सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 181–190

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 181–190

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३०५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३०६ ] वृद २६४५ सें वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितम्मन्यमानाः । जंघन्यमानाः परियन्ति मूढा हुमा । satta tre माना ययान्धाः ' ( मुण्डक ११२८ ) इष्टापूर्त मन्यमाना वरिष्ठं विज्ञान् ' नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ' ( मु. ११२।१० ) ८७ पृ.. ( ग ) मन्त्रभागका ऋषि भी ' नीहारेण प्रावृताः, जल्प्या च श्रसुतृपः विक्रम-उक्थशासश्चन्ति ' ( ऋ. सं. १०/८२७ ) इस प्रकार शुष्क कर्मकाण्डियों-“ को कितने कठोर शब्दोंसे आक्रुष्ट करता है? तत्र ब्राह्मणभाग के ऋषियों-ही सोचे द्वारा ' दास्याः पुत्र ' शब्दसे एक द्यतव्यसनीको गाली देना कैसे असम्भव हो सकता है? आशा है - वादी गतानुगतिकता को छोड़कर स्वयं भी कुछ विचार करेगा । ( घ ) मन्त्रभागमें ब्राह्मणके उक्त अधिक्षेपशब्दों के सदृश कहने से श्राक्रोशशब्द माक्षात् पर्यायरूपसे भी दिखाई पड़ते हैं । ' आलोक ' पाठकगण देखनेका कष्ट उठावें-प्रश्न: बनाते ' नि मायावान् अब्रह्मा दस्युरतं ( ऋसं. ४।१६।६ ) यहां पर कुत्सके ( क ) शत्रुको मायावान्, अब्रह्मा और दस्यु इन शब्दोंसे अधिक्षिप्त किया है । ' ब्रह्मा ' यह ब्राह्मणका नाम है, जैसे कि महाभाष्यमें ' समानार्थी एतौ ण्डार- ब्रह्मन्शब्दो ब्राह्मणशब्दश्च । श्रातश्च समानार्थी, एवं ह्याह- कुतो नु चरसि ह्रीं दो ब्रह्मन्! कुतो नु चरसि ब्राह्मर्णेति । तत्र द्वयोः समानार्थयोरेकेन विग्रहः याके ( ५११७ ) । स्वा. द. जीने भी वेदसंज्ञा विचार में ( ८७ पृष्ठ ) ऐसा ही नहीं; ' माना है । तो यहां ' ब्रह्मा ' ब्राह्मणभाग के ' अत्राह्मण: ' पद - स्थानीय सिद्ध कंजर हुआ । यह शब्द कहा भी ब्राह्मणको ही जाता है उसके आक्षेपके लिए; ; तर ब्राह्मणसे भिन्नके लिए नहीं कहा जाना । क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रमें उसकी प्रसक्ति ही नहीं । श्री मन्त्रभागप्रोक्त ' दस्यु ' शब्द ब्राह्मण- भागके ' दास्याः पुत्र ' शब्द के अर्थको कोड़ीकृत कर रहा है । ' मायावान् ' यह मन्त्रपद ब्राह्मणप्रोक्त ' कितव ' शब्दके अर्थको रखता है । जैसे यह शब्द कुत्सके शत्रुके केवल अधिक्षेप-' मात्रकेलिए रखे गये हैं, वास्तव में उसे शूद्र बताने के लिए नहीं, इसलिए ही ' पत्रह्मा ' का सायणादिने ' वेदोक्तकर्मसु श्रास्तिक्यरहितः ' यही अर्थ किया ' दास्याः पुत्र ' शब्दपर विचार [ ३०७ है, ' दस्यु ' का ' शत्रु ' अर्थ किया है, इस प्रकार इन मन्त्रोंके ( ऋ. ) - ' दरस्या: पुत्र ': ( ऐत्रा ), ' अब्रह्मा ' ( ऋ. ) - ' अब्राह्मण पर्याय ' दस्यु ' ' मायावान् ' ( ऋ. ) – ' कितवः ' ( ऐ. ) दास्याः पुत्र, प्रब्राह्मण: ' ( ऐत्रा. ) ऋषिगणद्वारा कितव ( जुवारा ) कबप पर अविक्षेपमात्र आदि पदों भी वास्तविक - शूद्रताका प्रतिपादन इष्ट इष्ट है, उसकी नहीं; यह अत्यन्त स्पष्ट है । इसलिए ' स्त्रिय दृष्ट्वाय कितवं ( वः ) वृषलः ' ( ऋ. १०।३४।११ ) इस मन्त्रमें कितव ( चतव्यसनी ) को केवल गाली देनेके उद्देश्यसे ' वृपल ' कहा है, वास्तवमें उसे शूद्र बनानेकेलिए नहीं, इसलिए श्रीसायणने उसका अर्थ ' वृषलकर्मा ' ही लिखा है । तब कितव होनेसे ' कवपको ब्राह्मण होने पर भी पलके पर्यायवाचक ' दास्याः पुत्र ' दाव्दसे अविक्षिप्त मात्र परस्पर- तुलना दासका वो दम्भय ' ( ऋसं. ' दास ' शब्दसे प्रयोग वेदके किया गया है । वेदके विद्वान् इन मन्त्र - ब्राह्मणके पदों की स्वयं कर देखें । ' दस्यु ' यह मन्त्र पद ' दास्या. पुत्र ' प्रयत् कराता है । ' अकर्मा दस्युरभि नोत्व तस्य दासस्य १०।२२।८ ) इस मन्त्रमें उसी पूर्वनिर्दिष्ट ' दस्यु ' का पूनः प्रतिनिर्देश किया गया है । एतदादिक शब्दोंका प्राक्रोशमें मन्त्रभागमें भी सुलभ है । तब वेदके ब्राह्मणभागमं भी उसकी सुलभता ही है । फलतः इन शब्दोंसे कवपका केवल आक्रोश ही इष्ट है, यथाश्रुत अर्थ नहीं - यह अवश्य ध्यान देनेकी बात है । ( ११ ) जो कि आजकलके विद्वान् कवषको शूद्रापुत्र मानते हैं- इस पर यह जानना चाहिये कि भ्रान्ति वा भूल विद्वानोंकी हो जाती हुई भी देखी गई है । अथवा बहुत से गतानुगतिकता में प्रवृत्त भी होजाते हुए देखे गये हैं । ' नैषधचरित ' में कहा है- ' वमं कर्षतु पुरः परमेकः, तद्गतानुगतिको न महार्घः ' ( ५२५५ ) हितोपदेशका यह पद्य भी प्रसिद्ध है- ' गतानुगति-को लोको न लोकः पारमार्थिकः । ' कई विद्वान् साम्प्रदायिकतामें निमग्न होकर अशुद्ध भी अपने पक्षको शुद्ध प्रसिद्ध किया करते हैं । जैसेकि - स्वा.द.जीने लिखा है - ' तात्पर्य - जिसके

