सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 161–170
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 161–170
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६६ ] : सम्पलाः पाणिपीडनमेव विहितम् ( पृ. १२ ) ( सव ब्राह्मणादि पहले अपने ज्यमाना दे या वर्ण वाली स्त्रीसे विवाह करते थे ) ऐसा लिखा है, तब स्पष्ट है निराकृतिः • कि समान वह ब्राह्मणी थी । इसलिए ' मनुस्मृति ' में भी कहा है कि -'सवर्णाऽग्रे । इत्युक्तः द्विजातीनाम् ' ' ( 1१२ ) यहाँ पर कुल्लूक भट्टने लिखा है- ' ब्राह्मणक्षत्रिय-तु मन्दा वंश्यानां प्रथमविवाहे कर्त्तव्ये सवर्णा श्रेष्ठा भवति । ' ब्राह्मणादि - द्विजकी २४ ) नो पहली स्त्री ' इतरा ' भला शूद्र कैसे हो सकती है? और रोगविशेषसे पत्य या जिह्वाके प्रस्पन्दनवश किमी बालककी शुद्रता भी नहीं हो सकती । समाप्य से ( ११ ) ब्राह्मणेन प्रोक्त ं ब्रह्मणा वा प्रोक्तम् ' यह ' ब्राह्मण - ग्रन्थको माहितः । ष्पवर्षा की जाती हुई व्युत्पत्ति भी ऐतरेय ब्राह्मण के कर्ता श्री महिदासको ब्राह्मण बताती है, जैसेकि - ' ॠग्वेदादिभाष्यभूमिका ' के वेदसंज्ञाविचार ८७ पृष्ठ में ८ ) मातरं स्वा. द. जीने यह शब्द लिखे हैं- ' ब्रह्म ेति ब्राह्मणानां नामास्ति । अत्र प्रमाणम् -'ब्रह्म वै ब्राह्मणः, क्षत्र ं राजन्य: ' ( शतपथ १३ | १ ) ' समानार्थी के तो पुत्र एतौ ब्रह्मन् - शब्दो ब्राह्मणशब्दश्च ' इति व्याकरणमहाभाष्ये ( ५।१।१ ) नौर वे म चतुर्वेदविद्भिर्ब्रह्मभि: - ब्राह्मणैर्महर्षिभिः प्रोक्तानि यानि वेदव्याख्यानानि, हुआ है । तानि ब्राह्मणानि । ' ब्राह्मणग्रन्थके कर्त्ता - ऐतरेयको यदि शूद्र माना जावे, कर ऐतरेव को मन्द तब उसका नाम ' ब्राह्मण ' स्वामीके अनुसार भी कैसे हो सकता है? इस # से भी ऐतरेय महिदास ब्राह्मण ही सिद्ध हुए, शूद्र नहीं । उस यज्ञरें । स्पष्टतवा ( १२ ) पहले हम लिङ्गपुराणका प्रमाण ऐतरेयके ब्राह्मण होनेमें दे ता सबंध चुके ही हैं, इसमें स्कन्दपुराण की साक्षी भी दिखाई जाती है । ' स्क-न्दपुराण ( श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस बम्बई ) के माहेश्वरखण्डके कुमारिका - खण्ड में भी ऐतरेयकी कथा आई है, उसमें ऐतरेयको ब्राह्मण वा ब्राह्मणपुत्र पत्नी पी कहा गया है । जैसे कि - ' श्रत्र तीर्थवरे पूर्वम् ऐतरेय इति द्विजः । सिद्धि से विाद प्राप्तो महाभागो वासुदेवप्रसादतः ' ( ४२ ( ३७ ) । २६ ) इस नारदके वचनमें श्रीसाम ऐतरेयको द्विज ( ब्राह्मण ) कहा गया है । शुद्र तो एकज होता है, द्विज स्वजाती- नहीं । तब इससे उसकी शूद्रता खण्डित हो गई । तब अर्जुनका प्रश्न हुम्रा कि - ' ऐतरेयः कस्य पुत्रो निवासः क्वास्य वा मुने! कथं सिद्धिमगाद् क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २६७ धीमान् वासुदेवप्रसादतः ' ( ४२।२७ ) इस पर नारदने कहा- ' श्रस्मिन्नेत्र मम ( नारदस्य ) स्थाने हारीतस्यान्वयेऽभवत् ( २८ ) माण्डूकिरिति विप्रा-प्रयो वेद - वेदाङ्गपारगः ' ( २१ ) यहाँ पर ऐतरेयके पिताको भी स्पष्ट ही श्रेष्ठ - ब्राह्मण कहा है । ( इन पद्योंका अर्थ यह है कि इस तीर्थमें ऐतरेय एक ब्राह्मण वासुदेव की कृपासे सिद्धिको प्राप्त हुआ । तब प्रश्न हुआ कि ऐतरेय किसका पुत्र था? वह कहाँ रहता था? उसने सिद्धि कैसे प्राप्त की? इसपर नारदने कहा - इसी मेरे स्थानमें हारीतके कुलमें एक वेद - विद्वान् माण्डकि नामक ब्राह्मण था । ) तस्यासीद् इतरा नाम भार्या साध्वी गुणैर्युता । तस्यामुत्पद्यत [ मजायत ] सुतस्त्वैतरेय इति स्मृत: ' [ ४२२३० ] यहाँपर माण्डूकि नाम वाले ब्राह्मणकी स्त्री इतराको साध्वी [ अच्छे गुण - कर्मों वाली ] कहा है, तब वह जन्मसे शूद्र वा गुणकर्मसे नीच भी कैसे हो सकती है, जो कि-' वादी ' इतरा ' शब्दका अर्थ ' नीच ' करते हैं । उसी इतरा नाम वालीका पुत्र ' ऐतरेय ' कहा है । इस इतिहासमें न ऐतरेयके पिताको शूत्र कहा है, न ही उसकी माताको, न ऐतरेयकों ही शूद्र कहा है । तब ऐतरेय शूद्र कैसे हो सकता है? ( १३ ) जो कि एक दयानन्दी द्वारा कहा जाता है कि ' शूद्रस्य च जुगुप्सितम् ' ( मनु. २।३१ ) इस वचनसे शूद्रका जुगुप्सित नाम रखना पड़ता है, ' इतरा ' यद्यपि यह नाम है, तथापि घृणित होनेसे उसकी शूद्रताको बता रहा है । ' इस पर जानना चाहिये कि - स्वा. द. जीने ' देवदास ' यह शूद्रका नाम कहा है, उसमें ' देव ' यह शूद्रका नाम है, ' दास ' यह वर्ण-चिह्न है, तो क्या ' देव ' यह नाम जुगुप्सित है कि - स्वामीने शूद्रका तथा ब्राह्मणादिका वह नाम रखा? तब तो रामायणर्वाणित मुनिका ' मतङ्ग ', मृच्छकटिकके प्रणेता राजाका नाम ' शूद्रक ' निम्नजाति - सूचक होनेसे जुगुप्सित है, इसलिए स्वा.द.ने भी ' सं.वि. ' में ' चाण्डाली ' मादि नाम
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२६८ श्रीसनातन ( १०२ ) रखना निषिद्ध कर दिया है, तो क्या यह शुद्रक - प्रादि, शूद्र मान लिए जाएंगे? मीमांसादर्शनके भाष्यकार ' शवर ' भी क्या शूद्र होंगे? यदि नहीं, तब ' इतरा ' भी नाममात्र से शूद्रा कैसे हो? ' इतर ' शब्द ' अन्य ' वाचक भी होता है, वह जुगुप्सित नहीं । वहीं स्वामीने लिखा है- ' स्त्रियोंका विषमाक्षर नाम रखें ' ( पृ. ६५ ) तब क्या अर्जुन, नकुल, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न यादि विषमाक्षर नाम वाले स्त्री हो जाएंगे? यदि नामसे इसका ज्ञान नहीं होता, तब ' इतरा ' इस नामसे उसका शूद्रा होना भी निर्मूल है । ( १४ ) स्कन्दपुराणके अग्रिम पद्य यह हैं- ' सच ( ऐतरेयः ) बाल्यात् प्रभृत्येव प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् । जजाप मन्त्रं त्वनिशं द्वादशाक्षर - संज्ञितम् । एवंप्रभावः सोभूच्च बाल्ये विप्रसुतस्तदा । [ ४२।