सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 101–110
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 101–110
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१४५: १४६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) विशेषकं भवति... उद्दिश्यमानविशेषणं ह्य ेतत्- ' स्वर्गकामो यजेतेंति ' । घिकारः साका विधिसंस्पर्शाभावाद् अविवक्षितं लिङ्ग संख्या च । तस्मात् स्त्रिया श्रप्यधिकारः । ' दर्शनाच्च ' ( ८ ) ' योक्त्रविधिपरे वाक्ये पत्न्या अधिकार साब प्रदर्शयति । सा च पुसा सह अधिक्रियते, न पृथक् । येन एकस्मिन् पूर्वपक्ष पत्नीसाध्याः पदार्था दृश्यन्ते - ' पत्नी श्राज्यमवेक्षते कर्मणि किया यजमानो वेदं बध्नातीति ' इति, यजमानसाध्याश्च - · T ' पशु ' । ' तुल्यफलत्वाच्च ' ( ९ ) कर्कभाष्यम्- ' स्वर्ग-कामो यजेतेति श्रनेन यथा यजमानोभिघीयते एवं पत्नी श्रपि जाता । यागेन यजमानः फलं साधयति, तथा पत्नी । यथा काम अपि ( चौखम्बा सीरीज पृ. ५-६ ) । ङ्गम । इससे जातिपक्ष स्त्रीके उपनयनादिमें न प्रवृत्त नहीं; किन्तु स्वर्ग - फलकी नहीं तो कामनामें प्रवृत्त है -यह सिद्ध है । यजनमें भी स्त्री - साध्य कार्य श्राज्यावेक्षण आदि कहे गये हैं, उपनयनादि नहीं । जैसे- श्रीरामने सीताकी अनुपस्थिति वादी के में यज्ञ में सुवर्णकी सीता वैठाई थी, जैसेकि - ' न सीतायां परां भाय वज्र वर्षकी स रघुनन्दनः । यज्ञे - यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ( वाल्मी. ७ । तिपक्षे १७ ) ' रामोपि कृत्वा सौवर्णी सीतां पत्नीं यशस्विनीम् । ईजे यज्ञैः ' होता ( कात्यायनस्मृति २०1१ ) । उस सुवर्णमयी सीताने न तो वेदमन्त्र ही पढ़े,. न यज्ञ ही किया, फिर भी यज्ञपूर्ति मानी गई, इस प्रकार स्त्री भी सुवर्ण-' पुत्र की पुतलीकी तरह यज्ञमें साथ बैठी रहती है, कर्म उसका सब पति ही करता हता मे है, साथ बैठनेमात्रसे उसे फल मिल जाया करता है । इसलिए वसिष्ठकी पृथक् पत्नीको वसिष्ठकर्तृक- यज्ञकी फलभोक्त्री माना गया है । इससे स्त्रीका उक्त है उपनयन वा वेदाधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । शेष है यजन - सो वह तो उपनयन तथा वेदाध्ययनके अधिकारसे भी स्त्री रहित निषादस्थपतिका भी मीमांसा में आता है । जैसे वह ऋत्विक् - द्वारा ' स्त्रीच करा दिया जाता है, वैसे यहां स्त्रीका पति द्वारा । जैसेकि - म. म. श्रीरघु-ल्लगं न ' नन्दन भट्टाचार्यने ' स्मृतितत्त्व ' के द्वितीयभाग ६३४ पृष्ठमें लिखा है— ' श्रमन्त्रस्य तु शूद्रस्य विप्रो मन्त्रेण गृह्यते ' इति वराहपुराणाद् श्रयं विधिः पं ० शिवदत्तजीका मत [ १४७ शुद्रकर्तृ कमन्त्रपाठरहितः । ततश्च तत्कर्मसम्वन्धिमन्त्रेण विप्रः तदीयकर्म-कारयितृ - ब्राह्मणो गृह्यते । तेन ब्राह्मणेन तत्र मन्त्रः पठनीयः । ( वराह - पुराणमें लिखा है - शूद्रको मन्त्रका अधिकार नहीं होता; फिर भी जहाँ वचनके वलसे शूद्रका मन्त्र लिखा हो; वहीं ' मन्त्र ' से ब्राह्मण लिया जाता है । शुद्रको वह मन्त्र नहीं पढ़ना पड़ता, किन्तु उसके कर्मको कराने वाले ऋत्विक् - ब्राह्मण द्वारा वह मन्त्र पढ़ना पड़ता है । ) इस प्रकार स्त्रीके मन्त्रकेलिए पति गृहीत होता है । जैसे कि - प्रन्नप्राशनमें अन्न बालक खाता है, तब ' श्रोम् अन्नपते! अन्नस्य नो देहि ' ( यजुः १११८३ ) यह अन्नप्राशनका मन्त्र भी बालकको पढ़ना चाहिए । कर्णवेधमें बच्चेका कान विद्ध किया जाता है । तब ' भद्र ं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ' ( ऋ. ११८६८ ) यह कर्णवेधका मन्त्र भी बालकको ही पढ़ना चाहिए, पर उसका सामर्थ्य वा प्रयज्ञोपवीतित्व होनेसे अधिकार न हो सकनेसे उसे उसका संरक्षक वा पिता यादि पढ़ देता है; वैसे ही याज्ञिक स्त्री - विषयक मन्त्रको भी उसका संरक्षक पति ही पढ़ देता है, और उसका फल पुत्रकी तरह स्त्रीको भी प्राप्त हो जाता है । फलतः स्त्री भी यज्ञके फल स्वर्गकी स्वामिनी होती है, उपनयनादि की नहीं । जैसाकि - ४११३३ महाभाष्यके उद्योतमें मीमांसाके प्राशयको श्रीनागेश भट्टने भी कहा है- ' यज्ञफल - स्वर्गादिभोक्त त्वाच्च यज्ञस्वामित्वं भार्याया बोव्यम् 1 । मदभिलषितसाधनत्वाद् मदर्थं कर्म- इत्येवं- लक्षणोधिकारो भार्याया प्रप्यस्ति इति मीमांसायां स्पष्टम् । अतः इससे वादिसम्मत स्त्रीके उपनयन - वेदादिकी कोई सिद्धि नहीं । जातिपक्षके विषयमें पृथक प्रकाश भी १५ संख्यामें डाला जायगा ।. गृह्यसूत्रोंमें भी ' कुमार ' पद जातिपरक नहीं है, यह हम १५ उत्तर-पक्षमें सिद्ध करेंगे । तब ' कुमारा विशिखा इव ' इसमें कुमार पद जाति-पक्षसे कुमारीके चौलकर्मका भी सूचक है - यह म.म. पं ० शिवदत्तजीका कथन ठीक नहीं । इसमें वेदको जातिपक्ष इष्ट नहीं, अन्यथा वेद ' स्वं
