सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 171–180

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 171–180

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२८५ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २८६ 7 व्यश्च ' ताके प्रकार एक महर्षिकी बहुत पत्नियां होनेसे जैसाकि - श्रीसायणने इस दोनेका प्राख्यायिकामें लिखा है, उनमें इतराका पुत्र भी ' ऐतरेय ' कहा गया नाम उसकी अन्य विमाताएं थीं । इससे सम्मान शूद्र कैसे हो सकती है? यह है, उसकी पतृतु पर्वत नामक ऋषिका पुत्र था - यह पूर्व बता चुके हैं, वह ' ऐतरेय ब्राह्मण'-काकर्ता था- इन बातों से वह स्पष्ट ब्राह्मण सिद्ध होता है; श्रन्यथा उससे कि- प्रोक्त ग्रन्थकी ' ब्राह्मण ' संज्ञा न होती - यह हम स्वाद के अभिप्राय के दीपुत्र, अनुसार बता ही चुके हैं । पुराणके वचनसे उसके पिताको भो ब्राह्मण आदि बता ही चुके हैं । इस सामश्रमीजीकी युक्तिमें तो ऐलूष - कत्रषका पितृनाम उत्पाद मिलनेसे वह भी ब्राह्मण सिद्ध हुआ । यदि वह शूद्र होता, तो उसकी भी षणाद् माताके नामसे प्रसिद्धि होती । तव यह सामश्रमीजोकी युक्ति भी नदेशः ' व्यभिचरित सिद्ध हुई । माने ( २६ ) जो कि – ' छूत और अछूत ' ( पूर्वार्ध ) में श्रीसातवलेकर महोदयने कहा है - ' यह इतरा - स्त्रीका पुत्र था, इसलिए ' ऐतरेय ' कहलाया; नाताके नहीं मालूम कि - इसका पिता कौन था, इसलिए उसका नाम उसकी माँके का - पुत्र नामसे चलता है ', ' यह भी ठीक नहीं । हम पुराणादिसे उसके पिताका कलिए, परिचय दे चुके हैं । सायणने उसे ऋषि, पुराणने उसे द्विज, स्कन्दपुराणने = {! ऐतरेयको भी द्विज कहा है । पिताका नाम पता न होनेसे पुरुष शूद्र नहीं-बताते हुआ करता । श्रीपतञ्जलि आदिके पिताका नाम न मिलने और माता-यदि गोणिकाके नामसे प्रसिद्ध होनेसे क्या उन्हें शूद्र मान लिया जायगा? यदि नहीं, तब ऐतरेयके विषय में भी यह क्यों नहीं सोचा जाता? वह है । माण्डूकि वा पर्वत नाम वाले ब्राह्मणका लड़का था — यह हम बता ही पिता के चुके हैं । तव ब्राह्मणका लड़का शूद्र कैसे हो? पिताका नाम भिन्न - भिन्न ते हैं । मिलनेसे यदि शूद्रता हो; तो कहीं अम्बाशङ्कर और कहीं करसनदास नामसे पिताका नाम मिलनेसे और भिन्न - भिन्न प्रकारके इतिहास मिलने से स्वा.द. भी शूद्र सिद्ध हो जावें । क्या वादी ऐसा माननेको उद्यत हैं? . ( ३० ) इधर महिदासको शूद्र मानने पर वादियोंके साम्प्रदायिक क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २८० . सिद्वान्ता भङ्ग भी होता है । उसमें प्रश्न हैं कि महिदास जन्मसे शूद्र था. वा गुणकर्मसे? यदि जन्मसे अर्थात् शूद्रापुत्र होनेसे, तव ' वर्णव्यवस्था गुणकर्मसे होती है ', यह वादियोंका सिद्धान्त खण्डित होता है । यदि वह गुणकर्मसे शूद्र था, तो उसके कौनसे निकृष्ट गुणकर्म थे? वह इतरा भी किसी शूद्रकी कन्या होनेसे शूद्र थी, वा निकृष्ट गुणकर्मसे? दोनों ही पक्षोंमें क्या प्रमाण है? यदि ऐतरेय, शूद्राके पुत्र होनेसे शूद्र था, तो वर्ण - व्यवस्था जन्म से सिद्ध हुई, फिर उसे ब्राह्मण - पदवी कब और कहाँ मिली? वह शूद्रसे ब्राह्मण बन गया - यह कहाँ लिखा है? इसमें प्रमाण क्या है? इसमें श्रीसामश्रमी वा उनके पिछलगुग्रोंके साध्य प्रमाण यहां प्रमाणित नहीं हो सकते । यहाँ प्राचीन ऐतिहासिक प्रमाण अपेक्षित हैं । उनके न होने से यह सिद्ध हुआ कि कोई मन्त्र वा ब्राह्मणका द्रष्टा शूद्र नहीं । ' वह गुणकर्मसे शूद्र था ' - यह तो प्रत्यक्षमे भी विरुद्ध है । जो वेदके भागको प्रकाशित करता है - वह गुणकर्मसे शूद्र कैसे हो सकता है? अथवा यदि वह जन्मसे शूद्र है; पीछे ब्राह्मण हो गया; तव तो यह भी सिद्ध हुआ कि सामान्यतया वर्णव्यवस्था जन्मते ही सिद्ध होती है, कहीं अपवादवश वर्ण का परिवर्तन हो जाता है । पर मूल - द्वान्तनो सामान्य-शास्त्र के ही अनुसार होता है । अपवाद सिद्धान्तकी गिनती में कभी नहीं थाना । यदि कहीं महिदासका शूद्र से ब्राह्मण बनना नहीं लिखा; तो वादि-सम्मत ' शूद्र ' का लक्षण कट गया । तव शूद्रादि - वर्ण जन्म दूलक सिद्ध हुए । पर महिदासकी तो जन्मसे शूद्रता ही प्रसिद्ध है । इसका पिता ब्राह्मण है, माता भी शूद्रा नहीं यह हम सिद्ध कर ही चुके हैं । ' इतरा ' तो उसकी माताका नाम ही था । नाम होनेसे हो ' इतरा ' शब्द सर्वनाम-न रहा, अतः ' इतराया अपत्यम् ' यह उसकी व्युत्पत्ति वादी - प्रतिवादियोंने • परजीवित की है, अनूदित की है, प्राहत की है । नीच अर्थ होनेसे तो

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२८८ ] श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) सर्वनाम- संज्ञा न हटनेसे ' इतरस्या अपत्यम् ' यही व्युत्पत्ति होती, पर वैसा न होने वा न दीखनेसे वादियों की मूलभित्ति ही निर्मूल होनेसे गिर गई-यह विद्वान् पाठकोंने स्पष्ट अनुभव कर लिया होगा । ( ३१ ) इससे ' वैदिकधर्म ' ( ३११३ ) में सभी भाष्यकार ' इतराका पुत्र ' ऐतरेय ' लिखते हैं- इनते मरिदास शुद्र ही सिद्ध होते हैं, क्योंकि अमरकोष के अनुसार ' इतरा ' शब्दार्थ ही नीच है ' यह कहते हुए एक पूर्वपक्षी का भी खण्डन हो गया । ' इनरा ' इस नामसे वह ' नीच ' कैसे हो सकती है? अमरकोषमे ' सिंह ' शेरका और ' शिव ' महादेवका नाम है, तो क्या शिव-पूजनसिंह ' ' महादेवकी पूजाका शेर ' है? ' कुशवाहा