श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 961–970
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970
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* उत्तरकाण्ड * ९५ ९ हे नाथ! आपका मुखरूपी चन्द्रमा श्रीरघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है । हे मतिधीर! मेरा मन कर्णपुटोंसे उसे पीकर तृप्त नहीं होता ॥ ५२ ( ख ) ॥
राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ॥
। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ ॥जीवनमुक्त महामुनि जेऊ श्रीरामजीके चरित्र सुनते - सुनते जो तृप्त हो जाते हैं ( बस कर देते हैं ), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं । जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान्के गुण निरन्तर सुनते रहते हैं ॥ १ ॥
भव सागर चह पार जो पावा । राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा ॥
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा । श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा ॥
जो संसाररूपी सागरका पार पाना चाहता है, उसके लिये तो श्रीरामजीकी कथा दृढ़ नौकाके समान है । श्रीहरिके गुणसमूह तो विषयी लोगोंके लिये भी कानोंको सुख देनेवाले और मनको आनन्द देनेवाले हैं ॥ २ ॥
श्रवनवंत अस को जग माहीं । जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं ॥
ते जड़ जीव निजात्मक घाती । जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती ॥
जगत्में कानवाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजीके चरित्र न सुहाते हों । जिन्हें श्रीरघुनाथजीकी कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्माकी हत्या करनेवाले हैं ॥ ३ ॥
हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा । सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा ॥
तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई । कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई ॥
हे नाथ! आपने श्रीरामचरित्रमानसका गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया । आपने जो यह कहा कि यह सुन्दर कथा काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीसे कही थी—॥४ ॥
दो० -– बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह ।
बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह ॥ ५३ ॥
सो कौएका शरीर पाकर भी काकभुशुण्डि वैराग्य, ज्ञान और विज्ञानमें दृढ़ हैं, उनका श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है और उन्हें श्रीरघुनाथजीकी भक्ति भी प्राप्त है, इस बातका मुझे परम सन्देह हो रहा है ॥ ५३ ॥
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी । कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी ॥
धर्मसील कोटिक महँ कोई ॥ बिषय बिमुख बिराग रत होई ॥
हे त्रिपुरारि! सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्मके व्रतका धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयसे विमुख ( विषयोंका त्यागी ) और वैराग्यपरायण होता है ॥ १ ॥
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* *९६० रामचरितमानस
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई । सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ॥
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ । जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ ॥
श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तोंमें कोई एक ही सम्यक् ( यथार्थ ) ज्ञानको प्राप्त करता है । और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है । जगत्में कोई विरला ही ऐसा ( जीवन्मुक्त ) होगा ॥ २ ॥
तिन्ह सहस्र महुँ सब सुख खानी । दुर्लभ ब्रह्म लीन बिग्यानी ॥
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी । जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी ॥
हजारों जीवन्मुक्तोंमें भी सब सुखोंकी खान, ब्रह्ममें लीन विज्ञानवान् पुरुष और भी दुर्लभ है । धर्मात्मा, वैराग्यवान्, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मलीन— ॥ ३ ॥
सब ते सो दुर्लभ सुरराया । राम भगति रत गत मद माया ॥
सो हरिभगति काग किमि पाई । बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई ॥
इन सबमें भी हे देवाधिदेव महादेवजी! वह प्राणी अत्यन्त दुर्लभ है जो मद और मायासे रहित होकर श्रीरामजीकी भक्तिके परायण हो । हे विश्वनाथ! ऐसी दुर्लभ हरिभक्तिको कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये ॥४ ॥
