सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 151–160
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 151–160
पृष्ठ 151
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः- ( ३-२ ) ays ] विलोक्य न काव्यं समर्पितम् । तृप्तिमन्तः सुराश्चासन् त आर्याणां ई भ्यश्च हव्यं । ( भविष्य. प्रतिसर्गपर्व, चतुर्थखण्ड, २१ अध्याय ३२-२६ ) है । बैं सहस्रका: तन्य एव इस प्रकार शूद्रोंसे वेद छीनकर तपोनिष्ठ मुनियोंको दे दिये गये । उस ( २ देवता लोग छोड़कर स्वर्गमे रहने लगे । वे ही शूद्र काः । ई ) नीतिसे वौद्ध बन गये । उन म्लेच्छोंसे भिन्न जो प्रार्य यह सं G देवताओंकी ( ब्राह्मण ) थे, वे वेदोंमें लग गये । सरस्वती की कृपासे उनकी वंशपरम्परा-उन में वृद्धि हो गई । वे देवोंको हव्य और पितरोंको कव्य देने लगे । तब अनधिकार जाकर बलिवैत्यको नीति फेल हो गई । शूद्रों के यज्ञसे अतृप्त देवता श्रब · प्राचार • ब्राह्मणों के यज्ञोंसे तृप्त और तेजस्वी हो गये । मय किया । यवनोंको अतः ' आलोक ' पाठकोंने जान लिया होगा कि - दयानन्दियोंने पूर्वापर-' दिया ' प्रकरणरहित भविष्यपुराणके कई पद्य उद्धृत करके सर्वसाधारणमें कितना सिद्ध भ्रम फैला रखा है कि- श्रीशाण्डिल्यजी जैसे विद्वान् भी उस जालमें फँस सेब कर हानि उठाते हैं । वस्तुत: यह उन म्लेच्छ शूद्रोंकी दैत्यसम्मत नीति दवताश्र थी । देवताओंका पक्ष उक्त श्लोकोंको देनेवाले वादी छिपा दिया करते हैं । वेद छीने । उसका कारण उनका भी दैत्य - पक्षवाला होना है । परन्तु छिपा लेनेसे वह बात छिप थोड़े ही जायगी, अपितु बहुत प्रकट होगी । ऐसे लोग इस अवसर पर उचित वा अनुचित सभी हथकण्डे अपने ] शुद्ध पक्षको सिद्ध करनेकेलिए अपनाते हैं । जब वे इस इतिहासको प्रमाणित कविना कर उद्धृत करते हैं, तो उन्हें इस इतिहासके पूर्वापर तथा निष्कर्ष वा T स्त्राज्ञः सिद्धान्तको भी प्रमाण मानना चाहिए । अन्यथा उसका पूर्वांश मानकर उसके उत्तरपक्षांशको छिपा लेना अपने पक्षको निर्मूल सिद्ध करना है । पुरीम पं.की इस समाजी नीति अपनाने से शोभा नहीं होगी । आशा है-अबसे पं.जी वा ं उन जैसे अन्य वादी, देवताओंको अतृप्त एवं निस्तेज : सबसे करनेवाले दैत्यपक्षका फिर कभी ग्रह नहीं करेंगे । देव ( २१ ) श्रीमध्वाचार्य स्वामीके स्पष्ट प्रमाण (? ) पूर्वपक्ष – ( क ) सुप्रसिद्ध द्वैत मतप्रचारक श्रीमध्वाचार्य ' महाभारत- तात्पर्यनिर्णय ' ग्रन्थ में लिखा है - ' वेदा प्रप्युत्तमस्त्रीभिः स्वामीने चाभिरिहाखिलाः ' ( २६।३७ ) अर्थात् उत्तम - स्त्रियों को कृष्णा कृष्णा-की तरह सम्पूर्ण वेद पढ़ने चाहियें । इसलिए ( द्रौपदी ) ' पण्डिता च पतिव्रता ' ( वनपर्व. २७/२ महाभारतमें द्रौपदी के लिए ' शतपथ ' के ' अथ य इच्छेद् ) ' पण्डिता ' शब्द आया है । लड़की के लिए ' पण्डित दुहिता मे पण्डिता जायेत ' ( १४४ ) १६ ) ' शब्दके प्रयोगसे लड़कियोंका वेदाध्ययन भी सिद्ध होता है । तभी उद्योगपर्वान्तर्गत ' विदुरनीति ' में ' प्रवृत्तवाक् यः स पण्डित उच्यते ' ( २३ ) में वेदादिग्रन्थोंके चित्रकथ.'... ' पण्डित ' कहा गया है । ( एक सिद्धान्तालङ्कार उत्तम वक्ताका नाम १ ९ ४६ में ) सार्वदेशिक- अगस्त ( ख ) ' व्योमसंहिता ' नामक एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थके श्रीमध्वाचार्यने ब्रह्मसूत्रभाष्यमें अनेक वचन स्त्रीणामधिकारं उद्धृत किये हैं । उनमें ' प्राहुरप्युत्तम-तु वैदिके । यथोर्वशी यमी चैव शय्याद्याश्च तथापरा: ' इस वचनमें उत्तम स्त्रियों-- उर्वशी, यमी, शत्री प्रादि प्राचीन ऋषिकायोंका वेदाध्ययनादिमें कालकी अधिकार माना है । ( ग ) उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् ' यह श्रीमध्वाचार्यने १।३।३६ ब्रह्मसूत्रके भाष्य में लिखा ( स्त्रियों का वेदाध्ययन ( पृ. ५३ ) में एक सिद्धान्तालङ्कार है । ) उत्तरपक्ष - ( क ) द्रौपदी मानुषी स्त्री नहीं थी; किन्तु अयोनिजा होनेसे देवकल्प थी । महाभारतके अनुसार तो वह ' इन्द्राणी ' देवता थी । तब श्रीमध्वाचार्यके वचन का यह अर्थ कैसे हो सकता है कि सभी स्त्रियोंको वेद पढ़ने चाहियें । ' उत्तमस्त्रीभि: ' यह ' कृष्णाद्याभि: ' का विशेष्य है, न कि - सर्वसाधारण स्त्रियोंका । अर्थात् द्रोपदी जैसी देवकल्प ( श्रमैथुनयोनि स्त्रियोंका अधिकार उक्त प्राचार्यने कहा है- सर्वसाधारण ) स्त्रियोंका नहीं । मानुषी-
पृष्ठ 152
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वादीने उक्त प्राचार्यके पूर्व श्लोकोंको छिपा लिया है जिससे अर्थ का वस्तुतः अनर्थ होगया है । वहाँ हरिभक्त्यधिकारीका वर्णन चालू है । वे
श्लोक यह हैं — ' परिचर्येव शूद्रस्य वृत्तिरन्येष्वपूर्ववत् ' ( २६।३० )
' वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन । इति श्रुतेरवर्णस्य ज्ञापन-प्राप्तिरेव न ' ( ३४ ) यहाँ शूद्रों तथा श्रवर्णों ( अन्त्यजों ) को ज्ञानका अधिकार निषिद्ध किया गया है । वादी भी ऐसा मानकर अपने स्वामीका ' यथेमां वाचं '... शूद्राय च, अरणाय ' का अन्त्यजोंको वेदाधिकार देनेका अर्थ खण्डित हुआ माने । पर अब बादी कहेगा कि - श्रीमध्वाचार्यको वेदका ज्ञान नहीं । पर वह याद रखे- ' इति श्रुतेः ' कहकर आचार्यंने अन्त्यजोंका वेदाधिकार वेदसम्मत माना है । आगे उक्त प्राचार्यका स्पष्ट वचन सुनिये- ' ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्यैः स्त्रीभिर्वेदान् विनाखिलम् । ( २६/३५ ) इस पद्यको वादीने छिपा दिया था । यहाँ प्राचार्यने स्पष्ट कहा है कि त्रैवर्णिकोंको वेदादिका पूर्ण अधिकार है, परन्तु स्त्रियोंको वेदके बिना शेष सब कुछ जानना चाहिये । जब वेदके विद्वान्, वादीके मान्य, द्वंद्वैतवादी प्राचार्य स्त्रीको वेदका अधिकार नहीं देते; तो उन्हींसे हमारा पक्ष सिद्ध हो गया । शेष जो वादीने उनका ' बेदा प्रप्युत्तमस्त्रीभि: ' वचन दिया है, यह अपवाद है, सामान्य शास्त्र उनका बताया जा चुका है कि स्त्रियां वेद नहीं पढ़ सकतीं । उसका बाध नहीं हो जाता क्योंकि ' नचोत्सर्गस्य अपवादाद्-निवृत्तिः ( योगदर्शन व्यासभाष्य - साधनपाद १३ ) ( अपवादसे उत्सर्ग-सामान्यशास्त्रकी निवृत्ति नहीं हो जाती ) ' नैव ईश्वर आज्ञापयति, नापि सूत्रकाराः पठन्ति प्रपवादेरुत्सर्गा बाध्यतामिति ' ( मिदचोन्त्यात् - सूत्र में ) ( न ही ईश्वर आज्ञा देता है; और न ही धर्मशास्त्री विद्वान कहीं कहते हैं कि - प्रपवादोंसे सामान्यशास्त्रका वाघ होता है; अर्थात् अपवादसे धन्यत्र सामान्यशास्त्र ही रहा करता है ) । तभी महाभाष्य में अन्यत्र कहा है- ' प्रकल्प्य च अपवादविषयं तत श्रीमध्वाचार्य राष्ट प्रमाण (? ) [ २४५ उत्सर्गोऽभिनिविशते ' ( ३।२।१२४ ) प्रर्थात् प्रपवादविषय प्रकल्पित 2 फिर अवशिष्ट अंश उत्सर्ग ( सामान्यशास्त्र ) ही बना रहता है करके ॥ इसी प्रकार ' काव्यप्रकाश ' में श्रीमम्मटभट्टने भी लिखा है- ' विषय - परिहारेण उत्सर्गस्य व्यवस्थिते: ' ( १० म उल्लास ' प्रसङ्गति अपवाद देव अलङ्कार पर ) अर्थात् अपवाद - विषयको छोड़कर शेष सर्वत्र उत्सगंकी । ही व्यवस्था रहा करती है ) । वि निष्कर्ष यह है कि अपवाद किसी सिद्धान्त ( उत्सर्ग ) का खण्डन नहीं करता । वह उत्सर्ग में संकोचमात्र कर देता है । प्रत्येक श्रोत्सर्गिक वचनका अपवाद होता है । सत्य बोलना उत्सगँ है, पर किसीके आप प्रापर बचाने के लिए असत्य बोलना पाप नहीं यह अपवाद है । यदि अपवाद । उत्सर्गका खण्डन कर दे; तब तो ' सत्यमेव जयते ' ( मुंड. ) यह सिद्धान ही न रह जायगा । शास्त्रकारोंने अपवादको केवल इतना ही विधिशास्त्र में ' स्वातिरिक्तत्वेन ' सङ्कोच भर कर अपवादविषयं तत उत्सर्गः प्रवर्तते ' के नियमसे एकवाक्यता हो जाती है । तब कहा जाता है कि छोड़कर सदा सत्य ही बोलना चाहिये । यह किया है । अवसर दिया है कि वह सके । तब ' उत्सृज्य शव उत्सर्ग और श्रपवाद कुछ सीमित अवसरको अन्यत्र भी हमने स्पर ' प यही बात प्रकृतमें भी समझ लेनी चाहिये । व्यवस्था उत्त वेद ( सामान्यशास्त्र ) से ही हुआ करती है, अपवादसे नहीं । वादीसे उद्धृत वचनमें श्राचार्यको उत्तम स्त्रियाँ यह विवक्षित है । ' देव्यो मुनिस्त्रियश्चैव नरादि- कुलजा अपि । उत्तमा इति विज्ञेयाः सन् द्र रप्यवैदिकम् । ज्ञेयमन्यैहरेर्नाम निजकर्तव्यमेव च ' ( ३८-३९ ) प्राचार्यको उत्तम स्त्रियोंसे देवयोनिको स्त्रियाँ तथा ऋषिकाएं झट है । -मागे ' नरादिकुलजा - प्रमि ' में भी आचार्यको वे ही देवता स्त्रिया मनुष प्रादिकी योनि में अवतीर्ण हुई हुई विवक्षित हैं । उसमें उन्होंने कृपा यह ' अन्त
पृष्ठ 153
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ २४ पत करने २५० ] | अपवाद ( द्रौपदी ) असङ्गति देवता ही श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) का उदाहरण दिया है, महाभारतके अनुसार मनुष्ययोनिमें श्रवतीर्ण हुई थी । इससे उन्होंने सकी तो वेदाधिकार नहीं दिया -- उसकेलिए तो लिखा हो विना । ' T खण्डन उक्त वचनमें देवताओं तथा ऋषिकाओं के लिए ' एव शची ( इन्द्राणी ) मानुषी स्त्रीव है - स्त्रीभिर्वेदान् ' शब्द दिया है, नोत्सर्गिक परन्तु ' नरादिकुलजाः ' के लिए ' अपि ' दिया है । उसमें रहस्य यही है कि चीके आप श्रारूढपतिता ब्रह्मवादिनियां - जो मनुष्यों वा पशुपक्षियों में भी हो सकती अपवाद हैं - उन ऋषिकाओं को भी अधिकार है; इस दृष्टान्तसे आचार्यके म.मैं - सिद्धान सर्वसाधारण- स्त्रियोंको वेदाधिकार सिद्ध न हुआ । अपवाद वचनकी उत्सगंमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती । सच्छूद्रोंको भी यहाँ वेदका अधिकार है कि इ निषिद्ध किया गया है । द्रौपदीकेलिए महाभारत में कहे हुए ' पण्डित ' शब्दसे भी वादीका पक्ष मिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि - ' निरिन्द्रिया उत्सृज्य अपवादम ह्यशास्त्राश्च स्त्रियोऽनृतम् ' ( अनु. ४०।११ ) से महाभारत निरिन्द्रिया अवसरको मन्त्राश्च ' ( मनु. ११८ ) में मनु स्त्रीको वेदाधिकार नहीं देते, तंत्र नेस ' पण्डिता ' का ' बुद्धिमती ' अर्थ में पर्यवसान हो जाता है । विदुरनीति में पण्डिताका लक्षण नहीं, पण्डितके लक्षण में भी वहाँ उत्तर वेदका कोई प्रकरण नहीं । विदुरजी शूद्र होनेसे वेदविषयक बात नहीं कहते थे, जैसे कि - ' शूद्रयोनौ अहं जातो नातोऽन्यद् वक्त मुत्सहे ' ( उद्योग-क्षित है । * पर्व ४१।५ ) तब विदुरजीने वैसे उपदेशकेलिए ' ब्राह्मी हि योनिमापन्नः 1:, सन्द सुगुह्यमपि यो वदेत् ' ( ४१।