सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 111–120
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 111–120
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[ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६५ १६६ / विधीयते । मन्त्रवत् प्राशनं चास्य ' [ मनु. २२६ ] ' नाम-पुंसो जातकर्म द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् ' [ मनु. २।३० ] इत्यादि पद्यों में सकता; धेयं दशम्यां तु ' अस्य ' को जातिवाचक मानकर यद्यपि उससे बालक-उसे बेद वादीके अनुसार दोनोंका ग्रहण सम्भव था, तथापि ' अमन्त्रिका तु कायय स्त्री विवाह बालिका. नमवचनसे णामनु॑दशेषतः ' [ मनु. २।६६ ] इत्यादिपद्य, तथा २।२६ पद्य में ' पु'सः ', दर्शन ३४ पद्य में ' शिशोः ' पदसे जातिपक्ष बान्धा जाता है । इस प्रकार ' वैवा-. तस्याः सा हिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः [ २।६७ ] ' एताः क्रियाः ’ दि स्मृति: ' ) वृहद् विष्णुस्मृति २६ १३ ) ' तासां समन्त्रको विवाह: '. स्त्रीणाममन्त्रका संस्कृत ( ०६१४ ) एतयैवाढता स्त्रियास्तुष्णीम् ' ( गोभि.गु. २२/२३ ) तूष्णीम्-ता ' नहीं; श्रमन्त्रकमेव यह यहाँ ' सामश्रमी ' ने व्याख्या की है, ' स्त्रियाः कन्यकाया उपन अस्तनोक्ताः ( चूड़ाकरणान्ताः ) संस्कारा अमंन्त्रकम् ' यह म. म उपनीत श्री मुकुन्दशर्माने व्याख्या की है ) ' आर्तव स्त्रियाः कुर्याद् श्रमन्त्रम् ' यह प ( जैमिनि १।११ ) श्रातैव कुमायें ' ( आश्वला गृ. १११५।१२ ) ( कुमा द स्याह यस्तु श्रमन्त्रकं कुर्यात् इति गार्ग्यनारायणः ) इत्यादि बाधक वचनोंसे का पर्यार जातिपक्ष बाधित हो जाता है । नाक्षी है । अब ' आलोक ' के पाठकगण इस जातिपक्षके बाधक अन्य वचन भी नयेत ' देखें- १ ' आवृतैव कुमार्ये ' ( आश्व. १ | १३ | ११, १ | १४ | ७, १११५।२० ) स.प वर्षकेश श्री हरदत्तने ' प्रावृत् ' का अर्थ दिया है - ' समन्त्र केऽनुष्ठानप्रकारेऽन्यत्र विहिते वृपली ह तस्यैव मन्त्रवजितस्य वचनमावृत् ' ( १११ ९ १५ ) २ ' आवृतश्च श्रस्त्रीभ्यः ' ( आपस्तम्बगृ. १।२।१५ ) यहाँ हरदत्तकी वृति - ' मन्त्ररहिताः क्रिया आवृत उच्यन्ते ' । ३ ‘ मानव गृ. ( १११७३१ ) में अष्टावक्रभाष्य - ' कुमार्ये श्रावृता-वचनमि तूष्णीं कुर्याद् ' । ४ स्त्रियास्तूष्णीम् ' ( गोभिल. २८२५ ) सामश्रमी तूष्णीम्-लङ्गग्रिमन्त्रकमेव । ५ ' यद् श्रमन्त्राः स्त्रियो मता: ' ( बोधायन घ. १ | ११ | ५ ) यगा, ५'स्त्रियै मूर्धानमेव श्रवजिघ्रति तुष्णीम् ' ( विना मन्त्रेण - हरिहर ) ( पार-जायेक गृ. १११८१३-६ ) ७ ' आवृतं ( विना मन्त्रं ) स्त्रिये ' ( बोघा.गृ. १।१२-भवर्ष १० ) ८ तूष्णी ( मन्त्रवर्णम् इति रुद्रस्कन्दः ) स्त्रिया ' ( ब्राह्यायण गृ. २1 जातिपक्षकी श्रालोचना [ १६७० १।१३ खादिरगृ. २।३।१५ ) ६ ' सर्व स्त्रिया विमन्त्रं तु कार्य ' ( वृहत्प-राशर - स्मृति ४।१४७ ) इत्यादि बाधक वचनोंसे स्त्रीका ग्रहण कराने वाला जातिपक्ष बाधित हो जाता है । तव जव कन्याओंके कर्ममें मन्त्र - पाठ का भी निषेध है, तब उनका मन्त्राधिकारप्रद - उपनयनमें अधिकार कैसे हो सकता है? * ( फ ) यदि वादीके अनुसार जातिपक्ष अबाधित है, तो क्या वे ' केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते । राजन्यवन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्व यधिके ततः । ( मनु. २।६५ ) यह केशान्त ( मुण्डन ) १६, २२, २४ वर्षकी कन्याओंका कराते हैं? यह अवस्था वादियोंके अनुसार कन्याओं के विवाहकी है । ( ख ) यदि जातिपक्ष प्रवाहित है; तो यदि विवाहका आदेश २५ वर्षमें करनेका है, तो २५ वर्ष वाले पुरुषके साथ २५ वर्षकी लड़कीका विवाह क्या वादि - सम्मत है? यदि पूर्ण ब्रह्मचारीका विवाह ४८ वर्षमें हो; तो जातिपक्षानुसार पूर्ण ब्रह्मचारिणी का भी ४८ वर्षीय विवाह क्या वादि-सम्मत है? यदि वादी प्रपवाद वचनों से यहां जातिपक्षको वाधित समझ;: तो हमारे मतमें भी यही व्यवस्था है । ( ग ) यदि जातिपक्ष प्रवाधित है, तो नपुंसकोंका भी गर्भाधान उपनयन, वेदाध्ययन, विवाह आदि वादीको मानना पड़ेगा । यदि वे ऐसा नहीं करते; तो जातिपक्ष वाघित सिद्ध हुआ । ( घ ) ' आज श्रमुकके वर पुत्रका विवाह है, ऐसा पत्र यदि मिले; तो हमें उसकी पुत्रीका विवाह भी क्या साथ मान लेना पड़ेगा? ' राजा दशरथके चार पुत्र हैं ' इस वाक्य में क्या उसकी चार लड़कियां भी मानी जा सकती हैं? यदि नहीं, तो जातिपक्ष बाधित ही हो गया । इसी कारण ' पुत्रे जाते वरं ददाति ' ( मान-वगृ. १।१७।१ ) यहाँ पर भ्रष्टावक्रने लिखा है- ' पुत्रे जाते सति नतु दुहि-तरि जातायाम् । तस्यां तूष्णीमेव कुर्यात् '! वस्तुतः श्री वेङ्कटाचल - शास्त्रीका यह अपना पक्ष नहीं है; जैसेकि वादीने लिखा है, यह तो शास्त्रिमहोदयने पूर्वपक्ष रखा है, अब उन्हींसे
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१६८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) दिया उत्तर - पक्ष भी देखिये । वे लिखते हैं- ' परे तु - ' पुराकल्पे तु नारीणां ' इति यमोक्त: ' प्राश्मारोहणमारभ्य स्त्रीणां गौर्यर्चनं परम् । पुराणपठनं श्रेयो न वेदाध्ययनादिकम् ' इत्यादिस्मृतेश्च स्त्रीणां वेद - तदङ्गाध्ययनादिकं न- इत्याहु: ' [ लघुत्रिमुनिकल्पतरु १४ पृष्ठ ] इस पक्षका उक्त शास्त्रिमहोदय-ने फिर खण्डन नहीं किया, अतः यही उनका उत्तरपक्ष सिद्ध हुआ । वादियों में दूसरेके पूर्वोत्तर - प्रकरणको छिपाकर बीचके उद्धरण दे देना यह प्रकृति गुरुपरम्परासे चल रही है, इसीसे वे अपना निर्वाह करते आ रहे हैं । अब जातिपक्षका सम्बन्ध उनसे न होकर वादीसे ही हो गया, अतः हम उत्तर भी वादीको ही देते हैं । ( क ) गृह्यसूत्रों में ' अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमु नयेत ' लिखकर भी वहाँ जातिपक्ष के बाघार्थं कुमार, माणवक, वटु, बालक प्रादि शब्द आते हैं, अतः वहाँ बालिकाकी निवृत्ति होजाती है । इसलिए ' कुमारं जातं ' ( प्रस्व. १।१६।