सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 21–30
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 21–30
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( द ) भोगलोलुप - समय में श्रीसनातनधर्मोद्धारका महान कार्यका अनवरत -परिश्रम आपके सिवाय कौन कर सकता था । मैंने श्रीचैतन्यचरितावलीमें श्रीगौराङ्गमहाप्रभुका यह वाक्य पढ़ा है कि- श्रीमद्भागवत तो सम्पूर्ण ही वेदोंका माष्य है । इस वाक्यको आपने दसवें पुष्पमें सिद्ध ही नहीं किया, वरन् सब पुराणोंको ही वेदवाक्य सिद्ध करके वैज्ञानिक रूप दे दिया है । स ध की पर्दा प्रथाको नष्ट करके स्त्री - स्वतन्त्रताको प्रोत्साहन देनेवाले सुधारकोंको तो आपने भारतमें पश्चिमीय सभ्यता लानेवाला ही सिद्ध कर दिया है ।...।. ( भ. छोटेलाल-वैद्य, कचौरा घाट, आगरा ) । ( २५ ) श्रीमान्यवर श्रद्धेय पं. जी, आपके लिखे ' सनातनधर्मालोक " ३५ ४ र्थं सुमन पढ़नेका सुअवसर मिला । हर पहलू और दृष्टिसे परमोत्तम है । आपने कुतर्कवादियोंकी हर प्रकारसे तसल्ली कर दी है । शास्त्रीय - प्रमाणोंके साथ - साथ ' दलीलें ' देकर और भी सोनेमें सुगन्धका काम किया । आपका उद्योग सराहनीय है । ईश्वर आपकी दीर्घायु करते हुए श्रीसनातनधर्मकी रक्षा तथा पुराणादि - शास्त्रोंके पूर्ण समाधान-का अधिक - से - अधिक सुअवसर देकर सफलता प्रदान करें ।... ( म. मुरारिलाल शास्त्री कौशिकाचार्य महोपदेशक, डोमीरोड महाभारती मन्दिर, भिवानी ( हिसार ) । ( ख ) ' आलोक ' का दम सुमन भी देखा । मेरे पास वे शब्द नहीं, जिनके द्वारा मैं आपकी बड़ाई कर सकूँ । किन्तु यह लिखे बिना नहीं रहा जाता कि आपका प्रयास स्तुत्य है । आजकल जितने लेखक आर्य-समाजियोंके खण्डन पर लिख चुके हैं, उन सबसे अधिक खोजपूर्ण प्रापने ( घ ) ' लिखा है । प्रमाणोंकी झड़ी लगा दी है । सम्भवतः श्रव श्रार्यसमाजियों-को भागनेको भी जगह नहीं रही । ईश्वर प्रापकी दीर्घायु करें । ( भ. मुरारिलाल महोपदेशक शास्त्री, मिवानी ) । ( २६ ) विद्याचरणसम्पन्नाः श्रीशास्त्रि - महाभागाः, ' श्रीसनातनवर्मा-' लोक ' दशम- पुष्पं प्राप्तम् अस्माभिराघ्रातं च । हृद्यतरोऽस्य सुगन्धः । ( जगद्गुरु रामानुजाचार्यः श्रीअनिरुद्धाचार्यः, वम्बई । ) ( २७ ) श्रीपं ० दीनानाथजी स.घ के प्रसिद्ध लेखकाग्रगण्य हैं । ' आपने ' स.ध. आलोक ' नामक वृहद् ग्रन्थ लिखकर धर्मकी अमूल्य सेवा की है । उक्त महाग्रन्यके १० पुष्प प्रकाशित हो चुके हैं, जो पठनीय एवं संग्राह्य है । ( ' लोकालोक ' सार्वभौम - हिन्दु विशेषांक सम्पादक श्रीपं ० माधवाचार्य शास्त्री । ) [ यह उक्त लेखकोंके ' आलोक ' के सम्बन्धमें हार्दिक भाव उनके पोंसे उद्धृत किये गये हैं ] । विनीत-1 नारायण शर्मा ' राजीव ' सारस्वत शास्त्री, एम.ए., बी.एड्., ( प्रकाशक ) .
