सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 121–130
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 121–130
पृष्ठ 121
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६६ / ६० ) पब्लि अर्थं भी कैसे? अतः यहां स्पष्ट ' वेद ' का ' कुशमुष्टि ' अर्थ वेद dearer है । सर्ववैदि इष्ट तथा सर्वसम्मत १ मनु ( ४।३६ ) पद्यकी टीकामें श्रीमेधातिथिने भी लिखा है - ' वेदो मार्जनायें वर्भमुष्टिः । तस्य च प्राणोपस्पर्शनं दर्भे ' इत्यादि प्रयोजनम् । १० यहीं पर श्रीकुल्लूकने लिखा है— ' वेदं दर्भमुष्टिम् ' । ११ श्री राजाराम शास्त्री नास्तीति ष्ट है कि ( आ.स वि. ) ने भी लिखा है- ' वेदं कुशाकी मुट्ठी ' । १२ इसी प्रकार बसिष्ठधर्मसूत्र ( १२।१४।१७ ) बोधायन. ( १।५।३-५, ६११५, २६-७ ), भी है । विष्णु. ( ७१।१३-१६ ) याज्ञवल्क्य १।१३३ इत्यादि प्रामाणिक - ग्रन्थोंमें भी = नार्यसमाजी ) वैदिक वेद ' ' का अर्थ ' दर्भमुष्टि ' ही रखा है । १३ शतपथ ' योषा वै वेदि, वृषा - वेदः ( १६।२।२१-२४ ) में भी वेदि पर रखने के लिए कुश - राशि ही हैवेद' वेद ' इष्ट है, वेदग्रन्थ नहीं । १४ वादिमान्य ' वीरमित्रोदय ' के उपनयन ११ ) || चमनुः- सम्कार ' ब्रह्मचारिप्रकीर्णक - धर्म ' प्रकरणमें ४८६ पृष्ठमें भी कहा है-' दण्डकमण्डलुं वेदं, यमः, वेदो दर्भमुष्टि ' । लखा है- १५ ' सत्याषाढश्रौतसूत्र ' में ' वेदोसि ' ( ११२ ) मन्त्र पर वैजयन्तीकार कहता है- ' वेदशब्दोऽयं [ दर्भाणां ] संस्कारवाची, स एव ) यहाँ भी के को क्रियते [ संस्कारः ] स वेदशब्दवाच्यः इत्यर्थः ' । इसी प्रकार ' वेदं प्रान्तैः स्रुवं चश्च समष्टि ' ( १७ ) · वेदका अर्थ एतदादिस्थलमें ' वेदग्रन्थ ' grased माना जाय; तो ' वेद पत्नी निरस्यति ' ( सत्याषा: २।५ ) इसका अर्थ हो स. १७ जायगा कि पत्नी वेदका खण्डन करती है, वा वेदग्रन्थको परे फेंकती है; नु. ४१३६ पर वादीको भी ऐसा अर्थ इष्ट नहीं होगा । फलतः वादीके दिये प्रमाणों में नौतसूत्रा के हा ' वेद ' का अर्थ ' दर्भमुष्टि ' है, न कि वेदग्रन्थ । व ' उस १६ ' यज्ञकुण्ड या वेद ' ( वैदिकधर्म जून ७० पृ. १६० स्त. १ पं. १५ ) विदुषी है । में श्रीवीरसेन वेदश्रमी लिखते हैं- ' वेद कुशमुष्टिका नाम भी है । इस तका वेलें विषयमें उनने युक्ति भी दी है— ' वेदिके भागमें कुशाप्रस्तरण ( वेद ) के हीं है, होनेसे वह भाग इस निमित्तं भी ' वेदि ' संज्ञक कहलाता है ' ( पं. १६-१८ ) । ' वेदं पयै प्रदाय वाचयेत् ' का प्रथ [ १८७ जहाँ उक्त प्रमाण इस विषयमें मिलते हैं, वहाँ उपपत्तिया भी । पाठक देखें । ( क ) वादी द्वारा दिये ' पत्नी वेदं प्रमुञ्चति ' ( का.श्री. ३८२ ) में ' प्रमुञ्चति ' का अर्थ ' छोड़ती है ' या ' पहनती है ' । वेदका पहनना या छोड़ना प्रकृतमें कैसे घट सकता है? स्पष्ट है - यहाँ कुवा-मुष्टिका ही धारण है । ( ख ) वादिदत्त ' यजमानो वेदं वघ्नाति ' ( का.श्री. १1१1८ ) में वेदग्रन्थका बान्धना कैसा? यहाँ भी स्पष्ट ही कुशमुष्टिका बान्धना है । ( ग ) ' वेदं पत्नी विस्र ंसयति ' ( शत. ११६।३।२२-२३ ) यहां भी अर्थ है कि पत्नी दृढतासे वन्धे हुए वेद ( दर्भमुष्टिनिर्मित पदार्थ ) को ढीला करती है, ' वेदग्रन्यको खोलती है ' यह वादिदत्त श्रर्य निर्मूल है । इसी कारण ' का.श्री. ' के इष्टिनिरूपणाव्यायमें कहा हुआ ' पत्नी वेदं प्रमुञ्चति ' यह ' वेद विस्रंसयति का पर्यायवाचक है । इसमें ' प्र मा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन माऽवघ्नात् सविता सुशेवः ' यह मन्त्र भी ज्ञापक है । यही बात सत्याषाढ श्री. के ' वेदं पत्नी निरस्यते ' ( २१५ ) में भी विवक्षित है । बचे हुए दर्भपदार्थको ढीला करना या उतारना ही यहाँ दृष्ट है; वेदग्रन्थकी तो यहाँ कोई चर्चा नहीं । श्राश्चर्य है कि - वादी इस याजिकप्रक्रिया में भी अपनी कपोलकल्पना लादना चाहता है, जिससे ' पत्नीको वेदाधिकार देना ' रूप उसका ग्रशुद्ध पक्ष गिद्ध हो जावे, पर ' आलोक ' के विद्वान् पाठकों उसकी बालूकी दीवारको गिरता हुमा देख लिया । स्पष्ट है कि - वादीको इनका अयं ज्ञात नहीं । प्रवशिष्ट है - कई मन्त्रोंका पढ़ा जाना, इसार यह स्मतंत्र्य है कि-विवाह हो जानेपर स्त्री ' पत्नी ' हो जाती है, उसके माता - पितासे भिन्न माता - पिता ( सास - ससुर ) हो जाते हैं । घर तथा गोत्र भी दूसरा हो जाता है । इसलिए वह द्वितीय जन्मवाली, ' द्विज ' जैसी हो जाती है, इधर पति उसका जीवनभरकेलिए शिक्षक होनेसे गुरुसदृश हो जाता है, उस पतिके समीप उस पत्नीका वैधनयन ( विवाह संस्कार ) होनेसे उपनयन संस्कार - सदृशता तथा पतिके घरमें सदाका निवास पत्नीका
पृष्ठ 122
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) गुरुकुलवास - सा हो जाता है । तब ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' ( २०६७ ) इस मनुवचनसे उपनीतसदृश हुई वह पतिके साथ यज्ञोंमें बैठने तथा अपने नियत कार्यको पूर्ण करनेमें समर्थ हो जाती है । इसीलिए श्रीपाणिनिने भी ( ४ | ११ ३ = ) यज्ञके संयोगमें उसे ' पत्नी ' माना है, पर साक्षात् उपनयन न होनेसे ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( मन्. २।१७२ ) उसका क्रमिक एवं वंध वेदाध्ययनका निषेध है, जो कई स्वमात्रनियत दो - चार मन्त्र यज्ञ वा विवाह में उसे ऋत्विक् के सहारेम बोलने पडते हैं; यह वेदाध्ययन नहीं हो जाता । बिना यज्ञोपवीतके कई लड़के बाजारमें घूमते - घामते, जूता पहरे गायत्रीमन्त्र प्रादि कई वेदमन्त्र बोलते जाते दीखते हैं-, वा शास्त्री प्रादि परीक्षामोंमें कई लड़कियां परीक्षानियत कई मन्त्र पढ़ती हैं — इसका नाम क्रमिक वा वैध स्वाध्याय ( बेदाध्ययन ) नहीं होजाता । उसी क्रमिक वेदाध्ययनका स्त्रीको निषेध है, पर पत्नीके विवाहित होजाने से स्वमात्रनियत कई प्राचार उसे करने पड़ते हैं, इसलिए २।