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३०८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लिए वक्ताने शब्दोच्चारण वा लेख किया हो, उसीके साथ उस वचन वा लेखको युक्त करना । बहुतसे हठी- दुराग्रही मनुष्य होते हैं कि जो बक्ताके अभिप्रायसे विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर मत वाले लोग, क्योंकि - मतके प्रग्रहसे उनकी बुद्धि प्रन्धकारमें फंपके नष्ट हो जाती हैं " ( स. प्र. भू. ४ पृ. ) इसलिए ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थ: ' यह न्याय भी प्रचलित है । जब ऐसा तब श्रीसायणका ' द'म्याः पुत्र इत्युक्तिरधिक्षेपार्थी ' यह अर्थ व्याकरण संस्कृतसाहित्य और वेदके मनुग्रहवश ठीक ही सिद्ध हुआ । जो आजकलके ३० के लगभग व्यक्ति इससे विरुद्ध हैं. वे प्रायः आई-समाजी हैं. या सुधारक हैं, शूद्रोंके सेवक हैं । जिनकी शास्त्रविरोध होने पर भी आज देशकालानुकूल शुद्र समाजके साथ सहानुभूति है, और कई श्रामामश्रमीके लेखसे भी प्रभावित हुए हैं, क्योंकि वे आजके शिक्षित-दयानन्दी सुधारक- समाजमें श्रीसामश्रमी वैदिक साहित्यके घुरन्धर पण्डित माने गये हैं । उनके मतसे श्रीशि.शं. काव्यतीर्थं प्रभावित हुए, फिर उन्हींको गड्डलिका प्रवाहकी तरह अनुसरण करते हुए अन्य व्यक्ति भी, बिना अपना विशेष अनुसन्धान किये, उनसे किये अर्थ में मुग्ध होकर स्वयं भी उसी पक्षके हो गये । पर एक अनुसन्धानकर्ता और सत्यान्वेषी - पुरुषका कर्तव्य हो जाता है कि वह परप्रत्ययने पतित न बनकर इधर - उधर की गवेषणा तथा मूलसूत्रोंका प्रत्यवेक्षण करे । यदि वह ऐसा नहीं करता, ती पता लग जाता है कि वह अनुसन्धाता वा सत्यान्वेषी नहीं है, किन्तु वह पक्षपाती है, या गतानुगतिक है । वा किसी सम्प्रदायका ग्रन्धा - भक्त है । ऐसा होनेपर बह कभी मूल सत्यको प्राप्त नहीं कर सकता है - यह निश्चित हैं । जब तक कवषके माता - पिताको किसी प्रामाणिक इतिहासके-द्वारा शूद्र सिद्ध नहीं किया जाता, जब तक कि उसकी माता शूद्रा दासी सिद्ध न की जा सके, तब तक कवषको दासीपुत्र शूद्र सिद्ध नहीं किया जा सकता, केवल वह ' दास्याः पुत्र ' शब्दसे कितव होनेसे निन्दित - प्रभंवाला ' ब्राह्मण ' शब्दपर विचार [ ३०६ ही माना जावेगा । यदि वादी सचमुच अनुसन्धान पथका पथिक है, तब उसे श्रीसामश्रमी तथा उसके अनुयायियों का मतसंग्रह नहीं, किन्तु उसे प्राचीनों. संग्रह करना चाहिये, जहाँ ऐलूष कवषको शुद्र कहा गया हो? ऐतिहासिक का मत भ आकाङ्क्षामें इतिहासको ही देखना पड़ता हैं, किसीका वैयक्तिक नहीं । परन्तु वैसा पूर्व लेख न मिलनेसे स्पष्ट हैं कि यह कथन श्रीसामश्रमीका ही उपज्ञात है । हम उनकी प्रमाणोपपत्तियोंकी मत केवल कर ही चुके हैं, अतः वे भ्रमपतित सिद्ध हो गए । ' प्रधानमंल्लनिवर्हण'- आलोचना प्र न्यायसे उनके अनुयायी भी श्रालोचित हो गये । जहां कहीं प्रवचन कुछ विशेष कहा है, उसकी आलोचना आगे की जावेगी । स ' अब्राह्मण ' शब्द पर विचार | तो ( १२ ) ' दास्याः पुत्र ' का यथार्थ तात्पर्य दिखला कर अब कवयकेलिए प्रयुक्त ' अब्राह्मण ' शब्द पर भी विचार किया जाता है । यह शब्द भी ' ऐ.बा. ' के उक्त स्थलमें ब्राह्मणव्यतिरिक्त - वाचक नहीं; किन्तु शब्दार्थ- वि के अनवच्छेद [ संशय ] में विशेषस्मृतिहेतु संयोगादि - पदार्थों में ' शब्दस्या- १ न्यस्य संनिधि: ' हेतुसे " कितव ' शब्दकी सन्निधिसे ' अपशवो वा प्रत्ये-गोअश्वेभ्यः ' के ' अपशवः ' शब्दकी तरह ' अब्राह्मणः ' शब्द भी ' अप्रशस्त-ब्राह्मण ' बाचक होकर निन्दार्थवादमात्रमें विश्रान्त हैं । जैसे ' दस्यु... अमानुष ' ( ऋ. १०२८ ) इसमें ' दस्युं मनुष्य ' अमानुष ' शब्दसे कहा हुमा ' मनुष्य- व्यतिरिक्त " अर्थ वाला इष्ट न होकर ' अप्रशस्त मनुष्यार्यक ' अत्र ही विवक्षित होत्ता हैं, इसीलिए हों श्रीसायणने ' मनुष्यसंव्यवहाराद बाह्यः, प्रश श्रासुरप्रकृतिः ' यह उसका अर्थ किया है, इसी प्रकार ' अब्राह्मण: ' में भी ब्राह्मण - व्यवहारसे बाह्य, प्रब्राह्मण- प्रकृतिवाला - यही अर्थ विवक्षित है, ' अ क्योंकि जुना खेलना ब्राह्मण- प्रकृति नहीं । इसीलिए ' स्त्रियं दृष्ट्वाब कितवं ' [ व: ]... वृषलः ' ( ऋ. १० ३४१११ ) इस मन्त्र में कितव [ जुनारी ] -को चिन्दाले ' वृषलः ' कहा गया है । इसका श्रीसायणने ' वृषलकम -

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- ३० ९ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) किया है, सो यहाँ ' शूद्र - प्रकृतिक ' ही अर्थ विवक्षित है, वस्तुतः ' शूद्र'-मश्रमी-का मत नहीं । हासिक ( १३ ) यदि उक्त ब्राह्मण - कण्डिकामें ' दास्याः पुत्र ' का वस्तुतः ' शूद्र-कथन पुत्र ' ही अर्थ इष्ट होता, तो इसी शब्द व स्वतः ' अग्राह्मण ' सिद्ध केवल हो गया, फिर उसकेलिए ' अब्राह्मण ' शब्दका उपादान व्यर्थ होगा, क्योंकि— लोचना ब्राह्मण शब्दसे ' क्षत्रिय, वैश्यका श्रथ भी जाना जा सकता है, पर पहले बहन- ' शूद्रापुत्र ' अर्थ विवक्षित होने पर फिर ' श्रब्राह्मण ' शब्दका कहना तो— चीननि सर्वथा ही व्यर्थ हो जाता है । फिर भी पृथक् उल्लेखसे स्पष्ट है कि— " यह ' दास्याः पुत्रः कितवः ' नीच जुझारी ' अब्राह्मण: ' - श्रप्रशस्त - ब्राह्मण है, तो हम प्रशस्त ब्राह्मणोंमें इसने दीक्षा कैसे ली " यही यहाँ आशय है । ( १४ ) नत्र के छः अर्थ हुआ करते हैं, उनमें एक अर्थ ' अप्रशस्त ' भी केलिए होता है । जैसे कि - ' तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । श्रप्राशस्त्यं विरोधदच नत्रर्थाः षट् प्रकीर्तिताः ' । इनके उदाहरण इस प्रकार हैं-दार्थ-दस्पा. १ तत्सदृश: -अब्राह्मण: ( ब्राह्मणसदृशः ) । २ अभाव: - श्रपापम् ( पाप नहीं ) । ३ तद्भिन्नः - अनश्व:, ( अश्व से भिन्न ) । ४ अल्प: -अनुदरा कन्या शस्त छोटे पेटवाली लड़की ) । ५ प्रशस्त: - पशवो वा अन्ये गोमश्वेभ्यः दु.... ( प्रशस्त पशु ) । ६ विरुद्धः - अधर्म: ( धर्मविरुद्ध ) । कहा जैसे प्रशस्त - पशु गाय- घोड़ोंकी प्रतियोगितामें अवशिष्ट पशु ' अपशु-र्यक प्रशस्त पशु ' कहे गये हैं; यह नहीं कि - ' वे पशु ही नहीं " रहे; वैसे ही , प्रशस्त ब्राह्मणों में यह कितव कवष; अब्राह्मण - द्यूतकार होनेसे अप्रशस्त-महाः भी ब्राह्मण यह कैसे दीक्षित हुआ वह ऋषियोंका अभिप्राय है । तब यहां ' अब्राह्मण ' शब्द स्थित ' नञ ' अप्रशस्त अर्यमें ही प्रकरणानुगृहीत है, वार अन्य अर्थ में नहीं । री ] - ( १५ ) ' जल ' ( पा. शरा ६ ) सूत्र - महाभाष्य में गुणहीनके उदाहरण अर्थ- में ' खड़े होकर पेशाब करते हुए वा खाते हुए, ब्राह्मणकी श्रप्रशस्तता बताने के लिए ' श्रब्राह्मण ' शब्द ' प्रयुक्त किया है । जैसे कि- ' अब्राह्मणोऽयं ' अब्राह्मण ' शब्दपर विचार [ ३११ यस्तिष्ठन् मूत्रवति, श्रब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् भक्षयति ' । इसकी व्याख्या करते हुए श्रीकटने लिखा है- तपः श्रुतयोरभावाद् ' निन्दया ' प्रत्र ' श्रब्राह्मण.'