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' आलोक ' ग्रन्थमाला ( ३-२ ) की विषय - सूची तथा पृष्ठ - सूची सं ० विषय १. मङ्गलम् २. ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' ३. आक्षेपों का परिहार ( क ) स्वा. द. जीका आक्षेप ( ख ) श्रीसिद्धान्तालङ्कारजीका प्राक्षेप ( ग ) श्रीतर्क रत्नजीके आक्षेप ( घ ) श्रीशाण्डिल्यजीका प्रक्षेप ( ङ ) श्रीविद्यालङ्कारजीका प्रक्षेप ४. ( क ) ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( ख ) ' दीर्घश्मश्रुः ' की स्पष्टता ५. वेदों की ऋषिकाएं ६. हारीतकी ब्रह्मवादिनियाँ ( ख ) ' पुरा कल्पे तु नारीणाम् ' ७. हारीतकी सद्योवधुओंका उपनयन- विचार ( ख ) ' नहि शूद्रसमाः स्त्रियः ८. ' प्रावृतां यज्ञोपवीतिनीम् ' ( गोभिलसूत्रपर विचार ) ६. ' भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' १०. ' स्त्रिय उपनीता अनुपनीताश्च ' ( पार की ११. ' यज्ञोपवीतमार्गेण ' पर विचार १२. ' दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( शतपथ ) १३. ' पुत्र ' शब्द जातिवाचक नहीं ५०-५५, टीका ) पुष्ठ १. २-४०. ४०-५५. ४०-४२ ४२-४४ ४४-४६. ४६-५० ८७४-६०४ ५५-६५ ६५-७२ ७२-७९ 40-50 ८६-६० ८६-६६ ६३-६४ ६६-१०६ १०-११२ ११२-११६ ११६-११६. ११-१२४ १२३-१२४ ( प ) १४. म.म. पं ० शिवदत्तजीके मतपर विचार १५. रामायणके प्रमाणोंपर विचार १६. ' पञ्चजना मम होत्र ' जुषस्वम् ' १७. जातिपक्षकी आलोचना १८. ' अमन्त्रिका तु कार्येयम् ', तथा ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणाम् ' की प्रक्षिप्ततापर ( ख ) प्राचार्या श्रादिपर विचार १६. ' वेदं पत्न्यै प्रदाय वाचयेत् ' के ' वेद ' शब्दके-अर्थ पर विचार २०. ' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम ' पर विचार २१. कुछ अन्य प्रश्न २२. यवनोंके वेद पढ़नेपर विचार २३. श्रीमध्वाचार्यके स्पष्ट प्रमाणोंपर विचार २४. स्त्रियोंके वेदाध्ययन पर लौकिक दृष्टिकोण २५. क्या ऐतरेय - महिदास शूद्र थे? ( पहली ऐतिहासिक भूल ) २६. क्या ऐलूष - कवष शूद्र थे? ( दूसरी ऐतिहासिक भूल ) ( क ) ' दास्याः पुत्रः ' शब्दपर विचार ( ख ) ' अब्राह्मण ' - शब्दपर विचार यही ११ वें पुष्प में २७. मतङ्गका ब्राह्मण बनना (? ) ( तीसरी ऐतिहासिक भूल ) यही ११ वें पुष्प में २८. वेश्यापुत्र - जाबाल (? ) ( चौथी ऐतिहासिक भूल ) १२४-१४ १४१-१५८ १५-१६४ १६४-१७३ विचार १७४- १८३ १-१-१८२ १८३-१८६ १८६ - २०४ २०५-२३८ २३८- २४६ २४७-२५२ २५२-२५७ २५८-२६६ २६६-३५२ ३००-३०६ ३०६-३१६ ( २३१ ) ३२६-३३० ( २३१-२३२ ) ३३१-३३६
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( फ ) यही ग्यारहवें पुष्पमें २६. श्रवणकुमार आदिका कुल ( पाँचवीं ऐतिहासिक भूल ) ३०. क्या वेदके कई ऋषि शूद्र थे? ( छठी ऐतिहासिक भूल ) ३१. पराशर - वसिष्ठ आदिका कुल? ( सातवीं ऐतिहासिक भूल ) - ३२. क्या मन्त्रद्रष्टा - कक्षीवान् शूद्र थे? ( आठवीं ऐतिहासिक भूल ) यही ग्यारहवें पुष्पमें ( ख ) शूद्रका कड़ा दण्ड ३३. श्रीराम द्वारा शूद्रवधमें उपपत्ति ३४. ' समानो मन्त्रः ' का अर्थ ३५. क्या पौराणिक - सूत, सूत जातिके ( नौवीं ऐतिहासिक ३६. क्या शबरी शूद्रा थी? ( १० वीं ऐतिहासिक ३७. क्या श्रीवाल्मीकि चाण्डाल थे? ( ११ वीं ऐतिहासिक ३८. क्या जानश्रुति वस्तुतः शूद्र थे? ( १२ वीं ऐतिहासिक थे? भूल ) भूल ) भूल ) भूल ) ३ ९. उवट - महीधरके मतमें क्या शूद्रोंको यज्ञाधिकार ४०. वेदविदुषी - मारती आदि स्त्री (? ) ( १८३-२३१ ) ३३६-३३६ ३४०-३४२ ३४३-३४४ ३५२-३६३ ( ३३२-३३४ ) ३५७-३५८ ३५८-३५६ ३५-३६१ ३६३-३७८ ३७६-३६१ ३६१-४०० ४०१-४०७ है? ४०८-४१३ ४१४-४१६ ( ब ) ( परिवर्धन ) ४१. प्रमाण - संग्रह : ४२. ' न वै कन्या न युवतिः ' का अर्थ ( क्या वृद्धा - स्त्रीका होतृत्व हो सकता है? ) ४३. लाजा - होमपरं विचार ४४. क्या सरस्वती उत्तम मानुषी स्त्री है? ४५. दक्षस्मृतिके वचनपर विचार ( ख ) नारीका यज्ञमें जाना ४६. स्त्रीके ' ब्रह्मा ' बननेपर विचार ( ख ) वेदमें इतिहास ४७. स्त्री - शूद्रोंके वेदानधिकारमें प्रमाणोंका संग्रह ४८. कुछ अन्य प्रमाण ४६. ब्रह्मसूत्रके अपशूद्राधिकरणके भाष्य ५०. अपशूद्राधिकरणका शाङ्करभाष्य ( ख ) श्रीरामद्वारा शम्बूक - वघपर विचार ( ग ) शूद्रके कड़े दण्डपर स्वा.