६७ मनुपद्यकी व्याख्यामें श्रीमेधातिथिने भी लिखा है - ' एवं च एतदुक्त ं ( स्त्रीणां ) विवाहस्य उपनयनापत्यम्, यथैव पुरुषस्य उपनयनात् प्रभृति श्रोता: स्माता प्रचारप्राप्ताश्च विद्यया भवन्ति, प्राक् तु कामचारः, कर्माऽक्षमत्वम् । एवं स्त्रीणां प्राग् विवाहात् कामचारः, परस्तात् श्रौतस्मार्तेषु ( श्राचारेषु ) अधिकारः । विवाह एव स्त्रीणां वैदिक-संस्कारः उपनयनम् । अनुपनयनेपि, विवाहे भक्त्या ( गौणतया ) उपनयनत्व-मुच्यते ' । इसमें स्पष्ट कहा है कि — स्त्रीका उपनयन न होनेपर भी, उसके विवाहको गौणतासे उपनयन - सा माना जाता है, तब क्वाचित्क मन्त्रविशेषोंको, जिनमें अधिकांश सौत्र ( सूत्रग्रन्थोक्त ) हुआ करते हैं-बोल सकती है, पर उसका साक्षात् उपनयन न होनेसे उसका पुरुषकी तरह स्वाध्याय ( क्रमिक एवं वैध वेदाध्ययन ) में अधिकार नहीं हो वेद पत्न्यै प्रदाय व चयेत् ' का प्रथ | १८३ जाना । यह बात सम्यक्तया स्मरण रखनी चाहिए । इस बातके होने बहुतसे विद्वान् भी इस विषय में मोहमे पड़ जाते हैं । ज्ञान न इस प्रकार ' वेदोमि वित्तिरसि ( ५२४।२३ ) ' वेदो बाजं वीरं मैं ' ( २४ ) वृषा वृषण्वनी वेद पत्नीभ्यो भव ' ( ५।४।२५ ) इत्यादि ददानु वादि दत्त ' काठक - महिता ' के मन्त्रोंका समाधान भी हो गया । वेदका पूर्वोक्त प्रमाणों के अनुसार ' दर्भमुष्टि - प्रणीत पदार्थ ' ही है, जिसे अ वादी न जानता हो, वा जानता हा भी उसे छिपा रहा हो । तब कदाचित् | विरुद्ध अपनी पुस्तक: १६८ पृष्ठमें उक्त ' वेद ' शब्दका ' वेदग्रन्थ ' इससे । म करते हुए श्रार्यसमाजी विद्वान् एक सिद्धान्तालङ्कारका पक्ष सर्वथा ि ग्रंथ । गया । इसी प्रतीत ब्राह्मण ( २ ॥१० ) में सीताको जो तीत वेदोंका देना बताया गया है, सो वहाँ भी वही कुशमुष्टि - प्रणीत तीन पदार्थोंका देना इष्ट है. — तब वहाँ श्रीसायणका वेदमन्त्र लांछित किञ्चिद ज गुटिकादिद्रव्यं दत्तवान् ' यह अर्थ समूल ही है । प्रजापतिने उमे वह ' वेद ' दिया था, श्रीभगवद्दत्तजीने कुशमुष्टिरूप उस बेदको इसीलिए ही नि ' प्राजापत्य ' ( प्रजापतिदत्त ) लिखा है, देखिये इस निबन्धका ४ थं अहू । इ तब वादीका श्रीसायण पर आक्षेप करना अपनी अनभिज्ञता प्रकट ना करना है । तब ( १८ ) " विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम ” । कि पूर्वपक्ष: - ' वेदकी एक शाखामें पुरुषमात्रको ही वेदाधिकारी माना तब गया है, जैसे- ' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम, गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि । असूयकायानृजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ' 1..: यमेव विद्याः उक शुचिमप्रमत्तं, मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् । यस्ते न द्र ह्य ेत् कतमंच्चना, तस्मै मा ब्रूया निविपाय ब्रह्मन्! इसमें कोई भी पुरुष - विशिष्ट गुणसे गए युक्त हो; तो उसे वेदाधिकार दिया जा सकता है । वेदके ' शं नः तं न ' का प्रादि शब्द भी वेदमें मानवमात्रको अधिकारी सिद्ध करते हैं । ( ख ) महा- कह
पृष्ठ 123
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
| ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १८३ १६० के ज्ञान न में भी ' इत्येते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरस्वती । विहिता ब्रह्मणा भारत पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः ' ( शा. १८८ ) सबके लिए वेदाध्ययनकी साक्षी चीरं ददानु मिलती है । ( श्रीशाण्डिल्यजी ' भारतीयधर्मशास्त्र ' ८१-८५ पृष्ठमें ) । दिवादि- उत्तरपक्ष - एक सत्य तो शाण्डिल्यजीके, मुखसे अब भी निकल गया । का अ वेदकी शाखाके इस उनके परममान्य प्रमाणमें पण्डितजीके मतमें वेदका कदाचित अधिकार ' पुरुषमात्र ' के लिए ही सिद्ध हुआ । स्त्री वेदाधिकारसे उनके तव इससे मत में भी वंचित हो गई । इसलिए परमात्माने ब्रह्म ' अथर्ववेदसंहितामें भी ' तत् कृण्मो ब्रह्म ( मन्त्रात्मक्लं ) वो गृहे सज्ञानं पुरुषेभ्यः ' ( ४/२०१४ ) थार घर के पुरुषोंक दिया, स्त्रियों को नहीं । स्त्रियोंको तो वेदने घड़ा भरना, जो नील गीत तीन ( अथर्व १२८ ) कपडा बुनना ( १४/२/५१ ), श्रोदन बनाने के लिए जल लाना, ( ११।१।१३ ), घड़ा उठाना ( ११ । १ । २३ ), भात तैयार करना किञ्चिद् - ( ११।१।२३ ), गृहक्षेत्र में रहना ( १४ / २ / १ ९. पतिके कामों के लिए वह ' वेद ' लिए ही नियुक्ति ( १०० ११५५ ) बीजवपन; सन्तान उत्पन्न करना ( १४ | २ | १४ ) इत्यादि सेवा उसके अधिकारमें दिये हैं । शेष उनने पुग्पमात्रका जो ना प्रकट नाम लिखा है, उसमें वेदशास्त्रानुसार वेदका अधिकार द्विजको दिया गया है - शूद्र - अन्त्यजादिको नहीं, यह हम पहले सम्यक्तया सिद्ध कर चुके हैं । तब उक्त शाखामन्त्रमें भी द्विज पुरुष ही इष्ट है । शाण्डिलाजी अपने पुस्तक के ८४ पृष्ठ में द्विज - उपनीतको ही वेदाधिकार देते हैं; पर शुद्रको किसी भी शास्त्र वा संस्कार - विधिमें उपनयन या द्विजत्वको आज्ञा नहीं, री माना तब शूद्र - अन्त्यज प्रादिको वेदाधिकार देनेकी पं ० जीकी व्याख्या निर्मूल है । मस्मि । द्विज आदिम तीन वर्णं हैं - यह सर्वसम्मत है, तब उन द्विजोंमें जो च. विद्या उक्तशाखोक्त गुणधारी हैं. वे ही उक्त शाखामन्त्रमें अभिप्रेत हो सकते हैं, चनाह शुद्र - अन्त्यज आदि नहीं । वे किसी भी धर्मशास्त्र में वेदाधिकारी नहीं कहे टं गुणसे गए । यदि श्रीशाण्डिल्यजीके अनुसार उक्त मन्त्रोंमें मानवमात्रको वेदाधि-तं कार होता, तो वेदविद्याका भी मानवमात्रके पास जाना उक्त