सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 131–140
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 131–140
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २०६ ] नोच्चारयेत् । तस्य अपवादः - स्वधानिनयनं पितृ [ मृतक ] कर्म, तस्माद् कार्य ‘ विना । तथाच वसिष्ठः – ‘ अथाप्युदाहरन्ति - ' नह्यस्य विद्यते कर्म किञ्चिद् स्त्रीको ` आमौञ्जिबन्धनात्, अन्यत्र उदककर्मस्वधापितृसंयुक्तभ्यः ' । यहाँ भी वही पड़ता बात बताई गई है । अधि. सुमन्तुने भी कहा है- ' अनुपेतो ( अनुपनीतो ) ऽपि कुर्वीत मन्त्रवत् पैतृमेधिकम् ' । उक्त मनुपद्यके भाष्यमें मेधातिथिने भी लिखा है-पसव्य ‘ अनुपनीतेन ` उदकदान - नवश्राद्धादि पितुः कर्तव्यम् इति अस्मादेव अपवाद प्रतीयते । यहीं राघवानन्द लिखते हैं- ' तेन अनुपनीतस्यापि पितुरीवंदे-यदि हिके अस्त्यधिकारः ' । यहीँ रामचन्द्र ने लिखा है- ' प्रकृतोपनयनस्य द्विजस्थ करना - पित्रोर्मरणं भवेत् चेत्; तहि स्वधोच्चारण कर्तव्यं; प्रेतकर्म करणीयम् ' । नहीं करना इससे तात्पर्य यह निकला कि अन्य कार्य में तो वेदमन्त्रको यज्ञोपवीतके लोग बिना न पढ़े; परन्तु मृतक कृत्य श्राद्धतर्पण आदि ग्रन्त्येष्टि सम्बद्ध कर्मों-में, बिना भी यज्ञोपवीत, मन्त्र पढ़ा जा सकता है । इस अपवादसे उपन-है । यन से पूर्व मृतपितृक - माणवक और उपनयनके अनधिकारी स्त्री - शूद्र आदि शूद्रेण भी मृतकका तर्पणादि कर सकते हैं । इस प्रकार वादीका प्रश्न दत्तोत्तर सम्मन हो गया । होनेसे शेष रहा तर्पणादिके समय जनेऊको दाएं - बाएं करना - यह मृतक- प्रश्नांश, सो गोभिलगृ. में वस्त्रको बाएं - दाहिने कन्धे पर रखने पर भी राम- “ उपवीती प्राचीनावीती माना जाता है यह हम ' प्रावृतां यज्ञोपवतिनीम् ' वर्जित निवन्ध में लिख चुके हैं, सो वही वस्त्र स्त्री - शूद्रके लिए होता है, जैसेकि -११२।१ गोभिलसूत्रकी टिप्पणी में म.म. मुकुन्दशर्माने लिखा है ' अत्र वाससा उक्त यज्ञोपवीतार्थः स्त्रीशूद्राणां कृते देवपितृ - कर्मणोरुपपद्यते । २।१।१ सूत्रकी लुपनी- ' टिप्पणी में भी कहा है- ' यज्ञोपवीतपदं च उत्तरीयेपि स्त्रीशूद्राणां प्रयुज्यते ननीत- - विन्यासविशेषलाभार्थमित्युक्तमधस्तात् - इत्येवं चन्द्रकान्तभाष्ये सिद्धांन्ति-नीतो ) | तम् । सो वह स्त्री अपने उत्तरीय वा उपवस्त्रको दाहिने बाएं कन्धे पर ' घुमा कर मृतकपतितर्पण कर सकती है । इससे स्त्रीका यज्ञोपवीत सिद्ध कई अन्य प्रश्न [ २०७ नहीं हो सकता । ( ख ) पूर्वपक्ष - ' उद्वहेत द्विजो भाय मवर्णा लक्षणन्विताम् ' ( मनु. ३।४ ) यहाँ द्विजको सवर्णा स्त्रीसे विवाहकी प्राज्ञा है, द्विजकी सवर्गा स्त्री भी द्विजा ही हो सकती है, एकजा नहीं । वह अनुपनीता होने पर एकजा होनेसे शूद्रा रहेगी । इस पद्यसे भी स्त्रीका उपनयन सिद्ध हो रहा है । ( श्रीइन्दु तथा एक सिद्धान्तालंकार सादेशिक में ) उत्तरपक्ष - यह शंका व्यर्थ है । जब मनु ' भ्रमन्त्रिका तु कार्येय ' ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणा ' इत्यादिसे स्पष्ट ही स्त्रीका उपनयन निषिद्ध कर चुके हैं - यह हम पूर्व [ १६ उत्तरपक्षमें ] स्पष्ट कर चुके हैं; तब मनुके इस वाक्यसे उनकी अनिष्ट बात निकालना प्रनुचित है । वास्तव में उक्त मनुपद्यका सरलार्थ यही है कि द्विज सवर्णा स्त्रीसे विवाह करे । ' सवर्णा ' का अर्थ यह है कि अपने समान वर्ण वाली । सो ' द्विज ' यह वर्णका नाम तो है नहीं, किन्तु ब्राह्मण प्रादि ही वर्णका नाम है । तो जिस द्विजका जो वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि है, वह स्त्री भी उसी ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्णोत्पन्नको ही ले । तब इससे वादीकी कोई भी पक्षसिद्धि नहीं । उपनयनके अभाव वाला ब्राह्मण भी ब्राह्मण ही माना जाता है । जैसे कि - न्यायदर्शन के वात्स्यायन भाष्यमें ' व्रात्योपि ब्राह्मण: ' [ ११२/१३ ] | मनुस्मृतिके १०।२१-२२-२३ पद्योंमें व्रात्य [ उपनयनाभाववान् ] को भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कहा है, व्रात्य शूद्रका मनुमें नाम ही नहीं । इस प्रकार स्त्रीके विषयमें जान लेना चाहिए । यदि स्त्रीको उपनयनरहित होनेसे शूद्रा माना जावे, तो क्या संन्यासी भी उपनयन - रहित होनेसे शूद्र माना जावेगा? क्या उपनयनसे पूर्व माणवक • भी शूद्र हो जावेगा? तब वह उपनयनमें ही अधिकृत कैसे हो सकेगा; क्योंकि शूद्रको तो उपनयनका अधिकार नहीं होता, इस कारण यह शंका भी तुच्छ है । स्त्री एकजा होने पर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्णं वाली