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१४८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कुमार उत वा कुमारी ' ( म. १०१८३२७ ) इत्यादि मन्त्रोंमें कुमारसे पृथक् ' कुमारी ' शब्द न कहता । अतः ' कुमास विशिखा इव ' में ' कुमाराश्च कुमार्यश्च ' इस प्रकार एकशेषसे पु - शेष हुआ है, तभी यहाँ बहुवचन है । तब लड़कीके चूड़ाकरणमें भी इससे क्षति नहीं पड़ती । पर गृह्यसूत्रमें तो एकवचन होनेसे एकशेष नहीं । जातिपक्ष तो वहाँ बाधित है - यह हम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके हैं । वस्तुतः उक्त ' कुमारा विशिखा इव ' मन्त्रमें ' प्रधानेन व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे कुमारोंका शिखाधारण ( शिखा-मुण्डन नहीं ) कहा है । कुमारीका भी वह भले ही हो जाय, पर यहाँ जातिपक्ष वेदको इष्ट नहीं यह १५ उत्तर पक्षमें स्पष्ट किया जायगा । ' उपाध्यायी, प्राचार्या ' प्रादि म.म.जीसे प्रदर्शित उदाहरणोंपर १६ वें निबन्धमें स्पष्टता की जायगी । ( ड ) सायणके वाक्यमें वेदके अनधिकारियों में ' स्त्री ' पद किसीने प्रक्षिप्त नहीं किया, सायणका वह अपना ही स्पष्ट मत है, वह केवल सायणके ऋग्वेद - भाष्योपोद्घात क्या, अन्य भाष्योंके उपोद्घातमें भी श्रीसायण स्पष्ट लिख चुका है, देखिये उसके ऐतरेय ब्राह्मण- भाष्यका उपोद्घात - ' ननु एवं सति स्त्री - शूद्र- सहिताः सर्वेपि वेदाधिकारिणः स्युः, इष्टं मे स्याद् अनिष्टं मा भूदिति श्राशिषः सर्वजनीनत्वात्? मैवम् - स्त्री-शूद्रयोः सत्यपि उपायवोधार्थित्वे हेत्वन्तरेण वेदाधिकारस्य प्रतिव ( षि ) द्धत्वाद् उपनीतस्यैव अध्ययनाधिकारं ब्रुवत् शास्त्रम् अनुपनीतयोः स्त्री-शूद्रयोर्वेदाध्ययनमनिष्टप्राप्तिहेतुरिति बोधयति ' यहां श्रीसायणने स्त्रीका भी वेदाध्ययन स्पष्ट निषिद्ध किया है, तैत्तिरीय - संहिताके भाष्यके उपोद्घातमें भी उसने यही लिखा है । इसलिए ऋग्वेद भाष्योपोद्घातके उसके उद्धृत स्थलमें ' त्रैवणिक - पुरुषाणां वेदमुखेन अर्थज्ञानाधिकारः ' यहाँ ' पुरुष ' शब्द स्पष्ट है, तब ' स्त्री ' शब्दकी प्रक्षिप्तताकी उसके वाक्यमें म.म.जी की शंका ठीक नहीं हो सकती । शेष पराशरमाधवीय प्रादिमें उसे कल्पारम्भका प्राशय यावज्जीबन कुमारियोंके लिए इष्ट है, आजकलके लिए नही । रामायणक कई प्रमाण [ १४३ सद्योवधूके उपनयन का भाव हम पहले हारींतके वाक्यकी व्यवस्था में बता ही चुके हैं । ' अष्टवर्षमुपनयीत ' में स्त्रीका ग्रहण करनेमें क्या हानि है-यह भी हम पूर्व लिख चुके हैं । शेष भी उनकी सहाधिकार आदिकी सभी । बातोंका उत्तर दिया जा चुका है । म.म. पं ० शिवदत्तजीका पूर्वपक्ष समाप्त हो गया । ( १३ ) रामायण के कई प्रमाण । ( क ) पूर्वपक्ष – ‘ अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवित् कृतमङ्गला ' ( लक्ष्मी .२।२०।१५ ) यहाँ कौशल्या मन्त्रवित् मन्त्रके जानने वाली कही गई है । यहाँ पर ' जुहोति ' का स्पष्ट अर्थ ' हवन करती थी ' है, पौराणिक टीका-कारोंका ‘ ब्राह्मणोंसे हवन कराती थी ', ऐसा अर्थ करनो दुराग्रहमूलक ही है । ( ख ) ' वैदेही शोकसन्तप्ता हुताशनमुपागमत् ' ( सुन्दर ५३२५ ) यहाँ अशोकवाटिकामें शोकसन्तप्ता सीताका हवन करना दिखाया है । ( ग ) ' तदा सुमन्त्रं मन्त्रज्ञा कैकयी प्रत्युवाच ह ( २२१४ | ५६ ) यहाँ कैकेयीका विशेषण ' मन्त्रज्ञा ' है, वेदमन्त्रोंको जाननेवाली कैकेयीने सुमन्त्रको उत्तर श्र दिया । ( च ) ' ततः स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी ( ४/१६/१२ ) सा यहां तारादेवीको वेदमन्त्रोंको जानने वाली कहा है । ( घ ) ' वाग्यतास्ते त्रयः सन्ध्यां समुपासत संहिता: ' ( २२८७१६ ) यहाँ राम, लक्ष्मणके साथ a ' सीताका भी सन्ध्योपासन स्पष्ट हैं । ( च ) ' नदीं चैमा शुभजलां सन्ध्यार्थं चरवर्णिनी ' ( ५।१५।४८ ) यहाँ सीताका सन्ध्योपासन स्पष्ट हैं । ( ' स्त्रियों श्र का वेदाध्ययनाधिकार ' १७१।१७२ । १७३ । १७६ १७७ पृष्ठमें वादी ) । * उत्तरपक्ष— ( क ) यहाँ कौशल्याके हवनप्रतिपादक वादिदत्त ' रामायण ': के प्रमाणमें ' मन्त्रवित् ' यह पाठ नहीं है, किन्तु ' मन्त्रवत् ' है । वादी द्वारा पाठ - परिवर्तन करना अपने पक्षकी दुर्बलता प्रकाशित करना है । ' अि जुहोति स्म ' का अर्थ है – कौशल्याने किसी ऋत्विक द्वारा ब्राह्मणसे टोक
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१४ ९ - १५० श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) में बताहै- ' कराया । यहाँ ' जुहोति ' ' हु ' धातु अन्तर्भावितण्यर्थ ' है, ' णिच् ' का अर्थ की सभी उसने अपने अन्दर डाल रखा है; तब यहाँ ' हावयति स्म ' यह अर्थ है । पूर्वपक्ष इस अर्थ में न तो कोई पक्षपात है, न दुराग्रह ही, किन्तु वहाँका प्रकरण ही स्वयं इस बातको स्पष्ट कर रहा है, पर वादीने अपने पक्षकी सिद्धिकी प्रसन्नतामें पूर्वोत्तर - प्रकरणको न देखनेकी शपथ ही खा रखी मालूम होती है । देखिये उक्त पद्यका अग्रिम पद्य - अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत्कृत-मङ्गला ' ( २।२०।१५ ) ‘ प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम् । ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम् ' ( २।२० । १६ ) यह दोनों पद्य आपस में गई है । श्रव्यवहित हैं, और अव्यवहित- समयके हैं; क्योंकि - कौशल्याके लिए जब टीका- ही ' जुहोति स्म ' कहा गया है, तभी वहाँ श्रीरामका प्रवेश कहा गया है । श्रीरामने आकर देखा कि मेरी माता ऋत्विक् ब्राह्मण द्वारा हावयन्ती-हवन करवा रही है । ५ ) यहाँ इस प्रकार पूर्वपद्यस्थ ' जुहोति स्म ' यह पद ' अन्तर्भावितण्यर्थं ' हाव-( ग ) यति स्म इस अर्थ में होकर अग्रिम पद्यके ' हावयन्ती ' इस पदके साथ को उत्तर अन्वितार्थक हो जाता है, अथवा उस ' जुहोति स्म ' में ' ब्राह्मणद्वारा ' यह श्रध्याहृत होकर वही अर्थ ' जुहोति हावयति ' ही होकर ' हावयन्ती ' के - ६।१२ ) साथ अन्वित हो जाता है । तव श्रव्यवहित - कालिक होने तथा उद्दिष्ट-ग्यितास्ते प्रति निर्दिष्ट होनेसे दोनों पदोंका समान ही अर्थ हुआ कि कौशल्या ऋत्विक्-साथ द्वारा हवन करा रही थी । सन्ध्याचं जहाँ हमारी बात प्रकरणानुगृहीत है, वहां प्राचीन टीकाकारोंसे ( ' स्थियों अनुमोदित भी है | देखिये इसपर रामाभिरामी टीका- ' अग्निहोत्रं मन्त्रवद् दी ) । जुहोति स्म ज्येष्ठपत्नीत्वाद् ऋत्विजा - इति शेषः । तदाह - हावयन्तीमिति ' मायण ( २।