- शब्द - प्रयोगः । तत्र जातिमात्रे प्रवयवे समुदाय हपारोपाद् ' ब्राह्मण ' शब्द प्रयोगः । नवा तु स्वाधाविकी तपःश्रुतयोनिवृत्तिर्थोत्यते' । श्रर्थात् - इस ब्राह्मण जातिजातमें न तो है तपस्या, न है वेदशास्त्रादि-का अध्ययन । तभी तो यह खड़ा होकर पेशाब करता है, वा खाता है, उसीकी निन्दार्थ ' अब्राह्मण ' शब्दका प्रयोग है । यहाँ तपस्या, अध्ययन, और जाति तीन ब्राह्मणत्वकारक साधनोंमें ग्रन्यतम ' जाति ' रूप प्रवयवको समुदाय मानकर उसे ब्राह्मण कहा गया, और नल से उसकी तपस्या और श्रुतका प्रभाव दिखलाया गया । इससे उसकी वास्तविक ब्राह्मणजाति निषिद्ध नहीं की जा रही, किन्तु ' नञ् ' से उसकी निन्दा हो विवक्षित होती है । तात्पर्य यह है कि- ' अब्राह्मणोयं यस्तिष्ठन् मूत्रयति ' इस वाक्यमें जैसे ' अब्राह्मण ' शब्द ब्राह्मणकेलिए ही प्राया है, ब्राह्मण - भिन्न केलिए नहीं । इससे खड़े होकर मूतने वाले ब्राह्मणको ब्राह्मण - भिन्न न बताकर उसकी अप्रशस्तता वतानी ही इष्ट होती है, वैसे ही ऐ.ब्रा. की श्रुतिमें कवपके लिए कहा हुना ' श्रब्राह्मण ' शब्द उसको ब्राह्मण - भिन्न न बताकर ब्राह्मण हो बता रहा है । ब्राह्मणताके साथ उसकी कितवत्वसे अप्रशस्तता बता रहा है - यह बात प्रत्यन्त स्पष्ट हो गई । यदि इस कण्डिका में ' अब्राह्मण ' शब्द न होता, तो कवषके ब्राह्मण होनेका शीघ्र पता न चलता, पर अब ' दास्याः पुत्र ' के साथ स्थित ' अब्राह्मण ' शब्दने कवषको स्पष्ट ब्राह्मण बता दिया । ' अब्राह्मण ' यह गाली ब्राह्मणको हो दी जा सकती है; शूद्रादिको नहीं । नहीं तो ' दास्याः पुत्र ' से ही उसकी प्रब्राह्मणता प्रतीत होनेपर फिर ' अब्राह्मण ' पदका ग्रहण व्यर्थ हो जाता । इसलिए ही श्रीसायणने कहा है- ' कितवो - द्य तकारः, तस्माद् श्रब्राह्मणोऽयम्, ईदृशो [ द्य तदेवनव्यसनी ] योऽस्माकं शिष्टानां मध्ये स्थित्वा कथ दीक्षां कृतवान्

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३१२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इति तेषामभिप्रायः ' । यहाँ श्रीसायणने कवषको ' दासीपुत्र ' होनेसे अब्राह्मण-नहीं कहा, किन्तु कितव होनेसे ही उसे ' अब्राह्मण ' कहा है, तब ' अब्राह्मण-पद उसकी अप्रशस्ततामें ही पर्यवसित हो जाता है, न कि उसकी तद्भावता-में, क्योंकि वह वह पुरुष वह वह न होता हुआ भी निन्दार्थ उस उस शब्दसे निन्दित किया जाता है । जैसे कि-( १६ ) ४।१।४ पाणिनि - मूत्र के महाभाष्य में लिखा है- ' चतुर्भिः प्रकारै: ' प्रतस्मिन् सः ' इत्येतद् भवति । ( चार कारणोंसे ' वह न होता हुआ ' भी ' बह ' कहा जाता है । ) तात्स्थ्यात् ताद्धर्म्यात्, तत् - सामीप्यात्, ततसाहचर्या-. दिति । तात्स्थ्यात् तावत् - मञ्चा हसन्ति, ( मञ्चकस्थित बच्चे हंसते हैं ) गिरिर्दह्यते ( पहाड़ जलता है ) । ताद्धर्म्यात् - जटिनं यान्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, ब्रह्मदत्ते यानि कार्याणि, जटिन्यपि तानि क्रियन्ते इत्यतो जटी ब्रह्मदत्त इत्युच्यते ' ( जटाधारीको जा रहे देखकर यह ब्रह्मदत्त है ' यह कहनेका यह भाव है कि ब्रह्मदत्त जो काम हैं, जटाधारीमें भी वही है; अतः यह ' जी ' ब्राह्मण है- यह कहा जाता है । तत्सामीप्याद् - गङ्गायां घोषः, कूपे गर्गकुलम् । ( गङ्गाके किनारे वस्ती है, कुर्एके पास गर्नका घर है ) । तत्साहचर्यात् कुन्तान् प्रवेशय ( लाठीधारियोंको, भाले उठानेवालोंको प्रविष्ट करो ) । यष्टीः प्रवेशय, यहाँपर प्रदीपमें कैंपटने लिखा है - मारोप्यते ताद्रूप्यम्, न तु मुख्यमित्यर्थः । बालेषु मञ्चत्वारोपाद् ' मञ्च ' शब्द-प्रवृत्तिसन्तीति पदान्तस्योगाद् विज्ञायते । [ एवं ' कितव ' पदान्तरयोगाद् ' प्रब्राह्मण ' शब्द प्रयोगः कवषकृते ] ( बच्चों में मव्वत्वका प्रारोप होने से ' हसन्ति ' इस दूसरे पदके योगसे ' मञ्च ' का अर्थ ' मञ्चस्थित बच्चों का बोध करा रहा है । [ इस प्रकार ' कितव ' इस दूसरे पदके योगसे कवषको ' अब्राह्मण ' कहना उसे ' अप्रशस्त ब्राह्मण ' बता रहा है । ' यह ब्राह्मण नहीं है ' इस अर्थको नहीं बता रहा है । ' जटिन ' ब्रह्मदत्तवद् धर्मलाभात् तद्-रूपारोपः । सिंहो माणक्क.. गौर्वाहीक: ' इत्यादावपि ताद्धर्म्यात् ताद्रूप्या-रोपान् तच्छब्द - प्रवृत्तिः । तदुक्त हरिणा- ' गोस्वानुषङ्गो वाहीके निमित्तात् ' अब्राह्मण ' शब्दपर विचार [ ३१३ कैश्चिदिष्यते । अर्थमात्रं विपर्यस्तं शब्दः स्वार्थे व्यवस्थितः वाक्यपदीय 31 [ यह आशय है कि - जैसे ' मञ्चा हसन्ति ' यहाँ ' हसन्ति ' पदके योगसे ] । का अर्थ ' मञ्चकस्थित बालक ' हो जाता है वैसे ' ' मवर्क ' तभ , कितवोऽब्राह्मणः ' कितव ' पदके योग से ' कितवशब्द प्रयुक्त निन्दाके द्योतनार्थं देखा