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२०६ ] श्री धर्मालोकः ( ३-२ ) रह ही जाती है । फिर उपनयन - स्थानापन्न विवाह होने पर द्विज - जंसी हो जाती है । ( ग ) पूर्वपक्ष - ' शूद्रसमैव ब्राह्मणादीनामपि स्त्री उपनयनरहिता ' यह सायणसे प्राचीन आत्मानन्दके ' अस्यवामीय ' भाज्य में लिखा है तब उससे ब्राह्मण आदिका विवाह निषिद्ध होगा; उससे वे सगम कैसे कर सकते हैं; उससे भोजनादि - व्यवहार कैसे कर सकते हैं? ( श्रीमहा. शंकर ) । उत्तरपक्ष - विवाह तो ब्राह्मणका शूद्रा श्रादिके साथ भी स्मृतियों में अभ्यनुज्ञात है, शूद्रसमा ब्राह्मणीका भला कैसे निषेध होगा? संगम तो शूद्राके साथ भी निरुक्तमें अभ्यनुज्ञात किया है- ' रामा रमणाय उपेयते, न धर्माय कृष्ण ( शूद्र ) जातीया ' ( १२।१३।२ ) । ' स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ' ( २।२३८ ) मनुने ही कहा है । वस्तुतः ' सम ' शब्द उपमा - वाचक होता । उपमा सर्वधर्मकी तुल्यतामें नहीं होती, किन्तु किञ्चित् साधर्म्यमें भी हो जाती है । जैसे कि - न्यायदर्शन में ' सिद्धं च किञ्चित्साधर्म्याद् उपमानम् ' ( १५ ) अर्थात् उपमामें किञ्चित् सादृश्य होता है, सर्वसारूप्य नहीं । नहीं तो ' चन्द्रवन्मुखम् ' में क्या स्त्रीका मुख चन्द्रमा - जितना ही बड़ा वा वैसा मान लिया जायगा? नहीं । इसलिए प्रसिद्ध है कि- दृष्टान्तमें विवक्षित एकदेश ही लिया जाता है - सर्वसारूप्य नहीं । ' इसलिए ३१२।२० ब्रह्मसूत्रके भाष्यमें स्वा. शंकराचार्यने लिखा है-' नहि दृष्टान्तदाष्टन्तिकयोः किञ्चित् क्वचिद् विवक्षितांश मुक्त्वा सर्व-सारूप्यं केनचिद् दर्शयितु ं शक्यम् । सर्वसारूप्ये हि दृष्टान्त दान्तिक -भावोच्छेद एव स्यात् ' । दृष्टान्त और दान्त में कहीं कुछ विवक्षित-श्रंशको छोड़कर कोई सर्व - सारूप्य नहीं दिखला सकता । सर्व - सारूप्य हो जानेपर तो दृष्टान्त - दान्तिक भावका ही उच्छेद्र हो जावेगा । फलतः स्त्री वेद - उपनयनके अनधिकारमात्रमें शूद्रके समान है, वस्तुतः वह शूद्र नहीं, अन्यथा उससे उत्पन्न सन्तान संकर हो, तब संकरके विरोधी शास्त्रकार भला ऐसी अभ्यनुज्ञा कैसे देते? श्रात्मानन्द ने भी स्त्रीको शुद्र नहीं कहा, कुछ अन्य प्रश्न --- [ - २०१ केवल यह कहा है कि ब्राह्मणादि स्त्रीका भी शुद्रके समान उपनयन होता - इससे वादीकी कोई इष्ट - सिद्धि नहीं । वणव्यवस्था जन्मसे नहीं होनेके कारण ब्राह्मणादिकी लड़की भी ब्राह्मणादि ही होती है, फिर उपनयम-स्थानीय विवाह हो जानेसे वह द्विज - जैसी हो जाती है । इससे वादिप्रदत्त कोई भी दोष नहीं रहता । पूर्वपक्ष - ( घ ) ' ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा ये शुचयोऽमलाः । तेषां मन्त्राः प्रदेया वै नतु संकीर्ण धर्मणाम् ' ( भविष्यपुराण उत्तरपर्व १३ । ६२ ) यहाँपर शूद्रकुलोत्पन्न भी जो शुद्ध और पवित्र हैं, उन्हें मन्त्रोंका उपदेश करना कहा है । ( श्रीरवि. ' हिन्दु ' पत्र में, वादी ' स्त्रियोंका या ' वेदाध्ययन ' पृ. २०८ में ) । उत्तरपक्ष - मन्त्र वेदसे भिन्न भी हुआ करते हैं । स्वा. द. जी ध सानुगाय यमाय नमः, सानुगाय वरुणाय नमः ' भद्रकाल्यै नमः, श्रादि प लौकिक वाक्योंको भी अपनी तीनों प्रसिद्ध पुस्तकोंमें ' मन्त्र ' माना है । तब शूद्रोंके विषयमें भी ऐसे ही ' नमः ' प्रन्त वाले वेद - भिन्न ' मन्त्र ' जान श्र लेने चाहिएं । इससे न हमारे पक्षको कुछ हानि है, न वादी पक्षको कुछ लाभ । वादी लोग जो भी प्रमाण देते हैं, उसमें पूर्वोत्तर - प्रकरण क छूटा हुआ होता है । पूर्वोत्तर - प्रकरण देखनेसे वही प्रमाण वादीके विरुद्ध. अभ हो जाता है । यहाँ भी यही बात है । इससे आगे जो मन्त्र लिये हैं; वें गर्भ पुराणोक्त ही हैं, वेदके नहीं । वेदके ही मन्त्र शूद्रादि निषिद्ध हैं; पुराण वा तन्त्र नहीं । अव देखिये वे मन्त्र । वहां लिखा है- ' मृद्गोमयं च संगृह्य मन्त्रैरेभिर्विचक्षणः । श्रहं तु ते प्रदिश्यामि मन्त्राणां विधि-मुत्तमम् । येषां देयो न देयो वा तान् शृणुष्व वदामि ते ' ( १३।६०-६१ ) । यह कह कर आगे वादीसे उद्धृत पद्य दिया है- ' ब्राह्मणाः क्षत्रिया ' गृह इत्यादि । आगे मृत्तिकाका मन्त्र यह लिखा है- ' त्वं मृदे! वन्दिता " अम देवविमलैर्देत्यघातिभिः । मयापि वन्दिता भक्त्या मामतो विमलं कुरु प्रथ सं ०६० १४. पर
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२१० ] श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) ३०१ ( १३/६६ ) वादिगण भी इस मन्त्रमें मृत्तिकाकी पूजा कर मूर्तिपूजाको पनावें । अब स्नानका मन्त्र देखिये- ' गङ्गा - सागरजं तोयं पौष्करं नार्मदं तथा । यामुनं सान्निहत्यं [ कुरुक्षेत्रस्थं ] च सन्निधानमिहास्तु में ' ( १३३ प्रदत्त ७० ) । आगे ' नवो नवोसि मासान्ते जायमानः पुनः पुनः । त्रिरग्निसम-नाः । वैतो वं ं देवानाप्यायसे हविः ' यह चन्द्र - मन्त्र है । ' त्वत्तले भोक्तुकामोऽहं १३ । देवि! सर्वरसोद्भवे! मदनुग्रहाय सुस्वादं कुर्वन्नममृतोपमम् ' ( १३। १ ) नौका यह पृथिवी मन्त्र है । अव वादी कहे कि क्या यह वेदमन्त्र हैं? नहीं-चोंका यह पौराणिकमन्त्र हैं । पौराणिक मन्त्रोंका भी संकर - अन्त्यजोंको देना निषिद्ध है, जैसे कि वादीसे उद्धृत पद्यमें ही कहा है— ' नतु संकीर्ण-धर्मिणाम् ' ( १३।६२ ) प्रत्युत शुद्ध भो शुचि और पवित्र हों । तब पूर्व-पक्षीका पक्ष कट गया । ( ङ ) पूर्वपक्ष - स्त्रीका विवाह तो क्यों वेदमन्त्रोंसे करना बताया और अन्य संस्कार क्यों मन्त्ररहित विधान किये; इसका उत्तर ' तेरी चुप सेरी चुप ' के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो सकता । गृह्यसूत्रों में विवाहमें कन्याके उच्चारण करनेके अनेक मन्त्र लिखे हैं - इससे विवाह में तो श्रमन्त्रक बनानेमें आधुनिक स्मृतिकारकोंकी दाल नहीं गली, परन्तु गर्भाधानादिमें स्त्रीके उच्चारणके स्पष्ट मन्त्र नहीं हैं; अतएव उनको श्रमन्त्रक लिख मारा । यदि आप पारस्करादि - गृह्यसूत्रों को देखेंगे; तो उनमें कन्याके भी समस्त - संस्कार समन्त्रक ही पायेंगे । ' ( श्रीतर्करत्नजी ' अछूतोद्धार - निर्णय ' में पू. ४८ ) । I उत्तरपक्ष - यह कथन प्रत्यक्षका अपलाप है । पारस्करादि समस्त गृह्यसूत्रोंमें कन्याओंके विवाहातिरिक्त समस्त संस्कारोंमें ' तूष्णीम् ' ' आवृत: ' ता ' अमन्त्रम् ' इत्यादि शब्दोंसे अमन्त्रक क्रियाएं लिखी हैं । ' आवृत: ' का श्रर्थं आश्वलायनादि - गृह्यसूत्रोंमें ' श्रमन्त्रका: ' इस नर्थको रखता है - इस पर गार्ग्यनारायण तथा श्रीहरदत्त, सुदर्शनाचार्य आदियोंकी टीका देखी कुछ अन्य प्रदन [ २११ जा सकती है । ' प्रावृतः प्राजापत्यः ' ( कौशिकगृह्यसूत्र १०।