सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 221–230

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 221–230

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' [ ३८५ ३८६ ] प्रतिलोमज । प्रतिलोमज - निषाद तो चाण्डाल एवं प्रस्पृश्य होता है दूसरा ठीक है, पर अनुलोमज वैसा नहीं । अनुलोमज - निषादका दूसरा नाम, स्मृति के यह ' होता है, देखिये ' मनुस्मृति ' ।-ना गीती ' पारशव ' निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ' ( १०1८ ) यह अनुलोमज-( ४१ का निपाद दाश ( कैवर्त ) का उत्पादक होता है, देखिये- मनुस्मृति ( १० ) बास्थान ३४ ) । मनुस्मृतिके अनुसार उसके बाल - बच्चे नौकर्मजीवी ( नौका -३१-३२ चलाने वाले ) होते हैं । मेदिनीकोषके - ' निषादः स्वरभेदेपि चण्डाले, यतो धीवरान्तरे ' इस वचनमें निषाद चण्डालसे भिन्न धीवर ( मल्लाह ) का जायगी । नाम भी छाया है; इसलिए ' रामायण ' में भी उनका काम नौकाओंका या है । चलाना दिखलाया गया है । गया है । यदि वह निषाद चाण्डाल होता, तो ' मनुस्मृति ' के अनुसार – ' श्रवान्धवं के पद्य शवं चैव तिर्हरेयुरिति स्थिति: ' ( १०।५५ ) ' वध्यांश्च हन्युः सततं क्योंकि यथाशास्त्रं नृपाज्ञया ' ( १०।५६ ) इस प्रकार निःस्वामिक मुर्दोंका उठाना उसका कर्म होता, पर रामायणके निषादके ये कर्म नहीं बताये गये, किन्तु पड़ेगा नौजीवन ही कर्म बताया है । इसलिए वह चाण्डाल भी नहीं; यह कहा स्पष्ट है । ' मनुस्मृति ' के अनुसार प्रावारवाले श्रीराम निषाद - गुके नं चैव चाण्डाल होनेपर उसके साथ स्पर्श तक न करते । इससे स्पष्ट है कि-तिं ) को रामाणीय - निषाद अनुलोमज है, प्रतिलोमज नहीं । इसलिए वह स्पृश्य है, मने उस श्रस्पृश्य नहीं । पर शबरी यदि चाण्डाली है; तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम, मन - जल प्रतिलोमज होने से उसका स्पर्श स्वीकृत न करते । यदि किया है; तो स्पष्ट जातिको है कि वह चाण्डाली नहीं, किन्तु तपस्विनी ब्राह्मणी थी, यह सिद्ध हो गया । द- गुहा ( ७ ) अनुलोमज होनेसे स्पृश्य होने पर भी शूद्रसघर्मा होनेसे निषादसे श्रीरामने कोई वस्तु नहीं ली, बल्कि - ' अरित चैतन्मूल - फलं निषादैः स्वय-इसपर मर्जितम् ' ( वाल्मी. २२८४।१७ ) यह उसकी फलादि सामग्री लोमन, ती । मित्रताके नाते से केवल इतना कह भी नहीं दिया कि - ' यत् त्विदं भवता क्या शवरी शूद्रा थी? [ ३८७ किञ्चित् प्रीत्या समुपकल्पितम् । सर्वं तदनुजानामि, नहि वतँ प्रतिग्रहै ' ( २२५०१४३ ) ( तुमने जो कुछ प्रीतिसे दिया है, उसका मैं तिरस्कार नहीं करता हूं, पर उसे ले नहीं सकता । ) बल्कि जल भी उससे न लेकर तो लक्ष्मणका लाया ही पिया- ' ततश्चीरोत्तरासङ्गः सन्ध्यामन्वास्य जलमेवाददे भोज्यं लक्ष्मणेनाहृतं पश्चिमाम् । स्वयम् ' ( २२५०१४६ ) । पर शवरीका श्राचमन भी स्वीकार किया, वन्यफल भी स्वीकृत किये, इससे स्पष्ट है कि वह चाण्डाली नहीं थी; किन्तु रामभक्ता ब्राह्मणी थी । जब श्रीरामने सवर्ण शम्बूक शूद्रको भी ' दण्डेनैव तमप्योपेत् धर्माद्धि विच्युतम् ' ( मनु. १।२७३ ) तपस्या करनेसे दण्डित किया स्वकाद् ; तब अवर्णा शवरीको [ यदि वह भीलनी है ] स्वधर्म - विरुद्ध श्राचरण करनेपर बिना दण्डके क्यों छोड़ दिया? स्त्री होनेका व्याज तो व्यर्थ है - स्मरण कीजिये इसपर ताटका एवं शूर्पणखाको । विना दण्ड दिये शबरीको तपस्यासे स्वर्ग देनेसे सिद्ध होता है, कि वह ब्राह्मणी थी । ( ८ ) पाठकों को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि - शरी यह उसकी जाति नहीं थी; किन्तु यह नाम था । जैसेकि - मृच्छकटिक ' के प्रणेताका ' शूद्रक ' यह नाम श, जाति नहीं । रामायणके पात्र दावरीके गुरुका ' मतङ्ग ' यह नाम था, जाति नहीं । ' मीमांसादर्शन ' के भाष्यकार ' शबराचार्य ' का जैसे यह नाम था, जाति नहीं; वैसे ही शबरी यह भी उसका नाम था, जाति नहीं । तभी ' वाल्मीकि रामायण ' में भी ' मणी शवरी - नाम काकुत्स्थ! चिरजीविनी ' ( ३।७३।२६ ) इस स्थल में उसका ' शवरी ' यह ' नाम ' आया है, जाति नहीं । जैसे उपनयनमें कहा जाता है - ' को नामासि ', वैसे यहाँ भी ' शबरी-नाम ' कहा है । इसी प्रकार ' अयोध्या नाम नगरी ' ( वाल्मो. ११२६ ] ' रावणो नाम भद्रं ते ' ( ३१४८२ ) ' गुहो नाम ' ( २२५०१३३ ) एतदादि स्थलोंमें भी ' नाम ' शब्द ' नाम ' वाचक है । अथवा ' नाम ' शब्द प्रसिद्धार्थक भी हो; वह भी एतदादि श्रवसरपर नाममें ही प्रयुक्त होता है । अथवा

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३८८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' शबरीनाम ' यह नमस्त - पद भी हो; तब ' अनो बहुव्रीहेः ' ( पा. ४।१।