१६ ) ब्राह्मणयोत्युत्पन्न श्री सनत्सुजातको " बुलवाया था । पुंल्लिङ्ग उस पण्डितके लक्षण में स्त्रीका लक्षण इष्ट भा इष्ट है । -नहीं । ' प्रवृत्तवाक् ' के अर्थ में वादीने ' वेद ' शब्द स्वयं प्रक्षिप्त किया है-मनुष मूल नहीं है । शतपथके वचनमें भी ' पण्डिता ' से वेदका अभिप्राय नहीं-नेपा यह हम १२०-२१-२२ पृष्ठमें बता आये हैं । ( ख ) वादीने व्योमसंहिताके पूर्वके पद्य भी छिपा दिये हैं, वे यह हैं-' अन्त्यमा अपि ये भक्ता नामज्ञानाधिकारिणः ' ( यहाँ अन्त्यजोंका केवल श्रीमध्वाचार्यके स्पष्ट प्रमाण ( 2 ) [ २५१ परमात्मा नामज्ञानमें अधिकार बताया गया हैं, वेदादि - ज्ञानमें नहीं ) ' स्त्री - शूद्रह्मबन्धूनां तन्त्रज्ञानेधिकारिता ' ( यहाँपर स्त्री - शूद्रों तथा नीचोंका वेदज्ञानमें अधिकार न कहकर तन्त्रों ( पुराणविशेषों ) के ज्ञानमें अधिकार बताया है । तब वादीका पक्ष कट गया । यही उक्त पुस्तकका सिद्धान्तपक्ष था, जिसे वादीने छिपा दिया । ) ' एकदेशे परोक्ते तु नतु ग्रन्थपुरःसरे ( यहाँ स्त्री - शूद्रको तन्त्रोंका ज्ञान भी परोक्ति- दूसरेके कथनसे कर्तव्य बताया है, ग्रन्थ - पूर्वक पढ़ने में अधिकार नहीं बताया । ) त्रैवर्णिकानां वेदोक्ते सम्यग् भक्तिमतां हरौ ' यहाँ स्त्री - शूद्रसे प्रतिरिक्त तीन वर्णोंका ही वेद अधिकार बताया गया है । इससे वादीका पक्ष कट गया । " आहुरप्युत्तमस्त्रीणां ' में प्रोक्त उत्तम - स्त्रियोंका प्राचार्यप्रोक्त लक्षण हम पूर्व बता चुके हैं । व्योमसंहिताकारने जो उत्तम स्त्रियाँ बताई हैं, उनमें मानुषी कोई भी नहीं, सब देवताएं हैं । श्राचार्य देवताओंको मनुष्यसे भिन्न ही योनि मानते हैं । अतः यह पद्य भी मानुषी - स्त्रीको वेदाधिकार नहीं देता । उनसे कही उवंशी, देवता - अप्सरा है, यमी, यम - देवता की बहन है, शची इन्द्र देवताकी स्त्री है । इनके ॠ.सं. में क्रमशः १०/१६, १०।१०, १०।१५६ सूक्त हैं । इससे वादीकी इष्ट - सिद्धि नहीं । संहिताकार इन्हें स्त्री - विशेष बता रहा है । तभी तो रामा. २।२०।१५ की तनिश्लोकी - टीकामें वैवस्वतमनुकी स्त्री मानवी देवीका अवतार कौसल्याको दिखलाकर उसे यज्ञका अधिकार दिया है, सर्वसाधारण स्त्रीको नहीं । शचीका श्रयं बुद्धिमती स्त्रीमात्र लिया जावे; तो उर्वशी यमी प्रादि मर्ख माननी पड़ेगीं । इन सूक्तोंके इनके अतिरिक्त अन्य ऋषि - देवता नहीं हो सकते, अतः यह सामान्य - स्त्रियोंका विषय न रहा । तब वादिपक्ष भी सिद्ध न हुआ । ( ग ) ' उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् ' यह जो श्रीमध्वाचार्य - स्वामीने लिखा हैं, इससे उन्होंने शूद्रका तो वेदाधिकार निषिद्ध कर ही दिया है; • इससे स्वा.द. द्वारा किये हुए ' यथेमां वाच ' के अर्थका खण्डन कर दिया
पृष्ठ 154
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) गया । क्या यह वादीको स्वीकार है? शेष उत्तम स्त्रियोंके लिए भी उन्होंने वेदमें क्रमिक एवं वैध अधिकार नहीं दिया, किन्तु विशिष्ट, स्वयोग्य ' सपत्नी मे पराधम ' इत्यादि सपत्नी - वाधन आदि कर्मकेलिए कहा है । जैसेकि उनके यह शब्द हैं- ' उत्तमस्त्रीणां तु न शूद्रवत् ' सपत्नी में पराधम ' इत्यादिषु अधिकारदर्शनात् ' । उसका कारण यह है कि उन्होंने भी स्त्रीका शूद्रकी तरह उपनयनाभाव ही माना है । -' संस्कारभावेन [ उपनयनेन ] प्रभावस्तु शूद्रसामान्येन ' कई विशेष-विधियोंका कारण उन्होंने यह बताया है— ' अस्ति च तासां संस्कारः [ उपनयनसदृशः ] स्त्रीणां प्रदानकर्मव [ विवाह एव ] यथोपनयनं तथा ' इति स्मृतेः ' यह ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिक: स्मृतः ' ( २/६७ ) इस मनुवचनका ही अनुवाद है, सो वह उपमा वा दृष्टान्त कुछ बातोंके सादृश्यमें चरितार्थ होता है, सर्वसादृश्यमें नहीं । जैसे कि ' न्यायदर्शन ' में कहा है — ' सिद्ध ' च किञ्चित् साधम्र्म्यादुपमानम् ' ( ५।११५ ) ( उपमा कुछ सादृश्य में होती है. पूरे सादृश्य में नहीं ) श्रीशंकराचार्य महाराजने भी कहा है - नहि दृष्टान्तदान्तिकयोः क्वचित् कंचिद् विवक्षितांश मुक्त्वा सर्वसारूप्यं केनचिद् दर्शयितु ं शक्यते; सर्वसारूप्ये हि दृष्टान्तदान्तिक-भावोच्छेव एव स्यात् ' ( प्र. ३।२२० ) | ( दृष्टान्त - दान्तिकमें कहीं किसी विवक्षित अंशको छोड़कर सर्वसारूप्य कोई भी नहीं दिखला सकता । यदि सर्वसारूप्य हो; तो दृष्टान्त - दान्तिक भावका उच्छेद हो जावे ) । इससे उनका भी सम्पूर्ण वेदमें क्रमिक एवं वैध अधिकार सिद्ध नहीं होता । इसको पहले कई बार स्पष्ट किया जा चुका है । ( २२ ) लौकिक दृष्टिकोण । पूर्वपक्ष — प्रापने शास्त्रीय दृष्टिसे तो यथावत् सिद्ध कर दिया कि-शूद्रों एवं स्त्रियोंको यज्ञोपवीत और वेदका वैध अधिकार नहीं, पर लौकिक दृष्टिसे तो उनको विद्या देना ठीक प्रतीत होता है । वे चाहते भी है, और लौकिक दृष्टिकोण | २५३ उनमें पढ़नेकी सामर्थ्यं भी है, तब क्यों न उन्हें विद्या पढ़ाई जाय? निषेध कदाचित् स्वार्थिजनकल्पित हों । ( कुछ दयानन्दी ) यह उत्तरपक्ष- चाहनेमात्र वा सामर्थ्य मात्रसे किसीका कोई स नहीं हो जाता । श्रीस्वामी शंकराचार्यने ३/४/४० ब्रह्मसूत्रकी अधिकार ला उक्त पूर्वपक्षका उत्तर दे दिया है कि- ' यो हि यं प्रति विधीयते व्याख्या में ना धर्मो, न तु यो येन स्वनुष्ठातु ं शक्यते, चोदनालक्षणत्वाद् धर्मस्य ' । १।३।