श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 951–960

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960

पृष्ठ 951

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* * उत्तरकाण्ड ९४९

कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥

अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥

हे भाई! मैं उनके लिये कालरूप ( भयंकर ) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मोंका [ यथायोग्य ] फल देनेवाला हूँ! ऐसा विचारकर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार [ के प्रवाह ] को दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं ॥३ ॥

त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक । भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥

संत असंतन्ह के गुन भाषे । ते न परहिं भवजिन्ह लखि राखे ॥

इसीसे वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियोंके नायक मुझको भजते हैं । [ इस प्रकार ] मैंने संतों और असंतोंके गुण कहे । जिन लोगोंने इन गुणोंको समझ रखा है, वे जन्म- मरणके चक्करमें नहीं पड़ते ॥४ ॥

दो० – सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक ।

गुन यह उभय न देखिअहिं देखि सो अबिबेक ॥ ४१ ॥

हे तात! सुनो, मायासे रचे हुए ही अनेक ( सब ) गुण और दोष हैं ( इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है ) । गुण ( विवेक ) इसीमें है कि दोनों ही न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है ॥ ४१ ॥

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई ॥ हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥

करहिं बिनय अति बारहिं बारा । हनूमान हियँ हरष अपारा ॥

भगवान्के श्रीमुखसे ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गये । प्रेम उनके हृदयोंमें समाता नहीं ।

वे बार- बार बड़ी विनती करते हैं । विशेषकर हनुमान्जीके हृदयमें अपार हर्ष है ॥१ ॥

पुनि रघुपति निज मंदिर गए । एहि बिधि चरित करत नित नए ॥

बार बार नारद मुनि आवहिं । चरित पुनीत राम के गावहिं ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी अपने महलको गये । इस प्रकार वे नित्य नयी लीला करते हैं । नारद मुनि अयोध्यामें बार-बार आते हैं और आकर श्रीरामजीके पवित्र चरित्र गाते हैं ॥२ ॥

नित नव चरित देखि मुनि जाहीं । ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥

सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं । पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥

मुनि यहाँसे नित्य नये - नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रह्मलोकमें जाकर सब कथा कहते हैं । ब्रह्माजी सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं [और कहते हैं - ] हे तात! बार-बार श्रीरामजीके गुणका गान करो ॥ ३ ॥

सनकादिक नारदहि सराहहिं । जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं ॥

सुनि गुन गान समाधि बिसारी । सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥

पृष्ठ 952

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* *९५० रामचरितमानस सनकादि मुनि नारदजीकी सराहना करते हैं । यद्यपि वे ( सनकादि ) मुनि ब्रह्मनिष्ठ हैं, परन्तु श्रीरामजीका गुणगान सुनकर वे भी अपनी ब्रह्मसमाधिको भूल जाते हैं और आदरपूर्वक उसे सुनते हैं । वे [ रामकथा सुननेके ] श्रेष्ठ अधिकारी हैं ॥४ ॥

दो० -जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान ।

जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान ॥ ४२ ॥

सनकादि मुनि-जैसे जीवन्मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ पुरुष भी ध्यान ( ब्रह्म - समाधि) छोड़कर श्रीरामजीके चरित्र सुनते हैं । यह जानकर भी जो श्रीहरिकी कथासे प्रेम नहीं करते, उनके हृदय [सचमुच ही ] पत्थर [के समान ] हैं ॥ ४२ ॥

एक बार रघुनाथ बोलाए । गुर द्विज पुरबासी सब आए ॥

बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन । बोले बचन भगत भव भंजन ॥

एक बार श्रीरघुनाथजीके बुलाये हुए गुरु वसिष्ठजी, ब्राह्मण और अन्य सब नगरनिवासी सभामें आये । जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण तथा अन्य सब सज्जन यथायोग्य बैठ गये, तब भक्तोंके जन्म-मरणको मिटानेवाले श्रीरामजी वचन बोले- ॥ १ ॥

सुनहु सकल पुरजन मम बानी । कहउँ न कछु ममता उर आनी ॥

नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई । सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥

हे समस्त नगरनिवासियो! मेरी बात सुनिये । यह बात मैं हृदयमें कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ । न अनीतिकी बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुता ही है । इसलिये [ संकोच और भय छोड़कर, ध्यान देकर ] मेरी बातोंको सुन लो और [फिर ] यदि तुम्हें अच्छी लगे, तो उसके अनुसार करो! ॥२ ॥

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई । मम अनुसासन मानै जोई ॥

जौं अनीति कछु भाषौं भाई । तौ मोहि बरजहु भय बिसराई ॥

वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञामाने । हे भाई! यदि मैं कुछ अनीतिकी बात कहूँ तो भय भुलाकर ( बेखटके ) मुझे रोक देना ॥ ३ ॥

बड़ें भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥

बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिला है । सब ग्रन्थोंने यही कहा है कि यह शरीर देवताओंको भी दुर्लभ है ( कठिनतासे मिलता है ) । यह साधनका धाम और मोक्षका दरवाजा है । इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया, ॥ ४ ॥

पृष्ठ 953

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* उत्तरकाण्ड * ९ ५१

दो० –-सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ ॥ ४३ ॥

वह परलोकमें दुःख पाता है, सिर पीट - पीटकर पछताता है तथा [ अपना दोष न समझकर ] कालपर, कर्मपर और ईश्वरपर मिथ्या दोष लगाता है ॥ ४३ ॥

एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥

नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं । पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥

हे भाई! इस शरीर प्राप्त होनेका फल विषयभोग नहीं है । [ इस जगत्के भोगोंकी तो बात ही क्या ] स्वर्गका भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्तमें दुःख देनेवाला है । अतः जो लोग मनुष्यशरीर पाकर विषयोंमें मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतको बदलकर विष ले लेते हैं ॥१ ॥

ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई । गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ॥

आकर चारि लच्छ चौरासी । जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥

जो पारसमणिको खोकर बदलेमें घुँघची ले लेता है, उसको कभी कोई भला ( बुद्धिमान् ) नहीं कहता । यह अविनाशी जीव [ अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज] चार खानों और चौरासी लाख योनियोंमें चक्कर लगाता रहता है ॥२ ॥

फिरत सदा माया कर प्रेरा । काल कर्म सुभाव गुन घेरा ॥

कबहुँक करि करुना नर देही । देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥

मायाकी प्रेरणासे काल, कर्म, स्वभाव और गुणसे घिरा हुआ ( इनके वशमें हुआ) यह सदा भटकता रहता है । बिना ही कारण स्नेह करनेवाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्यका शरीर देते हैं ॥३ ॥

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥

करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥

यह मनुष्यका शरीर भवसागर [से तारने ] के लिये बेड़ा ( जहाज) है । मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है । सद्गुरु इस मजबूत जहाजके कर्णधार ( खेनेवाले ) हैं । इस प्रकार दुर्लभ ( कठिनतासे मिलनेवाले ) साधन सुलभ होकर ( भगवत्कृपासे सहज ही ) उसे प्राप्त हो गये हैं, ॥४ ॥

दो० –जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ ।

सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥ ४४ ॥

जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागरसे न तरे, वह कृतघ्न और मन्द- बुद्धि है और आत्महत्या करनेवालेकी गतिको प्राप्त होता है ॥४४ ॥

पृष्ठ 954

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*:*९५२ रामचरितमानस

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू । सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू ॥

सुलभ सुखद मारग यह भाई । भगति मोरि पुरान श्रुति गाई ॥

यदि परलोकमें और यहाँ दोनों जगह सुख चाहते हो, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदयमें दृढ़तासे पकड़ रखो । हे भाई! यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वेदोंने इसे गाया है ॥ १ ॥

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका । साधन कठिन न मन कहुँ टेका ॥

करत कष्ट बहु पावइ कोऊ । भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ ॥

ज्ञान अगम ( दुर्गम ) है, [ और ] उसकी प्राप्तिमें अनेकों विघ्न हैं । उसका साधन कठिन है और उसमें मनके लिये कोई आधार नहीं है । बहुत कष्ट करनेपर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होनेसे मुझको प्रिय नहीं होता ॥२ ॥

