सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 211–220

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 211–220

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३६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) क्या पौराणिक वृत सूत जाति के थे [ ३६७ आपको ब्रह्महत्या नहीं लगेगी । ) इस प्रकार ' अग्नि- होनसे मेरे मारनेसे उसे मारने पर श्रीबलराम भी ब्रह्महत्याका नहीं; / उङ्कर के सङ्कर होनेपर । अतः स्पष्ट हुआ कि वे ब्राह्मण हैं । महाभा I नहीं । प्रायश्चित न करते में श्रीनीलकण्ठने भी सूतको ब्राह्मण लिखा है । लड़का पर्व ४ श्रध्या ' प्रतिलोमज ' शब्दका प्रयोग उसके पुरुषके ( ३ ) ( ख ) श्रीबलदेवद्वारा शेषके अवतार उनके आगे मुनियोंने उठकर वरयामि तिरस्काराय है । जैसे उनके आने पर न उठनेसे वे सूतके प्रयास किया था । ( १०।७८।२१ ) सूतके इसीसे तिरस्कारके पात्र थे । जैसे ' अवतार, सुपात्र, हजरत, पुण्यजन ( राक्षस ) शाद विपरीतलक्षणा से कुत्सित अर्थ में प्रयुक्त किये जाते हैं, वैसे ही प्रति-सूत - जैसा ' सूत ' शब्द तिरस्कारार्थं ‘ प्रतिलोमज ’ धर्मबाह्य तोनसङ्कराभिधायक प्रथमें क्यों नहीं प्रयुक्त किया जा सकता? वस्तुतः ' प्रतिलोमज ' कहनेका पाठया-पप रहस्य है । वह यह है-समुद्भवः श १ ) में ( ४ ) ( ग - घ ) वायुपुराण ( १ | १ | ३३-३६ ) में कहा है- वैन्यस्य तु जातिका यो वर्तमाने महात्मनः । सुत्यायामभवत् सूतः प्रथमं वर्णवैकृतम् । सूत ' कहा ऐन्द्रेण हविया तत्र हविः पृक्त बृहस्पतेः । जुहावेन्द्राय देवेन ततः सूतो उपाधि व्यजायत ( १ । १ । २ ९ - ३० ) शिष्यहव्येन सम्पृक्तमभिभूतं गुरोर्हविः । थे, जैसे भघरोत्तरचारेण जज्ञे तद् वर्णवैकृतम् ' ( १।३३।३६ ) वेनके लड़के महात्मा ते हैं, वैसे पृयुका यज्ञ जब चालू था; उस समय सुत्या ( यज्ञकी अभिषवभूमि ) में सूत. पैदा हुप्रा । यह एक प्रकारका वर्णविकार था । शिप्य इन्द्र ( क्षत्रिय ) की ह्रविसे गुरु बृहस्पति ( ब्राह्मण ) की हवि दव गई; तब सूत पैदा बलदेवको मन कही । शिष्य ( क्षत्रिय इन्द्र ) की हविसे, गुरु ( ब्राह्मण, बृहस्पति ) की ' ब्रह्महत्या • हवि दब गई । इस प्रकार निम्न ( शिष्य ) के ऊपर तथा उच्च ( गुरु ) के नीचे हो जानेसे यह वर्णविकार हुआ 1५०-५१ ) शूद्रामें पैद इससे स्पष्ट हो रहा है कि - सूत जाति - सूत नहीं थे, ' सुत्या-, क्योंकि प्रभिषवभूमि अर्थात् यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुए थे । पृथुका यज्ञ हो रहा था । प्रनिमें इन्द्रदेवकी हवि भी डाली गई, देवगुरु बृहस्पतिकी भी । उससे सूत उत्पन्न हुए । सूतकी वर्णसंकरताकी प्रसिद्धिका कारण यह है कि देवताओं में इन्द्र क्षत्रिय माने गये हैं और वृहस्पति ब्राह्मण । जैसे कि - ' स वा एप ब्राह्मणस्यैव यज्ञः, यद् एतेन बृहस्पतिरयजत । ब्रह्म हि बृहस्पतिः, ब्रह्म हि ब्राह्मणः । श्रथो राजन्य ( क्षत्रिय ) स्य ( यज्ञः ) यद् एतेन इन्द्रोऽयजत । क्षत्र हि इन्द्रः । क्षत्र राजन्यः ' ( शत. ५ । १ । १ । ११ ) । तब क्षत्रियवर्णं शिष्य इन्द्रके चरुसे ब्राह्मण वृहस्पतिके चरुके अभिभूत होजानेसे उसकी संकरतासे उत्पन्न सूत क्षत्रिय ब्राह्मणी में उत्पन्न सूतके समान हो गया, क्योंकि सूत जातिमें भी क्षत्रिय प्रवरवर्ण होनसे अपनी अपेक्षा उच्च वर्णवाली ब्राह्मणीमें प्रधान करके प्रतिलोमतासे ब्राह्मणत्वको अभिभूत करता है । यहां पर साक्षात् तो वैसा नहीं हुआ, क्योंकि अग्निकुण्डमें न कोई साक्षात् क्षत्रिय मनुष्य था, न ही कोई ब्राह्मण-जातीया मानुषी स्त्री साक्षात् थी । श्रतः सूत, सूतजातिवाले नहीं थे, क्याकि यह योनिज तो ये नहीं; यह तो अग्निसे उत्पन्न हुए प्रयोनिज थे । किन्तु उसके कुछ सादृश्यवश उपचारसे कहीं - कहीं प्रतिलोमज वा विलोमज कहे गये । ब्राह्मणरूप अग्निसे उत्पन्न होनेसे ' अग्निर्वेब्राह्मण: ' इस श्रुतसे वे ब्राह्मण थे । वास्तविक संकर होने पर तो वे ' अस्य ब्रह्मासनं दत्तं ' ( भाग. १०।७८।३० ) ब्रह्मासनके योग्य न होते । क्योंकि - ' व्यासासनोपवेशाच्च शूद्रश्चाण्डालतां व्रजेत् । विप्रस्यैवाधिकारोस्ति व्यासासनसमाक्रमे । धर्माणां श्रुतिगीतानामुपदेशे तथा द्विजः ' ( ११११५ वंशीधरीटीकामें उद्धृत सहिता-वचन ) ब्राह्मणं च पुरस्कृत्य ब्राह्मणेन च कीर्तितम् । पुराणं शृणुमान्नित्यं महापाप दवानलम् ( पद्मपुराण स्वर्गखण्ड ६२२५८ ) इत्यादि पुराण - वचना-नुसार पुराणका सुनना भी ब्राह्मणके अधिकार में होता है । चोधरी रो.ला. जीका सूतजातिको अछूत कहना भी गलत है । अस्पृश्यता तो शास्त्रानुसार चाण्डालश्वपचको होती है, देखो मनु.

