सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 31–40

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 31–40

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६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मनुके मतमें वेदका अधिकार सिद्ध न हुआ । यह ' मनुस्मृति ' सृष्टिकी श्रादिमें बनी हुई मानी गई है । यह श्रीयास्क भी लिखते हैं- ' विसर्गादी [ सृष्ट्यादौ ] मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ' ( ३।४।२ ) । इसपर वादियों का विश्वास न हो, तो वे अपने ' ऋषि ' की बात तो मानेंगे ही । वे लिखते हैं- ' यह मनुस्मृति जो सृष्टिकी आदिमें बनी हुई है, उसका प्रमाण है, ( सत्यार्थप्रकाश ११ वें समु. का आरम्भ १७२ पृ. ) । जव मनुके २।१६८ पद्यमें वेदका अध्ययन न करनेवाले द्विज को अर्थवादसे शूद्र कहा गया है, तब इससे भी शूद्रको वेदका अनधिकार सिद्ध हुआ । ४ इस प्रकार अन्य स्मृतियां भी निषेध करती हैं, जैसेकि - व्यास-स्मृति ( ११६ ) ' वसिष्ठ - धर्मसूत्र ' ( ४१३ ) ' गौतमधर्मसूत्र ' ( २ | ३१४ ) आदि । इसी प्रकार ' महाभारत ' शान्तिपर्व ( ६०।३७ ), सभापर्व ( ४५ ) १६ ), उद्योगपर्व ( २६।२६ ), सभापर्व ( ३६८- ९ ) में शुद्रको वेदका श्रधिकार निषिद्ध किया गया है । अनुशासनपर्व ( ४०।११ ) में स्त्रीको वेदशास्त्रका अधिकार नहीं दिया गया । वाल्मीकि रामायण ( १/६/१६ ) में शूद्रका स्वधर्म सेवा दिलाई गई है । तद्विरुद्ध वैदिक तपस्या करनेवाले शूद्र शम्बूकको श्रीरामने दण्ड दिया । तव शूद्र तद्विरुद्ध वेद पढ़नेके अधिकारी कैसे हो सकते हैं? रामायणमें किसी भी स्त्रीका उपनयन, वेदाध्ययन, गुरुकुल - निवास नहीं दिखलाया गया । रामायणकी नायिका श्रीसीताका छठे वर्ष में विवाह हो गया था, उसका कही भी उपनयन एवं वेदाध्ययन नहीं दिखलाया गया है । इससे रामायणके मतमें भी स्त्री-शूद्रों का वेदाध्ययन निषिद्ध सिद्ध हुआ । वाल्मी. ३।५६ १८ में यज्ञवेदीमें द्विजाति का अधिकार, तथा चाण्डालका अनधिकार बताकर हमारा पक्ष सिद्ध कर दिया गया है । ( ३ ) अव पारस्करादि - गृह्यसूत्रोंका मत भी देख लीजिये । उन्होंने तीन वर्णोंको ही यज्ञोपवीत दिया है; शूद्रको उपनयन एवं वेदाध्ययन नहीं दिया । देखिये ' पारस्कर गृ. ' ( २1१-२-३ ), ' ब्राह्यायण गृ ० ' ( ३ । ४० यथेमां वाचं कल्याणीम् [ ७ १३५ ), जैमिनि गृह्यसूत्र ( १।१२ ), प्रापस्तम्बगृ ० ( ४।१०।२-३ ), गोभिल गृ ० ( २।१०।१-२-३ ), ' प्राग्निवेश्य गृ ० ' ( १११११ ), ' काठक गृ ० ' ( ४१1१-२-३ ), वैखानम गृ ० ( २१३ ) इत्यादि । हिरण्यकेशीय - सत्याषाढ-सूत्रके उपनयन ( १ ९ | १ | १ ) सूत्रमें मातृदत्तने लिखा है — उपनयन त्रैव णिकानामेव स्यात् ' न तु शूद्राणामुपनयनं वेदाध्ययनम् ' इति शूद्रादीनां प्रतिषेधात् । तस्माच्छूद्रसमीपे नाव्येतव्यमित्यादिना तत्समीपेऽध्ययन-प्रतिषेधाच्च । पुंसामेव क्रियते, न स्त्रियाः । स्त्रिया नाव्येयं, न स्त्री - शूद्र-समीपे ब्रह्म श्रावयेदिति स्त्रीणामध्ययन - प्रतिषेधात् । पाणिग्रहो विधि: स्त्रीणामौपनायनिकः परः, इत्युपनयनभक्तित्वाच्च विवाहस्य ' । इसी प्रकार स्त्रीको भी अधिकार नहीं दिया गया, क्योंकि गृह्यसूत्रकारोंने पुंल्लिङ्ग शब्द ( कुमार ) लिया है, इधर उपनयनादिमें उनको जातिपक्ष इष्ट नहीं । जब ऐसा है तो सूत्रकारोंके मतमें भी स्त्री - शूद्रको वेदका अधिकार सिद्ध न हुआ; क्योंकि उपनयन संस्कार होकर उसके बाद ही वेदारम्भ संस्कार होता है । ' लाट्यायन श्रौतसूत्र ' ( ४१३५ ) में शुत्रका यज्ञ वेदीमें अधिकार नहीं माना गया । जब ऐसा है तो विद्यालङ्कारजी किस मुखसे कह सकते हैं कि ' शंकराचार्यजीके अतिरिक्त किसीने भी स्त्री - शूद्रको वेदका प्रनधिकार नहीं दिया । ' ( ४ ) अब जैमिनिजीका भी मत सुन लीजिये- ' अपि वा वेदनिर्देशाद् अपशूद्राणां प्रतीयेत ' ( मीमांसा. ६।११३३ ) यहांपर श्रीजैमिनिजीको चेदके निर्देशसे शूद्रका उपनयन इष्ट न होनेसे शूद्रका वेदाधिकार भी इष्ट नहीं । इयर जबकि जैमिनिजीने ' मीमांसादर्शन ' के छठे अध्यायके प्रथम पादमें सप्तम अधिकरण ही । ' यागे शूद्रस्य अनधिकाराधिकरणम् ' रखा हैं; तब उनके मतमें शूद्रका वेदानधिकार सिद्ध हो गया; क्योंकि यज्ञ वेदका विषय है । इसपर ' आलोक ' ( ६ ) में ' ब्राह्मणभागकी वेदता ' में देखो । इसलिए यज्ञ विषयवाले वेदकेलिए अधिकारपट्ट भी यज्ञोपवीत रखा गया है । तब शूद्रके सर्वथा तथा स्त्रीके स्वतन्त्र यज्ञ तथा यज्ञोपवीत

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= ] श्रीसनातनधर्मालोक. ( ३-२ ) न होनेसे तथा दोनोंकी अविद्या म्वीकृत होनेसे श्रीजैमिनिजीके मतमें भी स्त्री - शूद्रका वेदमें अधिकार सिद्ध हो गया । ' वेदान्तदर्शन ' का अपशूद्रा-धिकरण ( १ | ३ | ३४ | ३८ | ( ६ ) तो बहुत ही प्रसिद्ध है । इसका सभी भाष्यकारों ने शूद्रका वेदानधिकारमें अपना ऐकमत्य ही प्रस्फुट किया है । इस विषयमें ' सन्मार्ग दैनिक ' दिल्ली ( ६।५२४-५३३ ) में हमारी लेखमाला प्रकाशित हो चुकी है । जब वेदके मर्मज्ञ इन प्राचीन प्राचार्योंने ऐसा माना है; और ' यथेमां वाचं मन्त्र इनकी दृष्टिसे दूर नहीं था; तब स्पष्ट है कि स्वा ० द ० प्रोक्त इसका अर्थ ठीक नहीं । ( ५ ) इसके अतिरिक्त इस मन्त्रके तथाकथित अर्थवाला होनेपर वेदमें स्वयं व्याघात उपस्थित हो जायगा । ' वेदमाता प्रचोदयन्तां रावमानी द्विजानाम् ' ( अथर्ववेद शौ.