१२ ) इससे ङीप्का निषेध हो गया । दीर्घका प्रभाव तो श्रार्ष होने से हुआ; अथवा रामायणके पाणिनिसे पूर्वजता के कारण हुआ । श्रमणका अर्थ है ' तापसी ' । जैसे शतपथमें ' श्रमणोऽश्रमणः ' ( १४ | ७ | १ | २२ ) वातरशना ह् वा ऋषयः श्रमणाः ऊर्ध्व -मन्थिनो बभूवुः ' ( तै. प्रा. २१७११ ) यहाँपर भी ' श्रमणा ' का ' तापसी ' अर्थ है । इसी प्रकार ' कुमार - धमणादिभिः ' ( पा. २1१1७० ) यहां भीं ' कुमारी श्रमणा यह उदाहरण दिया है । सो ' तापसी ' अर्थ है । रामायण में ' निषाद ' यह जाति - शब्द है, किन्तु उसका नाम ' गुह ' बताया है । यदि ' शबरी ' यह जातिनाम अभीप्ट होता, तो रामायणकार उसका पृथक् नाम भी निषाद-गुहकी भान्ति अवश्य बताते; क्योंकि जातिनाम केवल देनेकी रामायण-कारकी शैली नहीं । ( 2 ) शेष प्रश्न यह रह जाता हैं कि शबरी यदि वह ब्राह्मणी है; तो उसे कहीं - कहीं ' हीनजातिसमुद्भवा ' ' अधमजन्मा ' ' जातिहीन ' ‘ हीनजन्मा ’ ‘ अघजन्मा ' आदि क्यों कहा है? इसपर उत्तर यह है, कि- स्त्रीजाति पुरुषजातिकी अपेक्षा हीनजाति मानी गयी है; क्योंकि-कई पाप करनेसे ही पुरुष दूसरे जन्ममें स्त्री बनता है । तभी तो गोस्वामी-तुलसीदासको भी स्त्रीजातिकी हीनता बतानेकेलिए शबरीके मुखसे-' प्रथम ते अधम, श्रधम अति नारी ' यह कहलाना पड़ा । उसे ( स्त्री ) को यज्ञोपवीतका अधिकार भी नहीं; इसीलिए ही उसे कहीं शूद्रा, कहीं शूद्रसदृशी तथा हीनजाति कहा जाता है -' येपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्या ( वेश्यापुत्रा ) स्तथा शूद्राः ( गीता ३२ ) यहाँ पर स्त्रीको पापयोनियों अथवा निकृष्टोंमें ' रखा. गया है । ' स्त्रीशूद्रहूणशवरा अपि पापजीवाः ' ( श्रीमद्भाग. २ । ७ । ४६ ) । यहाँ स्त्रीकी भी पापजीवोंमें गणना की गई है । स्त्रीका शूद्रोंसे साहचर्यं तो प्रायः शास्त्रोंमें आता ही है; तब शबरीकेलिए प्रयुक्त' प्रघजन्मा ' क्या शवरी शूद्रा थी? [ ३८६ ३६० श्रादिका समाधान तो हो गया । यह वेदसिद्ध भी है । कृष्णयजुर्वेद में कहा है- ' तस्मात् स्त्रियो निरिन्द्रिया नहीं पापात् पुस उपस्तितरं वदन्ति ' ( तं. सं. ६ शवार ) यहाँ श्रीसायणभाष्य अदायादीरपि उसके लिखते हैं- ' तस्माल्लोके स्त्रियः सामर्थ्यरहिता अपत्येषु तत्पर दायभाजो भवन्ति । पापात् पतितादपि पुंसोपि उपस्तितरं क्षोणतरं न वदन्ति ' । तब ब्राह्मणी - पक्षमें भी उसे ' अघजन्मा ' आदि कहा जा सकता स्त्रीस्वयं है । जाता हौ । ( १० ) शबरीकेलिए प्रयुक्त ' श्रमजीविनी ' शब्द भी उसे शूद्रविट कान करने में समर्थ नहीं, ' श्रमः तपति खेदे च ' इस कोपर्क प्रमाणसे ' श्रमु तपसि खेदे च ' इस दिवादिगणीय धातुपाठ में कहे हुए श्रर्थविचेषने , बा पंभ! ' श्रमजीविनी ' का ' तपस्विनी ' अर्थ में पर्यवसान हो जाता है । इसीका कहा अन्य पर्याय ' श्रमणी ' भी प्रसिद्ध | ' तपसा श्राम्यतीति श्रमणा ' ( तिलक. लमान १।२।५६ ) । -इस प्रकार रामचरित प्रतिपादक प्राचीन ग्रन्थ ' श्रीवाल्मीकिरामायण'- दिव्या के अनुसार ' शवरी ' यह उसका नाम सिद्ध हुआ; तदनुसार वह ब्राह्मणी कई ल परीक्ष्य सिद्ध हुई, शूद्रा नहीं । तदनुसार ही अर्वाचीन इतिहासों में भी चवरी-विषयक इतिहासोंको रामायणानुकूल ही समन्वित करना ठीक है । भक्ति फलान्य मार्ग के कई अर्वाचीन ग्रन्थों में तो शूद्रों में भी भक्तिभावको फैलाने के वचनस उद्देश्य से कई प्राचीन - भक्तोंको प्राचीन ग्रन्थोंके विरुद्ध चाण्डाल कह डाला खाना है! ब्राह्मण जामिल को भी उनमें शुद्र बताया गया है; जबकि यह ' चाहिए श्रीमद्भागवतसे विरुद्ध है । उक्तग्रन्थ अर्वाचीन भक्तिमार्गके हैं । ' भक्तिके अर्थवादस्वरूप वहाँ भगवद्भक्त अन्त्यजोंका उच्छिष्ट द्विजोंको भी खिलाया पुलाक उन - उ गया है; जबकि यह धर्मशास्त्रोंसे विरुद्ध है । अतः ऐतिहासिकतामें उन जाता ग्रन्थोंका अव्याहत प्रामाण्य भी नहीं है । फलत: ' शबरी शूद्रा थी ' यह बात रामचरित्रके सब ग्रन्थोंके उपजीव्य उच्छिष श्रीवाल्मीकिरामायणसे विरुद्ध है; अतः माननीय नहीं । इस कसौटीसे प्रतिथि उन्हें इस सोनेके खरे - खोटे होने का पता चल सकेगा । प्रसिद्धिके पीछे

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ३८२ ३६० ] चाहिये । इसीलिए ' आनन्दरामायण ' के राज्यकाण्ड में नहीं दौड़ना लिखा है- ' न सा दानी ( शूद्रा ) तु शवरी मुनिसेवन यादोरपि उसकेलिए भाष्यमें तत्परा ' ( ३ । ४४ ) । भाजो न ( ११ ) श्रीराम द्वारा शवरीके जूठे बेर खाने पर भी विचार किया त्रीस्वरूपं जाता है । भक्तोंकी सूक्तिमें प्रसिद्ध है- ' कैसे तुम भीलनी के जूठे बेर खाये ता है । हों । इस विषयमें यह जानना चाहिये कि वाल्मीकि रामायण में तो बेरों का नाम ही नहीं है । वहाँ पर तो - ' मया तु संचितं वन्यं त्रिविधं पुरुष-सिद्ध न तबा प्रंस! तदायें पुरुषव्याघ्र! पम्पायास्तीरसम्भवम् ' ( ३।७४।१७ ) यह विशेषले कहा है । उच्छिष्टको तो यहाँ गन्ध भी नहीं है । वेर तो आजकल मुस-इसीका समानोंसे भी ले लिये जाते हैं । तिलक. ' अध्यात्मरामायण ' में भी उच्छिष्टका गन्ध नहीं है, देखिये - ' संगृहीतानि दिव्यानि रामार्थं शवरी मुदा । फलान्यमृत - कल्पानि ददो रामाय भक्तितः । मायण- कई लोग – ' फलानि च सुपक्वानि मूलानि मधुराणि च । स्वयमास्वाद्य माधुर्यं ब्राह्मणी परीक्ष्य परिभक्ष्य च ॥ पश्चान्निवेदयामास राघवाभ्यां दृढव्रता । बावरी- फलान्यास्वाद्य काकुत्स्थस्तस्यै मुक्ति परां ददौ ' || इस ' पद्मपुराण ' (? ) के भक्ति वचनसे अपने पक्षकी पुष्टि देखते हैं । इसमें शबरी - द्वारा फलोंका स्वयं लाने के खाना तथा माधुर्यकी परीक्षा करना कहा है । पर यहां पर जानना डाला चाहिए कि यहाँ उच्छिष्टका गन्ध भी नहीं है । किसी ग्राम बेर आदिके कि यह " वृक्षोंके फलोंके खट्टापन वा मिठास जाननेका प्रकार यह है कि स्याली-भक्ति पुलाक - न्यायसे उस - उस वृक्षका एक - एक फल खाना पड़ता है, उसीसे हो खिलाया उन - उन वृक्षोंके अन्य सव फलोंका खट्टापन वा मिठास मालूम पड़ में उन जाता है । शबरीने भी इसी प्रकार परीक्षा की; तब यहां साधारणरूपसे नजीब उच्छिष्टता होने पर भी वस्तुतः उच्छिष्टता नहीं । हमें भयानक - गर्मीमें प्रतिथिबिशेषकी ठंडे जलसे सेवा करनी है । हमारे पास पांच - छ: कुंए पीछे हैं । क्रम - क्रमसे हम उन कुनोंसे जल निकाल कर स्वयं पीते हैं; और क्या शवरी शूद्रा थी? [ ३ ९ १ जांच करते हैं कि किस कुएंका जल अधिक शीतल है । जिस कुएंका जल अधिक शीतल सिद्ध होता है, उसी कुएंका जल कुएंसे निकाल कर श्रतिथियोंको उपहृत किया जाता है । पर इससे वह जल उच्छिष्ट कहा जा सकने पर भी वास्तवमें उच्छिष्ट नहीं होता । इस प्रकार जब सब वृक्षोंके एक - एक फलके खानेसे उनका मिठास जानकर उस वृक्षके अन्य फल किसीको दिये जाएं, वहां पर उन अन्य फलोंकी वास्तविक उच्छिष्टताका अवसर ही उपस्थित नहीं होता । प्रावा स्वयं खाकर श्राधा श्रीरामकेलिए रखना माना जाए; तो यह नहीं हो सकता; क्योंकि वैसा फल शीघ्र विकृत हो जाता है, और सूख भी जाता है । इसी प्रकार - ' कन्दमूल फल सरस प्रति दिये राम कंह प्रानि । प्रेम सहित प्रभु खायउ बाहि बार बग्नानि । ' " तुलसीरामायण ' के अरण्यकाण्ड-स्थित इस दोहे में भी उच्छिष्टताका गन्ध नहीं । इस प्रकार अन्य ग्रन्थोंमें भी जानना चाहिए । जहाँ जूठे बेर लिखे हों, वहीं पूर्व कहे प्रकारसे ही जान लेना चाहिये कि वहां वास्तविक जूठापन नहीं । तब वादियोंका मत सर्वथा उच्छिन्न हो गया । ( ३३ ) क्या श्रीवाल्मीकि चाण्डाल थे? ( ११ वीं ऐतिहासिक भूल ) पूर्वपक्ष - श्रीवाल्मीकि चाण्डाल थे - भंगी उन्हींके नामसे वाल्मीक कहे जाते हैं, वे तपस्त्री एवं मुनि थे; वेदज्ञ थे; तब शूद्रोंका भी वेदाधिकार सिद्ध हुआ । ( प्राजकलके सुधारक ) उत्तरपक्ष — अन्त्यजोद्धारके इस समयमें पुराने मुनियोंको ढूंढ - ढूंढकर उन्हें शूद्र - श्रन्त्यज सिद्ध करनेकी चेष्टा की जा रही है । उससे प्रसिद्ध श्री-वाल्मीकि मुनि भी नहीं बच पाये । उन्हें ' भंगी ' कहा जाता है । पर यह बात सर्वथा निर्मूल है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनका कुछ समय

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३६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कुसंगति में अवश्य बीता, पर वे थे ब्राह्मण ही । ' आलोक ' के पाठक अवधान दें । ( १ ) श्रीवाल्मीकि रामायणके कर्ता श्रीवाल्मीकि मुनि माने जाते हैं । तब उस रामायणसे उनका जो परिचय मिले, वह समूल कहा जावेगा । वाल्मीकि रामायण के अन्त में कहा है- ' कृतवान् प्रचेतसः पुत्रस्तद् ब्रह्माप्यन्वमन्यत ' ( ७।१११।११ ) इसमें रामायण के कर्त्ता श्रीवाल्मीकिको प्रचेताका पुत्र कहा गया है । इसलिए ही श्रीवाल्मीकिकी ' प्राचेतस ' यह संज्ञा प्रसिद्ध है । जैसा कि ' मुनिः प्राचेतसस्तदा ' वाल्मी. ( ७३ । १६ ) प्रचेताको मनुस्मृतिके – ' मरीचिमव्यङ्गिरसी पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगु ं नारदमेव च ' ( ११३५ ) इस पद्यमें ब्रह्मा वा मनुका पुत्र कहा गया है । तब ब्रह्मा वा मनुके पुत्र प्रचेता के लड़के वाल्मीकि भगी कैसे हो सकते हैं? अश्वमेधयज्ञके समय जब श्रीवाल्मीकि मुनि सीताको साथ लाए, तब उन्होंने अपना परिचय दिया कि - ' प्रचेतसोऽहं दशम: पुत्रो राघवनन्दन! न स्मराम्यनृतं वाक्यम् ' ( ७६६।१८ ) ( मैं प्रचेताका दसवाँ पुत्र हूं, आज तक मैंने असत्य कभी कहा हो; यह मुझे स्मरण नहीं आता ) यही श्लोक अध्यात्म रामायण ( ७।७।३१ ) में भी मिलता है । इसमें वाल्मीकिने अपने आपको प्रचेताका दसवां पुत्र कहा है । प्रचेताका परिचय दिया ही जा चुका है । इससे वाल्मीकि स्पष्टतया ब्राह्मण सिद्ध हुए । ( २ ) अध्यात्मरामायण में वाल्मीकिकी कुसङ्गतिका वृत्त इस प्रकार दिया गया है- ' ग्रहं पुरा किरातेषु किरातैः सह वद्धितः । जन्ममात्रं द्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ' ( अयोध्याकाण्ड ६।६५ ) यहाँपर वाल्मीकिजीने श्रीरामको स्वयं बताया है कि मैं जन्ममात्र से ब्राह्मण हूं, छोटी ग्रायुमें मैं किरातों ( भीलों ) में रहा, मेरे शूद्रों जैसे प्राचार रहे । फिर वाल्मीकिजी -ने बताया कि मैंने विवाह भी एक शूद्रा - स्त्रीसे कर लिया । उससे कई लड़के भी हुए, जैसा कि— क्या श्रीवाल्मीकि चाण्डाल थे? [ ३ ९ ३ ३६४ ' शूद्रायां वहवः पुत्रा उत्पन्ना मेऽजितात्मनः । ततश्चोरैश्च चौरोऽहमभवं पुरा ' ( २२६/६६ ) ( मुझ अजितेन्द्रियके शूद्रा में संगम्य । कैसे हो हुए । फिर चोरोंसे मिलकर मैं भी चोर रहा ) इससे बहुतसे लड़के हुआ कि वाल्मीकि जन्मसे ब्राह्मण थे । परन्तु भीलोंकी कुसङ्गति स्पष्ट सिद्ध स्कन वाला व्यवहार करने लगे थे, शूद्रासे विवाह कर लिया कई शूद्रों के पुत्र हो गये । यहां वाल्मीकिने अपने - आपको ' अजितात्मा ' कहा, लड़के भी टीकामें शूद्र होते, तो शूद्रामें सन्तान पैदा करनेसे अपने श्रापको ' है अजितात्मा । यदि वह । यह शब ' न घातकः कहते । ब्राह्मण होनेपर शूद्रोंमें सन्तान पैदा करनेसे उन्हें अपनेको तस्मिन्ने ' श्रजितात्मा ' कहना सार्थक है । इससे स्पष्ट है कि वे जन्मसे ब्राह्मण हैं । अस्तु । का उदा पूर्व उस चोरी करते हुए उन्हें मुनि मिले । ' दृष्ट्वा मां मुनयोवृच्छन् ब्राह्मण किमायासि द्विजाधम! ' ( अध्यात्मरामा ( २२३६ ९ ) ' दुर्वृतो नहीं जा-द्विजाधमः ' ( ७८ ) ( अपने सामने आते हुए देखकर मुझे मुनि कहने