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३६८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( १०१५१,५।८५ ) । जाति - सूतको भी कहीं भी अस्पृश्य नहीं बताया गया । उनका कार्य तो “ सूतानामश्वसारथ्यं ' ( १०/४७ ) है । सञ्जय - सूत धृतराष्ट्रका रथ चलाता था, पर उसे कहीं अस्पृश्य नहीं कहा गया । सूतजातिसे प्रसिद्ध कर्णको भी कहीं अस्पृश्य नहीं कहा गया, पर पौराणिक-सूत तो सूत जातिके नहीं थे, किन्तु श्रग्न्युत्पन्न होने से ब्राह्मण थे । ( ५ ) हरिवंशपुराण में भी सूतकी उत्पत्तिका वर्णन इस प्रकार किया गया है- ' एतस्मिन्नेव काले तु यज्ञ े पैतामहे शुभे । सूतः सुत्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः । तस्मिन्नेव महायज्ञ जज्ञ े प्राज्ञोथ मागधः । पृथोः स्तवार्थे तो तत्र समाहूतौ महर्षिभिः ' ( १।५।३३-३४ ) ब्रह्मपुराण ( ४ । ६०-६१ ) नीलकण्ठने यहाँ - ' सुत्यां सोमाभिषवकाले । प्रभिषवः - सोमव-ल्ल्या: कण्डनं रस - निष्कासनार्थम् ' यह टीका की है । ( सोमरस निकालने के समय यज्ञ - कुण्डसे सूत उत्पन्न हुए 1 ) ' कल्याण ' के ' हरिवंश ' में पाठ तो ' सूत्यां ' है पर वहाँ अर्थ किया गया है कि पृथु राज्यत्वकालमें पितामहने शुभ - यज्ञमें सोमके निकालने के दिन सोमका अभिषव करने के समय अर्थात् रस निकालने के समय सोम-लताको कूटते समय महाबुद्धिमान् सूतकी उत्पत्ति हुई । ' ( च ) यहाँ पर तथा वायुपुराणके वाक्य में ' सूत्यायां ' पाठ नहीं, किन्तु ' सुत्यायां ' है, ग्रतः सतजातीय स्त्री भी अर्थ नहीं, वैसा होने पर जातिवाचक ङीषन्त ' सूती ' शब्दका ' ङि ' में सूत्यां ' यह पाठ होता ' सत्यायां ' नहीं । एक पाणिनीयसूत्र ( ४।१।८० ) से ' सूत्या ' शब्द भी बनता है, पर उसका अर्थ ' प्राप्तयौवना ' होता है, जैसा कि बालमनोरमा में लिखा है, पर उस प्रथका यहाँ कोई प्रसंग नहीं । ( ६ ) ' सुत्या ' शब्द ' समज - निषद - निपत- मन- विद - पुत्र ' ( पा. ३1३1 EE ) इस सूत्र पुत्र, धातुको संज्ञामें क्यप् और तुक् करने पर बनता है, स्त्रीत्वके अधिकारमें टाप् हुम्रा । ' सिद्धान्तकौमुदी ' में उसका अर्थ ' अभिषव ' [ सोमयज्ञ ] किया है । श्रमरकोषमें भी ऐसे ही है - ' सुत्याभिषवः सवनं च क्या पौराणिक वूत सूत जातिके थे? ३७० सा ' ( २२८२४७ ) । अतः ' सूत्या ' यह शब्द तथा ' सूतजातीय यहाँ नहीं । तब वे सूत, सूतजातिके भी नहीं । यह शास्त्र ( ज ) जिस पुराणमें श्रीसूतजीको ' वक्ता वेदादिशास्त्राणां ' ' क्षत्रिय वहीं उन्हें स्पष्टरूपसे ब्राह्मण भी कहा है, जैसे कि- ' ब्रह्मणः कहा है निरूपय सुत्याहे वितते सति । पृषदाज्यात् समुत्पन्नः सूतः पौराणिको पौष्करे य वर्णन क [ ब्राह्मण: ] । वक्ता वेदादिशास्त्राणां त्रिकाला मलधर्मवित् दिवः । सूतो [ अग्निपुराण ( ब्रह्माके पुष्करके यज्ञमें सोमरस निकालने के दिन ] || सूत क पौराणिक ब्राह्मण सूत पैदा हुआ, जो वेदादिशास्त्रोंका दही - बीने मागधस कालिक धर्मका निर्मल ज्ञाता था ) । वक्ता था, तथा क्षत्रियों मुनि सूतको कहते हैं— ' न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद् वेदे अन्य क भारते । पुराणे मोक्षशास्त्रे च सर्वज्ञोसि महामते ' ( १।१७ ) ब्रह्मपुरागर्क शास्त्रे | इस इस वचनमें सूतको वेदविद्वान् भी बताया है । शूद्र होनेपर उसे ऐसा न ' पृयुचक्र कहा जाता । क्योंकि शुद्र वा सङ्करका वेदाधिकार नहीं होता । पृयुस्तो = पौराणि स्कन्दपुराणके ब्रह्मोत्तरखण्डमें भी सूतजीको ' तन्मन्त्राणां च माहात्म्यं परनामा तवैव द्विजसत्तम ' ( ११३ ) द्विजसत्तम [ श्रेष्ठ ब्राह्मण ] कहा और पठितः मन्त्रों ( वेदों ) के माहात्म्य जाननेवाला कहा है । तब वेदवक्तत्व वहां क्षत्राद् ब्राह्मणका सिद्ध हुआ, प्रतिलोमजका नहीं । मागव ' जातिभास्कर ' ( पृ. २८१ ) में पं. ज्यालाप्रसादने लिखा है - पुरापा यज्ञे पैत सूत अग्निकुण्डसे उत्पन्न है । और सारथ्यकर्मा सूत संकरजातिसे दूसरा है । महामति ( पं. ८ ) । इससे हमारा पक्ष बहुत पुष्ट हुआ । जब वह सूत पौराणिक प्रथमांशत ( पुराणवक्ता ) है; तत्र पुराणने उसके विषयमें जो कहा । उसे मानना ( च पड़ेगा, यह स्वाभाविक है । प्रतिपक्षी लोग चाहे किसी भी प्रकारका छ है - इस वल लगावें; पर वे पुराणोंसे सूतको कभी जाति - सूत नहीं सिद्ध कर सकते देता है यह हमारी स्पष्ट घोषणा है । पहले क सब्ध ० २४ उससे भि

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३७० / [ ३६६ कौटिल्य अर्थशास्त्रमें जोकि एक प्रामाणिक तथा प्रसिद्ध अर्थ-( ७ ) यह घ है- में ' वंश्यान्मागधवैदेहको [ क्षत्रिया ब्राह्मण्योः ] ' ( ३७१२६ ) शास्त्र ब्राह्मण्यां ] सूतः ( ३।७।३० ) इन सूत श्रादि - सङ्करोंका कहा है ' क्षत्रियात् करके कि - क्षत्रियसे ब्राह्मणी में सूत होता है - इस सङ्कर - सूतका ष्करे य निरूपण करके फिर पौराणिक सूतके विषयमें कहा है- ' पौराणिकस्तु श्रन्यः को दिल वर्णन मृतो मागधश्च, ब्रह्म - अत्राद् विशेष: ' ( ३।७।३१ ) अर्थात् पुराणमें जो " पुराण ] | मृत कहा है, वह प्रतिलोमज सूतसे, घीर पुराण - प्रोक्त मागध, सङ्कर-दही -धीरे मागधसे भिन्न है । इनमें पौराणिक - सूत ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ है, और मागध या तथा क्षत्रियों में श्रेष्ठ हैं । इससे बढ़कर पौराणिक सूत के ब्राह्मणत्वकी सिद्धि अन्य क्या हो सकती है । शास्त्रे इस पर महामहोपाध्याय पं ० गणपतिशास्त्रीकी टीका इस प्रकार है-् यपुराणके ' पृथुचक्रवर्तियज्ञभूम्युत्पन्नस्य पौराणिकस्य सूताख्यस्य, मागधाख्यस्य च ऐसा न पृयुस्तोत्रविधायिनः प्रतिलोमजत्वशङ्काप्राप्ति मनसि कुर्वन् तां परिहरति-' पौराणिकस्तु अन्यः सूतः ' इत्यादि । अस्यार्थ - पुराणप्रवक्ता रोमहर्षणा-माहात्म्यं परनामा यः सूतः, सः अन्यः - उक्तात् प्रतिलोमजसुताद् भिन्नः; यस्तत्सह-है, और पठितः पुराणेषु मागधो नाम, स च प्रतिलोमज - मागधाद् भिन्नः । ब्रह्म-त् यक्षत्राद् विशेषतः - विशेषेण युक्तः । सूतो ब्राह्मणाद् विशिष्टः- उत्कृष्टः । मागधः क्षत्रियाद् विशिष्ट इति । एतच्च तथ्यम्, यतः -'त यैव जातमात्रस्य यज्ञे पैत'महे शुभे । सूतः सुत्यां [ यज्ञाभिषवभूमौ ] समुत्पन्नः सौ येऽहनि पुराणका महामतिः ॥ तस्मिन्नेव महायज्ञ जज्ञे प्राज्ञोय मागध, इति विष्णुपुराण-दूसरा है । नौराणिक प्रथमांशतृतीयाध्याये । ' मानना ( चक्रवर्ती राजा पृथुकी यज्ञभूमिमें उत्पन्न पौराणिक सूत प्रतिलोमज का है इस शङ्काको मनमें रखकर अर्थ - शास्त्रकार श्रीकौटल्य उसका प्रत्युत्तर सकते देता है कि - पुराण- प्रवक्ता सूत - जिसका दूसरा नाम. रोमहर्षण था. वह पहले कहे हुए सङ्कर - सूतसे जो क्षत्रियसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न होता है-उससे भिन्न होता है; इस प्रकार उसके साथ पुरागमें पढ़ा हुआ मागघ क्या पौराणिक - सूत सूत जाति के थे? [ ३७१ भी, प्रतिलोमज - मागधसे भिन्न होता है । उनमें पौराणिक है, और पौराणिक मागध श्रेष्ठ - सूत श्रेष्ठ ब्राह्मण ठीक है; क्योंकि - क्षत्रिय है, और यह ग्रन्थकारकी बात - विष्णुपुराणके प्रथमांशके तृतीयाध्यायमें इसी प्रकार वहां अग्निपुराण यह स्पष्ट है ) । उद्धृत करके कहा है- ' इति व्यासशिष्य- तथा कूर्मपुराणके इस प्रकार के बचन उत्पत्तिः प्रतिलोमज - सूतविलक्षणा पौराणिक सूतस्य योनित एव च; तथैव मागधस्यापि कथ्यते, तथा द्विजत्व, विष्ण्वंदासम्भूतत्व तत्सहपठितस्य प्रयोनिजत्वम् । ( इस प्रकार व्यास के शिष्य पौराणिक सूतकी अयोनिज उसका श्रेष्ठ ब्राह्मण होना, तथा विष्णुके - उत्पत्ति तथा साथ पढ़ा हुआ मागध प्रशसे उत्पन्न होना कहा है, वैसे भी अयोनिज है ) अव इससे बढ़कर हमार पक्षका अन्य क्या पुष्टि हो? ' आलोक ' - पाठक तथा प्रतिपक्षी समझ लें । लाग यह स्वयं ( ८ ) ' अछूतोद्धारनिर्णय ' के प्रणेता, श्रीसूतको प्रतिलोमज मानने वाले श्रीतकरत्नजी अपने ' कोटलीयाथशास्त्र ' में इन सूत्राका अनुवाद लिखते हैं - ' क्षत्रिय से ब्राह्मणीम उत्पन्न सूत कहाता यह सूतजीका वर्णन श्राता है, वह इससे पृथक है । पुराणमें जो है, मागध भा यहा दूसर ही हैं | ये [ सूत एव मागध ] ब्रह्म ( ब्राह्मण ) और क्षत्रियस भी श्रेष्ठ मान गये हैं । ' इससे भी हमारा ही मत सिद्ध हुआ । वे ( तकरत्नजी स्थलको प्रक्षिप्त भी नहीं मानते । क्षत्रियके साथ उनका ) इस शब्द स्पष्ट ही ब्राह्मण वाचक है, तब उनसे कही पोराणिक लिखा ब्रह्म ' प्रतिलोमजता ' उष्ट्रलगुडन्याय ' से कट गई । उनके हामी प्रतिपक्षिगण - श्रीसूतका इस वातको स्वयं समझें । भी ( e ) विद्याभास्कर वेदरत्न, प्रायसमाजी श्रीउदयवीरजीने भी अपनी क्तउ - अर्थशास्त्रकी टीका में उक्त सूत्रोंका अयं यही लिखा है- ' वैश्यसे क्षत्रिया में उत्पन्न हुए मागध तथा क्षत्रियसे ब्राह्मणीमें उत्पन्न हुआ सूत कहाताहै, परन्तु जो सूत और मागघ नामक पुरुष पुराणों में वर्णित किये गये हैं, वे

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३७२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इनसे बिल्कुल भिन्न हैं, तथा ब्राह्मण और क्षत्रियोंसे भी [ दोनों क्रमसे ] श्रेष्ठ हैं । ' ( १० ) अनुसन्धानप्रवीण आर्यसमाजी विद्वान् श्रीभगवद्दत्तजी ' भारत-वर्षका वृहद् इतिहास ' प्रथमभाग - तृतीयाध्याय में लिखते हैं- ' लोमहर्षण आदि तो विद्वान् ब्राह्मण थे ' ( पं. ३ ) यहाँ लोमहर्षण उन्हें पौराणिक-सूतजी ही ब्राह्मणत्वेन इष्ट हैं । उक्त पुस्तकके ६८ पृष्ठमें उन्होंने फिर लिखा है- ' कौटल्य अपने सुप्रसिद्ध वाक्य में पौराणिकसूत और सारथि सूतका भेद बताता है- ' पौराणिकस्त्वन्यः सूतः ' ( अध्याय ६४ ) । ( ११ ) इस प्रकार पौराणिक लोमहर्षण - सूत, ब्राह्मण सिद्ध हुए । इसीलिए ' भविष्यपुराण ' प्रतिसर्गपर्व [ ३ ] द्वितीयखण्डमें शौनक प्रादि-ऋषियोंने सूतजीको ' सत्यं ब्रह्मन्! वदोपायं नराणां कीर्तिकारकम् ' ( २४ | ३ ) में ब्राह्मणके पर्यायवाचक ' ब्रह्मन् ' शब्दसे सम्बोधित किया है । इस प्रकार महाभारतके श्रनुशासनपर्व में - ' देवतानन्तरं विप्रान् तपः-सिद्धान् तपोधिकान् । कीर्तितान् कीर्तयिष्यामि सर्वपापविमोचनान् ' ( १६५।३६ ) इस ब्राह्मणोंके नामकीर्तन के अवसरमें- ' लोमशो नाचिकेतश्च लोमहर्षण एव च । ऋषिरुप्रभवाश्चैव भार्गवश्च्यवनस्तथा ' ( ४६-४७ ) यहां लोमहर्षण और उग्रश्रवाको, जो सूत हैं; यवक्रीत, तथा काश्यप-व्यासादिको भी ब्राह्मण बताया गया है । ( १२ ) श्रीतर्करत्नजीने ' अछूतोद्धारनिर्णय ' पृ. १३४ में प्रतिलोमज-सूतके वंशमें भगवान् कृष्णका जन्म लेना माना है, यदि यह ठीक है; तो श्रीकृष्णजी प्रतिलोमज क्यों नहीं कहे गये? क्षत्रिय क्यों कहे गये? और यह कहाँ लिखा है? तब तो उनके भ्राता श्रीबलरामजी भी प्रतिलोमज सूत होंगे, तो वलरामजीने सूतजीकी प्रतिलोमज - शब्दसे निन्दा कैसे की, जब वे तर्करत्नजीके अनुसार श्राप भी वैसे थे? श्रीकृष्णजी भी उस समय में विद्यमान थे, क्योंकि श्रीवलरामजीने ही श्रीसूतको मारा था, तब यदि श्रीकृष्ण उसके वंशज थे, तो सूतजी क्या उनके पिता थे, क्या पौराणिक सूत, सूत जाति के थे? ३७३ ३७४ वा पितामह, वा प्रपितामह? वा चाचा ताया? वस्तुतः निर्मूल है । यह कर इस ' कूर्मपुराण ' के ' त्वया सूत! महाबुद्धे! भगवान् ब्रह्मवित्तमः दिदृक्षया इतिहास - पुराणार्थं व्यासः सम्यगुपासितः । त्वं हि स्वायम्भुवे यज्ञे ॥ तं दृष्ट्व सुत्यादे पूजया F वितते सति । सम्भूतः संहितां वक्तु स्वशिन पुरुषोत्तम: ' ( हे महावृद्धिः वाले सूत! तुम भगवान्, ब्रह्मविदोंमें श्रेष्ठ ( ब्राह्मण ) हो । गुरुरुत्तमः इतिहास - पुराणोंके लिए श्रीव्यासजीकी खूब सेवा की थी । ( १२/१५ यज्ञमें जबकि सोमरस निकाला जा रहा था, संहिता कहनेकेलिए तुम ब्रह्माई उसन प्राशीर्वाद हुए थे; तुम अपने अंशसे पुरुषोत्तम ( विष्णु या कृष्ण ) हो ) इस वचन । शिष्य शिव'! जो म.म. गणपति शास्त्रीकी पूर्वोक्त टीकामें उद्धृत किया गया है, श्री ( १२३ ॥ को पुरुषोत्तमका श्रंश कहा है, सो उसका भाव है कि यह भगवान् विष्णुके अवतार हैं - ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ( सूतजी ) को पुराण ब्राह्मण के गया है सत्क । कहकर भला प्रतिलोमज जिसे प्रतिपक्षी अछूतोद्धार प्रणेता श्रीतकरल समझ ही न सके, श्रीर उनने उसे अनाप - शनाप लिख दिया, सङ्कर से व्यासजी यह उपा कह सकते हैं? आशा है - विद्वान्- ' आलोक ' पाठकोंने यह अच्छी तर्क नहीं । समझ लिया होगा, और प्रतिपक्षियोंने भी ) । ( १ ) ( १३ ) ( छ ) ' यदि सूतजी ब्राह्मण होते, तो शौनकादि उन्हें नमस्कार । चाहिये । करते, पर नहीं किया; अतः यह जातिसूत है ' यह प्रक्षेप भी ठीक नहीं । महाभारत श्रीमद्भागवतके पद्मपुराणीय उत्तरखण्डस्थ माहात्म्य में ' नैमिषे सुतमारी मत्रिय मभिवाद्य महामतिम् । कथामृत रसास्वादकुशलः शौनकोब्रवीत् ' ( १४१३ ) ' अङ्गिरस -श्रीशौनकका सूतको अभिवादन [ प्रणाम ] श्राया है, नहीं तो ब्राह्मण हा प्रङ्गिरा = वर्णसङ्करको अभिवादन कैसे होता? श्रीसूनको इस प्रकार स्कन्दपुराणके द्वितीय वैष्णवखंडस्थ भागवतमाहात्मों ' मुखादग्न भी ‘ नैमिषे सुतमासीनम् अभिवाद्य महामतिम् । कथामृतरसास्वाद कुलमुखसे उल ऋषयोब्रुवन् ' ( २ ) यहां ब्राह्मण ऋषियोंका सूतको अभिवादन ब्राह्मण श है । ( अग्नि:)

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३७४ / शिवपु. व्याससंहिता में ' तस्मिन्नवसरे सूतं पञ्चक्रोश-यह कंपन इस प्रकार समागतं वीक्ष्य [ मुनयः पुरा ते तं ववन्दिरे ( १18 ) दिदृक्षया । गत्वा मुनयो हृष्ट - चेतसः । अभ्युत्थानासनाद्यादि-व्यवित्तमः । तं दृष्ट्वा सूतमायान्त ( २०१५ ) सूत! सूत! महाभाग! त्वमस्मद्-सुत्याई ' पूजया समपूजयन् ( ११।१ ) । देवीभा. में ' नमश्चक्र: पुनः सूत क्षमाप्य च मुहर्मुहुः = महाबुद्धि तुम गुरुरुत्तम ( १२११४१३० : ) यहाँ पर मुनियोंका सूतको नमस्कार तथा सूतका उनको तुम ब्रह्मा प्राशीर्वाद देना सूतका ब्राह्मणत्व बता रहा है । ए उत्पन ' शिवपुराण ' विद्येश्वर - संहितामें ' सूत! सूत! महाभाग! व्यास-इस वचन शिष्य! नमोस्तुते । तदेव व्यासतो ब्रूहि भस्ममाहात्म्यमुत्तमम् ’ है, श्रोत ( १२३११, २०११११, ५।११२ ) यहां भी ऋषियोंका सूतको नमस्कार कहा भगवान् गया है । यही तात्पर्य ' सत्कृतं सूतमासीनम् ' ( १।११५ ) इस श्रीमद्भागवत-ब्राह्मण २ के ' सत्कृतम् ' पदका है । ' सत्कृतम् श्रादृतम् श्रभिवादितम् । ' इमसे सूत तर्करली यह उपाधि वा वंशपरम्परासूचक चिन्ह है । आज भी कथावाचकको सङ्कर को व्यासजी वा सूतजी कहते हैं । यह ब्राह्मण ही होता है; प्रतिलोमज जीत नहीं । ( १४ ) श्रीसूतकी अग्निकुण्डले उत्पत्ति में भी शङ्का नहीं करनी हें नमस्कार । चाहिये । द्रौपदी और धृष्टद्य ुम्नकी भी तो उत्पत्ति अग्निसे ही हुई - यह ठीक नहीं । महाभारतमें प्रसिद्ध है । वहाँ हविः क्षत्रियत्वाभिमन्त्रित थी, अतः वे सूतमारी क्षत्रिय माने गये । निरुक्तमें भी ' अङ्गारेषु श्रङ्गिराः ' ( ३।१७ । १ ) ( शश ३ ) ' श्रङ्गरसः पुत्रास्ते अग्नेरधिजज्ञिर इति श्रग्निजन्म ( ११ | १७ | १ ) यहाँ ह्मण श्रङ्गिरा ऋषिकी उत्पत्ति अग्निसे कही गई है । श्रग्निसे उत्पत्तिके कारण घीसूनको ब्राह्मण कहा गया है । ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' ( यजुः ३१।११ ) माहात्परं ' मुखादग्निरजायत ' ( ३१।१२ ) इससे अग्नि एवं ब्राह्मणकी परमात्मा के वाद- कुल मुतसे उत्पत्ति होने से दोनों सहोदर माने गये हैं । इससे अग्निको भी ब्राह्मण और ब्राह्मणको भी अग्नि कहा जाता है । जैसे कि- ' वैश्वानरः ( अग्निः ) प्रविशति प्रतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ( कठोप. २/११७ ) ‘ ब्राह्मणो क्या पौराणिक - सूत, सूत जातिके थे? ३७५ वैश्वानरः ' ( तै.ब्रा. ३।७।३।२ ) । ' प्रजापतिरकामयत - प्रजायेयेति । स मुखतस्त्रित निरमिमीत । तमग्निर्देवतान्वसृज्यत, ब्राह्मणो मनुष्याणां ' ( तं.सं. ७ | १ | १ | ४ ) तव ब्राह्मणरूप अग्निसे प्रसूत श्रीसूत साधारण-ब्राह्मण नहीं, किन्तु दिव्य प्रयोनिज ब्राह्मण सिद्ध हुए । ( १५ ) जो कि कहा जाता है कि- तायुग में भी सूत जातिका बड़ा सम्मान रहा, राजा दशरथने सून सुमन्त्रको अपना मन्त्री बनाया हुआ था । इस पर जानना चाहिए कि वह सुमन्त्र रथ भी चलाया करता था -इसलिए उसे सूत कहा जाता हो, पर वह सूत - जाति वाला नहीं था । श्रीकृष्ण भी महाभारतमें अर्जुन के रथको चलाते थे, इसलिए सूत हुए; उन्हें ' पार्थसारथि ' कहते हैं, परन्तु इस से उनकी सूतजाति नहीं हो जाती । ' सूतो मातलि: ' ( अमरकोप १११।४५ ) मातलिको इन्द्रका सूत कहा गया है, पर वह सूतजातिका नहीं हो जाता; न हो वैसा कहीं कहा गया है । आज भी मालिक स्वयं घोड़ा वा ' कार ' चलाते हैं; और सूत स्वामीके स्थान पर बैठता है, पर इससे स्वामी सूत - जातिवाला नहीं हो जाता । जब तक वादी पुराण- इतिहासका कोई ऐसा परिपुष्ट प्रमाण न दें, जिससे सूनका पिता कोई क्षत्रिय - मनुष्य कहा गया हो; और उसकी माता को किसी ब्राह्मणकी कन्या कहा गया हो, वा सूतजी के माता - पिता जब तक सूत - जातिके सिद्ध न किये जावें; तब तक सूतजीकी सूत - जाति प्रसिद्ध ही रहेगी; उनके दृष्टान्तसे शूद्रादिका वेदादिमें अधिकार नहीं हो सकता । ( १६ ) एक अन्य भी सूत होता है, जो होता तो ब्राह्मण है, पर प्रतिलोमधर्मा होता है । इसमें उशनाका वाक्य यह है- ' मृषा ब्राह्मण-कन्यायां विवाहेषु समन्वयात् । जातः सूतोत्र निर्दिष्टः प्रतिलोमविधिद्विजः । वेदानर्हस्तथा चैषां धर्माणामनुबोधक: ' इसका अथ ' वीरमित्रोदय ' के संस्कार - प्रकाश, उपनयन संस्कार, श्रनुपनेय - प्रकरण में द्याया है- ' ब्राह्मण-कन्यायां मृषा - विधिहीनेषु ऊढाया: समन्वयात् जातः, अत्र शास्त्रे प्रतिलोम-