दो० – राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर ।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर ॥ ५४ ॥
हे नाथ! कहिये, [ ऐसे ] श्रीरामपरायण, ज्ञाननिरत, गुणधाम और धीरबुद्धि भुशुण्डिजीने कौएका शरीर किस कारण पाया? ॥ ५४ ॥
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा । कहहु कृपाल काग कहँ पावा ॥
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी । कहहु मोहि अति कौतुक भारी ॥
हे कृपालु! बताइये, उस कौएने प्रभुका यह पवित्र और सुन्दर चरित्र कहाँ पाया? और हे कामदेवके शत्रु! यह भी बताइये, आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी । हरि सेवक अति निकट निवासी ॥
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई । सुनी कथा मुनि निकर बिहाई ॥
गरुड़जी तो महान् ज्ञानी, सद्गुणोंकी राशि, श्रीहरिके सेवक और उनके अत्यन्त निकट रहनेवाले ( उनके वाहन ही ) हैं । उन्होंने मुनियोंके समूहको छोड़कर, कौएसे जाकर हरिकथा किस कारण सुनी? ॥२ ॥
कहहु कवन बिधि भा संबादा । दोउ हरिभगत काग उरगादा ॥
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई । बोले सिव सादर सुख पाई ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९ ६१ कहिये, काकभुशुण्डि और गरुड़ इन दोनों हरिभक्तोंकी बातचीत किस प्रकार हुई? पार्वतीजीकी सरल, सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी सुख पाकर आदरके साथ बोले- ॥३ ॥
धन्य सती पावन मति तोरी । रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी ॥
सुनहु परम पुनीत इतिहासा । जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा ॥
हे सती! तुम धन्य हो; तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त पवित्र है । श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें तुम्हारा कम प्रेम नहीं है ( अत्यधिक प्रेम है ) । अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुननेसे सारे लोकके भ्रमका नाश हो जाता है ॥४ ॥
उपजइ राम चरन बिस्वासा । भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा ॥
तथा श्रीरामजीके चरणोंमें विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जाता है ॥५ ॥
दो० - ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ ।
सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ ॥ ५५ ॥
पक्षिराज गरुड़जीने भी जाकर काकभुशुण्डिजीसे प्रायः ऐसे ही प्रश्न किये थे । हे उमा! मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो ॥ ५५ ॥
मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि । सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचन ॥
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा । सती नाम तब रहा तुम्हारा ॥
मैंने जिस प्रकार वह भव (जन्म- मृत्यु ) से छुड़ानेवाली कथा सुनी, हे सुमुखी! हे सुलोचनी! वह प्रसंग सुनो । पहले तुम्हारा अवतार दक्षके घर हुआ था । तब तुम्हारा नाम सती था ॥ १ ॥
दच्छ जग्य तव भा अपमाना । तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना ॥
मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा । जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा ॥
दक्षके यज्ञमें तुम्हारा अपमान हुआ । तब तुमने अत्यन्त क्रोध करके प्राण त्याग दिये थे; और
फिर मेरे सेवकोंने यज्ञ विध्वंस कर दिया था । वह सारा प्रसंग तुम जानती ही हो ॥२ ॥
तब अति सोच भयउ मन मोरें । दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें ॥
सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा । कौतुक देखत फिरउँ बेरागा ॥
तब मेरे मनमें बड़ा सोच हुआ और हे प्रिये! मैं तुम्हारे वियोगसे दुखी हो गया । मैं विरक्तभावसे सुन्दर वन, पर्वत, नदी और तालाबोंका कौतुक ( दृश्य ) देखता फिरता था ॥३ ॥
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी । नील सैल एक सुंदर भूरी ॥
तासु कनकमय सिखर सुहाए । चारि चारु मोरे मन भाए ॥
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* *९ ६२ रामचरितमानस सुमेरु पर्वतकी उत्तर दिशामें, और भी दूर, एक बहुत ही सुन्दर नील पर्वत है । उसके सुन्दर स्वर्णमय शिखर हैं, [ उनमेंसे ] चार सुन्दर शिखर मेरे मनको बहुत ही अच्छे लगे ॥४ ॥
तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला । बट पीपर पाकरी रसाला ॥
सैलोपरि सर सुंदर सोहा । मनि सोपान देखि मन मोहा ॥