यह उसका नाम क्या ' कुश उखाड़ने वाली स्त्री ' होनेसे है? यदि नहीं, तो यहाँ भी वैसा क्यों नहीं समझने? क्या वादी शूद्रोंको भी नीच मानते हैं? जन्मसे, वा गुण-कर्मसे? इतरामें वह नीचता कैसे घटती है? उसकी नीचतासे उसका पुत्र भी नीच कैसे? उसने कौन सी नीचता की? अथवा माताके शूद्र होनेसे यदि पुत्र भी शुद्र होता है; तो वर्णव्यवस्था जन्मसे सिद्ध होती है । वस्तुनः इन लोगोंके पास श्रीसामश्रमीका वचन ही आधार है, जो स्वयं ही साध्य है, सिद्ध, मूल आधार इनके पास कोई नहीं, तब इनका पक्ष भी निर्मूल ही है । ( ३२ ) जो कि वादी वहीं कहता है कि- ' छान्दोग्य उपनिषद् ' तथा ' ऐतरेयारण्यकके वचनसे महिदास, ब्राह्मण सिद्ध नहीं होते, वहाँ तो ' इतके पुत्रने यह कहा है ' यह लिखा है । इससे महिदास शूद्र सिद्ध होते हैं, क्योंकि - ' इतरा ' शब्दार्थ ही ' नीच ' है । " यह भी ठीक नहीं इस पर उत्तर पहले कहा जा चुका है । ' इतरा ' नामका अर्थ ' नीच ' और ऐतरेयका श्रयं ' नीच स्त्रीके लड़के शुद्ध ' का नहीं होता । न कभी कोई ऐसा लिखता ही है कि- श्रमुक बात नीच स्त्रीके लड़केने कही है । वह शूद्र था या ब्राह्मण; यह इतिहासका विषय है । इतिहाससे हमने उसे ब्राह्मण सिद्ध क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? कर दिया है । आरण्यक उपनिषद् के ' एतद् ह स्म श्राह महिदास ऐतरेय: ' भी वादीसे इष्ट अर्थ नहीं । महिदासका मत वहाँ दिया जावे इस वचनमें और फिर नीच स्त्रीके पुत्र शूद्रने यह कहा है ऐसा उसका गौरवार्थ विशेषण दिया जावे, यह न्याय्य बात नहीं हो सकती । अपने पक्षकी दुसरेका प्रमाण वा साक्षी उत्तमता बताकर उपस्थापित की जाती पुष्ट्यर्थ-को नीचता बताकर नहीं । ' यह हमारी कही हुई बात एक नीचके है, पुत्र उस मानी है यह कह कर किसीका प्रमाण कभी नहीं दिया जाता । पिताकी उत्तमत्तासे पुत्रकी उत्तमता बताई जाती है । जैसेकि मनुस्मृतिमें- माता-' श्रोत्रिय: पिता यस्य पुत्रः स्याद् वेदपारगः । श्रोत्रियो स्यात् पिता स्थाद् वेदपारगः ' ( ३।१३६ ) ज्यायांसमनयोविद्याद् वर यस्य पुत्रः स्यात् श्रोत्रियःपिता ' ( ३।१३७ ) यहाँ पर पिताकी उत्तमतासे पुत्रको उत्तमता मानी गई है, पुत्रकी उत्तमता तथा पिताकी नीचतासे पुत्रकी उत्तमता नहीं मानी गई । इसका मूल वेदमें भी देखिये-‘ ब्राह्मणमद्य विदेयं पितृमन्तं पैतृमत्यम् ' ( यजु. माध्यं. ७।४६ ) अर्थात्-मुझे इस प्रकारका ब्राह्मण मिले, जो पितृमान हो । ' पिता अस्य श्रस्ति-इति पितृमान्, तम् ' । यह प्रर्थ ठीक नहीं । पिताके बिना कोई नहीं उत्पन्न होता, अतः यहाँ प्रशस्त प्रथमें मतुर है, ' प्रशस्तपितृकम् ' इत्यर्थः । ह यहाँ — ' पितृ ' शब्दसे माता - पिता दोनोंका ग्रहण है, एकशेष ( पा. ११२ | ७० ) प से ' मातृ ' शब्दका लोप है । ' पतृमत्यम् ' से प्रशस्त पितामह ( दादा ) प्रादि विवक्षित हैं— ' पितर: -पितामहादयः प्रशस्ता यस्य स तम् ' । पु य इससे माता - पिताकी प्रशंसासे पुत्रको प्रशंसा सिद्ध हुई, परन्तु ' नीच- का माता - पिताके पुत्र महिदासने ऐसा कहा है- ' ऐसा कहने से महिदास की प्रशंसा कभी नहीं हो सकती, किन्तु निन्दा हो । तब वादीका मत भी उपेक्ष-णीय सिद्ध होगा । दूसरेका नामग्रहण उसकी पूजा - सम्मान के लिए होता श्र स ० ध ० १६

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२६१ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६० है जैसे- ' वा सुप्यापिशले: ' ( पा. ६।१।९ २ ) इस सूत्रमें प्रापिशलिके नाम-वचनमें, रवार्थ ग्रहणके लिए कहा है— ' आपिशलिग्रहणं पूजार्थम् ' । श्राषिशलके पुत्रने विशेषण: ऐसा माना है । तब उपनिषद् वा आरण्यकमें गौरव के लिए लिया हुआ वह नाम व्यर्थ हो जावेगा - तरा - नीच माता के पुत्र ने यह कहा है; है, उस अथवा ' इतरयोः नीचयोः शुद्रयोः पुत्र इदमाह ' ( नीच शूद्र माता - पिता के के पुत्र पुत्रने यह कहा है ) यह कहा जावे - यह इतनी स्पष्ट वात है कि यहाँ माता- अधिक कहना वा लिखना अनावश्यक है । अतः वादीको अपने पक्षकी तिमें- पुष्ट्यर्थं दूसरेका नामग्रहण प्रशंसार्थं इष्ट होनेसे उपनिषद् और आरण्यकने पुत्रः भी महिदासकी प्रशंसार्थं उसकी माताका नाम लेकर उसे उच्चकुलप्रसूत यस्य ब्राह्मण ही सिद्ध कर दिया है - यह रहस्यज्ञाताओंके लिए स्पष्ट है । पुत्रकी वहाँ ' इतरा नाम वाली माताके पुत्र महिदासने यह कहा है ' ऐसा पुत्रकी तो उसके गौरवार्थं कहा जा सकता है । माताका नाम - ग्रहण ' सहस्र ' तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते ' ( मनु. २११४५ ) इस बवन से पिताकी अपेक्षा भी माताके अपने सम्मानार्थ है, अथवा बहुत माताम्रों वाले होने से I उसकी अपनी माताके परिचयकेलिए नीच प्रर्थं तो कभी विवक्षित नहीं I हो सकता; नहीं तो दाक्षीपुत्र नामसे बुलाये जाने वाले पाणिनि, गोणिका-। I पुत्र नामसे कहे जाने वाले पतञ्जलि, तथा माताकें नामसे प्रसिद्ध अन्य 90 ) व्यक्ति भी शूद्र माने जावें, पर यह अनिष्ट है । स्कन्दपुराणमें इतराके प्रादि I पुत्रको द्विज कहा है, और इतराको साध्वी और गुणगणना कहा है-यह हम ( १२ अंश में ) बता चुके हैं । एतदादिक बातें वादीका अभिप्राय नीच- काट रही हैं । पेस- ( ३३ ) जोकि - सामश्रमजीने कहा है- ' एतद् ह स्म तद् विद्वान् होता आह महिदासः ' ( ३।