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३७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) विधिः प्रतिलोमधर्मा द्विजो निर्दिष्टः । स च वेदानर्हः, तथापि एषां - स्मार्तानां धर्माणाम् अनु पश्चाद् ब्राह्मणं पुरस्कृत्य ब्राह्मणाऽभावे बोधकः - उपदेष्टा भवति । ततश्च विधिविकलविवाहोढब्राह्मणीजातस्य ब्राह्मणस्यैव सूतसंज्ञस्य प्रतिलोमधर्मस्य इदमुपनयनं, न सूतजातेरिति न विरोधः ' ( पृ. ४०६ ) । ( ब्राह्मणकी अवैध - विवाहित कन्यामें ब्राह्मणसे पैदा हुआ ब्राह्मण प्रतिलोमधर्म वाला होता है । वह वेदपर अधिकार तो नहीं रखता; तथापि ब्राह्मण न होनेपर ब्राह्मणको आगे करके स्मार्त - धर्मोका उपदेश कर सकता है । सो ऐसी ब्राह्मणीके लड़के सूत नाम वाले प्रतिलोम-धर्मा ब्राह्मणका ही यह उपनयन है, सङ्कर जातिवाले सूतका उपनयन तो नहीं होता । श्रत: यह विरोध नहीं ) । इससे भी एक ब्राह्मणविशेषकी सूतसंज्ञा कही गई है, उसे उपनयन भी कहा गया है, फलत: वह भी सुतजाति नहीं होता । पर पौराणिक सूत तो उससे उच्च है, उसे वेदवक्ता भी पुराण में यथास्थान कहा गया है । ' मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् ' इस श्रीभागवतके वचन में सूतका वेदमें अनधिकार इष्ट नहीं, किन्तु ' उसका पुराण- इतना वेदमें अभ्यास नहीं ' - यह तात्पर्य है, ' छान्दसेऽस्नातम् ' में ' अस्तात ' का अपारङ्गत अर्थ है, ' अप्रविष्ट ' अर्थं नहीं, अनधिकारमूलक प्रवेश नहीं । क्योंकि पुराण में ही उसे श्रग्न्युत्पन्न एवं ब्राह्मण, और वेदादिका ज्ञाता भी कहा गया है । सो उसका पुराणोंपर जितना अधिकार ( निष्णातता ) है; उतना - वेदोंपर नहीं - यह तात्पर्य है । ( १७ ) श्रीमद्भागवतकी ' भावप्रदीपिका ' टीकामें भी श्रीसूतको ब्राह्मण ही बताया गया है । जैसे कि - ( प्र. ) ननु ' ब्राह्मण्यां क्षत्रियाज्जातः सूतः ' इतिस्मृतेस्तस्य विलोमजातीयत्वेन शूद्रत्वात् ' श्वचर्मणि यथा क्षीरम-पेयं स्याद् द्विजातिभिः । तथा शूद्रमुखात् शास्त्रं न श्रोतव्यं कदाचन ' ( विप्रो वक्ता सुधीः कार्यो विशुद्धोभयवंशजः । इतिहासपुराणानां विप्रान्यो घर्मंहा निकृत् ' ( भाव. प्र. १०।७८।२ ) इति महाभारतादिस्मृतेश्च कथमतीव क्या पौराणिक - सूत, सूत जातिके थे? [ ३७७ विज्ञाः शौनकादयः साक्षाद् वेदरूपं श्रीभागवतं शुश्रुवुः? ( प्र. ) ' ब्राह्मणी में क्षत्रियसे पैदा हुआ सूत - जातिका होता वायुपुराण में स्मृति कहती है, तब प्रतिलोमज होनेसे शूद्र होने के कारण ' कुत्ते के है I यह कुण्ड रखा हुआ दूध द्विजोंकेलिए उपयोग योग्य नहीं होता, वैसे शूद्रके चमड़े मुखर पुराण सुना हुम्रा शास्त्र भी उपयोगके लायक नहीं होता । [ ब्राह्मण वक्ता हो, वो हु उसको सुत वह्मा - जा विद्वान् हो; तथा माता - पिता दोनों कुल उसके शुद्ध हों, उसीसे पुराण- दोषता ब्रा इतिहास सुने । ब्राह्मणसे भिन्न बक्ता धर्महानि करनेवाला होता है, मात्र. ' अग्नि १०७८२ ] इत्यादि महाभारत यांदिके कथनसे प्रतीव विद्वान् शौनक- हायत्व के नादियोंने साक्षात् - वेदस्वरूप श्रीभागवतको सूत - शूद्रसे कैसे सुना? ) ता है । इस प्रश्नका उत्तर इस प्रकार दिया गया है- अदिष्ट धर्म ' नह्ययं जातिसूतः । अस्य उत्पत्तिस्तु वायु - पुराणे ' वैन्यस्य संहिता की उ सुत्यायामभवत् सूतः ' इत्यादि । श्रग्निकुण्डसमुद्ध त! सून! दु इसके पुराणान्तराच्च रोमहर्षणो ' ब्राह्मण्यां क्षत्रियाज्जातः ' इति - जाति सूतो समान जाति किन्तु श्रग्निज: ' ( १ | ११५ ) ' अस्य ब्रह्मासनं दत्तम् ' ( भाग. १० | ७८ | ३० ) बड़े विद्वान् ब्रह्मासनार्हता तु श्रस्य ब्रह्मणसङ्कल्पादेव... ' अग्निवें ब्राह्मण ' इति बने, यह नही श्रुतेरग्निजत्वेन ब्राह्मणत्वादेव । अन्यथा ' व्यासासनसमाक्रमे । धर्माणां- चाहिये ऐस श्रुतिगीतानामुपदेशे तथा द्विज: ' इति संहितोक्तिव्यकुप्येत । वचन तो श्र ' किञ्च ब्रह्मासनं वैशम्पायनहारी पशान्तव्रत- मार्कण्डेयादिसमानः ( १ ) । इसल तत्सजातीय एवार्हति न होनः । न महान्तः शौनकादयो हीनात् परं रहस्वं किया, यह म जगृहुरिति वक्तुं शक्यम्, ' न हीनतः परमभ्याददीत ' इति श्रुतेः । ' नीचादपि इस सन्द उत्तमा विद्या ग्राह्या ' इति तु प्रापत्परं वृत्त्युपयोगिविद्यापर वा । ( नीच- कृत होगई । का तात्पर्य यहां स्ववर्णापेक्षया अपकृष्ट इष्ट है । जैसे कि - उपनिषदों | पुरानोंका ब्रा कपन भी ख कई ब्राह्मण क्षत्रियोंसे ब्रह्म - विद्या सीखने गये, यहाँ नीचका शुद्र या व शूद्रत्वाऽश अर्थ इष्ट नहीं ) श्रतएव तद् ( सूत ) - वधाद् बलरामेण ब्रह्महत्या- शु चीर्णमिति स्मर्यते । ' प्रकाम करक ( उ. ) यह पौराणिक - सूत सूत - जातिका नहीं है । इसकी उत्पत्ति गा ।