१५ ) पर श्रीहरदत्तने लिखा है- ' कुमारस्य इति अनुच्यमाने जातमिति लिङ्गस्याविवक्षितत्वात् कुमार्या प्रपि प्राप्नोति ( तन्निवृत्त्यर्थं ' कुमार-ग्रहणम् ' ) । ' आश्वला गृ. ' के उक्त ( १।१६।१ ) सूत्र पर गाग्यंनारायण-ने भी स्पष्ट लिखा है - ' कुमारमिति ( अनु — ) वर्तते, कुमारीनिवृत्त्यर्थं-मिति उक्तम् ' । ( १।१५।१ ) में उक्त वृत्तिकार - लिखते हैं- ( प्र ० ) कुमार-ग्रहणं किमर्थम्? ( उ ० ) अधिकारार्थम् । ' अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमुपनयेत इत्युपनयनं कुमारस्यैव यथा स्यात्, न कुमार्या इति ' ( प्र ० ) ननु ब्राह्मण-मिति पुंलिङ्गनिर्देशादेव न भविष्यति? ( उ ) न, जातिनिर्देशे लिङ्गम-विवक्षितम्, यथा- ' ब्राह्मणो न हन्तव्य इति ब्राह्मण्यपि न हन्यते । एवम-त्रापि स्त्रियाः ( उपनयनं ) प्रसज्यते, तन्निवृत्त्यर्थं कुमारग्रहणम् ' । कितने स्पष्ट शब्द हैं? यहाँ पर व्याख्याता श्रीहरदत्तमिश्र ने लिखा है- ' ब्राह्मण-ग्रहणं चात्र स्त्रीशूद्रादि - विनिवृतये ' । जाताधिकाराज्जननाद् अष्टमेन्दे भवेदिदम् ( उपनयनम् ) । कुमारमित्यधिकृतेनं स्त्रीणामुपनायनम् । ' इसी प्रकार गोभिल ( २/७/१६ ) के सूत्रकी व्याख्या करते हुए श्री -जातिपक्षकी चालोचना [ १६८ चन्द्रकान्त - तर्कालंकारने भी लिखा है- ( प्र ० ) ' ग्राह - कुमारप्रहार १७० किमर्थम्? ( उ ० ) कुमारी निवृत्त्यर्थम् । एवमेके; तद् असत् । कन्याका ' yara प्रावृता स्त्रिया: ' इति चूडाकरणान्तसंस्काराणां कुमार्या अपि कुतः? ) में णातु । ( प्र ० ) मन्त्रनिवृत्त्यर्थं तहि:? ( उ ) न, ' तूष्णीम् इति सू ब्रह्मचर्य १८ करणात् । [ प्र. ] कुमारग्रहणं तर्हि न कर्तब्यम् । अथ क्रियते प्रयोजनं वक्तव्यम् | ३ | तो ' चक अधिकारार्थम् - इति ग्रूमः । तेन उपनयादीनि व्रतानि कुमारस्यैव भवति ॥ पादव्यय न कुमार्याः । ’ ' ' तस्मात् कुमारग्रहणमुपनयनादिषु व्रतेषु कुमारीव्या को दाया नार्थम् । मनुरपि – ‘ अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषत: ' ' वैवाहिस पिता की विधिः स्त्रीणाम् ' इत्यादि । इससे जातिपक्षका वाघ होगया । वादिप्रदत्त भाष्यकारोंकी यह बात ठीक भी है, वेदानुकूल भी है । इसलिए बैद होनेसे क में ' मम पुत्राः शत्रुहणो अथो मे दुहिता विराट् ( ऋ. सं ० १० १५ ९ ३ ) ( ख यहाँ पर ' पुत्र ' शब्दसे पुत्रीका ग्रहण न हो मकनेके ही कारण पुत्री स्वामीने पृथक् ग्रहण किया गया । इसी प्रकार यदि स्त्री यदि वा पुमान् ' ( पर्व है, अतः ५।१४।६ ) ' त्वं स्त्री त्वं पुमानसि; त्वं कुमार उत वा कुमारी ' ( श्र. १५ ) निषिद्ध ह ८।२७ ) यहाँपर पुमान् से स्त्रीका, कुमारसे कुमारीका ग्रहण न हो सक ' सुरकृत्य ही इनका पृथक् - पृथक् ग्रहण किया । इसी कारण ही " शं नः करति संरक्ष्य क नृभ्यो नारिभ्यः ' ( ऋ. ११४३।६ ) यहाँ ' नृ ' से भिन्न ' नारी ' का ग्रह है, यह वा किया । इसी लिए ही ' सम्राज्ञी एधि श्वशुरेषु ' ( अथर्व १४ | १ | ४४ ) वह श्रथ स्वाम पर ' श्वशुर ' शब्द होने पर भी ' सम्राज्ञी उल श्वश्र्वा ' ( १४ | ११४ ) छोड़ देत श्वश्रूका पृथक् ग्रहण किया है । अनुसारी इससे स्पष्ट ही वेदके मतमें जातिपक्षका बाध हो गया । इसी प्रकार ' पुत्रो मे पण्डितः सर्वान् वेदान्, अनुब्रुवीत ' ( १४ / ९ / ४१७ ) इस शतपदी वाक्यमें पुत्र शब्दसे ' पुत्री ' का ग्रहण न हो सकनेसे ' श्रथ य इच्छेद् बुद्धि लड़कियों क मे पण्डिता जायेत ' ( १४।६।४।१६ ) यहाँ पुत्रीका पृथक् ग्रहण किया पर स्कता आ वेदारम्भम फिर भी उसे वेदका अधिकार नहीं दिया गया । इसी प्रकार ' प्रा उपनयमानो ब्रह्मचारिणं ' ( अथर्व. ११।५।३ ) यहाँ पर ' ब्रह्मचारिण ' १६ अमुक बाधित है
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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १७० ] मारग्रहस वेदको इष्ट न होनेसे ही ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( अ. १११५१ 1 कुतः कन्याका ग्रहण- ' को पृथक् कहा गया । उत्तरार्धके अनुरोधसे कन्याका अपि '१८ ) में ' कन्या ' इष्ट रखा गया । यदि जातिपक्ष सार्वत्रिक होता; करणात् । तो ब्रह्मचर्य ' घथैवात्मा ' उपस्थसंयम तथा पुत्रः, पुत्रेण दुहिता समा ' ( मनु. ६।१३० ) में दूसरा यम् ( उ. ) पाद व्यर्थ था, पुत्रसे पुत्रीका ग्रहण हो जाता । यह पद्य पुत्रके प्रभावमें पुत्री भवनि दायाधिकार बताता है; नहीं तो जातिपक्ष में पुत्रके होने पर पुत्री भी रोव्याक्तं को पिता की दायाधिकारिणी होती; पर ऐसा शास्त्र विरुद्ध है । इस प्रकार ‘ वैवाहिरों वादिप्रदत्त उपनयनसूत्र में भी सभी गृह्यसूत्रकारोंको जातिपक्ष बांधित इष्ट होने से कन्याका उपनयन नहीं होता । लिए ( ख ) श्रव जातिपक्षके बाघमें स्वा. द. जीके प्रमाण भी दिये जाते हैं-. १५११३ ) ण पुत्री स्वामीने उपनयन तथा वेदारम्भमें ' लड़का ' शब्दका १६ बार प्रयोग किया ( मर्थ है, अतः उनके मतमें जातिपक्षके बाघ होनेसे कन्याको यज्ञोपवीन (. १५ ) निषिद्ध हो गया । स्वामीजीने ब्रह्मचर्याश्रम - संस्कारमै ' मैथुनं वर्जय ' || हो सकरें ' सुरकृत्य वर्जय ' 1१४ ) ' स्वयमिन्द्रियस्पर्शेन वीर्यस्खलनं विहाय वीयं शरीरें रति संरक्ष्य ऊर्ध्वरेताः सततं भव । १५ । ( सं. वि. वेदारम्भ पृ. ३ ) यह लिखा का ग्रह है, यह बातें बालकोंमें समन्वित होती हैं; वालिकाओंमें नहीं । ' मैथुन ' का ४४ ) वह ग्रंथ स्वामीने लिखा है- ' स्त्रीका घ्यानं, प्रालिङ्गन, समागम आदिको जो डा छोड़ देता है, वह ब्रह्मचारी है ' ( पृ. १४ ) । यदि यहाँ गृह्यसूत्रों के अनुसारी उपदेशमें स्वामीको लड़की भी इष्ट होती, तो उसकेलिए भी सी प्रकार पुरुषके ध्यान, स्पर्श आदिका निषेध करते । क्षुरकृत्यसे दाढी - मूंछ आदिके शतपसं मूंडनेका निषेध है, लड़कियोंमें उसका श्रत्यन्ताभाव होनेसे भी यहाँ ि लड़कियों का ग्रहण नहीं होगा । इन्द्रिय - स्पर्शसे वीर्य का पतन तथा ऊर्ध्वरेत-कथा कता आदि भी लड़कियों का ग्रहण बाधित कर रहे हैं । यदि उपनयन-' आ वेदारम्भमें लड़की भी गृहीत होती, तो उसे भी शिक्षा होती कि अमुक-श्रमुक श्रङ्गको गुप्त रखो - केशवेश न करो, पर ऐसा न होनेसे जातिपक्ष बाधित है । तभी तो स्वामीजीने " द्विज अपने घरमें लड़कोंका यज्ञोपवीत जातिपक्षकी यालोचना [ १७१ थोर कन्याओंका भी ययायोग्य संस्कार करके " ( म.