१६६७ ) इस छान्दोग्यके वचन में महिदासके लिए ' विद्वान ' शब्द आया है, ऋषि वा श्राचार्य नहीं, अतः यह ब्राह्मण ( ऐत. १४ पृ. ) यह भी ठीक नहीं । उक्त स्थल में ' विद्वानका अर्थ नहीं ' नहीं, किन्तु ' जानन ' यज्ञदर्शनको ' पंडित ' जानते हुए महिदासने कहा है, यही क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २३१ अर्थ इष्ट है । ' विद्वान् ' शब्द ' विद् ' धातुसे किये शतृप्रत्ययको करने पर सिद्ध होता है, जिसका अर्थ शतृप्रत्ययके वसु प्रादेश उससे श्रीसामश्रमीजीकी अनुसार ही होता है । कुछ भी इष्टसिद्धि नहीं, प्रत्युत यज्ञतत्त्वको ज्ञाननेवाले होनेसे श्रीमहिदास, ब्राह्मण सिद्ध होते हैं; शूद्र नहीं | तब जिन महाश्रयोंने श्रीसामश्रमीजीके मतको हो प्राधार बनाकर श्रीमहिदासको शूद्र कहा है, उनका पक्ष खण्डित हो गया । निष्प्रमाण होनेसे श्रींसाम-श्रमीजीका पक्ष ' साध्य ' सिद्ध हुआ, ' सिद्ध ' सिद्ध नहीं । ( ३४ ) जो कि ' आर्य और दस्यु के श्रीरा दे.. जीके मनसे वादी महिदासको शुद्र बताता है, यह तो व्यर्थ है । उसमें तो उनने ' यह किसी ऋषिकी पत्नी इतराका पुत्र था ' यही लिखा है । इससे वह शुद्र कैसे हो जावे? पिताको जब ऋषि कहा है, तो उसका पुत्र भी ब्राह्मण ही प्रतिफ लित होता है । यदि श्रीरा. दे. जी उसे शूद्र लिख भी दें, तो उनका कथन निष्प्रमाण होनेसे चिन्त्य होगा, ' सिद्ध ' नहीं । ( ३५ ) हमारे शिष्य स्व. श्रीघ. दे. शास्त्री ( दर्शन केसरी ) का ' सुत्रा ' ( ११।२ ) में ' महिदास जैसे शुद्र उसी जमाने में ब्राह्मण - ग्रन्थोंके निर्माता बने हैं- ' यह कथन भी केवल गतानुगतिकतामात्र है । उस महाशयने भी इस विषय में कोई सिद्ध प्रमाण नहीं दिया, अतः निर्मूल है । जोकि उसने कहा है- ' महाभारत ' में तो अनेकों ऐसी दन्तकथाएं मिलती हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि - शुद्र भी बड़े विद्वान् और प्रतिष्ठित होते थे ' यह भी भ्रम है । हम तो मनुके शब्दसे कहते है- ' न ब्राह्मणक्षत्रिययोः.. कस्मिँश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते ( ३११४ ) कि किसी ब्राह्मणको स्त्री शुद्रा नहीं अनुशिष्ट की गई । जिसके माता - पिता दोनों शूद्र हो; ऐसे शुद्रका वर्णन उनको प्रकृत में दिखलाना चाहिए था, पर वैसा नहीं दिखलाया । हाँ, धर्मव्याघकी तरह कोई आरूढपतित हो, वह तो अपवाद ही होगा, सामान्य नहीं । व्यवस्था सामान्यशास्त्रसे होती है । ' विद्वान् ' इस शब्दसे यदि उन्हें ' बेदभिन्न ग्रन्थका विद्वान् ' अर्थ इष्ट हो, तो हमारा

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२२ ] श्रीसनातन धर्मालोकः ( ३-२ ) अधिक विवाद नहीं । शूद्रकी विद्वत्तासे गुणकर्मसे वर्णव्यवस्था कटती है-यह भी वादियोंको विचारना चाहिये । ( ३६ ) श्री र. का. शास्त्री, ठा. ब. ज. सि., श्रीनो.ला. आादियोंका ऐतरेयको ' दासी पुत्र ' बताना ' साध्य ' ही है, ' सिद्ध ' नहीं । ' दासी ' भी शूद्रा हो - यह भी आवश्यक नहीं । शर्मिष्ठा देवयानीकी दासी थी, पर न तो वह ' शूद्रा ' थी; और न उसके लड़के पुरु आदि दासीपुत्र शूद्र माने जाते हैं । उन महाशयने श्रीसामश्रमी तथा उनके पिछलगुवा श्रीकाव्यतीर्थंके कहने से वैसे लिखा है, हमने उस पक्षका खण्डन कर ही दिया है; मूल आधार जिससे महिदास शुद्ध सिद्ध हो सकें, इनके पास सर्वथा नहीं है । तब श्रासामश्रमी-के मतके निराकरणसे ' प्रधानमल्लनिबर्हण ' न्यायसे वा ' गर्भिणीहनने गर्भ-हननवत् ' इस लोकोक्ति से उनका पक्ष कट गया । बीजकी प्रधानतासे, उसके पिताके ब्राह्मण होनेसे श्रीमहिदास स्पष्ट ब्राह्मण ही सिद्ध होते हैं । इतराको भी किसी इतिहासमें शूद्रा नहीं कहा । विवाह सवर्णासे ही शास्त्रोंने अनुशिष्ट किया है. तब एक ऋषि ब्राह्मण असवर्णा विवाह कैसे करे? जहाँ वैसा करता है; वहाँ वैसा निर्देश लिखा हुआ होता है. पर यहाँ कहीं ऐसा नहीं लिखा । श्रीसामश्रमीके अनुसारियोंने उनकी अपेक्षा कोई नया प्रमाण वा नई उपपत्ति भी तो नहीं दो, तब उनकी सम्मतिका क्या मूल्य हो सकता है? हाँ, श्रीसाम-श्रमीसे पूर्वकालीन किसी प्रामाणिक विद्वान्का वा पुराण- इतिहास आदिवा कोई परिपुष्ट प्रमाण दिया जाता, तो उसका कुछ महत्त्व भी था, पर अब केवल साध्य श्रीसामश्रमीका पक्ष समर्थन ' साध्यसम ' हेत्वाभास ही है । ( ३७ ) जोकि शुद्रोंको वेदाधिकार की सिद्धि के लिए वादीने ' वैदिक-धर्म ' में ' शूद्रस्य वेदाधिकारे साक्षाद् वेदवचनमपि दर्शित स्वामिदयानन्देन ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' इति तदेवं वेदविधेः पक्षपातदोषभाक्त्वं न कथमपि - इति स्पष्टम् ' ( शूद्रके वेदाधिकारमें साक्षाद् वेदका — ' यथेमां वाचं क्या ऐतरेय महिदास शूद्र थे? [ २६३ कल्याणीम् ' वचन भी स्वाद ने दिखलाया है - तब इस प्रकार वेद भी सर्वथा नहीं है - यह स्पष्ट है ) यह श्रीसामश्रमीजीका उद्धरण पक्षपाती लिखकर इससे वेद - प्रवक्ता श्रीमहिदासकी शूद्रता एक ढंगसे सिद्ध करनेकी चेष्टा है, इस पर यह जानना चाहिये कि यह मन्त्र शूद्रादिको वेदधिकार को नहीं । इस विषय में हम इस ग्रन्थके आरम्भसे ५५ पृष्ठ तक - प्रद डाल ही चुके हैं - इससे भी बादीके पक्षकी सिद्धि नहीं । इस प्रकाश नाम लेनेसे भी सिद्ध हुआ कि श्रीसामश्रमीको उक्त मन्त्रका स्वा. द के. तथाकथित अर्थ इष्ट नहीं । नहीं तो स्वाद का नाम न लेकर स्वा. द का. उक्त मन्त्रको स्वयं वैसा अर्थ लिखते । शद्रोंको वेदाधिकार