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[ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३७७ | ३३ = / प्रकार है- ' वेनके लड़के पृथुके सोम निचोड़नेके समय बापुराण में इस उत्पत्ति हुई । अग्नि कुण्डसे उत्पन्न हे सूत इस यह प्रग्निकुण्डसे सुतकी वचनसे पुराणवक्ता रोमहर्षण - सूत ' ब्राह्मणीं में क्षत्रियसे पैदा के द्वय पुराणके नहीं है । किन्तु अग्निसे उत्पन्न है ' ( १ । १ । ५ ) । इस मुख हुआ सूत - जातिका दिया गया है ( भाग १०।७८।३० ) ब्रह्मासन की इसकी हो, को ब्रह्मासन ही है ।... पुरापषता ब्राह्मण - सङ्कल्पसे इ, भा.ज. ' अग्नि ग्राह्मणवर्णं होता है ' यह श्रुति है । सो अग्निसे उत्पन्न होनेसे शौनक - राह्यमत्व के कारण । नहीं तो व्यासासनपर बैठनेसे शूद्र चाण्डाल हो ) राता है । व्यासासनपर बैठने का अधिकार ब्राह्मणको ही है । उदिष्ट धर्मोके उपदेश में भी ब्राह्मणका ही अधिकार होता ' यह संहिता की उक्ति व्याहत हो जावे । यस्य तु ! इति इसके अतिरिक्त वैशम्पायन - हारीत मार्कण्डेय आदिके समान उनके सूतो मान जातिवाला ही ब्रह्मासन पर बैठ सकता है, हीन नहीं बैठ सकता ।: " बड़े विद्वान् शौनक आदि कभी हीनसे परम रहस्यको ग्रहण करने वाले ८ ( ३० ) 1 बने, यह नहीं कहा जा सकता । क्योंकि - ' हीनसे परम रहस्य नहीं लेना इति धर्माणां चाहिये ' ऐसी श्रुति भी मिलती है । ' नीचसे भी उत्तम विद्या ले ' यह वचन तो अापत्तिकालपरक है, श्रथवा दृत्तिकी उपयोगिनी विद्या के लिए ( ३ ) । इसलिए ही उस सूतके वधसे श्रीबलरामने ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त समानः रं रहस्य किया, यह स्मरण किया जाता है | ) नीचादपि इस सन्दर्भसे भी पौरागिक - श्रीसूतकी वादिसम्मत सूतजातीयता निरा-( नीच • कृत होगई । इससे ' पुराणों का प्रचार अब्राह्मणों द्वारा हुआ, इसलिए निषदों | पुरापका ब्राह्मणोंसे प्रचारित वेदोंसे विरोध है ' ऐसा पश्चिमी विद्वानोंका अव उपन भी खण्डित होगया । श्रव शवरी तथा श्रीवाल्मीकि तथा जानश्रुति शूद्रत्वाऽशूद्रत्व - विषयों पर निर्णय लिखकर अन्त में ' उवट - महीधरके त्या- ( सर्वे शुद्रको यज्ञाधिकार (? ) ' विषय में तथा कुछ अन्य विषयोंपरभी उत्पत्ति | प्रकाश करके ' आलोक'- ग्रन्थमालाका यह तृतीय पुष्प समाप्त किया चना । ( ३२ ) क्या शवरी शूद्रा थी? ( १० वीं ऐतिहासिक मूल ) ( पूर्वपक्ष ) ( क ) शवरी जब शूद्रा थी, श्रीरामने उसके जूठे बेर भी खाये थे, तब शूद्रोंकी भी द्विजोंसे व्यवहार्यता एवं समता तथा वेदादिमें अधिकार सिद्ध हुआ । ( ख ) अथवा यदि वह सन्यासिनी थी तो स्त्रीको .6 यज्ञोपवीत एवं वेदादिका अधिकार भी सिद्ध हुआ । ( श्रीनग. श्रीमा. झा शास्त्री, म.म. ज्ये.रा. जोशी शास्त्री प्रादि ) ( उत्तरपक्ष ) ( क ) - ' शवरी ' । शूद्रा थी; इस वातको अस्पृश्योद्धार के इस युगमें खूब बढ़ा - चढ़ा कर वर्णित किया जाता है, परन्तु हमारा विश्वास-है कि यह धारणा भी भ्रान्तिमूलक है, इस श्रसत्प्रचार में मूल कारण कुछ-पुराने भक्तोंकी एतद्विषयक सूक्तियां भी हैं । तथा दूसरा कारण शवरीका स्वयं नाम भी है । ' शवरी ' भीलनीको कहते हैं । भील - जातिको अन्त्यजों-में गिना जाता है । तब शवरी शूद्रा थी - ऐसा सन्देह स्वाभाविक है | पर वह शूद्रा थी; या नहीं इस बात के निर्णयके लिए उसका मूल- इतिहास ढूंढना पड़ेगा । शवरीका श्रीरामसे घनिष्ठ संबंध है, तब गवरीकी वास्तविकताको जानने के लिए पहले हमें श्रीरामका इतिहास जांचना पड़ेगा | श्रीरामके इतिहासका प्राचीन ग्रन्थ ' श्रीवाल्मीकि रामायण ' है यह वातिप्रति-1 वादिसम्मत सिद्धान्त है । शेष रामचरित्रप्रतिपादक सभी ग्रन्थ इसी ( वाल्मीकि रामायण ) के उपजीवक हैं । उनमें यदि वाल्मीकि रामायणसे विरुद्धता पाई जाए; तो उन ग्रन्थोंके विरुद्ध अंश माननीय नहीं होंगे । आज हम भी उसी रामायणके आधार पर शवरीका शुद्रत्व खण्डित करेंगे, विद्वान् पाठकोंका प्रवधान इवर प्रार्थनीय है । ( १ ) वाल्मीकिरामायण में राघववंश के राज्यका वर्णन आता है, उस में हमें मिलता है कि उसमें अधर्म अर्थात् धर्म विरुद्ध व्यवहार प्रचलित नहीं था । सभी वर्णं अपने - अपने धर्ममें शास्त्रप्रोक्त - स्वधर्माचरणमें निरत

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३८० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' थे । इधर रामायण के चरित्रनायक श्रीराम मनुस्मृतिप्रोक्त धर्मके पक्षपाती थे- यह बात वालि - वध के समय कहे हुए श्रीरामके रामायणस्थ- वचनों से सूचित होती है । देखिये-' श्रूयते मनुना गीतौ श्लोको चारित्र - वत्सली । गृहीतो धर्मकुशलः तथा तच्चरित मया ' ( ४ | १ = | ३० ) ( मनुजीने दो श्लोक कहे हैं; जिन्हें धर्मात्मा लोग ग्रहण करते हैं, मैंने भी तदनुकूल आचरण किया है ) । वे मनुके दो पद्य जो श्रीरामने कहे थे, वे ' मनुस्मृति ' ( ८३१६, ३८ ) में भी मिलते हैं, रामायण ( ४।१८।३१-३२ ) में भी मिलते हैं । जैसे कि-' राजभिघृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा । शासनाद्वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्वियम् ' । यह रामायणमें पाठ है ( पापयुक्त पुरुषोंको राजा द्वारा मृत्यु दण्ड देनेपर वा मूसल मारने से मृतक -कल्प होकर बच जानेपर भी पापी लोग निर्मल होकर स्वर्ग में जाते हैं । पापी पुरुष शासन ( राजदण्ड ) से वा उसके द्वारा छोड़े जानेसे पापसे छूट जाते हैं; परन्तु यदि राजा पापीका शासन नहीं करता, तब उसका पाप राजाको लगता है ( वाल्मी. ४।१८।३१-३२ ) । वर्तमान - मनुस्मृतिमें रामायणसे थोड़ा पाठ - भेद है, वह किञ्चित्कर है । वहुत प्राचीनतामें इस प्रकारके साधारण भेद हो जाने स्वाभाविक हो जाते हैं; क्योंकि- श्रीराम मनुस्मृति खोलकर तो वोल नहीं रहे थे, किन्तु मौखिक ही । अर्थभेद कुछ भी नहीं है । मनुका पाठ यह है-' शासनाद्वा वियोक्षाद् वा स्तेन: [ स्तेन इति सर्वपापस्य उपलक्षणम् ] स्तेयाद् विमुच्यते । प्रशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्विषम् ' ( ८१३१६ ) ' राजभिः कृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मला: स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ' ( ३१८ ) । इधर श्रीरामने किससे किस कारण प्रेम किया, किसको किस कारण क्या शबरी शूद्रा थी? 