श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 971–980

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980

पृष्ठ 971

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* उत्तरकाण्ड * ९६ ९ मनमें परम उत्साह भरकर अनेकों प्रकारकी बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि विश्वामित्रजीका अयोध्या आना और श्रीरघुवीरजीका विवाह वर्णन किया ॥ ६४ ॥

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा । पुनि नृप बचन राज रस भंगा ॥

पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा । कहेसि राम लछिमन संबादा ॥

फिर श्रीरामजीके राज्याभिषेकका प्रसङ्ग, फिर राजा दशरथजीके वचनसे राजरस ( राज्याभिषेकके आनन्द ) में भङ्ग पड़ना, फिर नगरनिवासियोंका विरह, विषाद और श्रीराम- लक्ष्मणका संवाद ( बातचीत) कहा ॥ १ ॥

बिपिन गवन केवट अनुरागा । सुरसरि उतरि निवास प्रयागा ॥

बालमीक प्रभु मिलन बखाना । चित्रकूट जिमि बसे भगवाना ॥

श्रीरामका वनगमन, केवटका प्रेम, गङ्गाजीसे पार उतरकर प्रयागमें निवास, वाल्मीकिजी और प्रभु श्रीरामजीका मिलन और जैसे भगवान् चित्रकूटमें बसे, वह सब कहा ॥२ ॥

सचिवागवन नगर नृप मरना । भरतागवन प्रेम बहु बरना ॥

करि नृप क्रिया संग पुरबासी । भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी ॥

फिर मन्त्री सुमन्त्रजीका नगरमें लौटना, राजा दशरथजीका मरण, भरतजीका [ननिहालसे ] अयोध्यामें आना और उनके प्रेमका बहुत वर्णन किया । राजाकी अन्त्येष्टि क्रिया करके नगरनिवासियोंको साथ लेकर भरतजी वहाँ गये जहाँ सुखकी राशि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे ॥३ ॥

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए । लै पादुका अवधपुर आए ॥

भरत रहनि सुरपति सुत करनी । प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी ॥

फिर श्रीरघुनाथजीने उनको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये, यह सब कथा कही । भरतजीकी नन्दिग्राममें रहनेकी रीति, इन्द्रपुत्र जयन्तकी नीच करनी और फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी और अत्रिजीका मिलाप वर्णन किया ॥४ ॥

दो० – कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग ।

बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग ॥ ६५ ॥

जिस प्रकार विराधका वध हुआ और शरभंगजीने शरीर त्याग किया, वह प्रसंग कहकर, फिर सुतीक्ष्णजीका प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजीका सत्संग- वृत्तान्त कहा ॥६५ ॥

कहि दंडक बन पावनताई । गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई ॥

पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा । भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा ॥

दण्डकवनका पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डिजीने गृध्रराजके साथ मित्रताका वर्णन किया । फिर जिस प्रकार प्रभुने पञ्चवटीमें निवास किया और सब मुनियोंके भयका नाश किया, ॥ १ ॥

पृष्ठ 972

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* *९७० रामचरितमानस

पुनि लछिमन उपदेस अनूपा । सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा ॥

खर दूषन बध बहुरि बखाना । जिमि सब मरमु दसानन जाना ॥

और फिर जैसे लक्ष्मणजीको अनुपम उपदेश दिया और शूर्पणखाको कुरूप किया, वह सब वर्णन किया । फिर खर- दूषण-वध और जिस प्रकार रावणने सब समाचार जाना, वह बखानकर कहा, ॥ २ ॥

दसकंधर मारीच बतकही । जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही ॥

पुनि माया सीता कर हरना । श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना ॥

तथा जिस प्रकार रावण और मारीचकी बातचीत हुई, वह सब उन्होंने कही । फिर मायासीताका हरण और श्रीरघुवीरके विरहका कुछ वर्णन किया ॥३ ॥

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही । बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही ॥

बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा । जेहि बिधि गए सरोबर तीरा ॥

फिर प्रभुने गिद्ध जटायुकी जिस प्रकार क्रिया की, कबन्धका वध करके शबरीको परमगति दी और फिर जिस प्रकार विरह - वर्णन करते हुए श्रीरघुवीरजी पंपासरके तीरपर गये, वह सब कहा ॥४ ॥

दो० – प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग ।

पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग ॥ ६६ ( क ) ॥

प्रभु और नारदजीका संवाद और मारुतिके मिलनेका प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालिके प्राणनाशका वर्णन किया ॥ ६६ ( क ) ॥

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास ।

बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास ॥ ६६ ( ख ) ॥

सुग्रीवका राजतिलक करके प्रभुने प्रवर्षण पर्वतपर निवास किया, वह तथा वर्षा और शरद्का वर्णन, श्रीरामजीका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीवका भय आदि प्रसंग कहे ॥ ६६ ( ख ) ॥

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए । सीता खोज सकल दिसि धाए ॥

बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती । कपिन्ह बहोरि मिला संपाती ॥

जिस प्रकार वानरराज सुग्रीवने वानरोंको भेजा और वे सीताजीकी खोजमें जिस प्रकार सब दिशाओंमें गये, जिस प्रकार उन्होंने बिलमें प्रवेश किया और फिर जैसे वानरोंको सम्पाती मिला, वह कथा कही ॥१ ॥

सुनि सब कथा समीरकुमारा । नाघत भयउ पयोधि अपारा ॥

लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा । पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा ॥

पृष्ठ 973

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* * उत्तरकाण्ड ९७१ संपातीसे सब कथा सुनकर पवनपुत्र हनुमान्जी जिस तरह अपार समुद्रको लाँघ गये, फिर हनुमान्जीने जैसे लङ्कामें प्रवेश किया और फिर जैसे सीताजीको धीरज दिया, सो सब कहा ॥२ ॥

बन उजारि रावनहि प्रबोधी । पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी ॥

आए कपि सब जहँ रघुराई ॥ बैदेही की कुसल सुनाई ॥

अशोकवनको उजाड़कर, रावणको समझाकर, लङ्कापुरीको जलाकर फिर जैसे उन्होंने समुद्रको लाँघा और जिस प्रकार सब वानर वहाँ आये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे और आकर श्रीजानकीजीकी कुशल सुनायी, ॥३ ॥

सेन समेति जथा रघुबीरा । उतरे जाइ बारिनिधि तीरा ॥

मिला बिभीषन जेहि बिधि आई । सागर निग्रह कथा सुनाई ॥

फिर जिस प्रकार सेनासहित श्रीरघुवीर जाकर समुद्रके तटपर उतरे और जिस प्रकार विभीषणजी आकर उनसे मिले, वह सब और समुद्रके बाँधनेकी कथा उसने सुनायी ॥ ४ ॥

दो० – सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार ।

गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार ॥ ६७ ( क ) ॥

पुल बाँधकर जिस प्रकार वानरोंकी सेना समुद्रके पार उतरी और जिस प्रकार वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद दूत बनकर गये, वह सब कहा ॥ ६७ ( क ) ।

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार ।

कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार ॥ ६७ ( ख ) ॥

फिर राक्षसों और वानरोंके युद्धका अनेकों प्रकारसे वर्णन किया । फिर कुम्भकर्ण और मेघनादके बल, पुरुषार्थ और संहारकी कथा कही ॥ ६७ ( ख ) ॥

निसिचर निकर मरन बिधि नाना । रघुपति रावन समर बखाना ॥

रावन बध मंदोदरि सोका । राज बिभीषन देव असोका ॥

नाना प्रकारके राक्षससमूहोंके मरण तथा श्रीरघुनाथजी और रावणके अनेक प्रकारके युद्धका वर्णन किया । रावणवध, मन्दोदरीका शोक, विभीषणका राज्याभिषेक और देवताओंका शोकरहित होना कहकर, ॥ १ ॥