शाखा में = ) महा कहा जाता । पर उसका जाना दिखाया गया है केवल ब्राह्मणके पास । विद्या ह वै ब्राह्मणमाज नाम ' [ १६१ उसे विद्याने जाकर कहा जो ब्राह्मण इस प्रकारका हो, उसे विद्या पढ़ायो, सूप आदि ब्राह्मणोंको नहीं । तब उक्त मन्त्र तो विशिष्ट ब्राह्मणको ही वेद - विद्याका अधिकार देने वाले सिद्ध हुए; जिसका मूल ' वेदमाता.. द्विजानाम् ' ( अथवं. १६७१1१ ) यह मन्त्र है । इसमें ' द्विज ' से ' ब्राह्मण ' इष्ट है, क्योंकि इस मन्त्रके उत्तरार्धमें ' ब्रह्मवर्चस ' की प्रार्थना है, जो कि-' ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चमी ' ( यजु. सं. २२/२२ ) के अनुसार ब्राह्मणके लिए स्पष्ट है । इसकी साक्षी ' ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता [ वेदमाता ] गच्छ देवि! ' ( तैत्तिरीयारण्यक १०1३० ) में भी मिलती है - ब्राह्मणोंके लिए स्वीकृत । ' उसके साथ ही ' द्विज ' से क्षत्रिय और वैश्यभी उपलक्षित हो जाते हैं । शूद्रका तो यहाँ कोई सम्बन्ध ही नहीं, क्योंकि शूद्रको कोई भी द्विज नहीं कहता, बल्कि प्रसूयकत्व, अनृजुप प्रयतत्व अशुचित्व, ब्रह्मचर्या-श्रमरहितत्व, द्रोह श्रादि, मन्त्रमें निषिद्ध गुण, द्विजके तो श्रागन्तुक होते हैं, पर शूद्रके स्वाभाविक और स्थायी होते हैं । जन्ममें वर्णव्यवस्था मानने वाले हम लोगोंके मतमें वे दुर्गुण शूद्रमें गतजन्मसे योनिके साथ प्राप्त होने से इस जन्ममें भी अनिवार्य होते है । कर्मसे वर्णव्यवस्था मानने वाले श्री-शाण्डिल्यजीके मत में भी शूद्र इन दुर्गुणोंसे समवेत ही होता है । हमारे मतमें क्षत्रिय, वैश्य में वे दुर्गुण तब सम्भव होते हैं, जब वे पूर्व जन्ममें शूद्र रहे हों । इन मन्त्रोंसे उनको भी वेद पढ़ानेका निषेध सिद्ध करता है । कि— शूद्रादिकका वेदमें अधिकार उक्त शाखाको भी इष्ट नहीं । इसके अतिरिक्त उक्त मन्त्रोंमें ब्राह्मणको अध्यापक स्वीकृत करनेसे भी ब्राह्मण वेदविद्या अधिकृत सिद्ध होता है । श्रीशाण्डिल्यजी कह सकते हैं कि - " विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम ' इससे अध्यापकका ब्राह्मण होना तो हमें उपलब्ध होता है; और हम उसे मानते हैं; पर उसमें श्रध्याप्यमान भी ब्राह्मण हो - यह अभिप्राय निकालना मन्त्रसे बलात्कार करना है । इस मन्त्रमें कहीं भी अध्याप्यमानको ब्राह्मण नहीं कहा गया है । इसपर निवे-दन है कि पहली कही हुई अर्थापत्तिसे यह सिद्ध है, अन्यथा विद्यादेवीने
पृष्ठ 124
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यजका अध्यापकत्वमें वरण क्यों नहीं किया? इसके अतिरिक्त उक्त मन्त्रों में स्पष्टतया भी शिष्यको ब्राह्मण कहा गया है । तब उक्त मन्त्र केवल ब्राह्मणको ही वेदाधिकार कह रहे हैं, शूद्र-अन्त्यजादिको नहीं । ' यहाँ कहाँ ब्राह्मणको वेदविद्याका अधिकारी कहा गया है ' यदि श्री-शाण्डिल्यजी यह जानना चाहते हों; तो उन्हें उक्त मन्त्रोंमें अन्तर्दृष्टि डालनी चाहिये । उनमें ' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम ' यह पहला मन्त्र है । ' य मातृणत्त्यवितथेन कर्णौ ' यह दूसरा है । ' अध्यापिता ये गुरु नाद्रियन्ते ' यह तीसरा है । ' यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तम् ' यह चौथा मन्त्र है । प. जी वेद की शाखा इन मन्त्रों प्रमाण मानते हैं । उन्होंने अपनी पुस्तकमें १ ले तथा ४ थे मन्त्रको उद्धृत किया है, २ रा औौर ३ रा मन्त्र उधृत नहीं किया, किन्तु वहाँ बिन्दुएं जोड़ दी हैं; इससे वे उन्हें भी प्रमाण मानते हैं-यह स्पष्ट है । अब पं ० जी तृतीय मन्त्र देखें । ' प्रध्यापिताये गुरु नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा ' यहाँ पर ब्राह्मणके लिए प्रयुज्यमान ' विप्र ' शब्द स्पष्ट ' विशेष्य ' है । श्रीसायणने भी यहाँ यही लिखा है- ' ये ग्रधमा विप्राः ' [ ॠ. भा. उपोद्घात ] । ऋ. [ ३।३३।४ ] मन्त्रमें श्रीसायणने ' विप्रः ' का अर्थ ' ब्राह्मणः ' किया है, १० । १७/६ मन्त्रमें भी ' प्राज्ञो ब्राह्मणः ' यही अर्थ किया है । वादीने भी ' घिया विप्रो श्रजायत ' ( यजु. २६।१५ ) में ' विप्र'का अर्थ ' ब्राह्मण ' किया है । देखो ' सिद्धान्त ' का वर्णव्यवस्था विशेषाङ्क । इसी प्रकार ' यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् । तस्मै मा ब्रूया निधिपाय ब्रह्मन्! ' इस चतुर्थ मन्त्रमें भी विशेष्य ' विप्राय ' की ' तृतीय मन्त्रसे अनुवृत्ति है । इससे स्पष्ट है कि - प्रकृत मन्त्रों में मन्त्रद्रष्टा ऋषिको प्रध्या-पक भी ब्राह्मण तथा अध्याप्यमान भी ब्राह्मण इष्ट है, मानवमात्र नहीं । इसमें उक्त चार मन्त्रोंका अनुवादक, सृष्टि की आदिमें प्रणीत मनु-स्मृतिका वचन भी साक्षी है । जैसेकि - " विद्या ब्राह्मणमेत्याह ( २।११४ ) " विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम " [ १ ९ ३ यहाँ पर अध्यापक ' ब्राह्मण कहा गया है । इसके साथ वाले ' यमेव शुचि विद्यान्नियत ब्रह्मचारिणम् - । तस्मै मां ब्रूहि विप्राय निधिपायाप्रमा तु दिने ' ( २११५ ) इस पद्य में अध्याप्यमान भी विप्र ( ब्राह्मण ) बताया है । तत्र यहाँ ' मानवमात्र ' नहीं, किन्तु ' ब्राह्मण ' ही अधिकृत सिद्ध गया जब कि - विद्याधिष्ठात्री देवता भी स्वयं अपना अधिकार केवल हुआ । ब्राह्मणको ही दे रही है, तव उक्तमन्त्रोंसे मानवमात्रको वेदाधिकारी कहना मन्त्र अन्याय करना है! ( क ) श्रोशाण्डिल्यजी कह सकते हैं कि - ' निघण्टु ( -२११५ ) में २४ संख्यावाले मेधात्रीके नामोंमे ' विप्र ' शब्द भी पढ़ा गया है । तब उक्त मन्वमें मेधावी मानवमात्रका ग्रहण न्याय्य है, इसमें ब्राह्मण - पर्यायता नहीं ' इस पर निवेदन है