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥

पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । सतसंगति संसृति कर अंता ॥

भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखोंकी खान है । परन्तु सत्संग ( संतोंके संग ) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते । और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते । सत्संगति ही संसृति ( जन्म- मरणके चक्र ) का अन्त करती है ॥ ३ ॥

पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा । मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा ॥

सानुकूल तेहि पर मुनि देवा । जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा ॥

जगत्में पुण्य एक ही है, [उसके समान] दूसरा नहीं । वह है– मन, कर्म और वचनसे ब्राह्मणोंके चरणोंकी पूजा करना । जो कपटका त्याग करके ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, उसपर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं ॥४ ॥

दो० - औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि ।

संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥ ४५ ॥

और भी एक गुप्त मत है, मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि शङ्करजीके भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता ॥ ४५ ॥

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा । जोग न मख जप तप उपवासा ॥

सरल सुभाव न मन कुटिलाई । जथा लाभ संतोष सदाई ॥

कहो तो, भक्तिमार्गमें कौन -सा परिश्रम है? इसमें न योगकी आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवासकी! [ यहाँ इतना ही आवश्यक है कि ] सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसीमें सदा सन्तोष रखे ॥१ ॥

पृष्ठ 955

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* उत्तरकाण्ड * ९५३

मोर दास कहाइ नर आसा । करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥

बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई । एहि आचरन बस्य मैं भाई ॥

मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्योंकी आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है? ( अर्थात् उसकी मुझपर आस्था बहुत ही निर्बल है । ) बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ? हे भाइयो! मैं तो इसी आचरणके वशमें हूँ ॥ २ ॥

बैर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥

अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥

न किसीसे वैर करे, न लड़ाई- झगड़ा करे, न आशा रखे, न भय ही करे । उसके लिये सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं । जो कोई भी आरम्भ ( फलकी इच्छासे कर्म ) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है ( जिसकी घरमें ममता नहीं है ), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो [ भक्ति करनेमें ] निपुण और विज्ञानवान् है ॥ ३ ॥

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा । तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥

भगति पच्छ हठ नहिं सठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥

संतजनोंके संसर्ग ( सत्संग) से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मनमें सब विषय यहाँतक कि स्वर्ग और मुक्तितक [ भक्तिके सामने ] तृणके समान हैं, जो भक्तिके पक्षमें हठ करता है, पर [ दूसरेके मतका खण्डन करनेकी ] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतर्कोंको दूर बहा दिया है, ॥४ ॥

दो० – मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह ।

ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥ ४६ ॥

जो मेरे गुणसमूहोंके और मेरे नामके परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [ परमात्मारूप ] परमानन्दराशिको प्राप्त है ॥ ४६ ॥

सुनत सुधासम बचन राम के । गहे सबनि पद कृपाधाम के ॥

जननि जनक गुर बंधु हमारे । कृपा निधान प्रान ते प्यारे ॥

श्रीरामचन्द्रजीके अमृतके समान वचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये [ और कहा— ] हे कृपानिधान! आप हमारे माता, पिता, गुरु, भाई सब कुछ हैं और प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं ॥१ ॥

तनु धनु धाम राम हितकारी । सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी ॥

असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ । मातु पिता स्वारथ रत ओऊ ॥

पृष्ठ 956

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* * ९५४ रामचरितमानस और हे शरणागतके दुःख हरनेवाले रामजी! आप ही हमारे शरीर, धन, घर-द्वार और सभी प्रकारसे हित करनेवाले हैं । ऐसी शिक्षा आपके अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता । माता-पिता [हितैषी हैं और शिक्षा भी देते हैं ] परन्तु वे भी स्वार्थपरायण हैं [ इसलिये ऐसी परम हितकारी शिक्षा नहीं देते] ॥ २ ॥

हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥

स्वारथ मीत सकल जग माहीं । सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं ॥

