सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 141–150

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 141–150

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ २२५ ) २२६ / नियोगकी हृदयको भेड़िये वा गीदड़के हृदयके समान कहा है । यह भाव स्त्रियोंके में और हैं । पुराणों में उन्होंका अनुवाद है । अतः ' कालगतिसे स्त्री - विरोधी वेद समानता स्वार्थियोंने पुराणादिमें प्रक्षिप्त कर दिये यह आक्षेप गलत हैं । भाव एतदादि कारणोंसे स्त्रीकी ताड़ना कही गई है । इसमें भी मौलिक किया प्राधार वेद ही है । देखिये--म में कई ' इन्द्र! जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियम्! मायया शाशदानाम् ' वनेयः जो ( अथवं. ८।४।२४ ) यहाँपर मायावी स्त्रीको भी पीटना कहा है । पुरुष क्रम स्त्रो श्रव ब्राह्मणभागात्मक वेदमें भी देखिये- ' सा चेद् ग्रस्मै न दद्यात् से कामम्, एनां यष्ट्या वा, पाणिना वा उपहत्य अतिक्र मेत् ' ( १४१६ ४१७, पुरुष वृहदारण्यक ६ ( ८ ) ।४।७ ) यहाँपर स्त्रीको छड़ीसे पीटना कहा है । दीपि विशेष इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) में देखिये । स्वा. द. जीने भी अप्रिय-णभाष वादिनी स्त्रीके प्रतीकारार्थ अन्य स्त्रीसे नियोग करना कहा है - यह भी बीस्वत्यं ताड़नाका ही प्रकार है । यह उक्त तुलसीदासके ' ढोल, गंवार ' इस वचनका मुलवचन भी देखिये-इस ' दुर्जनाः शिल्पिनो [ पशवो ] दासा मूर्खाश्च पटहाः स्त्रियः । ताडिता रोधिनी मार्दवं यान्ति न ते सम्मानभाजनम् ' यह वचन गरुड पुराण ( १ | १० | ३१ ) । चाणक्यनीति शास्त्र ( २/४५ ) तथा गर्गसंहिता आदिमें भी मिलता है । शूद्राः तब व गोस्वामीजी पर दोष न रहा । स्त्रीचे सो स्त्री - ताडनके विषयमें भी गोस्वामीजीने अपनी स्त्रीका ही वचन जन्ममें पाला है । क्योंकि- जब गोस्वामीजीने देखा कि स्त्री रामके पथमें काँटा - है । काव्यप्रकाशमें एक पद्य में भी कहा गया है- ' एषा कण्ठतटे कृता खलु स्त्रीके शिला संसारवारां निधौ ' यह स्त्री संसाररूप समुद्र में नहाने गये हुएकेलिए उसके गलेमें बान्धी हुई एक भारी शिला है । यह डुवोनेवाली तो है ही; यहाँ बाहर नहीं निकलने देती; तव उन्होंने पुरुषका स्त्रीसे बहुत लाड़ - प्यार अच्छा नहीं समझा । क्योंकि - ' लालनाश्रयिणो दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः ' यह समझकर उस स्त्रीको ' अस्थि चर्ममय देह ' समझकर उसे ताड़नाका कुछ ग्रन्थ प्रश्न [ २२० अधिकारी लिख दिया । यह तो उन्होंने अपनी स्त्रीकी बात पूरी की । तब इससे भी गोस्वामीजीपर दोष न रहा । उन्होंने इसमें उल्टा स्त्रीकी कृतज्ञता रखी । कृतघ्नता नहीं की । तब उसपर आक्षेप करनेवाला कुमारी खण्डित हो गई । नारीने गोस्वामीजीका उद्धार नहीं किया, किन्तु श्रीरामभक्तिने गोस्वामीजीका उद्धार किया । पूर्व. ( झ ) – हिन्दु संस्कृति के पुनरुद्धारक शङ्कराचार्यने भी स्त्री-निन्दा करते हुए कहा है - ' द्वारं किमेकं नरकस्य? नारी ' । यहाँ नारीको नरकका द्वार बताया गया हैं । ' विज्ञान्महाविजतमोस्ति को वा? नाथ पिशाच्या न च वञ्चितो यः ' यहाँ नारीको पिशाची बताया गया है; और जो उसमे नहीं ठगा गया है, उसे स्वामीने बड़ा समझदार बताया है । फिर कहा है- ' का श्रृङ्खला प्राणभृतां हि ' ( प्राणियोंके लिए बेड़ी कौन है? इसका उत्तर आचार्य शङ्करने दिया है — ' नारी ' । मैं मानती हूँ कि - उन्होंने जैन - बौद्ध मतोंका ह्रास किया, और हिन्दु-जातिका उद्धार किया, परन्तु उनका जन्म स्त्रीके गलेमें फाँसीका फन्दा डालनेकेलिए हुआ । शङ्कराचार्य बतावें कि- मण्डनमिश्र के साथ शास्त्रार्थमें क्या उन्होंने उनकी स्त्री भारतीको मध्यस्थ नहीं माना? और भारती भी जब शास्त्रार्थ किया; तब उसमें निरूत्तर होकर उससे उन्होंने एक महीना प्रवधि नहीं मांगी? देखो शङ्कर -दिग्विजय । इसी स्त्री जातिकी निन्दाके फलस्वरूप ही शङ्कराचार्यकी भगन्दर रोगसे मृत्यु हुई । ( एक शास्त्रिणी कुमारी ) ( उत्तर ) - ' द्वारं किमेक ' आदि शङ्कराचार्यके वचनोंपर विचार किया जावे; तो इसमें कुछ प्रयुक्तता नहीं दीखती । क्योंकि - नारी - कोट बना हुआ पुरुष नरकका ही तो उपार्जन कर रहा होता है । गो. तुलसीदासजी जब तक स्त्री लम्पट बने रहे, तब तक रामभक्ति-में अन्तराय पड़े रहनेसे नरकमें डूबे रहे । उस मोहके हट जानेपर ही उनका उद्धार हुआ । तब नारी नरकका द्वार ही सिद्ध हुई । T

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२२८ ] श्रीनागलोक ( ३-२ ) प्राप्ताको यह भी याद रखना चाहिए कि- श्रीशङ्कराचार्य थे-श्रद्वैत - संन्यासी । तब सन्यासीकेलिए स्त्री स्पष्ट नरकका द्वार सिद्ध हुई । तब वैसा कहनेवाले शङ्कराचार्यकी निन्दा क्यों? श्रीमद्भागवतपुराणमें भिक्षुधर्मनिरूपण में यहां तक कहा है- ' पदापि युवतीं भिक्षुनं स्पृशेद् दारवीमपि ।... स्पृशन् करीव बध्येत करिण्या प्रङ्गसङ्गतः ' ( ११।८।१३ ) संन्यासी लकड़ीकी बनी हुई स्त्रीको भी न हुए; नहीं तो बन्ध जाता है । आर्य समाजके स्वामी दयानन्दजी जब स्वामी विरजानन्दजीके पास पढ़ा करते थे; उस समय एक दिन ध्यानकी दशा में एक स्त्रीने स्वा.द.