कि - विशेषणता में ' विप्र ' शब्द भले ही ' बुद्धिमान् ' अर्थ वाला हो; क्योंकि ' मेघावी ' शब्द स्वयं विशेषण है, परन्तु विशेष्य ' विप्र ' ब्राह्म-पार्थ ही होता है; और ब्राह्मणके लिए ही प्रयुक्त किया जाता है । वहाँ मेधावी ' अर्थका सम्वन्ध नहीं होता । जैसे कि - ' विप्रं न जातवेदसम् ( ऋ. १११२७११ ) में ' विप्रं ' विशेष्य है; श्रतः यहाँ ' ब्राह्मणम् ' अर्थ है । यदि वेदमें ' विप्र ' केवल बुद्धिमान् वाचक होता; तो वही बात ' जात-बेदसं ' से जब सिद्ध हो रही है, तब वेदको उस अर्थ वाला ' विप्र ' शब्द साथ कहने की क्या आवश्यकता थी? जब कहा है, तो इससे उसकी बुद्धिमद-वाचकता न होकर ब्राह्मणवाचकता सिद्ध हो रही है । तभी श्रीवेङ्कट-माधवने भी इसका अर्थ लिखा है- जातप्रज्ञं ' ब्राह्मणमिव । ' श्रीसायणने f लिखा है- ' जातविद्य मेधाविनं ब्राह्मणमिव । ' श्री महीधरने लिखा है- व ' जातसर्वशास्त्रज्ञानं विप्रं - ब्राह्मणमिव स्थितम् । ( यजु: १५/४७ ) स्कन्दस्वामीने लिखा है- ' विप्रं ' न मेधाविनमिव, कम्? सामर्थ्यात् १ कञ्चिद् ब्राह्मणं जातविद्यम् ' [ निरुक्त ] । जैसे बुद्धिमान् अर्थं वाला f स ०६० १३
पृष्ठ 125
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ १ ९ ३ ४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १ ९ यमेव तु ' पण्डित ' शब्द आज भी पं ० मदनमोहन मालवीय आदिके लिए प्रयुक्त याप्रमा. किया जाता है, बुद्धिमान होते हुए भी श्रीगान्धिजी श्रादि अब्राह्मणोंके या गया नामके साथ नहीं; वैसे यहाँ ' विप्र ' शब्द भी कभी ब्राह्मणके लिए हुआ । प्रयुक्त नहीं किया जाता । ' राह्मणको ' अध्यापिता ये गुरु नाद्रियन्ते विप्रा: ' इस शाखामन्त्रमें तथा ' तस्मै मन्त्रले मां ब्रूहि विप्राय ' ( २।११५ ) इस मनुपद्यमें विप्र ' विशेष्य है, तब विशे-पणता न होनेसे यहाँ ' ब्राह्मणा: ' इस अर्थ में पर्यवसान है । तभी अमरकोष में २४ ' विंप्रक्षत्रियविट् - शूद्राश्चातुर्वर्ण्यमिति मृ ' ( २ | ७२ ) में भी ब्राह्मण-मन्त्रमें वर्णका नाम ' विप्र ' कहा है । ' विप्रश्च ब्राह्मण: ' ( २१७१४ ) इस पद्यमें भी ह्रीं ' इस विप्र ' शब्द ब्राह्मणका पर्यायवाचक है । इस प्रकार ' त्रिकाण्डशेष ' वाला ' ब्राह्म क़ोष ' वक्त्रजस्वनमो विप्रो वर्णश्रेष्ठः कठो द्विजः ' ( २७।२ ) में भी ' विप्र ' शब्द ब्रह्मणके पर्यायवाचकोंमें गिना गया है । अत्रिसंहितामें ' जन्मना वहां वेदसम् ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैद्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय ' एव च ' ( १४१ ) यह वचन जन्म ब्राह्मणके लिए आया है । वही ब्राह्मण है । विद्या पढ़ने पर ' विप्र ' कहा गया हैं । ब्राह्मण व्यतिरिक्त के लिए ' विप्र ' ' जात- शब्द, चाहे वह बुद्धिमान भी हो कहीं नहीं श्राया । द साथ ' य: कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोभिहितो वेदे द्धिमद्- सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( २७ ) इस प्रकार सर्ववेदज्ञ, सृष्टि की प्रादिमें उत्पन्न चिट- श्रीमनुजीकी भी इस विषयमें साक्षी देख लेनी चाहिए । उस मनुने ' यश्च नायणने विप्रोऽनधीयानः, ( २११५७ ) ' विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु है- वीर्यंतः ' ( ३।१५५ ) अहंत्तमाय विप्राय ' ( ३।१२८ ) ' भस्मीभूतेषु विप्रेषु ' ( ३।९ ७ ), ' विप्रसेवैव शूद्रस्य ' ( १०।१२३ ) ' विप्रस्य त्रिषु वर्णेषु ( १० ) मर्थ्यात् १० ) विप्रस्य विदुषो देहे ' ( ४११११ ) विप्रः शुध्यत्यपः स्पृष्ट्वा ( ५॥ ) ' वाला ' विप्राणां वेदविदुषां ( ।३३४ ) व्रात्यात्तु जायते विप्रात् ( १०।२१ ) इत्यादि वचनोंमें ‘ विप्रं ' शब्दको ब्राह्मणके लिए प्रयुक्त किया है । श्रार्यसमाजी श्रीतुलसीरामस्वामीने मनुटीकामें बहुत स्थलोंमें ' विप्र ' का " विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम " [ १६५ अर्थ ब्राह्मण कि है । उक्त पद्योंमें ' विप्र ' शब्दका ' मेघावी ' असे सम्बन्ध ही नहीं है, नहीं तो ' अनधीयानो विप्रः, भस्मीभूतो विप्रः, विप्रोऽनृचः ' ( मनु २२५८ ) त्यो विप्रः - इत्यादि स्थलोंमें वह अर्थ असम्भव हो जाय । " विप्रस्य विदुषों ' इत्यादि स्थलोंमें पुनरुक्ति - दोष प्रसक्त हो जाय । मनुस्मृति स्वा. द. जीके भी अनुसार सृष्टि कीँ आदिमें बनाई गई है, वह वेदका अनुवाद देती है, तब ' विप्र ' शब्द ब्राह्मणायक भी सृष्टिके आदि वैदिककालसे चला हुआ है यह स्पष्ट सिद्ध हुआ । यदि निघण्टुमें ब्राह्मणके नाम कहे होते, और उसमें ' वि ' शब्द न होता, तब तो कहा जा सकता था कि वह ब्राह्मण - पर्यायवाचक नहीं, पर ' अंब ऐसा नहीं कहा जा सकता । निघण्टुमें तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ' शब्द भी पर्यायवाचकार्थं नहीं दिये गये हैं, तो क्या फिर वेदमें ब्राह्मणा-दिका वर्णन ही नहीं माना जायगा? ' विप्र ' यदि निघण्टुमें ' मेघावी ' प्रयं-वाला है, तो होता रहे; पर इससे ब्राह्मणार्यक ' विप्र ' शब्दका उसमें कहीं भी विरोध नहीं । एक ही शब्द अनेक प्रथों में भी प्रयुक्त हुम्रा करता है । ' बुध ' का अर्थ ' देव ' भी होता हैं, ' विद्वान् ' भी । अन्य कोषोंसे भी अनुकू-' लता होनेसे ' विप्र ' का अर्थ ' ब्राह्मण ' ही है यह सिद्ध हो गया । इसके अतिरिक्त यह भी ठीक नहीं कि निघण्टु प्रोक्त श्रर्थ सब स्थानों में लिया जाय । निघण्टुके अनुसार ' विप्र ' यह ' मेघावी ' का नाम है, और ' कवि ' भी मेधावीका नाम है; तब फिर एक वेदमन्त्रमें यह दोनों इकट्ठे नहीं होने चाहियें; नहीं तो पुनरुक्ति हो जाय, पर देखे जाते हैं, इससे सिद्ध हो रहा है कि - वेद निघण्टुके अधीन नहीं, निघण्टु वेदके अधीन होता है । यदि सर्वत्र इन अर्थों में निघण्टुको ही श्राहत किया जाय, तो फिर ' ऋषिविप्रो विचक्षणः त्वं कविः ' ( ऋ. सं. २1१०७७ ) ' त्वं विप्रः, त्व कविः ' ( ऋ. १८२ ) ' विप्रः कविः ' ( ९ ८४१५ ) ' विद्वान् विप्रः ' ( ७ ८७१४ ) इत्यादि मन्त्रोंमें क्या श्रीशाण्डिल्यजी पुनरुक्ति - दोष मानकर वेद-