सं. १६७१११ ) यह मन्त्र वेदमें द्विजका अधिकार मानता है । तो यदि ' यथेमां ' मन्त्र सभीको वेदाधिकार दे दे; तव आपस में व्याघात हो जानेसे ' तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तेभ्यः ' ( न्यायदर्शन २।१।५७ ) के अनुसार वेद अप्रमाण हो जाय । और फिर इस मन्त्रमें ' वेद ' शब्द और ' द्विज ' शब्द स्पष्ट है; ' यथेमां वाच ' मन्त्रमें ' बेदवाचं ' शब्द नहीं है; ' वेद ' शब्द वाले मन्त्रमें ' द्विज ' शब्द है, केवल ' वाचं ' वाले मन्त्र में सभी वर्ण हैं; इससे स्पष्ट है कि वेदमें तो ' द्विज ' का ही अधिकार हैं; और साधारण वाणीमें सबका अधिकार है । स्वा ० द ० जीके अनुसार स्मृत्यादि - ग्रन्थोंमें वेदका अधिकारी ' द्विज ' कहा है; उक्त ' वेद ' शब्दवाले मन्त्रमें भी उसका अधिकारी ' द्विज ' कहा है - इनका ' श्रुतेरिवाऽयं स्मृति-रन्वगच्छत् ' इस प्रकार सामानाधिकरण्य सिद्ध हो जानेसे स्पष्ट है कि-‘ यथेमां वाचं ' मन्त्रमें बलात् ' वेदवाणी ' प्रयं करना स्वा ० द ० जीका ठीक नहीं । इससे यह भी सिद्ध हुआ कि जो स्वा ० द ० जीने स्मृत्यादिके वचनोंमें ही द्विजको वेदाधिकारी समझा है; वेदमें इन्हें वेदका अधिकारी ' द्विज ' नहीं दीखा; इसका कारण ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अ. १६७१।१ ) ' श्रयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ. १११४६१५ ) इत्यादि मन्त्रोंका स्वाध्याय यथेमां वाचं कल्याणीन् : न करना ही है । १० ( ६ ) स्वा ० द ० जीको ही स्त्री - शूद्रादिके वेदाधिकार का इस मन्त्र में भ्रम क्यों हुप्रा, इसपर भी विचार कर लेना चाहिये । उसमें कारण यह ' यश है कि उक्त मन्त्रमें उत्तम पुरुषकी क्रिया " प्रवदानि ' का प्रयोग है और. इस मन्त्रका देवता ईश्वर ' है । परन्तु ऐसा करनेपर उक्त मन्त्रका अपने वस अन्तिम प्र से तथा अन्य मन्त्रोंसे विरोध पड़ना है, अतः स्वा ०३० सम्मत केव अर्थ भी ठीक नहीं, यही इस निबन्धमें दिखलाया जायेगा । कथ ' ई ( ७ ) स्वा ० द ० जीने यहाँपर यह भी विचार नहीं किया कि जब हम प्राय अपनी ' संस्कारविधि ' के उपनयन तथा वेदारम्भ संस्कारमें ८-११-१२ I पर वर्षकी अवस्थामें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बालकका ही उपनयन एवं द्विजत्व Iलि तथा वेदारम्भ लिख रहे हैं, तव स्त्री - शूद्रका उपनयन तथा वेदारम्भ न मन्त्र होनेसे वे वेद पढ़ ही कैसे सकेंगे? केवल स्वा ० द ० जीने ही क्या, किसी I[ व भी स्मृतिकार वा गृह्यसूत्रकारने स्त्री तथा शूद्रादिको उपनयन वां I वेदारम्भ नहीं माना, इसपर प्रार्यसमाजी विद्वान् श्री पं ० नरदेवशास्त्रीजी ' राज की सम्मति प्रागे दी जावेगी, तब वे द्विज न होनेसे वेद पढ़ ही कैसे सकते I स्वा हैं? उन्हें सेवासे अतिरिक्त वेदादिपठन किसी भी शास्त्रने नहीं दिया । अपर ( ८ ) इसके अतिरिक्त वेदमन्त्रमें उत्तमपुरुषकी क्रिया था जानेसें स्पष क्या उसका वक्ता ईश्वर हो जायगा? यदि ऐसा है; तो क्या ' अग्निमीले पृष्ठ : पुरोहितम् ( ऋ.शा.सं. १ ९ ११।१ ) में यही अर्थ किया जायगा कि मैं परमात्मा अग्निकी पूजा करता हूं? अन्य मन्त्र भी ऐसे दिये जा सकते हैं । अग्निका अर्थ उसका अधिष्ठाता परमात्मा माना जाता है, अग्नि, का देवता होनेसे यहां प्रतिपाद्य है । यदि ' अहं ' से यहाँ परमात्मा लिया भूया जाय; तो स्तोता तथा स्तूयमान दोनों परमात्मा होनेसे दो परमात्मा माम ऐसी मानने पड़ेंगे । परन्तु वादी भी यहां जीवको प्रतिपादक तथा ईश्वरको है । प्रतिपाद्यः मानते हैं; वैसे ही ' यथेमां वाचं ' में भी समझ लेना चाहिये । * का इस मन्त्रके अर्थ में पं ० नरदेव शास्त्री वेदतीर्थकी सम्मति देखिये - ' अहं देनेव

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१० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यथेमां वाचं कल्याणीम् [ ११ ( e ) ' इस बात के माननेमें हमको नितान्त संकोच है कि यह मन्त्र ' यथेमाँ वाचं ' मनुष्यमात्रको वेदज्ञानाधिकार देनेका विधान करता है । वस्तुतः यह मन्त्र राजधर्म - प्रकरणका है । स.प्र. में उद्धृत भाग मन्त्रका केवल अर्द्धभाग है । मन्त्रका पूर्वार्ध और उत्तरार्ध मिलाकर देखनेसे हमारे कनकी उपयुक्तता सिद्ध होगी । इस मन्त्रका देवता ' ईश्वर ' है, परन्तु ' ईश्वर ' से यहाँ ' परमेश्वर ' अभिप्र ेत नहीं; किन्तु राजा अभिप्रेत है प्रायः जहाँ देवता ईश्वर श्राया है; वहाँ ' राजा ' ही लिया गया है । परमेश्वरकेलिए ' परमेश्वर साक्षात् श्राया है, अर्थात् ' परमेश्वर ' देवता लिखा गया है । यह राजधर्म - प्रकरणका क्यों है? इसलिए कि- १ प्राचीन मन्त्रद्रष्टाने इस मन्त्रका देवना ' राजा ' माना है । २ राजा को देतता [ वर्णनीय विषय ] मान लेनेसे मन्त्रके पूर्वार्ध और उत्तरार्धके अर्थ में विरोध नहीं आता । ३ स्पष्ट रूपसे ' राजा ' ही देवता है, ईश्वरसे वहाँ ' राजा ' ही अभिप्रेत | ४ परमेश्वरको देवता माननेमें उत्तरार्द्धके अर्थका स्वामीजी कृत अर्थसे मेल नहीं बैठता । यह बात स्वामीजीके किये हुए अपने ही भाष्यसे स्पष्ट हो जाती है । देखिये यजुर्वेद भाष्य, त्रिसंगतता स्पष्ट प्रतीत होगी । " ( आर्यसमाजका इतिहास प्रथमभाग १२२-१२३ पृष्ठ ) । ( १० ) अन्य विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि उक्त मन्त्र का वक्ता परमात्मा होता; तो अन्तिम अशंमें ' श्रहं देवानां प्रियो भूयासम् ' ' दक्षिणायाः दातुः प्रियो भूयासम्, अयं मे काम: समृध्यताम्, श्रदो माम् उपनमतु ' ( यजुः २६।