लगे- गये है । ऐ नीच ब्राह्मण! तू क्यों आ रहा है? ) यह नीच ब्राह्मण वहुत दुरे जन्ममें ) प्रचार वाला है ) इत्यादि - श्लोकोंमें मुनियोंने उसे चोरी आदि करने अधम- ब्राह्मण कहा । इससे स्पष्ट हुआ कि वाल्मीकि जन्मसे ब्राह्मण थे, ' सह परन्तु कुसङ्गतिमें पड़कर शूद्रोंके काम करने लग पड़े थे । वे जन्मसे शूद्र शुद्र सवर्व आदि नहीं थे - यह बात सिद्ध हो गई । चाण्डाल ' वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तम: ' ( मत्स्य पुराण १२ ५ १ ) जन्मों के के इस पद्यमें बाल्मीकिको भार्गव कहा गया है । विष्णुपुराण तृतीयांश होना, फि तृतीयाध्यायमें भी कहा गया है - ऋक्षोऽभूद्भार्गवस्तस्माद् ' वाल्मीकियोंमि- हरिके अन धीयते ' भार्गव शब्द पर वाल्मी. रामायण के रामाभिरामी टीकाकाले घोगी में लिखा है – ' प्राचेतसत्वेन श्रस्यापि भार्गवत्वम्, भृगोवंरुणपुत्रत्वाद्, भृगो- ' बहूनां ज र्भ्राता भार्गव इत्यन्ये, ( ७ | ९ ४ २५ ) अर्थात् प्रचेता वरुणको कहते हैं, चवनाधिक इधर भृगु वरुणका पुत्र है, भृगुके भ्राता होनेसे वाल्मीकिको भार्गव कहते तब हैं; और प्रचेता आदिम प्रजापति थे, तब प्राचेतस - वाल्मीकि चाण्डात चाण्डाल नहीं हो स

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[ ३ ९ ३ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३६४ ] संगम्य कैसे हो सकते हैं? तसे लड़के ( ५।१।२४, ७ ११२७८ ) में वाल्मीकि सुमति - नामक ब्राह्मण ष्ट लिह स्कन्दपुराण गये हैं, तथा ब्रह्मर्षि भी । परन्तु श्रीमद्भागवतपुराणको एक-तसे शूदों- के पुत्र कहे सद्यः सवनाय कल्पते ' ( ३।३३।६ ) इस पद्यकी टीका में लड़के भी टीका ' श्वादपि यदि मिले हैं- ' स्मरणस्य तु वाल्मीकेः । स हि चाण्डाल एव मार्ग-वह यह शब्द तात्मान घातकः । ऋषैरुपदेशात्पूर्वं महर्षित्वभावनां कृत्वा पश्चाद् रामस्मरणेन अपनेको तस्मिन्नेव जन्मनि वाल्मीकिर्जातः इति न किञ्चिदनुपपन्नम् । ' ( नामस्मरण ह्मण हैं । का उदाहरण वाल्मीकि है । वह राहजन चाण्डाल था, ऋषिके उपदेशसे पूर्व उसने महर्षि वननेकी भावना की । फिर रामके स्मरणसे उसी जन्ममें च्ह्मण हुद्या- इसमें कुछ भी अनुपपत्ति नहीं है ) पर यह शब्द विश्वसनीय दुई तो नहीं जान पड़ते, क्योंकि पूर्वोक्त प्रमाणों में वाल्मीकि जन्मसे ब्राह्मण माने हने लगे गये है । उसी टीकामें ' सद्य: ' का अर्थ ' तदुत्तरजन्मनि ' ( उससे अगले बहुत बुरे जन्ममें ) किया गया है । द करने ' स ' के भावमें गम्भीरता है । उसका भाव यह है कि वैसे तो ह्मण, शूद्र - प्रादिसे ब्राह्मण होना बहुजन्मसाध्य है, जैसे कि महाभारतके अनुशा-न्मसे सनपर्व ( २८१६-७-८-६-१०-११ ) में पशुपक्षी योनिसे बहुत जन्मोंके बाद चाण्डाल होना, चाण्डालका सहस्र जन्मोंके बाद शुद्र बनना, शूद्रकी ३० १२ ११ ) जन्मों बाद वैश्य वर्ण में उत्पत्ति, वैश्यका साठ जन्मोंके बाद क्षत्रिय तृतीयांश होना, फिर क्षत्रियका साठ जन्मोंके बाद ब्राह्मण होना कहा है, परन्तु किन हरिके अनन्य भक्त दवपचको ' सद्यः ' अर्थात् बहुत जन्मोंको ( जैसे कि -काकाले बोगी में कहा है- ' प्रयत्नाद् यतमानस्तुः श्रनेकजन्मसंसिद्धः ' ( ६।४५ ) गो- ' बहूनां जन्मनामन्ते ' ( ७।१ ९ ) न प्राप्त करके अर्थवादसे साथ वाले जन्ममें कहते हैं । बनाधिकारी ( द्विज ) हो जाना कहा है । व - कहते तव उक्त टीकाकारको भी नारदकी भांति वाल्मीकिभी पूर्वजन्म में चाण्डाल राण्डाल अभीष्ट हों - यह सम्भव है, क्योंकि उसी जन्ममें जाति - परिवर्तन नहीं हो सकता, नारी कथा - प्रसंग में श्रीमद्भागवतमें कहाहै-क्या श्रीवाल्मीकि चाण्डाल थे? [ ३२५ ' एवं यतन्तं विजने मान ( नारदम् ) ग्राहागोचरो गिराम् ( ११६१२१ ) हन्तास्मिन् जन्मनि भवान् न मां द्रष्टुमिहार्हति ।... हित्वाऽवद्यमिमं लोकं गन्ता ' मज्जनतामसि ' ( १२६६२६ ) ( इस प्रकार पूर्व जन्ममें शूद्राके पुत्र नारदको भगवद्दर्शनमें यत्न करते हुए; ब्राह्मण बनना चाहते हुए देखकर आकाशवाणी हुई कि तुम इस जन्ममें मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे । इस अधम ( शूद्र ) शरीरको पूरा करके फिर मेरी जनता ( ब्राह्मणत्व ) को प्राप्त कर सकोगे ) । श्रीमद्भागवतमें- ' चर्षणी वरुणस्यासीद्यम्या जातो भृगुः पुनः । वाल्मी-किश्च महायोगी वल्मीकादभवत् किल ' ( ६११६१४ ) यहाँ श्रीधर व्याल्या यह है - ' चषंणी वरुणस्य भार्यासीत्, पूर्व ब्रह्मणः पुत्रो भृगुवंस्था पुनर्जातः वाल्मीकिर्वरुणस्यैव पुत्रोऽभवत्, एती वरुणस्यासाधारणी पुत्रौ । ' ( चर्षणी वरुणकी स्त्री थी । पहले ब्रह्माका पुत्र भृगु हुया था, और फिर जिससे वल्मीकसे बाहर आया हुग्रा वाल्मीकि उत्पन्न हुआ ) यहाँ पर श्रीमद्-भागवतकार जब बाल्मीकिको उत्पत्ति चाण्डालसे नहीं बताते, तव श्रीमद्-भागवतके उक्त टीकाकार उसे इस जन्म में उससे विरुद्ध चाण्डाल कैसे कह सकते हैं? वल्मीकसे श्रीवाल्मीकिकी यह तपस्या ग्रभीष्ट है; जिसके कारण उनपरमट्टी जम गई थी, उसमें वल्मीक ( बांबी ) बन गये थे, उस वल्मीकसे निकलने से उनको वाल्मीकि कहते थे - यह कथा स्कन्दपुराण ( ११२४ । ७ । १।२७ = ) में स्पष्ट है | इस पर रामाभिरामी टीकाकार कहते हैं-' वाल्मीकि: - वल्मीकस्यापत्यम् ' वल्मीकप्रभवो यस्मात् तस्मात् वाल्मीकि-रित्यसी ' इति ब्रह्मवैवक्त: वल्मीक - प्रभवत्वेन गोणीपुत्रादिवद् गौणमस्य वल्मीका पत्यत्वं गृहीत्वा इञ साधुरपत्यार्थः । यद्वा - वल्मीक इति ऋषिविशे-षस्य संज्ञा इत्यादि ' ( वाल्मीकि १ | १ | १ ) अर्थात् जिस प्रकार शेषके अवतार पतञ्जलि गोणी - नामक स्त्रीके हाथमें सर्व रूपमें या पड़े थे, उनको गौणताते ' गोणीपुत्र ' कहा जाता है, वैसे ही वक्ष्मीकसे निकलने के कारण गौणरूपसे वल्मीकका श्रपत्य मानकर इन्हें अपत्यार्थक इञ - प्रत्ययसे

