सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 191–200
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 191–200
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[ ३२५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३२६ ] नेत्रधारी हो गया, जब सरस्वतीके जलने स्वयं उसके पास आकर उसकी - देखकर प्रतिभात तब ऋपियोंने उसपर देवी- कृपा देखकर कि जब यज्ञोपास्य-. ज्ञान ध्यास बुझाई, न देव इसके कितवतामूलक अप्रशस्त ब्राह्मणता के दोषको नहीं देखते, तब न जान * भी उन देवोंके भक्त उसके इस दोषको कैसे देखें? हम कि- इधर वह वेदसूक्तद्रष्टा होजानेसे ऋषि भी बन गया है, तब यह ब एक तक ऋषिपङ्क्तिमें बैठने योग्य है - यह जानकर उसे फिर बुला लिया । यह बन अन्तर कई मिनटोंका है । दिन, महीना, सालोंका अन्तर नहीं था कि वह कैसे बाहर पढ़ने गया, और वह विद्वान हो गया । यदि ऐसा होता, तो ऋषियोंको कैसे पढ़ पता लगता कि यह कहाँ है? तो क्या चालू यज्ञमें उसे बुलाया जा विना प्रदेश में सकता था? क्या वह यज्ञ कई वर्षो तक चलता रहा? उसमें भी क्या ना हुई hair fa ना काम रुका हुआ था कि उसका बुलाना श्रावश्यक समझा ह्मण- गया? वास्तवमें वादियों का पक्ष निर्मूल ही है, यह भली प्रकार सिद्ध हो तमुत्र ' ही चुका । जोकि वादी ' यथेमां वाचं ' मन्त्र द्वारा शूद्रादिको भी वेदका ब्राह्मण अधिकार देता है, यह भी ठीक नहीं - यह इस पुष्पके तकमें देखना नया न चिकि-३ | १ | स्वन्ध पूर्वपक्ष ११० दासीका पुत्र ) भी चाहिये । ( २५ ) मतङ्गका ब्राह्मण बनना ( तीसरी ऐतिहासिक भूल ) - ( क ) मतङ्ग चाण्डाल - कुलसे ब्राह्मण था । [ एक बी. ए. वैदिक सिद्धान्त में ] । ( पृ. २ से ५५ पृष्ठ ? हो गया । कवप ख ) ' स्थाने मतङ्गो !! ब्राह्मण्यं नालभद् भरतर्षभ! चाण्डालयोनी जातो हि कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान् ' ( महा. अनु. ३।१ ९ ) इस युधिष्ठिरके प्रश्नसे प्रतीत होता है कि- मतङ्ग होनेसे चाण्डालंसे ब्राह्मण हो गया ' । [ श्रीछु.ला. ' वेदप्रकाश ' पत्रमें ] ( स.प्र. मावा स्वा.बे.नं.सर. पृ. ८०-८१ ) । उसे उत्तरपक्ष - ( क ) मतङ्गकी कथाके दृष्टान्तसे तथा कवषकी दासी मतङ्गका ब्राह्मण बनना (? ) [ ३२७ पुत्रतामे ब्राह्मणता निर्मूल है । इस विषय पर हम पहले बहुत लिख चुके हैं । मतङ्ग चाण्डालकुलसे ब्राह्मण कभी बना ही नहीं । इन्द्रकी तपस्या-करके उसने ब्राह्मणस्त्र माँगा, पर इन्द्रने चाण्डालसे ब्राह्मण बनना बहुजन्म-साध्य बताया । [ २८।६-७-८-६-१०-११-१२-१३ ] इस पर ' महाभारत ' प्रनुशासनपर्व २७-२८- २६ अध्याय द्रष्टव्य हैं । इन्द्रके यह शब्द हैं-' ब्राह्मण्यं दुर्लभं तात! प्रार्थयानो न लप्स्यसे ' ( २८१३ ) ' वृणीष्व काममन्यं त्वं ब्राह्मण्यं हि सुदुर्लभम् ( १६ ) ' चाण्डालयोनी जातेन ( ब्राह्मण्यं ) नावाप्यं वै कथञ्चन । अन्यं कामं वृणीष्व त्वं मा वृथा तेऽस्त्वयं श्रमः ( २ ९ ४ ) ' मतङ्ग! ब्राह्मणत्वं ते विरुद्धमिह दृश्यते [ ८ ] ' बह्वीस्तु सविशन् योनीर्जायमानः पुनः पुनः । पर्याये तात! कस्मिंश्चिद् ब्राह्मण्यमिह विन्दति । तदुत्सृज्येह दुष्प्रापं ब्राह्मण्यमकृतात्मभिः । धन्य , वरं वृणीष्व त्वं दुर्लभोऽयं हि ते वरः ' ( २६११-१२ ) ' एवमेतत् पर स्थानं ब्राह्मण्यं नाम भारत! तच्च दुष्प्रापमिह वं महेन्द्रवचन यथा ' ( २११२६ ) ब्राह्मण्यं तात! दुष्प्राप्यं वर्णेः क्षत्रादिभिस्त्रिभि: ' ( २७/५ ) । तब मतङ्गका चाण्डालसे ब्राह्मण हो जाना कहना इतिहाससे विरुद्ध है । बी. ए. महाशयने स्वा.ब.जी पर विश्वास करके आँख बन्द करके यह असत्य लिख दिया । उक्त पद्योंका यह अर्थ है - हे तात! सुदुर्लभ ब्राह्मणत्व तू चाहता . है; पर वह तुम्हें नहीं मिलेगा | २८ | ३ तुम किसी दूसरे वरको माँगो, तुम्हें ब्राह्मणत्व मिलना बहुत दुर्लभ है । चाण्डालयोनिमें उत्पन्नको ब्राह्मणत्व कभी नहीं मिलता । तू कोई दूसरा वर मांग, जिससे तेरा वह परिश्रम व्यर्थ न जावे । २६१४ ऐ मातङ्ग, ब्राह्मणत्व तुम्हारे विरुद्ध है । ' बहुत - सी योनियों में बार - बार जन्म लेता हुआ किसी जन्ममें जाकर ब्राह्मण बनता है । ११। तब अपवित्र आत्मावालोंसे दुर्लभ ब्राह्मणत्वके वर-को छोड़कर किसी अन्य वरको मांग । यह ब्राह्मणताका वर तुम्हारे लिए दुर्लभ है । १२ । सो ब्राह्मणत्व यह बड़ा पद है । इन्द्र - वचनानुसार तुम्हारे-
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३२८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लिए दुर्लभ है । २ । क्षत्रिय आदि तीन दणकेलिए ब्राह्मणत्व दुर्लभ है । २७।५ ) मतङ्गकी कथामें उसे ब्राह्मणत्व प्रदान नहीं किया गया- वह पूर्वप्रोक्त स्थलमें देखा जा सकता है । वादीके दिये हुए पद्यमें भी यही कहा है - ' स्थाने मतङ्गो ब्राह्मण्यं नालभद् ' । ( ख ) ( हे भरतश्रेष्ठ भीष्मजी! चाण्डालयोनिमें मतङ्ग ब्राह्मण न बन सका यह तो ठीक है, पर क्षत्रिय - विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे बन गये? ) ' कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान् ' यह मतङ्गकेलिए नहीं है, किन्तु अगले पद्यमें स्थित विश्वामित्रकेलिए है । पूरा श्लोक इस प्रकार है- ' स्थाने मतङ्गो ब्राह्मण्यं नालभद् भरतर्षभ! चाण्डालयोनौ जातो हि कथं स [ विश्वामित्रः ] ब्राह्मणोऽभवत् ' ( ३।