्दके समूह! यह केवल आपकी ही कृपाका फल है ॥३६ ॥
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई । मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई ॥
॥संतन्ह कै महिमा रघुराई ॥ बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई तथापि हे कृपानिधान! मैं आपसे एक धृष्टता करता हूँ । मैं सेवक हूँ और आप सेवकको सुख देनेवाले हैं [ इससे मेरी धृष्टताको क्षमा कीजिये और मेरे प्रश्नका उत्तर देकर सुख दीजिये ] । हे रघुनाथजी! वेद- पुराणोंने संतोंकी महिमा बहुत प्रकारसे गायी है ॥१ ॥
श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई । तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई ॥
सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन । कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन ॥
आपने भी अपने श्रीमुखसे उनकी बड़ाई की है और उनपर प्रभु ( आप ) का प्रेम भी बहुत है । हे प्रभो! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ । आप कृपाके समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञानमें अत्यन्त निपुण हैं ॥ २ ॥
संत असंत भेद बिलगाई । प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई ॥
संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता । अगनित श्रुति पुरान बिख्याता ॥
हे शरणागतका पालन करनेवाले! संत और असंतके भेद अलग-अलग करके मुझको समझाकर कहिये । [ श्रीरामजीने कहा- ] हे भाई! संतोंके लक्षण ( गुण ) असंख्य हैं, जो वेद और पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं ॥३ ॥
संत असंतन्हि कै असि करनी । जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥
काटइ परसु मलय सुनु भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥
संत और असंतोंकी करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दनका आचरण होता है । हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दनको काटती है [ क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षोंको काटना है ]; किन्तु चन्दन [ अपने स्वभाववश] अपना गुण देकर उसे ( काटनेवाली कुल्हाड़ीको) सुगन्धसे सुवासित कर देता है ॥४ ॥
दो० –ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड ।
अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड ॥३७ ॥
इसी गुणके कारण चन्दन देवताओंके सिरोंपर चढ़ता है और जगत्का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ीके मुखको यह दण्ड मिलता है कि उसको आगमें जलाकर फिर घनसे पीटते हैं ॥३७ ॥
बिषय अलंपट सील गुनाकर । पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी । लोभामरष हरष भय त्यागी ॥
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* *९४६ रामचरितमानस संत विषयोंमें लम्पट ( लिप्त ) नहीं होते, शील और सद्गुणोंकी खान होते हैं । उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता । वे [ सबमें, सर्वत्र, सब समय ] समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है, वे मदसे रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भयका त्याग किये हुए रहते हैं ॥ १ ॥
कोमलचित दीनन्ह पर दाया । मन बच क्रम मम भगति अमाया ॥
सबहि मानप्रद आपु अमानी । भरत प्रान सम मम ते प्रानी ॥
उनका चित्त बड़ा कोमल होता है । वे दीनोंपर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्मसे मेरी निष्कपट ( विशुद्ध ) भक्ति करते हैं । सबको सम्मान देते हैं, पर स्वयं मानरहित होते हैं । हे भरत! वे प्राणी ( संतजन ) मेरे प्राणोंके समान हैं ॥२ ॥
बिगत काम मम नाम परायन । सांति बिरति बिनती मुदितायन ॥
सीतलता सरलता मयत्री । द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री ॥
उनको कोई कामना नहीं होती । वे मेरे नामके परायण होते हैं । शान्ति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नताके घर होते हैं । उनमें शीतलता, सरलता, सबके प्रति मित्रभाव और ब्राह्मणके चरणोंमें प्रीति होती है, जो धर्मोंको उत्पन्न करनेवाली है ॥ ३ ॥
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर । जानेहु तात संत संतत फुर ॥
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥
हे तात! ये सब लक्षण जिसके हृदयमें बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना । जो शम ( मनके निग्रह ), दम ( इन्द्रियोंके निग्रह ), नियम और नीतिसे कभी विचलित नहीं होते और मुखसे कभी कठोर वचन नहीं बोलते; ॥४ ॥
दो० -– निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज ।
ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुखपुंज ॥ ३८ ॥
जिन्हें निन्दा और स्तुति ( बड़ाई ) दोनों समान हैं और मेरे चरणकमलोंमें जिनकी ममता है, गुणों धाम और सुखकी राशि संतजन मुझे प्राणोंके समान प्रिय हैं ॥ ३८ ॥
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ । भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमि कपिलहि घालइ हरहाई ॥
अब असंतों ( दुष्टों ) का स्वभाव सुनो; कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिये । उनका संग सदा दुःख देनेवाला होता है । जैसे हरहाई ( बुरी जातिकी ) गाय कपिला ( सीधी और दुधार ) गायको अपने संगसे नष्ट कर डालती है ॥१ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९४७