३१ ] यहां भी ऐतरेयको ब्राह्मणका पुत्र कहा है । ' न शृणोति, न वक्त्येव, न चाध्येति कथंचन । ततो मूकोयमित्येव नानोपायैः प्रबोधित: ' [ ३२ ] ततो निश्चित्य माण्डूकिर्ज-डोयमिति भारत! अन्यान् विवाहयामास दारान् पुत्रांस्तथा दघे । पिङ्गा नाम च या भार्या तस्याः पुत्राश्च जज्ञिरे [ ३३।४३ ] चत्वार: कर्मकुशलाः वेदवेदाङ्गवादिनः । द्विजैः सर्वत्र पूजिता: ' [ ३५ ] । इस कथाका तात्पर्य भी प्रायः पहली कथा जैसा है । अतः पृथक् अर्थं नहीं लिखा । ब्राह्मणपुत्र होनेसे ही ऐतरेयको विष्णुभगवान् ने कहा था- ' त्वं च वत्स! श्रोतधर्मान् सम्यगाचर श्रद्धया ' [ ४२।२२८ ] यज यज्ञैरवाप्यैव दारान् नन्दय मातरम् ' ( २२६ ) साम्प्रतं प्रतिभास्यन्ति वेदाश्चापठिता श्रपि ( २३६ ) ततस्त्वं कोटितीर्थे च यज्ञे वै हरिमेधसः । याहि यत्र भविष्यं ते सर्वं मातुरभीप्सितम् ' ( ४२/२३७ ) इन सभी स्थलों में ऐतरेयको ब्राह्मण वा ब्राह्मणका पुत्र कहा है, शूद्र कहीं भी नहीं । श्रीमदानन्दतीर्थंके ब्रह्मसूत्र - १ माध्यायके अन्तिम अधिकरणमें लिखा है - ' महिदासाभिघो जज्ञे इतराया - स्तपोवलात् । साक्षात् स भगवान् विष्णुर्य-स्तन्त्रं वैष्णव व्यधात् ' ( इति ब्रह्माण्डे ) । यहाँ इतराके तपोबलसे क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २६ ९ महिदासकी उत्पत्ति बताई गई है, उसे विष्णुका अवतार २७० है । विष्णुका ग्रवनार शूद्र नहीं होता । वहीं जयतीर्थंको टीका बताया गया . है- ' न च महिदामो मुनितया उच्यते, वैयर्थ्यादेव । महिदासस्य में लिखा ( २४६ कुत इत्यत ग्राह- ' महिदासेति ' । वहीं टिप्पणी में ' इतरायाः विष्णुस्त्वं पश्चात संज्ञकर्षेरुत्पन्नो महिदासस्तन्नामको भगवान् पुत्रः विशाल- प्रभाव यस्य स इति महिदासः । साक्षाद् । महिनः - महात्मानः दासा स्पष्ट भगवान् विष्णुगुणपरिपूर्णः परमात्मैव इत्यर्थः ' । श्रीप्रानन्दतीर्थाचार्य के समकालीन, उसके जीवनवृत्त के यज्ञ क श्रीनारायण - पण्डिताचार्यंने भी श्रीमन्मध्वविजयकाव्य ८ सर्ग ३५ रचयिता
श्लोकंमः
लिखा है- ' महिदास पूज्य - चरणाद् द्विजाद् प्रभूद् विदितात् स: ' इसकी पूर्वजन्म व्याख्यामें ' विदितात् - प्रसिद्धाद् द्विजात् इतरादेव्यां महिदासनामा चासौं । है । महिदास: - महिदास: - महिदास - भगवत्पादाचार्य:, वैष्णवतन्त्र - प्रवक्ता है । महिदास: -मह् उत्सव एषामस्तीति महिनो ब्रह्मादयः । ते दासा यस्य. स ।. इस झं कल्किरिति यावत् । द्वावपि विष्णोरवतारविशेषौ । श्रीमन्महैतरेयोपनिषद् दिखला भाष्यमें भी श्रीमध्वगुरुयोंने यही कहा है । तब महिदासको शूद्र बतानेवाले. सव स्थ दयानन्दी शोच्य हैं । सब घट हाँ, पूर्व - जन्ममें ऐतरेयने अपना शूद्र होना कहा है जब वह इतराका प्रसिद्ध पुत्र ही नहीं था । तब मृत्यु हो जानेपर वह इस जन्म में इस ब्राह्मणपत्नीमें जीवन-उत्पन्न हुना । जैसेकि — ‘ ऐतरेयः स्वजननीं मुदितो वाक्यमब्रवीत् । पुरा जानना [ जन्मनि ] ऽहमभवं शूद्रो भीतः संसारदोषतः । परिनिष्ठागतं धर्मं ब्राह्मणं पितृनाम शरणं गतः ( स्कन्द. २४० ) । स कृपालुम प्राह मन्त्रं वै द्वादशाक्षरम् । प्राचीनत सदेमं जप चेत्युक्त्वा तमहं जप्तवान् सदा ' ( ४२१२४१ ) तेन जाप्यप्रभावेन वर्णित ममोत्पत्तिस्तवो [ ब्राह्मण्या उ- | दरात् । जातस्मृतिर्विष्णुभक्तिः स्थितिरत्र पुर च सर्वदा ( २४२ ) इदानीं च प्रयाम्येष यज्ञं तं हरिमेधसः ' ( २४३ ) किया ग गेहाय मातरं प्रोच्य स यज्ञ प्रोक्तवान् द्विजः । ऐतरेयः ] ' ( ४२।२४५ ) जैसे कि ततो वेदार्थ- [ ऐतरेय ब्राह्मण ] नैपुण्यस्तेन [ ऐतरेयेण ] ते तोषिता वर्णन ना द्विजाः । श्राकर्ण्यासनपूजाद्य: पूजयामासुरङ्गः! तम् ' ( २४८ ) प्रदक्षिणां कुछ प सर्वां हरिमेवाः सुतामपि । नन्दयित्वा स्वजननीं पुत्रानुत्पाद्य चामलान् और । एकमें
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२१ ९ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २७० ] ना गया यज्ञैरंतरेयो द्वादशीव्रततत्परः । वासुदेवानुध्यानेन मोक्षं लिखा ( २४ ९ ) इष्ट्वा ) यदि इतरा शूद्रा होतो, तो क्या जपका विष्णुत्वं पश्चादुपागतः ( ४२/२५० के गर्भ में डालनेवाला था? -कभी नहीं तब वह विशाल- प्रभाव महिदासको शूद्र, स्पष्ट ब्राह्मणी सिद्ध हुई । यहाँ सर्वत्र ऐतरेयको ब्राह्मण कहा है । उ दासा मात्मैव यज्ञ कराया, पूजा प्राप्त की । व्ययिता ( १५ ) इससे ऐतरेय - महिदास ब्राह्मण सिद्ध हुए । यहाँ ऐतरेयने लोकम पूर्वजन्ममें अपना शूद्र होना और इस जन्ममें इतराके गर्भसे उत्पत्ति कही इसकी है । किसी माताके गर्भसे उत्पत्ति पहले मरकर फिर अन्य जन्ममें होती ' सौं । है । तब ऐतरेयकी इस जन्ममें शूद्रता कहीं भी सिद्ध न हुई । पुराण काः । इस इतिहास में यद्यपि ऐतरेयका महीपूजन और महिदास नाम नहीं स्य. स.. दिखलाया, तथापि इस विषय में यह जानना चाहिए कि सब घटनाएं निषद् सस्थान वर्णित नहीं की जातीं । जैसे स्वाद चरितके लेखकोंने उनकी निवाले. सब घटनाएं सब जीवन चरित्रोंमें नहीं दिखलाई । जैसे स्वा. द. की प्रसिद्ध विषदान घटना किसी जीवन चरित्रमें न दिखलाई हो, इससे दोनों राका जीवन - चरित्रों वाले दयानन्द भिन्न भिन्न नहीं हो जाते, वैसे यहाँपर भी स्ती में जानना चाहिये । जब एक शताब्दीके स्वाद की जीवन घटनाओं में पुरा पितृनाम और जन्मभूमिके नाम प्रादिमें बड़ा अन्तर दिखलाई देता है, तब ह्मण प्राचीनतम ऐतरेयमें कुछ घटनाओं के भेदसे पुराण तथा सायणभाष्य में रम् । वर्णित ऐतरेय भिन्न - भिन्न नहीं हो जाते । वेन तिन पुराणों में ' ऐतरेय ' इस मुख्य नामको लेकर उसकी कथाका वर्ण म किया गया है, कहीं महिदास नामसे भी, यह हम पहले दिखला चुके हैं । D 3 ) जैसेकि कई जीवन - चरित - लेखक अपने चरितनायककी सब घटनाओं का पता वर्णन न