१७ ) इसीका हम पूर्वापर दिखलाते हैं; जिससे यह विषय स्वच्छ हो जाय । अनुशासनपर्वके ३ रे अध्यायके प्रारम्भमें विश्वामित्रका प्रश्न चला हुआ है- ' ब्राह्मण्यं यदि दुष्प्राप्यं त्रिभिर्वर्णेनंराधिप! कथं प्राप्तं महाराज! क्षत्रियेण महात्मना । विश्वामित्रेण धर्मात्मन्? ब्राह्मणत्वं नरर्षभ! ( १-२ ) अर्थात् यदि तीन वर्ण क्षत्रियादि ब्राह्मण नहीं बन सकते; तो क्षत्रिय - विश्वामित्र कैसे ब्राह्मण बने? ' तस्यैतानि च कर्माणि तथाऽन्यानि च कौरव! क्षत्रियस्येत्यतो जातमिदं कौतूहल मम ( ३।१६ ) ( उस क्षत्रिय विश्वामित्रके यह तथा अन्य कर्म हैं ) । ' किमेतदिति तत्त्वेन प्रब्रूहि भरतर्षभ! देहान्तरमनासाद्य कथं स ब्राह्मणोऽभवत् ' ( ३११७ ) एतत्तत्वेन मे तात! सर्वमाख्यातुमर्हसि ' ( बिना देह बदले विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे बन गये? इसका पूरा वृत्त मुझे बताइये ) इसके बाद यह श्लोक है - ' मतङ्गस्य यथातत्त्वं तथैवेतद् वदस्व में ( ३ ९ ) स्थाने मतङ्गो ब्राह्मण्यं नालभद् भरतर्षभ! चाण्डाल-योनौ जातो हि, कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान् ' ( ३।१६ ) । मतङ्गका भी मुझें पूरा हाल सुनाइये । यह चाण्डालयोनिमें पैदा हुआ था; अत: वह ब्राह्मण नहीं मतङ्गका ब्राह्मण बनना (? ) | ३२३ बन सका, यह तो ( स्थाने ) ठीक है; पर [ विश्वामित्र ] ब्राह्मण ३३ बने? ५ यह है पूर्वापर प्रकरण; तब यहाँ प्रतिपक्षी लोग गड़बड़ी कैसे प्राप्त हैं? फिर चौथे श्रध्यायसे भीष्मजीने विश्वामित्रका पूरा वृत्तान्त मचाते बता शुरू किया । ४।६१ पद्यमें यह कहा है - ' तथैव क्षत्रियो राजन्! विश्वा- सुनाना कैसे मित्रो महातपाः । ऋचीकेनाहितं ब्रह्म परमेतद् युधिष्ठिर ' । इसका श्रीसातवलेकरजीने ठीक ही किया है कि महातपस्वी विश्वामित्र अर्थके इसमें [ क्षत्रिया माता द्वारा उत्पन्न होनेसे ] क्षत्रिय होनेपर भी ऋचीक मुनिके द्वारा जो पहले ब्रह्मतेज प्रवेशित किया गया था; उस ही के निमित्तसे किया पादोंस उन्होंने... ब्राह्मणत्व लाभ किया था ' । इसके बाद बहुतसे प्रासङ्गिक प्रश्न युधिष्ठिरने पञ्चमःअध्याय- यह च ब्राह्म पृछे । प्रकरणवश शिव तथा शिवलिङ्गका वृत्तान्त भी आया । फिर २७३ विश्वा श्रध्यायमें युधिष्ठिरने प्रश्न किया कि - ' क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जिस कर्म वा तपस्या से ब्राह्मण वन जावे, यह मुझे बताइये । तब यहां भीष्मजी ' विश्व क्षत्रियादिको ब्राह्मणत्वादिकी प्राप्ति दुर्लभ कहकर पहलेसे पूछा हुना हुए... मतङ्गका हाल सुनाना शुरू किया । २८ वें तथा २ हवें अध्यायमें भी वही करिये मतङ्गकी चर्चा जारी रही । इन्द्रकी उसने तपस्या की - ब्राह्मणत्वकी तपस्या प्राप्ति केलिए । पर इन्द्रने निषेध कर दिया । यह मतङ्गोपाख्यान यहाँ परन्तु समाप्त हो गया । मतङ्ग कभी ब्राह्मण बना ही नहीं, तब स्वाद का उसे उक्त प ब्राह्मणत्व लाभ कहना इतिहास से सर्वथा विरुद्ध है । तो ब्रा आर्यसमाजी श्रीवेदानन्दजीने तो यहाँ पाठ भी स्वकल्पित रख दिया कट ग है, और प्रथं भी गलत दिया है कि- ' यह उचित ही है कि मतङ्गने इ ब्राह्मणता प्राप्त की । चाण्डालत्वमें उत्पन्न होकर भी उसने कैसे ब्राह्मणता उसके लि प्राप्त की ' ( ' यह प्रथं कितना विरुद्ध वा अशुद्ध है! ) ' नालभत् ' को यज्ञमें न ' प्रालभत् ' कर दिया! धोखा!!! पर उस गीता प्रेसके महा.में यह अर्थ किया है- ' मतङ्गस्य यथा तत्त्वं तथैवैतद् उस पर वदस्व मे ' ( ३।१८ ) जैसे मतङ्गको तपस्या करनेसे भी ब्राह्मणत्व नहीं कतवर 1
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३२६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १३० ] कैसे वैसी ही बात विश्वामित्रके लिए क्यों नहीं हुई? यह मुझे मचाते प्राप्त बताइये हुमा ।; मतङ्गको जो ब्राह्मणत्वं प्राप्त नहीं हुआ, यह तो उचित ही भा; सुनाना क्योंकि उसका जन्म चाण्डालको योनि में हुआ था; परन्तु विश्वामित्र ने विश्वा- कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया? ( ३।१ ९ ) अर्थ शेप है — ' चाण्डालयोनी जातो हि कथ ब्राह्मण्यमाप्तवान् ' यह अंश; मित्रके इसमें वादीको या तो भ्रम हुआ, या उसने जान - बूझकर अर्थका श्रनर्थ - मुनिके किया है । इसमें ' चाण्डालयोनी जातो हि ' यह तृतीय पाद तो पहले के दो मित्तसे पादोंसे सम्बद्ध है यह मतङ्गका विशेषण है, शेष ' कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान् ' यह चतुर्थ पाद प्रकृत विश्वामित्रकेलिए है कि- ' देहान्तरमनासाद्य कथं स न्यायसे ग्राह्मणोऽभवत् ' ( ३।१७ ) ' कथं प्राप्तं महाराज! क्षत्रियेण महात्मना । २७ वें विश्वामित्रेण धर्मात्मन्! ब्राह्मणत्वं नरर्षभ! ' ( ३।