सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 201–210
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 201–210
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[ ३४५ ३४६ ] या सदा. बतानुग्रह म नहीं किया; देवकुमा प्रसिद्ध है, और श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अतः यह अर्थ निर्मूल है । जबकि यह मन्त्र कर्मकाण्ड में सर्वजन प्रत्यक्ष है 1 । उसमें कोई भी स्त्री - शूद्रादिको कहा है- बेदाधिकार नहीं मानता । निबंधन ( ३६ ) फलतः ‘ ' ऐतरेय - ब्राह्मण ' को ' दास्याःपुत्र ' यह अलुक्समास-म्यानपंत शब्द कवके आक्रोश ( निन्दन ) मात्रमें पर्यवसित है । अथवा उक्त । इसपर वाला स्थल में अलुक्समास वाला न भी माना जाए; समासरहित ही शेपेण ' । पद ' दास्याः उक्त पुत्रः ' यह माना जावे; तथापि वह ऐसे अवसर में गाली देने में जाते हैं । विश्रांत होता है, = ययनको पूर्व कहे नाटकोंके सकता है । होजावी लोकमें कहते तब इस मण्डलमें क्यों घुस फिर हो जाता; किन्तु वास्तवमें दासी ( शूद्रा ) के पुत्र अर्थ होने में नहीं । इसमें वैसे प्रमाण भी साक्षी हैं । उनमें असमास भी माना जा हैं— ' यह कंजरी ( वेश्या, वा रंडी ) का पुत्र हमारे आया '? इससे प्रक्षिप्त व्यक्ति सचमुच वैश्यापुत्र नहीं वहाँ केवल गाली देना ही इष्ट होता है । कई पञ्जावी सद्ध हो सनाएं तङ्ग कर हुई अपनी लड़कियोंको कहती हैं- ' अरी रण्डी!!! ' उत्तरप्रदेशकी स्त्रियां कहती हैं - अरी रांड! इसमें केवल गाली देना ही शुद्धका इष्ट होता है । अपनी लड़कीका ' रंडी ' ( वेश्या ) वा ' रांड ' ( विधवा ) शूद्र- होना इष्ट - नहीं होता । इससे ' शाङ्खायन - ब्राह्मण ' वा कोषीतकी - ब्राह्मण मन्त्र- का निम्न वचन भी व्याख्यात हो गया । वह यह है-नाठकों- ' माध्यमाः सरस्वत्यां सत्रमासत, तद्धापि कवषो मध्ये निषसाद धिकार ( ' माध्यम लोगोंने सरस्वती नदीके किनारे यज्ञ शुरू किया । उस यज्ञमें वरक्ष कव भी बीच में शामिल हुआ ' । ) यहाँपर कवषको शूद्रापुत्र नहीं बतलाया वरोधसे तह इमे उपोदुः ( उसे उन माध्यमिकोंने अपवादित किया, निन्दित किया, प्राचीन उसे गाली दी ) दास्या वै त्वं पुत्रोसि ( ' तू दासीका लड़का है ' यह प्रेमी निन्दात्मक गाली है, इसमें ‘ उपोदुः ' यह शब्द लिङ्ग है । ) जैसे स्वा.द.जीने स.प्र.में एक आचार्यको गालीसे ' चाण्डालवर्णोत्पन्न ' कह दिया, सो चाण्डाल कोई वर्णं ही नहीं होता । दूसरे श्राचार्यको उन्होंने कब्जरजात्युत्पन्न, कव शूद्र नहीं । [ ३४७ तीसरेको यवनकुलोत्पन्न, चौयेको ' डोम ' लिख दिया, पांचवें ' रामसनेही ' को ' रांडसनेही ' कह दिया, यह सब क्रोधसे गाली रूपमें कह दिया । न वयं त्वया सह भक्षयिष्यामः ' ( ' हम तेरे साथ भोजन नहीं करेंगे ' यह भी गाली है, जैसे कि कोई ब्राह्मण खाने श्रादिमें अस्वच्छता व्यवहार कर रहा हो, तो उसे कहते हैं तू तो भंगिनका लड़का या श्रादि- भंगी है, वा मुसलमान है, हम तेरे हाथका नहीं खावेंगे, वा तेरे साथ एक पंक्ति में भोजन नहीं करेंगे ) ' सह क्रुद्धः प्राद्रवत् ( वह गुस्सेसे वहांसे चला गया ) यदि वह सचमुच दासीका लड़का होता; तो उसे ऐसा कहनेसे क्रोध न लगता ) । सरस्वतीमेतेन सूक्तेन तुष्टाव ( उसने सरस्वती नदीकी इस सूक्तसे स्तुति की । ) यदि वह सचमुच दासी पुत्र होता; तो वह भी केवल दास - सेवक होता, उसे वेदके सूक्त कैसे याद होने थे? ) ' तं हृ इयं ( सरस्वती ) अन्वियाय । ( सरस्वती नदी उसके पीछे - पीछे चली ) तत उ ह इमे निरागा इव मेनिरे ( उन्होंने उसीसे उसे निरपराध माना ) यहाँ उसकी निरपराधता बताई है, इससे स्पष्ट हुआ कि उसने कोई ऐसा अपराध किया था, जैसा कि ऐब्रा. में उसका द्य तदेवन दिखाया था उससे माध्यमिकोंने उसे उक्त गाली दी । ' तं ह् अन्वावृत्य ऊचुः - नमः ते अस्तु मा नो हिसी:, त्वं वै नः ( ब्राह्मणानां मध्ये ) श्रेष्ठोसि; यं त्वा इंयमन्वेति ( वे माध्यमिक कवपके पास जाकर कहने लगे, तुम्हें नमस्कार हो, शाप श्रादिसे हमें हानि न पहुंचाना । तुम हम ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हो; जोकि यह सरस्वती नदी तुम्हारे अनुकूल चलती है ) यहाँ उसे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ वताया है, इससे स्पष्ट है कि-बह ब्राह्मण था, उसको उन्होंने साधारण समझ, उसके किसी कुव्यवहारसे उसे उक्त शब्दोंसे गाली दी, पर सरस्वती नदी द्वारा उसे सम्मानित देखकर उसे अपने लोगोंमें श्रेष्ठ समझ उससे क्षमा मांगी, और कहा कि-हमें कहीं शापसे हिंसित न करना ।
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४८ ] घोसानघलोक ( ३-२ ) * संह ज्ञपयाञ्चक्रुः, तस्य ह क्रोधं विनिन्युः ( क्षमा मांगकर उसका क्रोध शान्त किया, ( दासीपुत्र होनेपर उसके क्रोधका अवकाश हो न था ) स एष कवषस्यैव महिमा ' ( १२।