न देनेसे वेदादि - शास्त्रोंका पक्षपाती होना भी नहीं हो सकता । गत जन्मके कुत्सित - गुणकर्मों से और पूर्वजन्मके सिद्ध होनेसे इस जन्म में यदि परमात्माने वा ऋषियोंने शूद्रको वेदका श्रधिकार पुण्य न नहीं दिया, तो इसमें भी पक्षपात नहीं । वादीको बताना चाहिये कि -परमात्माने उनके साम्प्रदायिक - सिद्धान्तानुसार वेद चार ऋषियों (? ) को दिये, इनमें कोई स्त्री तथा शूद्र क्यों नहीं रखा गया? क्या यह पक्षपा द नहीं? यदि चे स्वा. द. जीके शब्दों में कहें कि -स श्रत ईश्वरे पक्षपातस्य - लेशोपि नैव प्रागच्छति; किन्तु श्रनेन तस्य न्यायकारिणः परमात्मनः सम्यग् न्यायः प्रकाशितो भवति । कुत:? ज न्यायेति अस्यैव नाम अस्ति; यो यादृशं कर्म कुर्यात्, तस्मै तादृशमेव फ दद्यात् । अत्रैवं वेदितव्यम् — ' तेषामेव ( चतुऋषीणां ) पूर्वपुण्यमासीत्, श्रत: -खलु एतेषां हृदये वेदानां प्रकाशः कतु योग्योस्ति ' ( ऋ.भा.भू. वेदोत्पत्ति-बिषय -१६ पृष्ठ ) ( इससे ईश्वन्द में पक्षपातदोषका लेश भी नहीं आ सकता, किन्तु इससे उस न्यायकारी परमात्माका सम्यक् न्याय ही प्रकाशित होता है, क्योंकि - न्याय इसीका नाम है, जो जैसा कर्म करे, उसे वैसा हो फल दिया जावे । इसमें यह जानना चाहिये कि उन चार ऋषियोका तव भ पूर्वजन्मका पुण्य था, इसलिए उन्हीं चार ब्राह्मणों के हृदय में वेदों का प्रकाश एव

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२३३ २६४ ] क्षपाती लिखकर करना योग्य था ) टाकी तब हमारी वर - व पूर्वजन्मके कर्म प्रकाश पुरुष- रूपमें जन्म वा.द.के श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) । ओरसे उत्तर भी यही होगा कि — स्त्री - शूद्र आदियोंके इस प्रकारके थे कि उनका त्रैवणिकोंके घर और नहीं हुआ । इससे उन स्त्री - शूद्रों का प्रतिनिधि भी वेद-ग्रहणमें नहीं रखा गया । तव स्त्री - शूद्रोंके वेदमें अनधिकारसे भी .द.का ईश्वरका पक्षपात नहीं, अपितु उन पर अनुग्रह ही किया है जैसे कि वादी मन्त्रका से उधृत उद्धरणके आगे ही श्रीसामश्रमीने लिखा है-' स्पष्टं च दासानामनुपयुक्तमतीनां मन्वादिकर्तृकं वेदानधिकारित्व-सिद्ध विधानम् अनुग्रहार्थमेव इति ' ( ऐत. पू. १७ ) । ( स्पष्ट ही है कि— धिकार पुण्य न अनुपयुक्त बुद्धिवाले शुद्रादिके लिए वेदका अधिकार न रखना मनु आदियों-क- का उनपर अनुग्रहार्थ ही है । ) २ ) को जैसे कि कई लोग सारा समाचारपत्र पढ़कर उसमें प्रयास करके क्षपाउ दृष्टिको कष्ट देकर देशकी दशाको जान लेते हैं; और कई लोग समाचारपत्रके, पढ़ने - देखनेके कष्टके बिना ही अन्य द्वारा उसका निष्कर्ष श्रनेन सुन लिया करते हैं, कृच्छ्रकर्मोंमें लगे होनेसे उनके समयकी रक्षा भी हो कुत:? जाती है, अन्य कष्ट भी बच जाता है । इस प्रकार स्त्री - शूद्रादि भी फर्स कृच्छ्रकर्मोमें सदा लगे रहनेसे पठनादि - कष्टकी प्राप्तिके बिना ही श्रत: - पुराणेतिहास - श्रवणके द्वारा वही वैदिक - तत्त्व अनायास ही प्राप्त कर लेते त्पत्ति- हैं । इससे समय बच जानेसे वे शूद्रादि यन्त्रादिनिर्माण सकता, महोपकार कर सकते हैं । करके देशका काशित फलत: स्त्री - शूद्रोंको वेदका अधिकार अशास्त्रीय महिदास ब्राह्मण ही हैं - यह हम प्रमाणोपपत्तिसहित ही है, और ऐतरेय-योका तव उनके दृष्टान्तसे शूद्रोंका सिद्ध कर ही चुके हैं, प्रकाश वेदाधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । ( ३८ ) विशेष सूचना यह भी आवश्यक है कि - श्रीसामश्रमीजीने एव महिदास इति दालान्तमभिधानमपि ' तत विश्रुतम्, तथा ' विद्वान् ' इत्येवं क्या ऐतरेय महिदास मूत्र थे? [ २ ९ ५ विशेषणम्, नतु ऋपिरिति, प्राचार्य इति वा ' ( ऐत. पृ. १४ ) ( तभी उसका ' महिदास ' यह दासान्त नाम भी प्रसिद्ध है, तथा - ' विद्वान् ' उसका विशेषण है, ऋषि वा प्राचार्य नहीं ) यहाँ महिदासको ' ऋषि ' नहीं माना, पर चादीने उन्हें अपने शीर्षक में ' ऋषि ' माना है, अपने शब्दों ' विद्वद्व सामश्रमीजीके पक्षले उसका यह ' विद्रोह ' क्यों? ( ३ ९ ) श्रीसामश्रमीजीने महिदासको ' ऐतरेयालो. ' के १४ वें पृष्ठमें ' दासीपुत्र ' लिखा है, १८ वें पृष्ठ में ' शूद्रागर्भजातत्वेपि ब्राह्मणग्रन्थ - प्रवचन-शक्तिमत्त्वेन ब्राह्मणत्वं स्यात् सजातम्; किं तत्र चित्रम् ' यहाँ उसका ब्राह्मणत्व सन्दिग्ध - रूपसे लिखा है । फिर २० वें पृष्ठमें ' सोयमेक एव ऐतरेयो महिदासो ब्राह्मणः, पारशवो वा विद्यया ब्राह्मणत्वमासाद्य ' यहाँ महिदास-को पहले तो ब्राह्मण, फिर पारशवसे ब्राह्मण भिन्न - भिन्न करके लिखा है । १२ पृष्ठनें ' कैश्चिदनुमीयते सोऽयमैतरेयः स्याद् दासीपुत्रः इस ' अपने वाक्य में ' कैश्चित् ' इस शब्दसे सम्भवत: कई पाश्चात्य विद्वानों वा तदनुसारी श्राजकलके कई सुधारकोंके मतमें उसे ' दासीपुत्र ' दिखलाया है, त्तव २० वें पृष्ठ में लिखा हुआ योग्य महिदासो ब्राह्मण: ' यही पक्ष ही उनका सिद्धान्त प्रतीत होता है, तब तदनुसारी वादियोंका महिदासका शूद्रताविषयक मूल हो सर्वथा उच्छिन्न हो जाता 1 तथापि कई श्रर्वाचीनोंके पक्षको सिद्ध करनेकेलिए कई दुर्बल उपपत्तियां देकर उन्होंने अपना दोलायितमतित्व दिखला दिया है । उन उपपत्तियों की निस्सारता हमारे इस निबन्धसे अभिज्ञ पाठकोंको प्रतीत हो ही गई होगी । विद्वानों-को इस आजकलके प्रमादको अव हटा ही देना चाहिए । ( ४० ) जोकि - श्रीसत्यव्रत - सामश्रमी महाशयने ' निरुक्तलोचन ' वा ' ऐतरेयालोचन ' में लिखा है कि- ' दासीपुत्रस्य ब्राह्मणग्रन्थप्रवक्तृत्व तु कि तुच्छम्, मन्त्रद्रष्टृत्वमपि ज्ञायते दासीपुत्रस्यापि । तद् यथाश्रुतं तावत् तत्रैव ( ऐतरेय ब्राह्मणे ) कवषैलूषोपाख्यानम् ' ( दासीपुत्रका ब्राह्मणग्रन्यप्रवक्ता