करके अपनी इष्ट घटनाओंका निरूपण करते हैं, घटनाओं में क्षणां कुछ अपने अनुकूल परिवर्तन भी कर दिया करते हैं, जैसेकि - महाभारत न पौर पद्मपुराणके दुष्यन्त - शकुन्तला के चरित्रोंमें भी पर्याप्त अन्तर है, एक दुर्वासाका शाप वर्णित है, दूसरे में नहीं । श्रीरामकी भढनाओंका क्या ऐतरेय महिदास शूद थे? [ २७१ भी रामायण, महाभारत एवं पुराण श्रादिमें स्थान - स्थानमें अन्तर दिखाई देता है । रघुवंशमें तथा पुराण में वर्णित रघुके पितामें नाम-भेद और घटनाभेद दिखाई पड़ता है । इससे दुष्यन्त वा रघु ग्रादिकी भिन्न - भिन्नता नहीं हो जाती । श्रीलेखराम तथा देवेन्द्रनाथके बनाये जीवनचरितों में घटनाओं तथा कालनिर्देशका भारी वैषम्य है, इससे दोनों स्थलोंके दयानन्द भिन्न - भिन्न नहीं हो जाते, वैसे प्रकृतमें भी जानना चाहिये । जैसे महिदास - प्रोक्त ब्राह्मण ' ऐतरेय ब्राह्मणके नामसे है ' महिदास - ब्राह्मण ' नामसे नहीं, वैसे ही पुराणोंमें भी उस महिदासकी घटनाको न लेकर प्रसिद्ध ' ऐतरेय ' नामको ही लेकर उसकी माता इतराके सम्बन्धका वृत्त तो बताया है, उसकी कुलदेवताके कारण हुए ' महिदास'-नामके घटनाचक्रको नहीं दिखलाया । जैसे श्रीमोहनदास मह नाम उतना प्रसिद्ध नहीं, जैसेकि श्रीगान्धि । इस कारण प्रायः लोग श्रीगान्धि ' यही नाम दिखलाते हैं, ' मोहनदास ' नहीं, वैसे ही यहां पर भी प्रायः महिदास नाम न लेकर ' ऐतरेय ' नाम ही लिया गया है, क्योंकि वह ऐतरेय - नामसे सर्वसाधारण में प्रसिद्ध था । ' मही ' उनकी कुलदेवता थी, इसलिए उसका नाम जो महिदास हुम्रा - यह सर्वसाधारण में उतना प्रसिद्ध नहीं था । जैसे कि - दयानन्द यह नाम जितना प्रसिद्ध है, वैसे मूलजी नहीं । कहीं दयाराम नाम है, कहीं दयाल और कहीं मूलशकर; इससे दयानन्व भिन्न-भिन्न नहीं हो जाते । वैसे यहां पर भी समझना चाहिए । इससे दोनों ऐतरेय भिन्न - भिन्न नहीं हो जाते, जैसे कि कई वादियोंका विचार है । ( १६ ) जोकि एक सिद्धान्तालंकारने कहा है कि- ' स्कन्द पुराणने ऐतरेकी शूद्रता छिपाने के लिए ' पुरा जन्मनि ' इन शब्दोंसे उसे गतजन्ममें शूद्र कहा है, ' यह भी ठीक नहीं । ऐतरेयको प्राजकलके ही सुधारक ५०-६० वर्षसे शूद्र मानने लगे हैं । पर स्कन्दपुराण अब तो बनाया नहीं गया कि- प्राजकल मतसे डरकर उसने परिवर्तन कर दिया हो । पुराणमें
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२७२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तो जो वास्तविकता थी; वह बता दी कि इतराके पुत्र होनेमें तो वह था, पर उससे पूर्वजन्ममें जब वह इतराका पुत्र नहीं था तो शूद्र ब्राह्मण और वादीकी बातमें तो आकाश - पातालका अन्तर है, यह था । इसमें प्रवक्ता विपरिणाम वा छिपाना नहीं । पुराण वर्णित ऐतरेय ब्राह्मणप्रत्यके भिन्न भी नहीं, क्योंकि -मन्त्र- ब्राह्मण प्रोक्त ऋषि, मुनि तथा ऐतरेयसे द्रष्टा और प्रवक्ताओंोंके इतिहास - पुराणादिमें ही तो बतलाये प्राचार्यो एवं पुराणार्णवको ही मन्थन करना गये हैं, अतः उनका चरित्र जाननेकेलिए हैं । फलतः पुराणों में ऐतरेयको ' द्विजोत्तम ' कहकर उन वादियोंके पड़ता जड़ काट दी गई है, जो ' ऐतरेय ' ( इतरा - पुत्र ) इस नामसे ही उसे मतकी शूद्र सिद्ध करने का सरतोड़ परिश्रम करते हैं । ( १७ ) इस प्रकार हमने ' तदेवम् ऐतरेयनामव्युत्पत्तित एव इतरागर्भ-सम्भूतत्वसिद्धेः मिध्यत्येव ( महिदासस्य ) दासीपुत्रत्वम् ' तत एव महिदास इति दासान्तमभिधानमपि विश्रुतम् ' ( ऐतरेयालोचन १४ पृष्ठ १६ पंक्ति ) श्रीसामश्रमीके इस वचनमें पूर्व अंशकी तो प्रमागोपपत्ति सहित आलोचना हमने कर दी, अब उनके अग्रिम अंशकी कि- दासान्त नाम होनेसे भी ' महिदास ' शूद्र थे - प्रव आलोचना दी जाती है । यह भी सामश्रमीजीका कथन व्यभिचरित है, क्योंकि- ' शर्मवद् ब्राह्मणस्य स्याद् राज्ञो रक्षासम-न्वितम् । वैश्यस्य पुष्टिसयुक्त शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम् ' ( मनु. २।३२ ) यहाँ पर नामसे पृथक् ही शर्मा दास प्रादिका संकेत कहा है । स्वा. द. जीने अपनी ' सं.वि. ' में नामकरण प्रकरण में लिखा है- ' ब्राह्मण हो तो देव शर्मा, क्षत्रिय हो तो देव - वर्मा, वैश्य हो देव - गुप्त और शूद्र हो तो देवदास ' ( पृ. ६६ ) यहाँ स्वामीने दो - प्रक्षरों वाला नाम ' देव ' रखकर उससे अलग ही शर्मा-दास आदिका संकेत लिखा है, परन्तु ' महिदास ' में यह बात नहीं घटती । ' महिदास ' यह तो चार अक्षरों वाला नाम है; दो अक्षरों वाला नहीं । इसकी स्पष्टता हम आगे करेंगे । कुछ पीछे भी कर आये हैं । श्रीसायणसे दिखलाई हुई प्रापयाथिकासे विज्ञ पाठकोंने जाना होगा क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २७३ कि - ऐतरेयकी कुलदेवता ' भूमि ' थी, उनीका पर्यायवाचक ' मही ' महीका दास ( सेवक ) होनेसे उसने दिव्यमूर्तिधारिणी उस ' मही ' शब्द है । -२७ से ही ' ऐतरेय ब्राह्मण ' प्राप्त किया । इसी कारण ' मह्या को कृपा विग्रहसे उसकी ' महिदास ' यह संज्ञा हुई, तभी ' यापोः संज्ञाछन्दसोवंलम् दासः इस ( पा. ६।३।