जी के पैरों पर सिर रख दिया । स्वामीजीने उसके प्रायश्चित्तस्वरूप तीन-दिन उपवास किया । यह सुनकर स्वा. विरजानन्द रोमाञ्चित हो गये " ( श्रीमद्दयानन्दप्रकाश वैराग्यकाण्ड, नवमसर्ग पृ. ५६ पं. २६ ) । ( ञ ) शेष है मण्डनमिश्र के शास्त्रार्थ में उसकी स्त्रीको मध्यस्थ बनाना; इसमें प्राक्षेपिका कुमारीके पक्षकी कुछ सिद्धि नहीं । मण्डनमिश्र-की स्त्री भारती, सरस्वती देवीका अवतार थी । दुर्वासाके शापसे ब्रह्मलोक-से इस भूलोक में अवतीर्ण हुई थी । तो उसमें बिना पढ़नेके भी सब विद्याएं संक्रान्त थीं, इस विषयमें हम इस पुष्पके श्रन्तमें लिखेंगे । उसने दोनोंका शास्त्रार्थं सुना तक नहीं; केवल दोनोंके गलेमें एक - एक दिव्यमाला डालकर अपने घरके कामोंमें लग गई । उन दो मालानों में जिसके पुष्प म्लान हो जाने थे; उनकी पराजय भारतीने बतानी थी । एक दिन ' वह वहाँ फिर आई; और अपने पतिकी मालाके पुष्पोंको उसने म्लान देखा; तो कह दिया कि आपकी भिक्षाका समय उपस्थित गया हैं । दोनोंके शास्त्रार्थमें एक शर्त रखी गई थी, कि इन दोमें जो पराजित हो जावे; उसे विजेताका आश्रम स्वीकार करना पड़ेगा । संन्यासी शङ्कराचार्य जीत गये, सो मण्डन मिश्रको अब उनका श्राश्रम संन्यास ले लेना चाहिये । वही भारतीने तरीकेसे अपने पतिको कह दिया कि-कुछ अभ्य प्रश्न 2 आपका भिक्षाकाल उपस्थित हो गया है । संन्यासीको भिक्षु अर्थात् भाप हार गये; अब संन्यासी बनिये । कहते है अब इस विषयको शङ्कर -दिग्विजय में देखिये- ' एवं विजेतुमनसोर ता विष्टयोस्तां, मालां गले न्यधित सोभयभारतीयम् । ( ८६७ मलिन भावयुपैति कण्ठे, यस्यापि तस्य विजयेतर निश्चयः ) माला क गृहं गतवती गृहकर्मसक्ता भिक्षाशनेपि चरितु गृहिमस्करिभ्याम् स्यात् । उत्त क्र इससे स्पष्ट हैं कि- दोनों के शास्त्रार्थ में उसने कोई प्रत्यक्ष भाग ( दाह ) त और मण्डन मिश्र संन्यासी बननेको तैयार हो गये । नहीं लिए । स का ( ट ) तब भारतीने आचार्य शङ्करको कहा कि यह आपकी विश पूर्ण है; मुझसे शास्त्रार्थ कीजिये । मुझे हराने पर ही विजय होगा । शङ्करस्वामीने स्वीकार किया; और भारती को आपका पू सव अना पराजित कर दिया । बद फिर भारतीने चालाकी की । शङ्कराचार्यपर कामशास्त्र - सम्बन कई प्रश्न कर दिये । संन्यासी होनेके नाते प्राचार्य शङ्करको कामशास्त्रवा कुछ भी ज्ञान नहीं था; अतः वे उत्तर नहीं दे सकते थे; श्रतः उ भारतीसे एक मास की अवधि माँगी । इसमें न तो भारतीका ही ता गौरव था; और न प्राचार्य शङ्करका ही कुछ लाघव था । सच्चाई होनेके नाते यदि श्राचार्यको कामशास्त्रका ज्ञान नहीं था, इससे तो उ स्त्री उनका महत्व ही था । तथापि वे निरुत्तर नहीं हुए । उनने एक माही मोहलत मांगी । क्षी उन्होंने अपने प्रत्माको मृतक श्रमरुक - राजाके शरीर में संक्रान्त लिया; और श्रमरुक - राजा वनकर उनकी स्त्रियोंसे कामशास्त्रका ज विि करके फिर श्रमरुकके शरीरको छोड़ दिया । श्रीर आकर उस कार इह शास्त्रार्थ में भी भारतीको परास्त कर दिया । तब दुर्वासाका शाप पूर सुद a हो जानेसे भारती ब्रह्मलोकको चली गई । इस विषय में हम शहर मा दिग्विजयके कुछ पद्य उद्धृत करते हैं--श्रुत

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २३० ] कहते है ' अथ शारदाऽकृतकवाक् प्रमुखेष्वखिलेषु शस्त्रनिचयेषु परम् । मात्मनि विचिन्त्य मुनि पुनरप्यचिन्तयदिदं तरमा ' ( ९ १६६ ) तुमनसोर जय सोचा कि - शङ्करको जीता नहीं जा सकता ) ' अतिबाल्य एव माला ( भारतीने नियमैः परैरविधुरश्च सदा । मदनागमेष्वकृतबुद्धिरसी | उत्त कृतसंन्यसनो, ही, ( तदनेन सम्प्रति जयेयमहम् ( ६७ ) ( शङ्कर प्रति बाल्यावस्थासे हीं ८/६६ ) ) संन्यासी बने हैं; अत: इन्हें कामशास्त्रका कुछ ज्ञान नहीं होगा । श्रतः लिया । कामविषयक प्रश्न करके मैं इन्हें जीतूं - यह भारतीने सोचा ) । नकी विश ' इति सम्प्रधार्य पुनरप्यमुना, कथनंप्रसङ्गमथ सङ्गतितः । यमिनं आपका सदस्यमुमपृच्छदसौ कुसुमास्त्र ( काम ) शास्त्र - हृदयं विदुषी ' ( ६६८ ) मनापा ( उसने उनपर कामशास्त्र - सम्बन्धी प्रश्न कर दिये । ) ' कलाः कियत्यो वद पुष्पधन्वनः, किमात्मिका: किं च पद समाश्रिताः । चक्षे कथमन्यथा स्थितिः, कथं युवत्या कथमेव पुरुषे ' ( ६ ९ ) । ( वे यही प्रश्न मशास्त्रश थे ) । कालः उसे ' नेतीरितः किञ्चिदुवाच शङ्करो विचिन्तयन्नत्र चिरं विचक्षणः । ही तासामनुक्तौ भविताऽल्प - वेदिता भवेत् तदुक्तो मम धर्मसंक्षयः ' ( ७० ) संन्या ( आचार्य शङ्कर कोई आजकलके संन्यासी स्वा.द. थोड़े ही थे कि उन्हें तो उस स्त्री - पुरुषोंके प्राकर्षण - विकर्षणादिका पूरा ज्ञान होता । सोचने लगे कि-माही मैं उत्तर न दूँ; तो अल्पज्ञ कहलाऊंगा; उत्तर दूँ; तो मेरा संन्यासधर्म क्षीण होता है । कान्त कर ' इति संविचिन्त्य स हृदाऽऽशु तदाऽनवबुद्ध - पुष्पशरशास्त्र इव-का ज्ञान विदितागमोपि सुरिरक्षयिषुनियमं जगाद जगति जयिनाम् ' ( ६७१ ) उसका इह मास - मात्रमवधिः क्रियताम्, अनुमन्यते हि दिवसस्य गणः । तदनन्तरं शाप पूर सुदति! हास्यसि भोः! कुसुमास्त्रशास्त्र- निपुणत्वमपि ' ( ७२ ) ( एक नश मास वा कई दिनोंकी अवधि मांगी ) । ' उररीकृते सति तयेति तयाऽक्रमते स्म योगिमृगराड् गगनम् । श्रुतविग्रहः, श्रुतविनेययुतो दवदभ्रचारमथ योगदृशा ' ( ७३ ) ( आचार्य कुछ ग्रन्य प्रश्न [ २३१ शङ्कर उस समय श्राकाशमें उड गये । श्रर