२ ) इस प्रार्थनाको प्रपनेलिए कभी न करता । ऐसी प्रार्थना तो कोई दक्षिणा वा धनका अभिलाषी पुरुष ही कर सकता है । देवाधिदेव कैसे कहे कि ' अहं देवानां प्रियो भूयासम् '? ( मैं देवताओं का प्यारा वनूं ) दूसरोंको धन - दक्षिणा देने दिलानेवाला कैसे कहे — ' अहं दक्षिणायै ( षष्ठ्यर्थे चतुर्थी ) दातुः प्रियो भूयासम्? ( मैं दक्षिणा देनेवालेका प्यारा बनूं ) पूर्णकाम कैसे कहे कि - ' अयं मे कामः समृष्यताम् '? ( यह मेरी कामना समृद्ध हो ) " । ' ब्रह्मसूत्र ' के २।१।३४ सूत्रके माध्वभाष्य में कहा है - ' मुक्ता प्रप्याप्त-कामाः स्युः किमु तस्याखिलात्मनः ' ( मुक्त भी प्राप्तकाम होते हैं, वह सर्वात्मा परमात्मा भला प्राप्त काम न होगा? नित्यका सुखी कैमे कहे कि दो मामुपनमतु ' । उक्त मन्त्रसे पूर्व ( २६।१ ) मन्त्र में ' सकामान् अध्वनः कुरु, संज्ञानमस्तु मे प्रमुना ' ( २६।१ ) ऐसी प्रार्थना नित्यज्ञानी परमात्मा कैसे कर सकता है कि मेरे मार्ग सकाम हों; इससे मुझे ज्ञान प्राप्त हो । ' ( ११ ) वादियों को याद रखना चाहिये कि यदि वे हठधर्मसे ' येन केन प्रकारेण ' अपने पक्षको सिद्ध करनेकी चेष्टामें नहीं; तो उन्हें जानना चाहिये कि वेदके अधिकारी - वर्गकी सूचना तो वेदके यादि या अन्तमें ही घट सकती है; तभी ' इमां वाचं ' में ' इदम् ' शब्द उपपन्न हो सकता है । सारी ऋन्वेदसंहिता बन गयी; श्राघीसे अधिक यजुर्वेदसंहिता बन गई; उसके भी २६ वें सूक्तके, उसके भी प्रथम मन्त्रमें नहीं, किन्तु दूसरे मन्त्रमें परमात्माको अप्रासंगिक वेदके अधिकारिवर्गकी चिन्ता कैसे उपस्थित हो गई? ( १२ ) फलतः यहां पर ' ईश्वर ' का परमात्मा श्रयं मानने पर और ' वाचम् ' का ' वेदवाणी ' अर्थ माननेपर बड़े - बड़े दोष प्राप्त हो जाते हैं; परन्तु पहले ' ईश्वर ' शब्द के विषयमें श्रार्यसमाजी विद्वान् डाक्टर मंगलदेव जी शास्त्री अध्यक्ष गवर्नमेंट कालेज बनारसका भी मत हम उपस्थित करते हैं । डाक्टर महाशयने ' संस्कृत- रत्नाकर ' ( जयपुर ) पत्रके ' दर्शनांक ' में ' ईश्वर ' शब्दका इतिहास दिखलाते हुए लिखा है कि - ' ऋग्वेद संहिता ' में तो ' ईश्वर ' शब्द एक बार भी नहीं आया । शुक्ल यजुर्वेद संहिता ' में भी ' ईश्वर ' शब्दका प्रयोग सर्वथा नहीं किया गया । ' सामवेद ' में भी ' ईश्वर ' शब्द एक बार भी नहीं आया । अथर्ववेद संहिता ' में ' ईश्वर ' शब्द पाँच बार आया है, परन्तु वहाँ ' स्वामी ' का अर्थ है, ' परमात्मा ' अयं

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१२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नहीं । ' निघण्टुमें भी ' राष्ट्री, अर्यः ' इत्यादि ईश्वरके नाम आये हैं- वे भी स्वामी वा राजाके अर्थ में प्रयुक्त हैं, परमात्मा अर्थमें नहीं । इसी प्रकार ' निरुक्त ' में भी ' ईश्वर ' स्वाम्यर्थक है, परमेश्वरार्थक नहीं । ब्राह्मण - ग्रन्थोंमें भी ईश्वर शब्द समर्थ वाचक है, परमात्म - वाचक नहीं । श्रौतसूत्रोंमें प्रायः ईश्वर शब्द मिलता ही नहीं । जहाँ है भी, वहाँ परमात्मा अर्थ नहीं । उसी प्रकार धर्मसूत्रोंमें भी । ' कौटिल्य अर्थशास्त्र ' में भी राजार्थक ही ईश्वर शब्द देखा गया है, परमात्मा प्रथमें नहीं । इसी प्रकार अष्टाध्यायी - महाभाष्य में भी ' ईश्वर ' शब्द स्वामी वा राजा प्रथम है, परमात्मा अर्थ में नहीं । यह ' ईश्वर ' शब्दके इतिहासका पहला युग है । मध्ययुग ' मनुस्मृति ' में ईश्वर शब्दका अधिकतर अयं राजा है, कहीं - कहीं परमात्मा भी । अन्तिम युगमें ' भगवद्गीता ' आदि तथा दर्शनों में ईश्वर शब्द परमात्मार्थक ही है " । यद्यपि इसमें हम पूर्णतया सहमत नहीं; तथापि इससे यह तो सिद्धं हुआ कि वेदकालमें ईश्वरका अर्थ ' परमात्मा ' नहीं था, तब ' यथेमां वाच ' इस मन्त्रमें ' ईश्वर देवता ' में परमात्माका श्रयं कैसे हो सकता है? जव परमात्माका अर्थ न हुआ तब स्वा ० द ० प्रोक्त अर्थ भी सिद्ध न हुआ । ( १३ ) अव यह दिखलाया जाता है कि उक्त मन्त्र में ' परमात्मा ' अर्य करनेपर स्वा ० द ० जीके म में बड़े - बड़े दो प्राते हैं । १ उक्त अर्थ कहनेवाले स्वामीजीके मतमें ईश्वर सर्वथा निराकार है; तव कण्ठ तालु आदि न होनेसे ' सृष्टिनियमसे विरुद्ध ' उसने अक्षरात्मक वाणी ही कैसे उपदिष्ट की? क्या उपदेशक निराकार होते हैं? ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, के ११ पृष्ठके अनुसार उसका ' सर्वशक्तिमत्तांका ध्याज तो व्यर्थ है; नहीं तो वह सर्वशक्तिमत्तासे साकार हो क्यों नहीं हो जाता? स्वा ० द ० जीने स.प्र. में लिखा है — ' जो - जो सृष्टिक्रमसे अनुकूल, वह वह सत्य और उससे विरुद्ध असत्य हैं, ( ३ समु. पृ. ३१ ) ' परन्तु क्या सर्वशक्तिमान् व्ह कहाता है कि जो असम्भव बातकों भी कर सके?...... जो स्वाभाविक यथमा वाच कल्याणीम् [ १३ नियम हैं...... उनको विपरीत गुण वाले ईश्वर भी नहीं कर सकता ( स.प्र. ८ पृ. १३३ ) ' ईश्वर भी पूर्वकृत नियमको उल्टा नहीं कर सकता ' ( स.