सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 91–100
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 91–100
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१२५ १२६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( ग ) तियानः यज्ञोपवीत - धारण - पूर्वक सन्ध्योपासन भी मिलता है । ) ( सार्वदेशिक जून फैलाती ' १ ९ ४६, मई १ ९ ४७ ) । ' मनसा ( ब ) न्यायसिन्धु ( वेङ्कटेश्वर प्रेस सं. १६६५ पृ. १ ९ २ ) की पं ० , ऊष् शिवदत्तजीकी टिप्पणी - ' तत्र ब्रह्मवादिनीनामुपनयनम्, अग्नीन्धनं, वेदा-भवति ' ध्ययनम् ' इत्यादि हारीत वचनको उद्धृत करके लिखा है- ' अध्ययने मण कर वेदानामपि न दोष इति सुच्यते; अन्यथा विवाहप्रकरणोक्ततत्तन्मन्त्रपाठस्य हो लगाकर जाती वधूकर्तृकस्य अनुपपत्तेः ' । न्यायसिन्धुकी टिप्पणी - ( ' तत्र ब्रह्मवादिनीना-सर्वमायु- मुपनयनम् ' इत्यादि हारीत वचनको उद्धृत करके लिखा है - स्त्रियों के नयितवे वेदोंके अध्ययनमें दोष नहीं, यह इससे सूचित होता है । नहीं तो विवाह-पण्डिता, प्रकरणस्थित मन्त्रोंको वह वधू कैसे पढ़ सकेगी? ) ( ट ) किच- ' यज्ञकर्मणि रण्यककी पुनर्नापभाषन्ते इति महाभाष्योक्त्या यज्ञकर्मणि अपभाषणनिषेधे पति-तृवाची..ऋत्विगाद्य क्त - संस्कृत - शब्दस्य प्रबोधे सकलं कर्मैव भ्रष्टं स्यात् ' ( ' यज्ञकर्ममें वार्तिकं अपभाषण ( गलत बोलना ) निषिद्ध है । इस महाभाष्यकी उक्तिसे यदि तृवाचक ' स्त्री पढ़ी नहीं होगी; तो पति वा ऋत्विक् प्रादिसे कही हुई संस्कृत न - चरणैः ' • समझ सकनेसे वह सारा कर्म ही भ्रष्ट हो जायगा । ( सार्वदेशिक जुलाई अध्ययन- १ ९ ४६ ) । तिरेव न ( ठ ) सिद्धान्तकौमुदी - ( स्त्रीप्रत्ययप्रकरणे ) – ' पूर्वोत्तरमीमांसयोस्तु गा; तो केवलं शूद्राणामध्ययन - प्रतिषेध उपलभ्यते । नतु स्त्रीणाम् ] ( मी. ६।१।३७-स्त्रीकी २३८, वेदा. १1३1३८-३९ ) । प्रत्युत स्त्रीणां ' जाति तु वादरायणोऽविशेषात्, षिणं तु तस्मात् स्त्र्यपि प्रतीयेत जात्यर्थस्याविशिष्टत्वात् ' ( ६।१।८-२० ) ' स्त्री हुस्त्री चाविशेषात् ' ( कात्या.श्रौ. १।११७ ) ' दर्शनाच्च ' ( ८ ) तुल्यफलत्वाच्च ' संस्कृत ) ( ९ ) इति सूत्रैर्वेदिके कर्मणि पुंस इवाधिकारो दर्शितः । गृह्यसूत्रेषु भ्यते च कुमारपदमपि जातिपरमेव । श्रतएव ' कुमारा विशिखा इव ' इति श्रुति--सन्ध्यो- सूचितं चौलकर्म कुमारीणामपि स्वीकृतम ' । ' उपाध्यायी, श्राचार्या ' आदिका ' उपनीय तु यः शिष्यं ' इति मनुवचनेनापि स्त्रीणां वेदाघिकारो ध्वनितः । ( पूर्वं तथा उत्तर मीमांसामें केवल शूद्रोंके अध्ययनका निषेध मिलता है म.म.जीका मत | १२७ [ स्त्रियोंका नहीं ]; बल्कि मीमांसा में तो ' जाति तु बादरायणः इस कथनसे पुरुषोंके कर्ममें जातिपक्षके कारण स्त्रीका ग्रहण भी सिद्ध है । ' कात्या.श्रौ.सू. में ' स्त्री चाविशेषात् ' ' दर्शनाच्च ' ' तुल्यफलत्वाच्च ' इन सूत्रों में वैदिककर्ममें स्त्रियोंका भी पुरुषकी भांति अधिकार दिखलाया गया है । गृह्यसूत्रोंमें ' कुमार ' पद जातिपरक है; अतः वहाँ कुमारीका ग्रहण भी हो जावेगा । इसलिए ' कुमारा विशिखा इव ' इस श्रुतिसे सूचित शिखाकरण कुमारियोंका भी स्वीकृत किया गया है । ' उपाध्यायी, श्राचार्या ' श्रादिमें उपनीय तु यः शिष्यं ' इस मनुवचनसे भी स्त्रियोंका वेदाधिकार ध्वनित किया गया है । ) ( ड ) ' ऋक्सूक्त - संग्रहे ' टिप्पणी - ' तस्मान्निदचीयते ' स्त्री - शूद्रयोस्तु वेदेऽधिकारः प्रतिबद्ध: ' इति सायणवाक्ये स्त्रीपदमत्र केनचिन्महात्मना प्रक्षिप्तम्, जैमिनिन्यायमालायां [ ६।११४ ] ' अतएव हारीतेनोक्तम् - द्विविधाः स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योवध्वश्च... ' इत्यादि पराशरमाधवे ( २ अ. पृ. ४८५ ) च स्वयं स्त्रियाः कर्माधिकारनिरूपणात् । एतदधिकरणानुसारेण सर्वेषु यागेषु स्त्रिया अधिकार प्राप्तौ वेदाध्ययनमन्तरा तदनुपपत्त्या ' अष्ट-वर्षं ब्राह्मणमुपनयीत, तमध्यापयीत ' इत्यत्रापि तस्याः [ स्त्रियाः ] अधिका-रित्वसिद्धी का हानि:? उत्तराधिकरणेन ( ६११।५ ) दम्पत्योः सहेवाधि-कारो बोधितो नतु पृथक् । [ अतएव ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ( ४ | १ | ३३ ) इति स्त्रीप्रत्ययसूत्रे दीक्षितः - वमिष्ठस्य पत्नी । तत्कर्तृ कयज्ञस्य फल-भोक्त्री - इत्यर्थः, दम्पत्योः सहाधिकारात् ' ] । ऋक्सूक्तसंग्रहमें टिप्पणी-( इस कारण निश्चित होता है कि- ' स्त्रीशूदयोस्तु वेदेऽधिकारः प्रतिषिद्धः ' इस सायणके वाक्यमें ' स्त्री ' पद किसी महात्माने प्रक्षिप्त कर दिया है, सायणके मतमें स्त्री अनधिकारिणी नहीं । ) ' जैमिनिन्यायमाला ' में हारीतका ब्रह्मवादिनी - सद्योवधू श्रादिका मत दिखलाकर कहा गया है — ' इससे स्त्रीका भी अधिकार निरूपित किया