प्र. पृ. २० ) यह ' लड़कों और कन्याओंका भिन्न - भिन्न ग्रहण करके उपनयनमें जातिपक्षको काट दिया है । तभी तो ' यथेमां वाचं... ब्रह्मराजन्याभ्यां मन्त्रमें ब्राह्मणादिसे ब्राह्मणी श्रादिका ग्रहण वेदानुकूल न होनेसे ही स्वामीजीने ' स्वायं पदसे स्त्रियोंका ग्रहण करके सन्तोष कर लिया । इससे स्पष्ट ही जातिपक्ष बाधित सिद्ध है । पर स्वामीके अनुयायियोंने उनके वाक्योंमें बहुत स्थान कन्याका प्रक्षेप कर दिया है; इसलिए उनकी परस्पर विरुद्धता हो गई है । ' जब - जव हो, तब - तब कन्या ही हो, पुत्र न हो... तो उस स्त्रीको छोड़कर दूसरी स्त्रीसे नियोग करें ( स.प्र. ४ पृ. ७३ ) यहाँपर पुत्रीसे पुत्रको उत्कृष्ट बतला कर स्वामीने जातिपक्षकी कमर तोड़ दी है । ( ग ) इस प्रकार ' क्षुरकृत्यं वर्जय ' ( गोभिल ३११२२ ) ' न मुषितां ( नग्नां ) स्त्रियं प्रेक्षेत ' ( मानवगृ. ११११८, लौगाक्षि गृ. २॥१६, काठकगृ. १११८ ) ' न विहारार्थं जल्पेत् स्त्रीमिः ' काठक. शिकानि स्त्रीभ्यो वर्जयेत् ' ( वाराहगृ. ६ खं. ) बोधा. गृ: परिभाषा. ( १।१२।२ ) ' भ्रातृपत्नीनां जातवीर्यः । ( बोधायनधर्म. १1३1३४ ) ' सूतिका ' किगृ. २।१२ ) ' नास्य कामे रेतः स्कन्देत् ' ( श्मश्रूणि उन्दति ( प्राश्व.गृ. १।१६।३ ) ' इह् केशान् ' इति हरदत्तः । ' स्त्रीप्रेक्षणालम्भने ' ( ( १।१ ९ ) ' सर्वाणि सांस्प-' न स्त्रिया सह भुञ्जीत ' युवतीनां च गुरुपत्नीनां च रजस्वलां नेक्षेत ' ( कौषीत-खादिरगृ. २.५।१३ ) इह गोदाने इनश्रूणि उन्दति, न गौतमघ. ११२१२२ ) ' स्त्री-भिर्यावदर्य - सम्भाषी ' ( आपस्तम्वघ. १।३।१६ ) ' वर्जयेत् - स्त्रियः ' ( मनु. २।१७७ ) ' न रेतः स्कन्दयेत् क्वचित् ' (.२ / १८० ) ' स्वप्ने - सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामत: ' ( २1१८१ ) ' भैक्ष चाहर हश्चरेत् ' ( २११८२ ) समा-वृत्तो यथाविधि । उद्वहेत द्विजो भार्या ' ( मनु. ३।४ ) ' न स्त्रियमुपैति अष्टचत्वारिंशद् वर्षाणि ' ( ( ड आग्निवेश्यगृ. ११११४ ) ' प्रष्टचत्वारिंशत् सर्वेषाम् ' ( वाराहगृ. ६ खं., बोधायनघ. १।३।१, हिरण्यकेशीयगृ. २८
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१७२ ] श्री सनातन धर्नालोकः ( ३-२ ) मानवगृ. ११२१६, लोगाक्षिगृ. २२५, आपस्तम्बध. १।२।१२ ) यहाँ ४८ वर्षका ब्रह्मचर्य कहा है-यह सभी बातें ब्रह्मचारियोंकेलिए कही हैं । इन्हींसे स्त्रीके उपनयन-वेदारम्भ, समावर्तन तथा जातिपक्ष खण्डित हो रहे हैं, क्योंकि उक्त बातें स्त्री में नहीं घटतीं । नहीं तो स्त्री भी यदि ४८ वर्ष ब्रह्मचर्यं रखकर विवाह करे; तो २ वर्षके बाद उसका रजोधर्म बन्द हो जायगा, फिर उसके विवाहका क्या लाभ? अत: जातिपक्ष बाधित है । नहीं तो लड़कीकेलिए भी इस अवसर पर स्तनाच्छादनशिक्षा, रजोधर्मके कर्तव्य, पुरुषड़े समागमके निषेध कहे जाते; पर उपनयनादिके इन प्रकरणों में ऐसा कहीं नहीं आया है, अतः लड़कियोंका उपनयन गृहीत न होनेसे जातिपक्षका स्पष्टतया ही खण्डन हो गया । ( घ ) ' ब्रह्मचारी कार्ष्ण वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः ' ( अथर्व. ११ । ५।६ ) यहाँ पर ब्रह्मचारी [ रेतोनिरोधक ], कृष्णमृगचर्मधारी; दीर्घश्मश्रु [ स्वा. दयानन्दके शब्दों में- | ' चालीस वर्ष तक दाढी - मूंछ प्रादि पञ्च केशोंको धारण करने वाला ब्रह्मचारी होता है- संस्का.वि.वेदा. पृ. ६८ ) ४८ वर्ष तक केशश्मधुको धारण कर्ता भया ' प्रथमसंस्कारविधि ७० पृ. ) इनसे भी स्त्रीकी उपनयनसे पृथकता सिद्ध हो रही है । यदि स्त्रीके रजको उनका ' रेत: ' माना जावे, तो उसका निरोध नहीं हो सकता । अतः बह शुक्र नहीं, यदि हो, तो उसके सेचनसे अन्य स्त्रीमें गर्भ हो जावे, उसके होनेसे स्त्रीकी दाढ़ी मूछें भी हों, अतः शुक्राऽभाव होनेसे ही मनुने स्त्रियों को ' निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रिय: ' ( ६।१८ ) मन्त्रात्मक वेदका अधिकार नहीं दिया है । कृष्णयजुर्वेद [ तै.सं. ] में भी स्त्रियोंको ' निरिन्द्रिय ' ( ६५८२ ) और उन्हें सोम [ वैदिकयज्ञ ] के योग्य नहीं माना । मनुके २।१८१ पद्यानुसार ' पुनर्मा एतु इन्द्रियं ( प्र. ७२६७ ( ६१ ) ।१ ) में तथा ' पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम् ' ( ४।२२० ) इस मनुपद्यमें इन्द्रिय शुक्रको कहते जातिपक्षकी आलोचना १७४ हैं । उसके न होनेसे वे ' निरिन्द्रिय ' होती हैं, इसलिए वेदानुसार दीर्घश्मभू भी नहीं होतीं 1 । लड़के की भी दाढी मूछें चांहे छोटी श्रायुमें नहीं होतों. ( १ पर भीतर उनका उसमें बीज होनेसे भविष्य में हो जाती हैं; पर हमा; । उनका बीज न होनेसे वे कभी भी नहीं होतीं । इससे स्पष्ट है कि स्त्रीचे न्यूनता है । [ शुक्राभाव ] से उसमें बलकी न्यूनता है, बलकी म्यूनता उसमें स्वरोंकी न्यूनता है । वेदमें सात गीत स्वर तथा उदात्तादि तीन स्वर [ पाणिनिशिक्षा १२. ] हैं । पुरुषमें पूर्णता होनेसे उसमें सभी स्वर है स्त्री में अपूर्णता होनेसे प्रधान- पञ्चम स्वार होता है । अन्य स्वरोंकी न्यूनतासे उनको वेदाधिकार देना ' मन्त्रो हीनः स्वरते । वर्णतो वा... स वाग्वज्जो यजमानं हिनस्ति ' ( पाणिनि - शिक्षा ५२॥ । पड़ते इस आपत्तिको मोल लेना है । इसी वेदके निरिन्द्रियता के प्राशयको नेत्र विवाह श्रीग्रात्मानन्दने श्रस्यवामीयके भाष्य में अपूर्णेन्द्रियोंके लिए वेदानधिकार का कार लिखा है – ' स्त्रीणां शूद्रान्धपङ्गना बधिराः पतिताश्च ये । क्लीचा विवाह नैव काणामां वेदविद्याधिकारिता । ' स्त्रीका कोई विशेष उच्चारणी कपोल मन्त्र श्री जावे, तो उसे वर या ऋत्विक्का श्रश्रय लेना पड़ता है । [ श्री अस्तु । ( ङ ) फलतः उपनयनादिमें जातिपक्ष बाधित होनेसे यहाँ पर पुंलिङ्ग स्त्रीणां श्रविवक्षित नहीं माना जाता । इसलिए ' उपनयनं विद्यार्थस्य ' ( आप ) आवश्य ( १1१1 ९ ) में श्री हरदत्तने लिखा है [ 9 ] लिङ्गस्य विवक्षितत्वात् स्त्रि संस्कार अपि न भवति । ' इसी तरह श्रापस्त. गु. के ६।१५।१, १२, ६।१६ १ झ विधीयत सूत्रोंमें श्रीहरदत्त तथा श्री सुदर्शनाचार्य श्रादिकी व्याख्या भी देखी यहां. सकती है । इस प्रकार: वादियोंका जातिपक्ष निराकृत हो गया । इसहि पुरुष ' ही मनुने ' अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः ' ( २०६६ ) ' वैवाहिक है पुमा विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' ( २२६७ ) इन पद्योंमें स्वा की टीक संस्कार श्रमन्त्रक कहे; और उपनयनादिका सर्वथा निषेध किया है । ए -गृह्यसूत्रो