कामशास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके वापिस आकर भारतीको उस विषय में हरा दिया - यह ' दाकर-दिग्विजय ' के १० म सर्गमें स्पष्ट है । तब वादियोंका यह कहना सर्वथा गलत है कि ' यह शङ्कराचार्य वहांसे चम्पत हो गये; प्रौर पुनः बुलानेपर भी यह ' कन्योपनयन - संस्कार ' ( पृ. ५० ) में कहते हुए दयानन्दी प्रसत्यवक्ता सिद्ध हुए 1 प्राचार्य शङ्कर जब कामकला - ज्ञान करके मण्डनमिश्रके पूर्व प्रतिज्ञानुसार प्रत्युत्तर दिया; तब भारतीने स्वयं अपने अवधि लेकर नहीं प्राये । ' ' इन्दुशर्मा ' घर लौटे; पति के साथ अपना पराजय भी स्वीकार किया । देखिये ' शङ्कर- दिग्विजय ' में ( १० म सर्ग ६५-६६-६७ पद्योंमें ) । भारतीने स्वयं शङ्कराचार्यको कहा था- ' त्वया यदावां ( भारतीमण्डनमिश्री ) विजितौ परात्मन् ' ( १०१६८ ) पाठकोंने देख लिया कि यह पूर्वपक्षी कितने झूठे हैं, यह पुस्तकोंके पूर्वापर - प्रकरण छिपा देते हैं । अनुसन्धान न करनेवाली जनता इन्हें सत्यवादी समझ लिया करती है । हमने इस ग्रन्थमाला में इनसे छिपाये हुए अंश सब प्रकट कर दिये हैं । ( ठ ) जोकि पूर्वपक्षिणी कुमारीने कहा था कि - स्त्रीजातिके अनादर-कर्मके फलसे शङ्कराचार्यको भगन्दर हो गया; उससे वे मरे यह बात भी गलत है । फिर गो. तुलसीदास भी भगन्दरसे क्यों न मरे, वे भी प्राक्षेपिका कुमारीके अनुसार स्त्री - निन्दक थे? इस प्रकार कुमारीके वेदाध्ययनको हटानेवाले अन्यान्य स्मृतिकार भी भगन्दर रोगग्रस्त क्यों न हुए? भगन्दर तो बहुत विलासियोंको हुआ करता है, स्त्रियोंसे पृयक् रहनेवालोंको भला वह क्यों हो? स्त्री - निन्दासे तथा भगन्दर रोगसे परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं । यथार्थता यह है कि - श्रीशङ्कराचार्यके जैन - बौद्धादिसे अनेक शास्त्रार्थ हुआ करते थे; उनमें अभिनवगुप्त - नामक एक महाविद्वान्ने जो तान्त्रिक

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२३२ ] श्रीसनातनोः ( ३-२ ) भी था. शङ्कराचार्य शास्त्रार्थमें पराजित होकर उसके प्रतिशोधकेलिए अभिचारक्रिया ( जादू - टोने ) द्वारा शङ्कराचार्यको शारीरिक कष्ट देना सोचा । उसके फलस्वरूप श्रीशङ्कराचार्यके शरीरमें भगन्दर रोगको संक्रान्त कर दिया । उसे प्राचार्य शङ्करके मन्त्रज्ञ पद्मपादनामक शिष्य ने मन्त्र- चिकित्सा द्वारा शान्त कर दिया । इस विषयमें भी श्रीमच्छङ्कर-दिग्विजय में देखिये-' अथ यदा जितवान् यतिशेखरोऽभिनवगुप्तमनुत्तममान्त्रिकम् । स तु तदापनि यतिगोचरं हतमनाः कृतवान् प्रपगोरणम् ' ( हिंसार्थ उद्यम ) ( १६।१ ) स ततोऽभिचचार मूवुद्धिर्यंत शार्दूलममुं प्ररूढरोषः । प्रचिकित्स्यतमो भिषग्भिरस्माद् अजनिष्टाऽस्य भगन्दराख्यरोग़: ' ( १६।२ ) ' तदनु स्वगुरो गंदापनुत्यै परमन्त्रं तु जजाप जातमन्युः । मुहुरार्य-पदेन वार्यमाणोऽप्यरिवर्गेऽप्यनुकम्पिनाऽज्जपादः ( पद्मपादः ) ' ( ३१ ) प्रमुनैव ततो गदेन नीचः प्रतियातेन हतो ममार गुप्तः ( अभिनवगुप्तः ) । ( ३२ ) ( पद्मपादने अपने गुरुका वह भगन्दररोग मन्त्रशक्तिसे शान्त करके उसी रोगको शत्रुमोंपर दया करनेवाले आचार्य शंकरके निषेध करनेपर -भी गुस्से में आकर अभिनवगुप्त में संक्रान्त कर दिया; जिससे वह मर गया 1 ) श्रीशंकराचार्य के ऐहिकलीला - संवरणके समय तो भगन्दर रोगका कहीं गन्ध भी नहीं । वहाँ तो यह कहा गया है ---‘ एवं - प्रकारैः कलिकल्मषघ्नैः, शिवावतारस्य शुभैश्चरित्रः । द्वात्रिंश-दत्युज्ज्वल कीर्तिराशेः समा व्यतीयुः किल शंकरस्य ' ( १६/६६ ) इति कृत-सुरकार्यं नेतुमाजग्मुरेनं रजतशिखरि शृङ्ग तुङ्गमीशावतारम् । विधि-शतमख - चन्द्रोपेन्द्रवाय्वग्निपूर्वाः सुरनिकरवरेण्याः सर्षिसङ्घाः ससिद्धाः ' ( १६।१०३ ) यहाँ तो देवतानों तथा ऋषियोंका उन्हें लानेको धाना कहा है । उनका कथन यह था-कुछ अन्य प्रश्न [ २३३ ' भवान् श्राद्यो देवः कवलितविषः कामदहन, पुरारातिविश्व प्रभवलयहेतुस्त्रिनयनः । यदर्थं गां प्राप्तो भवमथन! वृत्तं तदायाहि स्वर्ग सपदि गिरिशाऽस्मत्प्रियकृते ' ( १६ १०५ ) यहाँ तदधुना, ग्राह को शिवका अवतार कहा गया है, बुद्धोंके प्रभाव को शंकराचार्य. स्वि उनका अवतरण ' शंकरदिग्विजय ' के प्रारम्भमें बताया दूर करनेकेलिए विश दिव्य वैपर चढ़कर शिवलोकमें गये-- गया है । तव वै । वे ‘ आरुह्योक्षाणमग्र्यं प्रकटितसुजटाजूटचन्द्रावतंसः शृण्वन्नालोद. वेदा शब्दं समुदितमृषिभिर्धाम नैजं प्रतस्थे ' ( १६/१०७ ) इस प्रकार मन्त्र प्राक्षेपिका कुमारीके आक्षेप निरस्त हो गये 1 किस पूर्वपक्ष ( 3 ) - त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पतिवेदनम् ' ( यजुः माध्य पढ़ ( ३।६० ) ' अरिष्टाऽहं सह पत्या भूयासम् ' ( यजुः ३७।२० ) ' ममेदमनुत्रतं. दिवा पति: सेहानाया उपाचरेत् ' ( ऋ. १०।१२६ २ ) ' उतास्मि संजया पत्य मे श्लोक उत्तम: ' ( ऋ. १०।१५ २ ) इत्यादि मन्त्र स्त्रियोंको भी बोलने । पड़ते हैं; इससे स्पष्ट है स्त्रियोंको वेदाधिकार सिद्ध है । जैसे उत्तरपक्ष — यह मन्त्र उन - उन ऋषिकाओं द्वारा समाधिमें दृष्ट हैं । अधि नौर ऋषिकाएं नियत संख्यासे भिन्न नहीं होतीं; और इनमें कई देवस्त्रियां । प्रतिव भी हैं । इसलिए कहीं अपवादरूपसे एतदादिक मन्त्र ' स्त्रीणां विवाहसु समन्त्रकः ' ( याज्ञव. १२/१३ ) इस वचनके बल से - जैसे कि - मृतकश्राह अपने वा अन्त्येष्टि आदि अनुपनीत भी लड़केको ' स्वधानिनयनाद् ऋते ' है । ( मनु. २।१७२ ) इस अपवादवचनसे नियत विशेष - मन्त्र बोलने पड़ते हैं । यह उनके अतिरिक्त वेदका क्रमिक एवं वैध - वेदका अध्ययन नहीं करना पड़ता उच्चा ( मनु. २।१७३ ) वैसे स्त्रियोंके लिए भी यहाँ अपवाद समझना चाहिये, है । श्रीसर्गिक अधिकार नहीं । बोलन इसमें रहस्य यह है कि - ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिक इस स्मृतः ' ( मनु. २२६७ ) इस मनुवचनसे स्त्रियोंका विवाह उपनयन संस्कार दिया स्थानापन्न, उपनयन - संस्कार जैसा हो जाता है; इसीलिए विवाहित तब