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१२८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) गया है । इस अधिकरणके अनुसार सब यज्ञोंमें स्त्रियों को भी अधिकार प्राप्त है, वह स्त्रियोंके वेदाध्ययनके बिना उपपन्न नहीं हो सकता; तब ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' में भी स्त्रीके उपनयनाधिकार - सिद्धिमें क्या हानि है? अगले ( ६।१।५ ). अधिकरण में पति - पत्नीका यज्ञमें इकट्ठा ही अधिकार बताया गया है, पृथक - पृथक नहीं । [ इसीलिए ही ' पत्युर्नो यज्ञ-संयोगे ( ४ | १ | ३३ ) इस स्त्रीप्रत्यय के सूत्रमें श्रीदीक्षितने लिखा है-‘ वसिष्ठस्य पत्नी ’ वसिष्ठके किये हुए यज्ञकी उसकी स्त्री भी फल भोगने-वाली होती है: क्योंकि - पति - पत्नीका इकट्ठा ही अधिकार बताया गया है ] । उत्तरपक्ष - यदि म.म. पं ० शिवदत्तजी इस समय जीवित होते, तो मैं इस विषयमें उनसे शास्त्रार्थ करता । जब वे जीते थे; तब मैं छोटी आयुका था । पर अब उनका मत श्रार्यसमाजी उद्धृत करते हैं, अतएव उनका उत्तरदायित्व भी उन्हीं पर है; और उत्तर भी उन्हें ही दिया जाता है । यहाँ महामहोपाध्यायजीने जैमिनिन्यायमाला ( ६ । ११४ ) के विरुद्ध ही टिप्पणी दी है । क्योंकि वहाँ केवल ' स्वर्गकामो यजेत ' पर ही श्री-सायणने ‘ मीमांसादर्शन ' ( ६।१।६ ) की तरह जातिसूत्रकी प्रवृत्ति मानी है, ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' पर नहीं, क्योंकि श्रीजैमिनिने भी मीमां. द.में ' अष्टवर्षं ब्राह्मणम् ' पर जातिसूत्र सूत्रित नहीं किया, किन्तु यज्ञ-विषयक वाक्य पर ही जातिपक्ष सूत्रित किया है । अधिकरण भी याग-विषयक है, उपनयन - विषयक नहीं । बल्कि उपनयन तथा वेदके विषयमें तो मीमांसाके ‘ सस्कारस्य तदर्थत्वाद् विद्यायां [ वेदे ] पुरुषश्रुतिः ' . ( ६ ११३५ ) इस सूत्र में पुरुषका नाम कहा है, यही बात वेदमें भी सूचित की है- ' तत् कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः ' ( अथर्ववेदसं. ३।३०३४ ) पुरुषत्वके नाते ब्रह्ममें अधिकार फिर शुद्रको भी प्राप्त है, पर फिर पूर्वमीमांसा ( ६।१।३०-३८ ) तथा उत्तरमीमांसा ( १।३।३८-३९ ) प ० शिवदत्तजीका मत [ १२ ९ में निषेध कर दिया है; यह स्वयं म.म. पं ० शिवदत्तजी भी मानते हैं । तब स्त्रीका ग्रहण न होनेसे उक्त स्थलमें जातिपक्ष कट गया । शेष रहा ' स्त्रीके यज्ञ में बैठनेसे उसके वेदाध्ययन तथा यज्ञोपवीतका अनुमान; अन्यथा उनके मतमें स्त्रीका यागमें अधिकार हो जाना अनुपपन हो जाता है'- इस पर यह जानना चाहिए कि यज्ञसे सम्बद्ध हो जानेसे स्त्रीका वेद वा उपनयनमें अधिकार नहीं हो जाता । यज्ञमें सम्बन्ध तो उपनयन एवं वेद तथा यज्ञके अनधिकारी निषादस्थपतिका भी मोमांसाम कहा है । जैसा कि आर्यसमाजके म.म. श्री ग्रार्यमुनिजीने भी ६२१ के मीमांमायंभाष्यमें लिखा है - ' अग्न्याधानका सबको अधिकार नहीं, अर्थात् निषादस्थपति, जिसकी उक्त इष्टि है, वह अग्न्याधानका नहीं । पर निषादस्थपतिके मीमांसा द्वारा यजन कह देने से उसका वेद चा यज्ञोपवीतम अधिकार नहीं हो जाता । क्योंकि - मीमांसा प्रनुसार वह वणिक है ( मी.द. ६।१।४४-४५-४६-४७-५२ ) उपनयन तथा वेदका अधिकार वेदके अनुसार मीमांसाके मतमें वणिक पुरुषको है, प्रतएव स्पष्ट है कि म.म. पं ० शिवदत्तजी यहाँ भ्रम में पड़ गए । जैसे वह निषादस्थपति उत्सर्ग रूपसे अग्न्याधानका अनधिकारी भी अपवादभूत श्रुतिविशेषके वचनके बलसे उस कार्यको ऋत्विज् श्रादिसे करा लिया करता है, वहाँ मन्त्रोच्चारण तथा होमादि भी ऋत्विगादि ही कर लिया करते हैं, क्योंकि - ' यश्च परार्थं यजति स ऋत्विक ' ( मी.द. शावर. ६।३।२६ ) तब वही इष्टि निषादस्थपतिरखामिक हो जाती है, ' स्वरितत्रितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले ' ( पा. १२३।७२ ) के अनुसार उनको फल प्राप्त हो जाता है, पर इससे निषादस्थपतिको वेद वा उपनयनका अधिकार नहीं हो जाता, यही बात स्त्रीके यज्ञमें भी समझनी चाहिए । स्त्रीके ' यज्ञका निष्पादक उसका पति होता है, वह [ स्त्री ] केवल सुवर्णको सीताकी तरह ग्रन्थिवद्ध वस्त्रके रूपमें साथ बैठी रहती है, उसका फल स ० ध ० ह
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[ १२ १३० [ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नते हैं । उसको प्राप्त हो जाता है । जैसेकि - ' पत्युनों यज्ञसंयोगे ' ( ४ | १ | ३३ ) इस सूत्रके ' वसिष्ठस्य पत्नी ' इस उदाहरणमें स्त्रीप्रत्ययोंमें महाभाष्यके पवीतका श्राशयको लेकर श्रीदीक्षितने लिखा है - ' वसिष्ठकर्तृ कयज्ञस्य फलभोक्त्री-अनुपपन्न इत्यर्थः, दम्पत्योः सहाधिकारात् ' अर्थात् यज्ञके कर्ता वसिष्ठजी हैं; उसका हो जाने से फल उनकी स्त्री भी प्राप्त कर लेती है, क्योंकि - यज्ञफलमें पति - पत्नी म्बन्ध तौ दोनोंका अधिकार है । जो स्त्री यज्ञमें सब तरहकी सहायता पहुंचाती है, नीमांसा में उठने - बैठने का काम वही करती है, अपना प्रतिनिधि पतिवस्त्र - प्रन्थिवद्ध-६८२१ वस्त्र वहीं रखती यज्ञदीक्षित पतिको उठने - बैठनेकी जरूरत नहीं रह कार नहीं, जाती, तब उस स्त्रीको फल मिले भी क्यों नहीं? अधिकारी मीमांसादर्शनके ‘ तस्या यावदुक्तमाशीर्ब्रह्मचर्यमतुल्यत्वात् ' ( ६।१।२४ ) सका वेद सूत्रके शाबरभाष्यमें स्पष्ट कहा है- ' अतुल्या हि स्त्री - पुरुसाः, यजमानः अनुसार पुमान् विद्वांश्च, पत्नी स्त्री च अविद्या च । यदि एवं हि, एतद् अतुल्यत्वम् ' यन तथा एतद् श्रतो भवति त्वर्थेषु यानि याजमानानि श्रवणानि तेषु उपादेयत्वेन. रुषको है । श्रवणाद् विवक्षितं [ पु ] लिङ्गम् । तेन तेषु पत्नी न स्यात् । तत् पत्न्या अध्ययनस्य प्रयोजकं स्यादिति यद्य च्येत? तन्न प्रसत्यपि प्रयोज-कारी भी कत्वे तस्य निटं तिर्मविष्यति । अस्ति हि तस्य पुमान् निर्वर्तकः ।... दिसे तस्मात् प्रतिषिद्धस्य पत्न्या अध्ययनस्य पुनः प्रसवे न किञ्चिदपि प्रमाणम्, गादिही श्रतस्तदपि पत्नी न कुर्यात् ' इससे म.म.जीका इस सूत्रकेलिए यह लिखना ( मी.