३ ) ( यह कवषकी ही महिमा है ) भंगीको भंगी कहने पर क्रोध नहीं होता, भिन्नको तो होता है । इसी प्रकार छागलेयोपनिषद् में भी कहा है- ' ऋषयो वं सरस्वत्यां सत्रमासत; तेऽथ कवषमैलूषं ' दास्याः पुत्र ' इति दीक्षाया श्रच्छिन्दन् । ' ( ऋषियोंने सरस्वती नदीके किनारे यज्ञ किया, उन्होंने ऐलूष- कवबको ' दास्या: पुत्र ' कहकर दीक्षासे अलग कर दिया ) । ऋषियोंने जिस शब्दसे उसे गाली थी, सर्वत्र उस शब्दका अनुवाद वा उद्धरण दे दिया गया है, वह केवल तिरस्कारार्थं ही है; उससे उसकी शूद्रता प्रतिफलित नहीं होती-क्योंकि इसमें कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं, यह हम सिद्ध कर चुके हैं । इसलिए बृहदारण्यकके अन्त में ब्राह्मण - वंशों में कावषेयका निरूपण कवषको ब्राह्मण ही सिद्ध कर रहा है । इस प्रकारका एक पुराणका प्रमाण भी हम पूर्व दे चुके हैं । ( ३७ ) उक्त ब्राह्मणकण्डिका पर कोई कहता है कि- ' कवष जन्मसे दासीपुत्र और कर्मसे कितव, इसलिए प्रब्राह्मण अप्रशस्त ब्राह्मण कहा गया है इस पर जानना चाहिये कि जो जन्मसे दासीपुत्र हो, प्रोर कमसे कितव हो; उसे प्रब्राह्मण - प्रशस्त ब्राह्मण भी कैसे कहा जा सकता है? उसे तो शूद्र कहा जाता है । ' अब्राह्मण ' शब्द ब्राह्मण वा ब्राह्मणसदृश-के लिए आता है । ' फणहीनो नागः ' में जिस प्रकार ' नाग ' हाथीका नाम ' नहीं हो सकता, “ प्रशंखचको हरिः ' में जैसे ' हरि ' बन्दरका नाम नहीं हो सकता; वैसे ' अब्राह्मण ' शब्द भी ब्राह्मणकेलिए ही गालीरूपमें प्रयुक्त होता है, शूद्रादिकेलिए नहीं; क्योंकि- ' प्राप्ती सत्यां हि निषेधो भवति ' ( निषेध प्राप्ति होनेपर ही होता है ) यह एक प्रसिद्ध न्याय है । यदि कवष जन्म और कर्मसे शूद्र था, तो उसमें ब्राह्मणत्व प्रसक्त ही न होनेसे उसे ' अब्राह्मण ' कहा ही नहीं जा सकता था । पर वैसा कहना ही कवषकी ब्राह्मणताको क शुद्र नहीं । | e सूचित कर रहा है, चाहे वह प्रशस्त ब्राह्मण ही 1. अप्रशस्त ब्राह्मणतासे गुण - कर्मसे वर्ण मानने वालोंका ही सिद्धान्त कटता है ।.. ( ३८ ) कई शङ्का करते हैं कि- ' कवष शूद्र हों, वा ब्राह्मण- ब्राह्मण आापका क्या बिगड़ता - बनता हैं, आपका उसके ब्राह्मणत्वका प्रयास क्यों इसमें? नहीं तो इस पर जानना चाहिये कि - जब यह वादियोंका अशुद्ध वा श्रसत्य पक्ष हैं, ब्राह्मणत तब उनकी श्रशुद्धता बताकर सर्वसाधारणका भ्रम हटाना एक उचित कार्य वह व्यय है । इसीं असत्य - घटनाऐं साधारण जनता पर प्रभाव डालकर वादी शूद्रों शब्द भी को वेदाधिकार सिद्ध करनेके लिए एड़ीसे चोटी तकका पसीना बहाते हैं, में विद्वान और साधारण जनता भी परप्रत्ययनेय बनकर स्वयं तो इस विषयमें! वेदाधिक सन्धान करती नहीं । वह भी इस दिशा में प्रवृत्त हो जावे, स्वयं भी अनु- इस विषय में अनुसन्धान कर सके इसलिए ही हमारा यह प्रयत्न है । ही दा ( ३ ९ ) जो कि प्रतिपक्षी कहा करते हैं – “ मुख्यामुख्यर्योर्मु'स्ये नहीं हो कार्य संप्रत्ययः ' इस नियमके अनुसार ' दास्याः पुत्र, अब्राह्मण ' आदि पदोंकी किसी ग व्याख्या क्यों न मुख्यार्थमें की जावे? ' इसपर उत्तर यह हैं कि जब किसी हो गया को अधिक्षिप्त करना हो, तो वहाँ लाक्षणिक वा अमुख्यार्थक शब्द भी था । इ प्रयुक्त किये जाते हैं । वहाँ भला मुख्यार्थ कैसे किया जा सकता है? अन्य भ किसी अपकारीको कहा जाता है- ' उपकृत बहु तत्र प्रथिता भवता परम् ' यहाँ यद्यपि ' उपकृतं ' आदि मुख्यार्थ होता है, पर अपकारीमें अधिक्षेपार्थं प्रकृत अर्थ कैसे माना जा सकता है? इस प्रकार ब्राह्मणमें के लिए प्रयुक्तः ' दास्याः पुत्र ' ' श्रब्राह्मण ' आदि पदोंका जा सकता है? जैसे कि - छान्दोग्योपनिषद् में रैक्वनें को ' शूद्र ' ( ४।२।३ ) इस उपचार शब्दसे कहा था- यह समझना किमुच्यतें, सुजनता वेद पदोंका उपकार ही भी श्रर्ता होनेसे वह ( मुख्य ) कुत्तिया भी आक्रोश- प्रधिक्षेप पठन मुख्यार्थ कैसे लिया से भी क्षत्रिय भी जानश्रुति नहीं हो ब्रह्मसूत्र ( १।३।३४- ( ७२-७ ३५ ) में स्पष्ट हैं, जैसे वहाँ मुख्यार्थ नहीं माना जाता, किन्तु श्रमुख्या ही श्रथं माना जाता है, वैसे यहाँ पर भी समझना चाहिये । यह है । ' दास्याः पुत्र ' कहकर फिर ' अब्राह्मण ' कहना तो स्पष्ट हीं कवष स्मर्यन्तेः शूद्रस्या
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३४१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) तासे. ३५० ] कर रहा है, ' नत्र यहां उसकी अप्रशस्नता बता रहा है, - इसमें ब्राह्मण सिद्ध पुत्र ' कहनेसे ही जब वह शूद्र सिद्ध हो सकता था. उसका यों? नहीं तो ' दास्याः भी प्रकार प्राप्त नहीं था, तो फिर उसका निषेध कैसा? किसी है ब्राह्मणत्व निषेध कवषकी ब्राह्मणता बता रहा है, तब ' दास्याः पुत्र ' कार्य वह व्यर्थ हुआ आक्रोशार्थक प्रतिफलित होता है । इस ऐतिहासिक प्रमाद शूद्रों: शब्द भी स्वयम् अवश्य ध्यान देना चाहिये । इस साध्य दृष्टान्तसे शूद्रोंका ते हैं, में विद्वानोंको सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि- कवष शूद्र ही सिद्ध नहीं । वेदाधिकार धनु- ( ४० ) अथवा अभ्युपगमसिद्धान्त वा वादितोषन्यायसे कवपको वस्तुत: इ ही दासीपुत्र मान लिया जावे, तब भी शूद्रोंको वेदाध्ययनाधिकार सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि — उसने ऋसं. का १०1३० सूक्त ऐ. ब्रा. के अनुसार मुस्के किसी गुरुसे तो पढ़ा नहीं था, किन्तु देवके अनुग्रहसे उसे स्वतः प्रतिभात नदोंकी हो गया । जैसे सन्त ज्ञानेश्वरके हाथ पड़नेसे भैसा भी वेदमन्त्र बोल उठा किसी था । इससे न तो यह सिद्ध होता है कि भैंसेने गुरुसे वेद पढ़ा, न इससे भी अन्य काही वेदमें अधिकार सिद्ध हो जाता है, वैसे प्रकृतमें भी है? समझना चाहिए । जनता वेदके कई सूक्त जालवद्ध मत्स्योंको तथा देवताओं की कुत्तिया सरमा को ह भी प्रति प्रतिभात हो गये थे, पर इस दृष्टान्तसे अन्य मछलियों वा कुत्तियाग्रोंका न वैसा अधिकार हो जाता है, न उनका सर्वसाधारणसे पक्षेप पठन सिद्ध हो जाता है, वैसे किसी विशेष श्रारूढपतित - शूद्रके मुख लिंगा से भी अतर्कित कई मन्त्र निकल पड़े, इससे अन्य शूद्रोंका वेदाधिकार सिद्ध. श्रुति नहीं हो जाता । इस विषयकी विशेष स्पष्टता हम ' वेदकी ऋषिकाएं ' ३४. ( ७२-७९ पृ. ) में कर चुके हैं । ही यही बात स्वा. शंकराचार्य महाराजने पूर्वोत्तर- पक्ष में स्पष्ट कर दी है । ( पू. ) ' विदुरप्रभृतश्चय शुद्रयोनिप्रभवा अपि विशिष्टज्ञानसम्पन्नाः स्मर्यन्ते; तस्मात् शूद्रोधिक्रियते विद्यासु ' ( ब्रह्म. १ | ३ | ३४ ) ( उ ० ) न-शूद्रस्याधिकारः, वेदाध्ययनाभावात् । येषां पुनः पूर्वंकृतसंस्कारवशाद् विदुर-विदुरादिके ज्ञानत्वपर विचार [ ३५१ धर्मव्याध - प्रभृतीनां ज्ञानोत्पत्तिः, तेषां न शक्यते फलप्राप्तिः प्रतिपेद्युम्, ज्ञानस्य ऐकान्तिकफलत्वात् । ( १।