प्र. पृ. ३१७ ) यदि परमात्मा सृष्टि नियम विरुद्ध कुछ कर नहीं सकता; तो बिना शरीर तथा मुखादि श्रवयवके सृष्टिक्रम - विरुद्ध बोल भी नहीं सकता; ( श्री बु ० दे ० विद्यालंकारने भी यही माना है, यह आगे दिखलाया जायना । ) फिर बेद भी उसकी वाणी नहीं बन सकते । २ यह भी प्रष्टव्य है कि जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, प्रतिशूद्र, स्त्री आदि परमात्माके पास स्वामी दयानन्दके अनुसार वेद पढ़ने गये: वे निराकार थे या साकार? क्या ईश्वर उन व्यक्तिविशेषोंको किसी सीमित स्थान में पढता था; वा सर्वव्यापकता में? यदि सीमित स्थानमें पढ़ाता था, तब परमात्मा भी एकदेशी सिद्ध होगया । यदि सर्वव्यापकतामें वेद पढ़ाता था; तो पढ़ने वाले ब्राह्मणादि भी क्या उसकी तरह अविच्छिन्न रूपसे सर्वव्यापक थे, जैसे कि मूर्तिपूजा - खण्डन के समय में स्वामीजी वा उनके अनुयायियों का कथन होता है; नहीं तो उसी तरह मूर्तिपूजा भी मान लीजिये । ३ वह जगत्भरके सब ब्राह्मण, शूद्रादिको पढ़ाता है वा थोडेसे ब्राह्मण, शूद्रादिको? यदि थोड़ोंको, तो उनकी सूची उपस्थित कीजिये । यदि सबको वेद पढ़ाता था, तो वहुतसे वेद- पराङ्मुख कैसे हो गये? ४ उसने भूतकालके ब्राह्मणों को पढ़ाया था, या वर्तमानकालके ब्राह्मणादिको भी? यदि वर्तमानकालके, तो यह प्रत्यक्ष विरुद्ध है । यदि उसने भूतकालीन ब्राह्मणादिको पढ़ाया, वर्तमानकालके नहीं, जैसा कि -स्वामीजीने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाके १३ पृष्ठमें लिखा है कि - ' न सृष्टेरा-रम्भसमये पठन - पाठन क्रमो ग्रन्थश्च कश्चिदपि श्रासीत्, तदानीमीश्वरोपदे-शमन्तरा न च कस्यापि विद्यासम्भवो बभूव ' तब वेदमें भूतकालका इतिहास भी सिद्ध हो गया । तब स्वामीजीके सिद्धान्तानुसार वेद अनित्य भी सिद्ध हो गये । क्योंकि परमात्मा वर्तमानकालके ब्राह्मण - शूद्रादिको वेदका

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३ ना १४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) उपदेश देना नहीं दीखता । उस समय वेद पढ़ानेके समय वेदमें ' ययेमां वाचम् ' मन्त्र था, या नहीं? यदि था, तो ' इतिहास जिसका हो उसके जन्म गे के पश्चात् लिखा जाता है, वह ग्रन्थ भी उसके जन्मके पश्चात् होता है. ( स.प्र. ७ समु. १२७ पृष्ठ ) स्वामीजीकी इम अपनी उक्तिसे विरोध पड़ता है । यदि वह मन्त्र उस समय वेदमें नहीं था, अव दिखाई पड़ रहा होनेसे वेद प्रक्षिप्तता भी सिद्ध हो गई । तब तो उनके अनुसार वेदके प्रामाण्य में भी सन्देह उपस्थित हो गया । I ५ यदि परमात्मा सदा ही ब्राह्मण - शूद्रादिको वेद पढ़ाता है, तो द करोड़ों पुरुष वेदानभिज्ञ क्यों हैं? अभिज्ञोंमें भी अर्थों में विवाद क्यों? न या फिर वेद पढ़ानेकेलिए गुरुकुलोंमें करोड़ों रुपया व्यर्थ व्यय क्यों किया T जा रहा है? क्या परमात्मा वेदकी पाठन - शैलीसे अनभिज्ञ है कि उसका 7 पढ़ाया तो लोग भूल जाते हैं, पर आर्यसमाजी विद्वानोंसे पढ़ाया उन्हें याद रह जाता है? तब परमात्मा सर्वशक्तिमान् कैसा? ६ परमात्मा वेद आर्थीको पढ़ाता है, श्रथवा ईसाई, मुसलमान श्रादियोंको भी? यदि आयको ही, तो वह संकुचिताशय हो गया, ' महाशय ' क्यों नहीं हुआ? ऐमा होनेपर यदि वह द्विजसे भिन्नोंको वेदका अधिकार नहीं देता, तो इसीसे वह संकुचिताशय क्यों माना जाता है? यदि वह मुसलमान ईसाई प्रादिका पढ़ाता हैं, तो उनका नाम मन्त्रमें क्यों नहीं? ‘ आवदानि जनेभ्यः ' कहकर भी पृथक् ब्राह्मणादि नाम कहने उससे भिन्न मुसलमान - ईसाई आदि यहाँसे हटा दिये गए, नहीं तो ' जनेभ्यः ' कहनेसे हो सब पुरुषोंका ग्रहण सम्भव होनेसे फिर ब्राह्मण आदिका नाम-ग्रहण व्यर्थ एवं प्रसाभिप्राय हो जाता है । तब इस मन्त्रमें ईसाई -न मुसलमानादि न श्रानेसे इस मन्त्रसे ' सवको ' अर्थात् मनुष्यमात्रको वेदका वादिसम्मत अधिकार सिद्ध न हुआ । तब इमसे वेदका अधिकार सीमितोंका I सिद्ध होनेसे वदि वह परमात्मा सनातनधर्मियों के अभिमत अनुसार द्विजोंके अतिरिक्त अन्योंको वेदका अधिकार नहीं देता, तब वह उपालम्भयोग्य . यथेमां वाचं कल्याणीम् [ १५ सिद्ध न हुआ । ७ अथवा यदि परमात्मा सभीको वेद पढ़ाता है, अथवा यदि पहले केवल श्रार्य ही ये, तब मुसलमान आदि बेदको न मानदेवाले कहाँस निकल पड़े? क्या परमात्मामें अपने शिष्योंके अनुकूल करनेकी शक्ति भी नहीं? यदि नहीं, तो जैसे स्वामीजीने ईश्वर - मूर्तिसे मूषक द्वारा नैवेद्य उठा लेनेपर उसकी साकारता खण्डित कर दी, वैसे व उसके शक्ति-मान् सिद्ध होनेपर उसकी निराकारता हटाकर नास्तिकता स्वामीजीने क्यों नहीं अपनाई? क्या उनकी सब जगह अपनी इच्छा ही प्रमाण है? यदि ऐसा है तो उन्हें स्वेच्छाधर्मी ही माना जावेगा, वैदिकधर्मी नहीं । ८ इस मन्त्रमें स्वामीजी ' स्त्री और सेवक का नाम भी कहते हैं, पर इस मन्त्रमें उनका नाम दिखाई नहीं पड़ता । तब इस मन्त्रके श्रर्थमें उनक: प्रक्षेप कैसे? स्वामीजीने ' स्वाय ' इस पदका ' स्त्री, सेवक ' अर्थ किया है, परन्तु वह अर्थ ' स्वाय ' का कैसे हो सकता है? क्या वादी लोग निराकारकों स्त्री तथा नौकर भी मानते हैं? ' अरण ' का प्रतिशूद्र अर्थ कैसे? वस्तुतः ' स्वाय ' का अर्थ है ' अपने कुलमें उत्पन्न हुएके लिए ' ' अरणाय ' का अर्थ है ' अन्य कुलजात ' जैसे कि - ' निरुक्त ' में ' परिषद्य ' ह्यरणम्य रेक्णों ( ऋ. ७।४।७ ) इस तथा ' नहि ग्रमाय अरण: ' ( ऋ. ७ । ४ । ८ ) इस मन्त्रमें । ( १४ ) इसके अतिरिक्त उक्त मन्त्रका यदि स्वामी दयानन्द - प्रोक्त श्रर्थं माना जावे, तो इससे स्वामी दयानन्दजीसे अभिमत गुणकर्म कृत वर्णव्यवस्था भी खण्डित हो जाती है । देखिये - १ यहाँपर प्रष्टव्य है कि-ब्राह्मणादि वर्णं इस मन्त्रमें परमात्माको जन्मसे अभिमत हैं, वा गुणकर्म से? यदि जन्मसे, तब तो वर्ण - व्यवस्था परमात्माको जन्मसे अभिमत हो गई । यदि गुणकर्मसे यहाँ ब्राह्मणादि इष्ट हैं, तो वेदाध्ययन रूप गुण कर्मसे पहिले ही उनकी ब्राह्मणादि संज्ञा कैसे हो गई? और फिर वेदाध्ययनसे क्षत्रिय, वैश्यकी संज्ञांका क्या सम्बन्ध? यदि यह संज्ञा