द. श्रादिका भी अनुमोदन ५१. नारी - विषयक शाङ्करमतकी आलोचनापर प्रत्यालोचना ५२. गायके मन्त्रका अर्थ पत्नी कर दिया (? ) ४१७-४१६ ४१६-४२७ ४२७-४३० ४३३-४४१ ४४१-४४५ ४४५-४४६ ४४५-४५१ ४५१-४५६ ४५६-४६१ ४५६-४६१ ४६१-५४८ ४६४-५०० ४७८-४८६ ४८७-४८८ ४५८-५०० ४६०-४६२ ५३. ब्रह्मसूत्रके अपशूद्राधिकरणके ' वैदिक - भाष्य ' पर विचार ५००-५२६ ५४. श्रीरामानुजाचार्यके अपशूद्राधिकरण पर विचार ५३०-५३३ ५५. श्रीमध्वाचार्य - स्वामीके अपशूद्राधिकरणपर विचार ५३३-५३८ ५६. श्रीवल्लभाचार्यं गोस्वामीका अपशूद्राधिकरण - भाष्य ५३८-५४६ ५७. श्रीनिम्बार्काचार्यका अपशूद्राधिकरण - माष्य ५४६-५४७ ५८. यतिपण्डित - भगवत्पादाचार्यका अपशूद्राधिकरण - भाष्य ५४७-५४८
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( म ) ५६. वैयासिक - न्यायमालाका अपशूद्राधिकरण ६०. ' मीमांसादर्शन ' शावरभाष्यका अपशूद्राधिकरण ६१. शाबरभाष्यपर आपत्तियोंका निरास ६२. मी.द. अपशूद्राधिकरणपर श्रीकुमारिल - मट्टकी-६४. श्रीसायणाचार्य ६५. स्वा. दयानन्द जी ६६. ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ' का तात्पर्य ६७. स्वा.द. और अछूत ६८. स्वा. द. जी और आजके विद्वान् ६६. ' भारतीय धर्मशास्त्रकी मालोचना ७०. ' स्त्रियोंका वेदाध्ययन ' पर विचार ७१. वेदमें स्त्रियोंके लिए मन्त्र (? ) ७२. ऋ. १०१८५-८६, १५६, १८३-१८४ टुप्टीका ७३. अ. २/३६, ३३६, ५१७, ६।१६, ११।१७, ६७८ ६१०१-१०२, ६।१३०-१३१ मन्त्रोंकी ७४. छोटे बच्चोंके मन्त्र ( ख ) सूर्या- सावित्रीके मन्त्र ( ग ) वृद्धावस्थामें यज्ञचर्चा ७५. ' ब्रह्मापरं युज्यताम् ' की समीक्षा प्रथमाध्यायः ( १–३३ I ' समानो मन्त्रः ' पर विचार ऋग्वेद में सरस्वती - सूक्त कई स्त्रीके पठनीय मन्त्र ६२२-६२३ । समीक्षा ) स्त्रीका ५४८-५५० ५५०-५५७ ५५८-५६४ ५६४-५७० ५७०-५७३ ५७३-५७६ ५७५-५७६ ५७६-५७६ ५७-५८० ५८०-५६७ ५ ९७-८७३ ६००-६०४ ६०४-६०५ , ६०४-६०६ ६०७-६१० ६१०-६११-६१४ ६१४-६१७ ६२२ ६२२ ब्रह्मा बनानां ६२३ । सूर्या - सावित्रीका सूक्त २३-६२६ । सुगन्धि पतिवेदनम् ६ -( म ) ६२६-६२७ । कुलायिनी घृतवती ६२७ । ' ब्रह्मचर्येण कन्या कौमार - ब्रह्मचारिणी ६२७-६२८ । द्वितीयाध्याय ( ३४ - ५३ ) II ब्राह्मण - वेदव्याख्यान ६२८ । कुमारी गन्धर्व - गृहीता ६२६ - ६३० । वेद खोलना ६३१-६३२ । शूद्रका ब्रह्मयज्ञ ६३२ । कात्यायनश्री.. के सूत्र ६३२ | अध्वर्यु - द्वारा मन्त्र बुलवानेपर स्त्रीकी हानि, उपनयनका प्रारम्भ ६३३ । घृतवन्त कुलायिनम् ६३४-६३५ । उपग्रह आदि निधन ६३५ । तृतीयाध्याय ( ५४ - १० ) III ' अर्यमणं नु देवं ' यह मन्त्र वरके हैं, वा वधूके? ६३६-३९ । ' अथैनां सूर्यमुदीक्षयति ' ६३४ ४१ । अथ इमौ समञ्जयति ६४१-४२ । होमे कर्तारः स्वयं पत्न्यादयः ६४२ । ' यज्ञोपवीतिनीम् ६४३-४५ । भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ६४५-४६ । ' कामं गृह्य ऽग्नौ पत्नी जुहुयात् ६४६ । बलि हरेत् दम्पती एव ६४७ । नहि शूद्रसमाः स्त्रियः, वह्व ची ६४८ । पाणिग्रहणादि गृह्य परिचरेत् ६४६ । प्राचार्या, उपाध्याया आदि ६४६ । अग्नि-होत्रस्य शुश्रूषा ६४-६५३ । ' अग्नि जुहोति स्म तदा ' ६५४-६५८ । ' अर्यमणं नु देव ' ( काठक ) ६५८ । ' ऊर्जं विभ्रती ६५६ । प्राशा--साना सौमनसं. ६६० | सायंप्रातर्वैवाह्यर्माग्नि परिचरेयाताम् ' ६६० । अर्यमणं नु देवम् ( मानव, वासह ) ६६१ । पर्देका विधान ६६१ । ध्रुवदर्शन ६३१ । अरुन्धतीदर्शन ६६२ । चतुर्थाध्याय ( ९ १ - १५३ ) IV ' श्रुतिस्मृत्योविरोघे तु ' ६६३ । जन्मना वर्णव्यवस्था, तथा स्त्रियोंकी स्थिति ६६४ । मनुस्मृति में मांस ६६४-६६५ । क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति ६६६ । ' यथैवात्मा तथा पुत्राः ' ६६६-६७२ । यो भर्ता
