सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 231–240
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 231–240
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श्रीसनातनधर्मालांकः ( ३-२ ) ४०५ ४०६ ] ' अपशूद्राधिकरण ' में भी देखिये । ' जातिनिर्णय ' में पृ. २८८ मागे - काव्यतीर्थ ने भी यही माना है - ' यद्यपि यह ( जानश्रुति ) नातिशूद्रो श्रीशिवशंकर था परन्तु इनको शोक उपस्थित हुप्रा, उससे द्रवीभूत हुआ चैत्ररवेन क्षत्रिय इसको , ऋषिने ' शूद्र ' कहा, यह कथन ठीक है ' ।, ' तस्मात् इस हेतु रामानन्दी श्राचार्य श्रीभगवदाचार्यजी शूद्रोंको वेदाधिकारी क्षत्रिय-विद्यायां मानते हैं; पर उनने अपने ' वेदान्तदर्शन ' के ' वैदिकभाष्य ' में जानश्रुतिको स्वयं- बास्तविक शूद्र न मानकर उसे क्षत्रिय ही माना है । हम उसका अनुवाद देते हैं-१।३।४४ ' शुगस्य ' के भाष्य में वे लिखते हैं ।... यह प्रसङ्ग ताण्ड्य-5 प्रकरण टके अमि महाब्राह्मण ' छान्दोग्योपनिषद् ' में लिखा गया है - ' पौत्रायण जानश्रुति कोई . उदार - जो धन, स्त्री, घर त्रादिकी अपेक्षा नहीं करता था, एक दानी महानुभाव क्षत्रिय था । किसी रातको महल पर किसी अदृश्य स्थानपर वह सो रहा त्याहारे. था । वहां पर उसने विश्राम करने की इच्छासे प्राये हुए हंसों में एक हंससे का पोषक कही जाती हुई अपनी कीर्ति सुनी । चित्ररथ डके श्रमि दूसरे किसी हंसने- जिसे जानश्रुतिका माहात्म्य पता नहीं था, पर जिसे रैक्व मुनिका माहात्म्य पता था - जानश्रुतिका अनादर किया । जान-श्रुतिको श्रुति धर्मका आदर करनेवाला था, उसे अपना अनादर सुननेसे शोक का सिद्ध हु हुघ्रा । वह उस शोकके दूर करनेकी इच्छासे सूत द्वारा ढूंढे हुए मुनि-हो के पास गया - यह उपनिषद्की गाथा है । उसीको प्राश्रित के नेकेलिए बादरायण समाधान करता है कि उस अपने अनादर सुननेसे जानश्रुतिको दे । ग्रतः शोक हुआ । उस शोक से रैक्वके पास दौड़ - धूप करने से यह निश्चित प्रतीत होता है कि - विद्वानों को भी जो शोकले सन्तप्त मन वाले होते हैं-द्रता एवं शोक हटानेकेलिए किसी सार्थक -विद्याको ग्रहण करने उस विद्याके जानने-सिद्ध हो वाले के पास जाता देखा गया है । के मत उन्होंने ‘ क्षत्रियत्वावगतेश्च ’ ( १।३।३५ ) ( वैदिकभाष्य ) ' जानश्रुतिकी क्षत्रियता अनुवाद उपनिषद्से प्रतीत हो भी रही है । विद्यार्थ जाना यह वर्ण एवं श्राश्रमके क्या जानश्रुति वस्तुतः शूद्र? [ ४०३ अभिमान में विद्याका फल हुआ करता है । उसको मैं क्षत्रिय हूं, मैं राजा . हूं ' यह वडा अभिमान हुग्रा था 1... जानश्रुति क्षत्रिय था. यह कैसे मालूम हुआ? सूत्रकार कहते हैं-' उत्तर ' ( १।३।