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[ २३३ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २३४ ] तिविश्व- - क्षत्रिय - वैश्य स्त्रियाँ भी ' द्विज ' कही जाती हैं; अतः उन द्विज-तदधुना, ब्राह्मण उपनीत सहरा हो जानेसे विवाह या वैवाहिक यज्ञ सम्बन्धी कराचार्य नेकेलिए. स्त्रियोंका विशेष मन्त्रोंपर अधिकार हो जाता है; अतः उन्हें वर वा पुरोहित वा तव प्रध्वर्युके श्राश्रयसे बोल सकती हैं; पर साक्षात् उनका उपनयन न होनेसे वे ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( मनु. २।१७३ ) के अनुसार क्रमसे वैध सम्पूर्ण नालोक वेदाध्ययन द्विजपुरुषकी भांति नहीं कर सकतीं । हाँ, शूद्रकी भान्ति वैदिक-प्रकार उनका सर्वथा अधिकार नहीं हो जाता । कुछ थोड़े - से मन्त्रोंका किसीके सहारे बोल लेना, वा विशेष परीक्षाकी तैयारीकेलिए कुछ मन्त्र पढ लेना - यह वैध एवं क्रमिक वेदाध्ययन उनका नहीं हो जाता । जु: माध्य. दमनुत विवाहित वे तो द्विजसदृश हैं ही; पर जैसे कई अनुपनीत बच्चे प्रविधि-पत्नी पूर्वक बाजारमें सरे - आम गायत्री मन्त्र श्रादि वोलते रहते हैं; कोई भी बोलने उनका नाम वेदाध्ययन नहीं मानता, वैसे यहाँपर भी समझ लेना चाहिये । जैसे शूद्रका सर्वथा वेदमें अनधिकार होता है; वेदके शब्द सुनने का अधिकारी भी वह नहीं रहता; पर विवाहित द्विज- स्त्री शूद्र जैसा इष्ट है । वस्त्रियाँ प्रतिबन्ध नहीं । वाहतु वह उपनीत - कल्प होनेसे उपनीतके कुछ अधिकारोंको; क्वाचित्क-त अपने सम्बन्धी मन्त्रोंको वर वा अध्वर्यु आदिके अवलम्बसे बोल सकती है । पर प्रोत्सर्गिकता ( सामान्यशास्त्र ) न होनेसे केवल अपवाद होने से ड़ते हैं यह वैध - वेदाध्ययनका प्रयोजक नहीं होता । तव वादियोंका स्त्री से T पड़ता । उच्चारणयोग्य मन्त्रविशेषोंके संग्रह करनेका परिश्रम व्यर्थ सिद्ध हो जाता चाहिये, है । क्योंकि – इससे स्त्रीके विशेष स्वसम्बद्ध मन्त्रोंका वर श्रादिके सहारे बोलना ही सिद्ध कर रहा है कि स्त्रीका वेदमें प्रोत्सर्गिक अधिकार नहीं । वैदिक इस विषयमें हम यत्र - तत्र स्पष्टता कर ही चुके हैं । यहाँ निर्देशमात्र कर संस्कार दिया है । बाहिङ प्र. ( ढ ) वैदिक कर्मकाण्डमें कई कार्यं स्त्रियोंकों भी करने पड़ते हैं; तब यदि स्त्रियोंको वेदका अधिकार न हो; तंब वे तत्तत्कर्म कैसे कर कुछ अन्य प्रश्न [ २३५ सकती हैं? ( एक दयानन्दी ) ( उ ) यह प्राक्षेप व्यर्थ है । जैसे हम इस ग्रन्थमें सीता - त्यागके श्रवसरपर प्रदवमेध यज्ञोंमें श्रीराम - द्वारा सुवर्णकी सीताकी मूर्तिका निर्माण कह चुके हैं; वैसे यहाँपर भी समझ लेना चाहिये । न तो उस सोनेकी मीताने कई मन्त्र पढ़े, न ही अग्निमें ग्राहृतियाँ डालीं; तथापि कार्यनिर्वाह हो गया; श्रीराम ही वे वे कार्य करते रहे; वा पुरोहित वा ऋत्विक्-श्रादियों द्वारा वह वह कृत्य कराते रहे; वैसे यहाँपर भी समझ लेना चाहिये | इसलिए पति - पत्नी का ग्रन्यिन्बन्धन किया जाता है । ' वसिष्ठ-पत्नी ' में यज्ञ वसिष्ठ करते रहे; सो वह यज्ञ उनकी पत्नीका भी माना गया, और उसे भी फल प्राप्त हुआ; वैसे यहाँपर भी समझना चाहिये । इसी अवसर पर प्रतिनिधिवाद भी समझ लेना चाहिये । एक अन्य भी दृष्टान्त दिया जाता है । हमारे सामने स्वा. दयानन्दजी की संस्कारविधि पड़ी है । उसमें हम छोटे बच्चोंके संस्कार दिखलाते हैं । जातकर्ममें देखिये - उसमें बच्चेकी जीभपर ' ओ ३ म् ' लिखते हैं, उसके कानमें कहते हैं— ' वेदोऽसि ' ( तेरा गुप्त नाम वेद है ) ( पृ. ५६ ) । ' ओं भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि ' ( पृ. ७० ) यह घृत - मधु चटाते हुए बच्चेको कहा जा रहा होता है । ' मेवां ते देवः सविता मेवां देवी सरस्वती ' ( पृ. ५७-५८ ) इत्यादि नौ मन्त्र बच्चेके कानमें जपे जाते हैं । फिर बच्चेको कहा जाता है- ' अश्मा भव, परशुर्भव, हिरण्यमस्तृतं भव । वेदो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ' ' तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् ' ( पृ. ५६ ) यह मन्त्र बच्चेके बोलनेका था; पर उसे पिता वा पुरोहित बोल देता है । निष्क्रमण में ' अस्मे प्रयन्धि ' मन्त्र वच्चेके कानमें बोला जाता है; इसका भाव यह है कि यह मन्त्र बच्चेके बोलनेका है - ' अस्मे ' का अर्थ है - ' अस्मभ्यम् ' । फिर बच्चेको सूर्यदर्शन कराके ' तच्चक्षुः... जीवेम शरदः शतं ' ( पृ. ५७ ) यह मन्त्र बोला जाता है, जो बच्चेके