३।३८ ) । ( प्र. ) विदुर यदि, शूद्रयोनि वाली दासीमें उत्पन्न हुए भी विशिष्ट-ज्ञानवाले माने जाते हैं । तव शुद्रका वेदमें अधिकार होना चाहिये । ( उ ) शुद्रका अधिकार नहीं । क्योंकि - उपनयन न होनेसे उनका वेदाध्ययन नहीं होता । जिन विदुर- धर्मव्याध प्रादिकी श्रारूढपतित होनेसे गत- जन्मके संस्कारके कारण ज्ञानोत्पत्ति हो गई हो, उनकी अपवादवश फल प्राप्ति निषिद्ध नहीं हो सकती । ज्ञानका फल ऐकान्तिक हुआ करता है । ) यही बात श्रीमध्वाचार्यस्वामीने अपने उक्त ब्रह्मसूत्रके सूत्रभाष्य में लिखी है - ' विदुरादीनां तु उत्पन्नज्ञानत्वान्न कश्चिद् विशेषः । ( विदुर-आादियों को जन्मसे ही ज्ञान उत्पन्न हुआ हुआ था, अतः उनके दृष्टान्त में कुछ विशेषता नहीं ) अव एक प्रश्न रह जाता कि- देवता भी तो वणिक एवं उपनीत नहीं, तब उन्हें वेदका अधिकार कैसे? इसी तरह शुद्रका भी वेदाधिकार होना चाहिए । यही पूर्वपक्ष ' वैयासिक न्यायमाला ' में आया है - ' शूद्रोधिक्रियते वेदविद्याया मथवा नहि? अत्र वणिक - देवाद्या इव शूद्रोधिकारवान् '? इसका वहीं उत्तरपक्ष श्राया है- ' देवा: स्वयंभात-वेदाः, शूद्रोध्ययनवर्जनात् । नाधिकारी श्रुतौ स्मार्तेष्वधिकारो न वार्यते ' ( १।३।१ ९ -२० ) इसीको वहां स्पष्ट किया है - ' अस्ति देवशूद्रयोर्वेषम्यम् । उपनयनाध्यनाभावेषि स्वयंभातवेदा देवा; तादृशस्य पुण्यस्य पूर्वमुपाजि-तत्वात् । शूद्रस्तु तादृशसुकृंतराहित्यान्न स्वयंभातवेदः । नापि तस्य वेदा-ध्ययनमस्ति, उपनयनाभावात् । श्रतो विद्वत्ताख्यस्य श्रधिकारहेतोरभावान्न श्रोतविद्यायां शूद्रोधिकारी ।......, । ( देवताओं एवं शूद्रों में विषमता है । देवताओं में चाहे उपनयन तथा अध्ययन नहीं है; तथापि उन्हें वेद स्वयं ही प्रकाशित हुए होते हैं । क्योंकि उन्होंने गतजन्ममें वैसा पुण्य अर्जित कर लिया था । शुद्र तो वैसे
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३५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पुण्यसे रहित होनेसे उसे स्वयं वेद प्रकाशित नहीं हुए होते । शुद्रका वेदाध्ययन भी नहीं है, क्योंकि उसका उपनयन नहीं होता । इसलिए. विद्वत्ता नामके अधिकारके हेतु न होनेसे शूद्र वेदविद्या में अधिकारी नहीं होता 1 ) इससे वादीका पक्ष सिद्ध न हुआ, क्योंकि - कवषको स्वयं वेदके कुछ सूक्त प्रतिभात हो गये थे उसने यथाविधि उन्हें गुरुसे नहीं पढ़ा था । तब इससे शूद्रोंको वेदाधिकार कैसे सिद्ध हो सकता है? पर हमने इस निबन्ध में प्रमाणोपपत्तिसे सिद्ध कर दिया है कि ऐलूष कवष शूद्र नहीं थे, किन्तु. ब्राह्मण । इसलिए कवषके लड़केका भी ब्राह्मण होनेसे ही बृहदारण्यक के अन्तमें वंशब्राह्मणमें ' कावषेय ' नामसे निरूपण प्राया है, अतः वादियों का पक्ष सर्वथा उच्छिन्न हो गया । ( ३० ) क्या ' मन्त्रद्रष्टा कक्षीवान शुद्र थे? ( पाठवी ऐतिहासिक भूल ) पूर्वपक्ष - ' ( क ) ' कस्तावद् वेदाधिकारी- इतिं वैदेनैव वक्तव्यम्, तत्र तु न कुत्रापि संकेतेनापि निवारितोऽधिकारः शूद्राणाम् ( ख ) प्रत्युत ' यथेमा वाचं कल्याणीम् ' इत्यस्मिन् मन्त्रे सर्वाधिकारा परमात्मवाण इत्येवोप-दिष्टम्, नैकस्य सञ्चिता सम्पत्तिर्वेदाः सर्वेषां हि ते । गौतमवचनां तु प्रवैदिकमेव । वेदाध्ययनेपि सर्वेषामधिकारः ' । ( क ) ( वेदका अधिकारी कौन है, यह तो वेदको ही बताना चाहिए । वेदमें तो संकेतसे भी शूद्रों का अधिकार नहीं हटाया गया । ( ख ) वल्कि ' यथेमां वाचं ' में वेदवाणी में सबका - शूद्रान्त्यजों - तकका अधिकार बताया गया है । वेद एककी सञ्चित सम्पत्ति नहीं है, वेद सभी के हैं । गौतम - स्मृतिका वचन तो श्रवैदिक है । वेदाध्ययन में तो सब का अधिकार हैं ) । ( श्रीम.ग्रा. स्वामी ' ब्रह्मसूत्रस्य वैदिक भाष्ये ' पृः १६४-१६५ ) । कक्षा हि नहीं । [ ३५३ ( ग ) ऋग्वेद मन्त्राणां शूद्रोपि ( कक्षीवान् ) ऋषिः । सर्ववेदव्याख्याता-सायणाचार्योंपि प्रत्र सम्मतः, ( ऋग्वेदमन्त्रोंका कक्षीवान् ३५ है । सर्ववेदव्याख्याता सायणाचार्य भी इसमें सहमत शूद्र भी ऋषि साप्ताहिक पत्रमें वही ) । ( घ ) ॠग्वेदके प्रथम मण्डल के हैं । ) ( संस्कृत- है, ऋषि कक्षीवान् है, जिसे दीर्घतमाने प्रङ्गराजकी पट्टरानीकी ११६ उशिकने उत्पन्न किया था, ऋ. ६।७४ का भी वही ऋषि दासी ( शूद्रा ) इस शवर ऋ. १०।१६६ का ऋषि है । कक्षीवान् की पुत्री घोषा है, उसका पुत्र वेद अनेक सूक्तोंकी ऋषिका है ।. ( श्रीभग. ) ( ङ ) समानो दशममण्डलके नान समानी ऋ. १०।१६१ ३ इति अन्तिम मण्डलस्यान्तिमसूक्तस्य मन्त्रः समितिः मन्त्रेण सर्वेषां ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राणां उपान्त्येन विर समानमन्त्रत्वोपपादनमपि वेदानां सर्वाधिकारत्व समर्थयते ' ( प्र. सू. वैदि. १६५ पृ. में ) । ( ' सं ( ' समानो मन्त्र: ' इस ऋग्वेदके अन्तिम मन्त्रसे पूर्वके मन्त्रमें ब्राह्मण - शूद्रादिका समान - मन्त्र बताना भी वेदोंके सर्वाधिकारका समर्थन सभी इमा करता है ) । ( च ) ' तस्यां कक्षीवदादीन् स शूद्रयोनौ ऋषिस्तदा । जनया- लगे उस मास धर्मात्मा पुत्रानेकादशैव तु ' ( १।