७११३३ ) यहां आर्यसमाजी ठाकुर - उदयनारायणसिंहने भी बिना मन्त्रके ' यह अर्थ किया है । उपनयन में ' प्रावृत: ' न श्रानेसे और गत संस्कारोंसे कुमारकी-अनुवृत्ति प्रा रही होनेसे वह कन्याका श्रमन्त्रक भी नहीं होता । पारस्करगृह्यसूत्र तो कहता ही लड़कोंके संस्कार है - लड़कियोंके नहीं । यह हमने अन्यत्र स्पष्ट किया है । आश्वलायनकी श्रीकुमारिलभट्टकृत ‘ गृह्यकारिका '. ( ११८३६, ११२३, १४१२२४, २१८।५ ) में भी कुमारियोंके चूडाकरणान्त संस्कार अमन्त्रक ही कहे । इस प्रकार वीर-मित्रोदयमें भी । शेष है स्त्रीके विवाहको समन्यकता क्यों, इसमें वादीकी चुप्पी भले हो; पर हमारी चुप्पी उसमें नहीं हो सकती । इसका उत्तर यह है स्त्रीका विवाह उपनयनस्थानीय है, साक्षात् उपनयन नहीं, यह हम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके हैं । तब कई मन्त्र कन्याके उच्चारणीय हो जाते हैं, जो दो - तीन से अधिक नहीं । शेष मन्त्र सभी वरके ही उच्चारणीय हैं । अब रहा यह कहना कि वेदमन्त्रोंके प्रशंसे स्पष्ट होता है कि यह कन्याके उच्चारणीय मन्त्र हैं - यह भी व्यर्य है - ' पिप्पल्यः समवदन्त ' ( अथर्व. ६।१०६२ ) यहाँ प्रचेतन श्रोषधिका उत्तम पुरुषमें बोलना भी कहा है, तो क्या इस मन्त्रका उच्चारण भी प्रोषधिसे कराया जायगा? कई शिशुओं के भी मन्त्र कहे हैं, ' भद्र ं कर्णेभिः शृणुयाम ' ( कर्णवेधमे ) आदि, तो क्या वे कई मासके वा ५-६ वर्षके बच्चेसे बुलवाए जाएंगे? नहीं; किन्तु उनके संरक्षक पितासे । उसी नीतिसे स्त्री - संरक्षक वर ही उन दो - तीन मन्त्रोंका जपन भी कर देता है, जैसे कि - गृह्यासंग्रह में कहा है- ' विवाहे यो विधिः प्रोक्तो मन्त्रा दाम्पत्य - वाचकाः । वरस्तु तान् जपेत् सर्वान् ' ( २।२४ ) इससे उन स्त्रियोंका सर्वत्र वेदमन्त्राधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । पूर्वपक्ष ( च ) ' कुलायिनी घृतवती ' ( यजु १०११४ ) । ' पृथिव्याः
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२१२ ] श्रीसनातनधर्मालीकः ( ३-२ ) पुरीपमसि तां स्वा ' ( १४१४ ) । इस मन्त्रसे स्त्रीका वेदाधिकार प्रतीत हो रहा है । ( सार्वदेशिक ) ( उत्तर ) वादी लोग जहां स्त्रीलिङ्ग देखते हैं; चाहे वहाँ मानुषी स्त्रीका वर्णन न भी हो, किसी देवताका हो, गायका हो; इष्टकाका हो; तब भी वे वहां मानुषी - स्त्रीका अर्थ बलात् ठूंस देते हैं । जलोंका वर्णन हो; तो उसका पर्यायवाचक ' अप् ' स्त्रीलिङ्ग होता है, गायका वर्णन हो; तो वह भी स्त्रीलिङ्ग । इस प्रकार इष्टका भी स्त्रीलिङ्ग । बस वादो वहां मानुषी स्त्रीका बलात् अर्थ करने बैठ जाते हैं । यह है वादियों का श्रुतिसे वलात्कार । ' कुलायिनी, घृतवती ' मन्त्रका ' इष्टका ' देवता है । सो वहाँ इष्टकाका अर्थ होगा, मानुषी स्त्रीका नहीं । प्रक्षेप ( ४६ ) - पौराणिक तथा वाममार्गी उब्वट - महीधरादि भाष्य-कारोंने इन मन्त्रोंकी इष्टकोपरक व्याख्याका उपहासजनक प्रयत्न किया है; जो ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे के विरुद्ध तथा सारहीन होनेके कारण धमान्य है । ' ( ' सार्वदेशिक ' ) परिहार - आप लोगोंके विषयमें यह लोकोक्ति ठीक घटती दीखती है- ' अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते ' । चूंकि श्राप लोगोंको इस विषयमें कुछ ज्ञान नहीं है; श्रतः श्राप व्यर्थकी निन्दा करते हैं । यह बात सर्वमान्य है कि- वेदका विषय यज्ञ है, इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. १४२-१४६ ) देखिये- । विशेष करके यजुर्वेदका विषय तो यज्ञ है ही । इसलिए इसे अध्वर्यु - वेद कहते हैं । उसमें यज्ञवेदिमें इष्टकानोंका वर्णन वेदमें स्वाभाविक है । वादीको यदि यह ज्ञात न हो; तो वह मुख्य वेदाङ्ग व्याकरणका अध्ययन करे । उसमें यह सूत्र स्मर्तव्य हैं - ' तद्वान् श्रासामुप-घानो मन्त्र इति इष्टकासु लुक् च मतो: ' ( ४ | ४ | १२५ ) इस पाणिनिसूत्रमें ' आस ' इस स्त्रीलिङ्गान्त शब्दसे ' इष्टकाएं ' सूत्रमें ' इष्टकासु ' इस पदसे साक्षात् गृहीत हैं ही । उक्त सूत्रका अर्थ यह है-कुछ अन्य प्रश्न [ २१ ॥ २१६ ' मत्वन्तात् प्रथमा - समर्थात् पासामिति षष्ठ्यर्थे यत् स्यात् प्रथमा - समर्थम् उपधानो मन्त्रश्चेद् भवति । यत्तद् श्रासामिति । तत् ६ ) निर्दिष्टम् इष्टकाश्चेत् ता भवन्ति । मतोश्च लुक् । इसका उदाहरण है- ' प्राश्विनी रुपदधाति । पाणिनिका यह वैदिक - सूत्र है । इसके उदाहरण भी. । होते हैं । ब्राह्मणभाग के भी वेद होनेसे यह उदाहरण भी उसीसे वेदके । जब गया है । ' आश्विनीरुपदधाति ' यह शतपथब्राह्मण ( २११११ दिया नेवै लिया गया है । यह हमारा प्राकरणिक सूत्र है । ) से काअ श्रीत इसका भाव यह है कि जिस मन्त्रमें ' अश्विन् ' शब्द हो; ' अश्विमान् ' होता है । ऐसा कौन है? इसपर सुबोधिनी टीकाकार वह मन्य इनम कहते मार्गी हैं - ' ध्र ुबक्षितिरित्यादिकः ' । देखिये यह ' ध्रुवक्षितिः ' ( यजुःमाध्यं. १४५१ ) तथा मन्त्र वादीसे दिये हुए ' कुलायिनी घृतवती ' से पहले का हैं । वादीसे दिया हुआ मन्त्र १४।