द. कि- ' इति सूत्रेऽतुल्यत्वं न विद्याऽभावेन, किन्तु राजसंनिधानेऽमात्यस्येव; जाती है, गुरुसन्निधाने शिष्यस्येव, पतिसन्निधानेऽस्वतन्त्ररूंपाऽप्राधान्येनैव ' ' ( सिद्धान्त. उनको तत्त्व. टि. पृ, १५२ ) यह खण्डित हो गया । उसका दृष्टान्त भी उनके नयनका पक्षको काट रहा है - राजाकी गद्दी वा गुरुकी कुर्सी श्रमात्य वा शिष्यको नहीं प्राप्त होती, अत: स्त्रीको भी पुरुष वाले अध्ययनादि अधिकार प्राप्त चाहिए । नहीं होते । सुवर्णको नका फल उक्त सूत्रका ऐसा अर्थ केवल शबरस्वामीने ही किया हो, यह बात भी नहीं, किन्तु वेद प्रकाण्ड विद्वान् श्रीशङ्कराचार्य - स्वामीके भी श्रद्धेय, पं ० शिवदत्तजीका मत [ १३१ मीमांसाके रहस्यज्ञ श्रीकुमारिल भट्टने भी ऐसा ही किया है - ' टुप् ' टीका ( श्रानन्दाश्रम ) में वे लिखते हैं- ' यजमानकांडे ये मन्त्राः, ते यजमानेनैव उच्चारणीया:, स ( यजमानो ) हि विद्वान्, इतरा ( पत्नी ) तु प्रविद्या । अन्यथानुपपत्त्या अध्येष्यते इति चेत्? सापि श्रन्यथानुपपत्तिर्यजमान-विद्वत्तयैव क्षीणा । तदीयेनैव अध्ययनेन निराकाङ्क्षत्वान्न प्रतिषिद्धमध्ययनं करिष्यति एवं चेद् याजमानमिति ग्रन्यतरस्मात् तद्धितोत्पत्ती कृतायां येपि मन्त्रवन्तः पदार्थास्तानपि यजमान एव करिष्यति । यद्यपि तेषु ( स्त्रिय:) विद्वत्त्वं नास्ति दोषः, तथापि यजमानेनैव केवलेन तद्धितस्य उत्पद्यमानत्वात् पत्न्या ग्रननुष्ठानम् । न च पत्नीयजमानयोः कृतंकशेपयो-स्तद्धितः प्रमाणाऽभावात् ' । यहाँ श्रीकुमारिलभट्टने शवरस्वामीकी अपेक्षा भी स्पष्टता कर दी । मोर्मासारहस्यज्ञ उनके सामने ' अतुल्यत्वात् ' का अर्थ करनेवाले वैयाकरण म.म. प ० शिवदत्तजीका कोई मूल्य नहीं । अन्य भी स्पष्टता उन्होंने की है- ' ब्राह्मणमुपनयीत ' इत्याचार्य करणे श्रात्मनेपदं भवति ।... माणवकस्य तु उपादीयमानत्वाद् लिङ्गसंख्यं विवक्षितम्... तस्मात् पुसोध्ययनं विहितम्, इतरस्या ( स्त्रियाः ) विधानाभावाद् अवैधता । न चान्ययानुपपत्त्या श्रध्ययनं तस्याः, अन्यथापि ( पु विद्वत्तयापि ) उपपद्यमानत्वात् । अतः प्राप्तोऽध्ययन-प्रतिषेधः ' इत्यादि । यहीं ६।१।२४ के छठे अधिकरणमें ' जैमिनि - न्यायमाला ' में ' विद्वत्त्वात् स एव तत् [ १० ]. इसकी ' शास्त्रदीपिका ' में भी स्त्रीका निषेध ही किया गया है । ' न्यायमालाविस्तर में भी वही बात ( स्त्रियोंका श्रदुष्य प्रकट की गई है । यह बात ठीक भी है - इस पर म.म. पं ० शिवदत्तजी का ' जैमिनि न्यायमाला ' ३०६ पृष्ठमें ' इदं च ' ' य इच्छेद दुहिता मे पंडिता बायेत ' इति ' वृहदारण्यकश्रुतिविरुद्धम् ' यह लिखना ठीक नहीं; यहाँ ' पंडिता ' अर्थ ' समझदार ' है, वेदाध्ययन वाली नहीं; क्योंकि वैसी बात उक्त श्रुतिके साथ वाली बृहदारण्यककी श्रुतिसे विरुद्ध है, जिसमें लड़केको
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१३२ । श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तो सव वेद पढ़ानेकेलिए कह दिया, पर लड़कीकेलिए प्राधा वेद भी अधिकृत नहीं किया । म.म.जीका पूर्वपक्ष उद्धृत करने वाले वादीके स्वामी दयानन्दजीने मनुपद्यके धनुसार लिखा है- ' [ राजा ] पुरोहित और ऋत्विका स्वीकार इसलिए करे कि वे अग्निहोत्र और पक्षेष्टि आदि सब राजधर्मके कर्म किया करें, और राजा श्राप सर्वदा राजकार्य में. तत्पर रहें ' ( सत्यार्थ. ६ समु. ६१ पृ. ) जिस प्रकार राजासे वरण किये हुए पुरोहितसे किये हुए कर्मका फल राजाको मिल जाया करता है, वैसे ही पत्नीसे वरण किये हुए पतिसे किये हुए कर्मका फल पत्नीको भी मिल जाता है । पति भी पत्नीका वरण इसलिए करता है कि वह उसके गृह-कार्यमें तत्पर रहती है, तब पति भी निश्चन्ततासे सन्ध्या, अग्निहोत्रादि करता है, उसीसे पतिकार्य - सहकारिणी पत्नीको भी फल मिल जाया करता है, जैसाकि मनुजीने पत्नीकेलिए कहा है- ' गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ' ( २२६७ ) पतिके घरके कामोंको पूरा कर देना स्त्रियोंका अग्निहोत्र है, अर्थात् उसको उसका फल मिल जाता है, जैसे कि - ' वसिष्ठस्य पत्नी ' पर हम पहले निर्देश कर चुके हैं । ४ | १ | ३३ महाभाष्यके उद्योत में भी कहा है- " यज्ञफल - स्वर्गादि-भोक्तृत्वाच्च यज्ञस्वामित्वं भार्याया बोध्यम् । ( यज्ञके फल स्वर्गांदि भोगनेसे भार्या भी यज्ञकी स्वामिनी है ) ' कथं च स्त्री नाम सभायां साध्वी स्यात् ' ( ४ | १ | १५ ) ( स्त्री सभामें साध्वी कैसे हो सकती है? ) इस महाभाष्योक्त वचन पर कैयटने लिखा है - ' यज्ञसभायां विदुषामेव पुरुषाणां साघुत्वाधिकाराद् ' । ( यज्ञसभामें विद्वान् पुरुष ही उचित हो सकता है । ) श्रीनागेशने इसपर लिखा है- ' वैदुष्यं च उपनयनादिमतां पुंसामेव इति तात्पर्यम् ' । ( विद्वत्ता उपनयन वाले पुरुषों की ही हो सकती है? ) यह वात वेदानुकूल भी है । तभी - ' सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् ' ( यजु. २२/२२ ) इस मन्त्रमें सभाकेलिए पुरुषकी ही प्रार्थना की है, लड़कीकी नहीं । फलतः म.म. पं ० शिवदत्तजीका मत इन सबसे विरुद्ध पं ० शिवदत्तजीका मत होनेसे उपेक्षणीय है । ( क - ख ) ' अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयीत ' इत्यत्र स्त्रिया अपि अधिकार ऐसा पं ० शिवदत्तजीने जातिपक्ष मानकर लिखा है । जब वे लड़की यज्ञोपवीत विवाहमें मानते हैं - यह हम पहले दिखला चुके हैं; तब में लड़का भी यज्ञोपवीत जातिपक्षके अनुसार विवाहमें करना पड़ेगा; क्या वे आठ वर्षके लड़के तथा लड़कीका उपनयन तथा विवाह श्राठ वर्षे करेंगे? क्या बादी उनका यह पक्ष मानेंगे? यदि नहीं; म.