१०४ । ४७ ) यहां पर कक्षीवान्को तब शूद्रयोनिमें उत्पन्न कहा गया है; और वह वेदका द्रष्टा है, सो शूद्रोंका भी वेदमें अधिकार सिद्ध हुना ' ( ' वर्तमान ' सम्पादक; श्रीर.शं. अवस्थी ) वेदम उत्तरपक्ष- - ( क ) वादीका ' वेदमें कहीं संकेतसे भी शूद्रोंका अपने में है; अनधिकार नहीं बताया गया ' - यह कहना प्रयुक्त है; ' वेदमाता... द्विजानाम् ' -तमा ( अ. १६७१1१ ) ' अयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋस. ११४६५ ) इत्यादि शुद्र मन्त्रोंसे वेदने ' द्विज ' ( शुद्र - ग्रन्त्यज ) का वेदमें अधिकार निषिद्ध कर ( मत दिया है । वैदिककालसे आजतक के सभी प्राचार्योंने ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य | नष्ट को ही द्विज एवं यज्ञिय माना है, शूद्र - अन्त्यजको नहीं । इन्हें एकज एवम् मित्र अयज्ञिय माना जाता है, अतः इन्हें यज्ञोपवीताधिकार न होनेसे वेदका अधिकार भी नहीं । इन्हें तो सभी शास्त्रोंने कृच्छ्रकार्य सेवाका ही दिया दिव्य स ० ध ० २३ से उ उत्पन प्रधान
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३५३ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ख्याता- ३५४ ] ऋषि नहीं । संस्कृत- है, वेदाध्ययनादिका ' यथेमां वाचं ' से परमात्मवाणी ' सर्वाधिकारा ' सिद्ध नहीं । सूक्तका ( ख ) में हम इस ग्रन्थके प्रारम्भिक ५५ पृष्ठों में स्पष्टता कर चुके हैं । ( शूद्रा ) इस विषय ' तपसे शूद्र ' ( यजुः ३०१५ ) शूद्रको कठिन सेवाकार्यका अधिकारी का पुत्र वेद तो है वेदका नहीं । वेदका अधिकार वेद ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं ' ( यजुः ३० | मण्डलके मानता, समितिः ५ ) ब्राह्मणको ही देता है, तब ' यथेमां वाच ' यह वेदके अन्य मन्त्रोंसे पान्त्येन विरोध आनेके कारण शूद्रान्त्यजको वेदाधिकार देनेका ' सिद्ध ' मन्त्र नहीं । वेदानां अब इससे वादी पक्षसिद्धि भी नहीं । इसके अतिरिक्त भगव. जी ( ' संस्कृतम् ' १२।२०,१७,३,४२ में ) वेदोंको ' पौरुषेय ' मानते हैं, तब वे में सभी इमां वाचं ' से ' परमात्माकी वाणी ' अर्थ ले ही कैसे सकते हैं? क्या वे समर्थन इस पक्षी सिद्ध्यर्थं ही वेदोंको अव अपोस्षेय ( परमात्म - वाणी ) मानने जनया. नगे हैं? वेद - सम्पत्ति के अध्यक्ष परमात्मा उसे शुद्रों को जब नहीं देते; को तब शूद्रका उस सम्पत्तिमें अधिकार भी कैसे हो? शूद्रोंका ( ग ) कक्षीवानको शूद्र और वेदद्रष्टा सिद्ध करके वादी शूद्रका भी वस्थी ) वेद अधिकार सिद्ध करना चाहता है; यह बात वादी सायणसम्मत मानता अपने में है; पर यह बात वादीकी सर्वथा गलत है । कक्षीवान्के उत्पादक दीर्घ-जानाम् ' तमाः शुद्र नहीं थे, किन्तु ब्राह्मण ऋषि थे, तब उनसे उत्पन्न कक्षीवान् - त्यादि शुद्र कैसे हो सकते हैं? ' बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते ' द्ध कर ( मनु. १।३५ ) श्रमोघवीर्य - तपस्वियों के ब्रह्मवर्चसको साधारण क्षेत्रदोष - वैश्य | नष्ट नहीं कर सकता । इसीलिए क्षत्रियाके क्षेत्रसे उत्पन्न भी श्रीविश्वा-एवम् " मित्र ऋचीक ब्राह्मणके चरुसे जन्म होने के कारण ब्राह्मण हुए । वेदका धीवर - कन्यारूप प्रसिद्ध भी सत्यवती में ब्राह्मण श्रीपराशर - ऋषिके दिया दिव्यसंयोगसे उत्पन्न श्रीवेदव्यास ब्राह्मण हुए । इस प्रकार अन्य भी बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं । ऋषियोंने कई पक्षिणियोंसे भी सन्तान उत्पन्न किये हैं, क्या वे संतानें भी पक्षी मानी जाएंगी? नहीं, बीजकी प्रघानतासे वे ब्राह्मण ही माने जावेंगे । वैसे यहाँ प्रकृतमें भी समझना कक्षीवान् ऋषि शूद्र नहीं थे [ ३५५ चाहिये । यहां उशिक् - दासीको भी मन्त्रपूत- जलसे पिने ऋषिपुत्री लिया था । मन्त्रपूत - जलकी शक्तिले पुरुषको भी पत्थर और कर भी स्त्री - पुरुष बना देना प्रसिद्ध है, तब यहाँ पर कक्षीवान की पत्थरको कोई प्रसक्ति ही नहीं । श्रीसायणाचार्य जब शूद्रको वेदाधिकारी शूद्रताकी बताते, ( देखो उनका वेदभाष्योंका ' उपोद्घात ' ) तब वे वेदके ऋषि नहीं को शुत्र कैसे बता सकते हैं? यदि वादीकी वस्तुतः ही श्रीसायण में श्रद्धा है, तो हम सायण भाष्य ही उद्धृत करते हैं, जिससे वादीका पक्ष गिर जायगा । ऋ. १।१२५।१ के सायणभाष्य में यह पूर्वपक्ष किया है- ' ननु कक्ष्या-नाम श्रश्वबन्धनी रज्जुः, तद्वान् कक्षीवान् । प्रववन्धनं च राज्ञ एवोचितम्, अतोस्य राजन्यत्वात् प्रतिग्रहो नोपपद्यते; ' याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ' [ १०1७६ ] इति स्मरणात् । तस्माद् ब्राह्मणस्यैवाधिकारो न तु क्षत्रियस्येति? ' यह पूर्वपक्ष है । [ क ] ( कक्ष्या घोडेकी वाग्धने की रस्सी का नाम है । अश्व का बन्धन राजाको ही उचित है । श्रतः कक्षीवान् क्षत्रिय होनेसे उसके द्वारा प्रतिग्रह लेना उपपन्न नहीं हो सकता । क्योंकि मनु. [ १०/७६ ] ने ब्राह्मणका प्रतिग्रह लेना कहा है । इस पूर्वपक्ष में भी कक्षीवान्को क्षत्रिय बताया है- शूद्र नहीं । इसका श्रीसायण उत्तरपक्ष देते हैं-' यद्यपि असो कलिङ्गाख्यस्य राज्ञः पुत्रः, तथापि तेन कलिङ्गेन स्वयं वृद्धत्वाद् अपत्योत्पादनाय सामर्थ्यमलभमानेन तदुत्पादनाय याचितो दीर्घतमा ऋषिः, अपत्योत्पादनाय प्र ेषितया राजमहिष्या प्रतिजरठेन महर्षिणा सह रन्तु लज्जमानया स्ववस्त्राभरणैरलंकृत्य स्वप्रतिनिधित्वेन प्रेषितामुशिङ्-नामिकां योषितं दासी- इत्यवगत्य मन्त्रपूतेन जलेन श्रभिषिच्य ऋषिपुत्रों-कृत्वा तया सह रेमे । तदुत्पन्नः कक्षीवान् नाम ऋषिः । एतत् सर्वमस्माभिः पूर्वाध्याये विस्तरेण प्रतिपादितम् । अतोऽस्य क्षत्रिय सम्बन्धात् कक्षीवशन् इति नाम उपपन्नम् । दीर्घतमसः परमषैरुत्पन्नत्वेन ब्राह्मणत्वात् प्रतिग्रहोपि