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१६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यथेमा याच कल्याणीम् [ १७ उनकी जन्मसे नहीं थी, तब परमात्माने ' ब्राह्मण शूद्रादिको मैं वेद पढ़ाता हैं यह कैसे बताया, अथवा ' परमात्माने ब्राह्मणादिको वेद पढ़ाया ' यह कैसे जाना गया? ३ परमात्मा ब्राह्मण तथा शूद्र - अतिशूद्रादिको वेद बरावर पढ़ाता है । या न्यूनाधिक अर्थात् विषमतासे? यदि विषमतासे, तो पक्षपाती सिद्ध हो गया । ४ वह पक्षपात उन वर्णोंके जन्मसे है या गुणकर्मसे? यदि जन्मसे, तो परमात्माको जन्मसे वर्ण - व्यवस्था इष्ट हुई । यदि गुण - कर्मसे यह पक्षपात है, तो चारोंका वेद पढ़ाना तो प्रभीसे प्रारम्भ हुआ । है, तव पढ़ने वालोंमें कर्म - तारतम्य कैसे हुआ? ५ यदि इसमें पूर्व जन्मका कर्म-वैषम्य कारण है, तब ब्राह्मण - शूद्र यादि भी पूर्व जन्म के कर्मसे सिद्ध हुए, इस जन्मके गुणकर्मसे नहीं, यह मनातनधर्मका सिद्धान्त ही विजयी हुप्रा । जैसे कि न्यायदर्शनके ३।२।६ ९ सूत्रके वात्स्यायनभाष्यमें उच्चामिजन और निकृष्टाभिजनादिरूप शरीरोत्पत्तिका कारण पूर्व - जन्मका कर्म माना है । ६ यदि परमात्मा सबको साम्यसे पढ़ाता है, तब क्या उसमें इतनी भी शक्ति नहीं कि वह सब अपने शिष्यों को पूर्ण विद्वान् वा एक वर्णका बना दे । ७ स्वामीजीके इस अर्थ को माननेवाले शिष्य महाभारतानुसार तो । मानते हैं कि -मादिमें केवल ब्राह्मण ही थे, अन्य वर्ण बादमें बने । इसमें वे कौनसी वात ठीक मानते हैं? ८ यदि परमात्मामें सबको एक वर्ण बनानेकी शक्ति नहीं, तब वह सर्वशक्तिमान् कैसे? यदि शक्ति है तव उनमें चार संज्ञाए ं कैसे हुई? अथवा क्या यह व्यवस्था बनी हुई है कि-एक वेद पढ़ें तो शुद्र, दो वेद पढ़े तो वैश्य, तीन वेद पढ़े तो क्षत्रिय, चार पढ़े तो ब्राह्मण? यदि यह व्यवस्था बनी हुई है, तो मैं ' चार वर्णों तथा प्रवर्णों को चारों वेदोंकी वाणीका उपदेश करता हूँ ' यह स्वामीजीका यं खण्डित होता है । इससे स्पष्ट है कि परमात्मा जन्मसे इन चारों वर्णों को मानकर उनके पढ़ानेमें उनके अधिकारके अनुसार वैषम्य करता है, सबको नहीं पढ़ाता । अन्य यह भी प्रष्टव्य है कि वे ब्राह्मणादि पहले वेदसे भिन्न अन्य शास्त्र भी पढ़े हुए थे, या नहीं? यदि पंढ़े हुए थे, तो वेद उन शास्त्रोंसे पीछेकी रचना हुई । यदि नहीं पढ़े हुए थे, तो उनको वेदोंकी प्रारम्भमें ही समझ कैसे आ गई? १० परमात्माने उन्हें वैदवाणी ही पढ़ाई, वाँ अर्थं भी समझाए? यदि अर्थ हो समझाए, तो वेदवाणीका उपदेश उन्हें पहलेसे ही सिद्ध हो गया, फिर ' परमात्माने चारों वर्णोंको वेद पढ़ायें यह स्वामीजीका अर्थ खण्डित हो गया, फिर अथत्मिक ब्राह्मण- भांग भी परमात्म - प्रणीत होनेसे वेद सिद्ध हो गया! यदि परमात्माने उन्हें वेद-वाणीका ही उपदेश किया; अर्थका नहीं तब उन्हें अर्थ- ज्ञान कैसे हो गया? ११ उस समय अग्नि, वायु, रवि, अङ्गिरा -- ये चार स्वामीजी से अभिमत ऋषि भी वेद पढ़नेमें शामिल थे या नहीं? यदि थे, तो उनका नाम यहाँ क्यों नहीं आया? यदि नहीं थे, तो उन्होंने फिर स्वामीजीके मतानुसार संसारको एक - एक वेदका सृष्टिकी आदिमें उपदेश कैसे दिया? क्या उस समय जगत्भरके ब्राह्मण - शूद्रादि परमात्मासे पढ़ाये गये वेदको भूल गए? क्या यह भी वेदमें कोई क्रमिक इतिहास है, क्योंकि स्वामीजीने ' लग्ने! देवेषु प्रवोचः ' ( ऋ. १।२७।४ ) यहाँ ' जगदीश्वर! एवं सृष्ट्यादी जातेषु पुण्यात्मसु श्रग्निवाय्वादित्याङ्गिरस्सु मनुष्येषु प्रोक्तवान् ' । यह भी कहा है । क्या यह वेदमें भिन्न - भिन्न कालका वर्णन भी म मानते हैं? १२ यह चारों स्वाम्यनुसार ब्राह्मण थे – इनमें परमात्माने किसी स्त्री तथा शूद्रको क्यों रखवानां ग्रादिष्ट नहीं किया? क्या उस ऋग्वेदके समयमें परमात्मा सनातनधर्मी थे, और यजुर्वेदमें ' यथेमां वाचं मन्त्र श्राते - आते श्रार्यसमाजी हो गए, और अथर्ववेदमें फिर द्विजोंकेलिए ' वेद रखकर अन्तमें सनातनधर्मी हो गए! १३ स्वामीजी पूर्ण विद्वत्तासे ब्राह्मण तथा पूर्ण मूर्खतासे शुद्र बनना मानते हैं । यदि परमात्मा उनके किए अर्थके अनुसार पूर्ण विद्वान् को फिर सं ० २

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१८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वेद पढ़ाता है; तो परमात्मा भ्रान्तिमान् सिद्ध होता है, क्योंकि पूर्ण-विद्वान्को फिर वेद क्यों पढ़ाए? यदि फिर भी पढ़ाता है और भ्रांतिमान् भी नहीं है, तो इससे स्पष्ट है कि वे ब्राह्मण पूर्ण - विद्वान् नहीं थे, किन्तु अपूर्ण विद्वान् थे । तभी तो परमात्माने उन्हें वेद पढ़ाया यदि ब्राह्मणगण अपूर्ण विद्वान थे, तो वे ब्राह्मण ही कैसे रहे? यदि वे । ब्राह्मण ही न रहे, तो परमात्माने ब्राह्मणोंको वेद पढ़ाया - यह स्वामीजी-का कहना गलत सिद्ध हो गया । श्रथवा जन्मसे उनकी ब्राह्मणता मानने पर परमात्माके मतमें वर्णव्यवस्था जन्मसे सिद्ध हुई । १४ स्वामीजीके मतके अनुसार अत्यन्त मूर्ख ही शूद्र - पदको प्राप्त करता है, तो क्या परमात्मा नहीं जानता था कि यह प्रत्यन्त मूर्ख है, इसका र पढ़ाना व्यर्थ है, मैं इसे क्यों पढ़ाता हूं? यदि वह यह नहीं जानता, तो वह अल्पज्ञ सिद्ध होता है । यदि वह पढ़ाये जा सकने योग्य शूद्रको पढ़ाता है, न पढ़ाये जा सकने योग्य शूद्र वा अतिशूद्रको वेद नहीं पढ़ाता, तो फिर वेद स्वामीजीके अनुसार मनुष्यमात्रकेलिए नहीं रहते, जैसेकि— स्वामीजीके यह शब्द हैं कि – ' मनुष्यमात्रको वेद पढ़नेका अधिकार है '. ( स.