हे असुरोंके शत्रु! जगत्में बिना हेतुके ( निःस्वार्थ ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं — एक आप, दूसरे आपके सेवक । जगत्में [ शेष ] सभी स्वार्थके मित्र हैं । हे प्रभो! उनमें स्वप्नमें भी परमार्थका भाव नहीं है ॥ ३ ॥

सब के बचन प्रेम रस साने । सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने ॥

निज निज गृह गए आयसु पाई । बरनत प्रभु बतकही सुहाई ॥

सबके प्रेमरसमें सने हुए वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी हृदयमें हर्षित हुए । फिर आज्ञा पाकर सब प्रभुकी सुन्दर बातचीतका वर्णन करते हुए अपने - अपने घर गये ॥४ ॥

दो० –उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप ।

ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप ॥ ४७ ॥

[शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! अयोध्यामें रहनेवाले पुरुष और स्त्री सभी कृतार्थस्वरूप हैं; जहाँ स्वयं सच्चिदानन्दघन ब्रह्म श्रीरघुनाथजी राजा हैं ॥४७ ॥

एक बार बसिष्ट मुनि आए । जहाँ राम सुखधाम सुहाए ॥

अति आदर रघुनायक कीन्हा । पद पखारि पादोदक लीन्हा ॥

एक बार मुनि वसिष्ठजी वहाँ आये जहाँ सुन्दर सुखके धाम श्रीरामजी थे । श्रीरघुनाथजीने उनका बहुत ही आदर- सत्कार किया और उनके चरण धोकर चरणामृत लिया ॥१ ॥

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ॥

देखि देखि आचरन तुम्हारा । होत मोह मम हृदयँ अपारा ॥

मुनिने हाथ जोड़कर कहा - हे कृपासागर श्रीरामजी! मेरी कुछ विनती सुनिये! आपके आचरणों ( मनुष्योचित चरित्रों ) को देख-देखकर मेरे हृदयमें अपार मोह ( भ्रम ) होता है ॥२ ॥

महिमा अमिति बेद नहिं जाना । मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना ॥

उपरोहित्य कर्म अति मंदा । बेद पुरान सुमृति कर निंदा ॥

हे भगवन्! आपकी महिमाकी सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते । फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ? पुरोहितीका कर्म ( पेशा ) बहुत ही नीचा है । वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निन्दा करते हैं ॥३ ॥

पृष्ठ 957

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* उत्तरकाण्ड * ९ ५५

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही । कहा लाभ आगें सुत तोही ॥

परमातमा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुल भूषन भूपा ॥

जब मैं उसे ( सूर्यवंशकी पुरोहितीका काम) नहीं लेता था, तब ब्रह्माजीने मुझे कहा था--हे पुत्र! इससे तुमको आगे चलकर बहुत लाभ होगा । स्वयं ब्रह्म परमात्मा मनुष्यरूप धारण कर रघुकुलके भूषण राजा होंगे ॥४ ॥

दो० – तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान ।

जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन ॥ ४८ ॥

तब मैंने हृदयमें विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी कर्मसे पा जाऊँगा; तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है ॥४८ ॥

जप तप नियम जोग निज धर्मा । श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा ॥

ग्यान दया दम तीरथ मज्जन । जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन ॥

जप, तप, नियम, योग, अपने - अपने [ वर्णाश्रमके ] धर्म, श्रुतियोंसे उत्पन्न ( वेदविहित ) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम ( इन्द्रियनिग्रह ), तीर्थस्नान आदि जहाँतक वेद और संतजनोंने धर्म कहे हैं [ उनके करनेका ] – ॥१ ॥

आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥

तव पद पंकज प्रीति निरंतर । सब साधन कर यह फल सुंदर ॥

[ तथा ] हे प्रभो! अनेक तन्त्र, वेद और पुराणोंके पढ़ने और सुननेका सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनोंका भी यही एक सुन्दर फल है कि आपके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रेम हो ॥२ ॥

छूटइ मल कि मलाहि के धोएँ । घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ ॥