१-२ ) कर्म बा इसलिए इस पद्यका अर्थ श्रीसातवलेकरने इस प्रकार लिखा है-मजीने ' विश्वामित्र बिना दूसरा शरीर धारण किये हुए ही किस प्रकार ब्राह्मण हुए... जैसा मातङ्गका वृत्तान्त है, वैसे ही इसे भी आप मेरे निकट वर्णन वही करिये । मतङ्गने शूद्र के सहारे ब्राह्मणीके गर्भसे उत्पन्न होके कठिन त्वकी तपस्या करनेपर भी ब्राह्मणत्व - लाभ नहीं किया; वह युक्ति - सङ्गत है, यहाँ परन्तु विश्वामित्रने किस प्रकार ब्राह्मणत्व लाभ किया ' । अतः वादीका उसे उक्त पद्यका किया अर्थ ठीक नहीं । रामायण - अरण्यकाण्डका मतङ्गमुनि तो ब्राह्मण था - महाभारतीय मतङ्गसे भिन्न था । फलत: वादीका पक्ष दिया कट गया । इस प्रकार स्पष्ट है कि- कवप भी शूद्र नहीं था । यदि होता, तो प्रणता उसकेलिए भी मतङ्गकी तरह ब्राह्मणत्व दुर्लभ होनेसे उसे ऋषियों - द्वारा ' को पज्ञमें न लिया जाता । पर लिया जानेसे स्पष्ट है कि वह ब्राह्मण पर उसमें कितवत्व था, एक दोष था, जिससे उसे निकाला गया । पर देवकृपा उस पर देख कर फिर उसके इस दोषकी पर्वाह नहीं की गई । फिर -नहीं कतवत्व उसका हट भी गया । यह गत निबन्ध में स्पष्ट कर दिया गया 1 ( २६ ) वेश्यापुत्र जावाल (? ) ( चौथी ऐतिहासिक मूल ) पूर्वपक्ष - ' सत्यकाम - जावालकी गाया भी इसी वातको सिद्ध करती है । वह वेश्याका पुत्र था; अज्ञातकुलका था, उसे गुरुने सत्य बोलनेन ब्राह्मण बना दिया । यह छान्दोग्योपनिषत् में प्रसिद्ध है । इसी तरह कवय भी दासीपुत्रसे ब्राह्मण बना ' ( स्वा.द.जी स.प्र में, श्रीवा, सो. दलाल बी.ए. हिस्ट्री आफ इण्डियामें, ' पतितोंकी शुद्धि सनातन है ' में श्रीरा.च. शास्त्री, श्रीम. प्रा. श्रादि ) । उत्तरपक्ष - यह प्रतिपक्षियोंका पक्ष अशुद्ध है । कोई ७-८ वर्षका बालक जिसे पिताका पता न हो और वेश्या - पुत्र हो; पूछनेपर बताए कि- मैं बेश्यापुत्र हूँ, तो क्या वादी उसे ब्राह्मण बना देंगे? आजकल इस प्रकार-से ब्राह्मणोंकी संख्या बहुत बढ़ाई जा सकती है, जिससे आर्यसमाज-प्रादिका गौरव बढ़े । तब तो जो इसके विपरीत अपने माता - पिताके परिचयको ठीक - ठीक न कहे, तो क्या वादियोंके मतमें वह शुद्र हो जायगा? ऐसा होने पर तो स्वा.द. भी शुद्र हो जायेंगे । इनके तीन-पिताओं ( पितृनामों ) का पता लग चुका है, क्योंकि उन्होंने अपने पिताका ठीक - ठीक परिचय नहीं दिया । यदि जाबाल वेश्यापुत्र वा प्रज्ञातकुलका होता; तब उसे ' प्रशस्त-मातापितृक ' न कहा जाता; पर ' उसे प्रशंसित माता - पिता वाला ' कहा जाता है, देखिये शतपथमें- ' सत्यकामो जाबालो ' मनो वै ब्रह्म इति यथा मातृमान्, पितृमान्, प्राचार्यवान् ब्रूयात्; तथा तज्जाबालोऽब्रवीत् ' ( बृहदारण्यक ४ | १ | ६ ) यहां प्रशंसा- अर्थ में मतुप् है । सो प्रशस्त माता-तथा प्रशस्त पिता, तथा प्रशस्त श्राचार्य वाला कहा गया है । यदि वह अज्ञातकुल वा वेश्यापुत्र होता; तब उसे प्रशंसार्थक माता - पिता वाला न कहा जाता । बस्तुतः यदि जावाल जन्मसे ब्राह्मण न होता, किन्तु वेश्यापुत्र होता '
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३३२ । श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सत्यभाषण से ही उने ब्राह्मण बनाया जाता, तो वहां ' नंतद् अब्राह्मणो विवक्तुमर्हति ' ( छान्दोग्य ४१४१५ ) यह वाक्य गुरु न कहता, प्रत्युत यह कहा कि तूने सत्य कहा है- श्रतः हम तुम्हें शूद्रसे ब्राह्मण बनाते हैं ' । पर गुरुने ऐसा न कह कर यह कहा कि- ब्राह्मणके ' बिना कोई अन्य ऐसा नहीं कहता । अर्थात् गौतममुनि सत्यकाम के सत्यभाषण से उसमें ब्राह्मणत्व श्रारोपित नहीं करते, किन्तु उसे पूर्वकालसे हो ब्राह्मण मानते हैं, नहीं तो उनकी ऐसी वाक्ययोजना न होती । यहाँ पर स्वा. वेदानन्दने अपने से प्रकाशित स.प्र. में इसका यह प्रथं लिखा है - ' ऐसी बात ब्राह्मण नहीं कह सकता है । ( टिप्पणी स.प्र. की पृ. ७६ में ) । यह भी यहां जानना चाहिए कि इस प्रकार सत्य बोलने पर वह ब्राह्मण बनाया भी नहीं जा सकता; नहीं तो सत्यहरिश्चन्द्र राजाको तथा महाभारतीय तुलाधार - वैश्यको भी ब्राह्मण कहा जाता; क्योंकि यह भी सत्यवादी थे । वादीके प्रति यह प्रश्न है कि उसकी माता जबाला ब्राह्मणी थी, या शूद्रा? यदि ब्राह्मणी, तब उसका पुत्र होनेसे जाबाल भी जन्म से ब्राह्मण सिद्ध हुआ । यदि वह शूद्रा थी, तो इससे वादियों का ही पक्ष कटता है । वह ऐसे कि उसके पुत्रने जो सत्य बोला था, इसमें उसका महत्त्व कुछ भी नहीं था, क्योंकि - ऋजुबुद्धि छोटा बालक यह नहीं जान सकता कि- ' वेश्यापुत्र ' कहनेसे मेरी कितनी हानि है? और जो उसने यह कहा भी था — यह उसका अपना स्वतन्त्र वा स्व - ज्ञानपूर्वक बचन नहीं था, किन्तु यह उसने अपनी माताके वचनका ' तोतेरटन्त ' अनुवादमात्र कर दिया । इस विषय में उसकी माता ही सत्यवक्त्री मानी जावेगी, क्योंकि - यदि वह ऐसा न कहली, तो वह छोटा बच्चा इतना भी न कह सकता । तब इस सत्यभाषणसे. महत्त्व उसकी माताका है, उसके ७-८ वर्षके लड़केका नहीं । परन्तु यदि सत्य बोलने वाली भी उसकी माता जवालाको वादी ब्राह्मणी नहीं बताते; किन्तु शूद्रा - वेश्या. ही बताते हैं, तब तो वादिपक्षका orige जावाल (? ) [ ३३३ स्वयं उनके द्वारा ही खण्डन हो गया कि वे सत्यभाषणसे तो ब्राह्मश व्यवस्था मानते हैं, पर सत्यभाषणसे उसकी माता जवालाको ब्राह्मणी - वर्णकी मानते, तब उसका अज्ञानपूर्वक तोतेरटन्त बोलने वाला लड़का ही नहीं मतमें ब्राह्मण कैसे बन सकता है? यदि उसकी माता ही सत्यभाषण उनके आदिसे ब्राह्मणी हुई, तब उससे उत्पन्न माताके नाम बाला जावाल भी जन्मसे ब्राह्मण सिद्ध हुआ, क्योंकि उसने स्वयं तो कुछ कहा ही नहीं, केवल माताके हो वचनका अनुवाद ही कर दिया । इस श्रायुमें बालकमें सांसारिक होनेसे माताके कथनसे अधिक कहनेकी शक्ति नहीं होती । शतः सत्यकाम ज्ञान न स तथा कवष - सम्बन्धी वादियोंका पक्ष कट गया । इस पूछनेसे तो वर्ण- गा व्यवस्था जन्ममूलक ' सिद्ध हो रही है । नहीं तो इस छोटी श्रायुमें जब उसने कोई विद्या नहीं पढ़ी थी; तब अच्छे गुण - कर्म न होनेसे गुणकर्म- ब्रा मूलक वर्ण - व्यवस्था तथा वर्ण पूछना बन ही नहीं सकता । जा ' नैतद् प्रब्राह्मणो विवक्त मर्हति ' यहाँ पर अर्थ यही है कि - ब्राह्मणके के पुत्रके बिना दूसरा ऐसा नहीं कह सकता । ब्रह्मणः —— ब्राह्मणस्य श्रपत्यं प्रव ब्राह्मणः; ' ब्राह्मोऽजातो ' ( पा. ६।