1351 ३८२ ] मारा - यह भी श्रीरामायणद्वारा अनुसंहित करना पड़ेगा, तब हम शबरीके विषय में विश्वस्त निर्णय करनेके अधिकारी सकेंगे जाकर है-। आइये कहा ' प्रालोक ' पाठकगण! इस कसौटीको अपनाइये, तब सुवर्णक खरे शुश्रूषामन होनेका स्वयं ज्ञान हो जायगा । - खोटे । किया है ( २ ) श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम थे, यह विश्वविश्रुत है । मर्यादा में ' तपः श तोड़नेवालेको वे वध दण्ड भी देते थे- चाहे वह सर्वपूज्य ब्राह्मण | मानी गई न हो, अथवा अवध्या स्त्री ही क्यों न हो - यह भी एक प्रसिद्ध ही क्यों श्रीभगवद् ' ' हत्येष ( श्रीराम ) नियमाद् वध्यान् अवध्येषु न कुप्यति ' ( वाल्मी बात है- शुत्रस्थापि . २ ॥ तपस्या त २।४६ ) । ( श्रीराम वधयोगोंको नियमके अनुसार मार देते हैं; पर अवध्य ( वधके प्रयोग्यों ) पर क्रोध नहीं करते ) रावणको श्रीरामने क्यों स्वभावजम निवन श्रेय मारा, वह तो ब्राह्मण था - चतुर्वेदवित् था! इसलिए कि उसने ब्राह्मणत्ल- हर्ष से की मर्यादा तोड़ रक्खी थी । ताटका स्त्रीको क्यों मारा? शूर्पणखा- ११६१६ नामक स्त्रीके नाक - कान क्यों कटवाये? इसलिए कि इन्होंने भी धर्म-मर्यादा तोड़ रक्खी थी । श्राततायीको दण्ड देकर श्रीरामने - गुरु वा ( शुद्र बालवृद्धी वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । श्राततायिनमायान्तं हन्यादेवा- ६ ) । इस बनाई गई विचारयन् ' ( ८।३५० ) ( गुरु हो, चाहे बच्चा वा बूढा हो, या विद्वान् ब्राह्मण भी हो - यदि वह प्राततायी ( धर्मविरोधी ) हो; तो उसे विचार | मनुना मान अयोध्याम किये बिना ही मार डालो ) इस मनुप्रोक्त सिद्धान्तको अर्घ्य दिया । नगरीकेनि उसी मर्यादा पुरुषोत्तमने शम्बूक शूद्रको क्यों मारा, वह तो तपस्यायें गये हों यह लगा था, जिसका विवरण उत्तरकाण्ड के अतिरिक्त ' श्रूयते शम्बुके हते ब्राह्मणदारकः । जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ' ( महा- ' मनुस्म भारत शान्तिपर्व १५३।६७ ) इत्यादि ग्रन्थोंमें भी प्रावृत्त हुआ है । है - ' वैश्यश क्षोभयेतामि श्रीरामने उसे इसलिए मारा कि शूद्र होते हुए उसने शास्त्र - विष । अपने कम तपस्या की; जिससे एक ब्राह्मणका वालक मर गया । मची ' म शुद्रका त्रैवर्णिक सेवा के अतिरिक्त तपस्या में अधिकार किसी भी धर्म- । श्री देखिये-शास्त्रमें नहीं बताया गया है । श्रीरामकी उपजीव्य मनुस्मृतिमें सप्ट तान् सर्वान

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[ ३५१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३८२ ] न जाकर तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां आइये कहा है- ' एकमेव ' ( ११६१ ) ( प्रभुने शूद्रको केवल एक ही कर्म आदिष्ट खरे - खोटे ' शुश्रूषामनसूया वह इन वर्णोंकी निष्कपटतासे सेवा करे ) और ' मनुस्मृति ' किया है कि सेवनम् ( ११।२३५ ) सेवा से भिन्न शुद्रकी तपस्या नहीं मर्यादा में तपः शूद्रस्य ' शास्त्रं प्रमाणं ते ' ( १६।२४ ) की घोषणा करनेवाली मानी गई । तस्मात् ' ने भी शूद्रोंकेलिए स्पष्ट कहा है- ' परिचर्यात्मकं कर्म बात है- ' श्रीभगवद्गीता स्वभावजम् ' ( १८/४४ ) यहाँपर भी शूद्रका कर्म सेवा कहा है । मी. श शूद्रस्यापि तो ब्राह्मणका कर्म कहा है- ' शमो दमस्तपः शौघं ब्रह्मकर्म हैं; पर तपस्या ( १८।४२ ) पर कर्मके आचरण के लिये वहाँ कहा है- ' स्वधर्मे स्वभावजम् मने क्यों ( नवनं ' श्रेयः परधर्मा भयावहः ' ( ३।३५ ) स्वयं ' रामायण ' ने भी शूद्रोंका ह्मणत. कर्म सेवा लिखा है- ' शूद्राः स्वकर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः ' शूर्पणसा- ( १२६।१ ९ ) । भी धर्म-( शूद्र अपने कर्मों में लगे हुए थे, तीनों वर्णोंकी सेवा किया करते - ' गुरु ' वा ( ३ ) । इस नियमका कारण यह था कि अयोध्या नगरी भी मनुजीसे हन्यादेवा बनाई गई थी । जैसे कि - ' अयोध्या नाम नगरी तत्रासीद् लोकविश्रुता । या विद्वान मनुना ( मानवेन्द्रण या पुरी निर्मिता स्वयम् ' ( वाल्मी ११५१६ ) सो यह से विचार | प्रयोध्या मनुजीसे बनाई हुई श्रादिनगरी थी । जब ऐसा है; तब अयोध्या-TI नगरीके नियम - कानून भी परम्परासे मनुस्मृतिके अनुसार वनाये वा चलाये तपस्यायें गये हों - यह स्वाभाविक है । बुके शु ( महा - ' मनुस्मृति ' में अपने धर्म में न रहनेवाले शूद्र के लिए देखिये क्या लिखा हुआ है । है - वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् । तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः स्त्र- विष्ठ क्षोभयेतामिदं जगत् ' ( ८।४१८ ) अर्थात् राजाको चाहिए कि शूद्रादिसे अपने कर्मोंको कराये, वे जरा अपने कर्मसे फिसले कि जगत्में गड़बड़ी भी धर्म- मत्री | ' मतुस्मृति ' राजाके द्वारा शासन करनेमें क्या कहती है, यह नमें सटता भी देखिये -'नाऽदण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ' ( ८ | ३३५ ) सर्वान् घातयेद्राजा शुद्रांश्च द्विजलिङ्गिनः' ( २२४ ) ( जो अपने क्या शवरी शूद्रा थी? [ ३८३ धर्ममें न रहे; राजा उसे दण्ड दे सकता है । द्विजका लिङ्ग रखने शूद्रको राजा मरवा दे ) वाले जब इस प्रकार स्वधर्मविरुद्ध आचरण करनेवाले शूद्रका शास्त्र सम्मत है, तब उस धर्मशास्त्र के पक्षपाती श्रीरामजीन वध धर्म-शूद्रका वध कर जहां शास्त्रीय व्यवहार किया, वहां राजकीय से शम्बुक-भी ठीक - ठीक पालन किया । तपस्या द्विजका - लिङ्ग नियमका है, शूद्रका नहीं । ( ३ ) इससे स्पष्ट है कि मनुस्मृतिको मर्यादानुसार श्रीराम शूद्रको तपस्याको नहीं सह सकते थे । पर उन्होंने चलने वाले तपस्या की वृद्धि पूछी है । देखिये - कच्चित्ते वर्धते शबरीसे तपोधने! ' ( ३।७४।