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३ ९ ६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' वाल्मीकि ' यह कहा जाता है, या वल्मीक किसी पि ( कदाचित् प्रचेताका ) नाम है - उसके अपत्य होनेसे इन्हें वाल्मीकि कहा जाता है । इससे स्पष्ट है कि वे जन्मसे चाण्डाल नहीं थे । हाँ, उक्त टीकाकार-का उन्हें चण्डाल कहना और ढंगसे माना जा सकता है । मार्गघातक कई चाण्डाल - विशेष होते हैं, यह भी उन्हींका कार्य करते थे; जैसा कि हम अध्यात्म रामायण पहले स्पष्ट कर चुके हैं, पर वहाँ उन्हें ' शूद्राचाररत ' ' जन्ममात्र से द्विज ' माना है । तब सम्भय है कि मार्गघातक चाण्डालवत् होनेसे ही उन्हें चाण्डाल कहा गया हो । जैसे कि महाभाष्य में कहा गया है - ' अन्तरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते तद् यथा- एष ब्रह्मदत्तः । ब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह तेन मन्यामहे ब्रह्म-दत्तवद्यं भवतीति ( १।१।२३ ) । अर्थात् तत्सदृशको भी उस शब्दसे कहा जाता है, जैसे अब्रह्मदत्तको ब्रह्मदत्त कहनेसे उसका भाव ब्रह्मदत्त-सदृशमें पर्यवसित हो जाता है, इस प्रकार ग्रचाण्डालको भी चाण्ड कहना चाण्डालस में पर्यवसित हो जाता है, वास्तविक चाण्डाल होने में नहीं । महाभाष्य में अन्यत्र भी यह स्पष्ट किया है-' चतुभिः प्रकारैः प्रतस्मिन् सः ' इत्येतद् भवति ' तात्स्थ्यात्, ताद्धर्म्यात्, तत्सामीप्यात्, तत्साहचर्यात् । तात्स्थ्यात् तावत् - मञ्चा हसन्ति, गिरिर्दह्यते । ताद्धर्म्यात् - जटिनं यान्तं ब्रह्मदत्त इत्याह । ब्रह्मदत्ते यानि कर्माणि, जटिनि अपि तानि क्रियन्ते इति प्रतो जटी ब्रह्मदत्त इत्युच्यते । तत्मामीप्यात् - गङ्गायां घोप:, कूपे गर्गकुलम् । तत्साहचर्याद् - कुन्तान् प्रवेशय, यष्टीः प्रवेशय इति ' ( ४।११४८ ) इस सन्दर्भका हिन्दी अर्थ ( पृ. ३१२-३१३ ) में दिया जा चुका है । तब वाल्मीकि भी भीलोंमें रहते थे, उनके धर्मको करते थे, उनके पास रहते थे, और उनके सहचारी थे । तब इसमें कोई प्राश्चर्य नहीं कि - वे इन कारणोंसे ' चाण्डाल ' कहे गये हों । परन्तु इसमें वे क्या श्रीवाल्मीकि चाण्डाल थे? [ ३२७ ' वास्तविक चाण्डाल नहीं थे ' यह मानना पड़ेगा, नहीं तो वचनोंसे विरोध पड़ता है । तब चाण्डाल उनका गीण पूर्वके प्रामाणिक सूचक नाम हुआ, वास्तविक नहीं, जैसा कि ' न्यायदर्शन , केवल निन्दा-' प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देन अनुवादः, निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ' में कहा है-( ४/१/६० ( जहाँ प्रधान शब्द संगत न हो सकता हो, वहाँ निन्दायादिसे ) रूप प्रर्थवाद हुआ करता है ) । गुणवाद-अथवा उनकी चाण्डालप्रसिद्धिका एक अन्य कारण भी हो है । मनुस्मृति में कहा है- ' शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यची सकता जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते, ( ३।१७ ) अर्थात् गतिम् । प पैदा करनेसे – ब्राह्मणत्वकी हानि होती है । श्रध्यात्मरामायण शूद्रासे संतान वच बताया जा चुका है कि - वाल्मीकिके शूद्रासे विवाह कर रखा था, उससे कई लड़के भी पैदा हो गये थे, तब ब्राह्मण्यकी भ्रष्टता से उसे कर्मचाण्डाल कहीं कहा गया हो; यह सम्भव है । पर पातित्यमें भी जाति नहीं जाती. यह शास्त्रीय मत है । तभी तो उक्त अध्यात्मरामायण के वचनमें कहा है - ' जन्ममात्रं द्विजत्वं मे ' । इसके अतिरिक्त चाण्डाल होता है ब्राह्मणीको सन्तान; परन्तु न यह बात वाल्मीकिमें घटती है, पितामें । तव चाण्डालोंने उनसे अपना सम्बन्ध कैसे उसकी शूद्रा स्त्रीके सन्तान पारशत्र तो माने जा सकते हैं यहाँ पर यह भी जानना चाहिये कि त्राह्मणको कहा जा सकता है, वहाँ पर चाण्डाल शल्द वास्तविक पारिभाषिक होता है | देखिये इस पर अत्रिस्मृति - ' देवो, वैश्य, शूद्रो, निषादकः । पशुम्लेंच्छोऽपि चाण्डालो स्मृताः ( ३७१, अत्रिसंहिता ३७३ ) यहां पर ब्राह्मणके हैं । उसमें ब्राह्मणका एक भेद ' पशु ' भी कहा गया है शुद्रपतिसे उत्पन्न न वाल्मीकिके IP जोड़ लिया? 1 H , चाण्डाल नहीं । भी कहीं चाण्डाल नहीं होता, किन्तु 2 मुनिर्द्विजो, राजा विप्रा दर्शावधाः ll दश भेद कहे गये , तो क्या वादी-लोग उसे वास्तवमें ' पशु ' मानकर उस दिनसे उसे खली - भूसा खिलाना