पृष्ठ 126
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) को न्याय पूर्वपक्षानुसार प्रप्रमाणित मानेंगे? ' विचक्षण, कवि ' आदि शब्दोंको ' विप्र ' की सन्निधिमें व्यर्थ मानेंगे? उनकी भावनाके नायक स्वा.द. जीने ' ब्रघ्न ' का अर्थ निघण्टु ( १।१४ ) में ' अश्व ' होने पर भी वेदमें उस-का अर्थ ' अश्व ' नहीं किया, बल्कि उसका ' अश्व ' श्रर्थ करने वाले मैक्स-मूलरको भी आप के श्रद्धेय स्वामीने ' स. प्र. ' ( ८ समु. १४३ पृ. ११ स. १७४ पृ. ) तथा ऋ. भा. भू. ( १७० पृ. ) में फटकार बताई है । इससे स्पष्ट है कि वेद में निघण्टु प्रोक्त ही शब्दार्थं मानना श्रावश्यक नहीं । श्री शाण्डिल्यजी यह भी मानते होंगे कि वर्तमान निघण्टु वेदके शब्दोंका अपूर्ण संग्रह है; तो वेदकी शाखामें स्थित ' विप्र ' शब्दका अर्थ भी वे यदि निघण्टुके अनुसार मेघावीमात्र करते हैं, तो क्या वे वेदकी शाखाको भी वेद मानते हैं? जबकि वेदके निघण्टु - प्रोक्त अर्थ वे वेदमें भी अनिवार्य रूपसे नहीं मानते, तो वेदशाखामें - जो उनके अनुसार वेद नहीं; उक्त निघण्टुको प्राश्रित कैसे कर सकते हैं? उक्त शाखाके ४ र्थं मन्त्रमें ३ य मन्त्रसे ' विप्र ' की अनुवृत्ति आरही होने से भी यह शब्द ' ब्राह्मण ' वाची है- मेघावी वाचक नहीं, क्योंकि -४ थं मन्त्रमें ' मेघाविनं ' स्पष्ट कहा ही है । ' तस्मै मेधाविने विप्राय मां ब्रूया: ' इस योजना में मेघावी वाचक विप्र शब्द व्यर्थ हो जाता है, अतः ' विप्र ' शब्द यहाँ स्पष्ट ' ब्राह्मण ' - परक है । ' विप्र ' शब्दका ' बुद्धिमान् ' अर्थ मानने पर गुणकर्मसे वर्णव्यवस्था माननेवालों के मतमें ' शूद्र ' का निरास स्वयं ही हो जायगा । क्योंकि उक्त पक्षमें निर्बुद्धिको ' शूद्र ' कहा जाता है । उक्त मन्त्रोंमें बुद्धिमान् अर्थं वाले ' विप्र ' शब्द मानने पर शूद्र वुद्धिरहित होनेसे स्वयं वेदविद्यासे बहिभूत सिद्ध हो जायगा । गुणकर्मसे वर्ण मानने पर बुद्धिमान कभी शूद्र नहीं माना जाता । फलत: इस मतमें भी शूद्र वेदाधिकारी सिद्ध न हुआ । इस प्रकार यहाँ ' मेघावी ' शब्द होनेसे स्त्रीका भी निरास उक्त शाखा - मन्त्रसे हो जावेमा, क्योंकि - स्त्री वेदाभिमत बुद्धि तथा मनोनिग्रहको धारण नहीं " विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम " १६ करती । जैसे कि- त्रिया अशास्यं मनः, उतो ग्रह रघु क्रतुम् ३३।१७ ) यहाँ सायणने लिखा है- स्त्रिया ' मनः- चित्तम् ( ऋ. ६ ) २ । प्रशास्य शिष्यं - शासितुमशक्यम, प्रवलत्वादिति । 1 ततोपि स्त्रियाः ऋतुं - पुरुपेष हा लघुम् श्रह - ग्रह ' । यहाँ पर ' लघु ' का ही ' रघु ' बना है ' लघिवह्योनं प्रज्ञां रघुम् वाए , लोपश्च ( उ. ११२६ ) इससे ' कु ' प्रत्यय और न लोप होकर '. घुगुलीनां वा लो रत्वमापद्यते इस वार्तिकसे ' ल ' को बालमूल-हो कर ' रघु ' बनता है । लघुः स्वल्प: ' ऐसा स्वा. द. ने ' उणादि- कोष ' में लिखा है । जैसे परन्त धातु गत्यर्थ है वैसे उधि भी, अत्तः दोनोंका अर्थ भी ' स्वल्प लघि होगा, प्राकरणिक अर्थ यहाँ है भी यही । ' ऋतु ' का अर्थ आपके यह समान मान्य श्रीश निघण्टुके अनुसार कर्म ( २1१ ) वा प्रज्ञा ( ३ ९ ) है | आपके हो मान स्त्रीक श्रीसातवलेकरने ‘ मेधातिथि - दर्शन ' ७२ पृष्ठमें उक्त मन्त्रका अर्थ किया है- इच्छ ' स्त्रियोंके मनको संयममें रखना कठिन है, स्त्रियोंके मनको का करना लिख अशक्य है । स्त्रियोंके कर्म छोटे होते हैं, उनका सामथ्यं कर्म होता है । शास्त्र उनकी बुद्धि छोटी होती है । स्वामीजीको मान्य शुक्रनीति में भी तथा सामर्थ चाणक्यनीतिमें इसी मन्त्रानुकूल लिखा है- ' प्रनृतं साहसं मौख्यं कामाधिक धन्यत्र स्त्रियां यतः ' ( ३।१६४, २।१ ) । ( गीत स त यहाँ स्त्रीकी बाह्य लौकिक - बुद्धि नहीं देखनी हैं, किन्तु वैदिक - बुद्धिस्य जैसे उस - उस शास्त्रको न पढ़ा हुआ वृद्ध भी ' बालानां सुखवोघाय ' ' वाद ' (: 1४ शब्दसे कहा जाता है, बुद्धिमान को भी वहाँ अनभिज्ञ माना जाता है, वैसे वेदेष्ट बुद्धिसे रहित, बुद्धिमती स्त्री भी निर्बुद्धि - लघुबुद्धि मानी जाती है । शास्त्री स्त्रीके चिन्ह होते हैं. सिरके बाल, जैसे कि - नामिक में स्वा. द. जीने ' स्व यहाँ न केसवती स्त्री स्यात् ' ( महाभाष्य ४ १ १ ३ ) के अर्थ में लिखा है- ' जिससे हो गई शिरके बाल बड़े हों, वह स्त्री ' ( पृ. ३ ) यह बात वेदानुकूल भी है- जिसका स्पतिः सूर्यायाः शीर्षे केशानकल्पयत् । तनेमां नारीं पत्ये शोभयामसि है, जो १४ । ११५५ ) । सूर्या एक स्त्री थी । पुरुषका तो १६-२२-२४ वर्षमें ( म चोदना
पृष्ठ 127