म जी लड़के यज्ञोपवीत ८ वर्षमें और उसका विवाह वादी २० - २५ वर्षमें करेंगे, श्री. ऐ लड़कीका विवाह तथा यज्ञापवीत ८ वर्षमें करेंगे, तो जातिपक्ष कट गया फिर जातिपक्षको शक्ति नहीं कि - ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' में लड़की स भी ग्रहण कर सके । क कन्या - विवाहका सिद्धान्त वादियोंके अनुसार १७-२४ वाँ वर्ष हैं, क इससे पूर्व कन्याका यज्ञोपवीत न हो सकेगा, न वह वेद पढ़ सकेगी । हा पं ० शिवदत्तजीका ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' में कन्याका ग्रहण वादी प द्वारा ही खण्डित हो जायगा; क्योंकि वादी कन्याका विवाह २४ वें वर्ष ह मानेंगे, यज्ञोपवीत भी कन्याका म.म.जीके अनुसार विवाह में होगा, क ८ वें वर्षमें कन्याका यज्ञोपवीत न होनेसे [ क्योंकि पं ० शिवदत्तजी विवाह वा कन्योपनयन मानते हैं ] ' भ्रष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत ' में म.म.जीका जाहि को पक्ष मानकर कन्याग्रहण व्यर्थ सिद्ध हो जायगा । तब जातिपक्ष ही क वर गया । वेदारम्भ होता है ब्रह्मचर्याश्रममें, विवाह हो जानेसे गृहस्थावार मा हो जानेके कारण पतिके घरके कार्यों में लगी रहने से वधूका वेदारम मा संस्कार ही न हो सकेगा । श्रतः पं ० शिवदत्तजीका ' भ्रष्टवर्षं ब्राह्मणमु उप नयेत ' में जातिपक्ष भी निर्मूल है । जातिपक्ष विषयमें हम पृथक् स्पष्ट ज्ज भी करेंगे । वादीका पक्ष भी कट गया; वे लड़कीका विवाह १७-२१ आ वर्षमें मानेंगे, ६-१२ वर्षमें ऋतुमती हो जानेसे वह शूद्रा हो जायगी विव तब उस लड़कीका यज्ञोपवीत भी निषिद्ध हो जावेगा; वह वेदाध्ययन अन
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१३४ | श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) न कर सकेगी । पे अधिकार ( ख ) गोभिलसूत्र के ' यज्ञोपवीतिनी ' पदके विषय में हम पहले वे लड़को स्पष्टता कर चुके हैं । फिर भी बादी बताए कि क्या ५० शिवदत्तजी तब उ ' यज्ञोपवीतिनी ' का ठीक अर्थ कर गये थे? यदि ऐसा है तो वे गोभिल के पड़ेगा; उक्तस्थल पर स्त्रीका यज्ञोपवीत विवाहमें मान गये हैं । इधर वे ' अष्टवर्ष भाठ ब्राह्मणमुपनयीत ' में जातिपक्ष मानकर उसका उपनयन बताते हैं । तब जी लड़ क्या वादी भी उनकी बात मानकर ८ वर्षकी लड़कीका विवाह मानते हैं? करेंगे, ऐसा हो तो वे स्वा. द. जीको इससे विरुद्ध अवस्थामें कन्या विवाह लिखने कट गया । से अनभिज्ञ मानें । में लड़की यदि वादी म.म.जीको अनभिज्ञ मानकर कन्याका विवाह २४ वर्ष में करेंगे, और म.म. जीके अनुसार कन्याके विवाहमें उसका यज्ञोपवीत वर्ष करेंगे तो २४ बर्ष तक वह वेद नहीं पढ़ सकेगी, गुरुकुलवास भी नकेगी । न कर सकेगी, फिर भी वादीका पक्ष कटता है । यदि वाद ग्रहण वादी पं ० शिवदत्तजीको अनभिज्ञ मानकर कन्याका यज्ञोपवीत बहुत पूर्व - २४ वें व ही मान लेंगे; तो विवाहके उक्त स्थलमें ' यज्ञोपवीतिनीम् ' इस विशेषणमें होगा, कोई उपपत्ति नहीं रहती - उसकी व्यर्थता हो जाती है । अब देखिये-जी विवाह वादीने न तो इस अवसर पर माना गोभिलको, न माना पं ० शिवदत्तजी जीका जाति को, न माना स्वा. द. जीको, क्योंकि वे इस अवसर पर ' यज्ञोपवीतकी तरह पक्ष ही क वस्त्र लपेटना ' प्रथं कर गये हैं, यज्ञोपवीत पहनना नहीं । तब वादी गृहस्थाश्र मानते किसको हैं? क्या हारीतको? नहीं । श्राप हारीतको भी नहीं का वेदार मानते । हारीत ब्रह्मवादिनीका यावज्जीवन ब्रह्मचर्य बताता है, तव ब्राह्मणमुर उपनयन तथा नियत वेदमन्त्रोंका अधिकार देता है, क्या वादी ऐसी याव-यक् स्पष्टत ज्जीवन कुमारीको ही ऐसा अधिकार देता है? कभी नहीं । यहाँ भी ह १७-२१ आपने हारीतको न माना । हारीत सद्योवधूको जिसका विवाह होना है, हो जायगी विवाह के अवसर पर उसका उपनयन ( वादीके अनुसार यज्ञोपवीत, हमारे दाध्ययन अनुसार उपवस्त्र ) मानता हैं, वेदाध्ययन नहीं । क्या वादी यह मानते पं ० शिवदत्तजीका मत [ १३५ हैं? कभी नहीं; क्योंकि २४ वर्ष तक वेदाध्ययन न होनेसे, विवाहके अवसर पर दिया हुआ आपका वह यज्ञोपवीत भी व्यर्थ रहेगा । श्रव वादी गतावे कि वह किसको मानता है? किसीको भी नहीं मानता । तब वादीका पक्ष भी किसीसे सिद्ध नहीं हो सकता । इसके प्रतिरिक्त ' प्रों या प्रकृन्तन्... प्रायुष्मति परिधत्स्व वासः ' ' परिधत्त धत्त वाससा ' इन मन्त्रोंके अर्थसे भी कपड़ेका बोध हो रहा है, यज्ञोपवीतकी तो इन मन्त्रोंमें गन्ध भी नहीं । तब इससे वादीका प्रयास विफल हुआ । ( ग ) जोकि स्त्रीके लिए ' प्रमे पतियानः पन्याः कल्पताम् ' इति वाच-येत्, यह मन्त्र बुलवाना लिखा है - पहले तो यह मन्त्र वादीके अनुसार वेदका नहीं है; प्रपने वेदोंमें उसे ढूंढो; अतः उनके पक्षकी सिद्धि नहीं । दूसरा विवाह में स्त्री को कई विशेष मन्त्र बुलवाना अपवाद है, इसकी श्रभ्यनुज्ञा दी गई है; पर वह उत्सर्ग नहीं । जैसे यज्ञोपवीतसे पूर्व वेदके • मन्त्रोंके उच्चारणका किसी को अधिकार नहीं; ' नाभिव्याहारयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनाद् ऋते ' ( म. २।१७२ ) में स्वचानिनयन ( मृतकश्राद्ध वर प्रत्येष्टि ) में बिना भी यज्ञोपवीतके मन्त्र - विशेषोंका माणवक प्रादिसे बुल-चाना अपवाद है, वैसे स्त्रीके विवाहके लिए भी अपवाद है । इसलिए याज्ञवल्क्य तथा व्यासने भी कहा है- ' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( १।२।१३ ) ' नवैताः कर्णवेघान्ता मन्त्रवर्ज क्रियाः स्त्रियाः । विवाहो मन्त्रतस्तस्याः ' ( व्यासस्मृति १।१५-१६ ) । इसलिए इस श्रवसरपर वर ही स्त्रीके पठनीय मन्त्रोंको भी बोल देता है, जैसे कि - गोभिलपुत्रके ' गृह्यासंग्रह ' में भी कहा है- ' विवाहे यो विधिः प्रोक्तो मन्त्रा दाम्पत्यबाचका: । वरस्तु तान् जपेत् सर्वान् ऋत्विम् राजन्य-वंश्ययोः ' ( २।२४ ) । इसलिए उसी गोभिल - वचन जिसे म.म.जीने उद्धृत किया है - उसीके साथही लिखा है, जिसे उन्होंने छिपा दिया; वह यह है - ' स्वयं [ वरो ] जपेद् श्रजपत्त्याम् [ वघ्वाम् ] ( यदि वह स्त्री उक्त मन्त्र न बोले; तो वर उसे बोले ) । ' प्रास्याः पतियानः पतिलोकं गम्याः '