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी । जरहिं सदा पर संपति देखी ॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई । हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥
दुष्टोंके हृदयमें बहुत अधिक संताप रहता है । वे परायी सम्पत्ति ( सुख ) देखकर सदा जलते रहते हैं । वे जहाँ कहीं दूसरेकी निन्दा सुन पाते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्तेमें पड़ी निधि ( खजाना ) पा ली हो ॥२ ॥
काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥
बयरु अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ॥
वे काम, क्रोध, मद और लोभके परायण तथा निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापोंके घर होते हैं । झूठइवे बिना ही कारणलेनासब किसीसेझूठवैर किया करतेदेनाहैं ॥जोझूठइभलाई करताभोजनहै उसके साथझूठभी बुराई करतेचबेनाहैं ॥ ३ ॥॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अहि हृदय कठोरा ॥
उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है । झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है ( अर्थात् वे लेने - देनेके व्यवहारमें झूठका आश्रय लेकर दूसरोंका हक मार लेते हैं अथवा झूठी डींग हाँका करते हैं कि हमने लाखों रुपये ले लिये, करोड़ोंका दान कर दिया । इसी प्रकार खाते हैं चनेकी रोटी और कहते हैं कि आज खूब माल खाकर आये । अथवा चबेना चबाकर रह जाते हैं और कहते हैं हमें बढ़िया भोजनसे वैराग्य है, इत्यादि । मतलब यह कि वे सभी बातोंमें झूठ ही बोला करते हैं । ) जैसे मोर [ बहुत मीठा बोलता है, परन्तु उस ] का हृदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान् विषैले साँपोंको भी खा जाता है । वैसे ही वे भी ऊपरसे मीठे वचन बोलते हैं [ परन्तु हृदयके बड़े ही निर्दयी होते हैं ] ॥ ४ ॥
दो० – पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥ ३ ९ ॥
वे दूसरोंसे द्रोह करते हैं और परायी स्त्री, पराये धन तथा परायी निन्दामें आसक्त रहते हैं । वे पामर और पापमय मनुष्य नर- शरीर धारण किये हुए राक्षस ही हैं ॥३ ९ ॥
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन । सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न ॥
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥
लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है ( अर्थात् लोभहीसे वे सदा घिरे हुए रहते हैं ) । वे पशुओंके समान आहार और मैथुनके ही परायण होते हैं, उन्हें यमपुरका भय नहीं लगता । यदि किसीकी बड़ाई सुन पाते हैं, तो वे ऐसी [ दुःखभरी ] साँस लेते हैं मानो उन्हें जूड़ी आ गयी हो ॥ १ ॥
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* *९४८ रामचरितमानस
जब काहू कै देखहिं बिपती । सुखी भए मानहुँ जग नृपती ॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी I। लंपट काम लोभ अति क्रोधी ॥
और जब किसीकी विपत्ति देखते हैं, तब ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत्भरके राजा हो गये हों । वे स्वार्थपरायण, परिवारवालोंके विरोधी, काम और लोभके कारण लम्पट और अत्यन्त क्रोधी होते हैं ॥ २ ॥
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं । आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा । संत संग हरि कथा न भावा ॥
वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसीको नहीं मानते । आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, [ साथ ही अपने संगसे ] दूसरोंको भी नष्ट करते हैं । मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं । उन्हें न संतोंका संग अच्छा लगता है, न भगवान्की कथा ही सुहाती है ॥३ ॥
अवगुन सिंधु मंदमति कामी । बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा । दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा ॥
वे अवगुणोंके समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी ( रागयुक्त ), वेदोंके निन्दक और जबर्दस्ती पराये धनके स्वामी ( लूटनेवाले ) होते हैं । वे दूसरोंसे द्रोह तो करते ही हैं; परन्तु ब्राह्मण-द्रोह विशेषतासे करते हैं । उनके हृदयमें दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे [ ऊपरसे ] सुन्दर वेष धारण किये रहते हैं ॥ ४ ॥
दो० – ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेताँ नाहिं ।
द्वापर कछुक बूंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं ॥ ४० ॥
ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेतामें नहीं होते । द्वापरमें थोड़े - से होंगे और कलियुगमें तो इनके झुंड- के - झुंड होंगे ॥४० ॥
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥
हे भाई! दूसरोंकी भलाईके समान कोई धर्म नहीं है और दूसरोंको दुःख पहुँचानेके समान कोई नीचता ( पाप ) नहीं है । हे तात! समस्त पुराणों और वेदोंका यह निर्णय ( निश्चित सिद्धान्त ) मैंने तुमसे कहा है, इस बातको पण्डितलोग जानते हैं ॥१ ॥
नर सरीर धरि जे पर पीरा । करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥
करहिं मोह बस नर अघ नाना । स्वारथ रत परलोक नसाना ॥
मनुष्यका शरीर धारण करके जो लोग दूसरोंको दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म- मृत्युके महान् संकट सहने पड़ते हैं । मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसीसे उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है ॥२ ॥