सीता रघुपति मिलन बहोरी । सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी ॥

पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता । अवध चले प्रभु कृपा निकेता ॥

फिर सीताजी और श्रीरघुनाथजीका मिलाप कहा । जिस प्रकार देवताओंने हाथ जोड़कर स्तुति की और फिर जैसे वानरोंसमेत पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधपुरीको चले, वह कहा ॥ २ ॥

जेहि बिधि राम नगर निज आए । बायस बिसद चरित सब गाए ॥

कहेसि बहोरि राम अभिषेका । पुर बरनत नृपनीति अनेका ॥

पृष्ठ 974

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९७२ * रामचरितमानस * जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी अपने नगर ( अयोध्या ) में आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र काकभुशुण्डिजीने विस्तारपूर्वक वर्णन किये । फिर उन्होंने श्रीरामजीका राज्याभिषेक कहा । [ शिवजी कहते हैं— ] अयोध्यापुरीका और अनेक प्रकारकी राजनीतिका वर्णन करते हुए—॥३ ॥

कथा समस्त भुसुंड बखानी । जो मैं तुम्ह सन कही भवानी ॥

सुनि सब राम कथा खगनाहा । कहत बचन मन परम उछाहा ॥

भुशुण्डिजीने वह सब कथा कही जो हे भवानी! मैंने तुमसे कही । सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़जी मनमें बहुत उत्साहित ( आनन्दित ) होकर वचन कहने लगे—॥४ ॥

सो० – गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित ।

भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥ ६८ ( क ) ॥

श्रीरघुनाथजीके सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा सन्देह जाता रहा । हे काकशिरोमणि! आपके अनुग्रहसे श्रीरामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम हो गया ॥ ६८ ( क ) ॥

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि ।

चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन ॥ ६८ ( ख ) ॥

युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हो गया था कि श्रीरामजी तो सच्चिदानन्दघन हैं, वे किस कारण व्याकुल हैं ॥ ६८ ( ख ) ॥

देखि चरित अति नर अनुसारी । भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥

सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना । कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥

बिलकुल ही लौकिक मनुष्योंका-सा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी सन्देह हो गया । मैं अब उस भ्रम ( सन्देह ) को अपने लिये हित करके समझता हूँ । कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया ॥ १ ॥

जो अति आतप ब्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ सोई ॥

जौं नहिं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥

जो धूपसे अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है । हे तात! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता? ॥२ ॥

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई । अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥

निगमागम पुरान मत एहा । कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा ॥

और कैसे अत्यन्त विचित्र यह सुन्दर हरिकथा सुनता; जो आपने बहुत प्रकारसे गायी है? वेद, शास्त्र और पुराणोंका यही मत है; सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि— ॥३ ॥

पृष्ठ 975

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* उत्तरकाण्ड * ९७३

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥

राम कृपाँ तव दरसन भयऊ । तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥

शुद्ध ( सच्चे ) संत उसीको मिलते हैं जिसे श्रीरामजी कृपा करके देखते हैं । श्रीरामजीकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपासे मेरा सन्देह चला गया ॥ ४ ॥

दो० - सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग ।

पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग ॥ ६ ९ ( क ) ॥

पक्षिराज गरुड़जीकी विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजीका शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रोंमें जल भर आया और वे मनमें अत्यन्त हर्षित हुए ॥ ६ ९ ( क ) ॥

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास ।

पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास ॥ ६ ९ ( ख ) ॥

हे उमा! सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र कथाके प्रेमी और हरिके सेवक श्रोताको पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय ( सबके सामने प्रकट न करनेयोग्य ) रहस्यको भी प्रकट कर देते हैं ॥ ६ ९ ( ख ) ॥ ।बोलेउ काकभसुंडकाकभसुंड बहोरी नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥

सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे । कृपापात्र रघुनायक केरे ॥