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£ 262 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १७४ ] दीर्घश्मयू | · ( १६ ) ' मन्त्रिका तु कार्येयें ' आदि पद्योंकी प्रक्षिप्तता (? ) होतों; । वा भिन्नार्थकता (? ) स्वीप कि स्वीमें पूर्वपक्ष -— ( क ) ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' तथा ' वैवाहिको विधिः न्यूनतासे स्त्रीणां ' यह मनुके पद्य प्रक्षिप्त हैं; यदि २४६६-६७ इन मनुपद्योंको हटा तीन वर दिया जावे; तो ' केशान्तः षोडशे वर्षे ' ( २६५ ) की ' एष प्रोक्तो द्विजाती-स्वर, नामपानको विधि: ' ( शब्द९ ) इस पद्यसे ठीक संगति मिल जाती है । ( ख ) अथवा ' भ्रमन्त्रिका तु कार्येय ' का ' अनुदरा कन्या ' की तरह ' अल्प-नः स्वरत मन्त्रा ' अर्थ है, कन्या - संस्कारमें मेखलाबन्धनादि विषयक कई मन्त्र छोड़ने क्षा ५२ ) पड़ते हैं । ( ग ) ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां ' का अर्थ यह है स्त्रियोंकी कोले विवाहविधि वैदिक है, पतिसेवा, वेदाध्ययनार्थं गुरुनोंके पास निवास, घर-निधिकार का कार्य और श्रग्निहोत्रादि - ये स्त्रियोंके कर्तव्य हैं । कुल्लूकभट्टका ' स्त्रीणां कला विवाहविधिरेव वैदिकः संस्कारः, पतिसेवा एव गुरुकुले वासः ' यह व्याख्या च्चारण कपोलकल्पित हैं, इसमें ' एवं ' शब्द अपनी तरफसे जोड़ा गया है । चड़ता है । [ श्री तुल. स्वामी मनुटीका, वादा सार्व. जुलाई १ ९ ४६ ] उत्तरपक्ष: - ( क ) ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' वैवाहिको विधिः पुंलिङ्ग स्त्रीणां यह दोनों पद्य मनुस्मृतिमें प्रक्षिप्त नहीं है, यह तो अत्यन्त आप आवश्यक हैं । यदि ये दोनों पद्य यहां न होते, तो फिर कुमारियोंका कोई = कि संस्कार ही न हो सकता । देखिये- ' प्राङ् नाभिवर्धनात् पुंसो जातकर्म २६११ ' विधीयते ' । [ मनु. २२६ ] यहां तो उत्पत्ति - मूलक संस्कार चलते हैं । देखी यहां लिखा है - ' पुसो जातकर्म विधीयते ' । ' पु ंसः ' में ' पुम्स् ' शब्द है । इसहि पुरुष ' का नाम ' पुमान् ' होता है, लड़कीका नहीं । ' ऐतरेय ब्रा ० में लिखा वैवाहि है पुमांसो वै नरः, स्त्रियो नार्यः ' ( ३।३४ ) इसलिए आप.गृ. ( ६।१५।१० ) की टीकामें श्रीहरदत्तने लिखा है- ' जातमिति पुलिङ्गस्य विवक्षितत्वात् है । पुंसः एवायं जातकर्म संस्कारः, न स्त्रिया: ' । इस प्रकार अन्य सभी -: - गृह्यसूत्रोंमें ‘ ‘ जात, माणवकः, ' कुमार ' श्रादि शब्दः भी इसी उद्देश्यसे गये हैं । मनुके २।२६ पद्यसे ' पू'सः ' की अनुवृत्ति २।६५ रखे पद्य तक चल ' प्रमन्त्रिका तू कार्येय ' की प्रक्षिप्तता [ १७५ रही है । इसलिए यहाँ मेवातिथिने लिखा है- ' पुस इति स्त्री - नमक-व्यावृत्त्यर्थम्, पुमानेव संस्कार्यतया निर्दिष्टः ' । इमो, ' पुंसः ' का अर्थ कुल्लूकभट्टने ' पुरुषस्य ' किया है । यह है भी ठीक | ' गोपथ ब्रा ' में कहा है- ' पुमांसः श्मश्रुवन्नः श्रश्मश्रुवः स्त्रियः ( ११.३।७ ) तो भविष्यत् श्मश्रुवाला होनेसे लड़केको भी ' पुमान् ' कहा ' जाता है । भविष्यत् में शुक्रशोणित- समुदाय मिलनेसे ( महाभाष्य ४ । १ । ३ ) लड़कीको भी ' स्त्री ' कहा जाता है । ' पूस ' शब्दसे स्त्रीका ग्रहण न होनेसे ही ' यदि स्त्री यदि वा पुमान् कृत्यां चकार ( अथर्व ५।१४।६ ) यहाँ पर पुस् ' से पृथक् स्त्रीका ग्रहण किया गया है । उक्त पद्यमें मनुको ' पुस् ' शब्दसे इष्ट भी लड़का ही है, जैसे कि मनुजीने स्वयं लिखा है- ' पुमान् पुंसोऽधिके शुक्रे, स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः । समेऽपुमान् पुंस्त्रियो वा ' ( ३ | ४६ ) । ' पु ंसि वै रेतो भवति तत् स्त्रियामनुषिच्यते । तद् वै पुत्रस्य वेदनम् ' ( प्र. ६११२ ) यहाँ भी पुमान्को स्पष्ट ही स्त्रीसे भिन्न माना गया है । तब चूडाकरणान्त संस्कार पुरुषोंके तो होते, स्त्री - नपुंसकके न होते । तो कन्या भी उक्त संस्कार हो जाएं; यत: ' ग्रमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणां ' ( २।६६ ) यह पद्य मनुजीने बनाया । इसलिए ' पुसः ' पर सर्वज्ञनारायणने लिखा है – ' पुंसो, न नपुंसकस्य, स्त्रीणां तु वक्ष्यते ' । यदि ' अमन्त्रिका तु ' यह मनुपद्य न होता; तो कन्याओंका एक भी संस्कार न होता । अब इस पद्यसे केवल नपुंसकों का ही संस्कारोंमें निषेध रहा । तभी नपुंसक बालकको नपुंसक लोग उसके माता - पितासे ले जाते हैं । इसीलिए २२६ पद्यमें मेघातिथिने लिखा है- ' प्रतः स्थितम् - पु सामेव एते संस्कारा एभिर्विधीयन्ते । विध्यन्तरेण स्त्रीणाममन्त्रकाः, नपुंसकस्य नैव सन्तीति ' । अव ' चूडाकरणान्त संस्कार स्त्रियोंके श्रमन्त्रक सिद्ध हुए । तभी मेधातिथिने ' स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं ' ( २।३३ ) इस मनुपद्यकी व्याख्या की अवतरणिकामें कहा है- ' पुंस इति अधिकृतत्वात् स्त्रीणाम्