६३ ) इस सूत्र से संज्ञा होनेके कारण ' कालिदास ' की ' ' महिदास ' में भी ङीपके ' ई ' को ह्रस्व हो गया । इससे ' मही ' तरह नाम की माताका नाम है - इस प्रकार ' जातिनिर्णय ' में कहते हुए श्रीकाव्यतीर्थ- यह ऐतरेय-का मत खण्डित हो गया । क्योंकि ' मही ' तो भूमि ( पृथ्वी ) का जा जो उसके कुलकी पूजनीय देवता थी, जिसका महिदासकी माता नाम ' इतरा है, ' ने ध्यान किया था । तब ' इतरा ' स्मरण- क्रियाकी कर्ता; और ' मही ' स्मरणक्रिया की कर्म- दोनों एक कैसे हो सकती हैं? ' एक झप इसके अतिरिक्त ' इतरा ' मानुषी और ' मही ' देवता थी । उक्त कथामें उप दोनोंकी विभक्तियां भी भिन्न - भिन्न हैं, तब दोनों अभिन्न कैसे हों? उसी कुलकी उपास्य देवता ‘ मही ' के दास होने से वह ' महिदास ' कहलाता था, और माता के नामसे ' ऐतरेय ' प्रसिद्ध था? ' मही ' इनकी माता नीच जाति- मा की दासी थी, इसलिए उसका नाम ' इतरा ' था ' यह जो काव्यतीर्थंने लिखा सन है, उनसे प्रष्टव्य है कि - यह कहां लिखा है? उक्त ग्राख्यायिकामें मही सि और इतरा दो भिन्न - भिन्न व्यक्ति हैं, और ऐतरेय इतराका लड़का शि बताया गया है ' मही ' का नहीं, मही ( पृथ्वी ) का तो वह उपासक था, लड़का नहीं । काव्यतीर्थजीने दोनों ( मही और इतरा ) को एक कैसे कर डाला? मही तो उक्त आख्यायिकामें दिव्यमूर्तिधर देवता बताई गई है, तो क्या दिव्यगुणों वाली देवता भी नीच दासी हो सकती है? ऐसा सम्भव ही नहीं । स्पष्ट है कि - काव्यतीर्थ महाशयका यह मत जहाँ असत्य है, वहाँ निर्मूल भी है । FB ( १८ ) जो कि - काव्यतीर्थं महाशयने लिखा है कि- ' इतरा ' शब्दार्थ ० ध ० १८ ब्रा वा इस
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२७३ है । कृपा इस हलम श्रीसनातनधर्मालोकः ( -२७४ ] : ' ( अमरकोष ही नीच है- ' इतरस्त्वन्यनीचयो माताका नाम था, यह हम पहले तो उसकी भी जाति मानी जाती है? अर्थसे : -२ ) ), पर यह व्यथ है । ' इतरा ' सिद्ध कर चुके हैं, तब क्या तब तो मीमांसाभाष्यकार तरह नाम भील ही हो जाएंगे! रामायणके मतङ्ग मुनि भी अन्त्यज हो तिरेय- शबराचार्य जाएंगे, और राजा शुद्रक शूद्र हो जाएंगे! क्या काव्यतीर्थं महाशय तथा व्यतीयं. श्रन्य कोई ऐसा मानता है? यदि नहीं, तब उनका मत कट गया । है, ( १ ९ ) श्रीक्षि.मो. शास्त्रीका ‘ भारतवर्ष में जातिभेद ' ( ८५ पृष्ठ ) में इतरा ' शूद्रा पत्नीसे उत्पन्न पुत्र ही ऐतरेय थे, यज्ञके समय ऋषिने ' महो ' ' एक ऋषिकी पुत्रको ही गोदमें लेकर उसे नाना- तत्वों का. प्रपनी ब्राह्मणी - पत्नीसे उत्पन्न उपदेश दिया; और बेचारे ऐतरेय की उपेक्षा की ' यह कथन भी निर्मूल ही कथामें है, क्योंकि उक्त इतिहाससे विरुद्ध है । जो कि शास्त्रीने लिखा है कि-- उसी " दुःखित होकर ऐतरेयने अपनी मातासे अपने मनका दुःख बताया । उनको नाथा, माताने अपनी कुलदेवी महीका स्मरण किया । शूद्रगण तो मही जाति- सन्तान हैं । पृथिवीगर्भसे देवी आविर्भूत हुई और ऐतरेयको दिव्य लिखा सिंहासन पर बिठाकर सर्वोत्तम ज्ञान देकर तिरोहित हुई ।... महीदेवीसे मही शिक्षा पानेके कारण ऐतरेय, महिदास मी कहाते हैं " यह भी प्राय: गलत लड़का है । शूद्रगण महीकी सन्तान हैं- इसका क्या आशय है? ऐतरेय, महीकी कथा, सन्तान तो नहीं था तब उसे शास्त्रि- महाशय शुद्र कैसे कहते हैं? कर है, वह तो इतराकी सन्तान था - यह वे भी मानते हैं, तब उन्होंने यह ऐसा कैसे लिखा? ' मही ' यह तो पृथिवी की अधिष्ठात्री देवताका नाम है जो जहाँ पृथिवीके गर्भसे प्रकट हुई । जिस देवताने ऐतरेयको शिक्षा दी, तब इससे महिदासके शूद्रत्वका सम्बन्ध कैसा? क्या महीदेवता शूद्रा थी? जब दार्थ उसके इतिहासमें ' इतरा ' यह नाम है; तब वह भी शूद्रा कैसे? ' पिताने ब्राह्मणीके पुत्रको उपदेश दिया, शूद्रापुत्र ऐतरेयकी उसने उपेक्षा की ' ऐसी बात किस इतिहास में लिखी है? ' नमो मात्रे पृथिव्यै ' ( यजु.सं. ६।२२ ) इस मन्त्रमें तथा अथर्ववेद [ शौ. ] संहिताके १२ वें काण्डके आरम्भमें हम-क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २०५ श्रापके लिए मही की उपासना वा प्रार्थना भाई है, तो क्या हम प्राप शूद्र होंगे? पृथिवीसे उत्पन्न श्रीसीता भी क्या शूद्रा थी? पृथिवीसे कान उत्पन्न नहीं होता, तो क्या सभी शूद्र होंगे? वादीका नाम ही ' क्षिति-मोहन ' है - पृथिवीके मोहन - पुत्र, तो क्या इससे वादी भी शूद्र होगा? यदि नामसे यह बात नहीं होती, तो इतरा नामसे ही उसकी शूद्रता कैसी? ' पत्नी ' यज्ञ - संयोगमें होती है; शूद्राका महाभाष्यानुसार यज्ञसयोग ' पत्नी ' यह संज्ञा नहीं हो सकती, तव शास्त्रीजीने ' शूद्रा- पत्नी ' शब्द न होनेसे लिखा? इस प्रकार उनका मत भी कट गया । कैसे ( २० ) लगे हाथ भूमिदेवताके दिव्यमूर्ति धारण पर भी विवेचना दी जाती है- ' भावं तु वादरायणोस्ति हि ' ( वेदान्तदर्शन १1३1३३ कुछ ) इस तथा ' अभिमानिव्यपदेशस्तु ' ( २२११५ ) इस सूत्र में श्रीवेदव्यासने भूमि-ग्रादिके अभिमानि - देवता भी बताये है । स्वामी शंकराचार्य महाराजने उसका इस प्रकार विवरण दिया है-' ज्योतिरादि विषया अपि आदित्यादयो देवतावचनाः शब्दाः चेतना-चन्तम् ऐश्वर्याद्य ुपेतं तं - तं देवतात्मानं समर्पयन्ति, मन्त्रार्थवादादिषु तथा-व्यवहारात् । अस्ति हि ऐश्वर्ययोगाद् देवतानां ज्योतिराद्यात्मभिश्च अवस्थातुम्, यथेष्टं च तं- तं विग्रहं ग्रहीतु सामर्थ्यम् । तथाहि श्रूयते-' मेधातिथि ह काण्वायनमिन्द्रो मेपो भूत्वा जहार ' ( षड्विगवा. १११ ) स्मर्यते च - ' प्रादित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम है ' इति । मृदादिध्वपि चेतना श्रधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते मृदब्रवीद्, प्रापोऽब्रुवन् - इत्यादिदर्शनात् । ज्योतिरादेस्तु भूतषातोरादित्यादिषु श्रचेतनत्वमभ्युपगम्यते । चेतनास्तु अधिष्ठातारो देवतात्मानः; मन्त्रार्थवादादिव्यवहाराद् इत्युक्तम् ' ( वेदा. १1३1३३ ) 1 ( ज्योति आदि विषयों वाले भी श्रादित्य आदि देवतावाची शब्द चेतन, ऐश्वर्यं वाले उस - उस देवतात्माको बताते हैं; क्योंकि -मन्त्र-अर्थवादादिमें वैसा ही व्यवहार देखा गया है । देवताओं में ऐसा ऐश्वर्ग है,