६ - ९ ) यहाँ उसे ' तपोधना ' बताया तपः? आहारश्च शूद्रा होती, तो उसे तपोधना वा ' तापसी है । यदि दावरी प्रकृत - स्थलमें शबरीके ' ( ३७४१० ) न कहा जाता । धर्मचारिणी, धर्मनिपुणा ' ( ११११५६ ) सिद्धा ' ' धर्मसंस्थिता ' ( ३।७४।६-७ ) आदि विशेषण प्राये हैं । यदि वह शूद्रा और तपस्विनी होती, तो उसे ' धर्मनिपुणा ' न कहकर ' धर्मानभिज्ञा ' कहना चाहिए था । वैसे शम्बूक शूद्रके तपस्या करनेसे ब्राह्मण कुमारको मृत्यु बताई है; वैसे ही शूद्रा शबरीकी तपस्या करनेपर भी अधर्म होनेसे तत्फलस्वरूप किसीकी श्रकाल मृत्यु हो जानी चाहिए थी । पर जब नहीं हुई; तत्र स्पष्ट है कि वह शूद्रा नहीं थी; किन्तु ब्राह्मणी थी । पूर्वोक्त भगवद्गीताके पद्य ( १८/४२ ) में तपस्या ब्राह्मणका कर्म बताया गया है । ( ४ ) अन्य उपपत्ति यह है कि - शबरी को ' श्रमणी ' ( ३०७३।२६, १ । १ । ५६ ) कहा गया है । ' श्रमणी का अर्थ है ' संन्यासिनी ' । देखो वृहदारण्यक ‘ श्रमगोऽश्रमणः ' ' तापसोऽतापसः ' ( ४।३।२२ ) यहाँ श्री-शङ्कराचार्यने ‘ श्रमणः - परिव्राट् ( संन्यासी ) ' ' तापसः वानप्रस्थः ' अर्थ लिखा है । ' वातरशना ह वा ऋपयः श्रमणा बभूवुः ' ( तैत्ति. प्रा. २७1१ ) कुमार-श्रमणादिभि: ' ( पा. २1१1७० ) इत्यादि वचनोंमें ' श्रमण ' शब्द संन्यासी-

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३८४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अधिकार ब्राह्मणको ही होता है । जैसे कि-वाचक है । संन्यासाश्रमका में मनुस्मृति में कहा है- ' ब्राह्मणः प्रवजेद् गृहात् ' ( ६।३८ ) । विष्णुस्मृति चोदिता ' ( ५।१३ ) । ' वैखानस -कहा है - ‘ परिब्रज्याश्रमप्राप्तिर्ब्राह्मणस्यैव ' में कहा है - ' ब्राह्मणस्याऽऽश्रमाश्चत्वारः ' ( १ | १ | १० ) क्षत्रियस्या-गृह्यसूत्र द्यः स्त्रयः । ( ११ ) वैश्यस्य श्राद्यौ ( १२ ); यहांपर शूद्रका किसी श्राश्रम-का वैध विधान नहीं कहा है | ' शुक्रनीति ' में कहा है- ' चत्वार श्राश्रमाश्चैते ब्राह्मणस्य सदैव हि । अन्येषामन्त्यहीनाश्च क्षत्रविट् शूद्रकर्मणाम् ' ( ४१३४० ) ' वर्तयन्त्योन्यथा दण्ड्या या वर्णाश्रमजातय: ' ( ४ | ३४२ ) यहाँ तो स्पष्ट ही शूद्रादिको संन्यासाश्रम लेनेपर दण्ड विधान कहा है । तब स्पष्ट है कि संन्यासिनी-शबरी शूद्रा नहीं थी । ( ख ) शेष है शबरीका संन्यास । सो स्त्रीका संन्यासका वैध अधिकार ' नहीं होता, अत: इसे गार्गी आदि ब्रह्मवादिनी स्त्रीकी तरह अपवाद ही समझना चाहिये, पर इससे स्त्रीका उपवीत एवं वेदादिका अधिकार नहीं हो जाता । संन्यासीको तो वेदाधिकार प्रद यज्ञोपवीतका एवं वैदिक यज्ञोंका ही त्याग करना पड़ता है; तब उसके दृष्टान्तसे स्त्रीका वेद एवं यज्ञोपवीतका अधिकार कैसे सिद्ध हो सकता है? स्त्रीका पतिसम्बन्ध ( विवाह ) ही उपनयन हुआ करता है, सो संन्यासमें उसका वैधव्य अथवा पतिसम्बन्ध त्याग देना ही उपनयन-त्यागरूप संन्यास होता है । अतः यहाँ किसी भी शंकाका अवसर नहीं । ' न वेद - व्यवहारोऽयं संश्राव्यः शूद्रजातिषु । तस्मात् सृजापरं वेदं पञ्चमं सार्ववर्णिकम् ' ( १।१२ ) ' नाट्यशास्त्र ' ( भरतमुनि ) के इस वचनसे शूद्रका चार वेदोंमें अधिकार नहीं; तब शबरीके वेदाधिकारित्वरूप एक-देशी पक्षमें तो उसकी शुद्रत्व - प्रसक्ति सर्वथा नहीं । जहाँ - कहीं शुद्रका वेद-श्रवण दीखे; वहाँ ' नाट्यसंज्ञमिमं वेदं सेतिहासं करोम्यहम् ' ( नाट्यशास्त्र १।१५ ) नाट्यशास्त्ररूप अथवा पुराणेतिहासरूप - पञ्चम - वेदका श्रवण ' क्या शबरी शूद्रा थी? ३८६ ] [ ३८ समझना चाहिये । अस्तु । प्र दूसरा ( ५ ) पहले कहा जा चुका है कि - श्रीरामका व्यवहार ' मनुस्मृति ' के यह ठीक अनुसार था, जैसे कि — उन्होंने बालीको स्वयं कहा था- ' श्रूयते मनुना गीतों ' पारशव '

श्लोकौ चारित्रवत्सलौ । गृहीतौ धर्मकुशलैः तथा तच्चरितं मया ' ( ४ । १८ । ' निष

( ३० ) रामायण में मनुके कहे हुए वे दोनों पद्य ' मनुस्मृति में निषाद दा मिलते भी हैं । वीजिये दोनों की तुलना - ( वाल्मी. ४।१८।३०-३१-३२ यथास्थान ३४ ) । मनु. ८।३१६,३१८ ) । शबरीको यदि भिल्ल - जाति की माना जाय, तो चलाने व वह शुद्र वर्णकी भी नहीं रहेगी, किन्तु अवर्ण एवं अन्त्यज मानी जायगी । धीवरान्त ' व्यासस्मृति ' ( १।१२-१३ ) में भिल्लको श्रन्त्यजोंमें गिना गया है । नाम भी ' अमरकोष ' ( २।१०।२० ) में शबरीको चाण्डाल के भेदोंमें बताया गया है । चलाना ' स्त्री - शुद्र हूणशवरा अपि पापजीवा: ' ( २७।४६ ) इस श्रीमद्भागवतके पद्यमें यदि ' शबर'को ' शूद्र ' से पृथक् गृहीत किया गया है । यह ठीक भी है; क्योंकि शवं चैव शूद्र ' वर्ण ' है, शबर ' अवर्ण ' है । यथाशास्त्र जब इस प्रकार ' शबर ' चाण्डाल सिद्ध हुआ; तब यह जानना पड़ेगा उसका नौजीवन क कि ' मनुस्मृति ' चाण्डालको स्पृश्य मानती है; या अस्पृश्य? उसमें कहा है - ' दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतकां तथा । शवं तत्स्पृष्टिनं स्पष्ट है चंद चाण्डाल स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति ' ( ५/८५ ) यहाँपर चाण्डाल ( दिवाकीर्ति ) को रामाणीय अस्पृश्य कहा है । तब मनुस्मृत्यनुसारी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामने उस अस्पृश्य चाण्डालीको अपना पांव क्यों छूने दिया? क्यों उसका आचमनन्यत प्रतिलोमजन स्वीकार किया? जब किया है, तो स्पष्ट है कि वह शबर- जातिकी । है कि वह नहीं थी, किन्तु श्रीराम भक्ता ब्राह्मणी थी । हो गया ( ६ ) इस पर कहा जा सकता है कि- ' जब श्रीरामने निषाद - गुहका ( 9 प्रालिङ्गन किया और निषाद चाण्डालको कहते हैं ( अमर. २/१०/२० ) । श्रीरामने तब चाण्डाली - शबरी भी उनका चरण - स्पर्श, सकती थी । इसपर मर्जितम् यह जानना चाहिये कि निषाद दो प्रकारका होता कर है । एक अनुलोमय, ली । म स ० ध ० २५