३४ स तस्य सूत्र की व्याख्यामें श्राचार्यने लिखा है- ' यत्तु प्रथित्वं न तद् असत प्र सामर्थ्ये अधिकारकारणं भवति । सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकार-कारणं भवति । शास्त्रीये- शास्त्रीयस्य सामथ्र्यस्य अपेक्षितत्वात् । दा शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्य अध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात् ' । इसे पहने स्पष्ट किया जा चुका है । तो जब शास्त्रोंने स्त्रीशूद्रों को अधिकार नहीं मा दिया, तो उनकी अपनी इच्छामात्र से उनका वह अधिकार - ग्रहण श्रनधि-कार चेष्टा है । लौकिक दृष्टिकोण से भी स्त्रियोंका यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययनाति में उचित प्रतीत नहीं होते, क्योंकि स्त्रियोंका स्त्रीत्व उन्हें प्राय: अपवित्र प्रत दशामें रखने को बाध्य करता है, जिससे यज्ञोपवीत के नियमोंका पालन उनके लिए कठिन वन जाता है । प्रतिमास रजस्वला होने पर, प्रसवकाल क में तथा नवजात शिशुनों के मलमूत्र प्रादिमें ही स्त्रीका समय व्यतीत होता है । स्त्रीके जिस वक्ष पर ब्रह्मसूत्रको लटकाया जायगा, वह तो धूल-धूसरित, मलमूत्रदिग्धाङ्ग नवजात शिशुका दिन - रात स्तनपानके समय रज क्रीडास्थल बना रहेगा । क्यों न वह उस डोरीके साथ कुतूहलसे किलोल करेगा? फिर पवित्रता कैसी? या उबटनसे खराब होता रहेगा । तब निर्व ' यज्ञोपवीतं परमं पवित्र " कहाँ रहा? न निषेधक स्मृतिकार, सूत्रकार तथा पुराणेतिहासकार आदि उन्मत्त भी नहीं हैं, स्वार्थी भी नहीं । वे सभी पूर्ण वेदज्ञ और सावधान हैं, सेवा- शरी वृत्तिमें लगे हुए वा शीघ्र लगने वालोंके भारको हलका करने वाले होने पढ़ा जात हव
पृष्ठ 155
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२३३ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २५४ ] यह उनको भला स्त्रीके उपनयनादि - निषेध से क्या वैयक्तिक कार लाभ से परार्थी था? हैं । घरका काम कोई साधारण - कृत्य नहीं होता, पुरुष भी उसे यामें नहीं कर सकता । स्वार्थी तो बादी लोग हैं, कि कपड़े भी उनसे घुलवाते तस्य हैं - बीका - चूल्हा भी उनसे कराते हैं, स्त्रियों वाले काम भी उनसे लेते हैं,. १३४ प्रसव उनसे कराते ही हैं, अपने बालक - पालनादि कार्य भी उन्हींसे कराते सति हैं, फिर पढ़ाई का बोझ भी उन पर डालते हैं । पढ़ने - लिखनेत्राः काम कार- दाहिने प्रङ्गका है, वाएंका नहीं । प्रकृतिने स्त्रियोंको अबला बनाया है, क्योंकि पिताके थोड़े शुक्र तथा माता के अधिक रजसे कन्याशरीर बनता है । शुक्र सप्तम धातु होता है, रज तृतीय, अतः रज, शुक्रको अपेक्षा निर्बल होता है । शुक्रसे प्रस्थि श्रादि कठोर तथा शरीरको सबल करने वाली वस्तुएं बनती हैं । कन्याके शरीर में इनकी गौणता तथा रजोमूलक कोमल वस्तुओं की अधिकता होती है । नाति श्रतएव कन्या पुरुषकी अपेक्षा निर्वल प्रकृति - सिद्ध है । तब उन्हीं प्रबला-वित्र के सिर पर वेदादिका भारी भार डालकर वादी लोग उन पर अत्याचार लन करते हैं । परीक्षाओं में उन अबलाओं को सिरतोड़ परिश्रम करना पड़ता है । हर समय अपने वा अपनी छात्राओोंकी उत्तीर्णता वा अनुत्तीर्णताकी ता चिन्ता रखनी पड़ती है, तो अब सोचिये कि अबलाओं का प्रबल परिश्रम, - रजस्वलात्वके समय जबकि तीन दिन एकान्तमें बैठना लिखा है उस समय मय अस्पृश्यताको छिपा कर पढ़ने - पढ़ाने वा परीक्षा देने जाना उनको भीतर से लि निर्बल वा सतत अस्वस्थ - रोगी न कर देंगे? क्या उनकी भीतरी हानि तब न करेंगे? क्या उस परिश्रमका प्रभाव गर्भ अथवा प्रसव एवं सन्तान के त शरीर वा मस्तिष्क पर न पड़ेगा? फिर स्तनन्धयों की पुष्टि क्या होगी? वा. पढ़ाने जाने के समय उन स्त्रियोंके बच्चों का पालन नौकरोंके अधीन हो जाता है | वेतनग्राही नौकर उस वच्चेकी क्या सेवा करेगा? माता वाला हृदय कहाँसे लाएगा? थकी हुई माताका स्तन्य भी बच्चेकी. पुष्टि क्या लौकिक दृष्टिकोण [ २५५ करेगा? इधर खाद्य पदार्थ निम्मार मिलने से बालकोंकी आयु घटेगी वा बढ़ेगी? इसी अक्षरशिक्षा - वृद्धिके फलस्वरूप स्त्रियोंकी लज्जाहानि, प्रावरण-प्रथा त्याग. इधर - उधर जाना, पढ़ानेके लिए ' मा वियोष्टं ' ( अ. १४।११ २२ ) से विरुद्ध पतिविरहित देशमें जाना, अपरिचित पुरुषोंके साथ ग्रामोद-प्रमोद, सदाचार - हानि, मानसिक - पतन आदि बहुत हानियाँ पढ़ती है । वेदाध्ययनार्थ उत्तम ब्रह्मचर्य ४८ वर्षका माना जाता है, तब क्या उनका विवाह रजोधर्मकी समाप्ति पर किया जायगा? यदि २४ वर्ष तक भी वादी उन्हें वेदादि पढ़ाएं; तब भी उनकेलिए पतिको कठिनता या पड़ती है । पति उन्हें उस समय ग्रायुर्वेदके अनुसार ३३ वर्षका मिलना चाहिए । पर वैमा पति या तो पहले विवाहित अव विधुर, अथवा विवाहित सपत्नीक मिलता है । दोनों प्रकारसे पठिताको ही कष्ट मिलता है । यदि २४ वर्ष वाली वह २४ वर्षके पुरुषसे विवाह करे, तो श्रायुर्वेदका व्याकोप होता है । यदि वादी उन्हें १६ वर्ष तक विवाहित करें, तब उनकी वेदविद्या पूर्ण नहीं होती; बल्कि वेदका प्रारम्भ ही नहीं होता; उन्हें पुरुषोंसे न्यून विद्या मिलती है, जिसे वादी पक्षपात मानने हैं । ब्रह्मचर्यमें शुक्रनिरोध करना पड़ता है? परन्तु स्त्री में शुक्र कहाँ है? यदि रज ही शुक्र माना जावे, तो उसका निरोध स्त्रीके बाकी बात नहीं । वह तो १२ वर्षके बाद प्रकृतिके नियमानुसार क्षरित होता रहता है, तो जव स्त्री ' ब्रह्मचारी ' नहीं, इसे हम पूर्व स्पष्ट चुके है । तो उसका उपन-यन और वेदमें अधिकार कैसा? इसके अतिरिक्त स्त्रीके रजको ' पुष्प ' कहा जाता है; उसके प्रकट करने से प्रकृति इङ्गित करती है कि - प्रव इसको फल लगने का समय है । तो प्रकृतिका इङ्गित उसके प्राकट्य होनेसे पूर्व विवाह करनेमें ही होता है, वेदादि पढ़ने - पढ़ाने तथा गुरुकुल भेजनेमे नहीं । यदि उससे बलात् वैसा कराया जायगा; तो उसके मस्तिष्क - तन्तुयोंमें तथा शारीरिक
पृष्ठ 156