२०१५-१६ ) । न केवल रामाभिरामने ही ऐसा लिखा है, प्रत्युत ' शिरोमणि ' टीकामें भी ऐसा ही लिखा है- ' हावयन्तीं ब्राह्मणैरिति शेषः । - द्वारा । ' अग्निं एतदनुरोधेन पूर्वत्र ' जुहोति ' इत्यस्य ' हावयन्ती ' इत्यर्थः, ( १५-१६ ) । सेय कितनी सोपपत्तिकता है? केवल इन दो टीकाकारोंने ही नहीं, ' भूषणं ' टीकाकारने भी लिखा है- ' जुहोति - हावयति कौशल्या, प्रतएव ' हावयन्तीम ' रामायणके कई प्रमाण [ १५१ ( १६ ) इति वक्ष्यति, ब्राह्मणैरिति शेषः ' ( १५ ) । कितनी स्पष्टता है? यह अयं टीकाकारों का निज - कल्पित नहीं है, जिससे कदाचित्-अमाननीय भी हो जाय, किन्तु एक तो प्रकरणानुकूल एवं मूलानुसारी है - यह हम पहले दिखा ही चुके हैं । दूसरा यह सोपपत्तिक तथा समूल भी है । यहाँ ' रामायण ' की उपजीव्य ' मनुस्मृति ' की साक्षी भी है । देखिये- ' पुरोहितं च कुर्वीत दृणुयाच्चैव चत्विजः । तेऽस्य गृह्याणि कर्माणि कुर्यु वैतानिकानि च ' ( ७/७८ ) अर्थात् राजा पुरोहित तथा ऋत्विजोंका वरण कर रखे, वे लोग राजघरानेके श्रौत एवं स्मार्त यज्ञोंको सम्पादित करें । कहीं वादी इस मनुपद्यको प्रक्षिप्त ही न कह दे, श्रथवा इसके प्रर्थ को हमारा कल्पित न कह दे, अतः इस पर उनके मतप्रवर्तक स्वा.द.-की साक्षी भी दी जाती है । देखिये - [ राजा ] पुरोहित और ऋत्विक्का स्वीकार इसलिए करे कि वे अग्निहोत्र और पक्षेष्टि आदि सब राजघरके कर्म किया करें; और आप सर्वदा राजकार्यमें तत्पर रहे ' ( स.प्र. ६ समु. पृ. ११ ) । तव यहाँ राजकार्य होनेसे, दशरथ राजाके रुके होनेसे उसकी ज्येष्ठ पत्नी होनेके नाते कौशल्या ऋत्विक् - द्वारा हवन करा रही थी- यह सिद्ध हो गया । जहाँ हमने स्वयं प्रकरणसंघटन द्वारा यह बात वाल्मीकिसम्मत सिद्ध कर दी है, टीकाकारोंकी भी अपने अर्थमें सहमति दिखा दी है, जहाँ हमने वादीके सम्प्रदायाचार्य स्वा.द. द्वारा भी अपने पक्षकी पुष्टि दिखलाई है-श्राशा है - वादी अपने स्वामीको ' पौराणिक ' न मानता होगा, जहाँ हमने श्रीवाल्मीकिको भी यही भ्रयं इष्ट है ' यह सिद्ध कर दिया है, वहां हम श्रीवाल्मीकिकी एक और भी अन्तः साक्षी उपस्थित करते हैं; जिससे सिद्ध होगा कि श्रीवाल्मीकि, स्त्रीका होम ब्राह्मण - पुरुष द्वारा ही कराना चाहते हैं, · साक्षात् स्त्री द्वारा नहीं । ऐसा सिद्ध हो जाने पर फिर वादी टीकाकारोंके लिए ' दुराग्रह ' शब्द न लिख सकेगा । उसे वैसा न मानने पर अपना ही ' दुराग्रह ' मानना पड़ेगा ।
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१५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) जब श्रीराम वनवासार्थं जा रहे थे, तब कौशल्याने हवन वा स्वस्ति-वाचन स्वयं न करके ब्राह्मण द्वारा कराया है । यदि वह स्वयम् उसमें अधिकारिणी होती, तो वहाँ ब्राह्मणके बुलाने वा उसे दक्षिणा देनेकी क्या श्यावश्यकता थी? देखिये- ' ज्वलनं समुपादाय ब्राह्मणेन महात्मना । हावयामास विधिना राममङ्गलकारणात् ' ( २।२५।२७ ) घृतं श्वेतानि माल्यानि समिधश्चैव सर्षपान् । उपसम्पादयामास कौशल्या परमाङ्गना ' ( २।२५।२८ ) उपाध्यायः स विधिना हत्वा शान्तिमनामयम् । हुतहव्याव-शेषेण बाह्य ं बलिमकल्पयत् ' ( २६ ) मधुदध्यक्षतघृतैः स्वस्तिवाच्य द्विजां-स्ततः । वाचयामास रामस्य वने स्वस्त्ययनक्रियाम् ' ( ३० ) ततस्तस्मै द्विजेन्द्राय राममाता यशस्विनी । दक्षिणां प्रददौ काम्यां ' ( २।२५ ३१ ) यहाँ पर स्पष्ट ही कौशल्याका ब्राह्मणद्वारा हवन कराना दिखलाया है, केवल कौशल्याका यज्ञसामग्री जुटा देनेका वृत्त प्राया है । स्वस्तिवाचन भी ब्राह्मणोंद्वारा कराया गया है । इस प्रकार पूर्वोपस्थापित पद्य ( २/२०१ १५ ) में भी उत्तर - पद्यके अनुरोधसे ' हावयन्तीं ' पदके ब्राह्मणद्वारा ही कौशल्याका हवन कराना इष्ट है, स्वयं हवन करना नहीं । इस प्रकार यह वादीका पक्ष सदाके लिए कट गया, अब उसका इसमें फड़फड़ाना सम्भव नहीं हो सकता । रामायणकी उपजीव्य ' मनुस्मृति ' भी स्त्रीका हवन निषिद्ध करती है । देखिये- ' न वै कन्या ( अनूढा ) न युवति: [ ऊढा इत्यर्थ:, ' यत्र रज: -शुक्रयोमिश्रणं भवति, यौति मिश्रीकरोति शुक्रशोणिते इति युवतिः, ' यु मिश्रणे ' यह मिश्रण विवाहितात्व में होता है । यदि ' यु ' धातुका यहाँ मिश्रण अर्थ किया जावे, तो ' कन्या ' शब्द व्यर्थ होगा ) होता स्याद् अग्निहोत्रस्य ' ( मनु. १११३६ ) ' नरके हि पतन्त्येते ( ११।३७ ) यहाँ विवाहिता अविवाहिता सभी स्त्रियोंको होता बनना निषिद्ध ठहराया है । श्रीकुल्लूकने लिखा है - ' कन्या- अनूढा, ऊढा - तरुणी ' । मैलापुरके वादिमान्य ' विवाह - कालविमर्श ' के ४२ पृष्ठमें कहा है- ' यदपि मन्वादिभिर्होमप्रकरणे रामायणके कई प्रमाण [ १५१ ' नैव कन्या न युवतिः ' इत्यादिभिः ' कन्या- युवत्योर्भेदेन व्यपदेशः तदपि विवाहिताऽविवाहिताभिप्रायेण ' । राघवानन्दने भी लिखा है- कृतः ' युवतिश्च ऊढानूढे! इस प्रकार अन्य टीकाकारोंने भी लिखा है कन्दा । यह ' वृद्धा ' अर्थ निकालना वादियोंका उपहासास्पद है; नहीं तो उनकी कन्याएं युवतियां हवन करती हुई वादियोंके अनुसार ही नरकगामिनी बनेंगी-क्या यह उन्हें इष्ट है? केवल यहीं नहीं, मनुने अन्यत्र भी इसे स्पष्ट है – ' न ' - ' स्त्रिया क्लोबेन च हुते भुञ्जीत ब्राह्मण: ववचितः । ( श्रीकम् ) एतत् साधूनां यत्र जुह्वत्यमी ( स्त्रीप्रभृतयः ) हविः । प्रती पमेतद् देवानां तस्मात् तत् ( स्त्रीक कहोमं ) परिवर्जयेत् ' ( ४/२०१६ ) २०६ ) । - ( स्त्री तथा नपुंसकसे हवन किये जानेपर ब्राह्मण वहाँ भोजन न करे । जहाँ पर स्त्री - नपुंसक आदि हवन करते हैं, यह सत्पुरुषों को ठीक नहीं है । यह स्त्री - होमादि देवताओंसे भी विरुद्ध है । अतः स्त्री है-हवन वन्द - कर - करा दे ) । त यहाँ पर भी सभी स्त्रियोंको चाहे वे कन्या वा युवतियाँ वा वृद्धाएं पू हों उनके द्वारा हवन करना निषिद्ध कर दिया गया है । हवन देवपूजाई ज होता है, पर स्त्रियोंके हवनको देवं प्रतिकूल तथा श्री - विनाशक बतात यह गया है । ' नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञः ' ( मनु. ५।