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥

मैलसे धोनेसे क्या मैल छूटता है? जलके मथनेसे क्या कोई घी पा सकता है? [ उसी प्रकार ] हे रघुनाथजी! प्रेम- भक्तिरूपी [ निर्मल ] जलके बिना अन्तःकरणका मल कभी नहीं जाता ॥ ३ ॥

सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित । सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित ॥

दच्छ सकल लच्छन जुत सोई । जाकें पद सरोज रति होई ॥

वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणोंका घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणोंसे युक्त है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है ॥४ ॥

पृष्ठ 958

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* *९५६ रामचरितमानस

दो० –नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु ।

जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु ॥ ४ ९ ॥

हे नाथ! हे श्रीरामजी! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये । प्रभु ( आप ) के चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मान्तरमें भी कभी न घटे ॥ ४ ९ ॥

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए । कृपासिंधु के मन अति भाए ॥

हनूमान भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ॥

ऐसा कहकर मुनि वसिष्ठजी घर आये । वे कृपासागर श्रीरामजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे । तदनन्तर सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीने हनुमान्जी तथा भरतजी आदि भाइयोंको साथ लिया ॥ १ ॥

पुनि कृपाल पुर बाहेर गए । गज रथ तुरग मगावत भए ॥

देखि कृपा करि सकल सराहे । दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे ॥

और फिर कृपालु श्रीरामजी नगरके बाहर गये और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगवाये । उन्हें देखकर, कृपा करके प्रभुने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिसने चाहा, उस-उसको उचित जानकर दिया ॥ २ ॥

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ सीतल अवँराई ॥

भरत दीन्ह निज बसन डसाई ।। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई ॥

संसारके सभी श्रमोंको हरनेवाले प्रभुने [ हाथी, घोड़े आदि बाँटनेमें ] श्रमका अनुभव किया और [ श्रम मिटानेको ] वहाँ गये जहाँ शीतल अमराई ( आमोंका बगीचा ) थी । वहाँ भरतजीने अपना वस्त्र बिछा दिया । प्रभु उसपर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे ॥३ ॥

मारुतसुत तब मारुत करई । पुलक बपुष लोचन जल भरई ॥

हनूमान सम नहिं बड़भागी । नहिं कोउ राम चरन अनुरागी ॥

गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥

उस समय पवनपुत्र हनुमानजी पवन ( पंखा ) करने लगे । उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया । [शिवजी कहने लगे- ] हे गिरिजे! हनुमान्जीके समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवाकी [ स्वयं ] प्रभुने अपने श्रीमुखसे बार-बार बड़ाई की है॥४-५ ॥

दो०- तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन ।

गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन ॥ ५० ॥

पृष्ठ 959

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* उत्तरकाण्ड * ९५७ उसी अवसरपर नारद मुनि हाथमें वीणा लिये हुए आये । वे श्रीरामजीकी सुन्दर और नित्य नवीन रहनेवाली कीर्ति गाने लगे ॥ ५० ॥

मामवलोकय पंकज लोचन । कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥

नील तामरस स्याम काम अरि । हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥

कृपापूर्वक देख लेनेमात्रसे शोकके छुड़ानेवाले हे कमलनयन! मेरी ओर देखिये ( मुझपर भी कृपादृष्टि कीजिये ) । हे हरि! आप नील कमलके समान श्यामवर्ण और कामदेवके शत्रु महादेवजीके हृदयकमलके मकरन्द ( प्रेम- रस ) के पान करनेवाले भ्रमर हैं ॥ १ ॥

जातुधान बरूथ बल भंजन । मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥

भूसुर ससि नव बूंद बलाहक । असरन सरन दीन जन गाहक ॥

आप राक्षसोंकी सेनाके बलको तोड़नेवाले हैं । मुनियों और संतजनोंको आनन्द देनेवाले और पापोंके नाश करनेवाले हैं । ब्राह्मणरूपी खेतीके लिये आप नये मेघसमूह हैं और शरणहीनोंको शरण देनेवाले तथा दीन जनोंको अपने आश्रयमें ग्रहण करनेवाले हैं ॥२ ॥