२ संख्याका हैं । यह १४११ है । इसमें ' अश्विन ' शब्द भी है । टीकाकारने केवल ' ध्रुवक्षितिः ' मन्त्र नहीं लिखा, किन्तु ' इत्यादिक ' | ' मुल्ला साथ लिखा है । तब इसका भाव यह हुआ कि - ' ध्रुवक्षितिः ' मन्त्र से लेकर ' चिति प्रभा जिन - जिन मन्त्रोंमें ' अश्विन् ' शब्द हैं, वे मन्त्र ' अश्विमान् ' हैं । वे इष्टकाओं के उपधायक मन्त्र हैं । इष्टक अब देखिये वे मन्त्र । एक तो वादीसे ही उद्धृत है- ' कुलायिनी बामम घृतवती ' ( यजुः १४ । २ ) इसमें भी अन्तमें ' अश्विनाध्वयूँ सादयताम् ह उसम ` त्वा ' है ही । तीसरा मन्त्र वादीने नहीं लिखा । उसमें भी ' अश्विन ' शम उवेट-है । ४ र्थ मन्त्रका आदि अन्तिम भाग वादीने छिपा लिया है । उसमें भी इस आश्विन ' शब्द है । पाँचवेंमें भी । लगान फिर अन्तिम सूत्र उसमें अष्टाध्यायीका है- ' वयस्यासुं ' मूर्ध्नो मतुप है । ( ४ | ४ | १२७ ) इसमें भी वैसी अनुवृत्ति है । ' वयः शब्दवन्मन्त्रोपषेयासुः प्रक्षेप पृ. ४ इष्टकासु । यस्मिन् मन्त्रे मूर्धवयः - शब्दौ स्तः, तेन उपधेयासु इष्टकासु । स्वा.द इसमें ' मूर्धन् वय: ' शब्द वाला मन्त्र है - मूर्धा वयः प्रजापतिरछन्दः ( १४ ) वाले
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[ २ || श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २१४ ] तत् यह मन्त्र वादीसे उद्धृत मन्त्रसे पाँचवाँ है । नर्दिष्टम् श्विनी । • कहने का भाव यह है कि यह सब ' इष्टकानोंके उपधान मन्त्र हैं ' । . जब वेदके प्रधान अङ्ग व्याकरणके प्रणेता, वादिप्रतिवादिमान्य श्रीपाणिनि-वेदके से दिवा ने वैदिकप्रक्रिया के अपने सूत्रोंमें यह स्पष्ट बताया है कि उक्त मन्त्र इष्ट-११ ) से विनियुक्त हैं, और उसीके अनुकूल ब्राह्मणभाग तथा ' कात्यायन-श्रौतसूत्र ' श्रादि श्र - ग्रन्थोंने उनका विनियोग बतलाया है; तब क्या इन मन्त्रोंको इष्टकापरक बतानेवाले पाणिनि तथा कात्यायन श्रादि वाम-बहमन्य कहते मार्गी हैं? अपनी अनभिज्ञनापर दोष न देकर वादी उनको बुद्धिविरुद्ध १४११ तथा अमान्य बतलाते हैं - यह बहुत खेदकी बात है । ) सदिया चूंकि स्वा.द.ने इन मन्त्रोंनें ' स्त्रीको उपदेश ' माना है; अतः ब्द भी ' मुल्लाको दौड मस्जिद तक ' न्यायसे वादी भी कूपमण्डूक बने हुए समुद्रका नादिक: प्रभाव मानते हैं; तथा उसकी निन्दा करते हैं । कृष्णयजुर्वेद ( तै.सं. ) में लेकर ' चितिवर्णनम् ' में ' प्रथमचितो अपस्याभिवान- इष्ट कोपधानम् ' लिखकर टका ' क्षितिः कुलायिनी वसुमती ' आदि मन्त्रोंमें ' द्वितीयचितो आश्विन्यादि इष्टकोपधानम् ' यही हमारा कहा हुआ ही विषय माना है; तब इसमें लायिनी. वाममार्गीपन या बुद्धिविरुद्धता क्या हुई? वादीकी बुद्धि ही बहुत तङ्ग है, नाम ह उसमें उससे प्रज्ञातविषय कैसे प्रविष्ट हो सके? खेद! उल्टा दोष वादा शब्द - महीधर पर देता है, और उन्हें वाममार्गी कहता है! अपना अज्ञान समें भी इस विपयमें नहीं देखता । फलतः ' कुलायिनी घृतवती ' का स्त्रीपरक श्रर्थ लगाना निर्मूल है । जो चाहो अर्थ करते जाओ । यही हाल विदेहजीका है । यही हाल स्वा. द. जीका । उवट - महीधरादिके ' वाममार्ग ' विषय में वेगालु श्राक्षेपपर वादी ' आलोक ' ( ५ ) पृ. ७७१-८०६ तथा ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४०६-४१३ पर देखें | अस्तु! यजुर्वेदके भाष्यकी कसौटी कोषु ' । - ( १४ ) स्वा.द.जी ' शतपथब्रा ' को मान गये हैं । सो उवट - महीधरने भी इष्टका बाले मन्त्रोंमें शतपथानुसार ही सब कुछ लिखा है । शतपथमें - ' एषोग्निः कुछ अन्य प्रश्न [ २१५ सर्व इष्टकायामिष्टकायां संस्कृतो भवति ' ( ८११४१५ ) ' द्व इष्टके भवतः ' ( ८२ | १ | १६ ) में इष्टकाका परिचय देकर ' तद् या एताः पञ्च प्राश्विन्यः ' ( ८२।१।१३ ) ' कुलायमिव वै द्वितीया चितिः ' ( २१५ ) इत्यादिमें जो कुछ शतपथब्रा ने लिखा है; वही उवट - महीधरने लिखा है । साथ ही वे शतपथकी श्रुति भी लिखते गये हैं । पर वादी व शतपथको क्यों मानेगा? आगे वादी उक्त मन्त्रमें श्रीमहीधरका ' ऐश्वर्याय इमानि ब्रह्माणि-मन्त्रान् प्राप्नुहि, अस्मन्मन्त्रोपहितः सौभाग्याय भव ' यह अर्थ लेता है । जब श्रीमहीधर ' इष्टका ' के लिए उसे सम्बोधित करके उसको अभिमन्त्रित करनेकेलिए प्रयुक्त कर रहे हैं; तव वादी इसे स्त्रीकेलिए कैसे लगाता है? शेष प्राक्षेप वादीका यह हो सकता है कि प्रचेतन इष्टकाको मन्त्रोंसे यह प्रार्थनाएं कैसे की जा सकती है? इसपर वादी याद रखें कि - वेदमें श्रचेतनोंको भी सम्बोधित किया जाता है; जिसमें अधिष्ठात्री देवताका तात्पर्य रहा करता है । यह न समझकर स्वा.द.ने अपनी निर्मूल कल्पनाएं करके उन्हें प्रथमान्ततामें परिवर्तित कर दिया है । वादी स्वा. द. का ' घृतेन सीता मधुना ' ( १२ | ७० ) इस मन्त्रका भाष्य देखे - जिसमें उनने अचेतन पटेलेकी मूर्तिपूजा की है । उस पर दूध या जल शहद या शक्कर आदि चढवाई हैं, उससे घी आदि मांगा है । क्या यह वादीकी बुद्धिके विरुद्ध नहीं । समावर्तनमें वादीने भी अपने स्नातक होनेके समय जूतेके जोड़ेसे रक्षाकी प्रार्थना की ही होगी कि - ' प्रतिष्ठेस्यो विश्वतो मा पातम् ' । छुरेको ' शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्तेस्तु ' इस मन्त्र के अनुसार नमस्कार तथा प्रार्थना वादी लोग कराते ही होंगे । क्या यह सब उनकी बुद्धिसे विरुद्ध नहीं है? वस्तुतः हमारे पक्षमें कोई दोष नहीं आता । क्योंकि वेद जड़ दीख रही घटादि वस्तुनोंका जड़ नहीं समझता, किन्तु उनकी अधिष्ठात्री देवता मानकर सबको चेतन समझता है । इसमें ' अभिमानिव्यपदेशात् ' वेदान्त-