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२३६ । श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) बोलनेका है । अब अन्नप्राशनमें देखिये- ' ओम् अन्नपतेऽन्नस्य नो देहि ' ( पृ. ७१ ) यह अन्न खानेके समय बच्चेके बोलनेका मन्त्र ' तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् ' ( पृ. ७६ ) यह भी बच्चेके कर्णवेधमें ‘ भद्र ं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ' ( पृ. बोलनेका मन्त्र है । एतदादिक मन्त्र न तो बच्चा बोल सकता तथापि उसकी ओरसे उसका पिता वा पुरोहित इस प्रकार वैदिक कर्मकाण्डमें स्त्रीकेलिए भी समझ । फिर चूडाकरण में बोलनेका मन्त्र है । ७७ ) यह भी बच्चे के है, न बोलता ही है; बोल दिया करता है, लेना चाहिये । स्त्रीके प्रशिक्षित होनेपर भी बच्चेकी भांति उससे तत्तत् कार्य करा लिया जाता है । बेदमें तो पशुत्रोंके भी कुछ कर्तव्य कहे हैं— ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण अश्वो घासं जिगीषंति ' आदि, तब क्या उसके लिए घोड़े- बैलको भी वेद पढ़ाया जायगा? नहीं, किन्तु बैल प्रादिके स्वामी ही उससे तत्तत् कार्य करा लेते हैं । वेदोंमें मृतक के लिए भी कई कर्तव्य आते हैं, जैसे कि- ' इयं नारी पतिलोकं घृणाना निपद्यत उप त्वा मर्त्य! प्रेतम् ' ( अ. १८।३।१ ) इस विषय में ' आलोक ' ( ८ ) देखो; तब उसके लिए क्या मृतक भी वेद पढ़ना शुरू करेगा? नहीं, प्रतिनिधि पुत्र वा अध्वर्युं ही तत्तन्मन्त्र पढ़ दिया करता है । इस प्रकार स्त्रीके विषयमें भी जान लेना चाहिये । वादियोंके एतदादि प्रश्न प्रत्युत्तरित हो गये । पूर्वपक्ष ( ण ) - ' अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणी वेदपारगा । प्रधीत्य सकलान् वेदान् लेभेऽसन्देहमक्षयम् ' ( महाभा. उद्योग. १०८।१८-१९ ) यहाँपर एक ब्राह्मणीका वेद पढ़ना कहा है- ( घ.दे. ) ( उत्तर ) - यह पद्य पूर्वपक्षीने गलत दिया है । वास्तविक पद्य वहाँ कुछ अन्य प्रश्न [ २३७ यह है - ' अत्र सिद्धाः शिवा नाम ब्राह्मणा वेदपारगाः । श्रधीत्य २३८ वेदान् लेभिरे मोक्षमव्ययम् ' ( महाभारत उद्योगपर्व १०६।१८ सकलान् । पाठ श्रीपाददामोदर सातवलेकरसे प्रकाशित महाभारतमें - १६ ) यह । वाङ्म प्रतीत होता है कि- पूर्व - पद्य में पूर्वपक्षीने पाठ वदलकर अपने पक्षको है । इससे । वेदव करने की असफल चेष्टा की । यहाँ तो ब्राह्मणोंका वेद पढ़ना सिद्ध । किसी विशेष ब्राह्मणीका नहीं । पूर्वपक्षीसे दिये हुए पाठमें एक कहा है, विष्ण है । ‘ अधीत्य सकलान् वेदान् लेभेऽसन्देहमक्षयम् ' इसमें ' प्र त्रुटि भी श्रीर विशेषणका विशेष्य सर्वथा नहीं दिया गया है । इससे स्पष्ट यह पाठ उसक प्रसङ्गत है । इसका सातवलेकरजीने यह अर्थं लिखा है-' इसी दिशा में वेदके जाननेवाले शिव नामक प्रसिद्धः ब्राह्मणोंने सब वेदोंको पढ़कर अविनाशी मोक्षको प्राप्त किया ' । पूर्व. ( त ) - ' सततं मूर्तिमन्तश्च वेदाश्चत्वार एव हि । सन्ति यस्याश्क जिह्वाग्र े सा च वेदवती स्मृता ' ( ब्रह्म. प्रकृति खं. १४।६४ ) यहाँ एक लमान वेदवती लड़कीका वर्णन है, जिसके जिह्वाके अग्रभागमें मूर्तिमान् चार ज्ञान वेद थे । ( ध.दे. ) ब्राह्मण अपना उत्तर - यह वेदवती एक विशेष देवता थी । इसे वहाँ ' कमलांशा जी, श वेदवती कमलायाँ विवेश ह ' ( ६३ ) उसे लक्ष्मी - देवताका अंश माना गया है । इससे मानुषी स्त्रियोंकी वेदज्ञता नहीं बताई गई है । प्रमस वह पैदा होते ही प्रसूतिगृहमें वेद - ध्वनि कर उठी ' सा च भूमिष्ठ अव य मात्रेण ज्ञानयुक्ता बभूव ह । कृत्वा वेदध्वनि स्पष्टमुत्तस्थौ सूतिकागृहे । पर वि ( १४४ ) । क्या सभी लड़कियाँ पैदा होते ही वेदध्वनि कर उठती हैं? पुराण यदि नहीं, तो वह सर्वसाधारण स्त्रीका विषय नहीं । उसीकेलिए । वंरा ' रामायण में लिखा है-- कथन ' तस्याऽहं कुर्वतो ( कुशध्वजस्य ) नित्यं वेदाभ्यासं महात्मनः । विरुद्ध सम्भूता वाङ्मयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मृता ' ( ७ १७१६ ) यहाँ रामा- उपेक्ष भिरामटीका में लिखा है- ' वेदाभ्यासं कुर्वतो महात्मनः तस्य सकाशाद । इस इ दे

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२३७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( २३८ ] सकलान् ३ ) यह वाङ्मयी - वाङ्मय - वेदमूर्तिः कन्याऽहं सम्भूता इसके वेदवती - इति स्मृता । भगवतः शक्तिलक्ष्मीरेव को सिद्ध श्रवतीर्णाः । अस्या वाङ्मयीत्वं सार्वात्म्यात् ३-२ ) । अत एवाऽहं पित्रा नाम्ना रावणवधाय रावणं हन्तुमत्र । अत एव वक्ष्यति- ' पितुर्मे कहा है, इति ( ७।१७।१२ ) इससे वह विशेष देवता होने विष्णुर्जामाताऽभिप्रेत त्रुटि भी मौर मानुषियोंके लिए उसके लक्षण असम्भव होनेसे इससे मानुषियोंकेलिए इस उसका उद्धरण नहीं बन सकता । यह पाठ सब ( २० ) यवनों को देद पढ़ाना? पूर्वपक्ष - दूरदर्शी कण्व ऋषिने मिस्र देशके दस हजार वयनों ( मुस-वस्याश्व लमानों ) को संस्कृत पढ़ाकर यज्ञोपवीत दिया और द्विज बनाकर ईश्वरीय-हाँ एक ज्ञान वेदको सबके लिए देनेका मार्ग ही खोल दिया । अतः दूरदर्शी -चार ब्राह्मणों को शास्त्र - सिद्धान्तानुसार भूमंडलके सभी मानवोंको द्विज बनाकर अपनाना चाहिये ( श्रीशाण्डिल्यजी, ' भारतीय धर्मशास्त्र ' में, श्रीकाव्यतीर्थं मलांशा जी, श्रीराम. ' शुद्धि ' में, श्रीरवि. आदि ) ना गया उत्तरपक्ष - इस भविष्य पुराणके प्रमाणको सभी दयानन्दजी वड़े प्र'मसे दिया करते हैं; और