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( य ) सा स्मृताङ्गना ६६६-६७२ । ' न वै कन्या न युवतिः ' ६७२-६७३ । ' अमन्त्रिका तु कार्येयें ' ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणाम् ' ६७३ वेदवचन बनाम स्मृतिवचन ६७३ ६७७ । पुंसवन संस्कार । ६७७-७९ । स्त्रीकी अपूर्णता ६८०-८१ ६७७ -। ' मीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता ' ६८१-८२ समनसा । ' या दम्पती सुनुतः ' ६८२-८३ । वि त्वा ततस्र े ६८३-८६ | श्रमन्त्रिका कायें, वैवाहिक विधिः स्त्रीणां ' ६८६-८७ | अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' ६८७-८८ । दयानन्दी श्रीमीमसेनजीके तर्क ६८८- ६५ । लड़कियोंका होम समन्त्रक ६१५-१८ । स्त्री - उपनयनके विषयमें श्रीमित्रमिश्रके मतकी आलोचना ७१० । संस्कार- गणपतिकी आलोचना ७१०-७१७ ६६८-| ' निरिन्द्रियाः ' की स्पष्टता ७१८ । ' शुद्धाः पूता योषितो ' मन्त्रपर विचार '७१ ९ -२० । ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ' ७२० । ' न वै कन्या ' । वृद्धा स्त्रीके अर्थकी आलोचना । युवति एवं वृद्धाकी परिभाषाकी आलोचना ७२०-२२ । ' दैत्याः सर्वे विप्रकुलेषु ७२२ । श्रीमध्वा-चार्यका वचन ७२२-२३ । ' अग्निहोत्रस्य शुश्रूषा ' ७२३ ' । ' वेदं पत्न्यै प्रदाय ' ७२३-२४ । अग्नि जुहोति स्म तदा. ७२४ । ' मान्या कापि मनुस्मृतिः ' के अर्थकी प्रालोचना ७२४ - ७२५ । ' पुराकल्पेषु नारीणाम् ' पर विचार ७२६ । ' मनसा भर्तु रतिचारे ' की सम्यक् आलोचना ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ७२ ९ । ' यथेमां वाचं ' के अर्थकी ७२६-७२६ | आलोचना ७२१-७३५ । ' असंस्कृत: ' और ' असंस्कृता ' के अर्थभेद पर विचार ' ७३५-७४५ । ' पितुर्गे हे तु या कन्या ' के अर्थकी आलोचना ७३६-७४४। यज्ञोपवीतहीन - ब्राह्मणादि शूद्र नहीं होता ७४५ । ' संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' औपनायनिकः स्मृतः, पाठभेदपरविचार ७४५-( र ) - ४७ । द्विजका द्विजासे विवाह ७४७ । ' पत्युरनुव्रता भूत्वा ' ७४७-७४८, ८५६-८५७, १५७-५८ । ' कौमारब्रह्मचारिणी ' ७४६-४६ । सामाहमस्मि ऋक् त्वं ७४६ । ' सहस्र ं तु पितृन् माता ' ७५० । पञ्चम अध्याय ( १५४-२३६ ) ( ऐतिहासिक दृष्टि ) V. ' ऋषिका, देवियों तथा मनुष्योंमें भेद ७५१-७५४ । ' ऋषीणां पुत्रः " ७५४ । देवों और मनुष्योंका अन्तर ७५५-५६ । ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ७५६ । कौशल्याका हवन करवाना या करना (? ) ७५६ । तारादेवीका स्वस्तिवाचन ७५६ । श्रीसीताकी सन्ध्या ७६० । ' यज्ञोपवीत - मार्गेण ' ७६० । ' मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी ' ७६१, ८७३ । ' वैदेही... हुताशनमुपागमत् ७६० । मन्त्रज्ञा कैकेयी ७६० । गार्गीके विषयमें ७६१ | ' य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ७६७ । ' विश्वासपात्र न किमस्ति नारी ' आदिका समाधान ७६१ । आचार्या, उपाध्याया ७६२ । कात्या.