श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 981–990
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990
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* उत्तरकाण्ड * ९७९
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर ।
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर ॥ ७५ ( ख ) ॥
एक बार श्रीरघुवीरने सब चरित्र बहुत अधिकतासे किये । प्रभुकी उस लीलाका स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजीका शरीर [ प्रेमानन्दवश] पुलकित हो गया ॥ ७५ ( ख) ॥
कहइ भसुंड सुनहु खगनायक । राम चरित सेवक सुखदायक ॥
नृप मंदिर सुंदर सब भाँती । खचित कनक मनि नाना जाती ॥
भुशुण्डिजी कहने लगे- हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है । [ अयोध्याका ] राजमहल सब प्रकारसे सुन्दर है । सोनेके महलमें नाना प्रकारके रत्न जड़े हुए हैं ॥ १ ॥
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई । जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई ॥
बालबिनोद करत रघुराई । बिचरत अजिर जननि सुखदाई ॥
सुन्दर आँगनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं । माताको सुख देनेवाले बालविनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी आँगनमें विचर रहे हैं ॥ २ ॥
मरकत मृदुल कलेवर स्यामा । अंग अंग प्रति छबि बहु कामा ॥
नव राजीव अरुन मृदु चरना । पदज रुचिर नख ससि दुति हरना ॥
मरकत मणिके समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है । अङ्ग अङ्गमें बहुत- से कामदेवोंकी शोभा छायी हुई है । नवीन [ लाल ] कमलके समान लाल-लाल कोमल चरण हैं । सुन्दर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योतिसे चन्द्रमाकी कान्तिको हरनेवाले हैं ॥३ ॥
ललित अंक कुलिसादिक चारी । नूपुर चारु मधुर रखकारी ॥
चारु पुरट मनि रचित बनाई । कटि किंकिनि कल मुखर सुहाई ॥
[ तलवेमें ] वज्रादि ( वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिह्न हैं, चरणोंमें मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नूपुर हैं, मणियों, रत्नोंसे जड़ी हुई सोनेकी बनी हुई सुन्दर करधनीका शब्द सुहावना लग रहा है ॥४ ॥
दो० –रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गंभीर ।
उर आयत भ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर ॥ ७६ ॥
उदरपर सुन्दर तीन रेखाएँ ( त्रिवली ) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है । विशाल वक्षःस्थलपर अनेकों प्रकारके बच्चोंके आभूषण और वस्त्र सुशोभित हैं ॥७६ ॥
अरुन पानि नख करज मनोहर । बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा । चारु चिबुक आनन छबि सींवा ॥
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* *९८० रामचरितमानस लाल- लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मनको हरनेवाले हैं और विशाल भुजाओंपर सुन्दर आभूषण हैं । बालसिंह ( सिंहके बच्चे) के से कंधे और शंखके समान ( तीन रेखाओंसे युक्त) गला है । सुन्दर ठुड्डी है और मुख तो छबिकी सीमा ही है ॥१ ॥
कलबल बचन अधर अरुनारे । दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे ॥
ललित कपोल मनोहर नासा । सकल सुखद ससि कर सम हासा ॥
कलबल ( तोतले ) वचन हैं, लाल - लाल ओंठ हैं । उज्ज्वल, सुन्दर और छोटी - छोटी [ ऊपर और नीचे ] दो - दो दँतुलियाँ हैं । सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखोंको देनेवाली चन्द्रमाकी [ अथवा सुख देनेवाली समस्त कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमाकी ] किरणोंके समान मधुर मुसकान है ॥ २ ॥
नील कंज लोचन भव मोचन । भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए । कुंचित कच मेचक छबि छाए ॥
नीले कमलके समान नेत्र जन्म- मृत्यु [ के बन्धन ] से छुड़ानेवाले हैं । ललाटपर गोरोचनका तिलक सुशोभित है । भौंहें टेढ़ी हैं, कान सम और सुन्दर हैं, काले और घुँघराले केशोंकी छबि छा रही है ॥ ३ ॥
पीत झीनि झगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही ॥
रूप रासि नृप अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी ॥
पीली और महीन झँगुली शरीरपर शोभा दे रही है । उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत ही प्रिय लगती है । राजा दशरथजीके आँगनमें विहार करनेवाले रूपकी राशि श्रीरामचन्द्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं, ॥४ ॥
मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा । बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा ॥
किलकत मोहि धरन जब धावहिं । चलउँ भागि तब पूप देखावहिं ॥
और मुझसे बहुत प्रकारके खेल करते हैं, जिन चरित्रोंका वर्णन करते मुझे लज्जा आती है! किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब मुझे पूआ दिखलाते थे ॥५ ॥
दो० – आवत निकट हँसहिँ प्रभु भाजत रुदन कराहिं ।
जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितड़ पराहिं ॥ ७७ ( क ) ॥
मेरे निकट आनेपर प्रभु हँसते हैं और भाग जानेपर रोते हैं और जब मैं उनका चरण स्पर्श करनेके लिये पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर- फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं ॥ ७७ ( क ) ॥