३६ ) पर वैदिव - भाव्य-' मागे इसी ही प्रकरण में कांपकी गाथा कही गई हैं । उसमें चैत्ररथ क्षत्रिय है - ( ताण्ड्य २०१२ ) इसी ब्राह्मणके प्रमाणसे चैत्ररथ क्षत्रिय होनेसे ही कर्माधिकारी या । समान प्रकरण होनेसे वन कन्यादिके दान के साथ विद्याग्रहणरूप क्षत्रियके लिङ्गने जानश्रुति क्षत्रिय ही था ' । ( अतः जानश्रुति पौत्रायण भी क्षत्रिय ही था यह स्पष्ट हैं ' ( पृ. ५० ) । छान्दोग्योपनिषत् - संस्कारभाष्य में भी उक्त महोदयने ' ग्रह हारेत्या शूद्र! ' ( ४/२/३ ) में लिखा है- ' थोडा ही घन लेकर जानश्रुति मेरी विद्या चाहता है, उससे कुपित हुए रेक्वने जानश्रुतिका अनादर करना चाहते हुए उसे ' अहह घरे शूद्र ' इन अपशब्दोंने गाली दी । ( पृ. १८ ) । इससे सिद्ध हुप्रा कि यह ' शूद्र ' शब्द जानश्रुतिकेलिए केवल गाली-रूप ही है, वास्तविक नहीं । यदि वह वस्तुतः क्षूद्र होता; तब यह ' शूद्र ' शव्द गालीरूप न होता; तब तो वैसी वस्तुस्थिति होती । जैसे कि --ऐल्प- कवषको ' दापा पुत्र और घब्राह्मण ' शब्द अधिक्षेप ( गाली ) केलिए कहा गया था, वह वहाँ ब्राह्मण था शूद नहीं । ' इसपर पीछे देखी ( पृ. ३०१, ३०६-३११ ) । इस प्रकार हमने इस कालकी सुधारकोंकी बारह ऐतिहासिक भूलें दिग्वलाई हैं । ' आलोक ' पाठकोंने उनपर सम्यक्या विचार कर लिया होगा । इन वर्तमान सुधारकोंकी भूलोंको समाप्त करके फिर हम पूर्वानुतन स्त्री - शुद्र के वेदानधिकार सम्बन्धी प्रकरण पर चलते है ।
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( ३५ ) उवट - महीधरके मत में शूद्रोंको यज्ञाधिकार (? ) पूर्वपक्ष - ( क ) ' अग्निर्ऋपिः पाञ्चजन्य: ' ( यजु: २६/६ ) में ' पञ्च-जनेभ्यो हितः, चत्वारो वर्णा निषादपञ्चमाः पञ्चजनाः तेषां हि यज्ञेधि-रोस्ति ' यह उपटने, ' विप्रादयश्चत्वारो वर्णा निषादश्चेति पञ्चजनाः, तेषां यज्ञाधिकारात् ' यह महीधरने अर्थ किया है । तब शूद्रान्त्यजोंका यज्ञविषय वाले वेदमें भी अधिकार सिद्ध है । ( ख ) मी. द. के ' चातुर्वर्ण्यम-विशेषात् ' ( ६।१।२५-२७-२६-३१-३५ ) आदि सूत्रोंसे जैमिनिजी भी शुद्रको यज्ञाधिकारी मानते हैं ' ( श्रीतकंरत्नजी ' अछूतो. पृ. १५-२६ में, एक सिद्धान्तालङ्कार ' उदारतम आचार्य दयानन्द ' में, श्रीशाण्डिल्यजी भा ध.शा. में ) । उत्तरपक्ष - ( क ) मन्त्रसंस्कृत और प्रसंस्कृत दो प्रकारकी मूर्ति की -तर अग्नि भी दो प्रकारकी होती है । संस्कृत - मूर्ति एवं अग्निमें संस्कृत ! उपनयनादि - संस्कार - सम्पन्न ] त्रैवर्णिकों का ही अधिकार होता है, असंस्कृत-शूद्रादिका नहीं, पर असंस्कृत मूर्ति एवं अग्नि में शूद्रादिका भी अधिकार हो सकता है । यह बात निर्मूल भी नहीं है, जैसे कि- ' भा.ध.