श्रौ. सूत्रका वचन ७६२ । ' वेदमें सरस्वती - मन्त्र ' ७६२ । वेदमें सरस्वती ७६२ । ' श्रीन् वेदान् प्रददौ ७६२ । इडा वै मानवी ७६२ । प्रार्त्विज्यमेव पत्न्यः कुर्वन्ति ७६३ । अष्टादशी दीक्षिती ७६३ । जायापती अग्नि-मादधीयाताम् ' सायणका वचन ७६३ । जैमिनि न्यायमाला ' आधानं विदुषो ७६४-६५ । कुमारा विशिखा इव ' ७६५ । सरस्वतीके मन्त्र ७६५-६६ । ' पत्नि! पत्नि! एष ते लोक: ' ७६५ | ' स्वाहा ' का अर्थ ७६६-६७ । ' सं पत्नी पत्या ' ७६७ । ' अत्र सिद्धा शिवा नाम ' ७६७-७६८ । अत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा ' ७६८ । ' सुता घृतव्रता ' ७६८ । ' श्रुतावती नाम विभो! ७६८-६६ । सुलभा, पण्डिता द्रौपदी, मर्त्रा परम-पूजिता ' ७६६-७० । ' शुद्धाः पूता योषितः ' ७७०-७१ । तेभ्यो
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( ल ) दधार कन्ये द्वे ' ७७१-७२ । वेदवती ७७२ । पार्वतीका यज्ञोपवीत ७७२ । ऋषि, देवता योनिवाद ७७३-७९ २ । देवा दीप्यमाना ऋत्विजः, सत्यसंहिता वै देवाः ' ७६२ । “ ओमासः ' स्वरानुसारेण च रूढित्यागेनापि ' देव ' शब्दस्य योग-स्वीकारो युक्त एव ' ७६२-६५ । ' भविष्य पुराण ' का वचन ७६५ । स्त्रियोंका परिव्रजन, स्त्रियोपि विद्याध्ययनाध्यापनाधि-कारिण्यो भवन्ति ' (? ) ७ ९५-७६६ । ' कन्यां अग्निमयक्षत ' ' ७ ९ ६ । ' स्वयं सा मित्र वनुते जनेचित् ' ७ ९ ६ । ' स्त्रियां सहस्रों देवी-देवताओंकी पूजामें दिन व्यतीत करने लगीं ७६६-७१७ । ' देवयोनियोंके माननेके विषयमें आर्यसमाजी श्रीगङ्गाप्रसाद-न्यायाधीशके विचार ' ७६७-७६८ । ' भारतीका उदाहरण ' ७६८-८०० । ‘ वेदा श्रप्युत्तम - स्त्रीभिः ' ८०१ । विदुला ८०१-२ । कथं नाम स्त्री सभायाँ साध्वी स्यात्? ' ८०२ । विदुलाका सभा - गमन ८०३ । शुद्धाः पूता योषितः ८०४-०५ । पार्वतीके जनेऊ पर सम्यक् विचार ८०५-८०८ । भविष्यपुराणके वचन ८०८ | स्त्रियोपि ' विद्याध्ययनाध्यापनाधिकारिण्यः ' ८०६ । " अर्यमणं नु देवं ' ८०६ - ८१० । स्त्रियों द्वारा सहस्रों देवी-' देवताओंकी पूजा, भारती ८१०-८१२ । ' पुरन्धिर्योषा ' ८१३-१४ । ' द्यौः अहं पृथिवी त्वम् ' ८१४ । कर्णाटी विज्जा आदि स्त्रियाँ ५१५ । ' अथ पत्नीं संनह्यति ' ८१६ । ' वाचयति ' पर विचार ८१७ । वेदे पत्नीं वाचयति ८१७ । गन्धर्वगृहीता ८१८, ६२-६३० । वृषा वै वेदो, योषा पत्नी । ' यथाधिकारः श्रीतेषु योषितां कर्मसु श्रुतः ' ८१८ । ' तस्मात् स्त्री ब्रह्मविद् भवेत् ८१ ९ । सरस्वतीका
वेद पढ़ना ८१ ९ । ' वेदोंसे मन्त्रसंहिताका तात्पर्य ' का प्रत्युत्तर ।
८१-८२४ । ' उताहमस्मि सञ्जया ८२४-८२६ ॥
( ब ) ' घोषा आदि ब्रह्मवादिनियां ८२६ । ' यज्ञोपवीतमार्गेण ' ८२६ । ' दादुपन्थीजीका कथन ' ८२७ । ' युगान्तरे ब्रह्मवादिन्यः ८२७ । अन्तमें सम्मतिकी आलोचना ८३०-३६ | ' नाधिकारः स्वतो नार्याः ' ८३६-८३७ । पौराणिक देवता इन्द्राणी ८३७-३८ । ' स्वयं जपेद् अजपन्त्याम् ' ८३८-३९ । ' अयज्ञो वा एष यद् अपत्नीकः ' ८३६-४० । " क्या स्त्रीके मन्त्र पति बोल सकता है? ८४४-४६ । ' अवशिष्ट विचार ८४६-८५६ । ' य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ८४८-८५० । ' पत्युरनुव्रता ' ( पतिव्रता ) पृ. ८५६-८५७, ५७-६५८ | क्या ' देव ' शब्द विद्वान्का पर्यायवाचक हैं? ८५७-८६८ । एक प्राक्षेपपर विचार ८६८- ८७० | ( क ) उपाध्याया श्राचार्या आदिपर विचार ८७२-८७३ । शाव्दिक - शिक्षासे स्त्रियोंको क्या लाभ ८७१ । लौगाक्षिका वचन ८७२ । मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी, स्त्रियाँ स्त्रीप्रज्ञा ८७३ । ' यथेमां वाचं ' पर अन्य विचार ८७४ । प्रत्युत्तर ८७४-६०४ । अन्तिम सूचना १. प्रथम - परिशिष्ट ( समाचारपत्रोंकी घटनाएं २. पुनर्जन्मके विषयमें ३. क्या सिद्धियोंकी बातें गप्प हैं? ४. स्वप्न में भविष्य - ज्ञान ५. यन्त्र - मन्त्रविद्याके चमत्कार ६. एक दयानन्दीका मन्त्रशक्तिमें विश्वास ७. पशु - पक्षियोंकी भगवद्भक्ति ८. एक - साथ अनेक बच्चोंका जन्म ९. व्रत - उपवासकी अद्भुत महिमा एक विद्यालङ्कारको ९०५-१०७ । ) ६०८-६१२ ६१२-१३ १४-६१६ १६- ६१८ ६१८-२० २०-२१ २१-६२४ २४-६२६ २६-२८