उन शिखरोंमें एक - एकपर बरगद, पीपल, पाकर और आमका एक-एक विशाल वृक्ष है । पर्वतके ऊपर एक सुन्दर तालाब शोभित है; जिसकी मणियोंकी सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है ॥ ५ ॥
दो० –- सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग ।
कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग ॥५६ ॥
उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है; उसमें रंग- बिरंगे बहुत-से कमल खिले हुए हैं; हंसगण मधुर स्वरसे बोल रहे हैं और भौंरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं ॥५६ ॥
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई । तासु नास कल्पांत न होई ॥
माया कृत गुन दोष अनेका । मोह मनोज आदि अबिबेका ॥
उस सुन्दर पर्वतपर वही पक्षी ( काकभुशुण्डि ) बसता है । उसका नाश कल्पके अन्तमें भी नहीं होता । मायारचित अनेकों गुण-दोष, मोह, काम आदि अविवेक, ॥ १ ॥
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं । तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं ॥
तहँ बसि हरिहि भजड़ जिमि कागा । सो सुनु उमा सहित अनुरागा ॥
जो सारे जगत्में छा रहे हैं, उस पर्वतके पास भी कभी नहीं फटकते । वहाँ बसकर जिस प्रकार वह काक हरिको भजता है, हे उमा! उसे प्रेमसहित सुनो ॥२ ॥
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई । जाप जग्य पाकरि तर करई ॥
आँब छाँह कर मानस पूजा । तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा ॥
वह पीपलके वृक्षके नीचे ध्यान धरता है । पाकरके नीचे जपयज्ञ करता है । आमकी छायामें मानसिक पूजा करता है । श्रीहरिके भजनको छोड़कर उसे दूसरा कोई काम नहीं है ॥३ ॥
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा । आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा ॥
राम चरित बिचित्र बिधि नाना । प्रेम सहित कर सादर गाना ॥
बरगदके नीचे वह श्रीहरिकी कथाओंके प्रसङ्ग कहता है । वहाँ अनेकों पक्षी आते और कथा सुनते हैं । वह विचित्र रामचरित्रको अनेकों प्रकारसे प्रेमसहित आदरपूर्वक गान करता है ॥४ ॥
सुनहिं सकल मति बिमल मराला । बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला ॥
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा । उर उपजा आनंदआनंद बिसेषा ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९ ६३ सब निर्मल बुद्धिवाले हंस, जो सदा उस तालाबपर बसते हैं, उसे सुनते हैं । जब मैंने वहाँ जाकर यह कौतुक ( दृश्य ) देखा, तब मेरे हृदयमें विशेष आनन्द उत्पन्न हुआ ॥५ ॥
दो० – तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास ।
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास ॥५७ ॥
तब मैंने हंसका शरीर धारण कर कुछ समय वहाँ निवास किया और श्रीरघुनाथजीके गुणोंको आदरसहित सुनकर फिर कैलासको लौट आया ॥५७ ॥
गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा । मैं जेहि समय गयउँ खग पासा ॥
अब सो कथा सुनहु जेहि हेतू । गयउ काग पहिं खग कुल केतू ॥
हे गिरिजे! मैंने वह सब इतिहास कहा कि जिस समय मैं काकभुशुण्डिके पास गया था । अब वह कथा सुनो जिस कारणसे पक्षिकुलके ध्वजा गरुड़जी उस काकके पास गये थे ॥१ ॥
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा । समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा ॥
इंद्रजीत कर आपु बँधायो । तब नारद मुनि गरुड़ पठायो ॥
जब श्रीरघुनाथजीने ऐसी रणलीला की जिस लीलाका स्मरण करनेसे मुझे लज्जा होती है— मेघनादके हाथों अपनेको बँधा लिया- तब नारद मुनिने गरुड़को भेजा ॥२ ॥
बंधन काटि गयो उरगादा । उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा ॥
प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती । करत बिचार उरग आराती ॥
सर्पोंके भक्षक गरुड़जी बन्धन काटकर गये, तब उनके हृदयमें बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ । प्रभुके बन्धनको स्मरण करके सर्पोंके शत्रु गरुड़जी बहुत प्रकारसे विचार करने लगे- ॥ ३ ॥
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा । माया मोह पार परमीसा ॥
सो अवतार सुनेउँ जग माहीं । देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं ॥
जो व्यापक, विकाररहित, वाणीके पति और माया-मोहसे परे ब्रह्म परमेश्वर हैं, मैंने सुना था कि जगत्में उन्हींका अवतार है । पर मैंने उस ( अवतार) का प्रभाव कुछ भी नहीं देखा ॥ ४ ॥
दो० –- भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम ।
खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम ॥ ५८ ॥