१५.५ ) यहाँ स्त्रीने. पतिविरहित यज्ञका निषेध कर दिया गया है; तब: मनुस्मृतिकी उपजीस भ रामायण कौशल्यासे हवन कैसे कराती? यहाँ पति साथ नहीं था । I जहाँ ' चकार रम्यं कौशल्या मंत्रैरभिजजाप च ' ( २२५३१ ) क एतदादि स्थलों में कौशल्या के मन्त्र दीखते हैं, वे पौराणिक ही सम चाहियें, वैदिक नहीं, जिनका रामायणस्थ कौशल्याके वचनों में मात उस स्पष्ट है । वे मन्त्र ' रामायण ' में इस प्रकार कहे गये हैं— समित्लुङ कर पवित्राणि वैद्यश्चायतनानि च । स्थण्डिलानि च विप्राणां शैलाः वृक्षाः शु अ ह्रदाः । पतङ्गा पन्नगाः सिंहास्त्वां रक्षन्तु नरोत्तमम् ( २२ ) आ
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[ १५१ १५४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) शः कृतः " -है - कन्दा ' नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहाश्च सह देवतैः । अहोरात्रे तथा सन्ध्ये पान्तु है । य - त्वां वनमाश्रितम् ' ( १४ ) इत्यादि २२५१३-२६ पद्य तक देख लेने की कन्याएं चाहियें | वे वेदके शब्द न होते हुए भी ' सानुगाय यमाय नमः, भद्रकाल्यै बनेंगी ' नमः ' इत्यादि स्वा. द. लिखित मन्त्रोंकी तरह ' मन्त्र ' कहे जाते हैं । इसी पष्ट किय प्रकार २।२५।२२,३४-३५ में भी कौशल्या - द्वारा किया मङ्गल भी वेद-अश्लीकम मन्त्ररूप नहीं । तब इससे वादीका पक्ष कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ - यह । प्रती विद्वान - पाठकोंने अनुभव किया होगा । इसी प्रकार तारादेवीके मन्त्रो के ( ४४२०६ विषयम मी जान लेना चाहिए । श्रव वादीकी यहाँ शक्ति नहीं कि यहाँ कुछ फड़फड़ा सके । यह विद्वानोंने समझ लिया होगा । नं न करे । ( ख ) ' वैदेही शोकसन्तप्ता हुताशनमुपागमत् ' वादी ग्रन्थोंके पूर्वापर-ठीक नहीं छिपाकर बीचके उद्धरण दे देनेकी प्रकृतिवाला है । इससे पूर्वका पद्य यह आदिद्वा है – लांगूलेन प्रदीप्तेन स एष परिणीयते ' ( सुन्दर. ५३।२४ ) ' श्रुत्वा तद्वचनं क्रूरमात्मापहरणोपमम् ' ( सीताको सूचना मिली कि - हनूमान्की बा वृद्धाए पूछ जला दी गई है । सो वह जलाई हुई पूछवाला हनुमान ले जाया देवपूजा जा रहा है । यह कठोर बचन सीताने जब सुना; तब यह समझा कि-राक बता यह मैं मारी जा रही हूं ) । उसके आगे उक्त पाठ है - यह पूर्वप्रकरण है । हां स्वीक. ' उपतस्थे विशालाक्षी प्रयता हव्यवाहनम् । यद्यस्ति पतिः शुश्रूषा... शीतो उपजीक भव हनूमतः । ( ५३।२६-२७ ) ( यह सुनकर सीता हनुमानको जलती था । पूछकी प्रग्निके पास आकर खड़ी हो गई । तब वह अग्निके आगे प्रार्थना करने लगी कि - ऐ अग्नि, यदि मैंने पतिकी कुछ भी सेवा की है; तो तू. सम हनुमान के लिए ठण्डी हो जा ) । यह उत्तर प्रकरण है । जब रावणके हीनोंमें प्रात श्रादेशसे हनूमानकी पूछ जलाई गई; तब सीताने भी यह सुना । उसने - समित्लुङ उसे अपना नाश समझा । तब वह मनसे पूछमें लगी अग्निसे प्रार्थना - वृक्षाः शु करने लगी कि तुम हनुमान के लिए ठंडी हो जाओ । ऐसा ही हुआ - यह अग्रिम - प्रकरणसे स्पष्ट है । यहाँ वादीको सीताके हवनका स्वप्न कहाँसे आगया? वहाँपर हवनकुण्ड क्या हनुमानकी पूछ थी? वहाँ हवन-रामायण के कई प्रमाण । १५५ सामग्री क्या थी? पूछकी अग्नि में हवन करनेमे अग्नि शान्त कैसे होती? वह तो उल्टा बढ़ती । यह हैं इन वादियोंके काले कारनामें!!! इसके अतिरिक्त हवन होता है चित्तके स्वास्थ्यमें । तब शोकसे संतप्त वह हवनमें किस प्रकार प्रवृत्त हो सकती थी? आश्चर्य है कि वादी अपने पक्षके पक्षपातमें लगा हुआ इस पर सोचता ही नहीं । इस प्रकारके पुरुषोंकेलिए ही कदाचित् स्वाद जीने कहा है- ' देश - कालके ' अनुकूल अपने पक्षको सिद्ध करनेकेलिए बहुतसे स्वार्थी विद्वान् श्रपने श्रात्माके जानसे विरुद्ध भी [ अर्थ ] कर लेते हैं ' ( स.प्र. ११ पृ. १८५ ) । भूमिकामें भी स्वामीने ठीक ही लिखा है- ' ताहार्य — जिसके लिए वक्ताने शब्दोच्चारण वा लेख किया हो, उसीके साथ उस वचन वा लेखको युक्त करना । बहुतसे हठी, दुराग्रही मनुष्य होते हैं, जो वक्ताके अभिप्रायसे विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर मत वाले लोग, क्योंकि मतके प्राग्रहसे उनकी बुद्धि प्रन्धकारमें फंसकर नष्ट हो जाती हैं ( स.प्र. पृ. ४ ) । अपने श्राचार्यकी यह बात वादीमें ठीक घट रही है । अतएव वादीका ' सीताका हवन ' अर्थ भी अशुद्ध है । वादी लोग हवनका प्रयोजन वायुशुद्धि मानते हैं, तब उनको बताना होगा कि क्या उस समय श्रशोकवाटिकाकी वायु प्रद्युद्ध हो गई यो कि उस समय श्री-सीता हवन करने बैठ गई? यदि कहें कि हनुमान की पूछमें लगी अग्नि का शीतल करनेकेलिए हवन किया, तो क्या वादी हवनसे प्रग्नि प्रादि देवताओंकी प्रसन्नता तथा इष्टफल ( श्रग्निको शीतल करना श्रादि ) मानता है? तब तो उसका साम्प्रदायिक सिद्धान्त [ शब्दमय मन्त्रशक्तिका प्रभाव ] खण्डित हो जाता है । तब बादी ' अपसिद्धान्त ' निग्रहस्थान में निगृहीत हो गया । तो फिर ग्रहादियज्ञसं भी इष्ट - सिद्धि हो जानेसे ' स.प्र.'-प्रोक्त ग्रहोंका फल न दे सकना रूप - सिद्धान्त भी कट गया । यदि वादी वैसा नहीं मानता, तो उसका अपने अनुसार प्रक्षिप्त प्रमाणको दे सकने-का अधिकार भी न रहा । हमने तो ग्रन्थकाराभीष्ट श्रयं बता ही दिया