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२१६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) दर्शन में बहुत प्रसिद्ध है । इसमें वादीकी स्वामीजीके बहुत मान्य प्रसिद्ध वेदज्ञ, वेदाङ्ग व्याकरणके भाष्यकार श्रीपतञ्जलिमुनि तथा श्रीकात्यायन-मुनिके वार्तिकका प्रमाण भी देते हैं; अतः वादी अपने कान खोलकर सुने-' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् । अथवा सर्वं X चेतनावत् । ( सभी संसार की वस्तुओं में चेतनता है ) एवं ह्याह - कंसकाः सर्पन्ति, शिरीषोऽयं स्वपिति, सुवर्चला आदित्यमनुपर्येति । मास्कन्द कपिलक इत्युक्ते तृणमास्कन्दति । धयस्कान्तमय: संक्रामति । ऋषिः पठति शृणोत ग्रावाणः । ( ३ । १ । ७ ) इसका तात्पर्य है कि सभी जड़ - चेतन वस्तुएं परमार्थ - दृष्टिसे चेतन हैं । इसमें कई उदाहरण देकर अन्तमें भाष्यकारने कहा है- ' ऋषिः पठति-x जोकि - ' दुष्कृत चरकाचार्यम् निबन्धमें उसके प्रणेताने टिप्पणी में लिखा है - ' वस्तुतः प्रभिमानी देवताको कल्पना अर्वाचीन प्राचार्यों द्वारा ही सृष्ट हुई है । प्राचीन प्राचार्य ' प्रचेतनेषु चेतनावत् ' अर्थात् अचेतनमें चेतन्नवत् व्यवहार औपचारिक [ गौण ] मानते थे । इसी नियमसे ही शृणोत ' ग्रावाणः ' आदि वैदिक वाक्योंका सामजस्य उपपन्न हो जाता है । उसके लिए अभिमानी - देवता की कल्पनाकी कोई आवश्यकता भी नहीं है । ” यह बात प्रतिपक्षीकी गलत है । यह वचन महाभाष्यस्थ वार्तिककेलिए प्रवृत्त प्रतीत होता है । यहाँ ' चेतनावत् ' है, ' चेतनवत् ' नहीं । और वहाँ ' मतुप् ' प्रत्यय है ' वति ' प्रत्यय नहीं । वहां ' मतुप् ' के ' म ' को ' व ' हुआ-हुआ है । अतः वहाँ भाव यह है कि सभी जड़ - चेतन पदार्थ ' चेतनावत् ' श्रर्थात् चेतना वाले हैं, चेतन । उक्त वार्तिकमें ' चेतना ' शब्द है ' चेतन ' नहीं । सो वहां ' मतुप् ' प्रत्यय होनेसे अभिमानी देवताकी सिद्धि स्वतः हो जाती है । जब ऐसा है; तो सभी पदार्थ चेतन सिद्ध हुए । तब जो कि ऋभाभू. में स्वा.द.जीने लिखा है - ' जड़पदार्थेषु प्रथमपुरुष एव । चेतनेषु मध्यमोत्तमी च । श्रयं लौकिक - वैदिक शब्दयोः सार्वत्रिको नियमः । कुछ धन्य प्रश्न [ २१७ ' शृणोत ग्रावाणः ' ( अर्थात् वेदने कहा है- ' हे पत्थरो, सुनो ' । इससे २१८ वेद-को जड दीख रहे हुए सभी पदार्थ चेतन इष्ट हैं । यह कृ.य. ( तै.सं. ) ( १ | ३ | १३ | १ ) तथा यही यजुः माध्यं सं में लिखा है- ' श्रोता ग्रावाणः ' । नांना ( ६।१६ ) । स इसपर श्रीकैपट लिखते हैं- ' ऋषिः वेदः सर्वभावानां चैतन्यं प्रतिपाद- चेतन-यतीत्यर्थः । वैचित्र्येण च पदार्थानामुपलम्भात् सर्वचेतन - धर्मप्रसङ्गः सर्वत्र होनेमे नोद्भावनीयः ' । ( वेद सब पदाथों को चेतन मानता हैं; परन्तु पदार्थों के इ विचित्र धर्म होनेसे सबमें सब चेतनोंके धर्म नहीं मिल सकते । ) इसपर सभी व श्रीनागेशभट्ट लिखते हैं- चेतनेषु मनुष्येष्वपि नानाजातीय - व्यवहार- ( x ) दर्शनादिति भावः । सर्वत्र परिणाम दर्शनेन चेतनाधिष्ठानं विना च तद- ( देखिय मम्भवात् सर्वस्य तदधिष्ठितत्वं ज्ञायते इति तात्पर्यम् ' ( चेतन मनुष्यों में भी ३१, परन्तु वैदिकव्यवहारे जडेपि प्रत्यक्षे मध्यमपुरुषप्रयोगाः सन्ति 1 । तत्रेदं ५ ) वा वोध्यं यद् - जडानां पदार्थानामुपकारार्थं प्रत्यक्ष - करणमात्रमेव प्रयोजनम् ' वेदाध्य ( शता. सं. पृ. ६ ९ ६ ) ( जडपदार्थों में प्रथमपुरुष होता है, चेतनोंमें मध्यम तथा उत्तम पुरुष होते हैं; यह सार्वत्रिक नियम है; पर वैदिक - व्यवहार में १।३।१ जडोंमें भी मध्यम पुरुषका प्रयोग उनका उपकारत्व बतलाता है; पर यह जुहुयाद स्वामीजीका व्याजमात्र बहानामात्र है । जड़ोंके गुण प्रथमपुरुषमें लिखनेसे यहां सि भी ज्ञात हो सकते थे; पर वेदने जड़ों को भी मध्यम पुरुष देकर यह सिद्ध किया हैं कि ऊपरसे जड मालूम होते हुए भी सभी पदार्थ वस्तुतः विद्यमा चेतन ही हैं इसीलिए ही तो महाभाष्यकारने भी इनकी वास्तविक प्रात चेतनामें वेदकी साक्षी दी है कि - ' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' ऋषिः पठति पड़ेगा ' शृणोत ग्रावाणः ' । नहीं तो प्रतिपक्षियोंको परमात्मामें कूटस्थतावश वैस चलनभाषणादिक्रिया न होनेसे परमात्माको भी जड़ मानना पड़ेगा । और केलिए फिर परमात्मामें भी वेदमें मध्यम पुरुष उसके उपकारकत्वार्थ ही मानता नहीं द पड़ेगा । उसे वास्तविक चेतन नहीं मानना पड़ेगा । अतः वादियोंका यह का पत्न व्याजमात्र हैं, यह वस्तुतत्त्व नहीं । उधृत प्रोत्साि