जिनका नाम जपकर मनुष्य संसारके बन्धनसे छूट जाते हैं उन्हीं रामको एक तुच्छ राक्षसने नागपाशसे बाँध लिया ॥ ५८ ॥
नाना भाँति मनहि समुझावा । प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा ॥
खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई । भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई ॥
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* *९६४ रामचरितमानस गरुड़जीने अनेकों प्रकारसे अपने मनको समझाया । पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ, हृदयमें भ्रम और भी अधिक छा गया । [ सन्देहजनित ] दुःखसे दुखी होकर, मनमें कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गये ॥१ ॥
ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं । कहेसि जो संसय निज मन माहीं ॥
सुनि नारदहि लागि अति दाया । सुनु खग प्रबल राम कै माया ॥
व्याकुल होकर वे देवर्षि नारदजीके पास गये और मनमें जो सन्देह था, वह उनसे कहा । उसे सुनकर नारदको अत्यन्त दया आयी । [ उन्होंने कहा- ] हे गरुड़! सुनिये, श्रीरामजीकी माया बड़ी ही बलवती है ॥२ ॥
जो ग्यान्हि कर चित अपहरई । बरिआईं बिमोह मन करई ॥
जेहिं बहु बार नचावा मोही । सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही ॥
जो ज्ञानियोंके चित्तको भी भलीभाँति हरण कर लेती है और उनके मनमें जबर्दस्ती बड़ा भारी मोह उत्पन्न कर देती है, तथा जिसने मुझको भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षिराज! वही माया आपको भी व्याप गयी है ॥ ३ ॥
। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें ॥महामोह उपजा उर तोरें
चतुरानन पहिं जाहु खगेसा । सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा ॥
हे गरुड़! आपके हृदयमें बड़ा भारी मोह उत्पन्न हो गया है । यह मेरे समझानेसे तुरंत नहीं मिटेगा । अतः हे पक्षिराज! आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँ जिस कामके लिये आदेश मिले, वही कीजियेगा ॥ ४ ॥
दो० - अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान ।
हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान ॥५ ९ ॥
ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारदजी श्रीरामजीका गुणगान करते हुए और बारंबार श्रीहरिकी मायाका बल वर्णन करते हुए चले ॥५९ ॥
तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ । निज संदेह सुनावत भयऊ ॥
सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा । समुझि प्रताप प्रेम अति छावा ॥
तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना सन्देह उन्हें कह सुनाया । उसे सुनकर ब्रह्माजीने श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाया और उनके प्रतापको समझकर उनके अत्यन्त प्रेम छा गया ॥१ ॥
मन महुँ करइ बिचार बिधाता । माया बस कबि कोबिद ग्याता ॥
हरि माया कर अमिति प्रभावा । बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९ ६५ ब्रह्माजी मनमें विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी मायाके वश हैं । भगवान्की मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझतकको अनेकों बार नचाया है ॥२ ॥
अग जगमय जग मम उपराजा । नहिं आचरज मोह खगराजा ॥
तब बोले बिधि गिरा सुहाई ॥ जान महेस राम प्रभुताई ॥
यह सारा चराचर जगत् तो मेरा रचा हुआ है । जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब पक्षिराज गरुड़को मोह होना कोई आश्चर्य [ की बात ] नहीं है । तदनन्तर ब्रह्माजी सुन्दर वाणी बोले- श्रीरामजीकी महिमाको महादेवजी जानते हैं ॥ ३ ॥
बैनतेय संकर पहिं जाहू । तात अनत पूछहु जनि काहू ॥
तहँ होइहि तव संसय हानी । चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी ॥
हे गरुड़! तुम शंकरजीके पास जाओ । हे तात! और कहीं किसीसे न पूछना । तुम्हारे सन्देहका नाश वहीं होगा । ब्रह्माजीका वचन सुनते ही गरुड़ चल दिये ॥ ४ ॥
दो० – परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास ।
जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास ॥ ६० ॥
तब बड़ी आतुरता ( उतावली ) से पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये । हे उमा! उस समय मैं कुबेरके घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं ॥ ६० ॥
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा । पुनि आपन संदेह सुनावा ॥
सुनिता करि बिनती मृदु बानी । प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी ॥