शब्दका प्रयोग भी औौपचारिक है, वा निन्दार्थवाद है । ' श्रब्राह्मण '. कि ( १७ ) यदि यहाँ वादी व्याकरणका डंडा देखकर उससे ऐत तो हम उसे तर्कशास्त्रका प्रमाण देते हैं । ' न्यायदर्शन ' के डर जाय, शैल श्रवतरणिकामें श्रीवात्स्यायनने शरा ६३ सूपकी है । कहा है-- ' निमित्ताद् श्रतद्भावेपि तदुपचारो दृश्यतेः खलु अर्थात् पुरुषको वैसा न होनेपर भी कभी किसी निमित्तले लाव वैसा कह दिया जाता है । उन निमित्तोंको सूत्रकार गिनते हैं उस १. स्थान २ तादर्थ्य ३ वृत्त ४... ब्राह्मण १ मञ्च - ' सहचरण ४... पुरुषेषु प्रतद्द्भावेपि तदुपचारः २ कट ३ राज संस्व ( २२/६३ ) इसके सब उदाहरण तो ' न्यायदर्शन ' में देखे जा सकते हैं, परन्तु यहाँ चतुर्य निमित्त ' वृत्त ' का कित उदाहरण देखना चाहिए- ' वृत्ताद् यमो राजा, कुवेरो राजा इति, तद्वद् भारत वर्तते ” अर्थात् राजा वास्तवमें यम या कुबेर तो नहीं हो जाता, परन्तु कित वैसे वृत्त [ श्राचरण ] से राजाको यमः वा कुवेर कहा जाता है, जिसका ऽयम पर्यवसान तद्वत्तायें हो जाता है, कि - यम - जैसा, कुबेर - जैसा ) वैसे ही तेषा कवषके भी द्यूतक्रीड़ाव्यसनी होनेसे श्रब्राह्मणोंका वृत्त धारण करनेसे उसे ' अब्राह्मण ' कहा गया, जिसका पर्यवसान वास्तविक श्रब्राह्मणत्वमें न होकर श्रब्राह्मणवत्ता - अब्राह्मसादृश्यमें हुआ कि यह अब्राह्मण - जैसा ( १८ ) अथवा कहीं वादी इसे न्यायका ही डंडा न मान लें, उसका प्रिय - प्रमाण इस विषयमें दिया जाता है । ' ब्रह्म ( वेद ) ब्राह्मण: यह वादिसम्मत प्रमाण ब्राह्मणको परिभाषा बताता है, ब्राह्मण: ( वेदका न जानने वाला ) इस विग्रहमें ' अब्राह्मण ' शब्द है । ब्राह्म पवित्र इसलिए शब्द जानाति आच तब न व्युत्पन्न अर्थ होता है । तब यह अर्थ निकला कि यह कवष ' अक्षर्मा दीव्य: ' ( ऋसं. १० अर्थ ३४८१३ ) इस वेदमन्त्रको भी नहीं जानता, वा उसे नहीं अनुसृत करता, निन्द

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३१३ श्री सनातनघमालोकः ( ३-२ ) ३१४ ] दीय ] | मव्वर्क तो अभी तक भी कितव है । इस समय तक कवषने यह सूक्त नहीं तभी वाह्मण देखा था । इसलिए जब उसने यह सूक्त देखा, तब देवताओंने ' तब गावः ब्राह्मणं. कितव! ( ऋ. १०।३४।१३ ) उसे ' कितव ' शब्दसे सम्बोधित किया । ऐतरेयब्राह्मण ऋसं. के इस इतिहासको बता रहा है, क्योंकि उसकी ऐसी शैली है, जैसेकि -- शौन: शेपाख्यानको ऐ.ब्रा. ने ऋग्वेदके क्रमसे दिखलाया जाय, सूपकी है । इस कारण उस सूक्तसे अनभिज्ञ होनेसे उसे पारिभाषिकतासे, वा पचारो लाक्षणिकतासे, वा यौगिकतासे ' श्रब्राह्मण: ' इस प्रकार निन्दार्य कहा है, मित्तसे उसकी ब्राह्मणता निषेधार्थं नहीं । चरण इसलिए म.म. श्री मित्र मिश्र ने अपने ' वीरमित्रोदय ' के उपनयन-राज संस्कार उपनेय- निर्णय प्रकरण ( ३ ९ २ पृ. ) में लिखा है- दास्या. पुत्रः मतो कितवोऽब्राह्मण इति प्रक्षेपमात्रं नतु वस्तुगत्यैव तन्मातुर्वासीत्वम्-- इति का भाप्यव्याख्यानात् ' । इससे श्रीसायणोक्त ' दास्याः पुत्र इत्युक्तिरधिक्षेपार्था । तद्वद् कितवो द्यूतकार:, तस्माद् ( द्यूतकारत्वाद् ) प्रब्राह्मणो- ( अप्रशस्त ब्राह्मणो ) रन्तु ऽयम् - ईदृशो नः श्रस्माकं शिष्टानां मध्ये स्थित्वा कथं दीक्षां कृतवान् इति सका तेषामभिप्रायः " यह अभिप्राय ठीक ही सिद्ध हुआ । उसे श्रीसायणने ऐसा कहीं नहीं लिखा कि- शूद्राका पुत्र हम ब्राह्मणों में न कैसे श्र घुसा, बल्कि यह लिखा है कि- यह श्राचारहीन ब्राह्मण हम सद्-ब्राह्मणोंमें कैसे श्रा घुसा? इसलिए श्रीसायणने कवषकेलिए - ' सरस्वत्याः पवित्रमुदकमयं पापिष्ठो मा पिवतु ' यहाँ उसकी निन्दार्थ ही पापिष्ठ शब्दका प्रयोग कराया है । वादीने भी ' अब्राह्मण ' का अर्थ ' अपने ति प्राचरणोंसे बहुत ही भ्रष्ट ' यह ( सार्वदेशिक अप्रैल १६५० पृ. ७६३ ) । किया है । श्रीशिवशं. काव्य. ने भी ' जातिनिर्णय ' ( २५० पृ. ) में यही पत्र अर्थ किया । यह ठीक भी है, नहीं तो ' दास्याः पुत्र ' का ' शूद्राका पुत्र of अर्थ करने पर, और ' अब्राह्मणः ' का ' यह ब्राह्मण नहीं ' ऐसा अर्थ करना व्यर्थ वा पुनरुक्त हो जाता है । इस कारण यहाँ उक्त शब्दोंसे उसकी निन्दा ही विवक्षित है -- यह अत्यन्त ही स्पष्ट है । जब तक किसी ' अब्राह्मण ' शब्दपर विचार [ ३१५ प्रामाणिक इतिहाससे कवयको दासीपुत्र ( शूद्र ) न सिद्ध किया जावे; तक तक श्रीसामश्रमी एवं उनके पिछलगुनोंका पक्ष प्रसिद्ध ही रहेगा । ( १ ९ ) श्रीसायणाचार्य वेदादि - शास्त्रों के भाष्यकार हमारी अपेक्षा अधिक शास्त्रदर्शी और इतिहासदर्शी थे । उसमें उन्होंने देखा कि कवप बास्तवमें शूद्रापुत्र नहीं, इसलिए उनने दिखलाया कि उसे कितव ( द्यूत-कार ) होनेसे ही ' दास्याः पुत्र ' शब्से और उससे आगे के ' श्रब्राह्मण ' शब्द से विक्षिप्त किया गया है । वादियोंके पास ऐसा कोई इतिहास नहीं, जहाँ कवषको शूद्र दिखलाया गया हो, बल्कि ब्रह्मपुराणमें पैलूष इति विख्यातः कवषस्य सुतो द्विजः ' ( १३६२ ) इस पद्य में उसे द्विज कहा गया है । ' द्विजका क्षत्रिय, वैश्य अर्थ करना तो वादीके ' शूद्रता ' पक्षके ही काटने वाला होगा । ( २० ) इससे ' वैदिक वाङ्मयका इतिहास ' द्वितीयभागमें लिखित उसके प्रणेताका निम्न लेख भी भ्रममूलक सिद्ध हुना, जिसमें उन्होंने लिखा है- " ब्राह्मणों के पाठसे पता चलता है कि - धारों वर्ण साधारणतया जन्मसे माने जाते थे... पर ब्राह्मणोंका पाठ यह भी बताता है कि - जन्मसे वर्ण एक कड़ा नियम न था । तपसे, ज्ञानसे, घोर