४।१७१ ) । न ब्राह्मण इति ब्राह्मणः, 1 की स एतद् विवक्तु ं न अर्हति । अतः यह ब्राह्मणका पुत्र ही है । जावाल शतपथ ( १०।६।२।६ ) के अनुसार उपमन्युका पुत्र है, उपमन्यु व्याघ्रपाद- भाष का पुत्र है । उसे बौधायनकल्पसूत्र में वसिष्ठवंशीय कहा गया है । श्रतः वच जन्म - ब्राह्मण ही है । ' परिचारिणी ' का अर्थ ' वेश्या ' नहीं, किन्तु ' पतिके पास प्राये मिल अतिथियोंकी सेवामें लगी हुई ' । यह ' अर्थ है । ' निघण्टु ' ( ३५ ) में बना परिचरण अर्थ में ' सपर्यति ' आदि धातुएं कही गई हैं । परिचरणका प्र वर्ण ' सेवा ' होता है, ' वेश्याकर्म ' नहीं । कोई स्त्री शब्दतः वा अर्थतः अपने पिव आपको ' मैं वेश्या हु ' यह नहीं कहती, तब जबालाके वाक्यका तदनभीष्ट इति अर्थ कैसे किया जा सकता है? ( तो ब्रह सो पतिके अतिथियोंकी सेवा में लगी हुई, वह पति गोत्र नहीं गोतम ही
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३३३ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३३४ नहीं सकी । पतिके अभ्यागतोंके भोजनादि सेवाका भार स्त्री पर उनके जान है! कभी - कभी तो स्त्रियोंके एतदर्थ अपने भोजनका अवसर भी रहता दिसे नहीं प्राता । श्राज भी सैकड़ों ब्राह्मणियाँ सुलभ हैं, जो पतिके गोत्रको नहीं सेहो जनतीं । इधर तो वृद्ध - पुरुषोंका ही अधिक ध्यान रहता है । ताके मनु. १०।५ पद्यमें श्रीमेधातिथिने भी इसे स्पष्ट किया है - ' गौतम-नन स्थापित वचनाद् ब्राह्मणोऽयमित्यवगमः, प्रागेवाऽसौ तं ब्राह्मणं वेद, काम गोत्र ' न वेद । गोत्र - प्रश्नेन चरणप्रश्नो वेदितव्यः, तत्र उपनयनभेदोस्ति ' । वणं. श्रीमेधातिथि कहते हैं - प्राचार्य गौतमको भी जावालके वचनसे ‘ यह जब ब्राह्मण था यह मालूम नहीं हुआ । वह तो उसे पहले से ही ब्राह्मण कर्म-जानता था । [ क्योंकि उस आचार्यकुलमें ब्राह्मण ही जाते थे, शूद्र नहीं ], केवल उसका गोत्र नहीं जानता था । गोत्रके प्रश्नसे चरण ( वेदशाखा वा चणके प्रवर - सम्बन्धी ) का प्रश्न समझना चाहिये; क्योंकि गोत्र - प्रवरसे उपनयन-अपत्यं की ग्रन्थियों में भेद होता है । हाण, / जिस प्राप्त मेधातिथि के विश्वाससे ' अथ शब्दानुशासनम् इस महा-बाल भाष्य के वार्निकको पाणिनिका सूत्र माना जाता है, उस प्राप्त मेधातिथिके पाद- वचनसे जावालको ब्राह्मण क्यों न माना जावे? अतः तब वादियोंको यदि ऐसे गोत्रानभिज्ञ - लड़कोंके मिलनेका अवसर मिले, तो क्या वे उसे वेश्या - पुत्र मानेंगे? वे परीक्षा करके देखें; और आये बनावें वहुतों को वेश्यापुत्र? उपनिषद्में गोत्र पूछा गया है, वर्ण नहीं । अयं बर्णं वा गोत्र एक नहीं होते । अतः ' वैखानसधर्मप्रश्न ' में कहा है- ' ब्रह्म-पिवंश्यानामार्षेयगोत्रस्मृतिर्नान्येषाम्, यस्मात् ' किगोत्रो नु सोम्य! असि? ' भीष्ट इति सत्यकाम ब्राह्मणं ज्ञातुं गोतमेच्छायाः छान्दोग्यस्तुतिः ' ( ४ | ८ | ८ ) ( ब्रह्मषिवंशवालोंको श्रार्षेय - गोत्रकी स्मृति होती है, दूसरोंको नहीं; तभी तो कि गोत्रो तु सोम्य! इस प्रकार ब्राह्मण सत्यकामको जाननेकेलिए गौतमकी इच्छा को छान्दोग्य में सूचित किया गया है ) इससे हमारा ही सिद्ध हो रहा है । इस प्रकार वैखानसघमं प्रश्नकारने भी जाबालको पक्ष वेश्यापुत्र जाबाल (? ) [ ३३५ ब्राह्मण ही बताया है । ): उक्त छान्दोग्य श्रुतिकी श्रानन्दगिरिने यो व्याख्या की है- ' प्रतिथ्य-भ्यागादि अधिकृत्य परिचर्याजातं बहु चरन्ती भर्तृगृहे यतोऽहं स्थिता, तेन परिचरणचित्ततया गोत्रादीन् नापृच्छम् । ( मैं जवाला ) पतिके घरमें उनकी इच्छानुकूल अतिथि - प्रभ्यागतोंकी मेवाको बहुत करती रही; इससे परिचरण ( सेवा ) में लगे हुए चित्त वाली होनेसे पतिसे गोत्रादि नहीं पूछ सकी । ) ' यौवने त्वामलभे ' इस उपनिषद् के वचनसे सिद्ध होता है कि - जबालाका विवाह छोटी आयुमें हुआ था; परन्तु गर्भ तथा प्रसव यौवनमें हुआ था । इसलिए आगे वह कहती है । यौवने लज्जया प्रथमं पनि प्रति न प्रश्नः पुनश्च तस्य उपरत ( मृत ) त्वाद् दुःख-बाहुल्याच्च ' । ( जवानोंमें पहले शर्मसे पतिसे न पूछा गया, फिर पति मर गया, तो बहुत शोकाकुल रही ), ( इधर- उबरसे भी गोत्रको न जान सकी ) । इससे यह भी सिद्ध होता है कि पहले गोत्रादि - निर्णयके बिना किसी-का उपवीत नहीं होता था । गोत्रका प्रश्न द्विजत्वको स्थिरतायं है, शूद्रोंका गोत्र नहीं होता । गोत्रका न कहने वाला शुद्र माना जाता था, और उसे यज्ञोपवीत नहीं दिया जाता था । यहाँ तो गोत्र न जानने पर भी ब्राह्मणतामात्रके अनुमानसे यज्ञोपवीत दिया गया । शूद्र होने पर उसे ' अब्राह्मण ' भी नहीं कहा जा सकता था । स्वा.द.जीका इसे प्रज्ञातकुल लिखना ठीक नहीं । श्रुतिमें गोत्र पूछा गया है, कुल नहीं । कुल - गोत्र भिन्न - भिन्न होते हैं, जैसेकि - ' न भोजनायें स्वे विप्रः कुल - गोत्रे निवेदयेत् ' ( मनु. ३।१०६ ) । विवाहमें स्त्रीका गोत्र परि-वर्तित होता है, कुल नहीं । ' जो स्त्री पिताके गोत्रकी न हो, वही विवाह में उत्तम ( सं. वि. १२४ पृष्ठ ), तो क्या स्वामीजी गोत्रका श्रर्थ वर्ण या कुल करेंगे? पितासे भिन्न वर्ण वाली लड़कीके साथ विवाह करायेंगे? अतः श्रीतुलसी रामस्वामीका भी यहाँ ' गोत्र ' से वर्णकी ध्वनि बताना ठीक