गरुड़ने आदरपूर्वक मेरे चरणोंमें सिर नवाया और फिर मुझको अपना सन्देह सुनाया । हे भवानी! उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा– ॥१ ॥
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही । कवन भाँति समुझावौं तोही ॥
तबहिं होइ सब संसय भंगा । जब बहु काल करिअ सतसंगा ॥
हे गरुड़! तुम मुझे रास्तेमें मिले हो । राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ? सब सन्देहोंका तो तभी नाश हो जब दीर्घ कालतक सत्संग किया जाय ॥२ ॥
सुनिअ तहाँ हरिकथा सुहाई । नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई ॥
जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना । प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना ॥
और वहाँ ( सत्संगमें ) सुन्दर हरिकथा सुनी जाय, जिसे मुनियोंने अनेकों प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अन्तमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ही प्रतिपाद्य प्रभु हैं ॥३ ॥
नित हरि कथा होत जहँ भाई । पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई ॥
जाइहि सुनत सकल संदेहा । राम चरन होइहि अति नेहा ॥
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* * ९ ६६ रामचरितमानस हे भाई! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो । उसे सुनते ही तुम्हारा सब सन्देह दूर हो जायगा और तुम्हें श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम होगा ॥४ ॥
दो० - बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग ।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग ॥ ६१ ॥
सत्संगके बिना हरिकी कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोहके गये बिना श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें दृढ़ ( अचल) प्रेम नहीं होता ॥ ६१ ॥
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा । किएँ जोग तप ग्यान बिरागा ॥
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥
बिना प्रेमके केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादिके करनेसे श्रीरघुनाथजी नहीं मिलते । [ अतएव तुम सत्संगके लिये वहाँ जाओ जहाँ ] उत्तर दिशामें एक सुन्दर नील पर्वत है । वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं ॥१ ॥
राम भगति पथ परम प्रबीना । ग्यानी गुन गृह बहु कालीना ॥
राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर ॥
वे रामभक्तिके मार्गमें परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणोंके धाम हैं और बहुत कालके हैं । वे निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कहते रहते हैं, जिसे भाँति- भाँतिके श्रेष्ठ पक्षी आदरसहित सुनते हैं ॥२ ॥
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी । होइहि मोह जनित दुख दूरी ॥
मैं जब तेहि सब कहा बुझाई । चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई ॥
वहाँ जाकर श्रीहरिके गुणसमूहोंको सुनो । उनके सुननेसे मोहसे उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा । मैंने उसे जब सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणोंमें सिर नवाकर हर्षित होकर चला गया ॥ ३ ॥
ताते उमा न मैं समुझावा । रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा ॥
होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना । सो खोवै चह कृपानिधाना ॥
हे उमा! मैंने उसको इसीलिये नहीं समझाया कि मैं श्रीरघुनाथजीकी कृपासे उसका मर्म ( भेद ) पा गया था । उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्रीरामजी नष्ट करना चाहते हैं ॥ ४ ॥
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा । समुझइ खग खगही कै भाषा ॥
प्रभु माया बलवंत भवानी । जाहि न मोह कवन अस ग्यानी ॥
फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षीकी ही बोली समझते हैं । हे भवानी! प्रभुकी माया [ बड़ी ही ] बलवती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले? ॥ ५ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९६७
दो० – ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान ।
ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान ॥ ६२ ( क ) ॥
जो ज्ञानियोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्के वाहन हैं, उन गरुड़को भी मायाने मोह लिया । फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं ॥ ६२ ( क ) ॥ मासपारायण, अट्ठाईसवाँ विश्राम
सिव बिरंचि कहुँ मोहड़ को है बपुरा आन ।
अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान ॥ ६२ ( ख ) ॥
यह माया जब शिवजी और ब्रह्माजीको भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है? जीमें ऐसा जानकर ही मुनिलोग उस मायाके स्वामी भगवान्का भजन करते हैं ॥६२ ( ख ) ॥
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा । मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ॥
देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ । माया मोह सोच सब गयऊ ॥
गरुड़जी वहाँ गये जहाँ निर्बाध बुद्धि और पूर्ण भक्तिवाले काकभुशुण्डिजी बसते थे । उस पर्वतको देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और [उसके दर्शनसे ही ] सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा ॥ १ ॥
करि तड़ाग मज्जन जलपाना । बट तर गयउ हृदयँ हरषाना ॥
बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए । सुनै राम के चरित सुहाए ॥
तालाबमें स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्तसे वटवृक्षके नीचे गये । वहाँ श्रीरामजीके सुन्दर चरित्र सुननेके लिये बूढ़े - बूढ़े पक्षी आये हुए थे ॥२ ॥
कथा अरंभ करै सोइ चाहा । तेही समय गयउ खगनाहा ॥
आवत देखि सकल खगराजा । हरषेउ बायस सहित समाजा ॥
भुशुण्डिजी कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षिराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे । पक्षियोंके राजा गरुड़जीको आते देखकर काकभुशुण्डिजीसहित सारा पक्षिसमाज हर्षित हुआ ॥३ ॥
अति आदर खगपति कर कीन्हा । स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा ॥
करि पूजा समेत अनुरागा । मधुर बचन तब बोलेउ कागा ॥
उन्होंने पक्षिराज गरुड़जीका बहुत ही आदर- सत्कार किया और स्वागत ( कुशल ) पूछकर बैठनेके लिये सुन्दर आसन दिया । फिर प्रेमसहित पूजा करके काकभुशुण्डिजी मधुर वचन बोले— ॥४ ॥
दो० – नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज ।
आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज ॥ ६३ ( क ) ॥
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* *९६८ रामचरितमानस हे नाथ! हे पक्षिराज! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया । आप जो आज्ञा दें मैं अब वही करूँ । हे प्रभो! आप किस कार्यके लिये आये हैं? ॥ ६३ ( क ) ॥
सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस ।
जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस ॥ ६३ ( ख ) ॥
पक्षिराज गरुड़जीने कोमल वचन कहे - आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवजीने आदरपूर्वक अपने श्रीमुखसे की है ॥६३ ( ख ) ॥
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ । सो सब भयउ दरस तव पायउँ ॥
देखि परम पावन तव आश्रम । गयउ मोह संसय नाना भ्रम ॥
हे तात! सुनिये, मैं जिस कारणसे आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया । फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गये । आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, सन्देह और अनेक प्रकारके भ्रम सब जाते रहे ॥ १ ॥
अब श्रीराम कथा अति पावनि । सदा सुखद दुख पुंज नसावनि ॥
सादर तात सुनावहु मोही । बार बार बिनवउँ प्रभु तोही ॥
अब हे तात! आप मुझे श्रीरामजीकी अत्यन्त पवित्र करनेवाली, सदा सुख देनेवाली और दुःखसमूहका नाश करनेवाली कथा आदरसहित सुनाइये । हे प्रभो! मैं बार-बार आपसे यही विनती करता हूँ॥२ ॥
सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता । सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता ॥
भयउ तासु मन परम उछाहा । लाग कहै रघुपति गुन गाहा ॥
गरुड़जीकी विनम्र, सरल, सुन्दर प्रेमयुक्त, सुखप्रद और अत्यन्त पवित्र वाणी सुनते ही भुशुण्डिजीके मनमें परम उत्साह हुआ और वे श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कथा कहने लगे ॥३ ॥
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी । रामचरित सर कहेसि बखानी ॥
पुनि नारद कर मोह अपारा । कहेसि बहुरि रावन अवतारा ॥
हे भवानी! पहले तो उन्होंने बड़े ही प्रेमसे रामचरितमानस सरोवरका रूपक समझाकर कहा ।
फिर नारदजीका अपार मोह और फिर रावणका अवतार कहा ॥४ ॥
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई । तब सिसु चरित कहेसि मन लाई ॥
फिर प्रभुके अवतारकी कथा वर्णन की । तदनन्तर मन लगाकर श्रीरामजीकी बाललीलाएँ कहीं ॥ ५ ॥
दो० - बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह ।
रिषि आगवन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाह ॥ ६४ ॥