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२३१७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २१८ ] वेद- दीखते हैं । सं. ) मांना प्रकारके व्यवहार : - सभी पदार्थों में परिणाम ( परिवर्तन वा विकार ) दीखता है, वह • के बिना असम्भव है; तव सभी पदार्थ चेतनाधिष्ठित चेतन - अधिष्ठान दि. होनेमे चेतन हैं ) । इससे अन्य स्पष्टता क्या हो सकती है । आजकलका विज्ञान भी सभी वस्तुओंको चेतन मानने लगा है । इस विषय में हमने अन्यत्र ' आलोक ' परर- ( ५ ) पृ. १६७-१७२ में स्पष्टता की है । इष्टका से भी प्रार्थना हो सकनेसे द. ( देखिये उनका सम्बोधन शत. ७४ २ २६, ७२४ २ १५, तै.व्रा. ३।१० । भी ३११, तै.ब्रा. ३।१०।३।१, तै. आ. १० १८, इष्टकाचिति शत. १०।१।३ । ५ ) वादीसे दिये इष्टकाके मन्त्र में सङ्गति लग जाती है । उनमें स्त्रियोंके वेदाध्ययनाधिकारका गन्धमात्र भी नहीं यह सिद्ध हो गया । म ( प्र. ) ' कानं गृह्य ऽग्नी पत्नी जुहुयात्, सायं प्रातर्होमी ' ( गोभिल. १।३।१५ ) इसकी टीकामें लिखा है - ' पत्नीमध्यापयेत् । कस्मात्? पत्नी ह जुहुयाद् - इति वचनात् । नहि खलु प्रनधीत्य शक्नोति पत्नी होतुमिति ' से यहां स्त्रियोंको वेदाधिकार तथा यज्ञाधिकार स्पष्ट हैं । ह ( उ ) यदि वादी टीकाको भो प्रमाणित करते हैं, तब हमारे पास विद्यमान उक्त सूत्रको टीकामें लिखा है - ' स्वस्य प्रसामर्थ्य गृह्यनी, सायं क प्रतिगृह्येऽग्नी पत्नी [ पत्यनुमता ] जुहुयात् ' यह भी वादियोंको मानना पड़ेगा । क्योंकि- ' काम ' का यही तात्पर्य है । यहां पतिके असामर्थ्य में वैसा कहा है, सर्वसाधारणता से नहीं । और फिर उस - उस कृत्यकी सिद्धि-I के लिए पहले विधिशास्त्र दिखलाना पड़ता है, पर वादी उसे कहींसे भी I नहीं दिखलाते । इससे स्पष्ट है कि यह अपवाद - वचन है । सो उतने मन्त्रों का पत्नी द्वारा बोलना कहा है, सर्वसाधारणतासे नहीं । इससे वादियोंसे उद्घृत टीका भी ' पत्नी जुहुयाद् इति वचनात् ' यह शब्द कहती है । वह श्रौत्सगिक - नियमको नहीं बान्ध सकती । कुछ अन्य प्रश्न [ २१ ९ महाभाष्य में स्पष्ट लिखा है - ' नैत्र ईश्वर श्राज्ञापयति, नापि धर्मसूत्र-काराः पठन्ति, अपवादैरुत्सर्गा वाध्यन्ताम् ' ( मिदचोन्यात् सूत्रमें ) ( न ही यह कोई ईश्वरकी बाजा है; और न ही धर्मसूत्रकार कहीं कहते हैं कि-श्रपवादोंसे उत्सर्ग बान्ध लिए जावें ' प्रकल्प्य चापवाद - विषयं तत उत्सर्गोऽ-भिनिविशते ' ( महाभाष्य ३।२।१२४ ) अपवादविषयको प्रकल्पित करके शेष स्थान उत्सर्ग ( सामान्यशास्त्र ) ही बना रहता है । ' अपवाद किसी सिद्धान्त ( उत्सर्ग ) का खण्डन नहीं करता । वह उत्सर्ग में सङ्कोचमात्र कर सकता है । प्रत्येक औत्सर्गिक वचनका अपवाद होता है । सत्य बोलना उत्सर्ग है । पर किसीके प्राण बचानेके लिए असत्य बोलना अपवाद है । ' यदि अपवाद उत्सगंका खण्डन कर दे; तब तो ' सत्यमेव जयते ' यह उत्सर्ग ( सिद्धान्त ) कभी रह ही नहीं सकेगा । शास्त्रकारोंने अपवादको केवल इतना ही अवसर दिया है कि वह विधिशास्त्र ( उत्सर्ग ) में स्वातिरिक्तत्वेन सङ्कोचभर कर सके । तब ' उत्सृज्य च अपवाद - विषयम् उत्सर्गः प्रवर्तते ' ( अपवादविषयको छोड़कर शेष सर्वत्र उत्सर्गं ही प्रवृत्त होता है ) के नियमसे उत्सर्ग और अपवादमें एकवाक्यता हो जाती है । तब कहा जाता है कि कुछ अवसरको छोड़कर सदा सत्य ही बोलना चाहिये । इसी प्रकार क्वचित् ( असामर्थ्यादि में ) अपनी पत्नी आदि द्वारा हनन करा लेनेसे न तो स्त्री द्वारा ग्राम हवन करा लेनेका सिद्धान्त स्थिर किया जा सकता है; और न ही ' पुरुष स्वयं हवन किया करें का खण्डन किया जा सकता है । अपवाद - शास्त्र कहीं - कहीं हुम्रा करते हैं; उत्सगं ( सामान्यशास्त्र ) को कभी बाधित नहीं किया करते । क्योंकि - अपवाद वचनकी उत्सगंको छोड़कर ही ' व्यवस्थिति शास्त्रों ' में प्रसिद्ध है । पतिके सामर्थ्य होनेपर फिर पत्नीका स्वातन्त्र्यसे हवनका अधिकार नहीं हुआ करता । तब वादीसे उद्धृत उक्त वचन ऐकदेशिक ही है; क्योंकि इससे पूर्व
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२२० j श्रीसमातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सूत्रमें कहा गया है— ' एवमत ऊर्ध्वं गृह्यनौ जुहुयाद् वा हावयेद् वा ' ( ११३११४ ) अर्थात् पुरुष ही स्वयं सदा सायं प्रातः हवन करे । अपनी सामर्थ्य में तब ' हावयेद् वा ' यह विकल्प रखा गया है । इसलिए भाष्यकार श्रीचन्द्रकान्त तर्कालङ्कारने भी लिखा है - ' जुहुयाद् वा, स्वयम-सम्भवश्चेद् हावयेद् वा पुत्रादिभिः असम्भवश्चेत् ' । असम्भव वा सम्भवके विषयमें ' कर्मप्रदीप ' में कहा है- ' सूतके च प्रवासे च अशक्तौ श्राद्धभोजने एवमादि - निमित्तेषु हावयेदिति योजयेत् ' ( कात्यायन-स्मृति २४१४ ) अर्थात् परदेस में होनेपर अथवा अशक्ति आदि निमित्तमें ' हावयेत् ' ( हवन करवा ले ) यह पक्ष भी रखा जाता है । इस प्रकार यह तुल्यबल विकल्प नहीं है, बल्कि यहाँ व्यवस्था है; सम्भव होनेपर स्वयं हवन करे; असम्भव होनेपर दूसरेसे हवन करवा ले । जैसे कि - न्यायदर्शनमें भी कहा है- ' प्रशक्तो विप्रमुच्यते इत्येतदपि नोपपद्यते । स्वयमशक्तस्य बाह्यां · शक्तिमाह ' - ' अन्तेवासी वा जुहुयाद ब्रह्मणा स परिक्रीतः, क्षीरहोता वा जुहुयाद् धनेन ६० ) यह प्रमाण वात्स्यायन भाष्यमें दिया गया है पूर्वपक्ष ( ज ) - ' इमं यज्ञं सह पत्नीभिरेत्य ' मन्त्रमें पत्नियोंके साथ यज्ञविधान स्पष्ट है; तब भी सिद्ध हुआ । उत्तरपक्ष - यहां पूर्वपक्षी लोग उक्त मन्त्रके देते हैं । वह यह है कि- ' यावन्तो देवाः तविषा स परिक्रीतः ' ( ४ | १ | । ( श्र. १६५८।