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३३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नहीं यदि वर्ण - व्यवस्था गुण - कर्मसे होती; तो वर्णं पूछनेकी आवश्यकता भी क्या थी? पूछना जन्मसे वर्ण - व्यवस्थामें बनता है, गुणकर्मसे वर्ण-व्यवस्था होने पर पूछनेका क्या अवकाश? यदि उसकी माता शूद्रा होती, तो अपने लड़केको उपनयन वा वेदाध्ययनार्थ श्राचार्यकुलमें न भेजती, किन्तु द्विजोंको सेवाके लिए भेजती; क्योंकि - शूद्र वा संकरको उपनयनका अधिकार कोई भी संस्कारविधि नहीं देती । प्रतः स्पष्ट है कि जाबाल जन्मसे ही ब्राह्मण था, यही बात ब्रह्मसूत्र ( १।३।३७ ) में बताई गई है । वाल्मी. ( २१११ = । १ ) में जाबालिको ब्राह्मणोत्तम बताया गया है । फलतः वादीका पक्ष गिर गया । इस विषयमें ' आलोक ' में अन्यत्र तथा ११ वें पुष्प ( पृ. १८३-२३१ ) में देखिये । कवषकी ब्राह्मणता हम बता हो चुके हैं । ( २७ ) श्रवणकुमार आदिका कुल । ( पाँचवीं ऐतिहासिक भूल ) पूर्वपक्ष- ' कवप ऐलूष, श्रवण, द्रुपद, कश्यप, द्रोण, कृप, कमठ, यवक्रीत, वक्षीवान्, माण्डव्य, कणाद, शुक, महिदास आदि भी नीच कुल में जन्म लेकर अपने कर्म और वृत्तिसे ब्राह्मण वन गये ' ( श्री भ.द. संन्यासी ) ( महा. शान्ति. २६६।१२- १७ ) उत्तरपक्ष- श्रवण, द्रुपद प्रादि कहीं भी ब्राह्मण नहीं कहे गये, श्रवणने श्रीदशरथको स्वयं ही अपनी श्रद्विजता कही थी, जैसे कि - ' ब्रह्म-हत्याकृतं पापं हृदयाद् अपनीयताम् । न द्विजातिरहं राजन् ' ( वाल्मी २ । ६३।५०-५१ ) ( आप ब्रह्महत्या के पापके डरको हृदयसे हटा दीजिये, मैं ब्राह्मण नहीं हूं ) । तब उसकी सन्ध्या एवं ब्रह्मवाद आदि भी अनधिकारवश तान्त्रिक वा पौराणिक ही समझने चाहियें । जब मरनेके समय श्रवण अपनेको ' श्रद्विज ' कह रहा है, तब वादी उसे ब्राह्मण कैसे कहता है? क्या वीत कश्यप श्रादि ब्राह्मण ये ३३७ यहाँ ' मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त कहावतको वादी चरितार्थ नहीं कर रहा महिदास, कवष श्रादिके विषयमें पूर्व लिखा ही जा चुका कक्षीवान?के विषयमें अग्रिम निबन्धमें कहा जावेगा । शेष कश्यप, द्रोण यादियोंके पिता ब्राह्मण थे, अतः इनको नीच कुल लिखना ठीक नहीं । महाभारत 11 श्रनुशासनपर्व ( १६५ / ४६-४७ ) में यवक्रीत, कश्यप, सूत व्यासादि को AT ब्राह्मण कहा है । मा सा सुनिये - ' देवतानन्तरं विप्रान् ( ब्राह्मणान् ) तपः - सिद्धान् तपधिकान् सय । कीर्तितान् कीर्तयिष्यामि सर्वपापप्रमोचनान् ' ( अनु. १६५।३६ ) यवक्रीतोऽथ रेभ्यश्च कक्षीवान् श्रशिजस्तथा ' ( ३७ ) मित्रावरुणयोः पुत्रः तथाऽगस्त्यः लिव ( ४० ) ऋषिर्दीर्घतमाश्चैव गौतमः काश्यपस्तथा । ( ४२ ) त्रिर्वसिष्ठः व्या शक्तिश्च पाराशर्यं ( व्यास ) श्च वीर्यवान् । विश्वामित्रो भरद्वाज जमदग्नि. ' पट स्तथैव च । ( ४४ ) ऋचीकपुत्रों राम ( परशुराम ) इच ( ४५ ) लोमहर्षण वीज ( सूत ) एव च । ऋषिरुग्रश्रवा: ( सूतः ) चैव भार्गवश्च्ययवनस्तथा प्रशन ( ४६-४७ ) एष वै समवायश्च ऋषिदेव समन्वितः " ( १६५।४७ ) । दि हाँ, कई ऋषियोंने अपनी तपस्याकी सामर्थ्य से पशु - पक्षियोंमें भी गर्भव पुत्र उत्पन्न किये । बीजकी प्रधानता और तपोबलसे वह क्षेत्रदोष बाधक नहीं होता । नहीं तो वादीकों उनकी सन्तानोंकों भी पशु - पक्षी मानना चाहिये, पर वह भी ऐसा नहीं मानता । वस्तुतः पिता यदि उज्य वर्ण ब्राह्मणादि हैं, तो ' तस्माद् वीजं प्रशस्यते ' ( मनु. १०११७२ ) इस सिद्धान्तसे ' स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ' ( २१२३८ ) इस अभ्यनुज्ञासे निम्न - कुल पक्षि की माताका सन्तान भी पिताके ही वर्णका माना जाता है । इस मनुस्मृतिमें प्रश्न किया गया हैं - ' अनार्यायां समुत्पन्नो ब्राह्मणात् ' ब्राह यदृच्छया । ब्राह्मण्यामप्यनार्यात्तु श्रेयस्त्वं क्वेति चेद् भवेद्? ' ( १०।६६ ) हुआ ( ब्राह्मणसे अनार्यमें उत्पन्न हो, वह श्रेष्ठ है? या अनायंसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न गर्भसे हो, वह श्रेष्ठ है? ) उसमें उत्तर दिया गया है - ' जातो नार्यामनार्यायाम २०५० २२ ब्राह्मण प्रधान
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३३७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३३८ ] रहा? श्रार्यो भवेद् गुणैः । जातोऽप्यनार्याद् भार्यायामनार्य इति निश्चयः ' दिये के कि प्रार्या ) ( आयंसे श्रनार्या में उत्पन्न हुआ श्रायं होता है, और अनायसे ( १०१६७ भारत प्रायमें उत्पन्न अनार्य होता है । ) इस सिद्धान्तले वीर्यकी ही प्रधानता दि को मानी गई है । ' थाहम्णेन भर्चा स्त्री संयुज्येत यथाविधि । ताहम्गुणा भवति समुद्र ेणेव निम्नगा ' ( ६।२२ ) यहाँ पर स्त्रीको भी पति सा संयोगसे उसके गुणों वाला हो जाना माना गया है । कान् । चेतोऽय इसलिए ' ऐतरेयालोचन ' में श्रीसामश्रमीजीने भी वैसा मानते हुए लिखा है- एषां ( वर्ण - त्रयोत्पन्नषट् पुत्राणाम् ) अपसदत्वेि व्याहतम् । तच्च तत्रैव ‘ सजातिजानन्तरजाः षट् सुता द्विजर्धामण: ' इति । नदग्नि. ' घट्पुत्रा द्विजघर्मण उपनेया: ' इति च तत्र कुल्लकः । पुनस्तत्र’व ‘ यस्माद् महर्षण वीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोऽभवन् । पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद् बीजं नस्तथा प्रशस्यते ' ( १०।