परिश्रमसे एक श्रब्राह्मण भी ब्राह्मण बन सकता था । इसी प्रकार विद्या - गुणहीन एक ब्राह्मण भी नाममात्रका ब्राह्मण रह जाता था । ब्राह्मणमें कहा है - ' ऋषयो वं सरस्वत्यां... दास्याःपुत्रः, कितवोऽब्राह्मणः कथं नो मध्येदीक्षिप्ट ' ऋषिजन सरस्वतीतट पर " यज्ञ करने लगे, उन्होंने कवष - ऐलूषको सोमसे परे कर दिया- ' दासीका पुत्र धोखा देने वाला, अब्राह्मण किस प्रकार यह हमारे यज्ञमें दीक्षित हुआ है । वह बाहर जंगलमें गया पिपासासे सन्तप्त । उसने यह अपोनप्त्र देवताका सूक्त देखा ' ( ऐ. २ । ३ । १ ९ ) । इससे प्रतीत होता है । कि- एक अब्राह्मण भी मन्त्रोंका द्रष्टा बन गया । उसे ही ऋषियोंने बेदार्थद्रष्टा - ब्राह्मण मान कर पुनः अपने यज्ञमें बुलाया ' ( पृ. २२१-२२२ ) यह उल्लेख इसलिए ठीक नहीं कि कवषकी शूद्रता तथा शूद्रसे

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३१६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ब्राह्मणता यहां नहीं दिखलाई गई । हाँ, पीछे उसका मन्त्रद्रष्टा हो जाना बताया है । इससे प्रतीत होता है कि वह यज्ञ ऋषियोंका था, धनुषियोंका नहीं । उसमें कोई धनुषि दीक्षा नहीं लेसकता था, उसमें कवष दीक्षित हो गया । वह ऋषि तो था नहीं, साथ ही कितव धूर्त द्यूतकार भी था; यह ऋसं. के १०।३४ प्रक्षसूक्तके कवष- ऋषि होनेसे सूचित होता है । वहां पर कवषके बोघनार्थ देवताओंोंने बार - बार ' कितव ' शब्दका कवषके मुखसे ही प्रयोग कराया है । उसके यज्ञमें प्रवेशसे ऋषियोंकों क्रोध हुआ कि- इसने हमारे साथ भी कितवता ( चारसौ बीस ) की है कि ऋषियोंसे प्रवेष्टव्य यज्ञमें यह प्रनृषि एवं भ्रष्टाचरण मा घुसा है । क्रोधसे उन्होंने ' दास्याः पुत्रः ' कितवः ' अब्राह्मण: '... इन शब्दोंसे उसे गाली देकर यज्ञसे बाहर कर दिया । तब देवताओं की कृपासे प्रपोनप्त्रीय सूक्त उसमें प्रतिभात हुआ देखकर उसे ऋषि - मन्त्रद्रष्टा होगया हुआ देखकर उसपर देवताओंको कृपा जानकर ऋषियोंने उसके कितवता दोष पर उपेक्षा कर-के फिर उसे ऋषि - यज्ञमें शामिल कर लिया । इससे व.वा.इ. के प्रणेता श्रीअनुसन्धाताजी का अभिप्राय निरस्त हो जाता है । यहाँ कवषका श्रब्राह्मणसे ब्राह्मण होना तो कहीं नहीं दिखलाया । हाँ, अनूषिसे ऋषि होना सूचित किया है । ऋषि मन्त्रद्रष्टाको कहते हैं । वह केवल ब्राह्मण ही नहीं होता; किन्तु ब्राह्मणसे प्रतिरिक्त क्षत्रियादि-प्रब्राह्मण भी हो सकता है । निरुक्त ( ६२७११ ) में कहा हुआ ' जालबद्धा ' मत्स्या ऋषय: ' इनका निदर्शन हैं । परन्तु ऋषियोंमें कोई शुद्र नहीं सुना गया । पहले श्रीभग. जीने जिस कवषको ' मन्त्रद्रष्टा ' दिखलाया, उसीको द्वितीय - पंक्तिमें ' मन्त्रार्थद्रष्टा ' कह दिया- इस प्रकार उद्दिष्ट प्रतिनिर्दिष्टकी असमानता करके उन्होंने प्रक्रमभङ्ग दोषको श्रामन्त्रित करके परस्पर-विरोध करके अपने पक्षको निर्मूल सिद्ध कर दिया । ' वेदार्थद्रष्टा होने पर ऋषियोंने उसे ब्राह्मण मानकर यज्ञमें बुला लिया ' यह अनुसन्धाताजीका ' ब्राह्मण ' शब्दपर विचार [ ३१७ कथन निर्मूल ही है । ऐ. ब्रा. में कहीं ऐसा नहीं कहा गया । अतः ' 3 शब्दका उन्होंने बीचमें प्रक्षेप ही किया है । ब्राह्मण तो वह पूर्वसे ब्राह्मण'-हाँ वह पहले मन्त्रद्रष्टा ऋषि नहीं था, साथ ही कितव भी था ही था, प्र ऋषि ने उसे ऋषि ( मन्त्रद्रष्टा ) होगया देखकर यह कह । फिर न कर कि नि ' विदुर्वे इमं देवाः उप इमं @ या है ' ( देवता इसे जानते हैं, यज्ञ हम देवताओंको प्रसन्नताथ ही कर रहे हैं, तब देवताओंके कृपापात्र इस कवषकी फिर यज्ञमें बुला लें - ) इन शब्दोंसे बुला लिया । इन शब्दों उस तथा अनुसन्धाताजीके शब्दों में तिल - तालका अन्तर है । सभ इस प्रकार श्रीसासश्रमीजीका मत प्रसिद्ध ही सिद्ध हुआ — जोकि नाग -उन्होंने कवषको निमूं लतासे शूद्र कहा । इसलिए ' ते ह वा ऋषयोद्धन् राज विदुर्वै इमं देवाः, उप इमं ह्वयाम है ' ( ऐ. २ | ३ | १ ९ ) इसकी व्याख्या न - श्रीसायणने कहा है- ' ते भृग्वादयः परस्परमिदमब्रुवन् – इस कवनं देवाः सर्वेपि विदुर्वे - जानन्त्येव; अतोस्य कितवत्वादिदोषो नास्ति, तस्माद् इमस-' स्मम्ममीपं प्रत्याह्वयाम ' यहाँ भी उसे कितवादिदोषसे दुषित कहा है, शूद्र-नहीं कहा । जात तब जो प्रपोनप्त्रीय सूक्त कवषने देखा था वह ऋसं. ( शा ) का १० थी, ३० है । उसका ऋषि अजमेरीसंहिता में भी ऐलूष कवष ही लिखा है । तब ' कवषको ' अक्षम दीव्य: ' ( ऋ. १०/३४ ) इस सूक्त दर्शनसे यूतक्रीड़ा से कह भी घृणा हो गई । इस सूक्तका ऋषि भी उक्त संहितामें कवष ही लिखा अपन है । इससे स्पष्ट है कि कवषको कितव होनेसे ही ऋषियोंने ' दास्याःपुत्र ' कुल गया और ' अब्राह्मण ' शव्दसे गाली दी; वास्तविकतासे नहीं । अतएव चन- कथा निन्दा- सूक्त में ' कितव ' ( १० | ३४ | १३ ) श्रादि कवष जैसोंको लक्ष्य करके जाय कहा गया । शूद्र इस प्रकार ऋ. सं. के विवरण करनेवाले ऐप्रा.ने यहाँ कपका वही कितवतासम्बन्धी इतिहास व्यक्त कर दिया है । तब ' दास्या पुत्र:, कहा ' अब्राह्मण ' ' इन शब्दोंसे श्रीसामश्रमीका ऐलूष- कवषको शूद्र सिद्ध करना ग्रन्थ नाम