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३६८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्रारम्भ करेंगे? यदि नहीं; तो इसी प्रकार ब्राह्मणको वहाँ चाण्डाल कहने-( 2 ) पर भी उसे वास्तविक चाण्डाल नहीं समझना चाहिये, किन्तु उसे पारि-भाषिक शब्द समझना चाहिये । वह पारिभाषा यह है— ' क्रियाहीनश्च मूर्खश्च सर्वधर्मविवर्जितः । निर्दयः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते ' ग्रत्रिस्मृति ३८१ ( त्रिसंहिता II ३८३ ) यह लक्षण ' शूद्राचाररत ' जन्म ब्राह्मण वाल्मीकिमें घट जानेसे उसे कहीं चाण्डाल कहा गया हो, यह सम्भव है, पर यह वास्तविक चाण्डाल सिद्ध न हुए; किन्तु जन्न - ब्राह्मण ही सिद्ध हुए । मत्स्यपुराणमें वरुणका H2H बीयं वल्मीकमें गिरने से यह वरुणपुत्र थे- ऐसा सूचित किया है । abla अथवा यहाँ अन्य रहस्य भी हो सकता है, वह यह है कि वाल्मीकि 1 दो हैं, एक महपि वाल्मीकि, दूसरे श्री वाल्मीकि । श्रीनाभाजीसे बनाई ' भक्तमाला ' पुस्तक में जिसकी श्रीप्रियादासने टीका लिखी है - दो वाल्मी-कियोंका निरूपण किया है । वहाँ उनने ६१ संख्या वाले पहले श्रीवाल्मी-किके विषयमें लिखा है क्रि - ' आदिकवि श्रीवाल्मीकि थे तो ब्राह्मण, परन्तु ( i ) भीलके द्वारा पाले गये, भीलनी हीसे उनका विवाह हुआ; पथिकों को मारना- लूटना ही उनका उद्यम रहा । करुणाकर हरिकी इच्छा से एक दिन सप्तर्षि उसके सामने आये । इनको भी जब उसने लूटना चाहा; तव उन महात्मानोंने ऐसा उपदेश दिया कि - रे द्विजाधम '! ' जो तेरे यम - दण्डमें भागी होइ न कोई । तो कत ही जत पाप हठि घोर दण्ड जिहि होई ' इत्यादि । श्रोसीताराम की | कृपासे महाभागवत . | हट गई सप्तर्षियोंके दर्शन और सम्भाषणसे उसकी किरात- बुद्धि हरे, विरक्ति और सूवृद्धि उत्पन्न हुई । वह वहाँ मरा - मरा जपते हुए £ ) ( मीक । बहुत समय बीतने पर वे सप्तर्षि फिर वहाँ प्राये । उसे उन्होंने ( वांवी ) में ढौंढा, और उसका नाम ' वाल्मीकि ' रखा । | गया है दूसरा ६२ संख्या वाला वाल्मीकि भी ' भक्तमाला ' में वर्णित किया , वह वहां इवपच ( चाण्डाल ) बताया गया है परन्तु उसे गुप्त -, क्या श्रीवाल्मीकि चाण्डाल थे? [ ३६ भगवद्भक्त श्रौर नामस्मरण लग्न स्वीकृत किया गया । यह सम्भव है कि उक्त टीकाकारका लेख उसी श्वपच ( चाण्डाल ) वाल्मीकिको अधिकृत करके लिखा गया हो? वह वाल्मीकिरामायणके कर्त्तासे भिन्न होनेसे उससे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । सो भंगियोंका उपास्य यही श्वपच वाल्मीकि ही हो सकता है, उनका रामायणकर्त्ता वाल्मीकिसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं; श्रतः उन्हें यह अपनी भूल सुधार लेनी चाहिये । कहीं यह भी लिखा मिला है कि यह ब्राह्मणपुत्र थे । उसके माता-पिता इसे वनमें छोड़कर तपस्या करने चले गये । तब यह बालक एक-भीलनीको मिला । उसने इसे पाला । उसने इनका नाम ' रत्नाकर ' रखा । उसका विवाह भी भीलकन्यासे किया । भिल्लसंसगंने यह अपना स्वरूप भी भूल गये, जिसका नारदजीने स्मरण कराकर उद्धार किया । फलतः — श्रीवाल्मीकि जन्मसे ब्राह्मण सिद्ध हुए । यद्यपि किरातोंकी सङ्गतिसे वह बाल्य में अपना स्वरूप भूल बैठे, तथापि ऋषियोंकी सत्सङ्गयिसे फिर सम्भल गये । मलिन सोना फिर स्वच्छ सुवर्ण हो गया । भारी तपस्या करके इन्होंने पूर्वका प्रायश्चित्त कर डाला । कहावत एक प्रसिद्ध है कि ' सुबह का भूला शामको घर लौट आए, तो गुला नहीं कहा जा सकता ' । तब इनको ' भंगी ' बताने वाले भारी भूल कर रहे हैं । फिर ' वाल्मीकिका भंगियोंसे सम्बन्ध कैसे हुआ, यह बात विचारणीय है । हो सकता है कि वाल्मीकिके शूद्रा- गर्भज लड़कोंकी परम्परा चल पड़ी हो, और उन्होंने वाल्मीकिकी तपस्या प्रसिद्ध हो जाने के समय अपने आपको ' वाल्मीक ' प्रसिद्ध कर डाला हो । पर दे धर्मशास्त्रविरुद्ध होनेसे न्याय्य ( जायज ) लड़के नहीं थे, तब उनका सुधरे हुए तपस्वी ब्राह्मण-वाल्मीकिसे सम्बन्ध जोड़ना भी व्यर्थ है, क्योंकि उस समय वे ' रत्नाकर ' थे, वाल्मीकि नहीं । अथवा दूसरे श्वपच वाल्मीकिका भक्तमालासे वर्णन भी हम बता चुके हैं, तब भंगियोंका सम्बन्ध उसी वाल्मीकिसे हो, यह सम्भव है । पर वे रामायणकर्ता नहीं थे ।

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४०० ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वस्तुतः स्कन्दपुराण- वैष्णव खण्ड, वैशाखमाहात्म्य २१ अध्यायमें श्री वाल्मीकिको पूर्व जन्ममें ही व्याध बताया गया है, तब दूसरे जन्ममें वल्मीकका पुत्र वाल्मीकि इस नामसे विख्यात होकर रामकथांका प्रका-पाक उसको कहा है, इससे भी वादियोंकी पक्ष - सिद्धि नहीं । इस अनुसन्धानसे स्पष्ट हुआ कि वाल्मीकि चाण्डाल वा अन्त्यज वा भँगी नहीं थे, वे दिव्य वा उच्च ब्राह्मण थे । वे ब्रह्मा के पौत्र थे, तभी उनकी रामायणका ब्रह्माजीने रामायणके अन्तिम पद्य के अनुसार अनुमोदन. किया । प्रारम्भ में नारद तथा ब्रह्मा इसी सम्बन्धसे उनके पास गये थे; और उन्हें रामायणके बीज समझाये थे । तब शूद्रोंका वेदाधिकार सिद्ध करनेमें यह उदाहरण भी ग्रकिञ्चित्कर सिद्ध हुया । अन्त्यजोद्धार - बद्ध-बुद्धि सज्जनोंको उचित है कि उनका मर्यादामें रहकर उद्धार करें, ऋषि-मुनियोंको शूद्र अन्त्यज सिद्ध कर देनेसे अन्त्यजोंका उद्धार नहीं होगा । श्री वाल्मीकि रामायण जिसे सभी लोग प्रामाणिक मानते हैं उसमें तथा पुराण - इतिहास में एतद्विषयक कोई गन्ध भी नहीं मिलती, न ही किसी अन्य मूलपुस्तक में ऐसी कोई बात मिली है । तब इन प्रसिद्ध प्रमाणों को छोड़ कर अप्रसिद्ध एवं निर्मूल किसी अन्य अनाप्तकी निष्प्रमाण बातोंको मान्य कर लेना अपना अविवेक प्रकट करना है । आशा है- विद्वान् लोग फैले हुए एतद्विषयक भ्रमोंको मिटाने में सहायक बनेंगे । स्त्रीको पति एवं माता-पिता द्वारा तथा शुद्र अन्त्यजोंको द्विज - द्वारा पुराणादि - स्थित वैदिकज्ञान यथावकाश सुनाना यही प्राचीन एवं शास्त्रीय मर्यादा है, साक्षात् वेदा-धिकार उन्हें देना शास्त्रीय एवं प्राचीन मर्यादा नहीं । ( ३४ ) क्या जानश्रुति वस्तुतः शूद्र थे? ( १२ वीं ऐतिहासिक भूल ) I ( पूर्वपक्ष ) — जानश्रुति - नामक पुरुष जो रैक्वके पास विद्याग्रहणार्थं I गया था - शूद्र था । रैक्वने उसे कहा था ' ग्रह हारे त्वा शूद्र! ' ( छान्दो-. I ग्योपनिषद् ४।