इस इतिहाससे अपना पक्ष पुष्ट किया करते हैं । भूमिष्ठ- अब यह प्रसिद्ध एक प्रामाणिक इतिहास मान लिया गया है । अतः इस-पर विचार श्रावश्यक है । पहले यह स्मरण रखना चाहिए कि- ' श्रुति स्मृति श्री है? पुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रीतं प्रमाणं तु तयोर्द्वधॆ स्मृति-केलिए ' ( व्यासस्मृति १/४ ) प्रर्थात् स्मृति और पुराणके विरोध में स्मृतिका कथन अधिक मान्य हुआ करता है । यदि पुराणका यह इतिहास स्मृतिसे. त्मनः । विरुद्ध है, तो मान्य नहीं हो सकता । ऐतिहासिक धर्मं - विरुद्ध आचरण रामान उपेक्षणीय ही हो जाता है; उपादेय नहीं । तब शाण्डिल्य जीने स्मृतिविरुद्ध काशाद इस इतिहास को उद्धृत करनेका कष्ट क्यों किया? तथापि हम प्रत्युत्तर देते हैं । कुछ अन्य प्रश्न [ २३० वस्तुतः यह इतिहास तो शूद्रोंको वेदाधिकार निषिद्ध कर रहा है । इसे सम्पूर्ण देखनेसे यह बात ज्ञात हो जायगी । ' सरस्वत्याशया को मिश्र देशमुपाययौ । म्लेच्छान् संस्कृतमाभाष्य तदा दशसहस्रकान् । वशीकृत्य स्वय प्राप्तो ब्रह्मावर्ते महोत्तमे । ते सर्वे तपसा देवीं तुष्टुवुस्तु सरस्वतीम् । पञ्चवर्षान्तिरे देवी प्रादुर्भूता सरस्वती । सपत्नीकांदच तान् म्लेच्छान् शूद्र-वर्णाय चाकरोत् ' ( प्रतिसर्गपर्व ४ २२।१६-१७-१८ ) इस भवि. के वचनमें पं ० जीने ' म्लेच्छ ' शब्दसे मुसलमान समझ लिए हैं, यह ठीक T तहीं । क्या सत्व वा त्रेतायुगमें कण्व ऋषिके समय भी मुसलमान थे? ' म्लेच्छ ' शब्द वेदों में भी प्राया है, पाणिनि धातुपाठनें भी ' म्लेच्छ ' श्रव्य-क्तायां वाचि ' [ चु. उ. से. ] म्लेच्छ प्रव्यक्ते शब्दे, अस्फुटे अपाब्दे च ' [ म्वा. प. से. ] | तब क्या वेड, पाणिनि आदि भी मुसलमानोंसे अर्वाचीन मान लिये जाएं? नहीं, ऐसा नहीं । अशुद्ध वा अव्यक्त भाषण करने वाले चाहे ब्राह्मण हों, चाहे क्षत्रिय आदि भी, सभी म्लेच्छ कहे जाते हैं । ' म्लेच्छा मा भूम इत्यध्येयं व्याकरणम् ' इस भाष्यकार के वचनमें ' हम मुसलमान न हो जाएं; अतः हमें व्याकरण पढ़ना चाहिये ' यह अर्थ नहीं हो सकता । ' म्लेच्छवाचश्चार्य-वाचः ' ( मनु. १०।४८ ) यहाँ ' म्लेच्छ वाक् ' कही गई है, सो वह अपशब्द अपभ्रंश भाषा विवक्षित है । नहीं तो क्या मनुके समय मुसलमान थे? श्रीशाण्डिल्यजीके मान्य श्रीसामश्रमीजीने ' ऐतरेयालोचन ' १७-१८ पृष्ठ में लिखा है- ' एवं च अस्मत्शास्त्रकृता ब्राह्मणादि - जातिसंज्ञा तु अस्मा-कमेव | भारतादन्यत्र ब्राह्मणादयस्त्रयो वर्णाः शुद्रम्लेच्छाश्च नैव सन्ति-इति तत्रत्यानां ब्राह्मणादि - जातिभावेन प्रार्यत्वं, शूद्रम्लेच्छत्वेन श्रनार्यत्वं या न किमपि संगच्छते अस्मत् - शास्त्रानुसारतः । तदेवमिङ्गलें डादिदेशानां म्लेच्छदेशत्वं तत्तद्देशीयानां म्लेच्छत्वं च न कथमपि संगच्छते इति प्रणिधा-नेन श्रालोच्यताम् । म्लेच्छदेशाः किलात्र भारते विद्यन्त एव । म्लेच्छा अपि भारतीयेष्वेव केचन । म्लेच्छाचाराश्च प्रस्मच्छास्त्रविमुखानामार्या-

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२४० j श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) णामनार्याणां च भारतीयानामेव, न तु अन्यदेशीयानाम् । सन्ति हि अत्र चिरादेव म्लेच्छाः, म्लेच्छ देशाः, अम्लेम्छानां म्लेच्छाचारनिषेधाश्च " इत्यादि । इस प्रकार ' यवन ' शब्द भी शास्त्रानुसार मुसलमानोंका नाम नहीं, नहीं तो १४ शतक के यवनोंका वर्णन करने वाले सृष्टिकी आदिके मनु और व्यास, पाणिनि आदि पांच सहस्र वर्षोंके ऊपरके मुनि भी मुसल-मानोंसे अर्वाचीन हो जाए, पर यह अनिष्ट है । यवन भी यहाँ कीं धर्मो-ल्लंघक क्षत्रिय जाति ही इष्ट है, यह बात ' इमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणानामदर्शनात्, ( १०।४३ ) इस मनुवचनसे स्पष्ट है, urant जाति विशेष इष्ट नहीं, क्योंकि अरब भारतीय देश नहीं । मुसलमान, अरब आदिकी एक अर्वाचीन जाति है । यवन प्राचीन क्षत्रिय जाति है, अतः मुसलमान मौहम्मद जाति हैं, यवन - जाति नहीं । तब काश्यपमुनिने उन म्लेच्छों में जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र अव्यक्तभाषी वा अपशब्दभाषी मिश्रित थे जिससे उस भारतीय देशका नाम ' मिश्र ' देश था, मिस्र नहीं, उनको सरस्वती ( संस्कृतभाषाधिष्ठात्री ) देवताकी प्रज्ञासे संस्कृत वाणी सिखला कर ( २१।१५ ) उनको पृथक्-पृथक् कर दिया । अर्थात् शूद्र, वैश्य आदि अलग - अलग कर दिये गए । तब उनसे स्वस्ववर्णकर्म कराये गए । महाभारतमें ' मिश्रक ' नामक तीर्थका उल्लेख है । चरकने ' मिश्रक-स्नेह ' नामकी एक ओषधि बताई है । पाणिनीय धातुपाठमें ' मिश्र सम्पर्के ' ( चु. उ. से. ) धातु भी प्रसिद्ध है । अतः यह भारतीय देश है । विलसन यदि अनुसन्धाताओंका अनुमान है कि भारतीय ' मिश्र ' उपाधिधारी ब्राह्मणोंने प्रतिप्राचीनकालमें अफ्रीका के किनारे उपनिवेश स्थापित किया था, इसीसे ' मिश्र ' देश बना । अस्तु, भारतके ब्रह्मावर्त आदि भागों से जहाँ श्राचारशिक्षा दी जाती थी- दूर बस जानेसे कालक्रमसे वे मिश्रित ब्राह्मणादि अपनी संस्कृतभाषाको भुला बैठे और समान आचार - विहार यवनोंको वेद पढ़ाना वाले होकर अपशब्द भाषण करते हुए ' म्लेच्छ व्यवहृत होने कण्वमुनिने ब्रह्मावर्तसे आकर उन्हें संस्कृतभाषा सिखाई, और उन्हें अपने अपने वर्णमें प्रतिष्ठित किया, और मुनिने उन्हें शिक्षा बशमें किया । तब वे स्वयं अपने ब्रह्मावर्त देशनें आगए । पं ० जीके इष्ट श्लोक यह हैं- ' मित्र देशोद्भवा म्लेच्छाः [ २४१ २४ लगे । तब सरस्वतीने देकर अपने I काश्यपेनैव शासिताः । संस्कृताः शूद्रवर्णन ब्रह्मवर्णमुपागताः! शिखासूत्रं वह पठित्वा वेदमुत्तमम् । यज्ञैश्च पूजयामासुर्देवदेवं शचीपतिम् ' ( समाधाय इस पं.