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २५६ ] में त्रुटि पड़नेसे उसका दुष्प्रभाव गर्भाधान, प्रसव एवं सन्तान पर स्नायुनों पड़ेगा । उनकी सदाचार- शिक्षा तो इधर स्त्रियोंकी विद्याके प्रचार बढ़ जानेसे हो गई है । फैशन - प्रियता बहुत बढ़ गई है । इधर पुरुषोंसे तिरोहित व्यय बहुत बढ़ गया है । पर - पुरुषोंसे ट्यूशन द्वारा पढ़नेसे पिताओंका मनकी कलुषता बढ़ कर विनोद वा बातचीत प्रादिके अवसर मिल जानेसे भयंकर परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं । अध्यापिकाएं बनकर वे धन इकट्ठा ' ममेयमस्तु पोष्या ' [ अ. १४ । १।५२ ] इस वैवाहिक नियमसे विरुद्ध हो कर कर ' पोषिका ' बन रही हैं । साम्यवाद मानेसे स्वस्वामिभाव वा पाति-हट रहा है, विवाद बढ़ रहे हैं, विवाहोच्छेदोंकी भूमिकाएं तैयार हो -व्रत्य रही हैं । पहलेकी ' गृहपत्नी ' अब अध्यापिकात्वमें परपुरुषोंकी किङ्कर तथा विनोदपात्र बनती हैं । वेतन बढ़ानेके लोभसे वे उनसे प्रस्थानोंमें किये हुए स्पर्शको भी सहन कर जाती हैं, इस प्रकार बढ़ते जानेसे स्त्री अपने-प्रापको दूसरोंके चंगुलमें पड़ा पाती है । यह सब घटनाएं आजकल प्रत्यक्ष हैं, पर अपने अशुद्ध पक्षके सिद्ध होनेके नशेमें इन बातों पर आवरण डाला जाता है । बहुत समय तक पढ़ाई में रखनेसे लड़कियों में कई प्रकारकी कुटेवें उत्पन्न हो जाती हैं, जो कि छात्रास्थानों में उनकी सामग्री की तलाशी में समय - समय पर मिलती रहती हैं । कहना न होगा कि यह सब उन्हें इस विद्या लाईनमें लानेका ही दुर्विपाक है । आचार्य शंकरने ब्रह्मसूत्र ( ३।३।५३ सूत्रके ) के भाष्य में कहा है- ' यो हि यस्मिन् सति भवति, प्रसति च न भवति, तत् तद्धर्मत्वेन ग्रध्यवसीयते ' ( जो बात जिसके होनेपर होती है, जिसके न होनेपर नहीं होती; वह उसीका परिणाम होता है ) श्राजकल ' गर्लस्कूल ' ' गरल ' ( विषैले ) स्कूल सिद्ध हो चुके हैं । हमारे स्मृतिकारोंने जैसे अन्तिम वर्णके अधिकारमें सब वर्णोंका-सेवाधमं सौंपा था, ' सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ' यह समझकर लौकिक दृष्टिकोण [ २५७ शूद्रोंको यज्ञोपवीत तथा वेदाध्ययनके कठोर व्रतसे वैसे उन्होंने स्त्रीके अधिकारमें भी पति तथा सन्तानादि अवकाश दे दिया था भार सौंपा था । वेदका संकेत देखकर उन्होंने प्रसिधारा कुटुम्बको सेवाका यनादिसे उन्हें उन्मुक्त कर दिया था । उसी सेवासे व्रत - सदृश वेदाध्य तथा पारलौकिक सुधार होना था । कोई सामाजिक- उनका सामाजिक होती थीं, पर प्राज उन्हें पुरुषों वाले कार्य दिये जा रहे हानियां भी नहीं आफिस की क्लर्क बन रही हैं, इससे जो हानियां हैं हैं । आज स्त्रियां ऐस अतएव यह अर्वाचीन - शैली हटवा ही, वे लोक प्रत्यक्ष है । हैं, देनी चाहिए । स्त्री प्रकृति है, पुरुष पुरुष है । प्रकृति जड़ होती है । पुरुषकी छाया से सब स्वतन्त्रता से नहीं, इसी प्रकार यहाँ भी स्त्रीके कार्य करती है विषय में समझना चाहिये । यहां तक हमने २२ उत्तरपक्षों में अनेक प्रश्नोंके यह केवल एक - दो व्यक्तियोंका पक्ष नहीं उत्तर दे दिये हैं । श्री हैं, किन्तु सभी श्रार्यसमाजी तथा सुधारकोंका यह पक्ष है, अतः उसका खण्डन आवश्यक था शूज इस विषयकी १५ के लगभग पुस्तिकाओं । इसमें हमने.. एक सं. २००३ में हमारा यह के प्रक्षेपोंके परिहार दे दिये हैं । उप कई विख्यात शास्त्रार्थ ' सिद्धान्त ' पत्रमें हो चुका है; जिसे सनातनधर्मी मोपदेशकोंने उत्तम समझकर वि बिना अपनी पुस्तक में संक्षेपसे दे दिया हमारा नाम लिये था । इसमें हम अपने परिश्रमकी स. सफलता समझते हैं कि उनको भी हमारा परिश्रम पसन्द लोन इस द्वितीयावृत्तिमें श्राया । ' नि भी हमने कई उपयोगी युक्तियाँ वा तर्क देकर इस संस्करणकी उपयोगिता बढ़ा दी है । इसमें वादियोंसे भग प्रसिद्ध प्रमाणोंका हमने समाधान दिये गये विषयके प्रमाण कर दिया है । जो कई अन्य इस वादियोंके द्वारा दिये जाते हों, पाठकगण उन्हें नि बतलावें, जिससे उनका समाधान अग्रिम संस्करण हमें राम में कर दिया जावेगा । अब ऐतरेय महिदास, ऐलूष कवष तथा कक्षीवान् आ शूद्र एवं वेदवक्ता बतलाए आदि वादियों द्वारा लेख जाते हैं, उस पर प्रकाश डाला जायगा । अ ० म ० १७ ' झा
पृष्ठ 157
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ २५७ या २५८ था सेवाका वेदाध्य माजिक श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) 7 ( २३ ) क्या ऐतरेय - महिदास शूद्र थे ( श्राजके युगकी कई ऐतिहासिक भूलें ) पूर्वपक्ष — ' ऐतरेय ब्राह्मण ' के प्रवक्ता श्रीमहिदास ? जबकि शूद्र थे— श्री नहीं ऐसा श्रीसत्यव्रत सामश्रमी, श्रीशिवशंकर काव्यतीर्थं श्रादि विद्वान् मानले स्त्रियां क्ष है, और वे ( ऐतरेय ) वेदके भारी विद्वान थे, तो शूद्रोंका वेदमें अधिकार हैं । सिद्ध हो ही गया । आप शुद्रोंको वेदानधिकारी कैसे मानते हैं? ' पथिक ' रती पुरुष है, ( ' वैदिकधर्म ' ( मार्च १ ९ ५० ) में, एक काव्यतीर्थ तथा एक सिद्धान्ता-क लेना लंकार )! उत्तरपक्ष - निरुतालोचन ' एवम् ' ऐतरेयालोचन ' प्रादिके प्रणेता ये हैं । श्रीसत्यव्रत- सामश्रमीजीने ' ऐतरेयालोचन ' के १३-१४ पृष्ठमें श्रीमहिदासको तथा शूद्र माना है- यह वादीका कथन है । इन्होंके मतको उपजीवित करके हमने.. एक काव्यतीर्थने अपने ' जातिनिर्णय ' पुस्तकमें उसका प्रचार किया । उसे हैं । उपजीवित करके प्रार्यसमाजने ऐसा प्रचार किया कि कई सनातनधर्मी जिसे विद्वान् भी इसी मतको ठीक समझने की भूल करते हैं । इससे