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( श ) १०. भूत - प्रेतोंका श्राद्ध - तर्पण आदि द्वारा उद्धार ११. ऋषि - मुनियोंके प्राशीर्वादका चमत्कार १२. सर्पोका चमत्कार १३. ' मूकं करोति वाचालम् ' ( ख ) एकसे अधिक सिर वाले लड़के १४. प्रार्थनाका महत्त्व १५. पृ. ८५६ की पूर्ति १६. ' आलोक ' - ग्रन्थमालाका परिचय २८ - ९ ४६ ६४६-६४७ ६४७-६४६ ६४६-६५० ६५०-६५१-६५७. ६५७-६५८ ६५६-६६४ * द्वितीय परिशिष्ट १७, सनातनधर्म ही सच्चा ' परिवार नियोजक ' ९६५-६८८ ( इसे ' आलोक ' पाठक श्रवश्य देखें ) १८. ग्रन्थान्तमङ्गलम् ε = 8-882 १६. आवश्यक सूचना ६६२ [ सूचना – इसमें जहाँ एक जैसे विषय मालूम हों, वहाँ पूर्वकी अपेक्षा कुछ विशेषता की गई होगी, यह स्मरण रख लेना चाहिये । ]
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' श्रीसनातनघमालोक ' प्रणेता-श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३ ) ( स्त्री - शूद्रादिके वेदाधिकारपर विचार ) १. मङ्गलम् । ॐ निषुसीद गणपते! गणेषु त्वामाहुविप्रतमं कवीनाम् । न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्क मघवञ्चित्रमर्च ' । ( ऋ. १०१११२1 ) तत्कराटाय हस्तिमुखा धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( कृष्ण यजुः- मै. सं. सहाश ६ ) वामाङ्गीकृतवामाङ्गि कुण्डलीकृतकुण्डलि । विरतु पुरो चस्तुं भूतिभूत्त्यम्बराम्बरम् ।३ । एकोपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः " दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥४ । श्रीसनातनधर्मालोकोऽयं सम्प्रकाशते । तमांस्यनेन दूरे स्युर्धर्ममार्गः स्फुटो भवेत् । ५ । पूर्व पञ्चाप ( मुल्तान ) बास्तव्य इदानीं देहलीं श्रितः । इमं ग्रन्थं विनिर्माति - श्री दीनानाथ - नामकः । ६ ।
सारस्वतस्य तस्याऽयं प्रयत्नः शास्त्रिणो महान् ।
पूर्तिञ्च भगवत्कृपया धवम् ॥७ ॥
स ० ध ० १ श्री दीनानाथ शर्मा शास्त्री सारस्वतः
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२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( २ ) " यथेमां वाचं कल्याणीम् ” आजकलके अर्वाचीन- विचार वाले व्यक्ति स्त्री एवं शुद्रादिको वेदाधिकारी सिद्ध करनेकेलिए " यथेमां वाचं कल्याणीम् " यह वेद - मन्त्र तथा अन्य वचन उपस्थापित किया करते हैं । हम उसपर विचार करते हैं । ' आलोक ' पाठकगण उसे ध्यान से देखें । वह सम्पूर्ण मन्त्र यह है-' यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः । ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च । प्रियो देवानां दक्षिणार्यं दातुरिह भूयासम् । श्रयं मे काम: समृद्ध्यताम्, उप मादो नमतु ' ( यजुर्वेद माध्यं. २६।२ ) वादियोंका अभिप्राय यह है कि हमें कोई ऐसा वेद मन्त्र वा शास्त्र वचन नहीं मिलता, जो स्त्री एवं शूद्रादिके वेदाध्ययनका निषेध करता हो, पर ऐसा मन्त्र तो मिलता है, जो सबको वेदका अधिकार देता है । वह यही मन्त्र है । ( श्रीरा.च. शर्मा, श्रीरवि. आदि ) । यह मन्त्र उन महाशयोंकी स्व- गवेषणासे प्रसूत नहीं । इसके उपस्थापित करने वाले व्यक्ति प्रायः स्वा ० द ० जीके अनुयायी होनेके नाते इसे मानते वा उद्धृत करते हैं । कई थोड़े ज्ञान वाले स्वतन्त्र पुरुष भी इस मन्त्रसे प्रभावित होकर स्त्री - शूद्रादिको वेदाधिकार सिद्ध करनेको तैयार हो जाते । तब यह आवश्यक है कि इस मन्त्र पर सम्यक् विचार किया जावे । सबके उपजीव्य स्वा ० द ० जीके अर्थ आलोचित कर देनेपर प्रधान - मल्लनिवर्हण न्यायसे सबकी आलोचना हो जायगी । यह विचार कर हम स्वा ० द ० जीका प्रयं उद्धृत करते हैं । यह मन्त्र स्वा ० द ० जीने स.