काकभुशुण्डिजीने फिर कहा- पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था ( अर्थात् बहुत था ) —हे नाथ! आप सब प्रकारसे मेरे पूज्य हैं और श्रीरघुनाथजीके कृपापात्र हैं ॥ १ ॥

तुम्हहि न संसय मोह न माया । मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दाया ॥

पठइ मोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥

आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है । हे नाथ! आपने तो मुझपर दया की है । हे पक्षिराज! मोहके बहाने श्रीरघुनाथजीने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है ॥२ ॥

तुम्ह निज मोह कही खगसाईं । सो नहिं कछु आचरज गोसाईं ॥

नारद भव बिरंचि सनकादी । जे मुनिनायक आतमबादी ॥

हे पक्षियोंके स्वामी! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाईं! यह कुछ आश्चर्य नहीं है । नारदजी, शिवजी, ब्रह्माजी और सनकादि जो आत्मतत्त्वके मर्मज्ञ और उसका उपदेश करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हैं ॥ ३ ॥

मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही ॥

तृस्त्राँ केहि न कीन्ह बौराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥

उनमेंसे भी किस- किसको मोहने अंधा ( विवेकशून्य) नहीं किया? जगत्में ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तृष्णाने किसको मतवाला नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया? ॥ ४ ॥

पृष्ठ 976

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*:*९७४ रामचरितमानस

दो० –- ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार ।

केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥ ७० ( क ) ॥

इस संसारमें ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान् और गुणोंका धाम है, जिसकी लोभने विडम्बना ( मिट्टी पलीद ) न की हो ॥७० ( क ) ॥

श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि ।

मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥ ७० ( ख) ॥

लक्ष्मीके मदने किसको टेढ़ा और प्रभुताने किसको बहरा नहीं कर दिया? ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी ( युवती स्त्री ) के नेत्र-बाण-ब न लगे हों? ॥७० ( ख ) ॥

गुन कृत सन्यपात नहिं केही । कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥

जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा । ममता केहि कर जस न नसावा ॥

[ रज, तम आदि ] गुणोंका किया हुआ सन्निपात किसे नहीं हुआ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मदने अछूता छोड़ा हो । यौवनके ज्वरने किसे आपेसे बाहर नहीं किया? ममताने किसके यशका नाश नहीं किया? ॥ १ ॥

मच्छर काहि कलंक न लावा । काहि न सोक समीर डोलावा ॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया । को जग जाहि न ब्यापी माया ॥

मत्सर ( डाह ) ने किसको कलङ्क नहीं लगाया? शोकरूपी पवनने किसे नहीं हिला दिया? चिन्तारूपी साँपिनने किसे नहीं खा लिया? जगत्में ऐसा कौन है, जिसे माया न व्यापी हो? ॥२ ॥

कीट मनोरथ दारु सरीरा । जेहि न लाग घुन को अस धीरा ॥

सुत बित लोक ईषना तीनी । केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी ॥

मनोरथ कीड़ा है, शरीर लकड़ी है । ऐसा धैर्यवान् कौन है, जिसके शरीरमें यह कीड़ा न लगा हो? पुत्रकी, धनकी और लोकप्रतिष्ठाकी इन तीन प्रबल इच्छाओंने किसकी बुद्धिको मलिन नहीं कर दिया ( बिगाड़ नहीं दिया)? ॥ ३ ॥

यह सब माया कर परिवारा । प्रबल अमिति को बरनै पारा ॥

सिव चतुरानन जाहि डेराहीं । अपर जीव केहि लेखे माहीं ॥

यह सब मायाका बड़ा बलवान् परिवार है । यह अपार है, इसका वर्णन कौन कर सकता है? शिवजी और ब्रह्माजी भी जिससे डरते हैं, तब दूसरे जीव तो किस गिनतीमें हैं? ॥४ ॥

दो० –- ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ।

सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥ ७ ९ ( क ) ॥

पृष्ठ 977

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* उत्तरकाण्ड * ९ ७५ मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभरमें छायी हुई है । कामादि ( काम, क्रोध और लोभ) उसके सेनापति हैं और दम्भ, कपट और पाखण्ड योद्धा हैं ॥ ७१ ( क ) ॥

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि ।

छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि ॥ ७१ ( ख ) ॥

वह माया श्रीरघुवीरकी दासी है । यद्यपि समझ लेनेपर वह मिथ्या ही है, किन्तु वह श्रीरामजीकी

कृपाके बिना छूटती नहीं । हे नाथ! यह मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ॥ ७१ ( ख ) ॥

जो माया सब जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहुँ न पावा ॥

सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ॥

जो माया सारे जगत्‌को नचाती है और जिसका चरित्र ( करनी ) किसीने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी भ्रुकुटीके इशारेपर अपने समाज ( परिवार ) सहित नटीकी तरह नाचती है ॥ १ ॥

सोइ सच्चिदानंद घन रामा । अज बिग्यान रूप बल धामा ॥

ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥

श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य ( सर्वरूप ), अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण, अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छ: ऐश्वर्योंसे युक्त भगवान् हैं ॥२ ॥

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता ॥

निर्मम निराकार निरमोहा । नित्य निरंजन सुख संदोहा ॥

वे निर्गुण ( मायाके गुणोंसे रहित ), महान् वाणी और इन्द्रियोंसे परे, सब कुछ देखनेवाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार ( मायिक आकारसे रहित ), मोहरहित, नित्य, मायारहित, सुखकी राशि ॥ ३ ॥

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥

इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥

प्रकृतिसे परे, प्रभु ( सर्वसमर्थ ), सदा सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं । यहाँ ( श्रीराममें ) मोहका कारण ही नहीं है । क्या अन्धकारका समूह कभी सूर्य सामने जा सकता है? ॥४ ॥

दो० – भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप ।

किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥ ७२ ( क ) ॥

पृष्ठ 978

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* *९७६ रामचरितमानस भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये ॥ ७२ ( क ) ॥

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥ ७२ ( ख ) ॥

जैसे कोई नट ( खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही - वही ( जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल ) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता, ॥ ७२ ( ख ) ॥

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥

जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी ॥

हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है । हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं ॥१ ॥

नयन दोष जा कहँ जब होई । पीत बरन ससि कहूँ कह सोई ॥

जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥

जब जिसको [ कवँल आदि ] नेत्रदोष होता है, तब वह चन्द्रमाको पीले रंगका कहता है । हे पक्षिराज! जब जिसे दिशाभ्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिममें उदय हुआ है ॥२ ॥

नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोहबस आपुहि लेखा ॥

बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी । कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥

नौकापर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत्को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपनेको अचल समझता है । बालक घूमते ( चक्राकार दौड़ते ) हैं, घर आदि नहीं घूमते । पर वे आपसमें एक- दूसरेको झूठा कहते हैं ॥३ ॥

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा । सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥

मायाबस मतिमंद अभागी । हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥

हे गरुड़जी! श्रीहरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, भगवान्में तो स्वप्नमें भी अज्ञानका प्रसंग ( अवसर ) नहीं है । किन्तु जो मायाके वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदयपर अनेकों प्रकारके परदे पड़े हैं, ॥ ४ ॥

ते सठ हठ बस संसय करहीं । निज अग्यान राम पर धरहीं ॥

वे मूर्ख हठके वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजीपर आरोपित करते हैं ॥ ५ ॥

दो० – काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ।

ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥ ७३ ( क ) ॥

पृष्ठ 979

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* उत्तरकाण्ड * ९७७ जो काम, क्रोध, मद और लोभमें रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकाररूपी कुएँमें पड़े हुए हैं ॥ ७३ ( क ) ॥