जीने इन श्लोकोंका न तो पूर्वापर- प्रकरण देखा; न उन्होंने २०७२-७३ यह जांच- ) ने का कष्ट किया कि वह वहाँका सिद्धान्तपक्ष है या पूर्वपक्ष? इन पद्यों श्री को श्रार्यसमाजी लोग उपस्थित करते हैं । श्रतः उनकी देखा - देखी श्री- यह शाण्डिल्यजी ने भी इन पद्योंको विना देखे - भाले उद्धृत कर दिया । श्रव प्रक हम वह प्रकरण उद्धृत करते हैं, जिससे पं ० जीके इष्ट - पद्योंका वास्तविक का श्राशय ज्ञात हो । शा कर बात यह है- जब कण्वमुनि मिश्र देशसे ब्रह्मावर्त में चले भाये, कर तब कण्वके ही कई शिष्य ऐसे भी निकले, जो मुनिके जाते ही शूद्र होते हुए भी स्वेच्छासे ब्राह्मण बन बैठे, वा ब्राह्मणों में घुस गए ( २१/७२ ) और अपनी धींगाधींगीसे चोटी जनेऊ धारण करके, जैसे आजकल के कई मुसलमान प्रार्यसमाजकी कृपासे शूद्र होकर भी धर्मपाल आदि बन गय कर, शिखासूत्र धारण कर वेद पढ़ने और यज्ञादिके लिए तैयार हो जाते पर हैं, वैसे वे म्लेच्छ ( अपशब्दभाषी ) भी कण्वसे शासित और संस्कृत से ( शुद्ध वाणी बोलनेवाले ) बन कर बलिदैत्यकी प्रेरणा से ब्राह्मणोंमें बुख कर उनकी भाँति शिखासूत्र रख यज्ञोंसे शचीपति इन्द्रका पूजन करने लगे, था जो उनकी अनधिकार चेष्टा थी । उस समय कण्वमुनि स्वर्ग में थे, मतः उन्हें उनका भय नहीं था । यही वे पद्य हैं जिनका पता पं ० जीने पृ. ८६ की टिप्पणी में दिया । स ० भ ० १६

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२४१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २४२ ] तब वतीने - उन शूद्रोंने जो वेदादि ग्रहण किया, तथा यज्ञ करके इन्द्रकी पूजा की, अपने म तो भविष्यपुराणकारको यह इष्ट है, न यज्ञ के देवता इन्द्रको यह बात इष्ट थी, न भगवान् विष्णुको, क्योंकि यह दैत्यमत था, देवमत नहीं । पनव वह बलिवैत्यके इशारेसे देवताओंको प्रतृप्त निस्तेज करनेका प्रकार था । धाव इससे यज्ञके देवता इन्द्रको दुःख हुआ । उसने श्रीजगन्नाथजी को यह बात -७३ ) कही । तब भगवान् ने बुद्धावतार धारण कर उन शूद्रोंसे वेद छीन लिये; श्री मुनियोंको दे दिये । वे शूद्रादि बौद्ध बन कर फिर म्लेच्छ बन गए, यह सब इस प्रकरण में स्पष्ट है । मालूम होता है कि पं ० जीने यह सारा प्रकरण स्वयं नहीं देखा, किन्तु वहाँके दो - तीन श्लोक आर्यसमाजी निबन्ध-कारोंकी पुस्तकोंसे उन पर विश्वास करके उद्धृत कर दिये । यदि श्री-शाण्डिल्यजी स्वयं सारा प्रकरण देख लेते, तो इस अपने पक्षका खंडन करने वाले, प्रकरणके पूर्वोत्तर - श्रंशविरहित, दो - तीन पद्योंको उद्धृत न करते! होते. प्रकरण यह है- ' भविष्यपुराण ' के प्रतिसर्गपके ४ र्थखंडके २० २ ) मध्यायमें यज्ञांश नामक ब्राह्मणका जगन्नाथपुरी में जानेका वर्णन दिया लके गया है । उनके साथ दस हजार वैष्णवादि थे ( ३ / ४ / २० / ६७-६८ ) वहाँ बन पर जगन्नाथजी ब्राह्मण - रूप धारण कर उनसे मिले [ ६ ९ ] यज्ञांशने उन-नाते से कहा कि कलियुगका वृत्त सुनाइये ( ७०-७१ ) । श्रीजगन्नाथने उसे कृत सुनाया । पं ० जीके वे इष्ट श्लोक पहले हम लिख ही चुके हैं- यही वृत्त था । वे म्लेच्छ शुद्र जो ब्राह्मण वन कर वेदपाठ और यज्ञ करने लगे, इसमें प्रेरक कण्व मुनि नहीं थे । ' काश्यपेन च शासिताः ' यह ' शासिताः ' प्रतः भूतकालका प्रयोग है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि - जिन अपशब्दभाषियों-को मुनिने शासित किया था, अब वे ही शूद्र होते हुए भी अपने अधिकारसे विरुद्ध ' ब्रह्मवर्णंमुपागताः ' ब्राह्मण बन बैठे, ब्राह्मणोंमें आ घुसे; चोटी - जनेऊ भी उन्होंने स्वयं धारण कर लिये । इसमें इशारा बलिदैत्यका था । जिस देवताका पूजन करते थे, वे इन्द्रदेव भी नहीं चाहते थे कि -यवनोंको वेद पढ़ाना [. २४३ शूद्र लोग जिनका अन्न खाना भी द्विजोंको निषिद्ध है- वेदोंसे मेरा यज्ञ करें । पर इसमें अपने प्रबल शत्रु, दैत्याधिपतिका हाथ देख कर इन्द्रदेवने विष्णु भगवान् की शरण लेना ग्रच्छा समझा । भगवान्को इन्द्रदेवताने वस्तुस्थिति समझाई कि कण्वकी इस लोककी स्थितिमें तो यह शूद्र प्रपनी मर्यादा ( कारुकवृत्ति ) में रहे ( २१:१७ ), पर कण्वके स्वर्ग चले जाने पर इन्होंने बलिदैत्य के संकेतसे मुझे अतृप्त एवं निस्तेज करनेके लिए उक्त चाल चली कि वैदिक यज्ञ करने लगे, पर इन्द्रदेवताने स्पष्ट कह दिया कि शूद्रोंके यज्ञोंसे मेरी तृप्ति नहीं हुआ करती, उसका कारण इन्द्रको इष्ट है कि शूद्रान्त्यज श्रादिका अन देवता भी नहीं खाते । जैसेकि मनुने भो कहा है- ' दवपित्र्यातिथेयानि तत् ( मुद्रा ) प्रधानानि यस्य तु । ना-इन्ति पितृ देवास्तद् ( शूद्रान्तं ) नच स्वर्ग स गच्छति ( ३११८ ) तब उन्होंने निस्तेज होना ही हुआ । जब अन्न ही न खाया जावे तो न तो तृप्ति ही होगी, और न तेज ही बढ़ेगा । तभी त्रिशङ्कु चांडालके यज्ञमें देवता नहीं श्राये विकुको स्वर्ग में भी नहीं आने दिया गया, विश्वामित्रको नये देवता रचने पड़े । यहां तक कि द्विजोंको भी शूद्रोंका अन्न खाना प्रयोग्य है । ' शुद्रान्तं ब्रह्मवर्चसम् ' ( मनु ४।