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१३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( गोभि ० २।१।२१ ) । इससे हमारे ही पक्षकी पुष्टि हुई । ( घ ) वसिष्ठका जो ' सावित्र्या अष्टशतेन जुहुयात् ' वचन दिया गया है, उसका उत्तर यह है । - ' वसिष्ठस्मृति ' - ' प्रस्वतन्त्रा स्त्री पुरुष - प्रधाना, अनग्निः अनुदक्या, चानृतमिति ( ५।१ ) इस प्रकार स्त्रीको स्वतन्त्रतासे अग्निहोत्रका निषेध करती है, तब यहाँ ' जुहुयात् ' में अन्तर्भावितण्यर्थं ' है, श्रतः वहाँ ' ऋत्विक्, पुरोहित आदि द्वारा यह अध्याहृत होता है । जैसा कि म.म. श्रीरघुनन्दन भट्टाचार्यने स्मृतितत्त्वके द्वितीय भागमें ६३४ पृष्ठ में लिखा है- ' शूद्रस्य मन्त्रपाठानधिकारे सिद्धे यद् ' अमन्त्रस्य ' इति पुन -र्वचनं तत् स्त्रिया ग्रहणार्थं परिभाषार्थं च । ततश्च तत् ( स्त्री ) - कर्म-सम्बन्धिमन्त्रेण विप्रः तदीयकर्मकारयितृ - ब्राह्मणो गृह्यते, तेन ब्राह्मणेन तत्र मन्त्रः पठनीयः ” । ( शूद्रके मन्त्रपाठके अनधिकार सिद्ध होनेपर भी जो कि - ' श्रमन्त्रस्य ' यह फिर कहा गया है - यह स्त्रीके ग्रहणके लिए है, और पारिभाषार्थ है । तब उम [ स्त्री ] कर्मसम्बन्धी मन्त्रसे विप्र उस कर्मके करानेवाला ब्राह्मण लिया जाता है । वह मन्त्र उस ब्राह्मण पढ़ना चाहिए । ) इधर ' वशिष्ठस्मृति ' में यहाँ ' सावित्र्या: शिरोभिः ' ( २११७ ) यह पाठ है । इसका अर्थ है कि- ' गायत्री के शिरोमन्त्रसे ' । शिरोमन्त्र है-' आपो ज्योतीरसोऽमृतम् ' यह उद्धरणकर्ता वादीके अनुसार वेदका नहीं है, वह अपनी चार संहिताओं में इस म त्रको ढूंढे, उसे नहीं मिलेगा । तब सब झगड़ा छूटा । हमारे अनुसार भी यह सम्पूर्ण मन्त्रसे पृथक होजानेसे ' अनाम्नातेषु ग्रमन्त्रत्वम् ' ( मीमां. २।११३४ ) के अनुसार वेदमन्त्र न रहा । इसी प्रकार ' वाक्यनियमात् ' ( मी. १।२।३२ ) इस मीमांसा - नियमके अनुसार नियतक्रमवाला न होनेसे वेद न रहा । तब इससे स्त्रीको वेदाधिकार सिद्ध न होसका । अथवा कहीं ' सावित्र्या ' ही पाठ हो, तो भर्ता मानसिक अतिक्रमण दोषकी निवृत्तिकेलिए ' सावित्र्यं नम: ' इस मन्त्रका अथवा सावित्री नामक पतिव्रता स्त्रीका स्मरण भी विवक्षित हो पं ० शिवदत्तजीका मत [ 35 -१ सकता है । स्वतन्त्रतासे वशिष्ठके मत में उसे अग्निहोत्रका अधिकार नहीं; तभी उसे ' अनग्निः ' कहा गया है । I ( ङ ) ' अथ य इच्छद् दुहिता मे पण्डिता ' का उत्तर पहले सभ्यता में दिया जा चुका है! उसे पाठक ( १० ) वें उत्तरपक्ष में देखें । लि ( च ) क्या वादी पं ० शिवदत्तजीकी यह बात मानता है कि - कठो तव आदि प्रयोगोंसे स्त्री वेदाधिकारिणी सिद्ध हैं । तो क्या वादी वैदकी शा. तथ खाश्चोंको बेद मानता है? यदि गया, क्योंकि बादी का सम्प्रदाय उद्धरण भी निष्फल सिद्ध हुआ चरण ( शाखाओं ) का उदाहरण सिद्ध न हुआ । शाखाओंको वेद मानने वाले ' तत्त्वबोधिनी ' टीकाने दिया है. बोधक हैं । यह शब्द ब्रह्मवादिनी हां तो उसका सैद्धान्तिक पराजय श्रा शाखाओंको वेद नहीं मानता । तब यह हम । क्योंकि - ' गोत्रं च चरणैः ' यह वार्तिद बता रहा है, इससे स्त्रीका वेदाधिकार | पि संस्क हम लोगोंका इस पर समाधान यहाँको कि यह ' कठी ' आदि शब्द ' पुराकल्प ' हैं अथ उन ऋषिकानोकेलिए हैं, जो ' पुराकल्प ' ' पित अर्थात् कल्पके आरम्भ में कठ बहुच आदि संहिताओंके प्राकट्यंके लिए इत्य प्रकट होती हैं, और वे ऋषिकाएं नियत होती हैं, उनसे भिन्न प्रोजकल में स की स्त्रियाँ नहीं होतीं । क्योंकि यह कल्पारम्भ नहीं । इधर कठ, वह विध श्रादिके उनके नियत ( न कि सब ) मन्त्रों का स्मरण करनेसे भी ' समुदा निया येषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि आदि नाम को प्राप्त कर लेती हैं ( छ ) यह कहना ठीक नहीं ऋत्विक्प्रोक्त अर्थका ज्ञान न होनेसे ऋत्विक् मातृभाषा में स्वयं बतलाते तो क्या, विद्वान् पुरुषोंको भी कहते जो वर्तन्ते ' इस न्याय से वे ' कठी बहुवच ' स्वाम । ' श्य कि यजमानपत्नी पढ़ी नहीं होगी; ता बर ' वह उस कार्यको न कर सकेगी क्योंकि तो हैं-- ऐसा करो, वैसा करों ' । स्त्रियोंको के. हा हैं, इसीलिए तो श्रौतसूत्रों में ' बाचयेत् ' भी क ऐसे विद्वान् पुरुषों द्वारा मन्त्र भी पढ़वाये गये हैं, नहीं तो फिर पढ़ने वाले ही. स्वयं सब विधियां कर लें, ऋत्विजोंको बुलाया ही न जाय, और फिर आध
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[ १३ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) -१३८ अधिकार ऋत्विज् दिसें बतलाई हुई विधि लौकिक संस्कृत जानने पर भी समझ मैं श्रा सकती है । पहले जब मातृभाषा संस्कृत थी, तइ भी बिना पढ़ी-सम्यक्त्वा लिखी स्त्रियाँ समझ ही जाती थीं । श्रव जब मातृभाषा संस्कृत नहीं है, तब जो भी अपनी मातृभाषा होगी, उसीमें विधि समझाई जाती है । कि - कठो तथापि विधियां प्रायः पुरुषके लिए श्राती हैं, स्त्रीके लिए तो कोई एक-की शा हो विधि प्राती है । ऐसे ही विवाहमें ऐसे ही यज्ञमें । तब इससे राजय हो हमारे पक्षको कोई हानि नहीं पहुंचती । स्त्रियोंको केवल वैध एवं क्रमिक तब यह ( मनु. २।