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥ ७३ ( ख ) ॥

निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ ( सहज ही समझमें आ जानेवाला ) है, परन्तु [ गुणातीत दिव्य ] सगुण रूपको कोई नहीं जानता । इसलिये उन सगुण भगवान्‌के अनेक प्रकारके सुगम और अगम चरित्रोंको सुनकर मुनियोंके भी मनको भ्रम हो जाता है ॥ ७३ ( ख ) ॥

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई । कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥

जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही । सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरघुनाथजीकी प्रभुता सुनिये । मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ । हे प्रभो! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ ॥१ ॥

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता । हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥

ताते नहिं कछु तुम्हहि दुरावउँ । परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥

हे तात! आप श्रीरामजीके कृपापात्र हैं । श्रीहरिके गुणोंमें आपकी प्रीति है, इसीलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं । इसीसे मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यन्त रहस्यकी बातें आपको गाकर सुनाता हूँ॥२ ॥

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ । जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥

संसृत मूल सूलप्रद नाना । सकल सोक दायक अभिमाना ॥

श्रीरामचन्द्रजीका सहज स्वभाव सुनिये । वे भक्तमें अभिमान कभी नहीं रहने देते । क्योंकि अभिमान जन्म- मरणरूप संसारका मूल है और अनेक प्रकारके क्लेशों तथा समस्त शोकोंका देनेवाला है ॥३ ॥

ताते करहिं कृपानिधि दूरी । सेवक पर ममता अति भूरी ॥

जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं । मातु चिराव कठिन की नाईं ॥

इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं; क्योंकि सेवकपर उनकी बहुत ही अधिक ममता है । हे गोसाईं! जैसे बच्चेके शरीरमें फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हृदयकी भाँति चिरा डालती है ॥४ ॥

दो० -जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर ।

ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥ ७४ ( क ) ॥

पृष्ठ 980

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९७८ * रामचरितमानस * यद्यपि बच्चा पहले ( फोड़ा चिराते समय ) दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोग नाशके लिये माता बच्चेकी उस पीड़ाको कुछ भी नहीं गिनती ( उसकी परवा नहीं करती और फोड़ेको चिरवा ही डालती है ) ॥ ७४ ( क ) ॥

तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि ।

तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥ ७४ ( ख ) ॥

उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दासका अभिमान उसके हितके लिये हर लेते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते ॥ ७४ ( ख) ॥

राम कृपा आपनि जड़ताई । कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ॥

जब जब राम मनुज तनु धरहीं । भक्त हेतु लीला बहु करहीं ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरामजीकी कृपा और अपनी जड़ता ( मूर्खता ) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये । जब- जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यशरीर धारण करते हैं और भक्तोंके लिये बहुत- सी लीलाएँ करते हैं ॥ १ ॥

तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ । बालचरित बिलोकि हरषाऊँ ॥

जन्म महोत्सव देखउँ जाई । बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई ॥

तब- तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्ममहोत्सव देखता हूँ और [ भगवान्‌की शिशुलीलामें ] लुभाकर पाँच वर्षतक वहीं रहता हूँ ॥२ ॥

इष्टदेव मम बालक रामा । सोभा बपुष कोटि सत कामा ॥

निज प्रभु बदन निहारि निहारी । लोचन सुफल करउँ उरगारी ॥

बालकरूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है । हे गरुड़जी! अपने प्रभुका मुख देख-देखकर मैं नेत्रोंको सफल करता हूँ ॥ ३ ॥

लघु बायस बपु धरि हरि संगा । देखउँ बालचरित बहु रंगा ॥

छोटे- से कौएका शरीर धरकर और भगवान्‌के साथ-साथ फिरकर मैं उनके भाँति- भाँतिके बालचरित्रोंको देखा करता हूँ॥४ ॥

दो० - लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ ।

जूठन परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ ॥ ७५ ( क ) ॥

लड़कपनमें वे जहाँ- जहाँ फिरते हैं, वहाँ - वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगनमें उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ ॥ ७५ ( क ) ॥