६ ) इस स्त्रियोंको वेदाधिकार अन्तिम प्रशको छिपा मादयन्ताम् ' ( अथवं. १६५८१६ ) यहाँ देवता तथा देव - पत्नियोंको हव्य देना कहा है । ' देवयोनिरन्यो मनुष्ययोनिरन्य: ' ( शतपथ ७ | ४ | २ | ४० ) यहाँ देवता तथा मनुष्योंकी भिन्न - भिन्न योनि बताई गई है । तब उससे मनुष्योंको अधिकार कुछ भी सिद्ध न हुआ । क्योंकि - योनिभेद होनेसे दोनोंके अधिकार समान सिद्ध नहीं हो सकते । देवताओंके सभी प्राचरण अनुकर्तव्य नहीं हो सकते । पुराणों में देवोंके जो चरित्र बताये हैं, वादी स्वयं उनकी शिकायत कुछ अन्य प्रश्न [ २२१ करते हैं । फिर भी पूर्वपक्षियोंका ही अर्थ मानकर भी उस पर विचार किया जाता है । यह हम भी मानते हैं कि पत्नी यज्ञ में पतिके साथ बैठी रहती है । जब सीता वनवास में थी; और भगवान् रामने अश्वमेध हो सम यज्ञ किया; तव पत्नीने भी उनके साथ बैठना ही था; क्योंकि - पत्नी यज्ञके ' थ सयोगमें ही होती है । पर सीताके वहां उपस्थित न होने से वहाँ पर दि सोनेकी सीताको बैठाया गया; जैमेकि रामायणमें कहा है-' न सीतायाः पराँ भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे - यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ' ( वाल्मी. ७ ६६ ७ ) यही बात कात्यायनस्मृतिमें भी कही है - ' रामोपि कृत्वा सौवर्णी सीतां पत्नीं यशस्विनीम् । ईजे यज्ञैर्बहुविधैः सह भ्रातृभिरच्युतः ' ( २०१० ) अब सोनेकी सीताने न तो वेदमन्त्र बोले, और न आहुतियाँ डालीं, फिर भी यज्ञकी पूर्ति नानी गई । इस प्रकार स्त्री भी पतिके साथ सोनेकी पुतली की तरह बैठी रहती है, इस उसका पति ही यज्ञ करता है, और मन्त्रादि पढ़ता है । परन्तु फल पत्नी-' अ को भी मिलता है, इसलिए सिद्धान्तकौमुदीमें श्रीदीक्षितने ' पत्युर्नो तब यज्ञसंयोगे ' ( ४।१।३३ ) सूत्रके उदाहरण ' वसिष्ठस्य पत्नी ' में लिखा है-' तत्कर्तृ ' क - यज्ञस्य फलभोक्त्री ' यह अर्थ स्वीकृत किया है कि यज्ञ करते हैं पति वसिष्ठजी; और उसका फल भोगती है उनकी पत्नी भी । क्यों न वह भोगे? वह घी देख देती है, साफ कर देती है । समिधाएं काट देती है । उठने - बैठने प्रादिका कार्य वही कर देती है, किन्तु ग्रन्थिवद्ध उसका वस्त्र उसका वहाँ प्रतिनिधि बना ही रहता है । पढ़ महाभाष्य में भी कहा है- ' सर्वेण गृहस्थेन पञ्च महायज्ञा निर्वर्त्यः को ( सभी गृहस्थी पुरुषों को पञ्च महायज्ञ करने पड़ते हैं । ) यच्च प्रात- कार्य हमचरु पुरोडाशान् [ पतिः ] निर्वपति, तस्य [ तन्निर्वाप फलस्य ] प्रसौ वृण [ पत्नी ] ईष्टे ' ( सो पति जो हवि श्रादि डालता है, पत्नी भी उस फलकी स्वामिनी होती है । ) कर
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२२१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २२२ ] यही ' प्रदीप ' में श्रीकैयटने भी कहा है- पति - शब्दार्थस्य यज्ञसंयोगे इति विशेषणम् । पत्न्याञ्च दुम्पत्योः सहाधिकारात् कर्तृत्वात् तत्फल-हो यज्ञसंयोगः ' । इसी प्रकार उद्योतमें श्रीनागेशभट्टने भी कहा है-यज्ञ सम्बन्धाद् यज्ञफलस्वर्ग ' - भोक्तत्वांच्च यज्ञस्वामित्वं भार्याया बोध्यम् । सहाधिकारा-के दिति - ' मदभिलषितसाधनत्वान्मदर्थं कर्म ' इत्येवंलक्षणोधिकारो भायया पर अप्यस्तीति मीमांसायां स्पष्टम् ' वही पूर्वोक्त भाव है । मीमांसामें भी वही हमारा पक्ष है । ( प्रश्न ) ' अग्नये स्वाहा - इति सायं जुहुयात्, सूर्याय स्वाहा इति प्रातः तूष्णीं द्वितीये उभयत्र । ' प्राभिराहुतिभिर्जुहुयात् स्त्री प्रातश्च सायं च । ' ( आश्वला.ट. ११६८-६ ) यहाँ स्त्रीका भी हवन कहा है ' । ( उत्तर ) यह पहला उद्धरण आश्वलायनगृ ( ११1८ - ९ ) में है । इसका उद्धरण व्यर्थ है । यहाँ स्त्रीका नाममात्र भी नहीं है । और फिर ' अग्नये स्वाहा, सूर्याय स्वाहा ' आदि वेदभिन्न भी मन्त्र हुआ करते हैं । तब इससे स्त्रीका वेदाधिकार सिद्ध नहीं होता । यह स्मातं कर्म हो जाता है । स्त्रीको उसका निषेध नहीं । दूसरा उद्धरण प्राश्व.गृ. १।६।२ में नहीं है । अतः वादीकी कल्पना मिथ्या है । क्योंकि १२६२ सूत्र तो ' नित्यानु-न गृहीतः स्यात् ' यह है । वह वादीके पक्षका पोषक नहीं है । तव देती ' आभिराहुतिभिर्जुहुयात् स्त्री ' यह वाक्य वादीका बनावटी सिद्ध हुआ । सका इसपर यह भी जानना चाहिये कि स्त्रीका वेदाध्ययन व मन्त्र पढ़नेका औत्सर्गिक - अधिकार तो कहीं भी नहीं कहा गया है । जहाँ पर दर्याः कोई इस प्रकारका वचन मिलता है, वहाँ पर ऋत्विक् वा पुरोहित उसका त- कार्य सम्पन्न कर देते हैं । मनुस्मृतिमें कहा गया है - ' पुरोहित च कुर्वीत प्रसो दृणुयादेव चर्त्विजम् । तेऽस्य गृह्याणि कार्याणि कुर्युर्वेतानिकानि च ' नकी ( मनु. ७।७२ ) ऋत्विक् वा पुरोहित राजाके अनवकाशवश स्मार्तं कर्म कर दिया करते हैं; और फल राजाको मिलता है, यह स्वा.दःने माना है, ' पुरोहित और ऋत्विक् राजाके अग्निहोत्र और पक्षेष्टि आदि सब राज-कुछ अन्य प्रश्न | २२३ घरके कर्म किया करें; और राजा आप सर्वदा राजकर्ममें तत्पर रहें ( स.प्र. ६ पृ. ९ १ ) वैसे ही अनधिकारवया श्रौत्सर्गिकतामें निषिद्ध भी स्त्रीके श्रौतकर्म, कहीं प्रावाद होनेसे वचन बलसे निपादस्थपतिके य़ाजनकी तरह ऋत्विक् - पुरोहित सम्पन्न करते हैं, और उसका फल स्त्रीको होता है । जैसे निषादस्थपतिके यन्त्राधिकारका श्रोत्सगिकनामे निषेध होने पर भी वचन -वलसे अपवादरूपसे कहा गया यजन ऋत्विक वा पुरोहित सम्पन्न कर दिया करते हैं; ऐसा स्त्रीके विषयमें भी जान लेना चाहिये । ( प्रश्न ) ' यत्र नारी अपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते ' ( ऋ. ११२८१३ ) इस मन्त्रके भाष्य में लिखा है- ' जिस कर्ममें पत्नी शालासे निकलना तथा शाला में घुसना सीखती है, यहाँ नारी वेदसे विहित इन विधियोंका अभ्यास करे | यह लिखा है; तब नारियोंके इस वैदिक अधिकारको कौन हटा सकता है? ( उत्तर ) यहाँ नारीका वेदाभ्यास कहीं भी नहीं कहा । यहां तो शालामे जाना तथा निकलना कहा है । ( प्र. ) ' अभ्यास- प्रयोज्यांश्च चातुः पष्टिकान् यात् कन्या रहसि एकाकिनी अभ्यस्येत ' ( वात्स्यायन कामसूत्र ३।