प्र. ३ पृ. ४४ ) । और फिर परमात्मा अपनी उक्तिसे विरुद्ध भी सिद्ध होता है, क्योंकि वह ' श्ररण ' को भी वेद पढ़ाता है, जिसका अर्थ स्वामी-' जीने ' अतिशुद्रादि ' किया है । . १५ यदि परमात्मा, जान - बूझकर ही शुद्र - अतिशूद्रादिको वेद पढ़ाता है, तब वह पढ़ाए जा सकने योग्यको शुद्र कैसे कहता है? वेद पढ़े हुए शूद्रको फिर वह ब्राह्मणादि क्यों नहीं मानता? इस प्रकार अपूर्ण विद्वान्‌को भी वह ब्राह्मण क्यों कहता है? इससे स्पष्ट है कि स्वामीजीके किये हुए अर्थके अधीन भी परमात्मा वर्णव्यवस्था जन्मसे ही मानता है, क्योंकि वह वेद पढ़े भी शूद्रको शूद्र कहता है; ब्राह्मण नहीं । अब स्वा.द. जीकी इच्छा है कि अपने अभीष्ट सिद्धान्तके प्रचारक ईश्वरको अपने सम्प्रदायसे बाहर कर दें, अथवा फिर ' अहम् ' पदसे ' परमेश्वर ' अर्थ और यथेमां वाचं कल्याणीम् [? a ' वाचं ' का ' वेदवाणी ' अर्थ न मानें; जिसमें शतशः दोष उपस्थित होते हैं । क्योंकि - तव वेदमाता '... द्विजानाम् ' ( अथर्वसं. १६७१ | १ ) इस मन्त्र से भी उक्त मन्त्रका विरोव पड़ता है - ' वेदमाता द्विजानां पावमानी ' यह शब्द स्पष्ट हैं । शूद्रको एकज माना गया है, ' द्विज ' कहीं नहीं माना गया; और उसे द्विजत्वका अधिकार भी कहीं नहीं दिया गया । उसे तो कृच्छ्रकर्म सेवारूप तपकी ही प्राज्ञा है, जैसा कि वेदमें ही कहा है-' तपसे शूद्रम् ' ( यजुः ३०१५ ) इसका श्रार्यममाजी भी यही अर्थ मानते हैं । ( देखो हम पुष्प ) स्मृतिमें भी कहा है- ' तपः शूद्रस्य सेवनम् ' ( मनु. ११।२३५ ) । श्राजकलके विद्वान् भी इसका यही अर्थ करते हैं । इसके श्रतिरिक्त ' यथेमां वाचं ' मन्त्रमें ' वेदवाच ' पाठ भी नहीं, फिर इससे सबको वेदाधिकार कैसे सिद्ध हो सकता है? नहीं तो विविध वेदमन्त्रोंमें परस्पर-विरोध होनेसे वेद श्रप्रमाणित हो जाए । - ( १५ ) अन्य प्रश्न यह है कि ब्रह्म - राजन्य आदि शब्द उस उस वर्ण वा जाति में रूढ इष्ट हैं, या यौगिक? यदि रूढ, तो वेद रूढ शब्द भी सिद्ध हो गये, तो वादियोंका वेदमें केवल यौगिक शब्द मानना खण्डित हो गया । यदि यह शब्द यहाँ यौगिक हैं, तो यह बात यहाँ कैसे घट सकती है, क्योंकि - वेद - पठन कर्म तो पांचोंका एक ही कहा है, तो तदनुसार या तो सभी ब्राह्मण हो जाते, या सभी शूद्र, अन्त्यज नामधारी हो जाते । इससे स्पष्ट है कि इनकी यह संज्ञा वेद पठनादि कर्म - मूलक नहीं, किन्तु जन्मसे रूढ है, जिससे वर्णव्यवस्था जन्मसे सिद्ध होती है । नहीं तो सृष्टिकी धादिमें युद्धोंके न होनेसे कइयोंकी सज्ञा क्षत्रिय कैसे हुई? वाणिज्य न होनेसे वैश्य -संज्ञा कैसे हुई? ( १६ ) अन्य यह भी प्रष्टव्य है कि - परमात्माने जिन ब्राह्मणादिको पढ़ाया; उनकी कितनी आयु थी? सबकी समान आयु थी, वा भिन्न-भिन्न? उनके माता - पिता थे वा नहीं, उनके गुरुकुलका क्या नाम था? वहाँ प्राचार्य - उपाचार्य आदि कौन थे? यदि परमात्मा ही आचार्य थे, तो

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२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यथेमां वाचं कल्याणम् [ २१ पढ़ानेवालोंका वा कई एकज ( १७ ) सिद्ध होते हैं, नामक चार बतलाया है भाष्य- भूमिका ' उपनयन किया गया वा नहीं? वे सभी द्विज किये गये, भी रहे यह बात इस मन्त्रसे कैसे जानी जाय? वास्तव में ऐसा अर्थ करनेपर स्वा. द. जी परस्पर विरुद्ध वक्ता क्योंकि उन्होंने सृष्टिकी प्रादिमें अग्नि, वायु, सूर्य, श्रङ्गिरा ऋषियों (? ) को ही परमात्मा द्वारा वेदका ज्ञान देना ( देखिये ऋ. ११२७१४ का स्वा. द.का भाष्य । ) ' ऋग्वेदादि-में भी स्वामीजीने लिखा है- ' ( प्र ० ) ईश्वरो न्यायकारी अस्ति, वा पक्षपाती ( उ ० ) न्यायकारी ' ( प्र ० ) तर्हि चतृणमिव [ ऋषीणां ] हृदयेषु वेदाः प्रकाशिताः, कुतो न सर्वेषाम् ( उ ० )... तेपामेव [ चतु-ऋषीणां ] पूर्वपुण्यमासीत्; अतः खल्वेतेषां हृदये वेदानां प्रकाशः कर्तुं योग्योस्ति ' ( वेदोत्पत्ति - विषय १६ पृष्ठ ) । तो पहले केवल चार पुण्यात्मा ऋषियोंको परमात्मा द्वारा वेद - ज्ञानका प्रदान दिखलाकर- जिनमें कोई स्त्री - शूद्र नहीं था, फिर सभी पुण्यात्मा - अपुण्यात्मा ब्राह्मण - शूद्रादिको परमात्मा द्वारा वेद - ज्ञान - प्रदान कैसे बतलाया? यह परस्पर विरोध हुआ, वा पहले चार ऋषियों (? ) का पढ़ाना और उनका पुण्यात्मत्व सिद्ध करना व्यर्थं हुआ । इससे तो यह सिद्ध हो रहा है कि - परमात्माने श्रारम्भमें केवल चार पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको ही वेदोपदेश दिया, उनमें कोई क्षत्रिय, वैश्य भी नहीं था; पापयोनि स्त्री, शूद्र तथा प्रतिशूद्रादिका तो क्या कहना? इसलिए ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम् ' ( यजुः ३०।५ ) इस मन्त्रमें भी वेदाधिकारी ब्राह्मणको ही रखा । इसलिए ' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम ' इस मन्त्रमें भी विप्र, ब्राह्मण यही शब्द प्राये हैं । यदि कहा जाय कि-पहला सृष्टिका प्रादिकालीन वर्णन है, दूसरा ' यथेमां ' वाला मध्यकालिक, तो वेदमें स्वाद के विरुद्ध भिन्न - भिन्न कालका इतिहास सिद्ध हो जाने से वेदकी अनित्यता प्रसक्त होगी । फिर ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अथर्व. १ ९ ।७१।