प्र. तथा ऋभाभू., तथा अपने यजुर्वेदसं. भाष्यमें व्याख्यात किया है । ' स.प्र. में स्वामीजी उक्त मन्त्रका अर्थ इस प्रकार करते हैं- ' परमेश्वर कहता है कि - जैसे मैं सब मनुष्योंके लिए इस कल्याण अर्थात् संसार और मुक्तिके सुख देनेहारी ॠग्वेदादि चारों वेदोंकी वाणीका आबदानि— उपदेश करता हूं, वैसे तुम भी किया करो । यहां कोई ऐसा प्रश्न करे कि- ' जन ' शब्दसे द्विजोंका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि स्मृत्यादि प्रन्थोंमें यथेमां वाचं कल्याणीम [ ३ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ही के वेदोंके पढ़नेका अधिकार लिखा है, स्त्री और शूद्रादि वर्णोंका नहीं ( उत्तर ) ब्रह्म - राजन्याभ्याम् ' इत्यादि । देखो परमेश्वर स्वयं कहता है कि हमने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्वाय अपने भृत्य वा स्त्रियादि, अरणाय और अतिशूद्रादिके लिए भी वेदोंका प्रकाश किया है ।... कहिले प्रत्र तुम्हारी बात मानें या परमेश्वर की? " ( पृ. ४४ ) अपने यजुर्वेद भाष्य में स्वामीजीने इसका अर्थ इस प्रकार किया है-' हे मनुष्यो! मैं ईश्वर जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, और स्वाय अपने स्त्री - क्षेत्र आदि, और ग्ररणाय उत्तम - लक्षणयुक्त प्राप्त हुए अन्त्यजके लिए भी, इन उक्त सत्र मनुष्यों के लिए इम संसारमें इमां - इस प्रकट की हुई सुख देनेवाली वाचम् - चारों वेद रूपी वाणीका आवदानि - उपदेश करता हूं, वैसे आप लोग भी अच्छे प्रकार उपदेश करें । जैसे में दान देने वाले के संसर्गी, देवानां विद्वानोंकी दक्षिणाएं श्रर्थात् दान श्रादिकेलिए मनोहर प्यारा हो जाऊं और मेरी यह कामना समृव्यताम् उत्तमतासे बढ़े, तथा मुझे प्रदः - वह परोक्ष सुख प्राप्त हो, वैसे श्राप लोग भी होवें और वह कामना तथा सुख प्रापको भी प्राप्त होवे ' । ( १ ) अब इस अपर प्रालोचना दी जाती है । ' आलोक ' पाठकगण इसे सावधानता तथा निष्पक्ष भावसे देखें । इस प्रथमें प्रापत्तियाँ यह हैं - १. ' हे मनुष्यो '! यह अर्थ मन्त्र के किस पदका है? वे मनुष्य ब्राह्मणादिसे क्या भिन्न थे, और प्रपनेसे वेदमें उपदिश्यमान ' जनों ' से भिन्न थे? जिनको सम्बोधित किया जा रहा है, क्या परमात्माने उन्हें वेदोंका उपदेश नहीं किया था? वा उनको उक्त कहनेसे पूर्व ही परमात्मा ब्राह्मणादिको उपदेश कर चुके थे? उस समय यह मन्त्र तो वेदमें नहीं रहा होगा । २. यदि सम्मुखस्य मनुष्य ही परमात्माको मन्त्रोक्त ब्राह्मणादि इष्ट हैं, तो उन्हें ' व: जनेभ्य: ' इस प्रकार ' युष्मद् ' शब्दसे कहा जाता, और फिर ' तुम्हें उपदेश करता हूं ' यह न कहा जाता,
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४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) किन्तु ' तुम्हें वेदवाणीका उपदेश जैसे कर चुका हूँ, वैसे तुम लोग भी करना ' इस प्रकारसे कहा जाता, क्योंकि ऐसी बात उपदेशके अन्तमें कही जाती है । न श्रादिमें, और न मध्यमें, यह स्पष्ट है, तब यह मन्त्र चारों वेदों, बल्कि अन्तिम वेदके अन्तमें होना चाहिये था, अथवा आदिम-वेदको आदिमें । पर मध्यमें अधिकारिचिन्ता - निरूपण अप्रासङ्गिक है, फिर तो वेदोपदेशमें व्यवधान डाल दिया गया । फलतः ' हे मनुष्यो! ऐसा सम्बोधन चिन्त्य है, क्या इस मन्त्रका देवता ' मनुष्य ' है, जो स्वामीजीने उन्हें परमात्माकी ओरसे नम्बोधित किया । यह याद रखना चाहिए कि- प्रतिपाद्य ही मन्त्रका देवता हुया करता है, प्रतिपादक नहीं । ३. ' मैं ईश्वर ' यह शब्द मन्त्रके किस पदका अर्थ है? क्या इस मन्त्रका ' ईश्वर ऋषि ' है? याद रखिए प्रतिपादक ही मन्त्रका ऋषि हुआ करता है । ४. ' स्त्री - सेवकादि ' किस पदका अर्थ तथा कैसे है? क्या सेवक शूद्र प्रादिसे भिन्न हो जाता है? ' स्त्री ' पृथक् कहने आगे कहे जानेवाले ' जातिपक्ष ' का तो बाघ हो गया । ५. ' उत्तमलक्षण प्राप्त अन्त्यजादि ' यह मन्त्रस्थ किस शब्दका अर्थ तथा कैसे है? ' उत्तम लक्षणयुक्त श्रन्त्यजों ' को देनेसे ' अधम - लक्षणयुक्त प्रन्त्यजको वेदवाणीका उपदेश न होनेसे वेदवाणी ' सर्वाधिकारा ' न हुई, इससे स्वा ० द ० के पक्षका मूल ही कट गया । स्वामीजीके सम्प्रदायमें चार वर्णोंसे भिन्न अन्त्यज भी क्या पञ्चम, श्रवर्णं माना जाता है? ६. ' चारों वेद रूप वाणी ' यह किस शब्दका अर्थ है? ७. ' वैसे आप लोग भी अच्छे प्रकार उपदेश करें ' यह किन पदोंका अर्थ है? ( २ ) १. यदि ' यथेमां वाचं ' यह मन्त्र स्त्री - शूद्रादिको वेदाधिकार देनेवाला होता, तो ' वेदान्त दर्शन ' के ' पशुद्राधिकरण ( ११८ ) में वेदके पूर्ण विद्वान् श्रीवेदव्यास, ' यागे शुद्रस्यानधिकाराधिकरण ' ( ६-७ ) में श्रीमान् वेदके अपश्चिम विद्वान् जैमिनि मुनि, संस्कार- प्रकरण में वेबके प्रकाण्ड पण्डित सूत्रकार पारस्कर आदि, तथा वंद - विषयनिष्णात मन्वादि-यथेमां वाचं कल्याणीम् [ ५ स्मृतिकार एवं गमायण - महाभारतादि - प्रणेता श्रीवाल्मीकि व्यास आदि, दर्शनोंके भाष्यकार श्रीशंकराचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीवल्लभाचार्य आदि, तथा वेदोंके भाष्यकार श्रीवेङ्कटमाधव, श्रीसायणा-चार्य आदि स्त्री - शूद्र प्रादिको वेदानधिकारी कैसे मानते? यह तो असम्भव है कि उनकी दृष्टिसे यह मन्त्र च्युत हो गया हो । तब स्पष्ट है कि उक्त मन्त्रका यह अर्थ नहीं । २. एक विद्यालंकारका सार्वदेशिक ' ( सितम्बर १ ९ ४६ के श्रृङ्क ) में ' शंकराचार्यजीके अतिरिक्त उक्त शाचार्यों में किसीने भी स्त्री - शूद्रादिको प वेदका अनधिकारी नहीं माना यह कहना प्रत्यक्षका अपलाप करना है । त हम दिङ्मात्र उनके वचन उद्धृत करते हैं! १ पहले स्वामीजीसे मान्य ‘ मनुस्मृति ' देखें । चार वर्णोंके कर्म बताते हुए मनुजीने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका अध्ययन लिखा है, स्त्री - शूद्रका सर्वथा नहीं । उनका केवल सेवा स करना ही कर्म लिखा है, सेवासे अतिरिक्त उन्होंने स्त्री - शूद्रका सब कर्म श्र निष्फलं बतलाया हैं । देखिये - ' एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् १ एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ' ( ११६१ ) ' यद् अतोऽन्यद्धि कुरुते । भवत्यस्य निष्फलम् ' ( १०।१२३ ) ' परिचर्यः स्त्रिया साध्व्या सततं तद्- · व पति: ' ( ५।१५१ ) ' नास्ति स्त्रीणां पृथग् यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम् देववत् में शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते ' ( ५११५५ ) ' वरं स्वधर्मो । पति ' श पारक्यः स्वनुष्ठितः ' ( १०।९ ७ ) । स्त्रीकेलिए रोटी पकानेकी विगुणो न मनुने मानी है, वेदाध्ययन नहीं- ' अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये सेवा ही शौचे धर्मेऽन्न -पक्त्यां च ( । ११ ) । चैव नियोजयेत् । ३. जब यही स्वा ० द ० जीके- स.प्र. ११. वें. समुल्लासकेः श्रारम्भमें सृष्टिकी प्रादिमें बनी हुई मनुस्मृति स्त्री - शूद्रादिके लिए - उपनयन मानवी, तब उनको बेदाधिकार ही कैसे देगी? देखिये- नहीं ' कार्येयं, स्त्रीणामा वृदशेषतः ’ ' ( २०६६ ) ' वैबाहिको ' नमन्त्रिका तु सि वैदिकः विधिः, स्त्रीणां संस्कारो स्मृतः । प्रतिसेवा गुरौ वासो,, गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया यज्ञोपवीत सर्वत्र तीन वर्णोंका ' ( २२६७ )..... प्राया है, स्त्री - शुद्रकां नहीं । तब स्त्री शूद्रको तं न