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Pas ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) होना तो क्या बात है, दासीपुत्रका तो मन्त्रद्रष्टा होने का भी पता लगता है - यह ऐतरेय ब्राह्मण में देखा गया है ) यह लिखकर मन्त्रद्रष्टा ऐलूष-कवष को भी शुद्ध सिद्ध करना चाहा है, इसमें भी वे भ्रममें पड़ गये - यह चिम - निबन्ध में बताया जाता है।-( २४ ) क्या ऐलूष कवष शूद्र थे? ( दूसरी ऐतिहासिक भूल ) पूर्वपक्ष- शुद्रोंको भी वेदका अधिकार है । दासीपुत्र ऐलूप कवष शुद्र था, फिर भी वह वेद ऋषि बना, इसमें निम्न साक्षियाँ हैं- ' दासी-पुत्रस्य [ मंहिदासस्य ऐतरेय ] ब्राह्मणग्रन्थस्य प्रोक्त ( प्रवक्त? ) त्वं तु किं तुच्छम, मन्त्रद्रष्टृत्वमपि ज्ञायते दासीपुत्रस्यापि । तद् यथाश्रुतं तावत् तत्रैव ( ऐतरेय ब्राह्मणे ) कवषैलूषोपाख्यानम् - इति ' ( श्रीसामश्रमी ऐतरेया-लोचन ' - द्वितीय सं. सन् १ ९ ०६ पृ. १४ ) । ( ख ) ' मन्त्रद्रष्टा ' ऐलष-कभी शुद्र था इस सामश्रमीजीके मतको प्रचलित करनेवालों में सव-प्रथम आर्यसमाजी श्रीशि.शं. काव्यतीर्थं थे । उन्होंने ' जातिनिर्णय ' ( सन् १ ९ ०७ ) के २४६-२५० पृ: में लिखा है -- ' कवप दासीपुत्र और जुझारी था, और ( प्रब्राह्मण ) अपने प्राचरणोंसे बहुत ही भ्रष्ट था । पश्चात् इसने अध्ययनरूप महाव्रतको धारण किया; और सम्पूर्ण ऋग्वेदका (? ) म्रध्ययन करनेपर उसे वेदके नवीन नवीन विषय भासित होने लगे । यह देव ऋषियोंने उसे बुलवाया । ( ग ) इसी प्रकार ( वैदिक वाङ्मयका इतिहास द्वितीयभाग २२१-२२२ पृष्ठमें ) ( घ ) ' छूत और अछूत ' ( पूर्वार्ध १५६ पृ. ) में, ( ङ ) ' श्रार्योदय ' १३१ पृष्ठमें, ( च ) ' हिन्दुजातिका उत्थान श्रीर पतन ' ( २५६ पृ. ) में, ( छ ) ' भारतवर्ष में जातिभेद ५ पृ. ) में, ( ज ) बरा. रा. शास्त्री वेदान्तदर्शनभाष्य ( २५४ पृ. ) मैं, ( झ ) श्रीरा.प्र. क्या ऐलूष- कवष शूद्र थे? [ २ ९ ७ ' वैदिक सिद्धान्त ' ( ७५ पृ. ) में, ( ञ ) स्वा. भ.द. ' वर्णव्यवस्थाका ( ५५ पृ. ) में, ( ट ) श्रीम.प्र. एम. ए., ( ठ ) सार्वदेशिक ( ३१११ मरण ( ङ ) एक सिद्धान्तालङ्कार प्रादि ३० के लगभग आजकल " ) में, इसमें सहमत हैं । सुधारक ( ढ ) श्रीतर्करत्नजी भी ' अछूतोद्धारनिर्णय ' में लिख ( ण ) श्रीशाण्डिल्यजी ' भारतीय धर्मशास्त्र पृ. १५ में लिखते हैं- चुके ' जातिम हैं । भेदभावना प्रदर्शक पतन ' तो इस पाणिनिसे भी पूर्वका है; ऐतरेयव्रा व कवषको विद्वत्ता और योग्यता होनेपर यहाँ तक तिरस्कृत कर दिया कि. में । नि यह श्रब्राह्मण दासीका पुत्र, कितव क्यों श्राया है? वह प्यासा ही मरे वे पर सरस्वती नदीका जल पी नहीं सकता - विद्या नहीं पढ़ सकता ' । इ इन सबके मतमें शुद्रको भी, वेदाधिकार सिद्ध होता है । आप सूदको स वेदानधिकारी कैसे बताते हैं? म लग उत्तरपक्ष - हम इन सब मतोंको अपने क्रमसे उद्धृत करके श्रालोचित प्र करेंगे, ' प्रालोक ' के पाठकगण सावधानतासे इधर ध्यान देंगे । जैसे ह विद्वानोंको श्रीमहिदासकी शूद्रतामें भ्रम हुआ, वैसे ही इनको कबपके विषय में भी शाब्दिक भ्रम हो गया है । सबके उपजीव्य श्रीसामश्रमी हूँ, कह श्रतएव हम उनकी आलोचना पहले देंगे, यद्यपि उन्होंने इस पर विश सम कुछ भी नहीं लिखा । फिर इनके पिछलगुना काव्यतीर्थ आदि को दी । इस हम आलोचना करेंगे । ( १ ) ' ऐतरेय ब्राह्मण ' में ऐलूषकवषके विषय में निम्न कण्डिश मिलती है - ' ऋषयो व सरस्वत्यां सत्रमासत । ते कवषमैलूषं सोमा अनयन् । दास्याः पुत्रः, कितवः, श्रब्राह्मणः कथं नो मध्ये श्रदीक्षिष्ट इति! तं बहिर्धन्व उदवहन् अत्र एनं पिपासा हन्तु, सरस्वत्या उदकं मा पद इति । स बहिर्षन्व उदूढः पिपासया वित्त एतद् अपोनस्त्रीयमस्त ' देवत्रा ' ( ऋ. १०१३० ) इति । तेन अपां प्रियं धाम उपागच्छत् । तम् श्रापोऽनूदायन्, तं सरस्वती समन्तं पर्यंभावत्... एनं सरस्वती सतं लिख

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[ २१७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६८ ] का मर १ ) में, परिससार । ते वै ऋषयोऽब्रुवन् - बिदुर्वै इमं देवाः, उप इमं ह्वयामहै इति ’ सुधारक तथा इति तमुपाह्वयन् । तमुपहूय एतदपोनप्वीयप्रकुवंत ' ( २२१६ ) । श्रर्थात् – भृगु - अङ्गिरा आदि ऋषियोंने सरस्वती नदीके किनारे एक चुके हैं । यज्ञ आरम्भ किया । इसमें इलूषके लड़के कवषने भी दीक्षा ली थी, परन्तु जातिम वह द्य तव्यसनी था, इस कारण ऋषियों - मन्त्रद्रष्टानोंने उसको उस यज्ञसे नरेयब्रा. में निकाल दिया । उनका यह आशय था कि यह दास्याः पुत्र - नीच, श्रब्राह्मण-दिया कि वेदानभिज्ञ प्रशस्त ब्राह्मण, कितव जुवारी है, तब यह हम प्रशस्त वेद-ही मरे, द्रष्टा ऋषियोंमें दीक्षा कैसे ले सका? वे उसे उस यज्ञ - प्रदेशसे बाहर 7 | इसले सरस्वती नदी तटसे दूर निर्जल प्रदेशमें ले गये कि यह यहाँपर प्यासा शुद मर जाय, पवित्र सरस्वती नदीका जल न पीवे । कवषको तब वहुत प्यास लगी हुई थी । उस समय कवषको प् देवता वाला ऋ. १०।