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३१७ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३१८ ] ही ह्मण- निर्थक प्रयोग तथा ' अपशवः ' की तरह अप्रशस्तार्थक था, • प्रलुक्समासके ओर ध्यान न देना ही है । इस आलोचनासे प्रधानमल्ल-फिर. नत्र के प्रयोगकी कि निबर्हण - न्याय से सामश्रमीजीके पिछलगुए सुधारकोंका निराकरण भी भी तो हो गया । कृपापात्र ( २१ ) कक्षको कथञ्चिद् दासीपुत्र मान भी लिया जाय; तथापि शब्दों उसकी माता शूद्रा थी - यह भी बात विचार पर नहीं टिकती । दायाँ सभी शूद्रा हों; यह निष्प्रमाण ही है । ( क ) अज्ञातवासमें द्रौपदी सैरिन्ध्री नामसे राजा विराटकी दासी बनी, वह क्षत्रिया थी, शूद्रा नहीं । ( ख ) - जोकि राजा हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी शैव्याको बेचा, वह किसी की दासी बनी । बन् न वह शूद्रा हुई, न उसके पुत्र रोहिताश्वको कहीं शूद्र कहा गया है । ख्या मेंदेवा ( ग ) राजा ययातिकी पत्नी देवयानीकी शर्मिष्ठा दासी थी; न तो : वह शूद्रा कही जाती है; और न उसके लड़के पुरुको ही कहीं शूद्र कहा इमस- गया है । ( घ ) पत्नी भी पतिकी दासी होती है, इससे क्या वह शूद्रा हो शूद्र जाती है? ( ङ ) गरुड़की माता विनता कद्र नाम वाली अपनी सपत्नीकी दासी I थी, पर वह शूद्रा नहीं थी, उसका पुत्र गरुड़ भी दास्याः पुत्र, वा शुद्र नहीं तब कहा जाता । ( च ) राजा लोग शत्रु राजाको जीतकर उसकी लड़कीको अपनी दासी बना लिया करते हैं, उससे वह शूद्रा नहीं हो जाती । लिखा कुलूतेश्वरकी लड़की पत्रलेखाको चन्द्रापीड़की सेवार्थ दासी बना दिया बापुव ' गया था- इससे वह शूद्रा नहीं हो जाती । तब वादितोषन्यायसे कवषको चल कथञ्चित् दासीका लड़का भी मान लिया जाये, तब वह शुद्र कैसे हो करके जायगा - जब तक कि उसके माता- पिताको किसी ऐतिहासिक प्रमाणसे शूद्र सिद्ध न किया जावे । पका ( २२ ) जोकि श्रीगोतमने कवषको इलूषा नामक दासीका पुत्र पुत्र, कहा है - यह भी निर्मूल है, नहीं तो उन्हें वैसा इतिहास किसी इतिहास-करना ग्रन्यसे दिखलाना चाहिये । ( क ) इलूष तो कवष के पिताका पुलिङ्गान्त नाम है - इलूषस्य अपत्यम् ऐलूषः । ( ख ) कबषको शुद्र मानते हुए भी ' ब्राह्मण ' शब्दपर विचार । ३१६ श्रीराजाराम शास्त्रीने श्रपने ' वेदान्तदर्शन - भाष्य ( २६४ पृष्ठ ) ' में ऐलूपका पुत्र कवष ' इस प्रकार यह पुरुषका नाम ही माना है । ( ग ) वैसा ही मननेवाले श्रीनगेन्द्र वसुने भी अपने हिन्दी विश्वकोष ४ यं भाग ( २२५ पृ. ) में ' इनके पिताका नाम इलूप ' माना है । ( घ ) वैसा ही माननेवाले श्रीच.से, शास्त्रीने भी ' हिन्दुराष्ट्रका नवनिर्माण ' ( १६१ पृ. ) में ' इलूषके पुत्र कवष ' यह उसका पितृनाम माना है । ( ङ ) श्रीसायणने भी अपने सं. के भाष्य ( १०1३० ) में इलूषपुत्रस्य कवपस्यापम् ' यही लिखा है- ' इलूषापुत्रस्य ' नहीं कहा । ( च ) अपने ऐ.ब्रा. के भाष्य में भी श्रीसायणने ' तेषां मध्ये कश्चिद् इलूपाख्यस्य पुरुषस्य पुत्रः कवपनाम-कोप्पस्ति ' यह कहकर उसके पिताका नाम ही ' इलूप ' बताया है । पुरुष भला दासी कैसे हो । ( छ ) इससे यह भी सिद्ध होता है कि कवय यदि किसी दासीका पुत्र होता, तब उसका नाम भी उस दासीके नामसे प्रसिद्ध होता, पिताके नामसे नहीं । परन्तु उसकी माता दासीके नाम न मिलनेसे, केवल पिताका नाम ही मिलनेसे यह स्पष्ट हो गया कि वह वस्तुतः दासीपुत्र नहीं, किन्तु ' दास्याः पुत्रः ' यह उसे गाली ही दी गई है । ( ज ) इससे श्री-क्षि.मो. शास्त्रीका ' भारतवर्ष में जातिभेद ' ( २५ पृ. ) में ' इलूया ' एक शूद्र दासी थी, यह लिखना भी असत् ( गलन ) सिद्ध हो गया । क्योंकि-. स्त्रीका नाम अकारान्त न होकर आकारान्त [ टावन्त ] ही होता है, परन्तु ' इलूपा ' ऐसा टाप् - युक्त नाम कहीं भी नहीं मिला ग्रतः कवषको दामी-पुत्रा भी निर्मूल ही है, उस पर सुधारकों द्वारा बलात् ही थोपी गई है । ( २३ ) श्रीकाव्यतीर्थका यह लिखना कि - ' सम्पूर्ण ऋग्वेदका अध्ययन - करनेपर उसे वेदके नवीन नवीन विषय भासित होने लगे, यह देख ऋषियोंने उसे फिर यज्ञमें बुलाया ' यह कोरी कल्पना ही है । ऐ.ब्रा. में : वा अन्यत्र कहीं ऐसा नहीं लिखा । वहाँ तो ' स बहिधन्य उदूढः पिपासमा

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ] ३२० वित्त एतद् अपोनप्त्रीयमपश्यत् ' तत्क्षण ही उसे अतर्कित उक्त - सूक्तका स्फुरण बताया है, उसका कहीं वेदका पढ़ना नहीं बताया गया, तभी तो ऋषियोंने झट उसी समय उसे यज्ञमें शामिल कर दिया । उसे यज्ञसे बाहर करनेवाले ऋषि भी अभी वहीं ठहरे थे । इस थोड़े ही क्षणोंके समयमें उसने उस मरु ( रेतीले प्रदेश ) में जहाँ कोई भी गुरुकुल नहीं था, कवषका सम्पूर्ण ऋग्वेद पढ़ना अनुपपन्न ही है । यदि यह पहले मे ही वेद पढ़ा हुआ होता, तब उसका ऋषियों द्वारा निकालना ही उपपन्न नहीं होता । नहीं तो फिर उसे बुलाते ही नहीं । उसे तो तब ' प्रपोनप्त्रीय ' ( ऋ. १०/३० ) इस एक सूक्तकी ही स्फुरणा बताई गई है, पीछे उसे ३१-३२-३३-३४ सुक्त प्रतिभात हुए । सम्पूर्णं ऋग्वेद वाली बात काव्य-तीर्थजीकी निर्मूल है | श्राश्चर्य यह है कि यह लोग निर्मूल कल्पनाएं गढ़ते हुए नहीं शर्माते । ( २४ ) श्रीर.