शा. ' ८०-८१ पृष्ठमें श्रीशाण्डिल्यजीने ' अदूरदर्शी प्रभुपूजक ' आदि शब्दोंसे लिखा है, किन्तु यह समूल है । ‘ प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्देवतं महत् ' ( ६ ३१७ ) यहाँ मनुजीने दो श्रग्नियां मानी हैं, १ प्रणीत - मन्त्रसंस्कृत, प्राहित, २ अप्रणीत -असंस्कृत, अनाहित । श्रीमद्भाग. में भी कहा है- ' वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः ' ( ११।२७।७ ) यहाँ यज्ञ वैदिक तथा तद्भिन्न भी माना गया है । वेदमें शास्त्रानुसार त्रैवणिक अधिकृत होनेसे वैदिकयज्ञका अधिकारी भी त्रैवर्णिक ही होता है, तन्त्र - पुराण - विशेषोंमें शूद्रादि भी श्रधिकृत होनेसे तान्त्रिकयज्ञमें पञ्चजन अधिकृत हो सकते हैं । सो उवट-महीवर भाष्य में भी उसी प्रसंस्कृत - अग्निका उद्देश्य है - जिसके द्वारा 2 पञ्चयज्ञ किये जाते हैं । उवट - महीधरके मतमें शूद्रोंको यज्ञाधिकार? [ YOR उदाहरणतः ' कात्या.श्रौ.सू. ' में अत्रैवर्णिक रथकारस्थपतिकां ४१० इष्टि कही है - यह उसके कर्कभाष्य में स्पष्ट है । वहां प्रश्न । विचायते - स्थपतीष्ट्यां किमाधानसंस्कृतोग्निः, उत लौकिक है- ' तत ही नि उत्तर है- ' लौकिके ' ( १ | १ | १४ ) लौकिकेग्नौ एतत् स्यात् [ न:? " वहाँ म मीमां. शावर भाष्य में भी कहा है- ' तस्माल्लौकिकेषु श्रग्निषु तु संस्कृते ] ' । १ ) द्वि-[ न संस्कृतेषु ] ' ( ६।८।२१ ) | इस प्रकार उवट - महीधरके स्थपतीष्टि भाष्य: । द्विनको निषाद - पञ्चम चार वर्णोंका यज्ञाधिकार भी लौकिक प्रसंस्कृत में भी शुद्रको होनेवाले पञ्चयज्ञोंके लिए ही है, क्योंकि - वैदिक यज्ञ में प्रत्रैवर्णिका ग्रमि हुए कह अधिकार नहीं, यह पूर्वमीमांसाके ' यागे ' शूद्रानधिकाराधिकरण ' तथा ( ४१ उत्तरमीमांसाके ' अपशूद्राधिकरण ' में स्पष्ट है । ' एवमपि आर्यसमाजी - विद्वान् श्रीतुलसीरामस्वामीने मनु ( ६।३१ ९ ) यद्यको शूद्रकी व्याख्यामें ‘ यज्ञमें शूद्रके घरका अग्नि वर्जित माना है । स्वा. द. जीने भी लिखा ' संस्कार विधि ' के सामा. प्र. में लिखा है- ' प्र भूर्भुव: - मन्त्रका उच्चारस ( क्योंकि करके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके घरसे श्रग्नि ला ' ( पृ. २३ ) । ' श्रागाराद III ब्राह्मणस्य वा राजन्यस्य वा वैश्यस्य वा ' ( गोभिल. १ । १ । १६ ) में भी यह माना स्पष्ट है । इसमें शूद्रका नाम नहीं रखा गया । इनसे स्पष्ट हो रहा है । की तरह कि- वैदिकयज्ञाधिकारी न होनेसे वैदिकयज्ञार्थ शूद्रकी प्रसंस्कृत अग्नि नहीं लाई जाती । यज्ञमें ' उ मन्त्र के विनियोजक ब्राह्मण में कहा है- ' न वै देवाः सर्वेणैव संबदन्ते- | धर ब्राह्मणेन वैव, राजन्येन वा वैश्येन वा, ते हि यज्ञियाः ( यहाँ श्रादिप उम afaint ही यज्ञिय माना है । बल्कि वैदिकयज्ञमें दीक्षितका शुद्धने असंस्कृत साक्षात् बोलना भी निषिद्ध माना है, जैसे कि - ' तस्माद् यदि एन शु नहीं; संवादो विन्देत्, एतेषामेव [ त्रयाणां ] एकं ब्रूयाद् इममिति विचक्ष, पञ्चमह इममिति विचक्ष्व ' ( शतपथ. ३।१।१।१० ) । इसी प्रकार ' ब्राह्मणो वै रहे हैं । राजन्यो वा वैश्यो बा — ते हि यज्ञियाः ' ( शत. ३ | १ | १ | ९ ) यहाँ मह त्रैवर्णिकोंको ही वैदिकयज्ञका अधिकारी बताया है, शतपथमें बंदिस्त शुद्राणां अनुष्ठान