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१५६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) । टीकाकारोंने भी वही अर्थ किया है- ' दुःखप्रापकत्वेन स्वापहरण-सदृशतद्वचनं श्रुत्वा शोकसन्तप्ता वैदेही हुताशनं - वन्हिम् उपागमत-मनसा प्राप्नोत् ' [ शिरोमणि ] । यह ' तिलक ' ने भी लिखा है- ' उपागमत्-ध्यानेन उपासितवती । यद्वा - तत्र ज्वलमानमग्निमुपासितवती ' । यहां हवनकी गन्ध ही नहीं है । यह तो हनुमानकी जलती हुई पूछकी श्रग्निके लिए कहा है । इधर " अयज्ञो वा एष यद् प्रपत्नीकः इस वादि - सम्मत प्रमाणके धनुसार ' अपतिक ' यज्ञ भी नहीं हो सकता, पत्नीका पतिसे स्वतन्त्र यज्ञ कहीं आया भी नहीं है । जैसे यज्ञ नहीं कहा गया है, वैसे ही भी उपपन्न नहीं हो सकता । यज्ञका फल प्राप्त हो जाय, तो हो जाने वादीको मृतकश्राद्ध ' मतानुसार भी ' हुताशनमुपागमत् ' ( ग ) ' मन्त्रज्ञा- कैकेयी ' इस रामायणमें सीतासे पृथग्भावमें श्रीरामका श्रीरामके पार्थक्य में श्रीसीताका यज्ञहवन यदि एक की दूसरा प्राहुति दे और उसे एकके कर्मसे दूसरे को भी फलप्राप्ति सिद्ध मानना ही पड़ जायगा । इससे वादीके का अर्थ हवन नहीं हो सकता । पदका ' राजनीतिक मन्त्र में चतुर कैकेयी ' यही प्रकृत अर्थ है । यहां ' वेदमन्त्र ' शब्द नहीं है, जिससे वादीका अर्थ हो सके । इसके अतिरिक्त वेदसे भिन्न मन्त्र भी हुआ ही करते है-' सानुगाय यमाय नमः, भद्रकाल्यै नमः ' इत्यादि वेद - मन्त्रोंसे भिन्न मन्त्र भी वादीके स्वामीने अपनी ' सं.वि. ' में मान ही रखे हैं ।.. रामायणके प्रकृत-स्थलमें सुमन्त्र जैसे राजनीतिज्ञ मन्त्रीको उत्तर देनेके समय ' वेदमन्त्रोंको जाननेवाली होना ' अर्थ साभिप्राय भी नहीं है, और न ही उसमें कोई उपपत्ति ही है, अतः इष्ट नहीं । तब यहाँ ' मन्त्र ' का अर्थ ' विचार ' ही है । इसलिए ' तिलक ' टीकामें लिखा है- ' मन्त्रज्ञा- स्वकार्ये वक्तव्यज्ञा ' । यही गोविन्दराजने - लिखा है- ' मन्त्रज्ञा राजनीत्यनुसारेण स्वकार्योचितः विचारज्ञा ' । तब वादीका प्रयास विफल है । आश्चर्य यह है कि अपने गलत पक्षको सिद्ध करनेकेलिए: यह लोग कैसे - कैसे षड्यन्त्र करते हैं!!! रामायणके कई प्रमाण [ १५ ॥ १५० ( घ ) ताराको जो मन्त्र जानने वाली कहा है, वह तो वाल्मीि अनुसार वानरी थी, इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) में आरम्भिक निव हैं? देखो!, तब वह बादीके अनुसार वेदमन्त्र जानने वाली कैसे हो सकते जाय है? हमारे अनुसार देवयोनि होनेसे उसे मन्त्र जानने वाली कहा है । तारा इसलिए ' तिलक ' में लिखा है- ' स्वस्त्यनमन्त्रवेत्त्री तारा, देवांशला प्रका तदु - वेदनम् ' । अथवा मन्त्र ' भद्रकाल्यै नमः ' प्रादिको तरह वेदभिन्नः हुआ करते हैं - यह हम पहले बता ही चुके हैं । उक्त रामायणके. • पद्य कर्ता ' मन्त्र ' के साथ ' वेद ' शब्द लिखा भी नहीं है, जिससे ' वेदमन्त्र ' ही प्रयं ते देखि अनिवार्य हो । वा.रा.में स्त्रियोंके मन्त्र वेदभिन्न आये हैं, ऐसा हम ( सीता भागमें दिखा चुके हैं । इसी प्रकार यहाँ ' गोविन्दराज ' ने लिखा चाहि ' मन्त्रवत् स्वस्त्ययमन्त्रवत्, मन्त्रश्च वैदिकादन्य इति ज्ञेयः । ' ( १२ वस्तुतः यहां भी ' मन्त्र ' का अर्थ विचार है, क्योंकि —– ठाराने मन्त्र ' विजयैषिणी ' कहा है । तब ' शब्दस्यान्यस्य सन्निधि: ' इस शब्दादी तीनो नियन्त्रण करने वाले प्रसिद्ध हेतुसे ' मन्त्र ' का अर्थ विचार भी सम्भव यहाँ सकता है, जैसाकि वादीके स्वामी अपने ' स.प्र. में मन्त्रोंसे अस्त्र चलायें इकट अवसर पर ' मन्त्रशक्ति ' पर विश्वास नहीं करते । जैसे कि ये सब बड़े सन्ध्य • जिनसे अस्त्र - शस्त्रों को सिद्ध करते थे, वे ' मन्त्र ' अर्थात् ' विचार ' से ि थी, करते और चलाते थे, और जो मन्त्र अर्थात् शब्दमय होता है, उससे स्वाधि द्रव्य उत्पन्न नहीं होता । जो कोई कहे कि -मन्त्र से अग्नि उत्पन्न है एक है, तो वह मन्त्र जप करनेवाले के हृदय और जिह्वाको भस्म कर दें । वैश्यो दिया मारने जाय शत्रुको, और मर जाय प्राप । इसलिए मन्त्र नाम है वि निर्मू का. जैसे- राजमन्त्री अर्थात् राजकर्मोंका विचार करनेवाला ' ( ११ ) १७३ ) पृष्ठ | वादीको चाहिये कि अपने आचार्यका भी अब प करे । इस प्रकार जब वादी भी मन्त्रशक्ति पर विश्वास नहीं करता, तब प्रकृत स्थल पर ' वेदमन्त्र ' श्रर्थं अपने मन्तव्य के विरुद्ध कर ही कैसे
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[ १४ १५८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वाल्मीकिरे नक निक हैं? वादितोषन्यायसे कुछ क्षणकेलिए मन्त्रका ' वेदमन्त्र ' श्रथं भी माना हो जाय, तो भी वादीने देखा होगा कि - शास्त्र विरुद्ध वैसा प्रयोग करने पर कहा है । ताराके पति बालीका विजय तो दूर रहा, प्रत्युत वह मारा गया । इस देवांशला प्रकार किसी भी तरहसे वादीका पक्ष सिद्ध न हुआ । वेदभिन्न ( ङ ) ' त्रयः सन्ध्यां ' यहाँ राम, लक्ष्मणके साथ तीसरा सन्ध्योपासन-केप कर्ता राजमन्त्री सुमन्त्र था; तव इससे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । 7. श्रयं से, देखिये तिलकटीका — ' त्रयः सुमन्त्रेण सहिताः समाहितचित्ताः ' । श्रथवा हम ( सीताकी सन्ध्या भी ली जाय, तो वहीं सन्ध्या भी वेदमन्त्र - भिन्न समझनी लिखा है- चाहिए, क्योंकि उसका उपनयन नहीं हुआ था । इस विषय में हम पहले ( १२. में ) प्रकाश कर चुके हैं । यहाँ तीनों इकट्ठे मिलकर सन्ध्या मन्त्र तो बोल नहीं रहे थे कि तीनोंकी सन्ध्या एक मानी जाय । वहाँ तो न शब्दाद तीनोंकेलिए लिखा है- ' वाग्यता: ' श्रर्थात् चुपचाप सन्ध्या कर रहे थे । सो 7 सम्भव यहाँ चुपचाप सन्ध्याकालकी उपासना - वन्दना ही इष्ट है, वेदमन्त्रोंकी स्त्र चलायें इकट्ठी सन्व्या करनी यहाँ न इष्ट है; न लिखी है । उस समय कौनसी " ये सब ब सन्ध्या प्रचलित थी, जो केवल वेदमन्त्र की थी, जो स्त्री - शुद्र सबकी एक ' सेि थी, यह वादीको सप्रमाण बताना होगा । पहले तो सन्ध्या सवकी स्व-उससे स्वाधिकार के अनुसार थी, साम्यवाद नहीं था, बल्कि द्विजों की सन्ध्या भी उत्पन्न है एक नहीं थी । ब्राह्मणोंकी सावित्री गायत्री, क्षत्रियोंकी त्रिष्टुप् और म कर दें. वैश्योंकी सावित्री जगती होती थी । स्त्री और शूद्रोंको इनमें कोई छन्द है वि दिया ही नहीं जाता था— यह गृह्यसूत्रोंमें स्पष्ट है, तब वादीका पक्ष निर्मूल है । ( ११ अव ( च ) सीताकी सन्ध्या, तथा यज्ञोपवीतके विषयमें पहले ( ६, १२ झ ) लिखा जा चुका है वहीं इस भागका उत्तर देख लेनेका पाठक कष्ट करें । रता, त कैसे कर पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् [ १५६ ( १४ ) " पञ्चजना मम होत्रं जुषव्वम् " पूर्वपक्ष - यज्ञियासः पञ्चजना मम होत्रं जुषव्वम् ' ( ऋ.सं. १०१५३ । ४ ) हे देवो! श्राप यज्ञ सम्पादन करते हुए निषादको मिलाकर पांचों वर्ण मेरे श्रग्निहोत्रका सेवन करो । निरुक्तमें उद्धृत इस मन्त्रमें यज्ञका अधिकार शूद्र और निपादों तकको भी दे दिया गया है । अतः इनका वेदाधिकार भी सिद्ध ग्रा ' ( श्रीरवि., वादी घ.दे.जी, श्री शाण्डिल्यजी, श्रीतकंरत्नजी, श्री वि.दे. शास्त्री आदि ) । उत्तरपक्ष – निरुक्तमें इस मन्त्रमें यज्ञ- प्रकरण होनेसे ' पञ्चजन ' का ' गन्धर्वाः पितरो देवा:, असुराः, रक्षांसि इत्येके ' ( शा १ ) यह भी अर्थ किया है - यह ठीक भी है, क्योंकि प्रकृतोपयुक्त है । उपवेदमें लिखा है-' देवास्तथा शत्रु - गणाश्च तेषां ( असुराः ), गन्धर्वयक्षाः पितरो भुजङ्गाः । रक्षांसि या चापि पिशाचजातिरेषोऽष्टधा देवगणग्रहाख्यः ' ( सुश्रुतसं. उत्तरतन्त्र ६०1७ ) यह देवताओंके ग्राठ वर्ग हैं, इनमें निरुक्त - प्रोक्त देवताओंके पंचवर्ग पञ्चजन जानने चाहियें । ( २ ) ' पंचजनानामुक्थ्यं देवमनुष्याणां गन्धर्वाप्सरसां सर्पाणां पितृणां च ' ( ३।३१ ) यह ' ऐतरेय--ब्राह्मण ' में प्रथं किया है । ( ३ ) ऋ. ( १।१००।१२ ) में श्रीमायणाचार्यने ' पाँचजन्य: - गन्धर्वाः, अप्सरसः, देवाः, श्रसुराः, रक्षांसि पंचजनाः, तेषु रक्षकत्वेन भवः, एवम्भूतो मरुत्वान् ' यह अयं किया है । ( ४ ) ऋ. 21 ६६।२० में ' पांचजन्य: - निषाद - पंचमाः चत्वारो वर्णाः पंचजनाः, यद्वा-गन्धर्वाः, पितरो देवा असुरा रक्षांसि इत्येते पंचजनाः, अथवा देवमनुष्याः, गन्धर्वाप्सरसः, सर्पाः, पितर इति ब्राह्मणेऽभिहिताः पंचजना:, तेषां तदभीष्टदानेन स्वभूतः ' यह अर्थ किया है । ( ५ ) ऋ. ५।३२।११ में ' पंचजनेभ्यो मतुष्येभ्यो हितः ' यह व्याख्या की है । ( ६ ) ऋ. १०१५३१४-५ मन्त्रके भाष्यमें श्रीमायणने ' यज्ञियाः पञ्चचना देवमनुष्यादयः यह अर्थ किया है । ( ७ ) ऋ. ६।१११४ मन्त्र के भाष्यमें पंचजनाः - ऋत्विग्यजमान-लक्षण: ' यह अर्थ किया है । अर्थात् ' चत्वार ऋत्विजो होत्रध्वयूं द्गातृ-
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१६० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ब्रह्माणः, पंचमो यजमानः । ( ८ ) शतपथ ब्राह्मणमें ' चत्वार ऋत्विजो बृहस्पति ( ब्रह्म ) पंचमाः, ते नाकसदो यज्ञे । ' ( ८।६।१।११ ) यह पंचजन का अर्थ किया है । ( ६ ) चत्वारो महर्त्विजो यजमानश्च " यह श्रीमही-घराचार्यने यजुः १२।२३ मन्त्र के भाष्यमें अर्थ किया है । ( १० ) चार वर्णं, पंचम निषाद यह अर्थ भी ' पंचजना मम होत्रं जुषध्वम् ' मन्त्रमें किया जाबे, तब भी हमारे पक्षकी हानि नहीं । यह वहाँ ननुष्योंका वर्णन नहीं, किन्तु इस मन्त्रके देवता ' देवा ' हैं । देखिये इस पऱ अजमेर वैदिक यन्त्रालयकी छपी ' ऋग्वेद संहिता ' । इसके ५७७ पृष्ठ में इस मन्त्रका ' ऋषि ' सौचीक ' अग्नि ' दिया है, और देवता ' देवा ' लिखे हैं । तब यह देवताओंका विशेषण है कि इस जातिके देवता । जैसे कि - ' बृहदारण्यक ' उपनिषद्में देवताओंका वर्णविभाग श्राता हैं । जैसे- ब्राह्मण कोटिमें वृहस्पति आदि, क्षत्रिय कोटिमें इन्द्र आदि, वैश्य-कोटिमें ' मरुत् ' प्रादि, शुद्रकोटिमें पूषा, असुर आदि ( १।४।११-१२-१३ ) हैं । श्री तर्क रत्नजीने भी ' अछूतोद्धार निर्णय ' के १०५ पृष्ठमें इसी प्रकार माना है । इसी प्रकार निषाद - कोटिके भी देवता होते हैं । जैसे कि- निरुक्त प्रोक्त ' राक्षस ' । श्रथवा निरुक्त- प्रोक्त इन्हीं देवताओंको औपमन्यवने पांच वर्गोमें स्थापित कर दिया है, यह स्वयम् शन्वित कर लेना चाहिये । इसलिए देवताओं को भी ' पंचजन ' कहा जाता है, जैसेकि - इसका प्रमाण ' जैमिन्यु-पनिषद् ब्राह्मण ' में देखिये – ' ये देवा असुरेभ्यः पूर्वे पंचजन्ना प्रसन् ' ( १।४१।