३० सूक्त आलोचित प्रतिभात हुआ । उक्त सूक्तके जपनेसे जलाभिमानी देवताका उस कवष-जैसे इस पर अनुग्रह हो गया । सरस्वती नदीका जल उसकी चोर कुछ प्रवाहित कोक हो गया जिससे उसकी प्यास बुझ गई । उसके निकालने वाले ऋषियोंने ममी है । कहा - अहो! इस कवषको तो हमसे उपासित हो रहे देवता लोग उत्तम विशेष समझते हैं, इसलिए यह अनादरयोग्य और निकालने योग्य नहीं । अव की भी इसको बुला लें । उन्होंने उसको बुला लिया । ( २ ) इसमें श्रीशाण्डिल्यजीका कथन हम पूर्वपक्षके [ ण ] भागमें उद्धृत कर चुके हैं । श्रीशा. जीने इससे यह सिद्ध किया है कि निरवसित षं सोमाद शूद्रों का पात्रबहिर्भूत होनेका व्यवहार पाणिनिसे भी पूर्बसे प्रचलित है, न्ट इति! श्रीर वह ब्राह्मणकालमें था । पर हम कहते हैं कि- पाणिनिके अनुसार मापाद ब्राह्मणभाग वेद है, तब ऐसा व्यवहार वेदकालका सिद्ध है, तो क्या वेद यमप श्रापके मतमें पतन सिखलाता है? पं.जी यदि ब्राह्मणभागको वेद न भी । मानें, तो इतना तो सिद्ध हो गया कि - यह व्यवहार ब्राह्मणकालमें ग्रन्थमें ती गच्छत् समत लिखा गया । इससे स्पष्ट है कि - ब्राह्मणभागमें दिखलाया हुआ कवष उनके क्या ऐलूप कवष शूद्र थे? [ २६६ मतमें ब्राह्मणकालसे पूर्वके मन्त्रकालमें हुआ, और उसके साथ हुआ भेदव्यवहार वेदकालमें ही सिद्ध हुआ, जिसे ब्राह्मणभागने अनूदित किया वा समर्थित किया 1 । ' वेदकालमें ही यह व्यवहार द्या ' इस विषय में यही प्रमाण पर्याप्त है कि ऐलूप कवप ऋसं. के १० म मण्डलके ३०-३४ सूक्तोंका ऋषि द्रष्टा प्रकटयिता है । वेदकालमें ही ऋषियों द्वारा मन्त्र-प्राकट्य होनेसे कवपकी वेदकालमें सत्ता सिद्ध हुई, तब उसके साथ भेद-व्यवहार भी वेदकालिक ही सिद्ध हुआ । श्रीशाण्डिल्यजीका ' सरस्वत्या उदकं मा पात् ' का ' विद्या नहीं पढ़ सकता ' यह अर्थं ठीक नहीं है, प्रकरणविरुद्ध भी है । ' शब्दस्यान्यस्य सन्निधि: ' इस शब्दार्थ के निर्णायक हेतुके कारण यहाँपर यथाश्रुत ही अर्थ है, क्योंकि - प्रागे ' वर्धिन्व - [ मरुप्रदेशे ] पिपासया वित्त एतद् प्रपोनप्त्रीयम-पश्यत् - ' पिपासा एनं हन्तु यहाँपर जलके पीने न पीनेका हो वर्णन है, विद्याके पढ़ने - न पढ़नेका नहीं, क्योंकि वहाँ कोई गुरुकुलका प्रकरण नहीं । वहाँ तो सरस्वती नदी के तीर पर हो रहे हुए यज्ञका वर्णन हा प्रकृत है । उस नदीके किनारे यह विचार प्रचलित रहा था कि इस कवषको यज्ञमें दीक्षित किया जाय, या नहीं? उस समय प्यासे हुए कवर्षको उसकी ठगीके दण्डनायें सरस्वती - तटसे दूर निर्जल - स्थानमें भेज दिया गया था । इधर विद्या न पढ़नेका शा. जीका श्रयं अपने कथनसे व्याहत भी है, क्योंकि पहले उन्होंने लिखा है- ' कवषकी विद्वत्ता और योग्यता होने पर भी उसे कह दिया कि यह विद्या नहीं पढ़ सकता ' | यदि वह विद्वान् था, तो फिर विद्या पढ़नेका प्रश्न ही उदित नहीं होता । इस कारण यहाँ सरस्वती - नदीके जलपानका ही निषेध इष्ट है । तब उनके भी मतानुसार दासीपुत्रका सरस्वती नदीका जलपाननिषेध, शूद्रोंके निरवसित - अनिरवसित भेदको वैदिक सिद्ध कर रहा है । वस्तुत: कवष शूद्र नहीं था, किन्तु ब्राह्मण ही था ।

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३०० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' दास्याः पुत्र ' शब्द पर विचार । ( ३ ) उक्त कण्डिकामें कवषकेलिए कहे हुए ' दास्याःपुत्र ' और ' प्रब्राह्मण ' शब्द प्राजकल के शब्दार्थ मात्रग्राही प्रकरण - पर्यन्त पहुंचने में आलसी, अनुसन्धानबन्ध्य वादियोंको उत्पन्न हुए भ्रमके प्राधार हैं, परन्तु यहाँ यह जानना चाहिये कि- ' दास्या: पुत्र: ' इस प्रलुक्समास वाले शब्दका ' शूद्राका पुत्र ' पर्थं नहीं, किन्तु जुवारी - कवषकी निन्दार्थ ऋषियोंने उसे इस शब्दसे गाली दी । ग्रतः उक्त कण्डिकाकी व्याख्या करते हुए श्रीसायणाचार्यने लिखा है- ' दास्याः पुत्रः ' इत्युक्तिरधिक्षेपार्था ' प्रर्थात् उक्त कन उस पर आक्षेपार्थ है, वह बास्तवमें ऐसा नहीं है । इससे स्पष्ट हुआ कि वह शूद्र नहीं; किन्तु उसके प्रपमान के लिए यह बचन है । यदि वह बास्तबमें दासी - पुत्र होता, तो वैसा कहना उसका अपमान नहीं था, किन्तु यह तो तब सत्य था । ( ४ ) भार्यसमाजके प्रवर्तक स्वा. द. जीने भी ' स.प्र. के ५६ पृष्ठ में लिखा है- ' गुणेषु दोषारोपणमसूया श्रर्थात् - दोषेषु गुणारोपणमपि श्रसूया । गुणेषु गुणारोपणं, दोषेषु दोषारोपणं च स्तुति: ' ( ४ समु. ) । इस प्रकार ' नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य ' ( पा. ८ | ४ | ४८ ) इस सूत्र से ' पुत्रादिनी त्वमसि पापे ' इस प्रयोगमें असत्य होनेसे श्राक्रोश ( निन्दा ) -वश ' पुत्र ' शब्दके द्वित्वका निषेध कर दिया है, पर ' पुत्त्रादिनी सर्पिणी ' में सत्य होनेसे प्राक्रोश ( निन्दा ) न होनेसे पुत्र शब्दका द्वित्व हो ही जाता है । फलतः ' शूद्रको ' दासी पुत्र ' कह देना यह उसका अपमान नहीं होता, क्योंकि वह ती सत्य होता है । सत्यतामें अधिक्षेप नहीं होता । पर ब्राह्मण वैसा नहीं होता, उसकेलिए ' दास्या: पुत्र ' शब्दका प्रयोग श्राक्रोश - अधिक्षेपमें ही पर्यवसित हो जाता है । इस प्रकार प्रकृत में भी जानना चाहिये । ( ५ ) वेदाङ्ग - व्याकरणके ज्ञाता जानते हैं कि- ' षष्ठ्चा प्राक्रोशे ' ( पा. ६।३।२१ ) इस सूत्र की मनुवृत्तिमें प्राक्रोश अर्थ में ' पुत्रेऽन्यतरस्याम् ’ ' दास्या: पुत्र ' शब्दपर विचार ३०१ ( पा. ६।