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[ ४०१ श्री सनातनधर्मालांकः ( ३-२ ) ४१० ] स्थपतित्रां - सर्वन ही निरूपित हैं । ? ' में भी इसीलिए ' अयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ. १।१४६१ संस्कृते वहाँ मन्त्रभाग ही यज्ञाधिकारी कहा है । इसी वैदिकयज्ञके अधिकारी न्यपतीष्टि ॥ ५ ) द्विजको ही वैदिकयज्ञका वस्त्र यज्ञोपवीत पहननेका अधिकार होता है,. : द्विजको में भी शुद्रको नहीं । इसलिए कृष्णयजुर्वेद में शूद्रका यज्ञमें अनधिकार बताते प्रोिं है- ' तस्मात् शूद्रो यज्ञेनवक्लृप्त: ' ( तै.सं. ७ ११४६ ) । हुए कहा निर्वाणिकरा वर्णिकों के हो यज्ञ - संयोग होनेसे उनकी ही स्त्रीको वेदाङ्गपाणिनीय-रण तथा ( ४/१/३३ ) सूत्रसे वास्तविक ' पत्नी ' माना है, शूद्र स्त्रीको नहीं । " एवमपि तुषजकस्य ( शूद्रस्य ) पत्नी न सिध्यति ' ( इस प्रकार तुषजक-) को ढ़की ' पत्नी ' सिद्ध नहीं हो सकती ) महाभाष्यके इस पूर्वपक्षपर श्रीकैयटने द. जीने भी तिम्श है— ' त्रैवर्णिकानामेव सभार्याणां यज्ञेधिकारो न तु शूद्रस्य । ' उच्चारण ( क्योंकि स्त्रियों सहित त्रैवर्णिकोंका ही यज्ञमें अधिकार है, शूद्रका नहीं ) ' आगाराद उसके उत्तरपक्ष में- ' उपमानात्सिद्धं पत्नीव पत्नी ' उसे श्रौपचारिक प्रयोग में भी यह माना गया है कि ' पत्नी ' की तरह अङ्गसमानता से वह ' पत्नी ' हो रहा है की तरह होती है, वास्तविक ( शास्त्रानुसार ) ' पत्नी ' नहीं होती । अग्नि नहीं ' उक्तस्त्रयाणां वर्णानां यज्ञः ' ( महा. शान्ति ३० ३७ ) में भी शूद्रका यज्ञमें अधिकार कहा है । तब शतपयानुसार भाष्य करनेवाले उवट-संवदते- मीर के विरुद्ध शूद्र निषादको यज्ञाधिकारी कैसे लिख सकते हैं? आदिए जब उन्होंने लिखा है - तो स्पष्ट है कि वह श्राधानसंस्कृत नहीं, किन्तु काले संस्कृत पञ्च महायज्ञोंवाली लौकिक श्रग्निकेलिए है । यज्ञ भी वैदिक नहीं; किन्तु नमोन्त ( नमस्कारान्न ) सन्नवाले पञ्चयज्ञ हो वहां इष्ट हैं । विचल, पञ्चमहायज्ञ भी वदिक परम्परासे ही सब प्रकारके पुरुषोंके लिए प्रा रहे हैं । " यहाँ से महाभाष्य ( २ | ४ | १ | १० ) के प्रदीप में श्रीकैयटने लिखा है-बंदिस्त शूद्राणां पञ्चयज्ञानुष्ठानैधिकारोस्ति । ' ( शूद्रोंका भी पञ्चयज्ञोंके अनुष्ठानमें अधिकार है ) । वहीं उद्योतमें श्रीनागेशने लिखा है — ' तस्मात् उवट - महीधरके मत में शूद्रोंको यज्ञाधिकार? [ ४११ शूद्रो यज्ञेनवक्लृप्तः ' इति श्रुतिस्तु श्रग्निहोत्रादि [ वैदिकयज्ञ ] विषया [ न तु शूद्राद्यधिकृतपञ्चयज्ञादि विषया ] ' ( शूद्र यज्ञमें अनधिकृत है, यह शूद्रकेलिए निषेधश्रुति वैदिक यज्ञ श्रग्निहोत्रादिविषयक है, शूद्रोंकेलिए पञ्चयज्ञादिके निपेधकेलिए नहीं । ) व्यासस्मृतिम भी कहा है- ' शूद्रो वर्णंश्चतुर्थोपि वर्णत्वाद् धर्ममर्हति । वेदमन्त्र- स्वधास्वाहा वपट्कारादि-भिर्विना ' ( १1६ ) ' मन्त्रः शूद्र े न विद्यते । तस्मात् शूद्रः पाकयज्ञैर्यजेत ' ( महा. शान्ति. ६०।३७-३८ ) । ( शूद्र चतुर्थ होता हुआ भी वर्ण होनेसे कई धर्मो में अधिकृत है; पर वह वेदमन्त्रोंसे स्वधा, स्वाहा, वपट् श्रादिके विना ही पञ्चयज्ञों में अधिकृत है । शूद्रमें मन्त्र अधिकृत नहीं होता । श्रतः शूद्र मन्त्रहीन पञ्चयज्ञरूप पाकयज्ञांते वजन करे ) । विष्णुस्मृतिमें भी कहा है- ' पञ्चयज्ञविधानं तु शूद्रस्यापि विधीयते । तस्य प्रोक्तो नमस्कारः ' ( १०८ ] ५ शाह ) । अर्थात् शूद्रके लिए नमः ग्रन्तवाले ' अग्नये नमः ' यह लौकिक मन्त्र ही इष्ट हैं । उन्हींसे पञ्चरज्ञ करनेका उसका अधिकार है ) । इसका श्रीतर्करत्नजीने ' अ ' पू. २४ में ठीक अर्थ नहीं किया, ' नमस्कारः ' का प्रयं ही नहीं किया । इसने शूद्र वेदानधिकारी सिद्ध होता है । इसी तरह ' नमस्कारेण मन्त्रेण पञ्चयज्ञान हापयेत् ' ( याज्ञ. १११२१ ) ' पुराणाद्य क्तमन्त्रैश्च नमोन्तः कर्म केवलम् ' शुक्रनीति ( ४१३६८-३६९ ) इसका अर्थ श्रीपं गंगाप्रसादजी लिखते हैं - ' शूद्रको वेदमन्त्रका अधिकार नहीं है । पुराणोंके ' शिवाय नमः ' आदि मन्त्रोंसे " अपने सारे कर्म कर सकते हैं ( पृ. ३८२ ) यह तर्करत्नजीका किया हुआ अर्थ ठीक है । ' नमस्कार- परायास्तु शूद्राया मन्त्रवर्जितम् ( ' अष्टाङ्गहृदय ' शारीर. ११२६ ) ' अनुज्ञातोस्य नमस्कारो मन्त्रः ' ( गौतमधर्म. २।१।६६ ) श्री हरदत्तने यहां लिखा है- ' शूद्रस्य वैश्वदेवादिषु तत्तद्देवतापदं चतुथ्यंन्तं ' मनसा ध्यात्वा नमो नमः ' इत्येवंरूपो मन्त्रानुजातो धर्मज्ञैः । ' ( शूद्रको ' वैश्वदेवादि एवं पञ्चयज्ञोंमें उस उस देवता पदको - जो चतुर्थ्यन्त हो,
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.४१२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मनसे ध्यान करके ' नमो नम: ' इस प्रकारका लौकिक मन्त्र धर्मज्ञोंने मनुज्ञात किया है ) । पूर्व - पद्योंका भी यही ग्रंथ है । शुद्रके ब्रह्मयज्ञमें पुराण- वेदका ग्रहण, वा ' ब्रह्मणे नमः ' यह मन्त्र जानना चाहिये । उसमें अध्यापन नहीं घटता; जबकि वह क्षत्रिय - वैश्यको भी विहित नहीं । अथवा ( मनु. ३।