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ is ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६८ ( ऋ. ) केशान्त होता है; पर आप लोगोंके अनुसार यह लड़की की विवा-स्पं - पुरुपैष २२६५ है । पूर्व मन्त्रके संकेतानुसार आप भी स्त्रीके केशोंको नहीं कट-हावस्था ज्ञां रघुम् वाएंगे । ' विकेश्यः पुरुषे हते ' ( अ. ११ / ९ / १४ ) वैधव्य में ही स्त्रीका केश-घवं ह्योनं. आया है, अन्यत्र नहीं । सिरमें केशोंकी अधिकता से आपकी मुण्डन ' वालमूल भावनाके नायक स्वामीजी ( स. प्र. १० पृ. १६२ ) उष्णता, श्रीर- बुद्धि-: हो कर मन्दता कहकर पुरुषोंको तो शिखा सहित मुण्डन करानेका प्रादेश देते हैं, परन्तु स्त्रियोंके केश नहीं कटवाते । जैसे लघ तवं वेदानुसार केशोंवाली स्त्रीकी बुद्धिकी मन्दता भी स्पष्ट होने से यह समान श्रीशाण्डिल्यजीके अनुसार मेधावीको वेद - विद्या देने वाले शाखामन्त्रने पके मान्य स्त्रीको भी उससे बहिष्कृत कर दिया । अब स्त्री अपनी वा आप लोगोंकी इच्छासे, वह अधिकार नहीं ले सकती । श्रीशंकराचार्य स्वामीने ठीक हो किया है- लिखा है- ' सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकार - कारणं भवति, वू करना शास्त्रीयेयें शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्य अपेक्षितत्वात् । शास्त्रीयस्य च होता है । सामय्यंस्य अध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात् ' ( ब्रह्मसू. १।३।३४ ) । भी तबा श्रन्यत्र भी उन्होंने लिखा है- ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ' माविकां ( गीता ३।३५ ) इति स्मरणात्, न्यायाच्च । यो हि यं प्रति विधीयते, स तस्य धर्मो, नतु यो येन स्वनुष्ठातुं शक्यते चोदनालक्षणत्वाद् क - बुद्धि । घर्मस्य ॥ न च रागादिवशात् प्रच्युतिः, नियमशास्त्रस्य बलीयस्त्वात् ’ यं ' ' बालं ( | ४ | ४० ) । है, ( सामर्थ्य भी लौकिक अधिकारका कारण नहीं हो सकती । जाती है । शास्त्रीय अर्थ में शास्त्रीय सामर्थ्य ही अपेक्षित होती है । शास्त्रीय सामर्थ्य ' स्तन यहाँ नहीं है, क्योंकि अध्ययनके निषेध करनेसे शास्त्रीय सामर्थ्यं निषिद्ध - जिससे हो गई है ) ( दूसरेके अच्छे धर्म से भी अपना विगुण धर्म भी अच्छा है । है जिसका जिसके प्रति विधान है, वही उसका धर्म है । वह उसका धर्म सि ( है, जो जिसको सुविधा पूर्वक कर सकता है । क्योकि नहीं ( ) * दना ( विधान ) है । रागादिवश उसे हटाया नहीं धर्मका लक्षण जा सकता; क्योंकि -" विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम ” [ १ नियम - शास्त्र बलवान होता है । ) उक्त शाखामन्त्रमें ' असंयत ' को वेदविद्या देनेका निषेध किया है, इसलिए वेदमें अधिकार भी ब्रह्मचारी इन्द्रियोंके संयमकर्ताको माना गया है । इन्द्रियों का संयम मनके शासन पर निर्भर है । मनका शासन गुरु-श्रादिके उपदेश पर निर्भर है, पर वेदने स्त्रीके मनको ' स्त्रिया प्रशास्य मनः ' ( ऋ. ८२३३।१७ ) में प्रशामनीय- जिसका अनुवाद ' न समाधिः ( चित्तस्येयं ) स्त्रीषु ' ( ३६१ ) ' स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ' ( ४७ ९ ) इन चाणक्यके सूत्रोंमें किया गया ह माना है; जिसके लिए वेदको स्वयम् अन्यत्र रुत्प्ट करना पड़ा - ' न वं स्वणानि सख्यानि सन्ति सालानुकाणां हृदयान्येता ' ( ऋ. १० / ६५।१५ ) ( स्त्रियोंका सख्प नहीं हुआ करता; क्योंकि उनका हृदय भेड़ियोंके हृदयके समान होता है ) । तब ' यस्तित्याज सखिविद सखाय ' ( ऋ. १०/११६ ) वह सखा वेदसे सखित्वमें कैसे श्रधिकृत हो सकती है? वह सखा केवल ' सखा सप्तपदी भव ' के अनुसार पने पतिकी ही होगी, वेदादि अन्यकी नहीं । इसमें उक्त शाखा - मन्त्रसे स्त्री भी वेदविद्यामें अनधिकृत सिद्ध हो गई । अस्तु -फलतः ' यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् । तस्मै मा ब्रूया: ' इस मन्त्रमें पूर्व मन्त्रसे ' विप्र ' की अनुवृत्ति प्रानेसे और इस मन्त्र में ' मेवाविन ' साक्षात् पढ़े होनेसे ' विप्र ' शब्द ' मेधावी ' शर्वमें नहीं, किन्तु ' ब्राह्मण ' प्रर्थमें पर्यवसित हो जाता है । इस प्रकार ' अध्यापिता ये गुरु नाद्रियन्ते विप्राः इस तृतीय मन्त्रमें भी ' विप्राः का अर्थ ' ब्राह्मण ' ही है । बुद्धिमान् श्रर्थ तो संगत भी नहीं हो सकता । जो बुद्धिमान् पढ़ाये गये हुए, गुरुका आदर नहीं करते, जैसे वे बुद्धिमान् गुरुकी कृपाके योग्य नहीं होते, वैसे उन बुद्धिमानों पर गुरुसे उपदिष्ट वेदवाक्य भी अनुग्रह नहीं करता ' इस अर्थ में ' बुद्धिमान् ' अर्थ स्पष्ट अनुचित है । वैसों को तो ' बुद्धिमान् ' शब्दसे कहना ही प्रयोग्य होता । ' ब्राह्मणा: ' इस अर्थ में तो प्रसंगति नहीं । कुत्सित गुणों वाले जन्म - ब्राह्मण ही वहाँ अभिप्रेत हैं ।
पृष्ठ 128
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तब वेदकी उक्त शाखामें भी वेदमें ब्राह्मणका, उसके उपलक्षणसे द्विजका अधिकार कहने से शूद्रादिका वेदमें श्रनधिकार सिद्ध हो गया, क्योंकि-वेदाध्ययनकेलिए उपनयन अनिवार्य हुआ करता है । परन्तु शूद्रका उपनयन कहीं भी प्रदिष्ट नहीं, अतः उसे ' एकज ' कहा जाता है ' द्विज '. नहीं । प्रकृत - स्थलमें जहां निरुक्तकारने उक्त चार मन्त्र प्रमाणरूपसे उपन्यस्त किये हैं, वहाँ स्वयं भी अध्येताका उपनीत होना सूचित किया है । जैसे कि - ' नावैयाकरणाय नानुपसन्नाय ' ( २२३६ ) यहाँ श्रीयास्कने ' अनुप्रसन्न ' का पाठनाधिकार निषिद्ध किया है । ' अनुपसन्न ' का अर्थ है अनुपेत-अनुपनीत । ' द्विजसे इतर ' यह उसका प्राशय है । इसे निरुक्तकारने पुतरपि स्पष्ट किया है - ' उपसन्नाय तु निर्ब्रूयात् ' ( २३८ ) यहाँ पर स्पष्ट ही उपसन्न - उपेत - उपनीतका अधिकार कण्ठसे कहा गया है । ' उपनीत ' शब्दका ही पर्यायवाचक ' उपसन्न ' और ' अनुपनीत ' का ' अनुपसन्न ' निरुक्तके प्रकृत - स्थल में आया है । जैसे पारस्करगृ. में ' उपनीत ' का पर्याय ' उपेताः ' ( ३।२।१२ ) श्राया है, और ' अनुपनीता ' का ' अनुपेता: ' । श्रापस्तम्बध. में ' उपनयन ' का पर्याय ' उपायनम् ' ( १।११६ ) तथा ' मानवगृह्यसूत्र ' में भी ( ११२२१ ) भाया है । इसी तरह ' उपेतः अनुपेतः ' ( आप.