१७३ ) वेदके अध्ययनका ही निषेध है, लौकिक संस्कृतका नहीं । वार्तिक दाधिकार ' पिता पितृव्यो भ्राता वा नैनामध्यापयेत् परः ' । पिता प्रादिसे वह लौकिक संस्कृत समझनेका ज्ञान कर सकती है । स ध इसका निषेध नहीं करता । यहाँका अथवा न पढ़ने पर भी अन्यके कहनेसे वैसा करना पड़ता ही है । अथवा वर उससे वैसा करा लेता ही है, जैसे कि जातकर्मादि सस्कारोंमें कल्प ' दें पिता लड़केसे वैसा करा ही लिया करता है, ' अश्मा भव, परशुर्भव ' पुराकल्प ' इत्यादि मन्त्रोच्चारण द्वारा उसके भविष्यत् कर्तव्यका उसके अन्तःकरण-के लिए में संस्कार डाल दिया करता है । अन्यथा क्या बच्चा मन्त्रोंके भाव या आजकल विधिको समझ सकता है? ' महाभाष्य में कहा है- ' याज्ञे कर्मणि प्रयोग-नियमः ' तो याज्ञिक - कर्ममें ज्ञान आवश्यक नहीं, केवल प्रयोग आवश्यक है, ' समुदा • जो ऋत्विज़ · आदिके सहारे निरक्षर भी कर सकता है । इसलिए वादीके स्वामीने भी कहा है- ' यदि यजमान न पढ़ा हो, तो इतने मन्त्र तो प्रव-श्य पढ़ लेवे । यदि कोई कार्यकर्ता जड़, मन्दमति ' काला अक्षर भैंस बरा -नी; ता बर ' जानता हो, तो वह शूद्र है अर्थात् शूद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो, -क्योंकि तो पुरोहित और ऋत्विज् मन्त्रोच्चारण करे, और कर्म उसी मूढ यजमान त्रयोंको के. हाथसे करावे ' ( संस्कारविधि - सामान्य प्र ० २६ पृष्ठ ) । यही बात यहां चयेत् भी वादी घटा ले । ने वाले यह बात यहां जाननेकी है कि स्त्रीका विवाह में बोलने का कोई एक-फिर आध ही मन्त्र होता है, देखिये सूत्रग्रन्थ । वे भी प्रायः सौत्र मन्त्र हैं, शेष पं ० शिवदत्तजीका मत [ १३२ सब वैदिक मन्त्र वरके हैं, इससे हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं! यज्ञो-पवीतसे पूर्व लड़का भी प्रशिक्षित होता है, तब उसको भी संस्कृत शब्दों का बोध न होनेसे संस्कारोंमें उसका भी सारा कर्म ही भ्रष्ट हो जायगा । यदि उस श्रनधीत लड़केके गुरुके प्रश्रयसे मन्त्र बोलनेसे भी विधि - भ्रंश महीं, स्वर श्रादिके प्रज्ञानसे होने वाला धर्म नहीं होता, तो वैसे ही घर वा पुरोहितके श्राश्रयसे एक प्राध अपना नियत मन्त्र बोलने पर प्रनधीत भी स्त्रीका विविभ्रंश नहीं होता । ( ज ) ' संस्कारादि यज्ञमें प्रयज्ञिय, संस्कृतसे प्रतिरिक्त भाषण तो ' नायशियां वाचं वदेत् ' से निषिद्ध है ' इसका उत्तर हम अभी - अभी दे ही चुके हैं । इसको उद्धृत करने वाले वादीको तो चाहिए कि विवाहादि संस्कार एवं यज्ञमें संस्कृतातिरिक्त हिन्दी भाषण करवाने वाली अपनी ' संस्कारविधि ' का बाईकाट कर दे । यदि वह कहे कि स्वामीजीकी संस्कारविधि स्त्री - शूद्रों वा मूर्खोकेलिए है; तो वह याद रखे कि सभी संस्कारों में प्रापके भाई उसी ' सं.वि. ' को ले जाते हैं, वहां की भाषा पढ़कर भी सुनाते हैं, तब आप सारा शूद्र स्त्रीमण्डल सिद्ध न कीजिये । ऐसा सिद्ध हो जानेसे फिर ' नायज्ञियां वाच वदेत् ' यह निषेध स्त्री - शूद्रके लिए प्रसक्त न होगा; श्रथवा वे फिर यज्ञके अधिकारी न रहेंगे । हमारे मतमें शुद्रोंको तो यज्ञका निषेध है ही, केवल स्त्रीकेलिए ' विवाहस्तु समन्त्रक: ' यह अपवाद है, अतः दोष नहीं । इधर यज्ञमें अयज्ञिय वाणी न बोलनेका तोड़ भी, उसके उद्धारका प्रकार भी हमारे पास विद्यमान है । ' नायज्ञियां वाचं वदेत् ' ( ११६/१८ ) यह गोभिलका सूत्र है । इसका तोड़ ' यदि प्रयज्ञियां वाचं वदेत्... नमो ' विष्णवे इति ब्रूयात् ' ( १।६।२१ ) यह है, तब स्त्रीको ' नमो विष्णवे ' कहना कुछ कठिन नहीं, अतः दोष भी नहीं होगा । इधर स्त्री उस समय लज्जादिवश ' अग्निम् श्रभिमुखो वाग्यतः ( मौनी ) प्राञ्जलिरास्ते आकर्मणः पर्यवसानाद् ( गो. १।६।१६ ) की तरह -विवाहमें चुप रहती है, उसका कार्य वर - पुरोहितादि ही ' कह ' करके कर
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पं ० शिवदत्तजीका मत [ १४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १४१ दिया करते हैं, जैसेकि इस विषयमें पहले हम गोभिलका सूत्र ( २०१०२१ ) ही उद्धृत कर चुके हैं, तब उसके मुखसे प्रयज्ञिय वाणी निकलेगी ही नहीं । ( झ ) श्री सीता - महाश्वेता श्रादिके सन्ध्योपासनके विषय में यह जानें कि सन्ध्या प्रातःकाल तथा सायंकालके तमः और प्रकाशके मिश्रण सन्धिकालरूप समय- विशेषको कहते हैं, तदाश्रित कृत्यों - शौच- दन्तधावन स्नान तथा भगवान् के ध्यान आदिको भी आश्रय श्राश्रयीके प्रभेदसे ' सन्ध्या ' कहा जाता है । उसमें वेदमन्त्रोंकी अनिवार्यता नहीं रहती, ( वादीके स्वामीने ही ' उष्णादि कोष ' ( ४१११२ ) में ' सन्ध्या ' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार लिखी है- ' सन्दधाति यस्यां वेलायां सा सन्ध्या, ' सायंकाल ' [ यहाँ स्वामीजीको ' प्रातःकाल ' भी लिखना चाहिए था, फिर वे लिखते हैं- ] ' सम्यग् ध्यायन्ति परब्रह्म यस्यां सा सन्ध्या ' । इसमें ' वेद-मन्त्रः ' यह शब्द कहीं नहीं लिखा हैं, तव वादीके पास क्या प्रमाण है कि- श्रीसीताकी सन्व्या वेदमन्त्रोंकी थी? परमात्माका ध्यान, भजन करना ही सन्ध्या है, तो उसका भजन अधिकारी वेदमन्त्रोंसे करेंगे, अनधिकारी वेदभिन्न मन्त्रों वा श्लोकोंसे । हमारे देशकी स्त्रियाँ ग्रव भी सायंकालमें मिलकर सन्ध्या किया करती हैं, पर वे वेदमन्त्र नहीं होते । उसमें भगवान्का व्यान तथा ' सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि ' ( सामवेदसं. २०१३ । ४/२ ) ' नामानि ते शतक्रतो! विश्वाभिर्गीभिरीमहे ' ( अथ. २० । १६।