७ ) इससे पाँच वर्गों वाले देवताओंको अग्निकी ओरसे ( क्योंकि-इसका ऋषि वही है, उसीका देवताओंसे संवाद है, जैसे कि - निरुक्त ( ३८१ ) के भाष्यमें दुर्गावार्धने कहा है – ' सौचीकस्य अग्नेरार्पम्, तस्य विश्वैर्देवैः सह संवादः ' कहा जा रहा है कि- ' ऐ पाँच वर्ग वाले देवताओ! मेरी हविको तुम लोग सेवन करो । इसमें मनुष्योंकी कोई बात ही नहीं । देवता तथा मनुष्य वेदके मतसे भिन्न - भिन्न योनि वाले होते ' पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ' १ हैं, इसे ४ र्थ पुष्पमें बताया जायगां । श्रतः यहाँ वादीका पक्ष सर्वदा ही सिद्ध हुआ, क्योंकि यहाँ पर देवता ही यज्ञसम्पादन करने वाले हैं, निषादादि मनुष्य नहीं । क्योंकि - मन्त्रमें ' देव ' देवता होनेसे ' देव ' इ प्रतिपाद्य हैं । अग्नि ' ऋषि ' होनेसे प्रतिपादक है । है क ११ – श्रथवा – यहाँ पर चार वर्ण, पांचवां निषाद मनुष्य यही श्र रा भी कर दिया जाय; तब भी हमारे पक्षमें कोई हानि नहीं पड़ती । नि अर्थसे मनुष्यमात्रका नाम ' पंचजन ' है, यह सिद्ध होता है । फिर उसका ना विशेषण मन्त्रमें है - ' यज्ञियाः ' । इसका अर्थ हुआ कि - ऐ यज्ञके योग्य ग मनुष्यो! मेरे होत्र ( यज्ञ ) का सेवन करो । विशेषण सदा साभिप्राय हुआ करता है । यदि मभी मनुष्यों को यज्ञका अधिकार हो, तो ' जिया ' विशेषण अनर्थक हो जाता है, क्योंकि - श्रव्यभिचारमें विशेषण निरखंड होता है । यह एक प्रसिद्ध न्याय है कि - ' सम्भव व्यभिचाराम्यां स्यादे विशेषणमर्थंवत् ' । वादी अपने नाम के साथ ' मनुष्य ' विशेषण लिखे, तो व्यभिचारी आ प्रसक्ति प्राप्त न होनेसे उक्त विशेषण व्यर्थ हो जायगा । पर ' अश्वत्थामा म नरो हतः ' यहाँ पर ' अश्वत्थामा ' का ' नरः ' विशेषण सार्थक है; क्योंकि- सब अश्वत्थामा गजमें अश्वत्थामा नामसे व्यभिचार प्राप्त था, उसके निवारणाएं का ' नरः ' विशेषण सार्थक हुआ । इसी प्रकार ' पंचजन ' निरुक्तानुसार जा यह मनुष्यमात्रका नाम है; और मनुष्यमात्र ही यदि यज्ञका अधिकारी है, ता अप श्रमनुष्यमें व्यभिचारकी प्रसक्ति न होनेसे यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा । में पर यह विशेषण जबकि व्यर्थ नहीं, किन्तु साभिप्राय है, तब इसके प्रयोद का रहस्य समझना चाहिये । आ क वह यह है कि - ' यज्ञिय ' का अर्थ है । ' यज्ञयोग्य ' इसकी सिद्धि ' प क्य ऋत्विग्भ्यां घखनौ ' ( पा. ५।१।७१ ) इस सूत्र से ' घ ' प्रत्यय करनेपर होई. सम है । ' घ ' को ' इय ' श्रादेश होता है । वार्तिककारने इसका अर्थ लिखा है- जा स ० ध ० ११ सा
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| १६ | १६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) क्ष सर्वा वाले इ ' यज्ञ - ऋत्विग्भ्यां तत् कर्म प्रर्हति - इति उपसंख्यानम्, यज्ञानुष्ठानमर्हति ' देव ' ही इति यज्ञियः ' । अब प्रश्न यह रहता है कि यज्ञयोग्य ' पञ्चजन ' [ मनुष्य ] कौनसे हैं, इसपर उत्तर ' शतपथ ब्राह्मण ' में लिखा है- ' ब्राह्मणो वैव, यहीं राजन्यो वा वैश्यो वा, ते हि यज्ञियाः ' ( ३ | १ | १ | ६ ) ती । इस निरुक्तानुसार मनुष्यमात्रका नाम है, तथापि ' यज्ञिय ' कर नाम होनेसे शेष मनुष्योंकी निवृत्ति हो गई, इससे उसका ज्ञके योग् गया । साभिप्राय १२ अथवा – यहाँ वादीके आग्रहानुसार ' चार । यद्यपि ' पञ्चजन ' श्रादिम तीन वर्णोंका भी वादीका पक्ष गिर वर्ण, पांचवां निषाद ' " यज्ञिया ये सभी मनुष्य ' यज्ञिय ' हैं— यज्ञके सम्पादक हैं- यह श्रर्थ मान लिया निरखंड जाय, तथापि हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं । यज्ञका करना कराना तो ब्राह्मणादि ही करेंगे । शूद्र- निषादादि भी यज्ञमें अपने योग्य सहायता देंगे । निषाद यज्ञिय भूमिके मार्जनका प्रबन्ध करेगा, शूद्र भूमिका शोधन, सेचन लेपन करेगा, निमन्त्रित पुरुषोंके श्रावासस्थानका निर्माण तथा मार्गनिर्माण भिचारणी श्रादिकी सेवा करेगा, वैश्य घनदान द्वारा, क्षत्रिय रक्षा - द्वारा, ब्राह्मण प्रश्वत्थामा " मन्त्रोच्चारण एवं यज्ञके अनुष्ठानके द्वारा यज्ञका कृत्य करेंगे । सेवा क्योंकि- सबको नहीं दी जाती, सेवा शूद्रका कर्म है । ब्राह्मणको झाड़ने- बुहारनेका निवारणा काम नहीं दिया जा सकता । शूद्र - निषाद आदिको सेवाके अतिरिक्त जा यज्ञानुष्ठान यजनयाजन करानेका कार्य नहीं दिया जा सकता । सब अपने-नुसारहै, तब अपने योग्य, यज्ञसे सम्बन्ध रखने वाले कृत्योंको करते हुए ' यज्ञिय ' कहे जायगा । जा सकते हैं । ' यज्ञियाः पाशाः, यज्ञियः प्रदेश: ' यह प्रयोग भी वेद - वेदाङ्गों-में आते हैं, तो क्या प्रदेश वा पाश आदि भी ऋत्विक्की तरह यज्ञमें सके प्रयो अधिकृत होते हैं? क्या वे मन्त्रोंको बोला करते हैं? वा यज्ञ किया-कराया करते हैं? कभी नहीं । वैसा होनेपर तो प्रसङ्गति हो जायगी, सद्धि ' य क्योंकि यह चेतन नहीं । वस्तुतः यह प्रदेशादि, परम्परासे यज्ञकार्यके नेपर होने सम्पादनमें सहायता देते हैं, अतः वे उपचार ( परम्परा ) से ' यज्ञिय ' कहें लिखा है- जाते हैं, साक्षात् नहीं । दासी ( शूद्वा ) पीसती है, पत्नी ' घीको देखती है, साफ करती है, सोमवल्लीके रसको निचोड़ कर देती है, पानीका घड़ा भर ' पञ्चजना मम होत्रं जुपध्वम् ' [ १६३ देती है । समिधाएं ठीक कर देती है । इस प्रकार भूशुद्धि आदि सभीका अपना - अपना अधिकृत कर्म हो जाता है । इस तरह शूद्रादि भी औपचारिक-रूपसे यज्ञिय हो जाते हैं । १३ प्रथवा - यहाँ अन्य रहस्य है । हम पूर्व सूचित कर चुके है कि निरुक्तकारने ' ग्रथ मनुष्यनामानि ' इन निघण्टुप्रोक्त मनुष्य – नामोंका निरूपण करते हुए लिखा है कि- ' तत्र पञ्चजना इत्येतस्य निगमा भवन्ति ' ( ३८१ ) । सो पञ्चजन ' का निगम श्रीयास्कने उक्त मन्त्र दिया है । तब उनके अभिप्रायके अनुसार यह ' पञ्चजन ' मनुष्यमात्रार्थक हुआ । ' पञ्चजनाः ' का विशेषण है ' ऊर्जाद: ' इसका प्रयं श्रीयांस्कने ' अन्नादा: ' किया है, ' यज्ञियाः ' का अर्थ ' यज्ञसम्पादिनः ' यह वादीने किया है, इसका अर्थ हुआ कि - यज्ञ सम्पन्न करनेवाले ' । अब यह योजना हुई कि है अन्नादा श्रतएव यज्ञसम्पादकाः पञ्चजना:! ऐ अन्न खाने वालो, इसीलिए यज्ञकी पूर्ति करने वाले पञ्चजनाः हे पांच मनुष्यो! मम ऋपे होत्रं-द्रवम्, श्रह्वा ' [ श्रीसायणने- ( १०।