ध. २६/७ ) तथा ( खादिरगृ. ३ २ ६ ) इस सूत्र में ' उपेत-श्रनुपेत ' शब्द ' उपनीत अनुपनीत ' स्थानीय हैं । इसी प्रकार निरुक्तक उक्त वचनमें भी ' अनुपसन्नाय, उपसन्ताय ' शब्द ' उपनीताय, अनुपनीताय ' अर्थको बतात हैं । ' उपसन्ताय ' का ' पाखें प्राप्ताय ' और ' अनुपसन्नाय ' का ' पाश्व भ्रप्राप्ताय ' यह अर्थ किया जावे, तो यह असाभिप्राय हो जाता है । पासमें न पहुंचे हुए किसीको भी विद्या देना भी असम्भव है -तब ऐस शब्दका कहना व्यर्थ ही है । तब यहाँ बंध ' उपसन्नता ' उपनीत अथं वाली होने पर ही साभिप्राय वमती है । इससे अनुपनीतों का वेदाधिकार हट जाता ॥ इसी कारण ' ब्रह्मचर्यो-" विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम " २० पपन्नम् ' इस पूर्व कहे शाखामन्त्रके पदसे भी ' अशूद्र ' शूद्रव्यतिरिक्तका है, क्योंकि शूदका वैध - ब्रह्मचर्याश्रम नहीं होता । उपनयन ही ब्रह्मचर्याथम प नही श्रारम्भक होता है, शुद्रको तो उसका प्रभाव ही होता है । ' शुचि ' ह भी हो जाती है । मेध्यस्थान से उत्पत्ति न होनेसे प्रादिसे उत्पन्न ब्राह्मणादि कोटिक शुचिता उसमें नहीं, किन्तु श्रमेध्यस्थान पाद - प्रदेशसे उत्पन्न होनेसे वह प्रशुचि है, अतः विद्यासे व्यावृत्त है । " वैधग्रह्मचर्याश्रमधारी, शुचि, उपनीत, शास्त्रीय प्राचारोंमें श्रप्रमत मेधोपजीवी आदिम तीन वर्ण ही उक्त शाखानुगृहीत हैं, अन्य शास्त्रा मान स्वीकृत हैं; शूद्र - अन्त्यज नहीं । तब श्रीशाण्डिल्यजीका नि लिए वेदशाखाके उक्त - प्रमाणोंसे मानवमात्रको वेदाधिकार देना सिद्ध न हो सका मन्त्र उनके दिये उक्त मन्त्रोंमें ‘ मानवाय ' यह विशेष्य नहीं दीख रहा, कि व्यत्ति ' विप्राय ' ( ब्राह्मणाय ) ही विशेष्य दीख रहा है । उक्त मन्त्रोंके ग्रनुवादक्ष सेनि श्रीमनुको भी यहां ' विप्र ' से ' ब्राह्मण ' ही इष्ट है — यह सिद्ध किया. ही र उक्त चुका है ।... शाखा इसमें साक्षी ' वेदमाता... पावमानी द्विजानाम् ( अं ० १६७११ मन्त्र है, इसका अर्थ ' स्त्रियों का वेदाध्ययन ' ( १४३ पृष्ठ ) में बा प्रादि " इस मन्त्र में वेदमाताको द्विजों को पवित्र करने वाला कहा है ' यह नि स्त्री है । यदि एकज - शूद्रादि सभीको भी वेदमाता पवित्र करनेवाली हो के तो यहां ' वेदमाता पावनानी जनामाम् ' होता, ग्रंथ ' द्विजानां ' कहकर ि वेदका शुद्रोंको इनसे उपनयन - वेदादिका अधिकार देना व्याघातको निमन्न करना देना है | पुजार जोकि पं. जीने अपने ' धर्मशास्त्र में लिखा है कि- प्रभुकी वाणी के तो स्पष्ट ही ' जनेभ्यः ( यजुः २६।२ ) कहा है ' यह उनकी अपनी मानव है । पहले उन्होंने इसे ' ऋषिकी उक्ति ' माना है, अब उसे ' प्रभुकी इन कह दिया । इसलिए ही तो पुरुषकी विद्या श्रनित्य मानी गई है । तब त प्राचीन- पुजारी उसके अन्तस्तलके अनुसार चलना चाहते थे, उसका द्विजों
पृष्ठ 129
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ). २०२ ] रक्तका बदलते थे, पर श्राजकलके उसके छली पुजारी उस प्रभुको अपनी ह्राचर्याश्रम नहीं चलाना चाहते हैं । ' जनेभ्यः ' वाले मन्त्र में ' वेदवाचं ' शब्द नहीं, शुचि पद इच्छानुसार और ' वेदमाता ' वाले शब्दमें ' जनानाम् ' नहीं, किन्तु ' द्विजानाम् ' है, इसीसे होनेसे मु उस प्रभुका अभिप्राय स्पष्ट हो रहा है । ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थः ’ न्याय यमेध्यस्थार ही किये अर्थ में समन्वित होता है— श्रीशाण्डिल्यजीके पक्ष में नहीं । हमारे है । पं.जी शाखाको वेद नहीं मानते, पर माध्यन्दिन सहितको यजुर्वेद मिश्रप्रम मानते हैं, उसमें पं.जीके अनुसार ' जनेभ्यः ' आया है, उसमें उन पुरुषोंके निरुक्तस्थि लिए कोई बन्धन नहीं रखा कि प्रसूयक, अन्जु श्रादि न हो, पर शाखा-मन्त्र में रखा गया है, तब पं. जी के अनुसार यह शाखामन्त्र विशेष -न हो स व्यक्तियोंको वेदाधिकार देनेवाला बना । शूद्र प्रन्त्यजं आदि तो उक्त मन्त्र रहा, ि से निरस्त हो ही जाएंगे, क्योंकि उनमें यह गुण - कर्म सम्भव नहीं, बल्कि अनुवास उक्त गुण कर्मवाले व्यक्ति ब्राह्मणादिमें भी बहुत ही न्यून मिलेंगे, तव तों कया ही शाखा - मन्त्र भी सीमितोंको वेदांधिकारप्रद सिद्ध हुआ - मानवमात्रको नहीं । तब भी पं. जीका पक्ष इसीसे निरस्त हो गया । पं. जीके माने eroti प्रादिम- चार ऋषियों (? ) को वेद देना- इसीका प्रमाण है । इसमें न कोई = ) में वा स्त्री थी, न शूद्र अन्त्यज; बल्कि क्षत्रिय वैश्य भी नहीं थे, किन्तु स्वामीजी यह के अनुसार पुण्य - गुणकर्मा चार ब्राह्मण ही थे, उनको भी केवल एक - एक ली हो वेदका उपदेश दिया गया । प्रभुके व्यवहारसे विरुद्ध यदि पं. जी व्यवहार कहकर करना चाहते हैं, तो वह प्रभुके पुजारी न माने जाकर प्रार्यसमाजके निमल पुजारी माने जाएगे । वाणी के ' शं नः, तन्न ' आदि वैदिक पदोंसे भी पं. जीके अनुसार अपनी मानवमात्रको वेदाधिकार सिद्ध नहीं, जब तक पं. जीके अनुसार की बा इन शब्दोके कहनेवाले ऋषियों को पं.जी शूद्र अन्त्यज सिद्ध न कर दें, तब तक शूद्र- प्रन्त्यजको वेदाधिकार त्रिकालमें भी नहीं दे सकते । यदि उसका इनके बक्ता ऋषि द्विज हैं, तो इन ' शन्नः तन्नः ' पदोंसे भी वेदाधिकार द्विजोंको रहेगा, मानवमात्रको नहीं । द्विजोंको वह सुख सीधा वेदवाणी से " विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम " [ २०३ मिलेगा, अवशिष्टों को वह सुख उन द्विजोंकी वेदभाष्यभूत अपनी वाणीसे मिलेगा । शाण्डिल्यजीका यह पक्ष श्रालोचित हो गया । ( ख ) ' इत्येते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरस्वती । विहिता ब्रह्मणा पूर्व ' इस महाभारतके पद्यसे भी वेदवाणीका चारों वर्णोंके लिए प्रकट होना सिद्ध नहीं, क्योंकि -महाभारतं वेदमें शूद्रोंका अधिकार निषिद्ध करता है-यह हम ' यथेमां वाच ' निबन्ध में बता चुके हैं । उद्योगपर्व ( २६।