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३५६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) उपपन्न एव । ' - राजाका पुत्र है, तथापि वह राजा स्वयं ( यद्यपि कक्षीवान् कलिङ्ग नहीं कर सकता था, तब उसने दीर्घतमा वृद्ध होनेसे सन्तान उत्पन्न रानीको उसके पास भेजा । पर रानी ऋषिसे प्रार्थना की, और अपनी बहुत ढेके पास जानेमें शरमाती थी, अतः उसने अपने स्थानमें अपनी दासीको भेजा । ऋषिने अभिमन्त्रित जलसे अभिषेक करके उसे ब्राह्मणपुत्री बना दिया । उससे कक्षीवान् पैदा हुआ; सो ऋषिसे पैदा होनेसे ब्राह्मणता होनेसे वह प्रतिग्रह भी ले सकता है ) । यहाँ श्रीसायणाचार्यने स्पष्ट हो कक्षीवान्को ब्राह्मण बताया है, शूद्र नहीं । दासी शुद्रा हो - यह भी प्रावश्यक नहीं । देवयानीकी दासी शर्मिष्ठा शूद्रा नहीं थी, किन्तु ब्राह्मणी थी । -( घ ) श्रीसायणाचार्यकी अन्य साक्षी भी इस विषय में देखिये- ' सच अङ्गराजः सर्वज्ञं तं दीर्घतम ऋषिमवगत्य... एवमवोचत् ' भगवन्! मम पुत्रो नास्ति, एषा महिषी, अस्यां कञ्चित् पुत्रमुत्पादय - इति । स च तथा — इत्यब्रवीत् । सा महिषी तु राजानं प्रति तथा ' इत्युक्त्वा ' प्रयं वृद्धतरो जुगुप्सितो मम योग्यो न भवतीति बुद्ध्वा स्वकीयामुशिक् - संज्ञां दासीं प्राहैषीत् । तेन च सर्वज्ञेन ऋषिणा मन्त्रपूतेन वारिणा प्रभ्युक्षि-ता सती संव ऋषिपत्नी बभूव । तस्यामुत्पन्नः कक्षीवान् नाम ऋषिः ' ( ऋसं. १।५१।१३ ) । इसका तात्पर्य लिखा जा चुका है । पूर्व- जैसा होनेसे फिर नहीं लिखा । यहाँपर इस सायणोक्तिसे भी कक्षीवान् ब्राह्मण सिद्ध हो गये । वादी-ने स्वमानित सायणसे विरुद्ध लिखा है; यह खेद है । महाभारत में भी इसकी साक्षो देखिये — ' प्रौशिजश्चैव कक्षीवान्... मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथा-गस्त्यः प्रतापवान् । एते ब्रह्मर्षयो नित्यमास्थिता दक्षिणां दिशम् ' ( शान्ति-पर्व २०८१३० ) यहाँपर प्रौशिज कक्षीवान्को ब्रह्मषिं ब्राह्मण ऋषि कहा गया है, शूद्र ऋषि नहीं । अब सबसे बढ़कर वेदका ही प्रमाण इस कक्षीवान् ऋषि शूद्र नहीं [ ३५७ विषय में देख लीजिये । ' हं मनुरभवं सूर्यश्चाहं, कक्षीवान् ऋषिरस्मि विप्रः ' ( ऋसं. ४।२६ उ १ ) यहाँ पर वेदने भी उक्त ऋषिको विप्र [ ब्राह्मण ] माना है । ' विप्र । ' शब्दकी ब्राह्मणवाचकतामें मीमांसा इस ग्रन्थके १८ उत्तरपक्ष १६२-१९ कह उठा पू. में देखनी चाहिये । इस कारण वादीसे इष्ट कक्षीवान्की शूद्रता निराकृत ६ उद हो गई । जब वे ब्राह्मण सिद्ध हुए, तब उनका लड़का शबर तथा लड़की विभ घोषा भीं ब्राह्मण सिद्ध हो गये । ' सकृदाख्यातनिर्ग्राह्या ' ( महा. ४ | १ | ६३ ) उस ( एकका नाम परम्परा ब्राह्मण कहने से उसके पुत्र - पौत्रादि भी उसी जातिक माने जाते हैं ) ' शवर ' शब्दसे भी घबड़ानेकी आवश्यकता नहीं, ' शवर ' उसका नाम था, जाति नहीं । यदि नामसे उसे अन्त्यज माना जावे, उसे तो मीमांसाभाष्यकार - शबरस्वामी भी भील माने जायें, रामायणके मतङ्ग- अत्य मुनि भी चाण्डाल माने जावें, पर यह अनिष्ट है । बहता पात ( ङ ) ' नैकस्य सञ्चिता सम्पत्तिर्वेदाः, सर्वेषां हि ते । गौतमवचनं वैसी तु श्रवैदिकमेव ' यह वादी के व्यक्तिगत विचार हैं । श्रीस्वामी शंकराचार्य, इति श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य, श्री वल्लभाचार्य, विधा यतिभगवत्पादाचार्य, ( देखो उनका ब्रह्मसूत्रका अपशूद्राधिकरणभाष्य ) वैयासिकन्यायमालाकार, श्रीसायणाचार्य आदि सभी श्राचार्य तथा श्रीमनु, याज्ञवल्क्य, वेदव्यास यादि, वेदके भारी विद्वान थे, उन सबका शूद्रके वेदानधिकार - विषयमें ऐकमत्य है, अतः वादी की इस विषय में अपनी ही बहुत भूल रही है कि वे परप्रत्ययनेय बनकर इस पक्ष के पक्षपाती बने हैं । " शूद्रको कड़ा दण्ड ” राजन गौतमवचन ' अथ हास्य वेदमुपशृण्वतः त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रपूरणम्, ब्रह्म उदाहरणे जिह्वाछेदः, धारणे शरीरभेदः, ( गो.ध सू. २१३४ ) भी ब्राह अवैदिक नहीं है, किन्तु वेदमें शूद्रानधिकारका अर्थवाद है - त्रतः शुद अत्याचार भी नहीं । प्रर्थवादमें यथाश्रुत प्रर्थ नहीं हुआ करता, किन्तु उसका तात्पर्यं देखा जाता है । इसका ' शूद्र वेदको न सुने, न स्वयं करण
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३५७ ३५८ ] करे, न याद करे ' इतने ही अर्थमें तात्पर्य है । वेदके अशुद्ध उच्चारण सुप्रसिद्ध है । शूद्र भी विद्यारहित होनेसे २६ ॥ उच्चारण में वृत्रासुरकाण्ड सुनकर उसके उच्चारणका प्रयत्न वा अनुकरण न कर ले, जिससे हानि विष ' कहीं किसी की हानि कर वठ; यही तात्पर्य उन्हें वेदश्रवण-२६६ उठा बैठे, वा प्रबल - निषेधका है । शासनको कई अनिष्ट दाकृत उदाहरण - उच्चारणमें एं रखनी भी पड़ती हैं, एक प्राधको दण्ड देना भी पड़ता है-ड़की fatfor अपने तथा दूसरेकेलिए हित निहित होता है । ३३ ) उसमें उसका तिके जैसे सरकार ऐसा दण्ड - विधान कर दे कि - ' जो ब्लैकमार्कीटिंग करेगा, उसे फांसी मिलेगी । ' श्रापाततोदर्शीको ऐसा दण्ड प्रखरता है, वह इसे तब अत्याचार मानता है, पर सर्वतोमुखीन दृष्टि वाले को इसमें परिणामहिता-राङ्ग- हा मालूम पड़ती है । वैसे कठिन दण्डविधानसे वैसी परम्परा नहीं बन पाती । वैसा दण्ड एक - प्राधको ही देना पड़ता है, पर विधानमें श्रा जानेसे I तु बंसी परम्परा नहीं बन पाती । रामराज्य में एक शूद्रको दण्ड मिला; शेष-I चार्य, इतिहास