भुजबल बिपुल भार महि खंडित । खर दूषन बिराध बध पंडित ॥

रावनारि सुखरूप भूपबर । जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥

अपने बाहुबलसे पृथ्वीके बड़े भारी बोझको नष्ट करनेवाले, खर-दूषण और विराधके वध करनेमें कुशल, रावणके शत्रु, आनन्दस्वरूप, राजाओंमें श्रेष्ठ और दशरथके कुलरूपी कुमुदिनीके चन्द्रमा श्रीरामजी! आपकी जय हो ॥ ३ ॥

सुजस पुरान बिदित निगमागम । गावत सुर मुनि संत समागम ॥

कारुनीक ब्यलीक मद खंडन । सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥

आपका सुन्दर यश पुराणों, वेदोंमें और तन्त्रादि शास्त्रोंमें प्रकट है । देवता, मुनि और संतोंके समुदाय उसे गाते हैं । आप करुणा करनेवाले और झूठे मदका नाश करनेवाले, सब प्रकारसे कुशल ( निपुण ) श्रीअयोध्याजीके भूषण ही हैं ॥ ४ ॥

कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥

आपका नाम कलियुगके पापोंको मथ डालनेवाला और ममताको मारनेवाला है । हे तुलसीदासके प्रभु! शरणागतकी रक्षा कीजिये ॥५ ॥

दो० - प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम ।

सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम॥५१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंका प्रेमपूर्वक वर्णन करके मुनि नारदजी शोभाके समुद्र प्रभुको हृदयमें धरकर जहाँ ब्रह्मलोक है वहाँ चले गये ॥५१ ॥

पृष्ठ 960

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* *९५८ रामचरितमानस

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा । मैं सब कही मोरि मति जथा ॥

राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ॥

[शिवजी कहते हैं— ] हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली । श्रीरामजीके चरित्र सौ करोड़ [ अथवा ] अपार हैं । श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते ॥ १ ॥

राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ॥

जल सीकर महि रज गनि जाहीं । रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥

भगवान् श्रीराम अनन्त हैं; उनके गुण अनन्त हैं; जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं । जलकी बूँदें और पृथ्वीके रज- कण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्रीरघुनाथजीके चरित्र वर्णन करनेसे नहीं चुकते ॥२ ॥

बिमल कथा हरि पद दायनी । भगति होइ सुनि अनपायनी ॥

उमा कहिउँ सब कथा सुहाई । जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई ॥

यह पवित्र कथा भगवान्‌के परमपदको देनेवाली है । इसके सुननेसे अविचल भक्ति प्राप्त होती है । हे उमा! मैंने वह सब सुन्दर कथा कही जो काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीको सुनायी थी ॥ ३ ॥

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी । अब का कहौं सो कहहु भवानी ॥

सुनि सुभ कथा उमा हरषानी । बोली अति बिनीत मृदु बानी ॥

मैंने श्रीरामजीके कुछ थोड़े -से गुण बखानकर कहे हैं । हे भवानी! सो कहो, अब और क्या कहूँ? श्रीरामजीकी मङ्गलमयी कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुईं और अत्यन्त विनम्र तथा कोमल वाणी बोलीं- ॥४ ॥

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी । सुनेउँ राम गुन भव भय हारी ॥

हे त्रिपुरारि! मैं धन्य हूँ, धन्य- धन्य हूँ जो मैंने जन्म--मृत्युके भयको हरण करनेवाले श्रीरामजीके गुण ( चरित्र) सुने ॥५ ॥

दो० – तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह ।

जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह ॥ ५२ ( क ) ॥

हे कृपाधाम! अब आपकी कृपासे मैं कृतकृत्य हो गयी । अब मुझे मोह नहीं रह गया । हे प्रभु! मैं सच्चिदानन्दघन प्रभु श्रीरामजीके प्रतापको जान गयी ॥ ५२ ( क ) ॥

नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर ।

श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥ ५२ ( ख ) ॥