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह ।
कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह॥ ७७ ( ख ) ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९८१ साधारण बच्चों- जैसी लीला देखकर मुझे मोह ( शङ्का) हुआ कि सच्चिदानन्दघन प्रभु यह कौन [ महत्त्वका ] चरित्र ( लीला ) कर रहे हैं ॥ ७७ ( ख ) ॥
एतना मन आनत खगराया । रघुपति प्रेरित ब्यापी माया ॥
सो माया न दुखद मोहि काहीं । आन जीव इव संसृत नाहीं ॥
हे पक्षिराज! मनमें इतनी [ शङ्का ] लाते ही श्रीरघुनाथजीके द्वारा प्रेरित माया मुझपर छा गयी । परन्तु वह माया न तो मुझे दुःख देनेवाली हुई और न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें डालनेवाली हुई ॥ १ ॥
नाथ इहाँ कछु कारन आना । सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥
ग्यान अखंड एक सीताबर । माया बस्य जीव सचराचर ॥
हे नाथ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है । हे भगवान्के वाहन गरुड़जी! उसे सावधान होकर सुनिये । एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप हैं और जड - चेतन सभी जीव मायाके वश हैं ॥२ ॥
जौं सब के रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥
माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुन खानी ॥
यदि जीवोंको एकरस ( अखण्ड ) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [ सत्त्व, रज, तम– इन] तीनों गुणोंकी खान माया ईश्वरके वशमें है ॥३ ॥
परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥
मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥
जीव परतन्त्र है, भगवान् स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं । यद्यपि मायाका किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान्के भजन बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता ॥ ४ ॥
दो० – रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान I।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥ ७८ ( क ) ॥
श्रीरामचन्द्रजीके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूँछ और सींगका पशु है ॥ ७८ ( क) ॥
राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥ ७८ ( ख ) ॥
सभी तारागणोंके साथ सोलह कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं उन सबमें दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती ॥७८ ( ख ) ॥
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* *९८२ रामचरितमानस
ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्यापs तेहि बिद्या ॥
हे पक्षिराज! इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता । श्रीहरिके सेवकको
अविद्या नहीं व्यापती । प्रभुकी प्रेरणासे उसे विद्या व्यापती है ॥१ ॥
ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर ॥
भ्रम तें चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥
हे पक्षिश्रेष्ठ! इसीसे दासका नाश नहीं होता और भेद - भक्ति बढ़ती है । श्रीरामजीने मुझे जब
भ्रमसे चकित देखा, तब वे हँसे । वह विशेष चरित्र सुनिये ॥ २ ॥
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥
जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥
उस खेलका मर्म किसीने नहीं जाना, न छोटे भाइयोंने और न माता- पिताने ही । वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतलवाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथोंके बल मुझे पकड़नेको दौड़े ॥३ ॥
तब मैं भागि चलेउँ उरगारी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा ॥
हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! तब मैं भाग चला । श्रीरामजीने मुझे पकड़नेके लिये भुजा फैलायी । मैं जैसे - जैसे आकाशमें दूर उड़ता, वैसे - वैसे ही वहाँ श्रीहरिकी भुजाको अपने पास देखता था ॥४ ॥
दो० – ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात ।
जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥ ७ ९ ( क ) । मैं ब्रह्मलोकतक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछेकी ओर देखा, तो हे तात! श्रीरामजीकी भुजामें और मुझमें केवल दो ही अंगुलका बीच था ॥ ७ ९ ( क ) ॥
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि ।
गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि ॥ ७ ९ ( ख) ॥
सातों आवरणोंको भेदकर जहाँतक मेरी गति थी, वहाँतक मैं गया । पर वहाँ भी प्रभुकी भुजाको [ अपने पीछे ] देखकर मैं व्याकुल हो गया ॥ ७ ९ ( ख ) ॥
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥
मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९८३ जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूद लीं । फिर आँखें खोलकर देखते ही अवधपुरीमें पहुँच गया । मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकराने लगे । उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुखमें चला गया ॥ १ ॥
उदर माझ सुनु अंडज राया । देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका । रचना अधिक एक ते एका ॥