का. शास्त्रीका यह लिखना कि ऋषियोंने इन्हें दासीपुत्र कह यज्ञसे निकाल दिया; तत्पश्चात् इन्होंने सम्पूर्ण ॠग्वेदका अध्ययन कर उसके नये - नये विषयोंको हृदयङ्गम किया । तब ऋषियोंने उन्हें पास बुलाकर अपना आचार्य बनाया ' यह ऐ. बा. से विरुद्ध ही है, क्योंकि यज्ञमे निकालने तथा फिर बुलाने के सम में कोई साल - छ: महीनेका अन्तर नहीं कि इस अवधि में उसने सब संहिता मोंकी उपजीव्य ऋसं. को भी पढ़ डाला, उसमें नव - नव उन्मेष भी वह कर सका । यहाँ तो कई मिनटों की बात थी । न सारी ॠसं की पढ़ने की बात कहीं लिखी ही है । यज्ञ शुरू होनेको था । तब जो ऋषि उसे नदी - तटसे दूर ले गये थे वे भी अभी वापिस नहीं श्राये थे । उनके देखते ही देखते caust प्रोनपत्रीय सूत स्वयं, बिना पढ़नेके परिश्रमके, अनायास ही प्रतिभात हो गया । यह चमत्कार देखकर ऋषियोंने उसपर देवकृपा जानकर उसे उस प्रवृत्त यज्ञमें मिला लिया । प्राश्चर्य है कि - सुधारक लाग ग्रन्थकार से विरुद्ध भी कल्पनाएं गढ़ दिया करते हैं । यह शास्त्रीजीने क्या ऐलूप कवष शूद्र था? [ ३२१ काव्यतीर्थजीका ही अन्धानुसरण किया है, उसका चुका है । उत्तर दिया जा ( २५ ) ' छूत और अछूत ' में उसके प्रणेताका कहकर ऋषियोंने दासीपुत्र कवष ऐलूषको अपने में यह कहना कि ऐसा विद्वत्ताके कारण मनुष्यका सम्मान किस शामिल कर लिया अच्छा उदाहरण है । जिन लोगोंने उसे नीचकुलोत्पन्न प्रकार होता था इसका । था, उन्होंने उसकी वेदविद्याको कह कर त्याग दिया यह भी गलत है 1- जानकर अपने में शामिल कर लिया ', । यह इसमें यह प्रष्टव्य है कि — कवष पूर्वंसे ही विद्वान् से निकाले जानेके इन कई मिनटोंके समयमें था, अथवा ऋषियों-पूर्वसे ही विद्वान् था; तब उसे विद्वान् हो गया? यदि वह अभी - अभी विद्वान् वन ' अब्राह्मण ' क्यों कहा गया? सम्बन्धित गया, तो क्या यह सम्भव है? वस्तुतः यज्ञमें हुए थे, वे सब ऋषि मन्त्रस्तोमद्रष्टा जो उस समय तक कवब मन्त्रद्रष्टा ( निरु. २।११।१ ) थे । नहीं था, थतः उसे यौगिक न होनेसे ऋषियोंकी पंक्ति में बैठने योग्य प्र [ ब्रह्म जानाति - इति ब्राह्मणः वा पारिभाषिक एवं. शाब्दिक प्रब्राह्मण प्र अद्रष्ट, न ब्राह्मणः इति ब्राह्मणः, वेदमन्त्रोंका ] और कितव होनेसे बहाँसे निकाल दिया गया । ' दास्याः पुत्र ' शब्द तो गाली ही है, नहीं तो यदि दासी वा पुत्र होनेसे ही ऋषियोंका उसे यज्ञमें [ शूद्रा ] के II दासीपुत्र तो वह वादियों के अनुसार शासिल करना इष्ट नहीं था, तो क पुत्र नहीं बन गया श्रव भी था, किसी ब्राह्मण - ब्राह्मणीका था, न ऐसा होना सम्भव ही था, तब वासीपुत्रताके द्वेषी ऋषियोंने उसे यज्ञमें क्यों बुला लिया? इसीसे चा ' दास्याः पुत्र ' शब्द केवल उसकेलिए गाली स्पष्ट है कि - कि ही थी, वास्तविकता नहीं । जब कवष तत्क्षण वैदिक - सूक्त प्रतिभात होनेसे अन सरस्वती नदीके स्वयम् उपस्थित ऋषि वन गया, जलसे उसकी प्यास भी बुझ गई; ऐसी स.भ ० २१ श्री " अप

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[ ३२१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३२२ ] या जा देवताओं की कृपा उस पर हुई देख उन ऋषियोंने उसे यज्ञमें बुला लिया, इससे हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं, क्योंकि ऋषि बनना अपने अधीन - ऐसा की बात नहीं । जिसे लुप्त वेदमन्त्र समाधिमें वा अतर्कित स्वयं प्रतिभात लया का । हो जायें, वही ऋषि होता है । मन्त्रद्रष्टा न होथेसे यास्क, पाणिनि आदि यह भी ऋषि नहीं थे, हाँ सम्मानकेलिए उन्हें कहीं ऋषि महर्षि कहा गया दिया हो - यह भिन्न बात है, जैसे कि - प्राजकल महर्षि मदनमोहन मालवीत, यह महर्षि मुहम्मद, राजर्षि टण्डन इत्यादि कह दिया जाता है — यह बात श्रीसामश्रमीजी के ' निरुक्तलोचन ' में भी स्पष्ट है । पियों-दि वह aar पर देवताओंकी एक कृपा तो यह हुई कि उस प्यासेको सरस्वती-वह नदीका जल मिल गया, फिर देवोंथे उसे द्यूतनिरत देखा, जिसके लिए जो ऋषियोंने उसे ' दास्याः पुत्र ' और ' प्रब्राह्मण ' शब्दसे गाली निकाली थी । थे । दूसरी कृपा यह हुई कि उसे द्यूतहा निसूचक ऋसं. १०।३४ सूक्त भी योग्य प्रतिभात हो गया - जिससे उसका कितवत्व भी समाप्त हुआ । इस हाण प्रकार उसकी भारी कष्ट पानेरूप तपस्यासे तत्क्षण प्रसन्न देवताओंने का ऋषियों द्वारा यज्ञमें पुनः प्रतिष्ठापनपूर्वक उसका सम्मान कराया- इससे वादिपक्षकी कुछ भी सिद्धि न हुई । यह ऐ.ब्रा. में ऋसं. के इन सूक्तों के प्राकट्यका क्रमिक इतिहास है । तब भी कवषको इन्हीं सूक्तों का ऋषि तो कहा गया है, सारी ऋसं. का नहीं । ( २६ ) श्रीवि. ब. शास्त्रीका यह उल्लेख कि - ऐत. में कवय - ऐलूषका चरित्र ब्राह्मण और जुआरिया लिन कर फिर स्वीकार किया गया है । कि वह भी अपने परिश्रमसे ऋषि हो गया ' इसपर उत्तर यह है कि-श्रब्राह्मणसे उसके ऋषित्वमें तो हमें आपत्ति नहीं. ब्राह्मणता तो उसकी या, उनके अनुसार नहीं दिखलाई गई । ब्राह्मण तो वह पहलेसे ही था । सी ऋषि तो देवशुनी सरमा भी बनी थी, जैसा कि निरुक्त ( ११।२५।१ ) और ऐतरेयालो. ' ( ३१ पृ. ) में सूचित किया गया है । उक्त वाक्यमें ' अपने परिश्रमसे ' यह शब्द चिन्तनीय हैं, कई मिनटोंके इस समयमें अपना क्या कवप शुद्र था? [ ३२३ परिश्रम क्या हो सकता है? कहाँ था उस मरुभूमिमें गुरुकुल प्रतकिंत देवी- कृपासे उसे कई मूक्त स्फुरित हो गये कि? यह तो वह ऋषि हो गया । वस्तुतः कवय ब्राह्मण था - यह हम पूर्व बता श्राये हैं । ( २७ ) श्रीरा. रा. शास्त्रीका ( क ) ' वेदमें कोई ऐसा मन्त्र नहीं, जो शूद्रके अधिकारका बाधक हो, ( ख ) प्रत्युत यह बड़ा प्रबल साधक प्रमाण है कि- ' ऐलूषका पुत्र कवप ऋषि जो जन्मले शूद्र (? ) है, वह प्रपोनप्त्रीय-सूक्तका द्रष्टा है ' यह कहना भी ठीक नहीं । ( क ) ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( १ ९ ७१।