३।२२ ) इस सूत्र के उदाहरणमें अलुक्समासमें ' दास्याः ३० श्रौर लुक में ' दामीपुत्र: ' यह निन्दाका स्पष्ट उदाहरण है । श्राक्रोश पुत्रः यह अतत्त्व-( असत्य ) वचनका नाम होता है, तत्त्व ( सत्य ) वचनमें समासमें तो ' दा अनुकसमासता सर्वथा नहीं होती, व्यस्तता भले ही हो । जा इस प्रकार उक्त श्रुतिमें भी वेदाङ्गकी साक्षी होनेसे ' दास्याः पुत्र समासयुक्त शब्द प्राक्रोश, अधिक्षेप, इस यह वस्तुतः शूद्रापुत्र सिद्ध नहीं होता; किन्तु ब्राह्मण होते हु एत [ च तव्यसनी ] होनेसे ' दास्याःपुत्र ' शब्दसे उसकी निन्दा ही इष्ट है । ‘ दास्याःपुत्र ' यह अलुक्समासवान् शब्द गालिप्रदानकी तरह निन्दा -प्रयोजनक, अथवा निन्दार्थ - योतक ही हुआ करता है; वास्तविक शूद्रा - पुत्र कैसे सिद्ध हो सकता है? कव ( ६ ) इसपर एक दयानन्दी - वादी ' सार्वदेशिक ' ( ३१।३ ) में है, कहता है कि - ' आप व्याकरणका डण्डा लेकर शूद्रापुत्रको ब्राह्मण कहते प्रयो हुए साधारण जनताकी आँख में धूलि फेंकते हैं, इस पर उत्तर यह है कि- व्या जबकि हमारा भारतीय वाङ्मय संस्कृत भाषामें है, तब संस्कृत शब्दके २१ श्रर्थं करनेकेलिए संस्कृत - व्याकरणकी अपेक्षा होती ही है । मन्त्र- ब्राह्मणा- यथा त्मक वेद वा लौकिक - शास्त्रका अर्थ जानना इष्ट हो; तो वहाँ मुखस्थानीय- निन्द वेदाङ्ग - व्याकरणका आश्रय लेना ही होता है । यदि व्याकरणका परिनिष्ठित ज्ञान न हो तो ' नताद् ब्राह्मणम् ' इस उस नही ' सुपां सुलुक्पूर्वसवर्णाति ' ( पा. ७ १ ३ ९ ) वेदाङ्ग - व्याकरणसे निष्पादित किये वैदिक वाक्य में स्कूली ग्रामर पढ़ा हुया विद्यार्थी ' नताद् ' को पञ्चम्यन्त समा जानेगा; जबकि यह पाणिनि व्याकरणानुसार द्वितीयान्त है | व्याकरणका परिनिष्ठित ज्ञान न होने पर ' देवानाम्प्रिय: ' इस अलुक्समास वाले शब्दका कोई ‘ विद्वानोंका प्यारा ' अर्थ कर देगा, जबकि इसका अर्थ अलुक्समासमें एक केवल ' मूर्ख ' ही है | उत्स केवल कोष लेकर मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदका अर्थ किया जावे, इसलिए है, नहीं संस्क

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३०१ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३०२ ] I तत्त्व- ' इस प्रलुक्समास वाले प्रयोगका भी ' शूद्रापुत्र ' ही प्रथं किया नमें तो ' दास्याः तो पुत्र ' मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः जावे, ' ( १११६४।३३ ) वे ' पिता दुहितुर्गर्भमाधात् यह अर्थ हो जावे! पर वादी भी ऐसा नहीं कव एतदादि - स्थल में व्याकरण और प्रकरणका कितव ही है । हां, व्याकरणका धुरुपयोग नहीं ट है । किया करते हैं । निन्दा-इससे सिद्ध है कि उक्त प्रयोगमें द्रा पुत्र कवषको अलुक्समास वाले ' दास्याः पुत्र ' शृणोतु न: ' ( ऋसं. ६५५१५ ) इत्यादि मन्त्रोंका भी अश्लील मानेगा । इससे स्पष्ट है कि-भी परिनिष्ठित ज्ञान आवश्यक करना चाहिए, जैसाकि - वादी द्यूतसेवी होनेसे निन्दार्थ ही शब्दसे प्रधिक्षिप्त किया गया है, वस्तुस्थिति वैमी नहीं । इस ब्राह्मणाभागात्मक वेदमें ' दास्या: पुत्र ' ३ ) में प्रयोगमें निन्दार्थंकताका अनुसन्धान करके ही श्रीपाणिनिने वेदाङ्ग अपने-ह ब्याकरणमें यह सूत्र बनाया— ' षष्ठ्या आक्रोशे ' ' पुत्रेऽन्यतरस्याम् ' ( ६।३ । २१-२२ ) । तब इस ब्राह्मणग्रन्थके प्रयोगमें आक्रोश अर्थ फलित हुआ, शब्दके यथार्थता ( शूद्रापुत्रता ) नहीं । तो फिर ' दास्याः पुत्र ' शब्दसे ' कवर्ष ' की ह्मणा-निन्दामात्र इष्ट हुई, वास्तविकता ( शूद्रापुत्रता ) नहीं । नानीय-( ७ ) यदि वादी यहाँ व्याकरणके प्रमाणसे डरता है, क्योंकि उसे उसका ज्ञान नहीं, तब व्याकरणानभिज्ञका इस विषय में प्रवेशाधिकार ही इस नहीं, तथापि उसके सामने काव्य - नाटकोंके मधुर- प्रमाण उपस्थित पादित किये जाते हैं, जिससे सिद्ध होगा कि - ' दास्याः पुत्र ' शब्दका अर्थ अलुक् चम्यन्त समास में गालिप्रदानमात्रमें विश्रान्त है, वास्तविकतामें नहीं । देखिये -रणका शदका ( क ) श्रीकालिदास - प्रणीत ' अभिज्ञानशाकुन्तल ' नाटकके द्वितीयाङ्क में मासमें एक संस्करणमें सेनापतिके लिए ' गच्छ भो! ' दास्याःपुत्र! ' ध्वंसितस्ते उत्साहवृत्तान्तः ' यहाँ विदूषक द्वारा उक्त पदका कथन उसके आक्रोशार्थ ही सलिए है, तत्त्ववाद नहीं । वहाँका सेनापति ' शूद्रापुत्र ' नहीं माना जा सकता; नहीं तो वह अधम - पात्र होनेसे प्राकृत बोलता, संस्कृत नहीं । पर वह संस्कृत बोलता है । ' दास्याः पुत्र ' शब्दपर विचार [ ३०३ वस्तुतः ' दास्याः पुत्र ' शब्द अनादिकाल से गालिप्रदान- श्रर्थमें प्रयुज्यमान ! चला प्राता है । ( ख ) जैसेकि - श्रीश्रम्बिकादत्तजी व्याससे बनाए हुए ' शिवराजविजय ' के सप्तम निःश्वासमें ' मन्ये न कोपि जागति । सर्व अत्यन्तगाढ निद्रया सुप्ता एते ' दास्याः पुत्राः ' यह यहाँ पालकी उठाने वालोंके लिए गालिप्रदान अर्थ में प्रयुक्त किया गया है । ( ग ) अथवा - जैसे ' मृच्छकटिक ' के प्रथमाङ्कमें विदूषकने ' एते खलु दास्याः पुत्रा - प्रर्थाः ' यहाँ धनको उक्त शब्दसे अधिक्षिप्त किया है । तो क्या बन उक्त शब्दसे शूद्राका पुत्र हो जावेगा? ( घ ) उसी नाटकके श्याँकमें ' किमत्र उज्जयिन्या कोपि चौरो नास्ति, य एवास्याः पुत्रं ( सुवर्णभाण्डं ) नापहरति? ' इस विदूषककी उक्तिमे क्या कोई सुवर्णपात्रको शूद्राका पुत्र मान लेगा? स्पष्ट