हे पक्षिराज! सुनिये, मैंने उनके पेटमें बहुत-से ब्रह्माण्डोंके समूह देखे । वहाँ ( उन ब्रह्माण्डोंमें ) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक-से- एककी बढ़कर थी ॥ २ ॥
कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा । अगनित उडगन रबि रजनीसा ॥
अगनित लोकपाल जम काला । अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥
करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि, ॥३ ॥
सागर सर सर बिपिन अपारा । नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर । चारि प्रकार जीव सचराचर ॥
असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार देखा । देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकारके जड़ और चेतन जीव देखे ॥४ ॥
दो० –- जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ ।
सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाई ॥ ८० ( क ) ॥
जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मनमें भी नहीं समा सकता था ( अर्थात् जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी । तब उसका किस प्रकार वर्णन किया जाय! ॥ ८० ( क ) ॥
एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक ।
एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥। ८० ( ख ) ॥
मैं एक-एक ब्रह्माण्डमें एक-एक सौ वर्षतक रहता । इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा ॥ ८० ( ख) ॥
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता । भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता ॥
नर गंधर्ब भूत बेताला । किंनर निसिचर पसु खग ब्याला ॥
प्रत्येक लोकमें भिन्न- भिन्न ब्रह्मा, भिन्न- भिन्न विष्णु, शिव, मनु, दिक्पाल, मनुष्य, गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प, ॥ १ ॥
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* *९८४ रामचरितमानस
देव दनुज गन नाना जाती । सकल जीव तहँ आनहि भाँती ॥
महि सरि सागर सर गिरि नाना । सब प्रपंच तहँ आनई आना ॥
तथा नाना जातिके देवता एवं दैत्यगण थे । सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकारके थे । अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी ही दूसरी प्रकारकी थी ॥२ ॥
अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा । देखेउँ जिनस अनेक अनूपा ॥
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी । सरजू भिन्न भिन्न नर नारी ॥
प्रत्येक ब्रह्माण्डमें मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं । प्रत्येक भुवनमें न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकारके ही नर-नारी थे ॥३ ॥
दसरथ कौसल्या सुनु ताता । बिबिध रूप भरतादिक भ्राता ॥
प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा । देखउँ बालबिनोद अपारा ॥
हे तात! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न - भिन्न रूपोंके थे ।
मैं प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रामावतार और उनकी अपार बाललीलाएँ देखता फिरता ॥४ ॥
दो० – भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान ।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन ॥ ८१ ( क ) ॥
हे हरिवाहन! मैंने सभी कुछ भिन्न - भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा । मैं अनगिनत ब्रह्माण्डोंमें फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको मैंने दूसरी तरहका नहीं देखा॥ ८१ ( क ) ॥
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर ।
भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर ॥ ८१ ( ख ) ॥
सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर! इस प्रकार मोहरूपी पवनकी प्रेरणा मैं भुवन-भुवनमें देखता फिरता था ॥ ८१ (ख) ॥
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका । बीते मनहुँ कल्प सत एका ॥
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ । तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ ॥
अनेक ब्रह्माण्डोंमें भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये । फिरता फिरता मैं अपने आश्रममें आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया ॥ १ ॥
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ । निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ ॥
देखउँ जन्म महोत्सव जाई । जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई ॥
फिर जब अपने प्रभुका अवधपुरीमें जन्म ( अवतार ) सुन पाया, तब प्रेमसे परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा । जाकर मैंने जन्म-- महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ॥ २ ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९८५
राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ॥
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना । माया पति कृपाल भगवाना ॥
श्रीरामचन्द्रजीके पेटमें मैंने बहुत- से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते । वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके स्वामी कृपालु भगवान् श्रीरामको देखा ॥३ ॥