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१७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अप्राप्तो नियम्यते - स्त्रीणामिति ' । श्रर्थात् ' पुसः ' की अनुवृत्ति चल रही होनेसे स्त्रियोंका नामकरण प्राप्त नहीं था, तब स्त्रियोंके नामकरणार्थं यह बचन बनाया गया । कितनी स्पष्टता है? और देखिये - गोविन्दराजने भी ' अमन्त्रिका तु ' पद्यकी अवतरणिकामें लिखा है- ' प्राङ् नाभिवर्धमात् पुसः ' इति पु ंस् ग्रहणस्य स्त्र्यर्थत्वे प्रमाणाभावात् स्त्रीणामप्राप्त इत्यत आह-' श्रमन्त्रिका ' इति । एषा सकल संस्कार पद्धतिः स्त्रीणां संस्कारार्थं मन्त्र-बर्जिता कार्यों | इससे बढ़ कर अन्य स्पष्टता क्या हो? टीकाकारने बताया है कि- पुस ग्रहणसे स्त्रीका अर्थ कहीं भी प्रमाणित नहीं है, अत: स्त्रीका कोई संस्कार प्राप्त नहीं था तदर्थ ' भ्रमन्त्रिका ' पद्य वना । अब वादीने देख लिया होगा कि यह पद्य कैसा आवश्यक है, उसकी बताई गई इसकी प्रक्षिप्तता कैसी उडी? सूत्रग्रन्थोंमें भी ' कुमार ' नाम कह कर उक्त संस्कार पुरुषोंकेलिए ही प्रादिष्ट किये हैं । फिर श्राश्वलायन, गोभिल आादियोंने ' प्रावृतः, तूष्णीम् ' आदि शब्दोंसे स्त्रियोंके श्रमन्त्रक - संस्कारकी अभ्यनुज्ञा कर दी । फिर स्त्रियोंका उपनयन भी श्रमन्त्रक प्राप्त हुआ, उसकी निरृत्त्यर्थ ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' ( २।६७ ) यह पद्य बनाया गया कि स्त्रियोंका विवाह संस्कार ही उपनयनस्थानीय है । उनका साक्षात् उपनयन तथा वेदारम्भ नहीं होता । यही मेघातिथिने स्पष्ट किया है-- ' पूर्व - [ प्रमन्त्रिका - तु इति ] वचनेन [ स्त्रीणां ] जातकर्मादि-चद् उपनयनेपि श्रमन्त्रके प्राप्ते तन्निवृत्त्यर्थमारभ्यते - ' वैवाहिको विधिरिति । अतो विवाहस्य उपनयनस्थाने विहितत्वात् तस्य [ उपनयनस्य ] निवृत्तिः । ( प्र. ) यदि विवाहः तत् - ( उपनयन - ) कार्यम्, हन्स! प्राप्तं वेदाध्ययनं [ स्त्रीणाम् ], प्राप्ता च ब्रह्मचर्या; उपनयनं नाम माभूत्? एतद् उभयमपि निवर्तयति - ' पतिसेवा इति ' । ( यदि स्त्रियोंका विवाह उपनयनका कार्य है; तो स्त्रियोंका वेदाध्ययन भी प्राप्त हुआ, ब्रह्मचर्यं भी; उपनयन उनका भले ही न हो पर इन दोनोंको ' पतिसेवा गुरौं ' आदिसे मनुजी हटाते हैं ) ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' की प्रक्षिप्तता (? ) । १७७ १० . इसी प्रकार कुल्लूकभट्टने भी लिखा है- ' अनेन उपनयनेपि प्राप्ते विशेष माह वैवाहिको विधिः ' इति । विवाहविधिरेव स्त्रीणां वैदिकः संस्कार. का उप-नयनाख्यो मन्वादिभिः स्मृतः । पतिसेवेव गुरुकुले वासो वेदाध्ययनरूपः सब गृहकृत्यमेव सायंप्रातः समिद्धोमरूपोग्नि - परिचर्या । तस्माद् विवाहादेरुप- । नयनस्थाने विधानाद् उपनयनादेनिवृत्तिरिति ' । ( तब विवाहादिके वेद उपनयनादिके स्थानमें विङ्गित होनेसे स्त्रियोंकी उपनयनादिकी निवृत्ति हो जाती है ) । नह इस प्रकार गोविन्दराजने भी ' एवम् [ स्त्रीणाम् ] उपनयनेपि श्रमन्त्रक प्राप्ते ग्राह - वैवाहिक इति ' यह अवतरणिका देकर लिखा है- ' यद् विवाह. विधानम्, तदेव ग्रासां वैदिक - संस्कारोपनयनस्थाने, पतिसेवा च गुरुशुश्रपा का स्थाने गृहकृत्यं चाग्निपरिचरणस्थाने ' । कितना स्पष्ट लिखा है कि-स्त्रियोंका विवाह - विधान ही उनके वैदिक - संस्कार उपनयनके स्थानपर है, पति की सेवा ही गुरुसेवाके स्थान पर है, स्त्रियोंका गृहकार्य अग्निहोत्रके अत स्थानपर है । इसपर नारायणने लिखा है - ' उपनयनं तु न कार्य किन तासाम्, विवाहसंस्कारस्य तत्स्थानीयत्वादित्यर्थः, वैदिक: -वेदाघिगमार्थं उप- हृद नयनरूप: ' । ( स्त्रियोंका उपनयन तो नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसके से स्थानपर स्त्रियों का विवाह ही है ) राघवानन्दने भी लिखा है- ' स्त्रीणां क्या वैवाहिक संस्कार उपनयनसंस्कारस्थानीयः; तेन तद्- ( उपनयन ) ' अल निवृत्तिः । वैदिक: - वेदमन्त्रकृतः ' विवाहस्तु समन्त्रक ' इति । नन्दन भी इसी प्रकार लिखा है । इस प्रकार दोनों ही पद्य ' प्रक्षिप्त ' सिद्ध न होकर उन ' आवश्यक ' सिद्ध हुए । उक्त दोनों पद्य प्राचीन टीकाकारोंने, रामाभिराम, कुमारिलभट्ट, गार्ग्यनारायण, तथा निबन्धकारोंने प्रतिष्ठापूर्वक उद्धृत किये हैं । वादीके मान्य ' विवाहकाल -विमर्श ' में व्याघ्रपादने भी ' स्त्रीणा. मुपनयनस्थाने विवाहं मनुरब्रवीत् ' इसे स्मरण किया है । ( स्त्रियोंका उपनयनका स्थानापन्न मनुजीने विवाहको माना है ) माघवीयमें- यम-स ० ध ० १२
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१७७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १७८ विशेष- वचन भी है- ' विवाहं चोपनयनं स्त्रीणामाह पितामहः ( मनु: ) ' इन - का र उप- HIT भाव यही है कि स्त्रियोंका विवाह ही उपनयनादिके स्थानापन्न रूपः । हैं; श्रतः स्त्रियोंका उपनयनादि नहीं होता; और वैध उपनयन न होनेसे दिरुप- वेदाध्ययनादि भी नहीं होता । तव प्रक्षिप्तताकी शंकाही न रही । हादिकेहो ( ख ) ' अमन्त्रिका ' का ' अल्पमन्त्रिका ' अर्थ किसी भी टीकाकारने नहीं किया, बल्कि मन्त्रा s भावका ही पर्याय वाचक गृह्यसूत्रोंमें ‘ प्रावृतः ’ ( चाश्व. १।१५।१२ इत्यादि बहुत स्थलोंमें ) आया है, उसी अर्थ में ' तूष्णीम् ’ मन्त्र के ( ११२२ ) श्राया है । क्या ' तूष्णीम् ' का अर्थ ' स्वल्पमन्त्रा ' है? टीका-ववाह -कारोंको भी ' अमन्त्रिका ' का ' मन्त्ररहिता ' अर्थ इष्ट है, स्वयं मनुको भी श्रपा- - निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च ' ( 15 ) इन पद्योंसे ' मन्त्रवजिता ' ही अर्थ इष्ट कि -है । तब ' मेखलाबन्धनादिके कई मन्त्र कन्यासंस्कारमें छोड़ दिये जाते हैं, है, अतः कन्या ' अल्पमन्त्रा है ' यह वादीकी बात ठीक नहीं । वादी ही कहे होत्र ' कि क्या उपनयनमें वे कभी स्त्रियोंके मेखलाबन्धन, कौपीन बन्धवाना, कार्य " हृदयालम्भन, ' मुखेन मुखं संनिधाय जपति ' [ श्रग्निवेश्यगृ. १।११३ ] मुंह उप-उसके से मुंह मिला कर बोलना, आदि करते हैं? वहाँ मन्त्र पढ़ना न सही, त्रीणां क्या यह क्रियाएं कभी कराते हैं? जब क्रिया ही नहीं होती; तव वह ' अल्पमन्त्रा ' कैसे? न- )भी हम कन्याओंके चूडाकरणान्त सस्कारोंको श्रमन्त्रक सिद्ध कर चुके है, टोकर उनमें किया वही होती है; जो बालकोंके संस्कार में होती है, परन्तु मन्त्रका राम, ही निषेध है । इस विषयमें गोभिलगृह्यसूत्रके २।