२६ ) पद्यका अर्थ श्रीसातवलेकरने लिखा है— ' शूद्रको वेद पढ़ने और यज्ञ करने का अधिकार नहीं है; और इसे प्राचीन धर्म कहां गया है । ' तब पं. जीसे दिये हुए महाभारतके पद्यका भी तत्सम्मत अर्थ नहीं । उक्त पद्यमें ' ब्राह्मी ' का अर्थ ' वेदवाणी ' नहीं । सभी जानते हैं कि - ब्राह्मी संस्कृत भाषाको कहते हैं, देखिये श्रमरकोष ' ब्राह्मी ' ( १।६।१ ) ब्रह्मण इयमिति ब्राह्मी । इसका अर्थ यह है कि ब्रह्मा ने पूर्वकालमें चारों वर्णोंके बोलनेकेलिए संस्कृत - वाणी बनाई थी, परन्तु धन आदि कमाने लोभमें पड़कर उससे अनभिज्ञ हो गये । यहां पर ' सरस्वती ' का अर्थ ' भाषा ' है । इसलिए श्रमरकोषमें ' ब्राह्मी भारती, भाषा, गीर्, वाक्, वाणी, सरस्वती ' ' ( ११६१२ ) ये पर्यायवाचक गये हैं । ' निघण्टु ' ( १1११ ) में भी ऐसा ही है । ' ब्राह्मी ' यहाँ ' वेदवाणी ' तो हो नहीं सकती, क्योंकि वहाँ लिखा है-येषां ब्राह्मी सरस्वती विहिता ब्रह्मणा ' अर्थात् ब्रह्माने चारों वर्णोंकी बोलचालको भाषा अपने नामसे ब्राह्मी ( संस्कृत ) बनाई । ' विहिता ' का प्रथं ' बनाई गई ' है, पर वेदवाणी बनाई नहीं जाती, अन्यथा कृतक हो जाने से वह अनित्य हो जावे. पर यह अनिष्ट है । ब्रह्माने भी वेदवाणीका पढ़ा था, प्राप्त किया था, वनाया नहीं था । यहाँ ' विहिता ' का अर्थ ' वनाई हुई ' होने से यह स्पष्ट है कि ब्रह्माने चारों वर्णोंके वोलनेकेलिए संस्कृत भाषा बनाई, पर वे लोभमें रहकर उसे भुला । तब यहाँ ' वेदवाणी ' अर्थ नहीं । श्रीशाण्डिल्यजीसे अनुवाद के लिए प्रयुक्त किये हुए
पृष्ठ 130
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२०४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' ' का अर्थ ' निर्मिता ' हो होता है ' प्रकटीकृता ' नहीं । ब्रह्मदेवसे बनाई होनेसे संस्कृत भाषाको ' देववाणी ' कहा जाना है, ' ह्यो ' भी । बल्कि इस सम्पूर्ण जगत्को भी ब्रह्मासे बनाया होनेसे ' ब्राह्म ' कहा जाता है । जैसे कि ' सर्वं ब्राह्ममिदं जगत्, ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि ' ( शान्तिपर्व १८८/१० ) वेदवाणी तो कोई बोलचालकी भाषा नहीं । इस कारण पाणिनि यास्क प्रादिने इसे मन्त्र ( मत्रि गुप्त - भाषणे ) छन्द. ( छादनात् ) अध्याय वा स्वाध्याय ( पाठ ) कहा है, उसे भाषा नहीं कहा, पर लौकिक संस्कृत वाणीको दोनोंने ' भाषा ' कहा है । ' भाषा भाषणात् । ' पर छान्दस - प्रयोगोंका लोक भाषामें प्रपवादोंको छोड़कर माघारणरूपसे प्रयोग नहीं होता, यह बात वादिप्रतिवादि सम्मत है, श्चन्यथा फिर वेद भी लोक भाषाके एवं मनुष्य - प्रणीत मानने पड़ेंगे । इससे स्पष्ट है कि उक्त महाभारतीय पथमें चारों वर्णोंका अपनी संस्कृतभाषाको बोलना छोड़ देना बनाया है, वेदकी यहाँ कोई बात नहीं । चेद छोड़ा होता; तो चारों वर्णोंने बराबर छोड़ा होता; क्योंकि उक्त पद्यमें चारों वर्णोंका इकट्ठा नाम है, पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंने तो उसे छोड़ा नहीं । शास्त्रोंने भी उन्हींका वेदका अधिकार बताया है । वे ही अब भी स्वयं उसमें अपना अधिकार बताते वा मानते हैं, पर शूद्र न. तो उसमें अपना अधिकार ही बताता है, न कोई प्राचीन शास्त्र ही उसे उसका अधिकार देता है । अतः ' महाभारत ' से विरुद्ध प्रर्थ लेनेके कारण श्रीप. जीका अर्थ तथा उससे उनका पक्ष सिद्ध न हो सका । ' शूद्र ेण हि समस्तावद् यावद् देदे. न जायते ' ( मनु. २।१७२ ) ' योऽनधीत्य द्विजो वेदम्... स जीवन्नेव शूद्रत्वं ' ( २1१३८ ) इन पद्योंसे ही शुद्रका वेदमें अनधिकार सृष्टिकी आदिसे ही सिद्ध हो रहा है, क्योंकि - मनुस्मृति सृटिकी प्रादिमें बनाई गई है । यह पं. जीसे सम्भावित स्वा. द. जी तथा श्रीयास्क प्रादि भी बताते हैं । ( १६ ) कई अन्य प्रश्न । ( १ ९ ) पूर्वपक्ष - ( क ) सनातनधर्मी- शास्त्रों में ' तर्पणं प्रत्यहं कार्य ६ भर्तुः कुशतिलोदकः ' इत्यादि पद्योंसे मृतपतिका श्राद्ध - तर्पणादि स्त्रीको करना कहा है । सो श्राद्धादिमें तो यज्ञोपवीतको वाएं दाहने करना पडता है । तब यदि स्त्रीका उपनयनसूत्र नहीं, तो वह मृतक श्राद्धादिकी अधि व कारिणी कैसे हो सकती है? ( श्रीइन्दु प्रादि ) उत्तरपक्ष- यद्यपि मृतककर्म सपिण्डन श्राद्धादिमें जनेऊ को सव्यापसव्य पै करना पड़ता है; तथापि वह सामान्य शास्त्र है । सामान्यशास्त्रके श्रपवाद भी हुआ करते हैं । मृतककर्म एक आवश्यक कृत्य है । उपनयनसे पूर्व यदि प्र बालकका पिता मर जाय, तब उसका मृतक श्राद्ध श्रादि तो अवश्य करना पड़ता है । उस दिन तो उसका प्रशौचादिके कारण उपवीत किया नहीं जा सकता । इस प्रकार शुद्रको भी अपने मृत पिताका तर्पणादि करना पड़ता है, परन्तु उसका यज्ञोपवीतमें अधिकार ही नहीं । तब क्या यह लोग वि मृतकका तर्पणादि न करें? में, इस त्रुटिकी पूर्त्यर्थं शास्त्रकारोंने मृतककृत्यके लिए अपवाद कहा है । जैसे कि - मनुस्मृति में - ' नाऽभिव्याहारयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनाद् ऋते । शूद्रेण समस्तावद्यावद् वेदे न जायते ' ( २८१७२ ) इसका यह अर्थ सर्वसम्मत है जब तक पुरुषका उपनयन नहीं होता, तब तक शूद्र- समान होतेसे वेदमन्त्रका उच्चारण न करे, परन्तु ' स्वधानिनयनाद् ऋते ' अर्थात् मृनक- प्र कर्म श्राद्धतर्पणादिको छोड़ कर । इसका अर्थ प्रार्यसमाजा श्रीतुलसीराम- उप स्वामीने किया है- ' परन्तु मृतक - संस्कारमें वेद - मन्त्र का उच्चारण वर्जित नि नहीं ' । १० - ' स्मृतिचन्द्रिका के संस्कारकाण्ड अनुपनीतधर्मके प्रकरणमें भी उक्त यज्ञ मनुपद्यके प्रर्थावसर पर कहा है- ' स्वधानिनयनं प्र तकर्म । तंत्र अनुपनी- टिप तस्यापि मन्त्राध्ययनं न विरुद्धम् - इत्यर्थः ' । ' वीरमित्रोदय ' के अनुपनीत- -वि धर्ममें भी ३२६ पृष्ठमें कहा है- ' ब्रह्म वेदः, तमनुपेतो ( अनुपनीतो ) । तम घुम