३ ) इत्यादि प्रमाणोंके अनुकूल उसका नाम - कीर्तन होता है, वैसा ही सीताकेलिए समझ लें । सन्ध्यामें वेदमन्त्रोंका होना अनिवार्य नहीं । नहीं तो फिर बादी अपनी सन्ध्यासे ' अ वाक् वाक्, यों भूः पुनातु शिरसि, भुः इत्यादि सप्त व्याहृतिवाला मन्त्र -ये मन्त्र निकाल दे, क्योंकि यह उसके अनुसार वेदमन्त्र नहीं । रामायणकालमें अधिकार अनधिकारका बहुत विचार किया जाता था । तभी तो शास्त्रविरुद्ध तपस्या करते हुए शम्बूक शूद्रको दण्ड दिया गया था । इधर रामायण में मनुस्मृतिक अनुसार व्यवहार दिखाये गये हैं, तभी श्रीरामने वालीके श्रागे उसके भारनेके समय दो मनुस्मृतिके पद्य कहे थे, जो श्रव भी मनुस्मृतिमें मिलते हैं । श्रीरामरे अपना व्यवहार मनुस्मृतिके अनुसारी बतलाया है, तब फिर उनकी स्त्री सीता मनुस्मृतिकी मर्यादाके विरुद्ध वेदमन्त्रों की सन्ध्या कैसे कर सकती थी? जब तक ६ वर्षमें विवाहित सीताको वादी उपनीता न मिद्ध कर लें, तब तक वे उसकी वैदिक - पन्ध्या सिद्ध नहीं कर सकते । नहीं त ' महाराज ( दयानन्द ) ने उन [ ठाकुर महाशय ] को कहा कि जब तक श्राप जनेऊ धारण न कर सकें, तब तक यह प्रार्थना किया करें-परमेश्वर!... भवत्कृपया धर्मे मे सदा प्रीतिर्भवेत्, नाधर्मे कदाचित् '... स्वामीजीने वह जप भी लिखाया — ग्रों नमः परमेश्वराय सच्चिदानन्द-स्वरूपाय सर्वगुरवे नमः । ( श्रीमद्दयानन्दप्रकाश १२० पृष्ठ ) यह स्वा. द. से निजी गढ़ा हुआ २४ अक्षरका मन्त्र है । जो अनुपनीतकेलिए वे बता रहे हैं । इसके अनुसार लौकिक गद्य - पद्य ' नमो भगवते रामचन्द्राय ' आदिकी सन्ध्या समझ लें । अथवा ' तस्माद् अहोरात्रस्य संयोगे ब्राह्मणः सन्ध्यामुपासीत उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन् ' ( ४/५ ) पविंश ब्राह्मणके इस प्रमाणसे सूर्यका ध्यान ही सन्ध्या है; तब ' सूर्याय नमः, इत्यादि लौकिक मन्त्रों द्वारा सूर्यका ध्यान अथवा उस सन्ध्याकालका वन्दन करना ही सन्ध्यावन्दन वा सन्ध्योपासन होता है । स्वामीजी भी ' भद्रकाल्यै नमः, सानुगाय यमाय नमः इन लौकिक, वेदभिन्न वाक्योंको भी ' मन्त्र ' कहते हैं । इन जैसे ' नमः ' अन्त वाले मन्त्रोंके जपनवाली सन्ध्यामें हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं । श्रथवा यहाँ सीताकी ' सन्ध्या ' का भाव प्रातःकालिक स्नान भी प्राकरणिक है । सन्ध्या होती है चित्तकी एकाग्रतामें, पर सीताका चित • तो उस समय विरह व्यथामें था, वह सन्ध्यामें क्या लगता? इसलिए व
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[ १४१ १४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः (: -२ ) व्यवहार ‘ सन्ध्याकालमनाः श्यामा सन्ध्यार्थे वरवर्णिनी ' ( वाल्मी. ५ | १४ | ४६ ) का समय दो अर्थ लिखते हुए ' शिरोमणि ' टीकामें लिखा है- ' सन्ध्याकालः समयो यस्य, श्रीरामने तस्मिन् स्नान - जपादी मनो यस्याः, सा, श्यामा - नित्य- षोडशवार्षिकीत्वेन की स्त्री प्रतीयमाना जानकी सन्ध्यार्थ - मान्ध्यकर्म [ स्नानध्यानादि ] निर्वृत्यर्थम् ' सकती यहाँ प्रातः - सन्ध्याका आश्रित कृत्य स्नान - ध्यान दिखलाया गया है । यही बात रामाभिराम टीका में भी लिखी गई है - ' सन्ध्यार्थे सन्ध्याकाल-कर लें. क्रियमाण - स्नानाद्यर्थे । रात्रि शेषे हनूमतोऽस्य वचसः प्रवृत्तेः सन्ध्याशब्देनात्र ता वे प्रातःकालो विवक्षितः । तत्र कर्तव्यस्नानादी च अस्त्येव स्त्रीणामप्यधिकारः । जव तक किं च सम्यग् भगवद्ध्यानस्यैव सन्ध्यापदार्थत्वेन अस्त्येव तत्र स्त्रिया - अधिकारः । गायत्रीमन्त्रेण तदर्थस्मरणपूर्वकध्यानं तु द्विजस्यैवाधिकारःः । चित्... ( सन्ध्याकाल समय जिसका, उन स्नान - जप प्रादिमें ही मन है जिसका, दानन्द- नित्य १६ वर्षकी मालूम होनेवाली सीता सन्ध्याके कर्म [ स्नान - ध्यान स्वा.द. आदि ] करने के लिए ' ( शिरो. ) ( सन्ध्या सन्ध्याकालमें किये जाते हुए वे बता स्नानादिकेलिए । रात कुछ रहती थी; उस प्रातः के समय में यह हनुमान् ' चन्द्राय ' का वचन है. तब ' सन्ध्या ' से यहाँ प्रातः काल इष्ट है । उसमें करने ब्राह्मणः योग्य स्नानादि कर्मोंमें स्त्रीका भी अधिकार है । भगवान्का ध्यान करना-षड्विंश यह ' सन्ध्या ' का अर्थ है, सो उसमें भी स्त्रीका अधिकार है । हाँ, गायत्री-य नमः, मन्त्र तथा उसके अर्थपूर्वक [ वैध ] ध्यानमें द्विज - पुरुषका ही अधिकार कालका होता है ) ।. जी भी तो यहां सन्ध्याका प्रातः सन्ध्याकालिक स्नान अर्थ करना कोई को भी दुराग्रह भी नहीं; क्योंकि प्रातः - स्नान आवश्यक ही होता है, हनुमान्का सन्ध्यामें यह वाक्य थोड़ी रात्रि शेष रहनेकै समयका हैं । श्रीवाल्मीकिको भी यहाँ यही स्नान अर्थ इष्ट प्रतीत होता है, इसलिए वहाँ ' शीतजला नदी ' ज्ञान भी ( ५।१४।५१ ) ढूंढी गई है । स्नानकेलिए ता ठंडे जल वाली नदी ढूंढी चित्त जा सकती है, सन्ध्याकेलिए, उसका प्रन्वेषण अनिवार्य नहीं । बल्कि इसलिए वादियोंकी ‘ सूखी वैदिक सन्ध्या ' के लिए तो जलकी भी अनिवार्य पं ० शिवदत्तजीका मन [ १४३ श्रावश्यकता नहीं, जब तक कि कफ और नींद तंग न करें । तब वहाँ ' शीतजला नदी ' का ढूंढना तो और भी व्यर्थ हो जाता है; क्योंकि वह तो उल्टा कफको बढ़ावेगी; घरसे यहां आनेपर नींद की प्राप्ति तो सम्भव ही नहीं । अतः ' शीतजलां नदीम् ' यह साभिप्राय विशेषण प्रात: -काल होनेवाले स्नानको बता रहा है, क्योंकि स्नानमें ठण्डा जल हितकारक होता है । महाश्वेताका यज्ञोपवीत पहिन र सन्ध्या करना यदि अनुकरणीय है; तो उसकी सन्ध्या तो त्र्यम्बकस्य दक्षिणां मूर्तिमाश्रित्य अभिमुखीम्... शङ्कराभ्यर्चनाय स्वयमुद्यतां... स्नपनाद्रं लिङ्ग - संक्रान्त- प्रतिविम्बतया हृदयमिव प्रविष्टां स्मरस्य ' [ कादम्बरी ] शिवलिङ्गकी