७२ ) । ' यदुक्त ' – ' न ब्राह्मणक्षत्रिययोः... शुद्रा भार्योप-दिश्यते ' इत्यादि षट् - श्लोक्या, तन्नूनमपरिणीतसवर्णापरम्, अतएव धीवरी-में भी गर्भजस्य वेदव्यासस्य विप्रत्वमुपपद्यते ( पृ. १३ ) । त्रदोष- ( इन वर्णोंसे उत्पन्न छ? पुत्रोंके निम्न होनेपर भी शु - पक्षी हटता । वहां यही कहा है- ' सजातीयोंसे उत्पन्न छ: - उच होते हैं— उनका उपनयन हो सकता है - यह वहांपर इस है । फिर वहीं मनुने कहा है- ' चूंकि बीज ( वीर्य ) नकुल पक्षियोंसे उत्पन्न हुए भी ऋषि हुए, पूजे गये, और इस कारण बीजका ही अधिक महत्त्व होता है । प्रणाल ' ब्राह्मण - क्षत्रियकी शूद्र स्त्री नहीं होनी चाहिये, यह उनका द्विजत्व नहीं लड़के द्विजधर्म वाले कुल्लूकभट्टने लिखा के प्रभाववश पशु-उनकी प्रशंसा हुई, जो कि कहा है-छः श्लोकोंमें कहा - | ६६ ) हुम्रा निषेध अविवाहित असवर्णाकेलिए है; तभी तो धीवरी (? ) के उत्पन गर्भसे उत्पन्न व्यासजीको भी ब्राह्मण माना जाता है । ) र्यायाम ( ३३ ) इससे हमारा ही पक्ष सिद्ध हुआ । ऐसे ही यदि पिता विशिष्ट-ब्राह्मण है, उसकी स्त्री शूद्रा भी हो, फिर भी उसकी सन्तान बीजकी प्रव ( नतासे ब्राह्मण ही मानी जावेगी, शूद्र नहीं । तब वादितोषव्यायसे श्रीव्यासकी माता धीवरी नहीं थी [ ३३६ महिदास एवं कवषकी माताके कथञ्चित् शूद्रा मानने पर भी ब्राह्मण होनेसे बीज- प्रधानतावश इनके पिता के वादी इनके पिताओं यह दोनों ही ब्राह्मण होंगे, शूद्र नहीं । ही रहा को शूद्र नहीं सिद्ध कर सके, तब उनका पक्ष सिद्ध । परममान्य होनेसे वादियोंको श्रीसामश्रमीका मानना ही चाहिये । उपर्युक्त मत परन्तु हम मनुके ही शब्दोंमें कहते हैं कि ' न ब्राह्मणक्षत्रिययो-रापद्यपि हि तिष्ठतोः । कस्मिँश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते १४ ) अर्थात् किसी भी इतिहास में ब्राह्मणकी ' ( 31 इसके अनुसार हम कह शुद्रा भार्या उपदिष्ट नहीं । कि- महिदास सकते हैं और अनुसन्धान भी हमें यही बताता है और कवपकी माताएं भी शूद्रा नहीं थी । श्रीसामश्रमीजीका श्रीवेदव्यासकी माता ( सत्यवती ) को घीवरी बताना भी अपना इतिहासका प्रज्ञान बताना है । वह धीवरके वीर्यसे नहीं, किन्तु उपरिचरवसु - राजाके वीर्यसे जन्मी थी । उपरिचरवसु धीवर नहीं थे । हां, उम लड़कीको धीवरने पाला अवश्य था । यदि धीवरसे पालनेसे वह धीवरी ही हो, तो पन्ना वायसे पाला हुआ राना उदयसिंह शूद्र, तथा मुसलमान धायसे पाले हुए हिन्दु - कुमार भी क्या मुसलमान माने जाएंगे? शूद्रा धात्रेयिकाओंसे पाले हुए राजकुमार तथा दयानन्दी-भी शूद्र हो जाएंगे? वह तो उपरिचर - क्षत्रियकी पुत्री थी । इस सम्बन्ध में ' महाभारत ' ( आदिपर्व ६३ श्रध्याय ) देखना चाहिये । धीवरने भी कहा था कि- ' अपत्यं चैतद् आर्यस्य ( उपरिचरवसोः ) यो युष्माकं समो गुणैः यस्य ( आर्यस्य ) शुक्रात् ( वीर्यात् ) सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ' ( १।१०० ॥ ७६ ) ( कि यह श्रार्यवीर्योत्पन्न है, अपने ( धीवरके ) वीर्यसे उत्पन्न उसे नहीं बताया । इस विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) देखो ।
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३४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( २८ ) क्या वेदके कई ऋषि शूद्र थे? ( छठी ऐतिहासिक भूल ) पूर्वपक्ष- ऋ. १०।१४२ में शार्ङ्गके लड़के जरिता, द्रोण, सारि-तृषक, स्तम्बमित्र - यह चार शूद्रापुत्र वेदके ऋषि थे । वे शाङ्खसे मन्दपाल-ब्राह्मणसे उत्पन्न हुए थे । वे प्रर्जुनकृत - खाण्डवदाह में बच गये । तब भाप कैसे कहते हैं कि - वेदका कोई ऋषि शूद्र नहीं हैं । अजमेरी ऋ. १० । १४२ में ऋषि: ' शाङ्गः ' लिखा गया है, जिसका अर्थ है- ' शार्ङ्गके लड़के । फिर पृथक् १-२ का जरिता । ३-४ का द्रोणः । ५-६ का सारिसृक्क । ७-८ का स्तम्बमित्र यह लिखा गया है । यह चारों शाङ्गिणीके लड़के हैं । जब खाण्डव वनको अग्नि लगाई गई थी; वे अग्निकी स्तुति कर रहे थे । उससे वे बच गये । तब अग्निने पक्षियोंको शाप दिया कि प्रागेसे तुम ( पक्षी ) नहीं बोल सकोगे । यह वात कादम्बरी में कुमारपालित-मन्त्रीने राजा शूद्रकको यह संकेतित की थी । उत्तरपक्ष - शाङ्गको कहीं भी ' शूद्रा ' नहीं लिखा गया । हां, वह एक पक्षिणी अवश्य थी । कुल्लूकभट्टने ( मनु. ३।२३ की टीका में ) उसे ' घटका ' ( चिड़िया ) लिखा है । श्रीसायणने भी ' शाङ्ग " इति पक्षिविशेषस्य भ्राख्या ' । शाङ्ग जातयः जरितृप्रभृतयश्चत्वारः चतुर्णां द्वय चानां द्रष्टारः ' ( ऋ. १०।१४२ ) यह लिखा है ( कि शाङ्ग यह विशेष - पक्षीका नाम. है । शाङ्ग जातिवाले जरितृ प्रादि चार, चार ऋचानोंके जोड़ेके द्रष्टा हैं ) । महाभारतमें भी कहा है- ' तच्छुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां वनौक-साम् । क्व तु शीघ्रमपत्यं स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत् ( आदि. २३१।