२ ) यह अथर्ववेदका मन्त्र शूद्रोंका वेदनें अनधिकार बता रहा है । स्वयं श्रीराजारामजी अपने इस मन्त्रके भाष्यमें इसे वेदपाठके बाद पठनीय मानते हैं, और ' वरको देनेवाली वेदमाता मुझसे स्तुति की गई है, वह द्विजोंकी पावमानी प्रेरे । उन्हींके किये इस अयसे भी अद्विज - एकज-शूद्रोंका वेदपाठ में श्रनधिकार सिद्ध हो रहा है । ( ख ) कवपकी चूद्रता सिद्ध नहीं है - यह हम बता चुके हैं । उक्त अथर्व मन्त्रमें जब एकज - शूद्रका वेदमें अधिकार ही नहीं, तब वह वेदका ' द्रष्टा कैसे हो सकता है? तत्र ' मो जब शूद्रको मन्त्रद्रष्टा ऋषि बनने की रोक नहीं, तो उसको मन्त्राध्ययनमें कैसे रोक हो सकती है यह शास्त्रीजीका कथन खण्डित हो गया । ' यह अनुदारताका भाव है कि - शूद्र वेदाध्ययनका अधिकारी नहीं, पूर्व ऋषियोंके समय नहीं पाया जाता ' यह उनका कथन भी ठीक नहीं, अधिकारीको अधिकार न देना ' अनुदारता ' नहीं होती । इसी ऐत. के वाक्यमें ऋषियोंने कवषको शास्त्रीजीके अनुसार दासीपुत्र होनेसे ही तो यज्ञसे बहिष्कृत कर दिया, प्रत्युत उसे सरस्वती नदीके जल पीनका अधिकारी भी नहीं माना; अतः उसे मरुदेशमें डाल दिया । तो क्या यह उनके मतमें ' अनुदारता ' नहीं? यह तो कवष पर बेवकृपा हो गई कि-उसे प्रपोनप्त्रीय सूक्त स्फुरित हो गया । तब उन्होंने इस विशेष कारण-यश उसे पुनः स्वीकृत कर लिया । इससे शास्त्रीजीका पक्ष कट गया ।

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३२४ | श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वस्तुतः वह दासीपुत्र नहीं था - यह हम सिद्ध कर ही चुके हैं । ( २८ ) श्रीगं.प्र. एम ० ए ० का ' जब ऋषियोंको ज्ञात हुआ कि - कवप ज्ञानी है, तो उनको बुला कर ऋषि - पदवी दी ' यह कथन तथा श्रीरा. दे. -जीका ' ज्ञानी तथा परमात्माका उपासक बननेसे यदि मन्त्रद्रष्टा ऋषि बन सकता है, तो उसकेलिए अन्य और कौनसी महत्ता शेष रह जाती है ' यह कथन भी हमारे पक्षसे बहुत विरुद्ध नहीं । पर यहां शूद्रसे ब्राह्मण हो जाना कहीं नहीं कहा, किन्तु मन्त्रद्रष्टा [ ऋषि ] हो जाना ही कहा है । ऋषित्व तो [ ऋसं. १०।१०८ २,४,६,८,१०,११ ] देवशुनी [ कुतिया ] का भी कहा है, जैसे कि - ऐतरेयालो. ३१ पृष्ठमें सामश्रमीजीने ' उसे ' सुशिक्षिता कुक्कुरी ' कहा है, इससे वह ब्राह्मणी नहीं बन जाती । ऋषि होना अपने अधीनकी बात नहीं है । श्रीरा.नं.ने कवषकेलिए कहा है— ' कवपको ऋषियोंने यज्ञसमारोहसे धूर्त, प्रब्राह्मण, दासीपुत्र कहकर निकाल दिया था, तब उसे दीक्षा देना अङ्गीकार न किया । देवता लोग कवषको जानते थे कि कवष ज्ञानी, विद्वान् तथा धर्मात्मा पुरुष था, अतः कवष महर्षि बना लिया गया ' इससे वादीका पक्ष कुछ भी सिद्ध नहीं होता । यहाँ अनजानमें ऋषियों द्वारा गाली देकर निकालना कहा है, फिर देवताओं द्वारा उसका परिचय प्राप्त होनेपर उसको पुनः बुला लेना कहा है - इससे वादीकी पक्ष सिद्धि नहीं । श्रीसायणाचार्यकी वह बात ठीक ' सिद्ध हुई कि - ' दास्याः पुत्र ' और ' अब्राह्मण ' यह कवको गाली दी गई थी । उसमें वास्तविकता नहीं थी । वह ब्राह्मण था । ( २ ९ ) जोकि वादी सायणके इस कथनको अटकलपच्चू मानता है । यह तो व्यर्थ है । श्रीसायणाचार्य मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेद तथा वेद ऋषियोंके इतिहास सुपरिचित थे, अत: उनकी उक्त व्याख्या निर्मूल नहीं, उन्होंने इस विषयका मूल अवश्य देख लिया होगा । मूलग्रन्थ भी तो वही बता हा है । वादीके ' क्या [ कवषको शूद्र बताने वाले । आजकलके विद्वानोंने सायण भाष्यको नहीं देखा था ' इस कथन पर उत्तर यह है कि सायण-क्या ऐलूप कब शूद्र था? • ३२५ भाष्य इन दिनों तो छपा नहीं । यदि श्राजके अर्वाचीन उपनेत्रधारी लोगोंने उसे देखा भी होगा, पर अर्वाचीनताके कालुष्य - दोषसे भी नहीं देखा । यदि देखा भी है, तो व्याकरणके परिनिष्ठित उसे देखकर प्रत होने से वे ' दास्याः पुत्र इत्युक्तिरधिक्षपार्थो इस वाक्यका तात्पर्य ज्ञान न सके । या श्राजकलको गतानुगतिकता ( भेडाचाल ) की 1 न जान देव हम जोकि वादी कहता है- ' कवष - ऐलूषकी गाथासे तो स्पष्ट दासीपुत्र प्रत्राह्मण भी तप करके पढ़कर, विद्वान् होकर ऋषि है कि- एक सकता है ' यह कथन भी व्यर्थ है । यदि वह अविद्वान् तक वन निकालने के इन कई मिनटोंमें ऋषियोंके देखते ही था; तब बाहर सकता था? वा क्या तप कर सकता था? क्या इतने देखते समय वह कैसे पढ़ पढ़न किसीकी सहायताके विद्वान् हो सकता था? जो ऋषि उसे निर्जल वह - प्रदेश बिना में छोड़नेकेलिए गये थे, ये भी वैसे ठहरे हुए थे । यह तो देवी - घटना हुई कव सक कि — उसे वेदका सूक्त अतर्कित तथा स्वतः ही प्रतिभात हो गया । ब्राह्मण- गया तो वह पहलेसे ही था । ऋषि देवी कृपा से होता है । ' यं कामये तं तमुत्र ' ही कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिम् ' ( ऋ. १०।१२५१५ ) उसका शूद्रसे ब्राह्मण अधि होना यहाँ वा अन्यत्र कहीं लिखा ही नहीं, तब यह गलत है । तकम यदि वह वस्तुतः शूद्र होता, तो वैदिक यज्ञमें पहलेसेही लिया न जाता, बमोंकि यज्ञिय - वर्ण श्रादिम तीन ही हैं, शूद्रादि नहीं । जैसे कि-शतपथ में ' ब्राह्मणो वैव, राजन्यो वा, वैश्यो या, ते यज्ञियाः १।६ ) ' द्विजातय इचेज्याभिः ( मनु. ८२३११ ( ३ | १ | ) | ( वैदिक - यज्ञोंसे सम्बन्ध द्विजोंका होता है, प्रद्विजोंका नहीं । ) प्रत्युत शतपथकी ३ । १ । १ । १० कण्डिकामें यज्ञदीक्षितका शूद्रके साथ साक्षात् प्रालाप ( बातचीत ) भी दासी निषिद्ध किया गया है, उसको यज्ञमें दीक्षित करना तो दूर रहा!!! तब स्पष्ट है कि - ब्राह्मण ऋवष कितव [ जुवारी ] तथा श्रबृषि होनेसे अप्रशस्त ब्राह्मण होनेके नाते प्रशस्त ब्राह्मण ऋषियोंमें अपांक्तय माना गया; और निकाल दिया गया । जब देवी- कृपासे अपोनप्त्रीय सूक्त उसे स्वा.