वे ( प्रा. लिये स. ) शुद्रका वेदमें अधिकार प्रवाधित मानते हैं । श्रीसामश्रमीके ' ऐतरेया-नमकी लोचन ' ( द्वितीय संस्करण ) का काल सन् १ ९ ०६ है । उनके तथा ' निरुक्तलोचन ' के प्रथम संस्करण में श्रीसामश्रमीजीने १८६० सन्के लग-देकर भग यह बात लिखी होगी । गये सन् १६०७ में प्रसिद्ध आर्यसमाजी एक काव्यतीर्थने अपने ' जाति-इस निर्णय ' २४ ९ पृष्ठमें वही बात लिखी । फिर १ ९ १८ सन् से लेकर श्री हमें रामदेव श्रादि आर्यसमाजियों द्वारा यह बात प्रचलित कर दी गई । गा । श्राश्चर्यका अवसर है कि- इन सबकी आधारभित्ति केवल श्रीसामश्रमीका द्वारा लेखमात्र है । न उन्होंने इस विषय में नूतन प्रमाण दिया न ही कोई मई, प्रभेद्य उपपत्ति ' दी है । तव सामश्रमीके मतके श्रालोचित कर 2 देने पर ' प्रधानमल्ल निबर्हण ' न्यायसे सबका मत आलोचित हो जायगा । ' आलोक ' - पाठक सावधानता से देखें । क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २५६ ( १ ) ' एतद् ह स्म वै तद् विद्वान् ग्राह् महिदास ऐतरेयः ( शदार ) इस ऐतरेयाऱण्यकके अनुसार श्रीमहिदास ' ऐतरेय ' सिद्ध होते हैं । ' छान्दो-ग्योपनिषद् में भी कहा है- ' एतद् ह स्म वै तद् विद्वान् श्राह महिदास ऐतरेयः । स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् ' ( ३११६७ ) यहाँ शाङ्करभाष्यर्मे लिखा है- ' महिदासो नामतः, इतराया अपत्यमेतरेयः ' । ( २ ) ' ऐतरेय ' यह नाम, तथा ' इतराया श्रपत्यम् ' यह उसकी व्यु-स्पत्ति देख कर जो कि प्राजकलके कई सुधारक इस भ्रम में पड गये हैं । कि- महिदास शुद्र था यह ठीक नहीं । वह इतरा नाम वाली स्त्रीका पुत्र था, इतराका नहीं । इसको संस्कृतमें यह कहना पड़ेगा कि - ' स इतरायाः ( इतरानाम्न्याः ) पुत्र ग्रासीद् न खल उतरस्याः ' ( शूद्रायाः ) । ' इतर'-शब्द सर्वनामता में अन्य वा नीच वाचक है, उस ' इतरा ' शब्दका स्त्रीलिङ्गमें ' ङस्में ' इतरस्याः ' प्रयोग बनता ' इतराया: ' नहीं । स्वा. शंकराचार्य महाराजने भी ' इतराया श्रपत्थन ' यही विग्रह किया है, ' इतरस्या प्रपत्यम् ' विग्रह नहीं किया । श्रीसायणाचार्यने भी ' ऐतरेय ब्राह्मण ' की भूमिका ' इतरायाः पुत्रः ' यही विग्रह किया है, ' इतरस्याः पुत्रः ' नहीं । श्रीमामश्रमी-जीने भी ' ऐतरेयालोचन ' तथा ' निरुतालोचन ' में यही [ इतरायाः ] व्युत्पन्ति दिन की है, दूसरी ( इतरस्याः ) नहीं । श्रीसामश्रमीने ' प्रार्यकत्यान मेव उद्वहने यथाविधि वैदिकमन्त्रादीनां व्यवहारः समुचितः तत एव तेषां [ तासाम्? ] पत्नीत्वम्; अत एवोक्त भगवता पाणिनिनापि - पत्न यज्ञसंयोगे ( ४११।३३ ) । इतरस्याः ( शूद्रायाः ) तु अमन्त्रकम् ' ( ऐ. आ. पृ. १२-१३ ) इस अपने वाक्यमें शूद्राकेलिए ' इतरस्याः ' यह सर्वनाम पद प्रयुक्त किया है, सर्वनामत्वरहित ' इतरायाः ' नहीं । तब महिदासकी माता के लिए प्रयुक्त ' इतराया: ' यह सर्वनामसंज्ञारहित पद स्पष्ट ही उसे ' प्रशूद्रा ' बता रहा है । इससे ऐतरेयको माताकी ' इतरा ' यह संज्ञा ( नाम ) सिद्ध हो रही है, शूद्राकी पर्यायवाचकता नहीं । भी ' महाभाष्य ' में कहा है- ' संज्ञोपसर्जने च विशेषे अवतिष्ठेते ( १ ।
पृष्ठ 158
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२० ] Sternersity ( ३-२ ) ११२६ ) । यहाँपर श्रीकैयटने लिखा है- ' सर्वनामकार्यम् अन्तर्गणकार्य च सर्वनामत्वप्रयुक्तानामेव भवति, न तु सज्ञोपसर्जनानाम् ' । इस विषय में ' सिद्धान्तकौमुदी ' में श्रीदीक्षितने भी स्पष्टता की है । जैसेकि - ' संज्ञोप-सर्जनीभूतास्तु न सर्वादयः । महासंज्ञाकरणेन तदनुगुणानामेव गणे संनि-बेशात् । अतः संज्ञाकार्यमन्तर्गणकार्य च तेषां न भवति । सर्वो नाम कश्चित्, तस्मै सर्वाय देहि ' इससे यह सिद्ध हुम्रा कि- सर्वादिगण में पढ़ा हुआ भी शब्द यदि किसी का नामविशेष हो, तो उसकी सर्वनाम सज्ञा तथा तत्प्र-युक्त कार्य नहीं होते । तब ऐतरेयकी माता ' इतरा ' की भी जब ' इतराया अपत्यम् ' इस विग्रह में सर्वनाम - संज्ञा नहीं दीख रही, इससे स्पष्ट हो रहा है कि यह उस का नाम विशेष है, ' शूद्र ' अर्थवाला ' इतरा ' शब्द नहीं । नहीं तो ' इतरस्या-अपत्यम् ' ऐसा सर्वनाम संज्ञा वाला विग्रह होता । पर ऐसा विग्रह किसी भी प्राचीन अर्वाचीन विद्वान्ने नहीं किया । इस प्रकार जव ' इतरा ' यह महिदासकी माताका नाम - विशेष सिद्ध हुआ; तो उसका पुत्र ' ऐतरेय-महिदास ' शूद्र कैसे हो सकता है? ' इतर ' शब्द ' शूद्र ' का पर्यायवाचक भी नहीं । नीचका पर्यायवाचक तो है; परन्तु ' महिदास ' की माता ' इतरा ' मीच थी इस विषय में भी कोई प्रमाण उपलब्ध न होनेसे यह बात भी निर्मूल है । ( ३ ) श्रीसामश्रमीने ' ऐतरेयालोचन ' के १४ वें पृष्ठमें प्रघम जातिकी स्त्रीका नाम तैत्तिरीय और सायणके अनुकूल ' परिवृक्ति ' और ' शतपथ ' के अनुसार ' पालागली ' और निरुक्त के अनुसार ' रामा ' माना है ' इतरा ' नहीं ' । यहाँ जब ' इतरा ' नामविशेष है. और उसके उक्त विशेषण ' परि-वृक्ति आदि कहीं मिले नहीं, तब उसके शूद्रा होनेकी भ्रान्ति हो ही नहीं सकती । ( ४ ) यदि वह ' इतरा ' नाम होनेसे ही शूद्रा मानी जावे, तब तो क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २६१ ' मीमांसादर्शन ' के भाष्यकर ' शबराचार्य ' को ' शवर ' नाम शूद्र वा अन्त्यज ( भील ) माना जायगा? तब तो रामायण होनेसे क्या ' मातङ्ग ' ऋषि भी ' चाण्डाल ' माने जावें । इस प्रकार तो ' में वर्णित के प्रणेता ' द्विज- मुख्यतया