१५ ) स चिन्तयन् श्रभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान् । शाङ्गिक शाङ्गिको भूत्वा ' जरितां समुपेयिवान् ' ( १६ ) तस्यां पुत्रान् प्रजनयत् चतुरो ब्रह्मवादिनः ( ११ ) । ( मन्दपाल उन वनवासियोंकें वचन सुनकर सोचने लगे कि-कहाँ शीघ्र और बहुत सन्तान हो सकती है? यह सोचकर वह बहुत · .. क्या देवके वाई ऋषि थे? [ ३४१ सन्तानों वाले पक्षियोंके पास पहुंचा । तब जरिता नामवाली पक्षिणीसे उसने शार्डी पक्षी बनकर गमन किया । उससे चार शा लड़कोंको पैदा किया ) 4 ब्रह्मवादी जह इस इतिहाससे शाङ्गिणी पक्षिणी सिद्ध है, शुद्र नहीं । इस चम ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. ८६७-६८ ) देखो । तथा नवम पुष्प ( पृ विषय में उस शाङ्गिणी पक्षिणीमें मन्दपाल ब्राह्मणने शाङ्गिपक्षीरूपमें. ३४५२४६ ) इसमें मनुजीकी भी साक्षी है- ' यस्माद् बीजप्रभावेण तिरंग्जा ऋषयोऽभवन् उत्पत्ति की । लि • पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद् वीजं प्रशस्यते ' ( १०१७२ ) ( बीजके प्रभावसे । पक्ष पशुपक्षि - स्त्रियोंसे भी उत्पन्न होनेवाले ऋषि व्रत गये ) । इस पास ' फि चीर्यकी प्रधानता बताकर उससे उत्पन्न हुनोंको ब्राह्मण बताया गया है । गल मन्दपालको वहाँ ' विप्रर्षिर्ब्राह्मणो ( २३१ / २ ९ ) ब्राह्मण सिद्ध भी गया है । ‘ अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सस्मे मम ' ( २३२१५ ) यहाँ उन बच्चोंको भी पक्षी बताया गया है कि अभी उनके पंख नहीं आये, श्रतः नही चे उड़ नहीं सकते । ' द्रोणो ब्रह्मभृतां वरः ' ( २० ) यहाँ दोपा - लड़केको शूद्र-श्रावित बताया गया है । इति महाभारत शान्तिपर्वमें लिखा है - राजन्! नैतद् भवेद् ग्राह्यम • तपस पकृष्टेन जन्मना । महात्मनां समुत्पत्तिः तपसा भावितात्मनाम् ' ( २ ९ ६।१२ ) तपस . उत्पाद्य पुत्रान् मुनयो यत्र - तत्र हु ' स्वेनैव तपसा तेषाम् ऋषित्वं विदषुः तपस पुनः ' ( १३ ) यहाँ अपकृष्ट जन्मवाले पुत्रोंको ऋषियोंने पैदा करके अपने दुर्गम तपोबलसे ऋषि वना दिया, यह लिखा है । इन शार्ङ्ग चार पुत्रको ' शुद्र ऋषि ' श्रीचतुरसेनशास्त्रीने लिखा उनक था । हमने उस महाशयसे पत्र - व्यवहार किया था कि यह तो पक्षी हूँ, ' प्रापने इन्हें शूद्र कैसे लिख दिया? अपन इसपर शास्त्रीने ( ११।१२३५६ को हमारे पास ) उत्तर भेजा था- गंयें I । ' जरितर आदिको मैं तो शूद्र मानता नहीं । वेदकी ऋचाएं रचनेकी आये सामर्थ्यवाले ऋषिको मैं कैसे शूद्र मान सकता हूं? मैं तो धर्मशास्त्रोंमें
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1३४१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३४२ ] शार्ङ्ग हावादी भी यत्किञ्चित् इतिहासकी कुछ झलक दीख पड़ती है, उसको सब जहाँ और रहस्योंसे मुक्त करके शुद्ध इतिहासके रूपमें ही देखनेकी चमत्कारों विषय में चेष्टा करता हूं; इसीसे मैं उन्हें न पक्षी समझता हूं, न पक्षधारी ' । ५-४६ ) ' आलोक ' - पाठकोंने देख लिया कि- ' सेनजीने कितना गलत उत्तर त की । लिखा है । उनकी जो इच्छा हो; क्या वही इतिहासका रूप है? वहाँ भवन् । पक्षी भौर पंखवाले लिखा है; तब इससे वे मनुष्य कैसे वन गये? और भावसे । फिर शूद्रता उनकी कहाँ लिखी है? यदि नहीं लिखी; तब श्रापने वैसी गलत प्रसिद्धि कैसे कर ली? इस प्रकार स्पष्ट हो गया कि — वेदका कोई है । भी ऋषि शूद्र नहीं है । जब स्वा.द.ने वेदके प्राप्त करनेवाले ऋषियोंमें किसीको भी स्त्री - शूद्र नहीं बताया; तब उनके पिछलगुनोंकी इस विषयमें क्या शक्ति है कि वह श्रतः शूद्र - ऋषि वेदमें सिद्ध कर सकें? अतः स्पष्ट है कि यह सेनजीकी कल्पना लड़केको इतिहास तथा धर्मशास्त्र से विरुद्ध होनेसे मननीय नहीं, खण्डित हो गई । तपस्याकी शक्तिसे पक्षियोंका ब्रह्मवादी होना सब सम्भव है । सुनिये नाम. तपस्याकी महिमा - ' यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तत् तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ' ( मनु. ११/२३८ ) ( जो दुर्लभ, दुष्कर, विदः दुर्गम, दुस्तर हो; वह सब तपस्यासे सुसिद्ध हो जाता है ) । अपने यदि वे न मानें; तो जरितर आदि चार ऋषि थे, यह भौ वात लिता उनकी गलत है । आधार में चित्र होता है, निराधारमें नहीं । क्षी हूँ, ( यह मन्त्र यद्यपि पूर्वंसे वेदमें थे; पर लुप्त थे; पर जरितृ श्रादिको अपने समयपर प्रतिभात हुए; इसलिए वे इनके ऋषि ( द्रष्टा ) माने गये । वेदके कई ऋषि पक्षी तथा मत्स्य आदि भी थे, यह हम पहले बता था-चनेकी प्राये हैं; पर शूद्र ऋषि कोई नहीं बताया गया । ( २१ ) पराशर, वसिष्ठ यादिका कुल (? ) ( ७ वीं ऐतिहासिक नूल ) पूर्वपक्ष -- ' पराशर, वसिष्ठ, व्यास प्रभृति ऋषि भी तो नीच कुलो-स्पन्न होकर ब्राह्मण और ॠषि प्रादि हुए । इसी प्रकार कवय भी नोच-फुलके थे 1 ( एक दयानन्दी ' सार्वदेशिक ' में 1 ) उत्तरपक्ष- इनके पिता जब ब्राह्मण थे, तो इनका नीच कुल कैसे कहा जा सकता है? श्रीव्यासके पिता श्रीपराशर ब्राह्मण माता सत्य-खती क्षत्रिय - सन्तान थी - इस विषयमें हम पूर्व बता चुके हैं । उसीके साथ श्रीपराशरका दिष्य - विधिसे संयोग हुआ, देखो ' घालोक ' ( ७ ) ( पृ. ६११-६३३ ) तब नीच - कुलकी बात ही न रही । ' क्षत्रियायास्तु ( ब्राह्मणेन ) यः पुत्रो ब्राह्मणः सोप्यसंशयः ' ( महा. अनुशा. ४७।