१ ) यह द्विजोंको वेदाधिकार अन्तिम वेदमें कहनेसे यह परमात्मा का अन्तिमपक्ष, सिद्धान्तपक्ष, एवम् उत्तरपक्ष हो जायगा; और यही मान्य सिद्धान्त हो जायगा । ( १८ ) अन्य विरोध स्वामीजीका यह है कि -- स्वामीजीने संस्कार-बिधिमें उपनयन एवं वेदारम्भ शूद्र - अतिशूद्रोंका नहीं माना, सुश्रुत वचनानुसार उन्होंने अशुभ लक्षणयुक्त और अकुलीन शूद्रको मन्त्र -संहिता तो दूर, अन्य शास्त्रोंके पढ़ानेका अधिकारी भी स.प्र. के २५ पृष्ठमें नहीं माना, फिर ४४ पृष्ठमें मनुष्यमात्रको वेदाध्ययनाधिकार देते हुए परस्पर विरुद्ध वक्ता भी सिद्ध हो गए । प्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीनरदेव-शास्त्रीजीके ‘ आर्यसमाजका इतिहास ( प्रथम भाग ) के १२० पृष्ठमें लिखा है - ' विधिपूर्वक उपनयन कराकर शूद्रोंको गुरुकुलों में भेजनेका विधान कहीं भी नहीं है ' । यदि शूद्रकेलिए पूर्वसे ही उपनयन संस्कार होता, तो जैसे ब्राह्मणादि तीन वर्णोंके उपनयनकाल वसन्तादिक दिये हैं, उनके लिए पृथक् दण्डादिका विधान किया है, भैक्षचर्या में ' भवति! ' इस सम्बोधनको अपने - अपने वर्णोंके ज्ञापनार्थं प्रागे, पीछे, मध्यमें लगानेका विधान बताया है, ऐसे ही और इसी प्रकारके अन्य विधान शूद्र- बालककेलिए भी देखे जाते, यदि इनको पूर्वसे ही उपनयनका अधिकार होता । स्वामीजीकी ' संस्कार-बिधि ' देखनेसे ये बातें स्पष्ट ज्ञात हो सकती हैं । जिन संस्कार - सम्बन्धी प्राचीन पद्धतियोंके प्राधार पर यह ' संस्कारविधि ' रची गई है, उनमें भी शूद्रकेंलिए कहीं भी यज्ञोपवीत संस्कारका विधान नहीं है । ' जब ऐसा है तो शूद्रोंका उपनयन न होनेसे वेदमें भी अधिकार नहीं हो सकता । ( १ ९ ) अन्य विरोध यह है कि- स्वामीजीने आर्यसमाजके तृतीय नियममें वेदका पढ़ना - पढ़ाना आयका परम धर्म माना है । स.प्र. के वें समुल्लासके अनुसार शूद्र अनार्य [ अनाड़ी ] माना गया है, पर यहाँ उसी श्रनार्यको वेदाधिकार दे दिया गया है - यह परस्पर - विरोध है । ( २० ) स्वा. दयानन्दजीका अन्य विरोध यह है कि उन्होंने अपने यजुर्वेद भाष्यमें ' अरणाय ' का अर्थ ' उत्तम लक्षणवाले अन्त्यजकेलिए ' यह किया है । तब अधम - लक्षणवाले अन्त्यजके लिए वेदोपदेश न होनसे वेदका

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.. २२ ] श्रीसमातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मनुष्यमात्रको अधिकार निरस्त हो गया । ' स्वाय ' का अर्थ. स्वा. द. जीने 5 ' अपने स्त्री - सेवक ' किया है । तब दूसरोंके स्त्री - सेवकोंको वेद न पढ़ाने से I • मनुष्यमात्र तथा स्त्रीमात्रको वेदाधिकार निरस्त हो गया । तब परमात्मा से भिन्न भी क्या कोई अन्य परमात्मा है, जिसके स्त्री - सेवक प्रादिको वह वेद नहीं पढ़ाता | स्वामीजीने जब अपनी ' संस्कार विधि ' में शूद्रादिको उपनयन तथा वेदारम्भका अधिकार नहीं दिया, तब वह वेद पढ़ेगा ही कब? वस्तुतः ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' का जो पण्डित ' मैं परमात्मा ब्राह्मण-शूद्रादिको वेदवाणी पढ़ाता हूँ ' यह अर्थ करते हैं, वे सभी भारी भूलमें हैं - यह बात अब दिखलाई जाती है । ( २१ ) यह हम मान लेते हैं कि इस मन्त्रका देवता ' ईश्वर ' है, हम यह भी मान लेते हैं कि यहाँ ' ईश्वर ' का अर्थ ' राजा ' नहीं, किन्तु ' परमात्मा ' है । तथापि न इससे हमारे पक्षकी हानि है, न स्वा. द. जी वा उनके पिछलगुग्राओं के पक्षकी सिद्धि ही है । इसमें स्वामीजी तथा उनके अनुयायी भारी भ्रममें पड़ गये, इसको पाठक प्रवधानसे देखें । ( २२ ) इस मन्त्रका देवता ' ईश्वर ' अर्थात् ' परमात्मा ' है । वादितोष-न्यायसे हम इसमें नकार नहीं करते, परन्तु इसमें यह विचारणीय है कि विनियोगान्तर्गत ' देवता ' शब्दका क्या अर्थ है? इसका उत्तर यह है कि-' या तेन उच्यते, सा देवता ' ( सर्वानुक्रमणी २।५ ) यहाँपर षड्गुरुशिष्यने भी कहा है- ' तेन वाक्येन यत् प्रतिपाद्य वस्तु सा देवता ' अर्थात् मन्त्र में जिसके प्रति प्रार्थना की जा रही हो; वही ' देवता ' होता है । यही निरुक्तकार - श्रीयास्कने भी कहा है-- ' यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थ-पत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते, तद्देवतः स मन्त्रो भवति ' ( ७ | ११४ ) अर्थात् ऋषि जिस वस्तुकी कामना करता हुआ जिस देवताकी स्तुति करनेपर अपनेको उस अर्थका पति चाहता हुआ कि मैं उस देवताकी कृपासे अमुक अर्थका स्वामी बन जाऊंगा, यह बुद्धि रखकर स्तुति करता है; अथवा यथेमां वाचं कल्याणीम् [ २३ जिस मन्यसे उसे प्रार्थना करता है; उस मन्त्रमें वही देवता होता है-. इस दुर्गाचार्यप्रोक्त प्रकारसे स्पष्ट है कि वेदमन्त्रमें प्रतिपाद्य विषय तथा स्तोतव्य एवं सम्बोध्यमान देवका नाम ही ' देवता ' होता है । जो प्रति-पादक अथवा स्तोता, अथवा सम्बोधयिता, प्रार्थक होता है, वह ऋषि होता है, देवता नहीं । जैसे कि वृहद्देवता ' में भी कहा है-( २३ ) ' संवादे ( सूक्ते ) व्वाह वाक्यं यः स तु तस्मिन् भवेद् ऋषिः । ग्रस्तेनोच्येत वाक्येन देवता तत्र सा भवेत् ' ( २६० ) यह बहुत स्पष्ट है । इस कारण ' सर्वानुक्रमणी ' में भी कहा है- ' यस्य वाक्यं स ऋषिः ' ( २४ ) १११ यजुर्वेद संहिताके भाष्यमें उबटने कहा है- ' मन्त्रस्य वाच्यं ' देवता ' इति श्रुतिर्दर्शयति । ' ' वेदार्थ - दीपिका ' में पङ्गुरुशिष्यने भी कहा हैं - ' संवादेषु च सर्वेषु स ऋषिर्यस्य वाक्यं तत् । आत्मस्तवेषु य ऋषि-देवना स एवोच्यते । तेन वाक्येन यः प्रतिपाद्यते स स्याद् देवता ' ( १ | १६५।