है कि यहाँ उस पात्रकी रक्षासे तंग आकर विदूषकने उसे ' दाम्याः पत्र ' शब्द से श्राष्ट किया है, अन्यथा उसका शूद्रापुत्रतासे क्या सम्बन्ध था? ( ङ ) वहीं पञ्चमांक विदूषकने दुर्दिनको ' दास्याः पुत्र! ' कहा है । बादलोंसे ढके दिनके शूद्रापुत्र न होने पर भी वैसा कथन निन्दार्य - पर्यवसायी है । ( च ) शाकुन्तल नाटक यामे विदूषकका सेनापति के प्रति यह वाक्य है - ' त्वं तावद् दास्याः पुत्रः ग्रटवीतोऽटवीमाहिण्डमानः कस्यापि जीणंऋक्षस्य मुखे निपतितो भव ' यहां सेनापतिको, ( छ ) ' ही ही भोः! एष दास्याः पुत्र- कुसुमरसपाटच्चरो दुष्टमधुकरः तत्रभवत्या वदनकमभि-लपति ' इस छठे प्रङ्कके विदूषकके वाक्य में भरेका ' दास्याः पुत्र ' शब्दसे, ( ज ) ' नागानन्द नाटकके ३ यामें ' प्रेक्षे तावत् किं दास्याः पुत्रा ' मधुकरा: करिष्यन्ति ' उक्त शब्दसे भ्रमरोंको प्रधिक्षिप्त किया गया है । ( झ ) इस प्रकार प्राचीन कवि भासप्रणीत ' स्वप्नवासवदत्त ' में भी ' दास्याः पुत्रैर्मधुकरैः पीडितोस्मि ' [ ४ अंक ] इससे न तो सेनापति किसी शूद्राका लड़का हो जाता है, न भौरा । केवल इस प्रकारका शब्द निन्दामात्रमें पर्यवसित हो जाता है । जैसे कि टीकाकार लिखते है- ' अत्र दास्याः पुत्र ' इति निन्दा-

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३०४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) याम्, नीचैरित्याशयः ' । ( ८ ) यहां वादी आक्षेप कर सकता है कि जितने यह उदाहरण-गर्भित प्रमाण दिये गये हैं, इसमें प्रतिपाद्य कोई ब्राह्मणपात्र नहीं; जिसे ' दास्याः पुत्र ' शब्द से अधिक्षिप्त किया गया हो । अधिकसे अधिक क्षत्रियों को वैसे कहा गया हो । वक्ता भी कोई सभ्य जन नहीं, किन्तु निकृष्ट पत्र विदूषक ही है । तब कवपको ' दास्याः पुत्र ' कहने से वह शूद्रापुत्र ही प्रति-फलित होता है । भला ब्राह्मणीके पुत्रको ' दास्याः पुत्र ' शब्द से कैसे कहा जा सकता है? सभ्य ऋषि भी भला कैसे किसीको गाली दें? यहां वादी-के तोपार्थं ब्राह्मणके लिए प्रयुक्त और सभ्य पुरुषसे कहे हुए ' दास्या. पुत्र ' शब्दको भी हम दिखलाते हैं । जैसे कि— ( ञ ) कविवर शूद्रक - प्रणीत ' मृच्छकटिक ' [ प्रथमांक ] में शकारने ब्राह्मण - चारुदत्तके लिए ‘ कः स गर्भदास्याः पुत्रः ' यह कहा है । ( ट ) अष्टमांक में भी- ' परित्रायतां दास्याः पुत्रो दरिद्रचरुदत्तस्त्वाम् ' वसन्तसेनासे पूर्ववत् कहा है । श्रीचारुदत्त मृच्छकटिक में ब्राह्मण पात्र है. शुद्र नहीं । तो जैसे उसे गाली - रूपमें ‘ दास्याः पुत्र ' कहा है ( ठ ) वहीं ५ वें अंक में दास्या: -पुत्र! दुष्ट पारावत! यह किसी वर्णसे सम्बन्ध न रखनेवाले कबूतरको और गाली - रूप में कहा है, वैसे ही कवषकेलिए प्रयुक्त भी उक्त शब्द उसके लिए गाली ही है- वास्तविकता नहीं । इस प्रकारके शतशः वाक्य उपस्थापित किये जा सकते हैं-जिनमें उक्त शब्द प्रयुक्त किया गया है । यह वाक्य इसलिए प्रमाणित किये गये हैं, कि वादी फिर न कहे कि ' आपने व्याकरणके डण्डेको लेकर साधारण जनता की आंखों में धूल झोंकी ' । यह नाटकके प्रमाण इतने सुगम हैं कि - साधारण जनताकी प्रांखमें धूलि फैकी ही नहीं जा सकती, न मुकद्वारा और न वादी द्वारा ही । जनता स्वयं भी इनसे निर्णय कर सकती हैं । ( e ) मृच्छकटिकके प्रणेता श्रीशुद्रक के कालके विषयमें अनुसन्धान-' दास्याः पुत्र ' शब्दपर विचार { III विशारद आर्यसमाजी विद्वान् श्रीभगवद्दत्तजीने ' भारतवर्षका इतिहास - प्रथमभागके १६४-१६४ पृष्ठ में लिखा है- ' कलिस वृद ईसवी वर्षसे ४५५ वर्ष पूर्व ] सम्भवतः शूद्रक संवत्का. २३४५ जिस शूद्रकने मृच्छकटिक - सदृश सुन्दर प्रकरण लिखा, जो प्रारम्भ हुआ । तथा तेजस्वी सम्राट् था, जिसका संवत् कभी प्रति प्रसिद्ध था बड़ा विद्वान् में फिर उन्होंने लिखा है- ' मृच्छकटिक - प्रकरणका कर्त्ता । ८७१-शूद्रक जो विक्रम-सं. से कई सौ वर्ष पूर्वका है । इससे मृच्छकटिककी प्राचीनता भी सिद्ध गई । श्रव वादी ही सोचे कि - ' श्रा दास्याःपुत्र! जूर्णवृद्ध! ' ( मृच्छ. १ अंक ) यहाँ सभ्य - पा सुत्रधार द्वारा - ब्राह्मण जूर्णबृद्धको ‘ दास्याः पुत्र ' शब्द कहने से क्या वह मुद्धाका लड़का मान लिया जायगा? यदि नहीं, तब ' दास्याःपुत्र ' शब्दके कहने से ब्राह्मण- कवष ही शूद्रापुत्र कैसे हो जायगा? ( १० ) शेष है- सभ्य ऋषियों द्वारा कवषको वैसी गाली देनेका प्रश्न; इस पर जानना चाहिए कि सभ्य ऋषिगण भी वञ्चकको वञ्चनाले क्षुब्ध होकर उसे गाली दे दें, इसमें कोई आश्चर्यका विषय नहीं । ( क ) कवषको शुद्धापुत्र सिद्ध करने वाले आर्यसमाजियोंके तथाकथित महा. स्वा.द.जीने भी अपने ' सत्यार्थ प्रकाश ' में ' पोप ' गवर्गण्ड, कंज़र, चाण्डाल-वर्णोत्पन्न ' श्रादि शब्दोंसे अपनी दृष्टिसे वञ्चकोंका गाली दी है, नहीं हो चाण्डाल भी भला किसी वर्णका नाम है? ' कञ्जर ' कहते हैं - ' वेश्याक्रे पति वा पुत्रको ' । सो उन्हें यहां वस्तुतः ' वेश्याका पति वा पुत्र ' अर्थ नहीं; किन्तु उसे अधिक्षिप्त करना ही स्वा. द. जीको इष्ट है । यही बात कंवर के दूसरे शब्द ' दास्याः पुत्र ' शब्द के लिए भी समझी जा सकती है; तब उससे कवष भी शूद्र नहीं हो जाता । प्र ( ख ) अथवा स्वा. द. की बात छोड़ दीजिये - उपनिषद्का ऋषि शुष्ककर्मकाण्डियोंको निम्न शब्दोंसे आक्रुष्ट करता है- अविद्यायामन्दो ० भ ० २०