में फिर इस काण्डकी प्रवृत्ति नहीं आई । निम्न लोग कड़े दण्डके I चार्य, विधानमें उल्लेख हो जानेसे फिर कोई अव्यवस्था नहीं कर पाते । इसलिए I य ) मनुजीने भी कहा है- ' वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् । तौ हि I मनु, च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेता मदं जगत् ' ( ८४१८ ) ( वैश्य शूद्रको राजा प्रयत्नसे अपने कर्म करावे । वे यदि अपने कर्मोसे च्युत हुए, तो देशमें नही बहुत अव्यवस्था फैल जाती है । राजा राम द्वारा शूद्रको दण्ड देने में जहां धार्मिक कारण था, वहाँ राजनीतिक कारण भी था । तपस्या है ब्राह्मणकर्म - ' शमो दमः तपः शौचं... म् ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ं ' ( गीता १८१४२ ) यह जन्म ब्राह्मणका कर्म है । भी ब्राह्मणने राजासे लेना है, राजाको देना कुछ नहीं । इस प्रकार यदि सभी - त्रतः शूद्र ब्राह्मणकर्म - तपस्या करने शुरू हो जावें; क्योंकि ' एक खबू जेको किन्तु देखकर दूसरा खजा रंग पकड़ता है, इम लोकोक्तिसे शूद्रोंमें अन्धानु-स्वयं करणकी प्रवृत्ति बड़ी प्रबल होती है, तब उनकी ओरसे राजाको कुछ नहीं रामद्वारा शूद्रयमें उपपत्ति [ ३५६ मिलता । इस प्रकार निरन्तर होते रहनेसे राजाकी अर्थ - व्यवस्था पर कड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है । विषैले फोड़ेको बढ़ने से पहले ही जडमूलसे काट दिया जावे - यह प्रच्छा होता है, नहीं तो उससे विष सारे शरीर मे फैलने की आशङ्का रहती है । फिर शूद्रादिका काम है चातुर्वण्यंसेवा प्रर्थात् देश सेवा । देशकी रक्षाकेलिए एवं देश -शत्रुनोंके विनाशके लिए अस्त्र - शस्त्र बम प्रादि तथा यान- विमानादि बनाने पड़ते हैं । शत्रु - सङ्घट निकट मानेसे पहले ही यह कार्य देशमें तैयार कर देना पड़ता है । सो शूद्रादि यदि उस जन्मसिद्ध कर्मको छोड़कर ब्राह्मणोंका कर्म - तपस्या करने चल पड़; तो शत्रुग्रोंकी विघातक प्रवृत्ति बढ़ जानेसे देवकी सङ्कट समस्या बड़ी गम्भीर हो सकती है; तब उसका उपाय यही है कि राजा उस शूद्रको फांसी दे दे, वा उसका गला ही काट दे । इस अवसर पर गान्धिजीका सत्याग्रह - शस्त्र कुण्ठित ही सिद्ध होता है । श्रीराम यदि कड़े - युद्धको छोड़कर लङ्का राक्षसोंके आगे गान्धि - शस्त्र ' अनशन ' ( भूख - हड़ताल शुरू कर देते, जैसे कि हिटलरसे युद्ध करना छोड़कर उसके श्रागे सत्याग्रह करनेकी अग्रे जोंको श्रीगान्धिजीने शुभ (? ) सम्मति दी थी; कि- हिटलरको स्वयं राज्य दे दो । वे यदि शत्रुकी भूमिमें ही पहुंचकर कड़ा युद्ध न करते; तो लङ्काके राक्षसोंका जीतना तो दूर, उल्टा राक्षस ही प्रयोध्यापर आक्रमण भी कर देते । सो प्रतिपक्षीको इन बातोंकी श्रवैदिकता बताना तो अपना अल्प-श्रुतत्व प्रकट करना है । शेष रहा ' समानो मन्त्रः ' मन्त्रसे चारों वर्णोंकी समानमन्त्रताका उपपादन; यह प्रतिपक्षीकी बात ठीक नहीं । एतदादिक मन्त्र एक - कुटुम्बी तथा समानपात्र ( जैसेकि - मीमांसा शावर. ३१५१४३ में स्पष्ट है ) ऋत्विजों-के लिए है, सर्वसाधारणकेलिए नहीं । वेदोंका विषय यज्ञ है, ( न्याय. ४ ) १६२, सिद्धान्तशिरो. गणि. कालमाना. इत्यादि ) देखो इसपर ' श्रालोक ' ( ६ ) ( पृ. १४२-१४६ ) ' मन्त्राश्च कर्मकरणा: ' ( प्राश्व.श्री. १।१।२१ )
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३६० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' अनर्थका हि मन्त्राः ' ( निरुक्त में कौत्स ) इसका यह भाव नहीं है कि-मन्त्रोंके अर्थ नहीं होते । इसका यह भाव है कि- मन्त्रोंका महत्त्व शब्दमें है, अर्थ में नहीं । ' ग्राम्नायस्य क्रियार्थत्वात् ' ( मीमां. १।२1१ ) । यहाँ भी वेदकी प्रवत्ता कर्मकाण्डाथं बताई गई है । महाभाष्य में व्याकरणके प्रयोजनों में अधिकका सम्बन्ध वैदिक कर्मकाण्ड-से बताया गया है । कल्प वेदका हस्तरूप अङ्ग है । उसका सम्बन्ध भी याज्ञिक - कर्मकाण्डसे है । यज्ञिय केवल प्रादिम तीन वर्ण ही हैं- ' ब्राह्मणो वैव, राजन्यो वा, वैश्यो वा, ते हि यज्ञियाः ' ' न वै देवाः सर्वेणैव सवदन्ते, ब्राह्मणेन वेव राजन्येन वा, वैश्येन वा ' ( शत. ३।१२।१६-१० ) ' प्रयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋसं. १११४६१५ ) तब वे ही द्विज, यज्ञ - निप्पादक ऋत्विक् - यजमान यज्ञकी समाप्ति पर उक्त मन्त्रसे प्रार्थना करते हैं, क्योंकि - ऋसं. की समाप्ति में वह यज्ञ - स्तोत्र भी समाप्त हो जाता है । इसलिए श्रीसायणने यहाँ लिखा है-' एषाम् एकस्मिन् कर्मणि सह प्रवृत्तानाम् ऋत्विजां स्तोत्रियाणां वा मन्त्र एकविधोस्तु! ' ( इस एक कर्ममें इकट्ठे स्थित हुए ऋत्विजों वा स्तोत्र बोलनेवालोंका मन्त्र एक जैसा हो ) सो यह उनका इकट्ठे होकर एक-स्वरसे समान ही मन्त्र बोलना इष्ट है । किसीकी स्वर कैसी हो, दूसरेका मन्त्र दूसरा हो, ऐसा यज्ञमें शोभित भी नहीं होता । सो यहां यही ' समानो मन्त्रः ' का तात्पर्य है । और " समानी प्रपा " आदि मन्त्र भी एक कुटुम्बियोंके लिए चरितार्थ हैं । ' अरा नाभिमिव श्रभितः अग्निसपर्यंत ' ( प्र. ३1३०1६ ) ' वत्सं जातमिवान्या ' ( अ. ३ | ३० | १ ) एतदादि - मन्त्र इस विषयमें प्रकाश करते हैं । रथके अरे परस्पर सम्बद्ध एक कुटुम्वको स्मरण कराते हैं । रथ बहुत होते हैं, एक नहीं, इस प्रकार कुटुम्ब भी । मारे अपने ही रथके पहिये में संयुक्त होते हैं; भिन्न - भिन्नोंका भिन्न - भिन्नसे संयोग नहीं होता । ' मन्त्र ' का अर्थ [ ३६१ ३६२ ] ऐसा करनेपर फिर थरोंको काटना पड़ता है, दूसरेमें जोड़ने पर वैषम्य श्राकर उपस्थित होता है । फिर ( १1१०४ इस प्रकार मन्त्रमें उपमित गाय भी अपने बछड़ेसे प्यार करती अपने लड दूसरेसे नहीं । अतः द्विजोंमें एकजोंको मिश्रित करना वेद- प्रतिकूल है तभी श्र है । ' पात्र कि फलतः ' समानो मन्त्रः ' से वादीकी पक्ष सिद्धि नहीं । यहाँ ऋत्विजोंका एक स्वरसे मन्त्रोचारण इष्ट है, जिससे विस्वरताका तो तस्यां घा उपस्थित न हो जाय । वा समान ही मन्त्र बोलना इष्ट है - यह नहीं प्रसंग कि सिद्ध हुआ एक, एक संहिताके मन्त्रको बोले, तो दूसरा भिन्न- संहिताके । इससे उत्त शूद्रय वादीकी = कर्ममें उपहास तथा विघ्न ही उपस्थित होता है । इसमें कोई शूद्रादिक वेदाधिकार - प्रसंग की चर्चा नहीं । कई उक्त - मन्त्रमें चारों वर्णोंका कुछ भी वर्णन नहीं । वैसा कहना विद्यया । प्रतिपक्षीकी कृत्रिमता है । यहां तो ऋत्विजोंका वर्णन है । ऋत्ि पुत्रान् जन बननेका अधिकार केवल ब्राह्मणको है, यह मीमांसा दर्शन ( १२ | ४ | ३८- प्रमाणते ३ ९ -४२ ) तथा ( ६।६।१८ ) में स्पष्ट है । उन्हीं ऋत्विजोंकी समान- वान् भी = मन्त्रता यहां उपपादित है, चारों वर्णोंकी नहीं । आई है- ' गौतमः क ( च ) ' तस्यां कक्षीवदादीन् स शूद्रयोनी ऋषिस्तदा ' का वादीने जो तपस्विनो यह अर्थ किया है कि उस ऋषिने कक्षीवान् यदि लड़कों को शूद्रयोनि । यहां उत्पन्न किया, अर्थात् वे शूद्र थे ' ठीक नहीं । यहाँ अर्थ है कि - तस्यां शूद्र- = नाम उशि योनौ ऋषिः कक्षोवदादीन् जनयामास ' ' शूद्रयोनी ' यह ' तस्यां ' का विशेषण है, शूद्र इति योनि: यस्याः सा शूद्रयोनिः, सो यहाँ ' शूद्रयोनि वाली अर्थात् दासीमें किया - यह अर्थ है, सो उत्पादक ब्राह्मण लड़के भी ब्राह्मण थे, कक्षीवान् आदिको किय तस्यां शूद्रयोनौ दास्यामित्यर्थः । उसने कक्षीवान् श्रादियोंको पैद्य बताया गय उसमें ' क होने से बीजकी प्रधानतावश वे उनके लिए कहीं भी शूद्र नहीं बताया गया ॥ श्रीया । प्रमोघवीर्य ऋषियोंके ब्रह्मवर्चसको क्षेत्रदोष नहीं दबा सकता - यह हम पूर्व जोक बंता चुके हैं । मण तभी तो दीर्घतमाने ' नेत्युवाच महर्षिस्तं ममेमे इति चाब्रवी कोई भी
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[ ३६१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३६२ ] पर फिर ) उनको अपना लड़का माना । नहीं तो ब्राह्मण ( १११०४/४६ कैसे रखे? तब ' शूद्रयोनी ' का अर्थ ' शूद्रायां ' ही है, करती अपने लड़के शूद्र ददो मूढा शूद्रां धात्रेयिकां मम ' ( ५० ) यहाँ शूद्रा ' यह है, सभी ' प्रवमन्य विशेषण दिया है, अतः पूर्वपद्यमें भी ' शूद्रयोनी - शूद्रायां है । ' धायिका ' का, कक्षीवदादीन् एकादश पुत्रान् जनयामास ' यही अर्थ यहाँ तो तस्यां धात्रेयिकायां श्रीसातवलेकरजीने भी इसका यही अर्थ किया है- ' ऋषिने का प्रसंग सिद्ध हुआ । नहीं कि उस शूद्र योनि [ दासी ] में कक्षीवदादि ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये ' तब । इससे वादीकी इष्ट सिद्धि न हुई । शूद्रादिके कई विद्वान् कहा करते हैं कि - ' जात्यन्धो वेदवित् प्राज्ञः पत्नीं लेभे स विद्यया । तरुणीं रूपसम्पन्नां प्रद्वेषीं नाम ब्राह्मणीम् । स ( दीर्घतमाः ) सा कहना पुत्रान् जनयामास गौतमादीन् महायशा: ' ( महा. १।१०४१२३-२४ ) इस ऋत्विक प्रमाणले दीर्घतमाकी ब्राह्मणी स्त्रीसे उत्पन्न गौतमादि लड़कों में ही कक्षी-२ | ४ | ३८० वान् भी था । गौतमादिकी गणना स्कन्दपुराण सह्याद्रिखंडमें इस प्रकार समान- काई है- ' या भार्या दीर्घतमसः प्रद्वेषी परिकीर्तिता । तस्या पुत्रास्त्रयश्चासन् गीतमः कक्षिवान् कलिः । सर्वे वेदस्य द्रष्टारो बभूवुर्वेदपारगाः । पुत्रान् दीने जो तपस्विनो दृष्ट्वा प्रद्वेषी मुमुदे भृशम् ' ( ३५।२६-३० ) योनि कक्षाको वेदद्रष्टा भी माना है, ब्राह्मी प्रद्व ेषी ही का दूसरा तस्यां शुद्र विशेषण । नाम उशिक हो यह सम्भव है । राजा वलिकी दासी में दीर्घतमाने पुत्रों को मित्यर्थः । पेश किया उनमें कक्षीवान् नहीं बताया गया, किन्तु ' काक्षीवत ' ही योंको पैदा बताया गया है, यह बात महाभारतके प्रकृतस्थल पर नतावश | उसमें ' काक्षीवदादीन् ' ( १०४१४८ ) ' काक्षीवदादयः ' या गया ।! उनकेलिए ' प्रधीयतः ' ( ४८ ) साधारण अध्ययन प्राया हम पूर्व आया । फलतः दोनों ही पक्षोंमें हमारी पक्ष -सिद्धि है जोकि कई लोग कहते हैं कि- वेदके कई ऋषि शूद्र चाब्रवीम् । निमाण है । इस विषय में हम पहले ही लिख चुके हैं कोई भी ऋषि शूद्र स्मरण नहीं किया गया । यदि कहीं देखी जा सकती है, ( ४६ ) पाठ है । है, वेदद्रष्टृत्व नहीं । थे- परन्तु यह बात ( पृ. ३४०-३४२ ) लिखा है; तो वहाँ कक्षीवान् शूद्र नहीं था । । ३६३ वह एक पारिभाषिक शब्द है, वास्तविक नहीं है । ज्योतिषके अनुसार ब्राह्मणोंके ' तुलसीराम ' ' दयानन्द ' आदि नामोंका शूद्रवर्ण होता है, पर वे वस्तुतः शूद्र नहीं हो जाते । भगवदाचार्य नामका वर्ग मूषक होता है-वह चूहा नहीं हो जाता । उसकी योनि ' इवा ' बताई गई है, वह वस्तुतः वैसा नहीं हो जाता । इस प्रकार कक्षीवान् तथा कवष भी ज्योतिषानुसार औपचारिक शूद्र वर्ण है, वास्तविक नहीं । जैसे वृक्षोंके, पशुयोंके, पक्षियों के, देवताओंके, ग्रहोंके, सामवेदीय स्तोत्रोंके, वैदिक छन्दोंके कृमि - पतङ्ग श्रादियों के ब्राह्मण - शूद्रादि वर्णं वताये गये हैं, वह वास्तविक शूद्रादि वर्णके नहीं होते, उपचारसे वैसे कहे जाते हैं- इस प्रकार ऋषियोंके इस प्रकार के बताये वर्ण भी औपचारिक हैं, जैसे ब्राह्मण सत्त्वगुणसम्पन्न भी प्रकृतिकी त्रिगुणात्मकतासे त्रिगुणात्मक भी होते हैं, तब वे उपचारसे ' देवो, मुनिः, द्विजो, राजा, वैश्य, शूद्रो, निषादकः । पशुम्लेच्छोपि चाण्डालो विप्रा दशविधाः स्मृताः ' ( ३७१ ) इस त्रिस्मृतिके अनुसार पशु आदि संज्ञा वाले कहे जाते हैं, चाणक्यनीतिमें ११।