१२ ) यहाँ ६४ कलाओंका लड़की द्वारा एकान्तमें अभ्यास करना कहा है । ( उत्तर ) इसमें स्त्रियोंके वेदाधिकारकी कुछ भी चर्चा नहीं है । प्राप उन्हें नाचना - गाना भले ही सिखा दें; पर इससे स्त्रियोंका वेदाधिकार कुछ भी सिद्ध नहीं होता । जो कि प्रश्वला.गृ. ( ५४ ) में मैत्रेयी आदिका नाम ३१४१४ सूत्रमें कहा है, यहाँ तो गार्गी वाचक्नवी आदि स्वर्गीय स्त्रियोंका तर्पण कहा है, जिसे दाहिने कन्धे पर जनेऊ करके पुरुषोंको करना पड़ता है । इससे मृतक श्राद्धकी सिद्धि होती है । उससे वादियोंका साम्प्रदायिक सिद्धान्त कटता है | यहाँ यह भी नहीं लिखा कि यह वेदमें अधिकृत थीं? अथवा स्त्रियोंका वेदाधिकार प्रोत्सर्गिक होता है - यह भी यहां नहीं लिखा ।
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२२४ ] श्रीमनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पूर्व. ( झ ) कालगतिके अनुसार पुरुषोंनें नारी विरोधिनी वृत्ति जारी हुई कि - प्रसिद्ध भक्त तुलसीदासको भी यह कहना पडा- ' अधम ते अधम अधम अति नारी ' और ' ढोल गंवार शूद्र पशु नारी । ये सब ताडन के अधिकारी ' क्या यही पुरुषोंकी महानुभावता है? क्या इसीसे वे सर्वश्रेष्ठ होना चाहते हैं? कृतघ्न होते हुए भी अपने - आपको वे सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? तुलसीदास उपस्थित होकर बतायेंगे कि - सांसारिक विषय-वासना क्या में डूबे हुए उनका उद्धार उनी स्त्र के सिवाय और कौन कर सका, जिसने उन्हें शिक्षा दी थी- ' प्रस्थि- चर्ममय देहु मम तामें जैमी प्रीति । ऐसी जो कहुं राममें होति न तो भवभीति ' उस देवी की क्या यही कृतज्ञता गुसाई ' जीने की कि सारी स्त्री जातिको ताडनाका अधिकारी बनाकर मातृजातिका अपमान किया । ( एक शास्त्रिणी कुमारी ) ( उत्तर ) गो. तुलसीदासने अपने ' मानस ' के आधारभूत साहित्यके-लिए लिखा था-‘ नानापुराणनिगमागम - सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि । ... भाषा - निबन्धमति मञ्जुलमातनोति ' ( १।७ ) ' मानस ' में हमने नाना -पुराण, तथा वेद एवं शास्त्रों तथा कुछ अन्य साहित्यको भी अपने ' मानस ' का आधार बनाया है । यदि यह बात सिद्ध हो जावे; अपने उत्तरदायित्वसे उन्मुक्त हो प्रक्षेप्तानोंको याद रखना नहीं हुआ करते; श्रतएव वेद में पुंसवन संस्कार माना गया है; ' पुमांसं पुत्रं जनय ' ( अथवं. ( अ. ३।२३।२ ) ' जायमानं मा मन्त्रोंमें पुत्रोत्पत्तिकेलिए कहा है जायेंगे । चाहिये कि स्त्री - पुरुषके पुत्रमें पक्षपात दिखलाया जिसमें कुछ मन्त्र देखिये-३ । २४ । ३ ) ' आ ते योनि पुमांसं स्त्रियं क्रन् ' ( प्र. । तब गोस्वामीजी अधिकार समान गया है । तभी गर्भ एतु पुमान् ' ८।६।२५ ) इन स्वा.द.जीने भी कन्या की अपेक्षा पुत्रकी ही प्रधानता मानी है । कुछ अन्य प्रश्न [ २२५ २२ तभी ता कन्याएं बहुत होनेपर और पुत्र सर्वथा न होने पर आज्ञा दी हैं ( स. प्र. ४ पृ. ७३ ) इस प्रकार जब वेदोंमें शास्त्रों नियोगकी स्त्रि • वादियोंके सम्प्रदायमें भी कन्याकी अपेक्षा पुत्रमें पक्षपात है, में श्री । वेदव तो समाप्त हो गई I; तंव समानता । भाव वेदादि प्राचीन साहित्य में स्त्रीयोनिको ' पापयोनि ' स्वीकृत एतव गया है । सनातनधर्मी संसारमें यह प्रसिद्ध है कि पुरुष पूर्व किया । भाघ पापोंके कारण स्त्री बनता है । जैसे कि- ' अदुष्टाऽपतितां भार्या जन्म में कई परित्यजेत् । सप्त जन्म भवेत् स्त्रीत्वं ' ( पराशरस्मृ. ४।१६ ). ( यौवने जो पुष वः । यौवनमें श्रदुष्ट और अपतित स्त्रीको छोड़ देता है; वह सात जन्म लो बनता है ) इस प्रकारके शास्त्रोंमें बहुत पाप बताये गये हैं, जिससे काम पुरुषयोनिसे गिरकर स्त्री बनता है । पुरुष वृहद कृष्णयजुर्वेद में कहा है- ' तस्मात् स्त्रियो निरिन्द्रिया अदायादीरपि विशे पापात् पुं स उपस्तितरं वदन्ति ' ( तै. सं. ६५८२ ) इस पर सायणभाष, वादि यह है — पापात् पतितादपि पुंसोपि उपस्तितर - क्षीणतरं स्त्रीस्वयं ताड़ वदन्ति ' । " हाँ स्त्रीको पतित पुरुषसे भी निम्न माना गया है । अब वह बात वैदिक हो गई; उसीका अनुवाद गोस्वामीजीने ' अघससे अधम ' इस ' दुर्जन
चौपाई में दिया है; अब यह पुरुषोंमें काल की गतिके अनुसार स्त्रीविरोधिनी मार्दव
प्रवृत्ति सिद्ध न हुई, किन्तु वैदिक होनेसे त्रिकालाबाधित सिद्ध हुई । चाण
' पि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्या ( वेश्यापुत्राः ) तथा शूद्राः तब ( गीता १३२ ) इसे वादिप्रतिवादिमान्य गीताके वचनमें भी स्त्रीचे पापयोनि माना गया है । उसका रहस्य यह है कि पुरुष गत जन्ममें पाला बहुतसे पाप करनेसे ही पुरुषत्वसे गिरकर स्त्री बनता है । इस विषय में हम अन्यत्र बहुत कुछ लिख चुके हैं कि वेदोंके स्त्रीके शिला विषय में क्या भाव हैं । एक आदर्श अन्य भी देख लीजिये- ' न वे स्त्रैणानि उसके सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता ' ( ऋ. १०१ ६५।१५ ) यहाँ बाहर स ०६० १५. अच्छा यह स