५३१५ ) में यही अर्थ किया है ] जुपध्वम्- सेवध्वम् ' मेरा श्राह्वानं [ बुलाना ] सुनो । हम ' घथेमां वाचं ' निवन्धमें बता चुके हैं कि ऋषि लोग बड़े - बड़े यज्ञ करते थे, उसमें ' दीयतां भुज्यताम् ' इस जोरदार कही हुई वाणीका लाउडस्पीकरके ढंगसे प्रयोग करते - कराते थे । यज्ञकी समाप्तिमें उस यज्ञ-की सफलतार्थं बड़ा भोज किया जाता था, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पञ्चम इन सभी पाँच प्रकारके मनुष्योंको - जो अपनी - अपनी पृथक् पंक्तिमें स्थित होते थे — भोजन, बिना भेदभावके [ यह नहीं कि-ब्राह्मणको तो पेड़ा - बर्फी आदि दिया जावे, शूद्रादिको न दिया जावे, ऐसा नहीं ] दिया जाता था । इस विषयमें हम ' यथेमां वाचं ' निबन्धमें पर्याप्त स्पष्टता कर चुके हैं, सो यहाँ पर भी यही बात है । उन मनुष्योंकेलिए यह कहा जा रहा है कि - यज्ञान्तका अन्न खाकर यज्ञको सम्पन्न ( सफल ) करने वाले पञ्चजनो! मेरी ' दीयताम् भुज्यताम् ' इस कही जाती हुई
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१६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वाणीके प्राह्वानका सेबन करो, अर्थात् अपनी - अपनी पंक्ति में कल्याणी भाकर भोजन प्राप्त करो । इस प्रकार इस मन्त्र तथा ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' इस मन्त्रकी एकवाक्यता एकार्थता हो गई । तब इससे वादी से अभिमत दोनों मन्त्रोंका अर्थ खण्डित हो जानेसे हमारा पक्ष ही समूल सिद्ध हुआ । ( १५ ) जातिपक्षकी आलोचना । पूर्वपक्ष- सुप्रसिद्ध सनातनधर्मी विद्वान् श्रीकाशीशेषवेङ्कटाचलशास्त्री ने ' लघुत्रिमुनिकल्पतरु ' में लिखा है- ' ब्राह्मणेन षडङ्गो वेदोऽध्येपो ज्ञेयश्च ' ' भ्रष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत ' भ्रत्र ब्राह्मणपदं जातिपरम्, तैन ब्राह्मणजातीयानां पुंसामिव स्त्रीणामपि तज्जातीयानां तदध्ययनमध्यापन-मुपनयनं च भवति ' तब इससे स्त्रियोंका भी उपनयन और वेदाध्ययन सिद्ध हुआ । जातिपक्षका यह भाव है कि - ' योऽत्रागमिष्यति, स व्यापाद-यिष्यते ' यहांपर ' यः ' और ' सः ' यद्यपि पुंलिङ्ग दीख रहे हैं, तथापि यहाँ जातिपक्षसे पुरुष और स्त्री दोनोंका बोध हो जाता है, नहीं तो ' जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु: ' इसमें ' जात ' शब्दके पुलिङ्ग होनेसे स्त्रियोंकी मृत्यु नहीं होनी चाहिये, पर ऐसा नहीं होता । इसी प्रकार ' अष्टवर्ष ' ब्राह्मणमुपनयेत ' में भी जातिपक्षवश स्त्री - पुरुष दोनोंका ही उपनयन सिद्ध है । ( एक सिद्धान्तालंकार; सार्वदेशिक जून १ ९ ४६ ) श्रोशाण्डिल्यजी, श्रीम.शं श्रीइन्दु, श्री तुल. रा. स्वामी आदि ) । उत्तरपक्ष - सनातनधर्म व्यक्तिविशेष पर निर्भर नहीं, वह तो अपने प्राचीन साहित्य पर अवलम्वित है । जो विद्वान् स.ध. के प्राचीन-साहित्यसे कुछ प्रशमें विरुद्ध है; उसका दायित्व न हम पर है, न स.घ. पर । हम उसका प्रत्युत्तर देंगे । वादीने ही उसका उद्धरण दिया है, अतः उत्तरदायित्व भी उसीपर है । नहीं तो हम जिन प्रायसमाजी विद्वानोंका जातिपक्षको आलोचना [ १६५ १६६ मत दिखलाते हैं । वादी उसे क्यों नहीं मान लेते? वस्तुतः विज्ञ सनातनधर्मी उक्त वचनमें जातिपक्ष नहीं कह पुसो ज क्योंकि ८-११-१२ वर्षमें कन्याका भी उपनयन मानने पर सकता; । धेयं दश पढ़ना पड़ेगा, उसके बाद जातिपक्षके अनुसार २५ वर्षमें उसका उसे बेद वादीके करना पड़ेगा । ' पिता पितृव्यो भ्राता वा इस वादीसे मान्य यमवचनरे विवाद बालिका कन्याको पितृगृहमें रहना पड़ेगा । तब पिताके घरमें उसे रजोदर्शनवम णामांव ' पितुर्गे हेतु या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता । हस्तस्याः २२३४० कन्या दृषली स्मृता द्यम ३१२२.स्वाम हिको पद्योंसे विरोध पड़ेगा । यहां ' असंस्कृता ' का ' मन्त्रैर्यदि यदि न संस्कृता ( वसिष्ठ १७ ६५ ) की भांति ' अविवाहिता ' अर्थ है ' अनुपनीता ' । ( २६/१ क्योंकि इसमें भ्रणहत्या, वृषलीपतिः ' प्रादि भी लिङ्ग हैं, उनका उपन नहीं; श्रमंस्त्रक से कोई सम्बन्ध नहीं । ' अनुपनीता ' अर्थ होने पर ७-८ वर्षसे उपनीत अपि अ लड़की प्राचार्यकुलमें रहेगी; तब रजोदशामें पितृगृह व होनेसे यह पर ( श्री जैमिनि मुकुन निर्विषय हो जायगा । इसलिए “ रजस्वला च या कन्या यदि स्यादयस्तु विवाहिता । वृषली ' ( २१।५ ) यह लध्वाश्वलायनमें ' असंस्कृता ' का पयार जातिपक्ष ' अविवाहिता ' है । शङ्करदिग्विजयका ३ । ४० पद्य भी इसमें साक्षी है । तब सिद्ध हुआ कि कोई विज्ञ सनातनधर्मी ' अष्टवर्ष ' ब्राह्मणमुपनयेत '; श्रव जातिपक्षसे कन्याका ग्रहण नहीं करेगा । वृषलीका विवाह स. देखें-- १ निन्दित है, और वृषलीको वेदाधिकार नहीं हो सकता । १२ वर्षके शाद श्री हरदत्त अभी उसने वेद पढ़ना जारी ही नहीं किया होगा कि वह वृपती है तस्यैव म जायगी, और उसका वेद पड़ना बन्द हो जायगा । ( आपस्तम उच्यन्ते ' • जातिपक्ष तब बांधित हो जाता है, जब उसके बाधक वचन मि तूष्णीं कृय जावें । श्रथवा जहाँ केवल पुरुषके वा केवल स्त्रीके ग्रहणके लिङ्गमि प्रमन्त्रकम जावें, वहाँ भी जातिपक्ष वान्धा जाता है । जैसे- ' जो यहाँ प्रायगा, ५ स्त्रियै मारा जायगा । ' यहाँ यदि ' स्त्रीको छोड़कर यह अपवाद मिल जाये, स्कं गृ. १ पहला वाक्य जातिपरक नहीं रहता । इसी प्रकार ' प्राङ नाभिवर्धन १० ) ८