करउँ बिचार बहोरि बहोरी । मोह कलिल ब्यापित मति मोरी ॥
उभय घरी महँ मैं सब देखा । भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा ॥
मैं बार- बार विचार करता था । मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़से व्याप्त थी । यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा । मनमें विशेष मोह होनेसे मैं थक गया ॥ ४ ॥
दो०- देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर ।
बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर ॥ ८२ ( क ) ॥
मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये । हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया ॥ ८२ ( क ) ॥
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम ।
कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम ॥ ८२ ( ख ) ॥
श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे । मैं करोड़ों ( असंख्य ) प्रकारसे मनको समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था ॥ ८२ ( ख ) ॥
देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई ॥
धरनि परेउँ मुख आव न बाता । त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥
यह [ बाल ] चरित्र देखकर और [ पेटके अंदर देखी हुई ] उस प्रभुताका स्मरण कर मैं शरीरकी सुध भूल गया और ‘ हे आर्तजनोंके रक्षक! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ' पुकारता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा । मुखसे बात नहीं निकलती थी! ॥ १ ॥
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी । निज माया प्रभुता तब रोकी ॥
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ । दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥
तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी मायाकी प्रभुता ( प्रभाव ) को रोक लिया । प्रभुने
अपना कर-कमल मेरे सिरपर रखा । दीनदयालुने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया ॥२ ॥
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा । सेवक सुखद कृपा संदोहा ॥
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी । मन महँ होइ हरष अति भारी ॥
सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपाके समूह ( कृपामय ) श्रीरामजीने मुझे मोहसे सर्वथा रहित कर दिया । उनकी पहलेवाली प्रभुताको विचार- विचारकर ( याद कर - करके ) मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष हुआ ॥ ३ ॥
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* *९८६ रामचरितमानस
भगत बछलता प्रभु कै देखी । उपजी मम उर प्रीति बिसेषी ॥
सजल नयन पुलकित कर जोरी । कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥
प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ । फिर मैंने [ आनन्दसे ] नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकारसे विनती की ॥४ ॥
दो० – सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास ।
बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास ॥ ८३ ( क ) ॥
मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक, गम्भीर और कोमल वचन बोले- ॥ ८३ ( क ) ॥
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि ।
अनिमादिक सिधि अपररिधिमोच्छ सकलसुख खानि ॥ ८३ ( ख ) ॥
हे काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग । अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखोंकी खान मोक्ष, ॥ ८३ ( ख) ॥
ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना । मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ॥
आजु देउँ सब संसय नाहीं । मागु जो तोहि भाव मन माहीं ॥
ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान ( तत्त्वज्ञान ) और वे अनेकों गुण जो जगत्में मुनियोंके लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें सन्देह नहीं । जो तेरे मन भावे, सो माँग ले ॥१ ॥
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ । मन अनुमान करन तब लागेउँ ॥
प्रभु कह देन सकल सुख सही । भगति आपनी देन न कही ॥
प्रभुके वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेममें भर गया । तब मनमें अनुमान करने लगा कि प्रभुने सब सुखोंके देनेकी बात कही, यह तो सत्य है; पर अपनी भक्ति देनेकी बात नहीं कही ॥ २ ॥
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥
भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥
भक्तिसे रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही ( फीके ) हैं जैसे नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजनके पदार्थ । भजनसे रहित सुख किस कामके? हे पक्षिराज! ऐसा विचारकर मैं बोला—॥३ ॥
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥
मन भावत बर मागउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥
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* उत्तरकाण्ड * ९८७ हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझपर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी!