कविबंभूव प्रथितः शूद्रक इत्यगाधसत्त्वः मृच्छकटिक ' क ३ ) शूद्रक भी शूद्र मान लिए जाएंगे; पर यह अनिष्ट है । ( १ ) वा तव तो मुद्राराक्षसमें वर्णित राक्षस ' सुबुद्धिशर्मा ' को भी I ' राक्षस ' ही मानना पड़ेगा । फिर तो माण्डकि मुनिको मेण्डकका वास्तवमे । चाणक्यको चनेका लड़का, भारद्वाज मुनिको भरद्वाज पक्षीका लड़का, ' ऐ शाकटायनको शकट ( छकड़े ) का लड़का मानना पड़ेगा । फिर तो लड़का ' हये. । के चरित ' में वर्णित ' कुमारगुप्त ' तथा ' ध्वन्यालोक ' के टीकाकार सि श्रीमान् ' अभिनवगुप्त ' भी गुप्तान्त नाम वाले होनेसे वैश्य माने जावें ब्राह्मण; पर, के ऐसा कोई भी नहीं मानता, इस प्रकार महिदासकी माता ' इतरां ' भी ' श इसी नामसे ही शूद्रा और उसका पुत्र ऐतरेय भी शुद्र कैसे हो सकता है? प्या ( ५ ) इस लिए श्रीसायणाचार्यने ' ऐतरेय ब्राह्मण ' के भाष्यको द्वि भूमिकामें इस विषय में एक आख्यायिका लिखी है । उसमें उनके स्पष्ट शब्द हैं - ‘ कस्यचित् X खलु महर्षेर्बह, व्यः पत्न्यो विद्यन्ते ( स्म ), तत्र फस्या-श्चिद् इतरा इति नामधेयम् । तस्या इतरायाः पुत्रो महिदासाख्यः कुमारः निर तदीयस्य तु पितुर्भार्यान्तरपुत्र ष्वेव स्नेहातिशयो नतु महिदासे । तत् कस्बा-ञ्चिद् यज्ञसभायां तं महिदासमवज्ञाय अन्यान् पुत्रान् स्वोत्सङ्ग स्थापया-मास । तदानीं खिन्नवदनं महिदासमवगत्य इतराख्या तन्माता स्वकीय-कुलदेवतां भूमिमनुसस्मार । सा च भूमिदेवता दिव्यमूर्तिघरा सती यत्र-x ( दयानन्दी पथिकने ' परोपकारी ' ( मार्च १ ९ ६७ के अङ्क पृ. १६-१७ ) ' में ' कस्यचित् खलु महर्षे: ' इस सायणके वाक्यका अर्थ किया है- किसी " ( ' खलु ' नामक महर्षिकी बहुतसी स्त्रियाँ थीं ' । ' खलु ' वाक्यालङ्कार प्रर्थ ३३ श्राता है, पर इस समझदारने ' खलु ' यह नाम बना दिया । इस पर अपे ' आलोक ' के ' दशमसुमन ' का मुखबन्ध देखो । मा
पृष्ठ 159
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ २६१ ' श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६२ ] नसे क्या सभायां समागत्य महिदासाय दिव्यं सिंहासनं दत्त्वा तत्र एनमुपवेश्य सर्वेषु छकटिक पाण्डित्याधिक्यमवगमय्य एतद् ( ऐतरेय ) ब्राह्मण प्रतिभासनरूपं वः ( १ ) · कुमारेषु वरं ददौ । तदनुग्रहात् तस्य मनसा... चत्वारिंशदध्यायोपेतं ब्राह्मणं प्रादुरभूत् ' । ( पृ ० ४ ) वास्तवमे श्रीसायणसे दिखलाई हुई, तथा श्रीसामश्रमीसे निरुक्तालोचन ' श्रीर लड़का, ' ऐतरेयालोचन ' में उधृत की हुई इस कवासे महिदास कहीं भी शूद्र वा शूद्रा लड़का, पुत्र प्रतीत नहीं होते; किन्तु स्पष्टता से ब्राह्मणके पुत्र और जन्मसे ब्राह्मण तो ' हृपं सिद्ध होते हैं । महर्षि भला शूद्र कैसे हो सकते हैं? और महर्षिका शूद्रां -ब्राह्मण, के साथ विवाह भी अनुपपन्न ही है; क्योंकि शास्त्रों में उसका निषेध है-पर ' शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् । जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मं-तरा भी प्यादेव हीयते ' ( मनु. ३।११ ) ' प्रायश्चित्तीयते चापि विधिदृष्टेन कर्मणा ' ता है? ( महा. अनुशासनपर्व ४७।९ ) यहाँ प्रायश्चित्त बताया गया है । ' सवर्णाग्र भाष्यको द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि । कामतस्तु प्रवृत्तानामिमा. स्युः क्रमशोऽ के स्पष्ट धरा: ' ( मनु. 31११ ) तब ऋषिमें कामसे विवाह भी अनुपपन्न ही है । • ( ६ ) जोकि कहा जाता है कि- ' अक्षमाला वसिष्ठेन संयुक्ताऽधमयो-कस्या कुमारः निजा ' ( मनु. ६।२५ ) इससे ब्राह्मणों का भी प्रधमयोन्युत्पन्न स्त्रीसे विवाह • करवा- सूचित होता है; इस पर जानना चाहिए कि- श्रीवसिष्ठकी स्त्री प्ररुन्धती यापया. ही प्रक्षमाला है, पर उसकी शुद्रता इतिहास - सिद्ध नहीं । तब यहीं ' अधम-स्वकीय- योनिजा ' का अर्थ है कि- अपनी योनिकी अपेक्षा निम्नयोनिमें उपन्न । ती य सो वसिष्ठजीको ऋषियोनि एवं पुरुषयोनि होनेसे श्रेष्ठता तथा अरुन्धती ६-१७ ) की मनुष्ययोनि एवं स्त्रीयोनिमें जन्म होनेसे ' अधमयोनिजता ' हुई । - किसी ' ( मनुष्यजातिः - ) पशूनुद्दिश्य श्रेयसी; देवान् ऋषींश्च श्रधिकृत्य न ' ( ४ | ३३ ) योगदर्शनके व्यासभाष्य के इस वचनमें मनुष्ययोनिको पशुयोनिकी स पर अपेक्षा तो उत्तम बताया है, पर देव और ऋषियोनिको अपेक्षा निकृष्ट । मौर फिर स्त्रीयोनि पुरुषयोनिकी अपेक्षा भी अधम होती है, जैसेकि -मानस ' में गो ० तुलसीदासने कहा है- ' प्रथम ते प्रथम प्रथम प्रति नारी ' क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २६३ ( अरण्यकाण्ड ) । कृष्णयजुर्वेदमें भी कहा है- ' तस्मात् स्त्रिमः... पापात् पुंस उपस्तितरं वदन्ति ' ( तं. सं. ६ शवार ) यहाँ पर सायणभाष्य इस प्रकार है- ' पापात् पतितात् पुंसोपि उपस्तितरं क्षीणतरं स्त्रीस्वरूपं वदन्ति ' पूर्वजन्मके ' प्रदुष्टापतितां भार्या यौवने यः परित्यजेत् । सप्त जन्म भवेत् स्त्रीत्वं ' ( पराशर स्मृति ४।१६ ) इत्यादि कई पापोंसे पुरुषयोनि से पतित-हो कर जीव स्त्रीयोनि में जाता है, इसलिए ' येपि स्युः पापयोनयः: स्त्रियो ( १1३२ ) इस गीतावचनमें स्त्रियोंका ' पापयोनयः ' यह विशेषण श्राया है | इसलिए इसके प्रतिद्वन्द्वी ६१३३ पद्यमें ' पुण्याः ' यह पापयोनिका प्रति-' द्वन्द्वी शब्द आया है | ' उत त्वा स्त्री शशीयसी पुंसो भवति वस्यसी । प्रदेवत्राद् धराधसः ' ( ऋ.सं. ५२६१।