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२७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कि- देवता ज्योति आदिके प्रात्मारूप में रह सकते हैं; और अपनी इच्छा-नुसार शरीर धारण कर सकते हैं । जैसे श्रुतिमें - कण्वके लड़के मेधातिथि का इन्द्रने मेष बनकर धपहरण कर लिया । स्मृति में आदित्य पुरुष बनकर कुन्ती के पास गया । मट्टी आदिमें भी ' मिट्टी बोली ' इत्यादिमें चेतन अधिष्ठाता माने जाते हैं । ज्योतिरूपमें तो सूर्य प्रादि श्रचेतन माने जाते हैं, पर इनके अधिष्ठाता देवता मन्त्र ब्राह्मणादिके अनुसार चेतन माने जाते हैं ) । ( २१ ) सम्पूर्ण शांकरभाष्यको मथकर उसका सुन्दर विवरण प्रार्थ-समाजी पण्डित श्रीराजारामजी शास्त्रीने अपनी प्रथर्ववेदभाष्यभूमिका में किया है । उसके कई उद्धरण दिये जाते हैं— ' परमेश्वरकी सृष्टिमें देव-धारी जीवोंकी सृष्टि नाना प्रकारकी है । इस भूलोक में ही शैवाल, तृण, घास आदि नाना प्रकार के स्थावर और पशु - पक्षी आदि नाना प्रकारके जङ्गम हैं । ये सारे जीव - विशेष हैं । मनुष्य इन सबसे ऊंची श्रेणीका जीव है, पर परमात्माकी सृष्टि यहीं तक समाप्त नहीं है | मनुष्यसे कई दर्जो में ऊंचा पद रखनेवाले जीव भी उसकी सृष्टिमें विद्यमान हैं, जो मनुष्योंकी नाई चेतन हैं । वे अपनी शक्ति श्रौर ज्ञानमें इतने ऊंचे पहुंचे हुए हैं कि मनुष्यकी शक्ति और ज्ञान उनके सामने तुच्छ हैं । इस अनेक प्रकारकी ऊंची सृष्टिमें सबसे ऊंचा स्थान देवताओंका है । देवता चेतन हैं । मनुष्यसे ऊपर और परमेश्वरसे नीचे हैं । परमेश्वर की ओरसे उनको भिन्न - भिन्न अधिकार मिले हुए हैं, जिनका वे पालन करते हैं । देवता नजर और अमर हैं, पर उनका अजर - अमर होना मनुष्योंकी अपेक्षासे है, वस्तुतः उनकी भी अपनी - अपनी आयु नियत है । ब्रह्माण्डकी दिव्य शक्तियोंमें से एक - एक शक्ति पर एक - एक देवताका श्रधिकार है । जिस शक्ति पर जिसका अधिकार है, वही उसका देह है, जो उसके वशमें है । जैसे हमारे देहमें एक जीबात्मा हैं, जो इस देहका अधिपति है, इसी.. या ऐतरेय - महिवास शूद्र थे? [ २७७ प्रकार उस शक्तिके अन्दर भी एक जीवात्मा है, जो उसका श्रविपति २७-जैसे हमारे अधीन यह देह है, वैसे एक देवताके अधीन है । आदि रूपी देह है । हम एक थोड़ी - सी शक्ति वाले देहके स्वामी सूर्य [ पृथिवी पत एक बड़ी शक्ति बाले देहका स्वामी है । वह अध्यात्म - शक्तियों में हैं, वह दिच्छ बढ़ा हुआ है कि अपनी इच्छानुसार जैसा चाहे; वैसा रूप धारण इतना पर चाहे, वहाँ जा सकता है । वही देव सूर्य [ पृथिवी आदि ] का अधिष्ठाता कर जहाँ होनेस कहलाता है; और सूर्य [ पृथिवो आदि ] के नामसे ही बुलाया ' प्राश इसी प्रकार अग्नि और वायु [ एवं पृथिवी ] श्रादिके अधिष्ठाता जाता है । सन् देवता हैं । देवताओंका ऐश्वर्यं बहुत बड़ा है, पर वह सारा परमेश्वरके अधीन उपस है । एक - एक देवता एक - एक दिव्य शक्तिका नियन्ता है, पर उन सबके । सिध्या लुढ़क ऊपर उन सबका नियन्ता परमेश्वर है । इसलिए सभी देवता मिलकर भवति जगत्का प्रबन्ध इस प्रकार कर रहे हैं, जिस प्रकार राजाके अधीन उसके भृत्य उसके राज्यका प्रबन्ध करते हैं । देवताओंकी उपासनाग्रोंसे उन #t, fa कामनाओंकी सिद्धि होती है, जिसके कि वे मालिक होते हैं, पर मुक्ति ' नहीं ह नहीं । मुक्ति केवल ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होती है । देवता स्वयं भी ब्रह्मको किनार साक्षात् करने से मुक्त होते हैं । ब्रह्मको साक्षात् करके भी वे तब तक दिव्य-शरीरको धारण किये रहते हैं, जब तक उनका वह अधिकार समाप्त इ नहीं हो लेता, जिस अधिकार पर उनको परमेश्वरने लगाया है । हिप्र वार्तिक अधिकारकी समाप्ति पर वे मुक्त हो जाते हैं; और उनकी जगह दूसरे कारणं श्र ग्रहण करते हैं; जो मनुष्यों में से ही उपासना द्वारा उस पदवीके योग्य बन गये हैं । देवताओंक ऐश्वर्यके दर्जे होते हैं, और सबसे ऊंचा कटं इच्छायचि दर्जा ब्रह्माका है ' ( पृ. ११ ) तह? ( २२ ) इससे पृथिवी - देवताका दिव्यमूर्ति धारण भी स्पष्ट हो गया । इस प्रकार आपात रूपसे अचेतन दीख रहे पृथिवी प्रादि पदार्थोका पसं चेतनत्व वार्तिककार श्रीकात्यायन तथा महाभाष्य - प्रणेता श्रीमान श्री. ( 5. )
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२७७ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २७८ ] है । स्वीकार करते हैं । जैसे कि- ' घातोः कर्मणः समानकर्तृ का-भी पतञ्जलि वा ( ३ | १ | ७ ) इस पाणिनि - सूत्रसे इच्छा प्रथमें सन् होता है, ई. वह दिच्छा कूल पिपतिषति ' यहाँ किनारा व पत्थरके प्रचेतन इतना पर ' प्रश्मा लुलुठिषते, प्रभावके कारण इच्छार्थक सन् प्राप्त नहीं होता; तब जहाँ होनेसे इच्छा प्रचेतनेषु उपसंख्यानम् ' यह वार्तिक प्रचेतनोंमें आशङ्का अर्थ में ठाता ' प्राशङ्कायाम् T है । सन् करनेके लिए बनाया गया । ठता भाष्य इस प्रकार है- ' आशङ्कायाम् [ श्रर्थे ] अचेतनेषु कर्तव्यम् - अश्मा लुलुषिते, कूलं पिपतिषतीति । [ पत्थरके उपसंख्यानं प्रधीन लुढ़कनेकी, किनारे गिरनेकी प्राशङ्का है ] ( प्र. ) किं पुनः कारणं न सिष्यति ( इह इच्छार्थकः सन् )? ( उ ) एवं मन्यते - चेतनावतएतद् सबके । भवति इच्छा इति । कूलं च प्रचेतनम् ( अश्मापि ) च श्रचेतनः ' । लकर उसके ( आशङ्का अर्थमें अचेतनोंमें भी सन् करना चाहिये । पत्थरके लुढ़कने उन की, किनारे के गिरनेकी श्राशङ्का है । ( प्र. ) क्यों इनमें इच्छार्थक सन् मुक्ति नहीं होता? ( उ ) ऐसा माना जाता है कि इच्छा चेतनोंमें होती है । ह्मको किनारा और पत्थर दोनों अचेतन हैं ) । दिव्य. इसपर खण्डनवार्तिक आता है- ' न वा तु श्रकारणत्वाद्, इच्छाया माप्त हि प्रवृत्तित उपलब्धि: ' इस पर भाष्य यह है- ' न वा वक्तव्यम् ( पूर्व-है । वार्तिकम् ) । ( प्र. ) किं कारणम्? ( उ ) तुल्यकारणत्वात् । तुल्यं हि दूसरे, कारणं चेतनावति देवदत्ते, कूले च अचेतने । ( प्र. ) किं कारणम्? ( उ. ) वीके इच्छाया हि प्रवृत्तित उपलब्धिर्भवति । योपि सौ ( चेतनावान् देवदत्तः ) ऊंचा कटं चिकीभवति, नासी