२।३ ) तब शुद्रका भी विद्याधिकार एवं वेदाधिकार सिद्ध I I हुआ । ( एंबार कृष्णमा. ' वर्णविमर्श ' में ) IIIIII ( उत्तरपक्ष ) - ऐसा नहीं । जानश्रुति जन्मसे क्षत्रिय था, उसे निन्दा से शूद्र कहा है, वह वस्तुतः शूद्र नहीं । जैसे- ' साहित्यसङ्गीत - कलाविहीनः, साक्षात् पशु: ' इस भर्तृहरिके वचन में साहित्यसंगीतकला से हीन पुरुषको साक्षात् पशु ' कहने पर भी उसे वस्तुतः पशु नहीं माना जाता, नहीं तो उसे भीखू में बांधा जाय, खली - भूसा भी उसे खिलाया जाय, पर ऐसा नहीं किया जाता, किन्तु उसे निन्दार्थवादसे वैसे कहा जाता है । जैसाकि ' न्यायदर्शन ' में कहा है- ' प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादः, निन्दाप्रश-IIIII सोपपत्त ेः ' ( ४।१।६० ) IIIIII उसका तात्पर्य तद्वत्तामें ही माना जाता है, साक्षात् तत्तामें नहीं, वैसे ही उक्त - उपनिषद् में क्षत्रिय - जानश्रुतिकेलिए कहा हुआ ' शुद्र ' शब्द निन्दार्थवाद होनेसे ‘ गौण ' शब्द है, ' मुख्य ' नहीं, अतएव " यौगिक ' है-‘ रूढ ' नहीं । शुचा श्रभिद्र द्राव, इति शूद्रः ' हंसके वचन सुननेसे अपनी The ज्ञानहीनताके शोकसे युक्त हुप्रा जानश्रुति रैक्वके पास दौड़ा गया, इसलिए उसे शब्दतः ' शूद्र ' कहा गया है । रूढि अर्थ प्रकृत न होने पर श्रवयवार्थ भी किया जाता है; यदि वह प्रकृत हो तो । जानश्रुति गुरु - शुश्रूषाकर्त्ता बनकर रैंक्वके पास जिज्ञासाशमनार्थं नहीं 1031 गया, किन्तु शूद्रोंकी तरह उसे धनका लोभ दिखाकर उसने अपनी प्राशङ्का दूर करनी चाही; श्रतः मुनिने उसे श्रशूद्र होने पर भी शूद्रबत्तासे पूर्व कहा । ' वत् ' प्रत्यय न होने पर भी ' वत् ' का अर्थ लग जाता है, जैसे कि IIII स ० ध ० २६

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EOR ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) शेष रहा वादीका ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका अर्थ; सो वह तो सर्वथा ही प्रशुद्ध है । जब वादीके स्वा.द.ने ही उसमें भक्तके द्वारा बुलवाना नहीं लिखा; इधर जब ईश्वर ' देवता ' होनेसे प्रतिपादक नहीं, किन्तु प्रतिपाद्य है, बादीके भी अनुसार निराकार होने से जब परमात्मा स्वयं बोल नहीं सकता, तब भक्तके द्वारा वह प्रतिपाद्य ही रहेगा, स्वयं प्रतिपादक नहीं | तब वादीके अर्थके अशुद्ध सिद्ध होनेसे उस सिकताभित्ति पर ग्राश्रित वादीका पक्षरूपी महल भी स्वयं धराशायी हो गया । ' स्व ' का अर्थ वादी करता है कि ऐ भक्त! क्या तेरे अपने, क्या प । स्वा.द.ने इससे अपनी स्त्री, सेवक तथा अन्त्यज, लिये हैं; तब दोनों गुरु - चेलों में किसका अर्थ ठीक और किसका गलत है? श्रागे जो ' हे भक्त! ऐसा उद्योग कर, जिससे देवोंमें मेरा प्रेम बढ़े, यज्ञ करनेवाले तथा दक्षिणा देनेवालोंमें मेरा प्रेम बढ़े '? इस अर्थसे वादीने परमात्माको अशक्त सिद्ध कर दिया । मन्त्र कहता है -- ' प्रियो देवानां भूयासम् ' ' दक्षिणाया दातुश्च प्रियो भूयासम् ' ( मैं देवताओं का प्यारा में, दक्षिणा देनेवालोंका प्यारा बनू ) पर वादीने ' इनमें प्रेम बढ़े ' यह । प ही बदल दिया है । ' ऐसा उद्योग कर यह शब्द भी वादीने स्वयं मन्त्रार्थ में प्रक्षिप्त कर दिये, जो शायद परमात्माकी गलतीसे छूट गये हो! हे ' भक्त! तेरे उद्योगसे ' अयं मे काम: समृध्यताम् ' ( मेरी यह है । कामना पूर्ण हो ) । भी | देखिये पाठकगण! वादीने ' हे भक्त.! तेरे उद्योगसे ' इतने शब्द उक्त परमेश्वरकी वेदमन्त्र के अर्थ में प्रक्षिप्त कर दिये हैं । हा खेद! यह लोग देते हैं वाणी में शायद त्रुटि देखते हैं. तब मनगढ़न्त प्रक्षेप उसमें कर । यहाँ यही दशा इस ' यथेमां ' से पूर्व मन्त्रकी भी वादीने की है । वस्तुतः वादी के अनुसार भी ईश्वरके निराकार होनेसे प्रतिपादक न हो-विद्यालङ्कारको प्रत्युत्तर [ ९ ०३ सकने के कारण ' यह परमात्माने भक्तको कहा है ' यह व्याघात हो जानेसे उसका पक्ष मूलसे ही कट गया । क्योंकि - कभी कहते हैं- ' परमात्मा निराकार होनेके कारण स्वयं बोल नहीं सकता, इसलिए भक्तों द्वारा बुलवाता है ' ( पृ. २६३ ) कभी कहते हैं कि - परमात्मा भक्तोंसे कहता है ' ( पृ. २६६ ), तब ' यावज्जीवमहं मोती ब्रह्मचारी तु मे पिता । माता तु मम वन्ध्यासीद् प्रपुत्रश्च पितामहः ' की तरह वादीका लेख स्वयं ही व्याघात ग्रस्त होनेके कारण खण्डित हो गया । वादीने हमसे दिखलाये हुए दोषोंका न तो क्रमसे उद्धरण दिया है; न उनका कोई समाधान ही किया है । केवल कुछ लिख देनेसे काम नहीं चल सकता । ' हे भक्त! ये अग्नि और पृथिवी मेरे सामने सिर झुकाते हैं, मेरी आज्ञा है - सदा झुकाते रहें । यह अर्थ भी गलत है । एक तो भक्तका अध्याहार करना निर्मूल है । दूसरा जब प्रग्नि और पृथिवी उसके सामने सिर झुका रहे हैं; तब यह प्राज्ञा देना कि - सदा सिर झुकाते रहें - यह कथन व्यर्थ हो जाता है ॥ और ' मेरी आज्ञा है ' यह किस पदका अर्थ है? वादी मन्त्रार्थ में प्रक्षेप कर रहा है । ' सिर झुकाने ' का भाव ' अनुकूल होना ' है । सो अनुकूल तो वे ऋषिके सामने भी हो सकते हैं । इसलिए आवश्यक नहीं कि यहाँ परमात्मा ही वक्ता हो । ऋषि भी हो सकता है । इधर ' सन्नमतां ' का अर्थ ' सन्नमयताम् ' है । ' छन्दस्युभयथा ' ( पा. ३ | ४ | ११७ ) ' णेरनिटि ' ( पा. ६।४।५१ ) इन पाणिनिसूत्रोंसे सार्वधातुक-शक्की प्रार्धधातुक संज्ञा हो जानेसे णिका लोप होकर उक्त प्रयोगकी सिद्धि है कि - अमुकको मेरे वशवर्ती करें । यहाँ प्रार्थनामें लोट् है । सो इसका प्रार्थनाकर्ता ऋषि याज्ञवल्क्य ही वक्ता है । परमात्मा वा देवता भला वक्ता कैसे हो सकते हैं? देवता तो इस मन्त्रके अजमेर वैदिक-यन्त्रालयकी यजुर्वेदसंहितामें ' अग्न्यादय: ' इस प्रकार बहुतसे कहे गये हैं ।