मैं अपना मन भाया वर माँगता हूँ । आप उदार हैं और हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं ॥४ ॥
दो० – अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव ।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव ॥ ८४ ( क ) ॥
आपकी जिस अविरल ( प्रगाढ़ ) एवं विशुद्ध ( अनन्य, निष्काम ) भक्तिको श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभुकी कृपासे कोई विरला ही जिसे पाता है, ॥ ८४ ( क ) ॥
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम ।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ॥ ८४ ( ख ) ॥
हे भक्तोंके [ मन–इच्छित फल देनेवाले ] कल्पवृक्ष! हे शरणागतके हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधाम श्रीरामजी! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये ॥ ८४ ( ख ) ॥
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक । बोले बचन परम सुखदायक ॥
सुनु बायस तैं सहज सयाना । काहे न मागसि अस बरदाना ॥
' एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो ) कहकर रघुवंशके स्वामी परम सुख देनेवाले वचन बोले — हे काक!
सुन, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान् है । ऐसा वरदान कैसे न माँगता? ॥ १ ॥
सब सुख खानि भगति तैं मागी । नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी ।
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं । जे जप जोग अनल तन दहहीं ॥
तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, जगत्में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है । वे मुनि जो जप और योगकी अग्निसे शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्न करके भी जिसको (जिस भक्तिको) नहीं पाते ॥२ ॥
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई ॥ मागेहु भगति मोहि अति भाई ॥
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें । सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें ॥
वही भक्ति तूने माँगी । तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया । यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी । हे पक्षी! सुन, मेरी कृपासे अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदयमें बसेंगे ॥३ ॥
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा । जोग चरित्र रहस्य बिभागा ॥
जानब सबही कर भेदा । मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥
भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उनके रहस्य तथा विभाग-इन सबके
भेदको तू मेरी कृपासे ही जान जायगा । तुझे साधनका कष्ट नहीं होगा ॥ ४ ॥
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* *९८८ रामचरितमानस
दो० –- माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि ।
जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि ॥ ८५ ( क ) ॥
मायासे उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे । मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण ( प्रकृतिके गुणोंसे रहित) और [ गुणातीत दिव्य] गुणोंकी खान ब्रह्म जानना ॥ ८५ ( क ) ॥
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग ।
कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग ॥ ८५ ( ख ) ॥
हे काक! सुन, मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं, ऐसा विचारकर शरीर, वचन और मनसे मेरे चरणोंमें अटल प्रेम करना ॥ ८५ ( ख ) ॥
अब सुनु परम बिमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ॥
निज सिद्धांत सुनावउँ तोही । सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही ॥
अब मेरी सत्य, सुगम, वेदादिके द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुन । मैं तुझको यह ' निज
सिद्धान्त ' सुनाता हूँ । सुनकर मनमें धारण कर और सब तजकर मेरा भजन कर ॥१ ॥
जीव चराचर बिबिध प्रकारा ॥मम माया संभव संसारा ।
सब मम प्रिय सब मम उपजाए । सब ते अधिक मनुज मोहि भाए ॥
यह सारा संसार मेरी मायासे उत्पन्न है । [ इसमें ] अनेकों प्रकारके चराचर जीव हैं । वे सभी मुझे प्रिय हैं; क्योंकि सभी मेरे उत्पन्न किये हुए हैं । [ किन्तु ] मनुष्य मुझको सबसे अधिक अच्छे लगते हैं ॥२ ॥
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी । तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी ॥
तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी । ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी ॥
उन मनुष्योंमें भी द्विज, द्विजोंमें भी वेदोंको [ कण्ठमें ] धारण करनेवाले, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले, उनमें भी विरक्त ( वैराग्यवान् ) मुझे प्रिय हैं । वैराग्यवानोंमें फिर ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अत्यन्त प्रिय विज्ञानी हैं ॥ ३ ॥
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा । जेहि गति मोरि न दूसरि आसा ॥
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं । मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं ॥
विज्ञानियोंसे भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति ( आश्रय ) है, कोई दूसरी आशा नहीं है । मैं तुझसे बार- बार सत्य (' निज सिद्धान्त ' ) कहता हूँ कि मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई भी नहीं है ॥४ ॥
भगति हीन बिरंचि किन होई । सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई ॥
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी । मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