प्राघोषयति - कट करिष्यामीति । ( प्र. ) किं तह? ( उ. ) सन्नद्धं रज्जुकीलकपूलपाणि दृष्ट्वा तत इच्छा गम्यते । या । " कूलस्यापि पिपतिषतौ लोष्टाः शीर्यन्ते, भिदा उपजायते, देशाद् देशान्तर-नोका मुपसंक्रामति ( अतस्तत्रापि इच्छार्थक एव सन् कर्तव्यः । ) श्री. ( आशङ्का अर्थ में सन् करनेवाले वार्तिककी श्रावश्यकता नहीं है । ' ( प्र. ) क्यों? ' ( उ. ) चेतम - देवदत्त में तथा प्रचेतन - किनारे में कारण समान क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २७६ है 1 ( प्र. ) क्या कारण है? ( उ. ) इच्छाकी प्रवृत्तिसे उपलब्धि होती है । जो चेतन देवदत्त चटाई बनाना चाहता है; वह ढंढोरा नहीं पिटाना कि-मैं चटाई बनाऊंगा, किन्तु रस्सी और कील तथा मूंज आदि उसके हाथमें देखकर उसकी इच्छाका पता लग जाता है । इस प्रकार किनारा भी जब गिरा चाहता है, उसके ढेले गिरने लगते हैं । उसमें दरार पड़ जाती है, भूस्खलन हो जाता है; इसलिए उसमें भी इच्छायें-चाला ही सन् प्रत्यय करना चाहिये ) । इस पक्षमें कुछ ग्रस्वरस देखकर ' उपमानाद् वा सिद्धमेतद् ' यह अन्य वार्तिक बनाया गया । ( कूलं ) पिपतिषतीव पिपतिपति; इच्छेव इच्छा ' । यह उत्तर भी कृत्रिम था, अतः वार्तिककार इसमें वास्तविक उत्तर देते है – ' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' यहां भाष्य इस प्रकार है- ' अथवा सर्व X चेतनावत् । एवं ह्याह - कंसकाः सर्पन्ति, शिरीषोऽयं स्वपिति; सुवर्चला श्रादित्यमनुपर्येति । ऋषिः पठति शृणोत प्रावाणः ' ( तै.सं. २ । ३ । १३ । १ ) ( महा. ३ । १ । १ । ७ ) । यहाँ ' प्रदीप ' में कंयटने कहा है- ' ऋषिः वेदः, सर्व - भावानां ( पदार्थानां ) चैतन्यं प्रतिपादयतीत्यर्थः । श्रात्माऽर्द्ध तदर्शनेन-इति भाव: । ( तब यह शंका हुई कि यदि पत्थर आदि चेतन हैं, तो वे भी हमारी तरह चलते - बोलते क्यों नहीं? इस पर कहते हैं- ' वैचित्र्येण च पदार्थानामुपलम्भात् सर्वचेतनधर्मप्रसङ्गः सर्वत्र नोद्भावनीयः ' । ( पदार्थोंमें धर्मोकी विचित्रता होनेसे सब चेतनोंमें सब धर्म नहीं हो सकते ) यहाँ उद्योतमें श्रीनागेशभट्टने लिखा है- ' चेतनेषु मनुष्येष्वपि नानाजातीय-व्यवहारदर्शनादिति भावः । सर्वत्र परिणामदर्शनेन चेतनाधिष्ठानं विना च तदसम्भवात् सर्वस्य ( प्राणिनोऽप्राणिनो वा ) तद- ( चेतना ) विष्ठितत्वं ज्ञायते इति तात्पर्यम् ' । X यहाँ ' मतुप् ' प्रत्यय है, ' वति ' नहीं । सो ' दुष्कृतं चरकाचार्य ' में उसके कर्ताका ' वति ' प्रत्ययका अर्थ करना ठीक नहीं । इसपर पहले लिखा जा चुका है ।
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२०० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( सभी वस्तुएं चेतन होती हैं । तभी कहते हैं कि - कटोरे सरक रहे हैं । यह सिरसका वृक्ष सो रहा है । सूर्यमुखी फूल सूर्यकी प्रोर मुंह करता है । तभी वेदने कहा है- ' पत्थरो! सुनो । ) इसपर कैयटने लिखा है - वेदने यहां सभी पदार्थोको चेतन कहा है । विचित्रतावश सभी चेतनोंमें सभी चेतनोंके धर्मका प्रसङ्ग शङ्कित नहीं करना चाहिये । इसपर श्रीनागेशभट्टने कहा है - चेतन मनुष्यों में अनेक प्रकारके व्यवहारं दीखते हैं । तब सब स्थान परिवर्तन - परिवर्धन दीखनेसे चेतन - अधिष्ठान के बिना वैसा होना सम्भव नहीं, अतः सभी पदार्थ चेतनसे श्रधिष्ठित हैं, अर्थात् चेतन हैं ) । ( २३ ) इस सन्दर्भसे भूमि देवताकी शक्तिपर अच्छा प्रकाश पड़ता # । सो वेदके भी मतमें पृथिवी - देवता चेतन है । यदि अचेतन होती; तो वेद वद् विश्वा भुवनानि वज्रिन्! द्यात्रा रेजेते ( कम्पेते ) पृथिवी च भीषा ' ( ऋ. १७१४, १/६१/१६ ) इत्यादि मन्त्रोंमें पृथिवीका इन्द्रसे भय न दिखलाया जाता । जड वस्तुको भला भय कैसे हो? तब वेदके मत में पृथिव्यभिमानी देवता चेतन होनेसे उससे अधिष्ठित पृथिवी भी चेतन सिद्ध हुई | तभी वेदने ' भूम्यं पर्जन्य- पत्न्यै नमोस्तु ' ( श्र. १२ ११४२ ) पृथिव्या अकरं नमः ' ( अ. १२ ११२६ ) ' नमो मात्रै पृथिव्यै ' ( यजुःसं. ६/२२ ) इत्यादि मन्त्रोंमें पृथिवीको नमस्कार करके मूर्तिपूजा सिद्ध की है । तब पृथिवी महिदासके कुलकी देवता होनेसे उसकी शक्तिका प्रभाव महिदासमें भी जानना चाहिये । ( २४ ) इससे सिद्ध हुआ कि महिदासका ' मही ' यह स्त्रीलिङ्गान्त दो अक्षरोंवाला नाम नहीं था, जिससे ' दास ' पद उसका शूद्रत्व बोधक माना जावे, जैसेकि - श्रीसामश्रमीका अभिप्राय है, किन्तु कृदन्ती चार अक्षरों वाला ' महिदास ' यही नाम था । नामके मध्यमें ही शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास शब्द आयें, तो उनसे पुरुपकी ब्राह्मणता - शूद्रता आदि ! नहीं क्या ऐतरय महिदास शूद्र थ? [ २८१ जानी जाती, किन्तु नामसे पृथक् ही ठहरे हुए शर्मा, दास श्रादि शब्द २८२ पुरुषको वैसा बताते हैं । जैसे किसी स्त्रीका नाम ' रामकुमारी ' हो, वहाँ ' कुमारी ' शब्दमात्र गुप्त को देखनेसे उसका अविवाहितात्व नहीं जाना जा सकता, क्योंकि उसका इ सारा ही नाम ' रामकुमारी ' है । ' राम ' यह पुंलिङ्गान्त भला स्त्रीका उक्त तक ऐसा नह नाम कैसे हो सके? तव ' रामकुमारी ' यह नाम बिवाही स्त्रीका भी हो किन्होंके सकता है, परन्तु ' रमा कुमारी ' नाममें उसका ' रमा ' यह तु यक्ष नाम भी हो सकता है । ' कुमारी ' यह उसका विशेषण होनेसे उससे उसका वैश्य नट श्रविवाहितात्व भी सिद्ध हो सकता है । विवाह हो जानेपर वह द्वयक्षर दास आ नाम वाली अपने आपको ' रमा कुमारी ' नहीं लिख सकती । परन्तु पृथक र ( 2 ' श्रयुजानि स्त्रीणाम् ' ( आश्व. १ १५/६ ) इस शास्त्रोक्तिके अनुसार ' रमाद्रुमःरी ' यह पञ्चाक्षर ही सारा नाम उसका इष्ट हो, तो विवाहिता- सम्पूर्ण न भी वह अपना नाम ' रमाकुमारी ' लिख सकती है, क्योंकि उसमें चार प्रक्ष ' कुमारी ' शब्द नामके अन्तर्गत ही है, पृथक नहीं । होनेसे ' दास ' श इस प्रकार किसी क्षत्रियका नाम ' सत्यशर्मा ' वा ' कृष्णगुप्त ' है, अथवा मत ब्राह्मणका नाम ' धर्मवर्मा ' वा ' अभिनवगुप्त ' है, इस प्रकारके नामोंमें होनेसे उ समास होनेसे शर्मा, वर्मा, गुप्त शब्दोंसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्णं नहीं प्रमाणोंसे जाना जा सकता, किन्तु वहाँ ' सत्यात् शर्म यस्य स सत्यशर्मा क्षत्रियः. ६३ ) इ धर्मों वर्म यस्य स धर्मवर्मा ब्राह्मणः प्रभिनवाद गुप्त इति अभिनवगुप्तो यह नाम ब्राह्मणः कृष्णेन कृष्णाद् वा गुप्त इति कृष्णगुप्तः क्षत्रियादिः ' यह ' इतरा इ व्युत्पत्तियां होंगी । उस पुरुषके क्षत्रिय होने पर ' संत्यशर्मवर्मा ' इस प्रकार ( वेदकाल नामसे पृथक् ही ' वर्मा ' जोड़ा जाता है । इस प्रकार ' धर्मवर्म - शर्मा, कहा जा अभिनवगुप्त शर्मा, कृष्णगुप्त - वर्मामें भी जान लेना चाहिये । इसलिए सामश्रमी ध्वन्यालोकके टीकाकार ' श्रीअभिनवगुप्त ' गुप्तान्त होनेपर भी वैश्य नहीं दास कहे जाते, किन्तु ब्राह्मण हो । विकटारको चाणक्य ने कहा था-- तुलसीदास ब्राह्मणोऽह विष्णुगुप्तो नाम शिवगुप्ततनयः । ' ब्राह्मण होनेसे ही विष्णुः जाएंगे, इ और सुदान
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२८१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २८२ ] शब्द श्राद्धकेलिए निमन्त्रित किया गया था राजा नन्दके गुप्तको भी गुप्तान्त था, चन्द्रगुप्त भी । यदि दमात्र इधर विष्णुगुप्त होनेसे दोनोंको वैश्य माना उसका तर्क ठीक हो, तो गुप्तान्त । श्रीसामश्रमीका जावे । परन्तु स्त्रीका उक्त । विष्णुगुप्त ( चाणक्य ) ब्राह्मण था, चन्द्रगुप्त मौर्य शूद्र था, मी हो ऐसा नहीं में क्षत्रिय । यमराजके लेखक ' चित्रगुप्त ' भी गुप्तान्त होने से म भी किन्हीं के मत माने जाते । इससे स्पष्ट है कि सम्पूर्ण नामके अन्तर्गत गुप्त, उसका वैश्य श्रादि नहीं शब्द वैश्य, शूद्र, वर्णको नहीं बताते, किन्तु सम्पूर्ण ग्रामसे यक्षर दास ही वे वर्णचिन्ह बनते हैं । रखे हुए परन्तु ( २५ ) इस प्रकार ' महिदास ' में भी ' दास ' शब्द नामान्तगंत है, नुसार सम्पूर्ण नामसे पृथक् नहीं, अर्थात् उसका सम्पूर्ण नाम ही ' महिदाम ' यह हिता- चार अक्षरोंका था । ' मही ' यह द्वयक्षर उसका नाम नहीं था, स्त्रीलिङ्ग उसमें होनेसे ' मही ' यह पुरुषके नाममें कैसे जुड़ सकता है? तब मन्त ' दास ' शब्दसे उसकी शूद्रता कभी व्यक्त नहीं हो सकती । नथवा महिदास ( ऐतरेय ) अपनी कुलदेवता मही ( पृथ्वी ) का उपासक मोंमें होनेसे उसकी दासतावश ' महिदास ' नामसे बुलाया जाता था । पूर्वके नहीं प्रमाणोंसे व ब्राह्मणपुत्र होनेसे ' सकृदाख्यातनिर्ग्राह्या ' ( महाभाष्य ४।१ । त्रियः ). ६३ ) इस प्रमाणसे ब्राह्मणजातिवाला ही था । उसकी माताका ' इतरा ' गुप्तो यह नाम ही था । निरुक्तालोचनमें श्रीसामश्रमीने ही स्वयं लिखा है ---यह ' इतरा इति प्रसिद्धायाः कस्याश्चिदपि ऋषिरमण्याः पुत्रेण इदं प्रोक्तमिति ' नकार ( वेदकाल निर्णये २१८ पृ. ) । माताके नामके कारणं तो उसे ' ऐतरेय ' शर्मा, कहा जाता था, महिदास नहीं । जब वह ब्राह्मणका पुत्र सिद्ध है, चलिए सामश्रमीजीने वैसे माना भी है, तब वह शूद्र कैसे माना जाये? दासान्त होनेसे शूद्र मानने पर तो महान् ग्रनर्थं घटेगा । गो. तुलसीदास ( मानस - प्रणेता ) ब्राह्मण थे, तब वे भी दासान्त होनेसे शूद्र हो विष्णुः जाएंगे, इस प्रकार कालिदास भी । परन्तु ऐसा नहीं है । पहले दिवोदास धौर सुदास क्षत्रिय हुए हैं, क्या वे भी शूद्र हैं? ' मुद्राराक्षस ' का पात्र क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २८३ वैश्य चन्दनदास भी फिर शूद्र माना जायगा । श्राजके मोहनदास गान्धि वैश्य भी शूद्र हो जाएंगे । इस प्रकार श्रीदेवदास गान्धि, श्री पुरुषोत्तमदास-टण्डन, श्रीघनश्यामदास आदि नामोंमें भी जानना चाहिये । यदि ऐसा नहीं, यह व्यक्ति दासान्त - नामसे भी जब शूद्र नहीं हैं, क्योंकि - ' दास ' शब्द यहां नामान्तर्गत है, नामसे पृथक् वर्णचिन्ह नहीं; इसी प्रकार दासान्त होनेसे महिदास भी शूद्र नहीं । इससे ' ऐतरेय ब्राह्मण ' की पदानुक्रमणिकाकी भूमिकामें जो कि-श्रीविश्वनाथशास्त्री जोशीने ' शूद्र ' दासं प्रयोजयेत् ' यह प्रमाण लिखा है, और गोभिलट. के चिन्तामणि भट्टाचार्य के भाष्य में ' दासान्तं चान्त्यजन्मनः ' यह ग गातातपका वचन दिया गया है, और जो कि - ' शर्मा देवश्च विप्रम्य, वर्मा त्राता च भूभुजः । भूतिर्गुप्नश्च वैश्यस्य दासः शूद्रस्य कारयेत् ' यह वचन उद्धृत किया है, इनका उत्तर भी पूर्ववत् ही है । इनका कथन भी श्रीमामश्रमीका अन्धानुकरण हो है । शब्द भी वही हैं । सुश्रुतमें काशिराज श्रीदिवोदासका वर्णन है, तो क्या वे शूद्र थे? उसके-लिए बालमनोरमा ( लुक्समास ) में कहा है- ' कश्चिद् राजर्षिरयम् ' | इससे सिद्ध है कि शर्मा, दास आदि नामसे पृथक होते हुए वर्णव्यञ्जक होते हैं, नामके मध्यमें नहीं । ( २६ ) शेष प्रश्न है कि- ' यदि महिदास ब्राह्मण हैं, तो उनके नामके साथ ' शर्मा ' क्यों नहीं? इस पर जानना चाहिए कि एतदादिक सब कृत्य ब्राह्मणोंके अधीन थे? सब वर्णं अपने - अपने कर्ममें संलग्न थे, तब ' शर्मा ' के साथ न होनेपर भी भ्रमकी सम्भावना नहीं थी । विशेषण व्यभिचार ( प्रतिप्रसक्ति ) की प्राप्ति पर ही देना पड़ता है । प्रसिद्ध है-' मम्भवव्यभिचाराभ्यां स्याद् विशेषणमर्थवत् । ' तभी तो प्राचीन समय में शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास आदि चिन्ह जोड़ने की शैली कहीं भी न दिखाई, न सुनाई पड़ती है । तब प्राचीनकालके ' महिदास ' के नाम में स्थित ' दास ' शब्द में ही वह शैली कहांसे घुस पड़ी?