१३ ) ( ब्राह्मणसे क्षत्रियामें जो पुत्र हो, वह भी ब्राह्मण होता है ) ' त्रिपु वर्णेषु जातोपि ब्राह्मणाद् ब्राह्मणो भवेत् ' ( १७ ) ( ब्राह्मणसे तीनों वर्णोंमें उत्पन्न लड़का ब्राह्मण होता है ) । शेष है लोकप्रसिद्धि; उसमें तो तिलका भी ताल हो जाता है । श्रीसीताके रावणगृहमें शुद्धतासे निवासमें भी लोकमें असत्प्रसिद्धि होगई । श्रतः प्रसिद्ध है- ' जनानने कः करमर्पयिष्यति । ' ' जनावनायोद्यमिनं जनार्दनं क्षये जगज्जीवपिवं वदन् शिवम् ' ( नैषधचरित ११२४ ) अर्थात्- ( लोग जनत्राता विष्णुको तो जनार्दन ( जनपीडक ) कहते हैं; श्रीर प्रलयके कर्ता रुद्रको ' शिव ' कहते हैं 1 ) श्रीव्यासका निरूपण हो चुका । श्रीपराशर श्रीशक्त नामक ऋषिके संयोगसे अदृश्यन्तीके गर्भ से उत्पन्न हुए थे- ' परासुः स यतस्तेन वसिष्ठः स्थापितो मुनिः । गर्भस्थेन ततो लोके पराशर इति स्मृतः ' ( महाभा. १४ १७८१३ ) । ( वसिष्ठ मर रहे थे, गर्भस्थित पराशरने उन्हें बचवा दिया, इसलिए उनका नाम पराशर हुआ ) । निरुक्तमें भी लिखा है- ' पराशीर्णस्य वसिष्ठस्य स्थविरस्य जज्ञे ' ( ६३०१२ ) । ( वसिष्ठ जीर्ण - शीर्ण वूढ़े हो चुके थे; तब पराशर पैदा हुए ) ' आश्रमस्था ततः पुत्रमदृश्यन्ती व्यजायत ।
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३४४ ] Sentence: ( ३-२ ) शक्त ेः कुलकर ( पराशर ) राजन्! द्वितीयमिव शक्तिनम् ' ( महा. १७८ । ( १८०1१ ) ( प्राश्रमस्थित मदृश्यन्तीने शक्तिके कुल बनानेवाले दूसरे शक्ति, पराशरको पैदा किया । यहाँ भी कोई नीचकुलकी बात नहीं । इसमें इतिहासको देखना चाहिये, असत्प्रसिद्धि पर नहीं दौड़ना चाहिये । शेष हैं श्रीवसिष्ठ, उनकी उत्पत्ति मित्रावरुण देवताके द्वारा देवाप्सरा-उवंशी मनसे हुई है । वेद भी यही कहता है- ' उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठ! उवंश्या ब्रह्मन्! मनसोधिजातः ' ( ऋसं. ७।३३।१२ ) ( हे वसिष्ठ जी; तुम मित्रावरुणकी सन्तान हो; हे ब्राह्मण! तुम उर्वशीके मनसे प्रकट हुए हो ) इस प्रकार पुराण - इतिहासमें भी कहा है-" मित्रावरुणजं तेज प्राविश त्वं महायशः! अयोनिजस्त्नं भविता तत्रापि द्विजसत्तम! ' ( श्रीमद्भा. ६।१३।६ ) ( हे महायशस्वी वसिष्ठजी; तुम मित्रावरुणके तेज में प्रविष्ट होनो; तुम वहां भी प्रयोनिज बनोगे । ) यहाँ पर भी नीच कुल नहीं । देवयोनि मनुष्य योनिकी अपेक्षा उत्कृष्ट ही होती है; इसलिए देव- पत्नी- ' अप्सराओं को मनुष्य द्वारा नमस्कार भी कराई गई है - ‘ ताभ्यो गन्धर्वपत्नीभ्योऽप्सराभ्योऽकरं नमः ' ( अथर्व.सं. २१२/५ ) । उर्वशी कोई मनुष्य- वेश्या नहीं, जैसे कि वादी कहा करते हैं । यह देवा-प्सरा है । मनुस्मृतिके अनुसार मनुसे वसिष्ठकी मानसिकउत्पत्ति कही गई है ( १।३५ ) फलतः वसिष्ठ भी ब्रह्मषि ही हैं । इस प्रकार ऐलूष कवषका भी ब्राह्मण कुल है । केवल इसमें द्यतव्यसन था, वह भी ' अक्षेर्मा दीव्यः ' ( ऋ.सं. १०१३४ ) इस सूक्तके दर्शनके समय क्योंकि इस सूक्तका ऋषि भी ऐलूष कवष ही है - हट गया । इसी द्यूत-क्रीड़ाप्रियतासे ही उसे निन्दार्थवादसे - ' दास्याः पुत्र, अब्राह्मण ' कहा गया, वस्तुतः नहीं । प्रर्थवादका शब्दार्थ में पर्यवसान न होकर उसके विवक्षित निन्दा - प्रशंसारूप तात्पर्यमें ही पर्यवसान होता है । इस प्रकार एक सिद्धान्तालंकारका ' कवष ऐलूष एक दासीपुत्र था, किन्तु तप, सदाचार और बिद्याके बलसे वह ब्राह्मण ऋषि बन गया ' यह कथन भी निर्मूल क शुद्र नही था । [ ३४५ है । निकालने के कुछ गी वह क्या तपस्या कर सकता था ३४६ चारी हो सकता था, क्या विद्या पढ़ सकता था? उसको तो, क्या सदा. देवतानुग्रह-वरा कई ॠग्वेदसूक्त विना पठन - परिश्रमके स्फुरित होगये । ऐसी जानकर ही उसे यज्ञमें बुला लिया गया । इसलिए ऐ. प्रा. में देवकृपा प्रसिद्ध ' विदुर्वे इमं देवाः उप इमं ह्वयामहै ( २११६ ) ' ऋषि ' शब्दका कहा निबंधन है- वेदा करते हुए श्रीयास्कने ' तद् यद् एतान् तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भु प्रभ्यान ते ऋषयोऽभवन् ’ ‘ तद् ऋषीणामृषित्वम् ' ( २०१६ १ ) यह लिखा है । इसपर वाला श्रीदुर्गाचार्यने स्पष्टता की है- ' अनधीतमेव तत्त्वतो ददृशुः तपोविशेषेण पद उ अर्थात ऋषि लोग बिना ही अध्ययन किये मन्त्रोंके द्रष्टा वन जाते । दास्य यही ऋषियोंका ऋषित्व होता है ' । इससे वादियोंकी कवपके श्रध्ययनको हैं । विश्रा बात कट जाती है । पूर्व क यदि कहा जावे कि- ' प्रज्ञानात्मिका तपस्या एक क्षणसें भी होजावी सकता है; ' तब इससे श्रीकाव्यतीर्थं श्रादिका अभिप्राय तो कट गया । तब इस ल प्रकारकी प्रविर्ताकत घटना सामान्यशास्त्र में नहीं गिनी जा सकती, फिर मण्डल इस असाधारण घटनासे साधारण शुद्धों का वेदाधिकार कैसे सिद्ध हो हो जात सकता है? तलनाप उत्तरप्र ( ३५ ) जो कि वादी कवषकी शुद्रला सिद्ध करके, इतिहाससे शुद्रका इष्ट हो वेदाधिकार बताकर उसमें ' यथेमां वाचं कल्याणीं ' इस मन्त्रसे सभी शूद्र- होना इ श्रन्त्यजादिका वेदाधिकार बताया करते हैं; यह ठीक नहीं; हम इस मन्त्र- का निम का यह अर्थं इस पुस्तकके आरम्भमें आलोचित कर चुके हैं - विद्वान् पाठकों-ने इस प्रर्थकी निर्मूलता जान ही ली होगी । वेद तो अपना अधिकार ( ' माध्य द्विज - पुरुषको ही देते हैं, शूद्र एवं स्त्रीको नहीं । जैसे कि - ' स्तुता मया वरत कवप भी चेदमाता... पावसानी द्विजानाम् ' ( श्र. १६७१।१ ) इस मन्त्रके विरोध इम ' यथेमां वाचं ' का वेदाधिकार अर्थ करना ठीक नहीं । इस विषयमें प्राचीन उसे गा ऋषि - मुनियोंके प्रमाण अपेक्षित हैं, आजकलके अवैध अछूतोद्धाप्रेमी निन्दात्म सुधारकोंके नहीं स्वा. द. से पूर्व किसी भी प्राचीनने उक्तमन्त्रका ऐसा स.प्र. में ए कोई वर्ण