१।२२ सूत्रकी म. म. दूधृत मुकुन्दशर्माकी व्याख्या, वीरमित्रोदयके संस्कारप्रकाश जातकर्मादि-रणा- संस्कारों में एवं अन्य सभी गृह्यसूत्रोंमें देखा जा सकता है | अतः वादीका का व्याज निरस्त हो गया । क्योंकि - ' इयम् अशेषत: श्रावृत् ' ( मनु. २।६६ ) यम- इससे चूडाकरणान्त सभी संस्कारोंमें श्रमन्त्रकता कही गई है । तब वादी ' का ' मेखला - वन्धन ' कहांसे आ गया? मेखला बन्धन तो उपनयनमें होता है; कन्याओंके उपनयनका तो ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' ( २१३६ ) मनुके इस ' श्रमन्त्रिका तु कार्ये ' ग्रादिकी प्रक्षिप्तता (? ) [ १७२ पद्य से श्रागे ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां ' ( २२६७ ) इस पद्य में निषेध ही किया गया है । ( ग ) ' वैवाहिको विधि: ' का अर्थ करनेमें वादीने छल किया है । जब अपने अर्थके अनुसार वादी स्त्रियोंकी विवाहविधि ' वैदिक ' मानता है, तव स्त्रियोंके गर्भाधान, सीमन्त, नामकरण आदि सत्र संस्कार तो ' अवैदिक ' हो गये । बात वही हमारी सिद्ध हुई कि स्त्रीके विवाहमें ही केवल मन्त्र पढ़ े जाते हैं, शेष सस्कारोंमें नहीं । शेष उनके संस्कार अवैदिक ( वेद-मन्त्रहीन ) होते हैं । जब स्त्रियोका अन्य सस्कारों में वेदमन्त्राधिकार न रहा, तत्र जहां वादिसम्मत जातिपक्षका खण्डन हो गया, वहाँ स्त्रीका वेदाध्ययनाधिकार भी खण्डित हो गया । पक्ष हमारा ही सिद्ध रहा । अपने इस अर्थ में वादीने ' संस्कारः स्मृतः ' पदको कहाँ रखा? स्त्रीणां वैवाहिको विधि: - वैदिक: संस्कारः स्मृतः ' स्पष्ट अन्वय है । पति-सेवाका ' गुरौ वासः ' से सम्बन्ध है; क्योंकि पति स्त्रीका गुरुस्थानीय होता है । परन्तु वादीने उस सम्बन्धको विच्छिन्न करके अलग - अलग कर दिया है । इसको पृथक् करने वाला ' च ' कहाँ है? वह स्त्री पतिकी भी सेवा करे; और रहे गुरुग्रोंके पास, यह वढ़िया अर्थ है! वादी प्रसंगति अलंकार-का प्राचार्य कब से बना? जब स्त्री गुरुकुलमें रहेगी, तो पति सेवाके लिए वह क्या गुरुमोंको भेजेगी? इस मनु - पद्यमें प्रकरण जबकि स्त्रीके विवाहितत्वका है, तभी तो ' वैवाहिको विधिः ' पतिसेवा, गृहार्थः ' यह शब्द उक्त पद्यमें आये हैं; उस समय वेदाध्ययनार्थं गुरुकुलमें रहनेका क्या काम? क्या विवाहके बाद स्त्रीका गुरुकुलवास होता है? यहाँ वादी पतिको स्त्रीका गुरु बता रहा है; वा भिन्न अन्य पुरुषों को? यदि भिन्न, तो यहाँ भिन्नता प्रदर्शक ' चकार ' कहाँ है? ' घरका कार्य और अग्निहोत्रादि ये स्त्रियोंके कर्तव्य हैं ' यह आगे वादीका किया अर्थ है, तो प्रग्निहोत्रादि पतिके कर्तव्य तो न रहे; क्या यह वादीको स्वीकृत है? ' घरका कार्य और अग्निहोत्रादि ' यहां ' औरं
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१८० ] श्री सनातनधर्मालोक. ( ३-२ ) अर्थ बताने वाला ' च ' उक्त श्लोकमें कहाँ है? ' अग्निपरिक्रिया ' का ' अग्निहोत्र आदि यह ' आदि ' शब्द वादीके विद्वान् कहाँसे लाए? ऐसे ही असत्य अर्थ करके अर्थकर्ता श्रीतुलसीरामस्वामीने ' भास्करप्रकाश ' को तुन्दिल कर रखा है; सत्यसे वे कोसों दूर हैं । यह ' उत्तम ' प्रयास नहीं । जब कि - ' वैवाहिको विधिः - स्त्रीणां वैदिकः संस्कारः स्मृतः, पति - सेवा स्त्रीणां गुरौ वासः स्मृतः, गृहार्थ: -स्त्रीणाम् अग्नि - परिक्रिया स्मृता ' ऐमा अन्वय उक्त पद्यका स्पष्ट है, तब कुल्लूकभट्ट प्रादिसे लिखा हुआ ' एव ' शब्द ' अब्भक्षः, वायुभक्षः, ' अप एव भक्षयति, वायुमेव भक्षयति ' ( महा-भाष्य ) की तरह स्वयं गृहीत हो जाता है I । वादीने उक्त पद्य में ' च ' न होने पर भी उसे अर्थ में प्रक्षिप्त कर दिया । ' पति - सेवा गु · वासः गृहाथ:, में अविद्यमान भी अल्पविराम ( कामा ) चिन्होंको प्रक्षिप्त कर दिया । यह ' कर्तव्य ' है, यह अर्थ तथा ' आदि ' शब्द भी उसमें प्रक्षिप्त कर दिया । यह अपनी प्रक्षिप्तता तो वादीको दीखी नहीं; और उलाहना दिया कुल्लुक - भट्टको, कि - इसने प्रथमें स्वारस्य प्राप्त ' एव ' शब्द लिख दिया । क्या यहाँ ‘ ··· सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति । आत्मनो विल्वमा-त्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ' की उक्ति चरितार्थं नहीं? अर्थ में ' एव ' न भी लिखा जावे, तब भी तो यही प्रर्य होगा कि -' विवाह स्त्रियोंका उपनयन एवं वेदारम्भ संस्कार ( क्योंकि मनुने इन को पृथक् सस्कार न गिन कर एक ही संस्कार माना है ) है, पति सेवा स्त्रियोंका गुरुकुलमें निवास घरका काम स्त्रियोंका अग्निहोत्र है । वात वही निकली । जैसे ' पति स्त्रीका गुरुस्थानीय है ' कहनेसे स्त्रियोंके लिए पतिसे अतिरिक्त गुरुकी निवृत्ति हो जाती है, इस लिए वह ' पति ही स्त्रीका ' गुरु होता है ' यह ' एव ' का अर्थ ' ही ' स्वयं स्वारस्यसे प्राप्त हो जाता है, वैसे ही उक्त प्रर्थमें ' एव ' शब्द ' स्वयम् उपस्थित हो जाता है, " फिर कुल्लूक भट्टको उलहना क्यों? इस प्रकार वैवाहिक विधिके ही स्त्रियोंके उपनयन - वेदारम्भस्थानीय होनेसे स्त्रीके उपनयनादिकी निवृत्ति ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' श्रादिकी प्रक्षिप्तता (? ) [ १६ | १८ हो जाती है । ' पतिसेवा गुरौ वासः ' को उद्धृत करते शिवदत्तजीने भी इसके पूर्वके तथा वादके मनुपद्यांशको हुए म. म. पं ० छिपा वह शोभाका काम नहीं किया । कर कह जिस प्रकार वे ( म.म. जी ) पति सेवासे भिन्न स्त्रीके नही गुरुकुलवासी निवृत्ति मानते हैं, वैसे ही वैवाहिक विधिसे भिन्न स्त्रीका उपनयनादि उनको नित्त मानना पड़ेगा । उन्होंने अन्यत्र ' संस्कारो वैदिकः भी शतं स्थान ' प्रोपनायनिकात् परः ' ऐसा मनुका पाठ कर डाला स्मृतः दे वह उचित नहीं । अपने निर्मूल पक्षका पक्षपात फिर यही, यह नीर कुकृत्य करवानेको बाधित करता है । अतः उनकी ' सिद्धान्तकौमुदी ' महाभाष्य ' न्याक सिन्धु ' ‘ ऋकुसूक्तसग्रह ' ' ग्रार्यविद्यासुधाकर ' में एतद्विषयक टिप्पणिय नितान्त निर्मूल हैं, यह विद्वानोंने हमारे इस पुस्तकसे जान लिया होगा । ( घ ) एक आदर्श उनका यहाँ भी देख लीजिये - ' स्त्रीप्रत्ययकी टिप्पणी में ‘ आचार्या ' पर उन्होंने लिखा है, जिसे ' सार्वदेशिक ' ( जुलाई १ ९ ४६ ) १ वेदक ३॥३ ॥