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४०४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) हंसवाक्याद् ग्रात्मनोऽनादरं श्रुतवतो जानश्रुतेः शुक् उत्पेदे, ताम् ऋषी ' क्वः ' शूद्र ' शब्देनानेन सूचयाम्बभूव आत्मनः परोक्षज्ञताख्यापनाय - इति गम्यते, जातिशूद्रस्यानधिकारात् । ( हंसवचनेन ) शुचमभिदुद्राव, शुचा वा अभिद्रवे, शुचा वा रैक्वमभिदुद्राव - इति ( शाब्दिक - ) शूद्रः । अवयवार्थ-सम्भवाद् रूढ्यर्थस्य च असम्भवात् । दृश्यते च प्रयमस्यामाख्यायि-कायाम् । ' • ( पूर्वपक्ष ) - ' शूद्राधिकारका पोषक श्रुतिका यह लिङ्ग है - ' संवर्ग-विद्याके श्रवणकी इच्छावाले जानश्रुतिको ' शूद्र ' शब्दसे बुलाया गया है । ( उत्तरपक्ष ) - यह लिङ्ग नहीं है कि शूद्रको ब्रह्मविद्याका अधिकार है, क्योंकि इसमें न्याय नहीं । न्याय होनेपर ही लिङ्ग द्योतक हुआ करता है, अन्यथा नहीं । पर यहाँ न्याय नहीं है । भले ही यहाँका ' शूद्र ' शब्द केवल एक संवर्गविद्या में ही शुद्रको अधिकार दे दे; क्योंकि यह उसी विषय में है, पर इससे शुद्रका सब विद्यात्रों में अधिकार कैसे हो जावेगा? यह तो भूतार्थवादका वाक्य है; विधिवाक्य नहीं; श्रतः यह शूद्रको कहीं अधिकृत नहीं कर सकता । यह ' शूद्र ' शब्द अधिकृतविषयमें जोड़ा जा सकता है । हंसके वाक्य सुननेसे अपने अनादरको सुनते हुए जानश्रुतिको शोक पैदा हो गया । ' उस शोंकको मैं जान गया हूँ ' इस प्रकार ऋषि रैक्वने अपनी परोक्षज्ञानमें शक्ति बताते हुए यौगिक ' शूद्र ' शब्दसे सूचित कर दिया - यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा है । क्योंकि विधिशास्त्र के अनुसार जाति-( जन्मके ) शूद्रका अधिकार नहीं माना गया है । [ हंसके वचनसे जानश्रुति ] शोकको ( अभिदुद्राव ) प्राप्त हुआ, अथवा शोकसे अभद्रत हुम्रा; अथवा शोकसे रैक्वके पास ( श्रभिदुद्राव ) गया; इस प्रकार वह शाब्दिक - शूद्र है । क्योंकि - यहाँ प्रकरणके बलसे शूद्रका यौगिक अर्थ तो हो सकता है; पर विधिशास्त्रसे विरुद्ध होनेसे यहाँ ' शूद्र ' शब्दका रूढि अर्थ ( जातिशूद्र ) तो असम्भव है । यह बात इसी प्राख्यायिकामें स्पष्ट क्या जानश्रुति वस्तुतः शूद्र थे? Yox Yo हो भी रही है ) । आगे १।३।३५ सूत्रका शाङ्करभाष्य इस प्रकार है- ' इतश्च न जातिशूद्रो श्री नानश्रुतिः । यत्कारणं - प्रकरण निरूपणेन क्षत्रियत्वमस्य उत्तरत्र चैत्ररखेर क्षत्र अभिप्रतारिणा क्षत्रियेण समभिव्याहाराद् लिङ्गाद् गम्यते । ' । इस चैत्ररथिर्नाम एकः क्षत्रपतिरजायत ' इति च क्षत्रपतित्वावगमात् तस्माइ । त्वमस्यावगन्तव्यम् । तेन क्षत्रियेण अभिप्रतारिणा सह समानायां विद्यायां क्षत्रिय- मानव संकीर्तनं जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वं सूचयति । क्षत्तृ ( सूत ) प्रेपणाद्यं स्वयं- बास्त योगाच्च जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः, अतो न शूद्रस्याधिकारः । ' देते इसका अर्थ इस प्रकार ( जानश्रुति शूद्र नहीं है; क्योंकि प्रकरण देखने से यह क्षत्रिय सिद्ध हो रहा है । यह श्रागे चित्ररथके लड़के अमि. महाव्र प्रतारीके साथ जोकि क्षत्रिय है - कहा गया है | ( हमारे पूर्व के महानुभाव उदार साहचर्यं - नियमका बड़ा खग्गल रखते थे, यह महाभाष्यकारने ' प्रत्याहारे. क्षत्रि नुबन्धानां ' वार्तिक में सूचित किया है ) यह लिङ्ग ( हमारे पक्षका पोषक था । प्रमाण ) है । ' चैत्ररथि नामक एक क्षत्रिय राजा हुआ । यहाँपर चित्ररक के लडकेको क्षत्रपति कहा गया है । उस क्षत्रिय चित्ररथके लड़के त्रि-प्रतारीके साथ समान विद्या में जानश्रुतिका नाम भी लेना जानश्रुतिको श्रुति क्षत्रिय बता रहा है । और फिर रथके सारथिको रैक्वके ढूंढनेका हुकम देना - इस ईश्वरता ( राजत्व ) से भी जानश्रुति स्पष्ट क्षत्रिय सिद्ध हो के पा रहा है । शूद्रमें यह ऐश्वर्य नहीं होता कि अपने रथके चलानेकेलिए बादरा नौकर - चाकर रखे; और उनको किसीके ढूंढ लाने का हुकम दे । श्रतः शोक स्पष्ट है कि - शूद्रका ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं होता ) । प्रतीत इस प्रकार श्रीवेदव्यासद्वारा जानश्रुतिको शाब्दिक - शूद्रता एवं शोक वास्तविक - क्षत्रियता बतानेसे जानश्रुति भी शूद्र नहीं थे- यह सिद्ध हो वालेके गया । अशुद्रका विद्याग्रहणार्थं जाना सिद्ध हो जानेसे श्रीव्यासजी के मत 42 भी शुद्रका विद्याग्रहणमें अनधिकार सिद्ध हुआ इसी कारण ही उन्होंने उपनिष वेदान्तदर्शनमें यह अपशूद्राधिकरण रखा है । इस भाष्यका हिन्दी अनुवाद ।