११ ) । ' वेदसम्मेलन ' लाहोरके भाषणमें आर्यसमाजी विद्वान् श्री-ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने भी १४ पृष्ठमें कहा था- ' देवता मन्त्रके प्रतिपाद्य ' ' या तेनोच्यते सा देवता ' ( subject matter of mantra ) विषयको कहते हैं । ' साऽस्य देवता ' ( ४२।२४ ) पाणिनि - सूत्रपर ' सिद्धान्तकौमुदी ' में भी कहा है- ' त्यज्यमानद्रव्ये उद्देश्यविशेषो देवता, मन्त्रस्तुत्या च । ' इस सिद्धान्तके कुछ उदाहरण भी देख लेने चाहियें । ऋग्वेद शा.सं. में ' मयमी सूक्त ' प्रसिद्ध है । वहीं जिस मन्त्रका यम प्रतिपादक है, वहां यम ' ऋषि ' है, देखिये - १०११०१२, ४, ८ - १०,१२,१४ । इनमें यम ' प्रतिपादकं ' होनेसे ' ऋषि ' है; और ऋ. १०।१०।१, ३, ५-७, ११, १३ मन्त्रों में ' प्रतिपाद्य ' होनेसे ' वैवस्वत यम ' ' देवता ' है । और १०1१०1१, ३, ५-७, ११, १३ में प्रतिपादक होनेसे ' वैवस्वती यमी ' ऋषि है, तथा १०१०२, ४, ८-१०, १२, १४ में प्रतिपाद्य होनेसे वैवस्वती यमी ' देवता ' है । इसपर देखिये अजमेर वैदिक यन्त्रालयकी

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२४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' ऋग्वेदसंहिता ' ( प्राचीन सं. ) ( पृ. ५४५ - ५४६ ) । इसी प्रकार ऋ. १०१६५ सूक्तमें १, ३, ६, ८-१०, १२,१४, १७ मन्त्रोंका प्रतिपादक होनेसे पुरूरवा ऐल ' ऋषि ' है, और १, ३, ६, ८, * १०, १२, १४, १७, इन्हीं मन्त्रोंमें उवशी प्रतिपाद्य है; अतः वह मन्त्रोंकी ‘ देवता ं है । २, ४, ५, ७, ११, १३, १५, १६, १८ प्रतिपादक होनेसे उर्वशी ' ऋषि ' है; और इन्हीं मन्त्रोंके प्रतिपाद्य होनेसे पुरूरवा ऐल देवता है । इस पर देखिये अजमेरी वैदिक - यन्त्रालयकी ऋस. ( प्राचीन सं. ) ( पृ. ६१२ ) । ( २४ ) पाठकगण इस कसौटीको अपने पास रखें, इससे उन्हें मन्त्र में ऋषि एवं देवताका ज्ञान होगा । ग्रव इस कसौटीसे ' यथेमां वाचें कल्याणीम् ' इस मन्त्रके ' ईश्वर देवता ' की परीक्षा कीजिये । जबकि— ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका देवता ' ईश्वर ' है; तब वह इस मन्त्रमें प्रतिपाद्य होगा, प्रतिपादक नहीं । ऋषिसे स्तोतव्य, सम्बोध्यमान अथवा प्रार्थनीय होगा, स्वयं स्तोता, सम्बोधयिता अथवा प्रार्थक न होगा । पर यदि इस मन्त्रमें ' ईश्वर ' देवता न होकर ' ऋषि ' होता, तब वह ' प्रतिपादक ' होता ' प्रतिपाद्य ' नहीं, सम्बोधक होता, ' सम्बोध्य ' नहीं । पर अब वह ईश्वर इस मन्त्रमें देवता होनेसे अन्यसे प्रतिपाद्य है, प्रार्थ्यमान है, अन्यके प्रति प्रार्थयिता वा प्रतिपादक नहीं । यह बात अवश्य याद रखनेकी है । इसलिए ' यथेमाँ ' से पूर्वके मन्त्रके भाष्य में उवटने कहा है- ' परमात्मा उच्यते ' ( २६।१ ) श्रीमहीघरने भी कहा है- ' परमात्मानं प्रति उच्यते ' परमात्मानं प्रति उच्यते । ' अब इससे स्पष्ट हुआ कि इमां कल्याणी वाचं जनेभ्य: श्रावदानि ' इस क्रियाका कर्ता, अथवा प्रार्थनाका प्रतिपादक ' ऋषि ' है, ईश्वर नहीं, क्योंकि ईश्वर तो उक्त मन्त्रमें ' देवता ' होनेसे ' प्रतिपाद्य ' है । भला वह प्रतिपादक कैसे हो सकता है? तब ' इमां कल्याणीं वाचं ' का ' उवट--महीधर के भाष्य में अनुद्र ' जिनीं ' दीयतां भुज्यताम् ' इत्येवमादिकां वाचं वीमीत्यर्थः ' यह जो प्रयं किया है; सो इसका प्रतिपादक ' लोगाक्षि ' ऋषि यथमा वाच कल्याणीम् [ २५ ही है, ईश्वर नहीं, क्योंकि ईश्वर तो इस मन्त्रका देवता अर्थात् प्रतिपाद्य है, ऋषि प्रर्थात् प्रतिपादक नहीं । ( २५ ) प्रथम - मन्त्र में ' अष्टमी भूतमाधनी ' ( २६।१ ) कही गई है । उसका व्याख्यान उबटने ' प्रष्टमी च वाक् भूतसाधनी ' भूत- प्रज्ञप्तिकरी ' महीधरने ' भूतानि साधयति, वशीकरोति भूतसाधनी वाक् ' प्राणियोंको वश करने वाली वाणी ' यही किया है, प्रकरण भी उसीका है । ' यथेमां ' मन्त्रमें ' इमा ' इस सर्वनाम पदसे उसी सन्निकृष्ट ( सनिहित ) वाणीका ग्रहण होता है वेदवाणीका नहीं । क्योंकि वह सारीकी सारी वेदवाणी - इस समय निकट नहीं कि ' इदम् ' से उसका बोध हो जाय । ' इदम् ' शब्द सन्निकृष्ट ( निकट ) का ही बोध कराता है । जैसा कि यह अभियुक्तोक्ति प्रसिद्ध है— " इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवति चंदो रूपम् । प्रदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् । " यह उक्ति निर्मूल भी नहीं है । इसलिए ' निरुक्त ' में भी कहा है-' अयमेततरोः ( श्रागततरः, प्रसन्नतरो ) ऽमुष्मात् ( दूरस्थात् ) । श्रसौ अस्ततर: ( दूरतरः ) ग्रस्माद् ( निकटस्थात्, विप्रकृष्टत्वात् ) ' ( ३ । १६ । ε ) । ' इमां ' से ' वेदवाणी ' तव गृहीत होती जब यह मन्त्र आदिम- वेदका प्रारम्भिक मन्त्र होता । उस समय वेदवाणी बुद्धिस्थित होनेसे ' इमां ' से गृहीत हो जाती । ' अथवा उक्त मन्त्र अन्तिम वेदका अन्तिम मन्त्र होता । उस समय वेदवाणी समक्ष उपस्थित होती । पर अब ऐसा नहीं है । श्रतः ' इमां ' से उसका ग्रहण भी नहीं होता । अब तो ' यथेमां ' मन्त्रके ' इमां ' से पूर्व मन्त्र अन्तमें कही हुई ' अनुद्व जिनी वाक् ' ही ली जावेगी । क्योंकि वही इस मन्त्रके निकट है, उससे पूर्वकी वा इस मन्त्रके वादकी वाणी नहीं । सो वह परमात्मासे प्रदिष्ट ' भूनसाधनी वाक् ' ' दीयताम् भुज्यताम् ' इस प्रकारकी यज्ञमें कही जाती हुई वाणी — जिसकी स्पष्टता आगे की जाने वाली है— ऋषिकी है, ईश्वरकी नहीं; क्योंकि – ' आवदानि ' का