११-१२-१३-१४-१५-१६-१७ पद्यों में भी उनके लक्षण कहे हैं; वैसे ऋषियोंमें भी ऐसी संज्ञामात्र ही सम्भव है, वास्तविकता उसमें नहीं होती । इस प्रकार वादीका यह पक्ष भी गिर गया । श्रव संक्षेपसे श्री ' सूत ' पर भी प्रकाश डाला जाता है । ( ३१ ) क्या पौराणिक - सूत सूत जाति के थे? ( वीं ऐतिहासिक नूल ) पूर्वपक्ष - ( क ) पुराण में वर्णित रोमहर्षण सूत सूत - जातिके थे । ' क्षत्रि-यात् सूत एव तु ' ( मनु. १०।१७ ) क्षत्रियते ब्राह्मणी में प्रतिलोमसङ्कर सूत उत्पन्न होता है । ( ख ) इसलिए श्रीबलदवने उसे ' प्रतिलोमज ' ( भागव. * १०।७८।२४ ) कहा था । ( ग ) पुरुषोत्तममासमाहात्म्य ( २१५ ) में वह
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३६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अपने आपको भी ' विलोमज ' कहता है, तब प्रतिलोमज होनेसे वह अछूत हुए । ( घ ) इस प्रकार भागवत ( १।१८।१८ ) में भी कहा है । वे शौनकादि-ब्राह्मणोंको पुराण सुनाया करते थे । ( ङ ) सूत्यायामभवत् सूतः ' ( वायु-पुराण ११३३ ) यहाँ सूत स्त्री में सूतका उत्पन्न होना कहा है । ( च ) यदि वह ब्राह्मण होते, तो शौनक ग्रादिका उन्हें कहीं नमस्कार वर्णित होता, पर नहीं है । ( छ ) ' वक्ता देदादिशास्त्राणां त्रिकालामलधर्मवित, इस श्रग्निपुराण के वचनमें उसे वेदादि - वक्ता कहा है- इससे वर्णसङ्करोंका भी वेदमें अधिकार सिद्ध हैं ' ( ज ) श्रीतकरत्नजी ' अछूतोद्धारनिर्णय १३४ पृ. में ( झ ) चौधरी रो.ला. ' अछूतोद्धार ' ३५ पृष्ठमें, ( ञ ) श्री काव्यतीर्थं ' जातिनिर्णय ' ( २७६ पृष्ठ ) में, ( ट ) श्री रा.चं. शास्त्री ' पतितोंकी शुद्धि सनातन है ' ( ४२ पृ. ) में; ( ठ ) श्रीसु.दे. विद्यावाचस्पति ' नमस्तेकी व्याख्या ' पृष्ठ २३ में ) । ( ड ) प्राचीन भारत में दो प्रकारकी परम्पराएं प्रचलित थीं, पहली वेदसे संबद्ध, दूसरी पुराणोंसे संबद्ध 1 पहलीके प्रचारक ब्राह्मण थे- दूसरी परम्पराके प्रचारका श्रेय श्रब्राह्मणों - सूत आदिको प्राप्त है ( पाजिटर - एक अंग्रेज विद्वान् ) उत्तरपक्ष -श्रीलोमहर्षण जातिसूत नहीं थे किन्तु उच्च - ब्राह्मण थे 1 उनका ' सूत ' यह यौगिक उपनाम वा उपधि है, जाति नहीं । वे पुराणा-नुसार यज्ञकुण्डमें उत्पन्न हुए थे । जब वे पुराणसे ही सूत जाति के सिद्ध किये जाते हैं; तब पुराण उनके विषयमें जो कहें, वह वादियों को मान-नीय होना चाहिए । ( १ ) ( क ) ' हरिवंश ' जो महाभारतका अन्तिम भाग है, उसके १ । ४ पद्य में ' सौति ' शब्द आया है । ' सौति ' सूतके लड़के को कहते हैं । इस पर श्रीनीलकण्ठने अपनी टीकामें कुछ लिखा है, उससे वादियोंके प्रयास पर पानी फिर जाता है । वह उल्लेख यह है - सूतः - ' प्रग्निकुण्डसमुद्भ ूत! सूत! निर्मल - मानस! ' इति पौराणिकप्रसिद्धेरग्निजो लोमहर्षणः, तस्य पुत्रः सौतिः - उग्रश्रवाः, न तु ' ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सूतः ' इति स्मृत्युक्तः, क्या पौराणिक सूत सूत जाति के थे? [ ३६५ तद्धितानर्थक्या पत्तः " I अर्थात् पुराण सूतकी अग्निकुण्डसे उत्पत्ति बताते है; अतः ' अग्नि- होने स कुण्डप्रसूत ' होने से उनका नाम ' सूत ' भी प्रसिद्ध है । नहीं तो सूतके लड़के को भी ' सूत ' ही कहा जाता, - जातिका पुत्र नहीं होता, किन्तु व्यक्तिका ही ' ब्राह्मणि ' न कह कर ब्राह्मण ही कहा जाता है । पुत्र रूपमें प्रसिद्ध भी कर्णको कहीं भी ' सीति ' न सतम् ' ( महा. १।१८६०२३ ) सूत ही कहा गया है यहाँ सूत - जाति नहीं उहूर सङ्क ' सौति ' सर्वथा; सुके । ब्राह्मणके नहीं । प्रायश्चित लड़के को । सादि पर्व ४ सूत - जाति वाले पुरुषक ( 3 ) कहकर ' नाहं बरगामि तिरस्कारार्थ । पर लोमहर्षण सूतके किया लड़केको ' सौति ' इस प्रकार तद्धिती इत्र प्रत्ययसे कहा गया है, इससे प्रणाम के सिद्ध है कि सुत यह जाति नहीं, किन्तु नाम है । तिरस्कार विपरी छन्द ' कश्चित् पुमान् ब्रह्मयज्ञे यज्ञकुण्डात् समुत्थितः । स सूतो धर्मवा तोनसङ्करा च मत्पूर्वंपुरुषः स्मृतः । ' ( ब्रह्मवैवतं ब्रह्मखण्ड १०।१३४ ) पुराणं पाठ्या. प्रबंमें क्यों मास तं च ब्रह्मा कृपानिधिः । पुराणवक्ता सूतश्च यज्ञकुण्डसमुद्भवः प्रय रहस्य ( १३५ ) इसी प्रकार शिवपुराण वायवीयसंहिता उत्तरभाग ( ११६ ) में ( ४ ) यहाँ सौतिने अपने पिताको यज्ञ कुण्ड में उत्पन्न कहा है, तब सूत जातिका गोर्वज्ञे व प्रश्न ही नहीं उठता । श्रीमद्भागवतादिमें जो कि सौतिको ' सूत ' कहा द्रेणहवि जाता है, उसमें कारण सूत जाति नहीं, किन्तु जैसे ' जनक ' यह उपाधि व्यजायत थी; उसके उत्तराधिकारी भी सीरध्वज आदि ' जनक ' कहे जाते थे, जैसे प्रधरोत्तरचा आद्य शङ्कराचार्य के उत्तराधिकारी भी ' शङ्कराचार्य ' ही कहे जाते हैं, वैसे पृयुका यज्ञ यहाँ भी जानना चाहिये । पैदा हुआ । ( २ ) यदि लोमहर्षण, सूत जातिके वर्णसंकर होते; तो श्रीबलदेवको को हविसे उसके मारनेमें श्रीमद्भागवत ( १०।७८।३२-३३ ) में ब्रह्महत्या की हवि दवग जाती । जैसेकि - रामायण में सङ्कर श्रवणकुमार ने कहा था कि- ' ब्रह्महत्या. नीचे हो ज कृतं पापं हृदयादपनीयताम् । न द्विजातिरहं राजन्! ( २ / ६३५०-५१ ) -' शूद्रायामस्मि वैश्येन ' ( ५२ ) ( मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, मैं वैश्यशूद्रा द ासग्रहुङ्कर हूँ ), श्रतः मेरे मारनेसे ब्रह्महत्याका डर हटा दीजिये, क्योंकि अभिषवभूि मनिमें इन्द