बादीने उद्धृत किया था - ' उपनीय तु यः शिष्यम् ' इति मनुवचनेनाति हो ज स्त्रीणां वेदाध्ययनाधिकारो ध्वनितः ' एक तो ' आचार्या व्याख्यात्री ' बुनना कौमुदीकी प्रतीक पर मनूक्त ' आचार्य ' का लक्षण देना उनका ठीक नहीं क्योंकि - वह पु ंलिङ्ग आचार्यका लक्षण बताता है आचार्याका नहीं । दूसरा यह होता भ जबकि मनु स्त्रीको वेदाधिकार स्पष्ट शब्दों में निषिद्ध करते हैं - फिर उन्हें दत्तजी का लक्षण ' आचार्य ' में देना ठीक नहीं । तीसरा- मनुने ' वेदमध्यापयेद् द्विज: ' में श्राचार्यका अध्यापन माना है पर व्याकरणमें प्राचार्याका अध्यापन इष्ट नहीं । यदि होता; तव उसे क्षे बादीन ' या तु स्वयमेवाध्यापिका तत्र वा डीष् वाच्यः ' इससे ' उपाध्यायी ' की ( मैला तरह ' आचार्थी ' भी बनाया जाता, पर नहीं वनाया जाता । कह माधवी ' प्रध्यापन ' श्रयं विवक्षित न होनेसे ही दीक्षित को ' आचार्या व्याख्याओं हमारा द्विजात अर्थ करना पड़ा । पं ० शिवदत्तजीने ' मनुवाक्येन ध्वनितः ' कहा है, ए तव वा जब मनुने अभिधासे ही स्त्रियोंका उपनयन - वेदादिका निषेध कर दिया है । किसी
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[ १६ श्री सनातनधर्मालांक ( ३-२ ) | १८२ ] म. म. पं ० प्राचार्यका लक्षण किया है, ' आचार्या का वैसा लक्षण मनुने कहीं । छिपा करे वहाँ तब उसके अभिप्रायके विरुद्ध अनुमानित ध्वनि बताना ठीक कहा नहीं, नहीं । कुलवासी ' भ्राचार्य ' वेदाध्यापकसे भिन्न भी होता है, जैसे कि - ' प्राचार्याणां यनादि श्री शतं पिता ' ( मनु. २।१४५ ) इस मनुके पद्यमें यहाँ वेदाध्यापक इष्ट नहीं, स्मृतः के वह तो ' उत्पादक - ब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता ( २११४६ ) इस पद्ममें यह नीति ' ब्रह्मदाता ' शब्दसे इष्ट है । मनूक्त पारिभाषिक लक्षण ' श्राचार्या में प्रवृन करवानेको नहीं हो सकता । वहाँ ' आचार ' ग्राहयति, आचिनोति बुद्धिम्; ' ' न्या प्राचिनोति श्रर्थान् ' ( निरु. ११४११२ ) यह यौगिक अर्थ है । ' उपाध्यायी ' टिप्पणियाँ में भी मनूक्त उपाध्यायका लक्षण नहीं । जिम वार्तिकसे इसकी सिद्धि है, या होगा । asia ' या तु स्वयमेव अध्यापिका ' यह शब्द प्राया है, ' वेदस्य ' वा की टिप्पण वेदेकदेशस्य ' नहीं आया, ' उपेत्य अधीते अस्या उपाध्यायी ' ( महाभाष्य - ९ ४६ ) ३।३।३१ ) वहाँ तो सिलाई - कढ़ाईकी प्रणाली पढ़ानेसे भी वही शब्द संगत वचनेनादि हो जाता है । क्योंकि - ' या प्रकृन्तन् ' इत्यादि वेदमन्त्रों में स्त्रियोंका कपड़ा यात्री बुनना, सीना, कसा काढ़ना ( ऋ. २१३८ | ४ ) आदिका वर्णन आया है, ठीक नहीं, यह भी एक विद्या है,... उसीका सिखाना- पढ़ाना इस अवसर पर विवक्षित हीं । दूसरा होता है ।. यह प्रसक्तानुप्रसक्त हमने कह दिया । वैसे म. म. पं ० शिव-फिर उन्हें दत्तजीको युक्तियोंका हम पूर्व ( १२ निबन्ध में ) समाधान कर चुके हैं । उसी ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' का अर्थ जिसे मीना - वादीने बदलने के लिए प्रयत्न किया था, उसीके मान्य ' विवाहकालविमर्श ' याय उसे ( मैलापुर ) में व्याघ्रपादके ' स्त्रीणामुपनयनस्थानं विवाहं मनुरब्रवींत् ' तथा ता । कह माधवीयमें यमके ' विवाहं चोपनयनं स्त्रीणामाह पितामहः ( मनुः ) ' यह च्यात्या हमारा पक्षपोषक किया है । श्रीमद्भागवतपुराण में भी उसका ' नासा ' द्विजातिसंस्कारो न निवासो गुरावपि ( १०।२३।४२ ) यही अर्थ किया है । है तव वादीके किये उक्त मनु - पद्यके श्रर्थमें वादीका वलात्कार सिद्ध हुआ । दिया है किसी भी प्राचीन - टीकाकारने वैसा अर्थं नहीं किया । बल्कि कई श्रार्यसमाजी ' अमन्त्रिका तु कार्येय ' श्रादिकी प्रक्षिप्तता (? ) [ १८३ भी अस्मदिष्ट ही अर्थ मानते हैं, जैसे कि श्रीराजाराम शास्त्री - विवाहकी विधि ही स्त्रियोंका वेदका संस्कार ( उपनयन ) माना गया है, पतिकी सेवा ही गुरुके निकट वास है, घरका काम अग्नि की सेवा है । ' श्रार्यसमाजी श्रीतुलमीराम स्वामीने भी मनुकी टीकामें इसका अर्थ ठीक ही किया है कि- ' स्त्रियोंकी विवाह सम्बन्धी जो विधि है, वही केवल वेदोक्त है, और पतिसेवा - गुरुकुलवास, गृहकृत्यादि - सायंप्रातर्होम हैं । ' यहाँ उनकी दी हुई डैशें हमारे पक्षको स्पष्ट कर रही हैं । पर भास्करप्रकाशमें उन्होंने इस अर्थ को बिगाड़ा है, वह यह है- ' स्त्रियों को इतनी बातें वैदिक हैं, वैवाहिक विवि, पतिसेवा, गुरुकुलवास, गृहस्थाश्रम और अग्निहोत्र करना, इसमें उन्होंने ' संस्कार ' का अर्थ नहीं दिया, क्या पतिसेवा भी कोई संस्कार है? घरका काम - काज भी क्या कोई संस्कार है? स्पष्ट है कि वे उसमें सफल नहीं हो सके । हमने यहाँ उस अर्थ की आलोचना कर दी है । इस अर्थसे तो स्त्रियोंकी अन्य बातें - अध्यापकता, पुत्रोत्पादन, ब्रह्मचर्यं श्राश्रम, संन्यास श्राश्रम, वेदाध्ययन जातकर्मादि शेष सब संस्कार - जिनको वादी लोग मानते हैं - प्रवैदिक हो जाएंगे । क्या वादियोंको ऐसा स्वीकार है? यदि नहीं, तब इससे वादी का उसे प्रक्षिप्त वताना वा उसके अर्थको बदलनेकी चेष्टा करना निन्द-नीय प्रयत्न है | ( १७ ) ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ' इत्यादिका वास्तविक अर्थ । पूर्वपक्ष - ' वेदे पत्नीं वाचयति- ' वेदोसि वित्तिरसि ' ( बोधा. श्री. ३।३० शाङ्खायन श्रौ. १।१५।१३ ) ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् होताऽध्वर्युर्वा, वेदोसि वित्तिरसि ' ( श्रश्वला.श्री. ११११११ ) यहां पत्नीके हाथमें वेद देकर उसके द्वारा मन्त्रविशेषका बुलवाना कहा है । ( पृ. ५२ ) अथ वेदं पत्नी विस्र ंसयति ' वेदोसि येन त्वं देव! वेद ' ( शत. १।१२।२२-२३ ) यहाँ वेद को खोलकर ' वेदोसि ' ( यजु. २।२१ ) इस मन्त्रपाठका विधान है ( पृ.