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२०४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) शर्मा आदि संकेतोंका तो प्राजके समय में ही अधिक उल्लेख आवश्यक है, क्योंकि - प्राजके प्रवर वर्ण, उच्च वर्णोंके कर्म करते हुए भी लज्जित नहीं होते । तब उनसे भेदकतार्थ ' शर्मा ' आदि चिन्होंको साथ लगाना पड़ता है, परन्तु पहले सभी स्वस्वकर्मनिरत थे । अतः उस समय ' शर्मा ' आदि न लिखने पर भी भ्रम वा व्यभिचार सम्भव नहीं था । नहीं तो याज्ञवल्क्य, शौनक, पाणिनि श्रादिके नामके साथ ' शर्मा ' न होनेसे वे क्या शूद्र मान लिए जाएंगे? यदि ऐसा नहीं, तब ' अत्र " विद्वान् महिदासः " इति लिखितम्, ब्राह्मण ऋषिर्वा महिदास इति न, अतोऽयं शूद्र ' ( यहाँ विद्वान् महिदास यह लिखा है; ब्राह्मण वा ऋषि महिदास नहीं लिखा; इसलिए महिदास शूद्र है ) यह सामश्रमीजीका अनुमान कुछ भी महत्त्व नहीं रखता । ( २७ ) श्रीसामश्रमीका यह लिखना कि - ' यदि महिदासके नामके साथ ' ऋषि ' शब्द प्रयुक्त होता, तब वे ब्राह्मण माने जाते, निरुपपत्तिक है । ऋषि मन्त्रद्रष्टा श्रा करते हैं - यह स्वयं वे अपने ' निरुक्तलोचन ' में मान गये हैं । जब महिदास मंत्रद्रष्टा नहीं थे, तब प्रबाधितरूपसे उन्हें ' ऋषि ' कैसे कहा जाता? यदि सामश्रमीजीके अनुसार ऋषि होनेसे ब्राह्मण होता है, पर महिदास अव ऋषि न होनेसे ब्राह्मण नहीं, तो कवषको वे ब्राह्मण क्यों नहीं मानते? वे तो मन्त्रद्रष्टा ऋषि थे । परन्तु श्रीसामश्रमी उसे ब्राह्मण न मानकर शूद्र मानते हैं, तब उनकी युक्ति अपने मतसे भी विरुद्ध सिद्ध हुई । वस्तुतः ' ऋषि ' शब्दसे मन्त्रका बोध होता है, ब्राह्मणका नहीं, ' यद् ब्रह्मभि: ( ब्राह्मणैः ) यद् ऋषिभिः यद् देवंविदितं पुरा ' ( अथ.सं. ६।१२।२ ) इस मन्त्रमें ब्राह्मण, ऋषि और देव पृथक पृथक् कहे गये हैं । इससे स्पष्ट है कि- ' ऋषि ' शब्दसे ब्राह्मणका बोध नहीं होता । ऋषि - योनि तो मनुष्य योनिसे भिन्न होती है यह हम ' वेदकी ऋषिकाएं ' ( ७२-७९ पृष्ठ ) में बता चुके हैं । ( २८ ) जोकि - श्रीसामश्रमीजीने महिदासके दूसरे नाम ' ऐतरेय'-क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २८५ शब्दमें ' स्त्रीभ्यो ढक् ' ( पा. ४ | १ | १२० ) इस अथवा ' शुभ्रादिभ्यश्च ' २८६ ( पा. ४ | १ | १२३ ) इस सूत्रसे ढक् प्रत्यय बताकर इतरा नामकी माताके नामसे प्रसिद्ध होने से, पिताका नाम प्राप्त न करके महिदासक शूद्र होनेका अनुमान किया है- यह भी ठीक नहीं । प्राचीन बहुतसे पुरुषोंके नाम उसकी माताके नामसे भी देखे गये हैं । उसमें एक कारण है— ' सहस्र तु पितृनु है, उस माता गौरवेणातिरिच्यते ' ( मनु. २।१४५ ) ( माता हज़ार पिता पर्वत भी गौरवमें बढ़कर है ) इस शास्त्रीय वचनका अनुसरण । जैसे कि- काक ' वृहदारण्यक ' के अन्तिम वंश ब्राह्मण में गौतमीपुत्र, भारद्वाजी पुत्र, प्रोक्त पाराशरीपुत्र, काण्वीपुत्र, आत्रेयीपुत्र, शाण्डिलीपुत्र, ( ६।५।१-२ ) श्रादि अनुसा नाम माताके नामसे बताये गये हैं; शाङ्करभाष्य में इसपर ' स्त्री - प्राधान्याद् बता ह मिलने गुणवान् पुत्रो भवतीति प्रस्तुतम् । श्रतः स्त्रीविशेषणेनैव पुत्रविशेषणाद् माता के आचार्यपरम्परा कीर्त्यते ' ( शंकरा. ) ' स्त्रीप्राधान्यवशान्मातृनाम्ना निर्देश: ' व्यभिच यह सूचित भी किया है, तब क्या यह ऋषि शूद्राके पुत्र शूद्र माने जाएंगे? ( महोदय महाभाष्य में श्रीपाणिनिको कई वार ' दाक्षीपुत्र ' इस प्रकार माताके नहीं मा नामसे मृत किया गया है । श्रीपतञ्जलि अपने आपको ' गोणिका - पुत्र ' नामसे कहते हैं, ' सौमित्रि ' यह लक्ष्मणकेलिए, ' गाङ्गेय ' यह भीष्मकेलिए, परिचय ' कौन्तेय ' युधिष्ठिरकेलिए, ' सौभद्र'य ' अभिमन्युकेलिए मातृनाम प्रसिद्ध है! ऐतरेय क महाकवि - भवभूति ' उत्तररामचरित ' में अपने आपको ' जतुकर्णीपुत्र ' बताते हुआ क । तब क्या यह सब व्यक्ति मातृनाम मिलनेसे शूद्र माने जाएं? यदि गोणिका नहीं, तब यही उपपत्ति ऐतरेयको शूद्र सिद्ध करनेमें निर्बल सिद्ध हुई । यदि न मातृ - नामका अन्य कारण एक पुरुषकी बहुत पत्नियाँ होना भी होता है । माण्डूक पिता एक और माताएं जब बहुत हों, तब उन माताओंके पुत्र पिताके चुके हैं नहीं - किन्तु अपनी - अपनी माताके नामसे भेदकतार्थं प्रसिद्ध किये जाते हैं, मिलने से जैसे कश्यप मुनिकी अदिति पत्नीके पुत्र ' प्रादित्य वा श्रादितेय नामहे । पिताका दिलिके दैत्य, विनताका वैनतेय, कद्र के काद्रवेय नामसे प्रसिद्ध थे । स्वा.द. . (