२१८ ) । प.जी अव इस इतिहासके पद्य भी देखें-' दु. खितो भगवान् इन्द्रः श्वेतद्वीपनुपागतः । स्तुत्या मां ( जगन्नाथ ) बोधयामास देवमङ्गलहेतवे । प्रबुद्धं मां वचः प्राह ( इन्द्रः ) शृणु देव! दयानिधे! शूत्र - संस्कृतमन्न च खादितुं न द्विजोऽर्हति । तथाच शूद्रजनि-संयंस्तृप्ति नचाप्नुयाम् । काश्यपे स्वर्गते, प्राप्ते मागधे राजि शामति । मम शत्रुर्वलिदैत्यः कलिपक्षमुपागतः । निस्तेजाश्च यथाहं स्यां तथा वै कर्तुमुद्यतः ' ( ७४-७७ ) । यह कहकर इन्द्रने सुनाया कि- मेरे निस्तेज करनेकेलिए बलिदंत्यने इधर शूद्रोंको ब्राह्मणों में अज्ञात तोरसे घुसा दिया; इधर देवताओंकी शक्ति क्षीण करने के लिए देववाणी ( संस्कृतभाषा ) में परिवर्तन करके उसे प्राकृतभाषाका रूप दे दिया । अब मेरी रक्षा कीजिये ।

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२४४ । श्रीर्गाः ( ६-२ ) को पढ़ाना ' मिश्रदेशोद्भवे म्लेच्छे सांस्कृती ( देववाणी ) तेन संस्कृता ( तस्यां संशोधनं कृतम् ) । भाषा देवविनाशाय दैत्यानां वर्धनाय च । श्रार्येषु प्राकृती भाषा दूषिता तेन वै कृता । अतो मां रक्ष भगवन्! भवन्तं शरणागतम् ' ( ७७-७८-७९ ) । यह सुनकर श्रीजगन्नाथने इन्द्रसे कहा किन्तुम १२ प्रदितिके लड़के भवतार लो, मैं भी अवतार लूंगा । इन शूद्रोंसे वेद छीनकर फिर मुनियों-को दे दिये जायेंगे । वैसा ही किया गया । इनमें विष्णुने बुद्धावतार लिया । सबने वेदनिन्दा प्रारम्भ कर दी । यह वेदरक्षाकी एक नीति थी । इस नीति में फंसकर उन शूद्रोंने बेद छोड़ दिये, वुद्धमत ले लिया । वेद फिर शुद्ध ब्राह्मणों को दे दिये गये । उन ब्राह्मणोंमें जो शूद्र घुस आये थे, वे बुद्ध - नीतिके प्रभावसे उनसे पृथक् होकर बौद्धशास्त्रपरायण हो गये । इस वेदनिन्दासे देवताओंको कुष्ठ रोग हो गया । तब सबने श्रीजगन्नाथका दर्शन कर पापशुद्धि की । वे भविष्यपुराणके पद्य यह हैं-' इति श्रुत्वा तदाहं ( जगन्नाथः ) वै देवराजमुवाच ह । भगवन्तो

दशादित्या गन्तुमर्हन्ति भूतले । श्रहं लोकहितार्थाय जनिष्यामि कलौ युगे ॥

प्रवीणो निपुणोभिज्ञः कुशलश्च कृती सुखी । निष्णातः शिक्षितश्चैव सर्वज्ञः सुगतस्तथा । प्रबुद्धश्च तथा बुद्धः प्रादित्याः क्रमतोऽभवन् । धाता मित्रोर्यमा शो मेघः प्रांशुभंगस्तथा । विवस्वांश्च तथा पूषा सविता त्वाष्ट्रविष्णुको । कीकटे देश श्रागत्य ते सुरा जज्ञिरे क्रमात् ' ( ऋ.सं. ३१५३।१४ ) के मन्त्रोंमें कीकट देशका वर्णन प्राया है । इसीकी व्याख्या निरुक्तकारने ' कीकटो नाम देशोऽनायं निवासः ' ( ६ । ३२ । १ ) लिखी है । ' वेदनिन्दां पुरस्कृत्य वौद्धशास्त्रमचीकरन । तेभ्यो ( शुद्र ेभ्यो ) वेदान् समादाय मुनिभ्यः प्रददुः सुराः । वेदनिन्दाप्रभावेण ते सुराः कुष्ठिनोभवन् । विष्णुदेवमुपागम्य तुष्टुवुवौद्धरूपिणम् । हरिर्योगबलेनैव तेषां कुष्ठमनाशयद् । तद्दोषाद् नग्नभूतश्च बुद्धः स तेजसाभवत् । वौद्धराज्यविनाशाय दारुपाषाणरूपवान् । अह सिन्धुतटे जातो लोकमङ्गलहेतवे । मन्दिरं रचितं तेन ( इन्द्रद्युम्नेन ) तत्राहं ( जगन्नाथः ) समुपागतः २ शुद्धः कलिकाले भविष्यति ' ( भविष्यपुराण ३ / ४ / २०१८० । मां विलोक्य न - ९ १ ) । • इमी वृत्तकी स्पष्टता अग्रिम ३१ वें अध्यायमें कि- ' इति श्रुत्वा वचस्तस्य जगन्नाथस्य धीमतः पुनः की गई है । सह । कृष्प्रचेतन्य तमुवाच प्रसन्नधीः । विस्तरात् तत्कथाँ ब्रूहि यथा वौद्धसमुद्भवः एव २ ) जगन्नाथ उवाच ' स्वर्गते काश्यपे विप्रे ते म्लेच्छाः ( २. दिन समर्चयामासुर्देवदेवं शचीपतिम् ' ( २१।२१ ) पूर्वापर प्रकरणसे शूद्रवर्णकाः । देव है कि काश्यप ( कण्व ) उस समय इस लोकमें नहीं थे जबकि यह सं यज्ञ शुरू कर दिये । यदि वे होते तो अपने शिष्यों को उन रे में चेष्टासे रोकते । इस कारण कण्वके शिष्योंने भी इस अनधि जा उनकी इस लोककी स्थितिमें न करके उनके स्वर्गमें जानेके यह विरुद्ध प्राचार ब्राह तब श्रीशाण्डिल्यजीका ' दूरदर्शी कण्व ऋषिने समय किया । दस हजार यवनाश यज्ञोपवीत दिया, और वेदको सबको देनेका मार्ग ही खोल कहना निजकल्पित है । भविष्यपुराणके इस इतिहाससे दिया प्रक हो रही । बल्कि - शूद्रोंके यज्ञ करनेकी यह बात सिद्ध भ्रम देवता इन्द्रको दुःख हुआ ब्राह्मण योनिमें अवतार जैसे कि-दुःखितो भगवान् श्राहर्तुमिच्छन्तो [ देवाः ] तत्पत्नी जयनी स्मृता । तयोः सकाशात् संजाता चक्रुः शास्त्रार्थमुत्तमम् । समाधितो मुनीन् सर्वान् इस अनधिकार चेष्टासे कर । उन शूद्रोंसे वेद छीननेकेलिए इन्द्रने देवताश्रर थी लिवाकर भेजा । उन शूद्रोंसे उन्होंने वेद खो उस वह इन्द्रः सबन्धुर्जगतीतले । [ शुद्रेभ्यो ] ब्रह्मयोनी ब्रभूविरे । जिनो नाम - द्विजः कविन प्रश कश्यपाद् अदितेरंशाज्जातो तो कीकट - स्थाये । कर प्रादित्या लोकहेतवे । तत्रोष्य वौद्धशास्त्राद्माः सिद्ध वेदान् शुद्रेभ्य श्राहृत्य विशालां प्रययुः पुरी । उसक समुत्थाप्य [ तेभ्यो वेदान् ] ददुः स्वयम् । स्त पं.जी सर्वे सुराः स्वर्गे ततः प्रभृति भूतले । म्लेच्छा बभूविरे बौद्धाः, सबसे अवस बेदतत्पराः । सरस्वत्याः प्रभावेण त मार्या बहवोऽभवन् । तैश्च देवि करन