६ ) यहां देवपूजा एवं दानसे रहित पुरुषकी अपेक्षा स्त्रीको श्रेष्ठ कहकर स्त्रीको पुरुषको अपेक्षा श्रघमयोनि सूचित की है, क्योंकि-उक्त मन्त्र देवपूजा वा दान से हीन पुरुषका निन्दार्थवाद है । श्ररुन्धती कपिलमुनिकी भगिनी भला शूद्रा कैसे हो सकती है? श्रतः मनुके ' श्रघमयोनिजा ' का ' प्रथमोऽनृषि- मनुष्ययोन्युत्पत्ना ' यही तात्पर्य है, ' शूद्रा ' आदि नहीं । ( 3 ) जब महर्षिकी स्त्रीका ' इतरा ' यह नाम हो बताया गया है; वर्ण नहीं, तब वह शूद्रा कैसे हो सकती है? पिताका किसी पुत्रमें यदि स्नेहातिशय नहीं है, इससे वह शुद्र थोड़े ही हो जायगा? यदि शूद्राके पुत्र होने के कारण उसमें स्नेह न माना जावे, तो वह शूद्रासे ही विवाह वा स्नेह वा संगम कैसे कर सकता? तब किसी पत्नी के पुत्रमें बहुत स्नेह न होनेसे वह शूद्र नहीं हो जाता । राजा उत्तानपादका सुरुचिकी सपत्नी, अपनी प्रथम - पत्नी सुनीतिके पुत्र ध्रुवपर स्नेह नहीं था, उसे उस गोदसे उतार दिया था; तब क्या इससे ध्रुव शूद्र हो जायगा? ऐसा . कोई मानता है? तब इससे श्रीक्षि. मो. शास्त्रीका यह कहना कि ' ऋषिने अपनी
पृष्ठ 160
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ब्राह्मणपत्नीसे उत्पन्न पुत्रको ही गोदमें लेकर उसे नाना - तत्त्वोंका उपदेश दिया, शूद्रापत्नीसे उत्पन्न ऐतरेयकी उपेक्षा की यह निर्मूल सिद्ध हुम्रा । कहीं भी ऐसा नहीं लिग कि- ' उम ऋषिकी एक पत्नी ब्राह्मणी और एक शूद्रा थी ' । यह वादीकी निर्मूल कल्पना है । ( ८ ) ' ऐतरेय श्रीमहिदास कण्व वंशप्रसूत पर्वत नामक ऋषिका पुत्र था । उसकी रात्रि और इतरा नामवाली दो स्त्रियों थी यह वृत्त नाथ-द्वाराके गोस्वामियोंके पुस्तकालयमें रखे ' वंशब्राह्मण ' ( ६/५/३ ) में लिखा है । यदि यहां ' इतरा ' शुद्राका पर्यायवाचक है, तो क्या उसकी दूसरी पत्नी ' रात्रि ' भी ' रात ' थी? यदि रात्रि में पयायवाचकता नहीं, किन्तु नाम है; वैसा ही ' इतरा ' भी नाम ही है । ( E ) केवल श्रीसायण, वा ' वंश - ब्राह्मण ' ही नहीं, किन्तु पुराण भी ऐतरेय तथा उसके पिताको ब्राह्मण कहते हैं । जैसे कि - ' लिङ्गपुराण ' के उत्तरभाग २५८ अध्यायमें ' कश्चिद् द्विजो महाप्राज्ञस्तपस्तप्त्वा कथञ्चन ' ( ७/१६ ) पुत्रमेकं तथोत्पाद्य संस्कारैश्च यथाक्रमम् | योजयित्वा यथाकालं कृतोपनयनं पुनः ( १७ ) ( यहाँ ऐतरेयको ब्राह्मणका लड़का, तथा आठ-वर्षमें यज्ञोपवीतधारी कहा गया है । ) शूद्रका उपनयन विधिविहित नहीं होता, तब ऐतरेय - महिदास शूद्र कैसे हो? प्रध्यापयामास तदा स च नोवाच किञ्चन । न जिह्वा स्पन्दते ( TTS-म्यवर्णान् प्रनवति ) तस्य दुःखितोभूद् द्विजोत्तमः । ( ७।१८ ) ' वासुदेवेति नियतमैतरेयो बदत्यसौ । ( उसे पढ़ाया गया, पर वह बोलता नहीं था । उसकी जीभ अक्षर बोलती ही नहीं थी । केवल वह ' वासुदेव ' शब्द कहता था ) जीभमें रोगविशेष वा अशक्तिसे यदि अक्षर नहीं निकलते, तो कोई इससे शूद्र नहीं हो जाता । ब्राह्मणपुत्र होनेसे वह स्पष्ट ब्राह्मण सिद्ध हुआ । ' पिता तस्य तथा चान्यां ( भार्या ) परिणीय यथाविधि ( ७ / १ ९ ) पुत्रान् उत्पादयामास तथैव विधिपूर्वकम् । वेदानधीत्य सम्पन्ना बभूवुः सर्व-सम्पताः ' ( २० ) | ( उसके पिताने धन्य स्त्रीसे विवाह किया । उस स्त्रीसे.. ऐतरेय महिदास शूद्र थे? उत्पन्न सभी लड़के वेदके जानकार बने ) । २६६ ' ऐतरेयस्य सा माता दुःखिता शोकमूर्च्छिता । उवाच पुत्राः ( मम सपत्न्याः ) वेद - वेदाङ्गपारगाः ' ( ७।२१ ) ब्राह्मणः सम्पलाः । यया मोदयन्ति च मातरम् । मम त्वं भाग्यहीनायाः पुत्रो जातो पूज्यमाना निराकृतिः है । समान ( यत्नहीनः ) ( २२ ) ममात्र निधनं श्रेयो न कथञ्चन जीवितम् । कि - व इत्यु स च निर्गम्य यज्ञवाटं जगाम व ( २३ ) तस्मिन् याते द्विजानां तु मन्या द्विजात न प्रतिपेदिरे । ऐतरेये स्थिते तत्र ब्राह्मणा मोहितास्तदा । ( २४ ) तो वंश्यान वाणी समुद्धता वासुदेवेति कीर्तनात् । ऐतरेयस्य ते विप्राः प्रणिपत्य यदा. पहली तथम् ' ( २५ ) पूजां चक्रुस्ततो यज्ञं स्वयमेव जगाम वै । ततः समाप्यतं जिह्वा यज्ञमैतरेयो धनादिभिः ( २६ ) सर्ववेदान् सदस्याह सषडङ्गान् समाहितः ॥ तुष्टुवुश्च तथा विप्रा ब्रह्माद्याश्च तथा द्विजाः ( २७ ) ससृजुः पुष्पवर्षापि की जा खेचराः सिद्धचारणाः । एवं समाप्य तं यज्ञमंतरेयो द्विजोत्तमः ( २८ ) मातरं बताती पूजथित्वा तु विष्णोः स्थानं जगाम ह ' ( ७ / २ ९ ) । स्वा. व ( ऐतरेकी माँ बहुत दु: खी हुई, और कहा कि मेरी सौतके तो पुत्र प्रमाण वेदवेदाङ्गों को जाननेवाले हैं । ब्राह्मण उनका सम्मान करते हैं; और वे एतौ चतुर्वेद को प्रसन्न करते हैं । तू मुझ प्रभागिनका निकम्मा लड़का पैदा हुम्रा है । मैं मर जाऊं तो ठीक है, मेरा जीना ठीक नहीं । यह सुनकर ऐतब तब उ वहाँसे निकल कर एक यज्ञमें गया । उसके वहाँ होनेपर ब्राह्मणों को मन्त्र से भी ही नहीं फुरते थे । तब वासुदेव कहनेसे उसकी वाणी फुर उठी । उस या ' उसने वेद प्रङ्गों सहित सुनाये ) । यहाँ पर ऐतरेयको स्पष्टठवा ' द्विजोत्तम ' ( श्रेष्ठः ब्राह्मण ) कहा गया है । तब उसकी शूद्रता सर्वस न्दपुरा खण्डित हो गई है । में भी ( १० ) इसके अतिरिक्त ' इतरा ' उस ब्राह्मणीकी प्रथम पत्नी थी, कहा ग . तब उस ऋषिने पुत्रकी जिह्वामें अस्पन्दन देखकर दूसरी स्त्रीसे विवाह प्राप्तो किया । पहली स्त्री ब्राह्मणकी कभी शूद्रा नहीं हो सकती, जैसे श्रीसाम ऐतरेय श्रमीजीने ' ऐतरेयालोचन ' में ' तत्र सर्वेषामेव प्रार्यवर्णानां प्रथमं स्वजाती नहीं ।