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१८४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३६-४० ) ' पत्नी वेदं प्रमुञ्चति ' - वेदोसीति ( कात्या. श्रौत ३।८।२ ) पृ. ४६ ) ' तस्यै ( सावित्र्य मीतायें ) उ ह श्रीन् वेदान् प्रददौ प्रजापतिः, ( तै. ब्रा. २।३।१० ) यहाँ सायणका ' वेद ' पदका श्रर्थं ' वेदमन्त्रलाञ्छितं किञ्चिद् गुटिकाद्रव्यं दत्तवान् ' यह अर्थ तो अनर्थ है ( पृ. १८८ ) एतदादि-प्रमाणोंसे स्त्रीका वेदाधिवार सिद्ध है ( एक सिद्धान्तालङ्कार ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन ' में ) उत्तरपक्ष- इन वादिदत्त व वचनों में ' वेद ' शब्दका अर्थ ' वेदग्रन्थ ' नहीं है; जैसेकि वादीने लिखा है, अन्यथा प्राश्व. श्री. का ' वेदोसि वित्तिरसि यह मन्त्र वादीको अपने वेबसे दिखाना चाहिये । यदि वह न दिखा सका, तो उसका प्रमाण प्रसिद्ध हो गया; श्रथवा किसी अन्य संहिता वा ब्राह्म-णका है, तो वादीको उन्हें भी वेद मानना पडेगा । अथवा यदि किसी वेद-का अंश है, तो वह नियतानुपूर्वी तथा नियतपदप्रयोग - परिपाटी वाला ( अक्षत ) न होनेसे वह वेद न रहा । इधर जब पत्नीके हाथमें वेद है; तो होता वा अध्वर्यु वह मन्त्र क्यों पढ़वाता है? फिर तो वेद- पुस्तकका देना व्यर्थ ठहरता है, कहलवानेसे भी मंत्र तुलवाया जा सकता है, ग्रन्थ देना क्यों? वस्तुतः वादीके उक्त वचनोंमें ' वेद ' का अर्थ ' दर्भमुष्टिनिर्मित पदार्थ-विशेष ' ही है । इसकी पुष्टिमें हम बहुतसे विद्वानोंकी जिनमें श्रार्यसमाजी भी हैं - साक्षी उपस्थित करते हैं । १ श्रीतारानाथ तर्कवाचस्पतिके बनाये ' वाचस्पत्य ' नामक महाकोष में लिखा है - ' वेद: - कुशमुष्टिकृतपदार्थ भेदः ' ' वेदं कृत्वा वेदि कुर्यात् ' इति श्रुतिः । २ ' वेदोसि ' ( २।२१ ) मन्त्रपर महीघर - भाष्य भी देखिये -पत्नी वेदं प्रमुञ्चति ( का. ३१८१ ) हे कुश-मुष्टिनिमितपदार्थ! त्वं वेदः ऋगाद्यात्मको ज्ञाता वाऽसि । हे द्योतनात्मक वेद! देवानां ज्ञापकोऽभू: ' । इससे सिद्ध है कि इस अवसरमें यजमान-पत्नी दर्भमुष्टिनिर्मित पदार्थको ही पहनती है, वेदग्रन्थको नहीं । ग्रन्थ कोई पहननेकी वस्तु नहीं । वही उक्त श्रौतसूत्रमें इष्ट है । इसका प्रमाण ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ' का अर्थ [ १ यह है कि- एतदादिस्थल में ' वेद ' शब्द उच्छादि ( पा. ६/१/६० १८६ होने से अन्तोदात्त ' कुशमुष्टि ' में योगरूढ है । ग्रन्थराशिमें ' रूढ ' ) पहिल वेद शब्द वेदप्र तो वृषादि ( ६।१।२०१ ) गणमें पठित होनेसे आद्य दात्त है - यह सर्वराष्ट इष्ट कविद्वत्सम्मत है । ३ काण्व यजुः सं. के भाष्यमें श्रीसायणने भी लिखा है - ' सम्मार्जनाएं दर्भम दर्भमुष्टिना निर्मितः पदार्थो वेदः; तं पदार्थम् ऋग्वेदादिवेदात्मना स्तौहि पर त्वं वेदोसि – ऋगाद्यात्मको वेदिता वाऽसि ' ( ११५ ) इससे स्पष्ट है कि ( या. पत्नीका ' वेद ' कुशमुष्टि - पदार्थ ही है । अचेतनकी स्तुति मूर्तिपूजा भी है । वसिष्ट ४ आर्यसमाजी विद्वान् श्रीभगवद्दत्तजी ( डी.ए. बी. कालेज लाहौर ) ' वैदिक विष्णु कोष ' में लिखते हैं – ‘ वेदः – दर्भमुष्टिः, प्राजापत्यो वै वेदः ' । ५ श्रार्यसमार्ज ' वेद ' श्रीचमूपतिजीसे सम्पादित ' वेदार्थकोष ' ( ३ ) में भी यही लिखा है- वेदः कृपा-दर्भमुष्टिः, प्रजापतेर्वा एतानि श्मश्रूणि यद् वेदः ' ( तं. ३।३।९ ।११ ) । ६ ' शब्द - कल्पद्र ुमकोष ' म भी लिखा है – ' वेदः दर्भमुष्टिः, यथा च मनुः- सम्का ' यज्ञोपवीतं वेदं च ' ( ४।३६ ) । ' दण्ड ७ ' आप्टे ' की बनाई ' संस्कृत इङ्गलिश डिक्शनरी में भी लिखा है- । ' वेद: - A bundle of Kusha Grass M.TS (: 4.36 ) यहाँ जी वैजयन कुशाके बण्डलको ' वेद ' शब्द वाच्य माना है । ८ ' सेन्ट पीटर्सवर्ग ' के कोष क्रियते इसपर लिखा है 1 वेद - [ उञ्छादि ] Buschelstarken grased वं ( Kueq ) ' इस अर्थ में वहाँ अथर्व ६२८१, यजुः २।२१, तै.स. १ माना ४१६, तै. ब्रा. ३।३।७ २, शत. १ | ३ | १ | ११, का. ३१ ७, मनु. ४१३६ जायग श्राश्व.श्रौ. १।११।१ यह प्रमाण दिये हैं । तब प्राश्वलायन श्रौतसूत्रज्ञ परवा हमारा किया हुआ अर्थ समूल ही है । नहीं तो जब वेदग्रन्थ उसके हाथों ' वेद ' है, वह स्वयं मन्त्र पढ़ सकती है; तब ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ' उसनं पढ़वान्ता कैसा? वल्कि जब वह वादी के अनुसार वेदकी विदुषी है । में श्री तब एक प्रसिद्ध मन्त्र बुलवानेके लिए उसे वेदग्रन्थ देना उसका वेद विषय म वैदुष्य प्रकट करना है । पर जब यहां ' वेद - ग्रन्थ ' शब्द ही नहीं है, वा होनेसे १६-१