मूर्तिपूजाकी दिखलाई गई है, इस प्रकार हर्षचरितंमें सरस्वतीको भी पुलिन प्रतिष्ठा-पित - शिवलिङ्गा च ' [ प्रथम उच्छ्वाम ] यही मूर्तिपूजा दिखाई गई है । तब क्या वादी शिवलिङ्गकी मूर्तिपूजाका स्त्रियोंके द्वारा अनुकरण ठीक मानता है? यदि ऐसा हो तो वह शीघ्र ' वैदिकधर्मकी जय करें ' । यदि वादी यह मूर्तिपूजा बाणभट्टकी वेदानभिज्ञतासे लिखी समझता है, तो उसका स्त्रीयज्ञोपवीत भी उसकी वेदानभिज्ञताका फल समझे । ' मीठा-मीठा गड़प और कड़वा कड़वा थू ' यह कहावत क्या वादी चरितार्थ नहीं कर रहा? इसपर वादीको यह याद रखना चाहिए कि- महाश्वेना गन्धर्व कन्या एवं देवता थी; तभी तो अपने पतिके तीन जन्म लेनेपर भी वह बूढ़ी नहीं हुई । क्या वादी ऐसी मानुषी दिखा सकता है? तब देवताओंके नियम मानुषियों में लागू नहीं हो सकते, क्योंकि देवता तो जन्मसे ही विद्वान् होते हैं । वे दिव्य ( लोकोत्तर ) होनेसे कभी - कभी लौकिक - मर्यादा तोड़ देते हैं; अतः उनका लौकिक - धर्मशास्त्रविरुद्ध आचरण अनुकरणीय नहीं । वाणभट्टने मानुषी स्त्रीमें कहीं यज्ञोपवीत नहीं दिखलाया? ) ( ञ ) हारीतवचन पर पहले स्पष्टता की जा चुकी है । हारीतानुसार
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.प ० शिवदत्तजीका मत [ १४५ १४४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यावज्जीवन थोड़ी - सी ब्रह्मचारिणियाँ भले ही उपनयनपूर्वक वेद पढ़ें; तब वे म.म.जीके अनुसार वैवाहिक मन्त्र क्यों पढ़ेंगी? सद्योवधूको हारीत भी वेदाधिकार नहीं देता; तब ऋत्विक् उसकी उस समय सहायता करेगा । वस्तुतः वे ऋषिकाएं हैं - यह हम पहले स्पष्ट कर चुके चुके हैं । सद्योवधू तो हारीतानुसार वेद पढ़ेंगी नहीं । सद्योवधूका हारीतप्रोक्त उपनयन ' आचार्यकरण ' न होनेसे ' यज्ञोपवीत ' नहीं । नहीं तो फिर ' कर्मकरान उपनयते ' में भी वैसा अर्थ हो जाय? पर नहीं होता । वहाँ " भृतिदानेन स्वसमीपं प्रापयति ' यह मर्थ किया गया है । देखिये-श्रात्मनेपद - प्रक्रिया ( १।३।३६ ) | शेष हैं विवाहमें कई वधू - द्वारा पढ़े जाने वाले मन्त्र, उसपर ' तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' ( याज्ञ. ११०११३ ) विवाहो मन्त्रतस्तस्याः ( व्यास १।१६ ) यह अपवाद-वचन मिलते हैं, उन्हें ऋत्विक् आदिके सहारे बुलवाया जा सकता है । दूसरेके महारे तो निरक्षर बच्चा भी वोल सकता है । ' वचनस्य को नाम भार:? ' इस प्रकार यज्ञके स्त्रीविषयक क्वाचित्क कई मन्त्रोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये । इमपर पूर्व प्रकाश डाला जा चुका है । ( ट ) इसका उत्तर भी ( ज भागमें ) दिया जा चुका है । कर्मकाण्डमें वैसा उच्चारण विवक्षित है, ज्ञान नहीं । तो स्त्री ऋत्विगादि प्रोक्त शुद्ध मन्त्रका जब अनुवचन कर लेगी, तब कर्मभ्रष्टता कैसी? याज्ञ कर्ममें प्रयोग - पक्ष ही होता है, ज्ञान - पक्ष नहीं । ' तैः पुनरसुरैयज्ञेि कर्मणि अप-भाषितम्, ततस्ते पराभूता: ' संस्कृतका ज्ञान रखते हुए भी असुरोंने यज्ञके समय ' हेलय: ' इस प्रकार प्रशुद्ध आचरण किया, वे हार गए । तब यहाँ विवाह - यज्ञमें भी उच्चारणमात्रकी आवश्यकता है, ज्ञानकी नहीं । इसलिए वेदमें भी कर्मकाण्डको ' अविद्या ' ( यजुः ४०।६ ) कहा गया है । महाभाष्य में भी ' आचारे नियम: ' माना गया है, सो वह लड़की स्वतन्त्रता से कोई मन्त्र अशुद्ध उच्चारित कर ले यह सम्भव है, इसलिए उसे ऋत्विक वा वरके परतन्त्र होकर बोलना पड़ता है - इससे कर्मभ्रष्टताकी आशंका नहीं रहती । ( ठ ) ' जाति तु वादरायणः; तस्मात् स्त्र्यपि प्रतीयेत यह मीमांसाका सूत्र केवल ' स्वर्ग - कामो यजेत ' में संकुचित है, स्त्रीके उपनयन - वेदाद्यधिकारः में व्यापक नहीं । क्योंकि इस सूत्रमें उसका प्रकरण नहीं । इसका यह है कि - ' लिंगविशेषनिर्देशात् पुंयुक्तमैतिशायन: ( ६१११६ ) यह पूर्वपक्ष ‘ दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इस ऐकदेशिक वाक्य पर सूत्रित किया गया है, उपनयनादिमें नहीं । अन्यत्र भी प्रचलित नहीं, अन्यथा ' पशु मालभेत ' से स्त्री - पशु भी आलब्ध किया जाय, पर नहीं किया जाता । तभी तो ६।१।८ मीमांसासूत्र के भाष्य में शवरस्वामीने लिखा है- ' स्वर्गकामः शब्देन उभावपि स्त्रीपुंसौ, अधिक्रियेते, अतो न विवक्षितंः - पुःलिङ्गम् । कुतः 7. प्रविशेषात् । नहि शक्नोति एषाः विभक्तिः - स्वयंक्राम लिन विशेष्टुम् । स्पष्ट है कि यहाँ उपनयन की कोई बात ही नहीं । नहीं तो जातिपक्षानुसार लड़कीका भी यज्ञोपवीत प्रष्टवर्ष करना पड़े ब्रह्मवादिनियों का तो यावज्जीवन विवाह नहीं होता, सद्योवधुयोंका बादीके अनुसार विवाहमें उपनयन करना पड़ता है, तो क्या वादी ८ बर्षकी लड़कीका विवाह मानेगा? यदि नहीं, तब स्पष्ट है कि यह जातिपक्षे उपनयन् - वेदादिमें व्यापक नहीं । यदि जातिपक्ष सर्वत्र अबाधित होता, तो ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो जायेत ' ( शत. १४६४५१७ ) से ' पुत्र के ग्रहणसे पुत्रीका ग्रहण भी हो जाता, तब ' अथ य इच्छेद् दुहिता में पण्डिता जायेत ' ( १४ ॥ ४११६ ) यह कण्डिकी व्यर्थ थी । जब यह पृथक् प कही गई है, इससे स्पष्ट है कि - जातिसूत्र ' स्वर्गकामो यजेत ' में प्रसक्त है सर्वत्र नहीं । इस विषय में हम अधिक १५ संख्या में कहेंगे । इसी प्रकार ' स्त्री चाविशेषात् ' यह कात्यायन श्रौतसूत्रका सूत्र भी स्त्री की स्वर्गकामनामें विश्रान्त है, जैसाकि उसके कर्कभाष्य में लिखा है - स्त्री च अधिक्रियते, कुंत एतत्? श्रविशेषात् । यस्मात् श्रूयमाणमपि एतल्लिगं न सब्ध ० १०