७४ ) ब्राह्मणकी पूजा ही उसका ब्रह्मज्ञ है । आशा है - ' आलोक ' पाठकोंने श्रीउवट - महीधरके वचनका रहस्य समझ लिया होगा कि यह स्मार्त- पञ्चयज्ञकेलिए है, वैदिकयज्ञार्थ नहीं । इसके अतिरिक्त यज्ञमें ' पञ्चजन'का भिन्न अर्थ भी होता है, भिन्न तात्पर्य भी यह १५६- १६४ पृष्ठमें ' पञ्चजना मम होत्र ' में पाठक देखें । वैदिकयज्ञका शूद्रादिको अधिकार नहीं । पं ० गं. जीने वैश्यसे शुद्रका ग्रहण मानकर जो कि शूद्रको यज्ञाधिकारी माना है; यह कल्पना प्रापातमनोहर दीखती हुई भी शास्त्रानुगृहीत नहीं । इसपर ' आलोक ' ( ९ ) पृ. ३६४-३६५ ) में देखें । ( ख ) मीमांसादर्शनमें ' अपि वा वेदनिर्देशाद् प्रपशूद्राणां प्रतीयेत " ( ६।११।३३ ) यह उत्तरपक्षका सूत्र है ' प्रवैद्यत्वाद् श्रभावः कर्मणि स्यात् ' - ( ३७ ) भी । ' तथाचान्यार्थ दर्शनम् ' ( ६।१।३८ ) यह सिद्धान्त है - ' शूद्रस्य नाध्ययनम् । यद्य वा एतत् श्मशानं यत् शूद्रः । ' ' न शूद्रजनसन्निधो ' ( मनु. ४/६६, १०८ ) ' नाधीयीत दमशानान्ते ' ( मनु. ४।११६ ) ' श्मशाने नाध्येयम् ' ( महाभाष्य ५।२।११५६ ) इस प्रकार जङ्गम श्मशान शूद्रका वेदाध्ययन निषिद्ध होनेसे उसे वैदिक यज्ञका भी निषेध हो गया । श्रीतकंरत्नजीने मीमांसा के पूर्वपक्षके सूत्रों को उत्तरपक्ष और उत्तरपक्षके सूत्रोंको पूर्वपक्ष कर दिया है । यह उनका छलका कार्य है । इस प्रकरण में कुल १४ सूत्र हैं, उनमें २५ वां सूत्र पूर्वपक्ष है, २६ उत्तरपक्ष, २७ पूर्व, २८ उत्तर, २ ९ पूर्व, ३० तटस्थ, ३१ पूर्व, ३२ युक्ति, ३३ उत्तरपक्ष, ३४ पूर्व, ३५ उत्तर, ३६ पूर्व, ३७ सिद्धान्त, ३८ सिद्धान्तीका युक्ति - सूत्र है । यह पूर्वपक्ष उत्तरपक्षका क्रम है, स्थानाभावसे हम इस पर स्पष्टता नहीं उदट - महीधरके मतमें शुद्रों का यज्ञाधिकार? [ ४१३ कर सकते । इस प्रकार श्रीमार्यमुनिजीने भी इन सूत्रोंमें IIII बहुत खींचातानी की है; पर वह मीमांसाकारके हृदयसे विरुद्ध स्वपक्षसिद्ध्ययं । वेद शूद्रका अधिकार मानने वाले रामानन्दी है । अपने ब्रह्मसूत्रके वैदिकभाष्य ' में स्पष्ट लिखा है कि- ' श्रीभगवदा. जीने भी । पूर्व अधिकार नहीं । अतः उन्होंने ' मीमांसादर्शन ' के सूत्रोंको शूद्रका भी वैदिककर्मयें । दिग्विजय परं परक ही माना है । उनके यह स्पष्ट शब्द हैं- ' मीमांसादर्शने शूद्रानधिकार. । वेति ' प्रथमे पादे सप्तमम् श्रपशूद्राधिकरणं प्रस्तुवता जमिनिना पष्ठाच्यारे । बनानाम चरितम् ॥ अवश्यं कर्माणि नियताविकाराण्येव ' ( तु नाऽन्याय्यमाः । मादिग्रह तद ( शूद्रा ) विकारं पृ. १६४ ) ' ब्राह्मणानि महिलाओं निवारयन्ति चेद् निवारयन्तु नाम । किं तेन? हैकि कर्ममार्गप्रवर्तकान्येव तानि । कर्ममार्गे हि तेषां शासनं नान्यत्र । कात्यायनं ' सार्वदेशि नापि ' फलयुक्तानि कर्माणि ' । ( २ ) श्रङ्गहीनाऽश्रोत्रियषण्ढ -शूद्रवजंग् उत्त ( ५ ) इत्यादि सूत्रयता परिभाषाध्याये कर्मण्येव नाधिकारस्तेषाम् विधिविरु ( शूद्राणाम् ) इति स्पष्टमु द्घोष्यते ' ( पृ. १६४ ) । पति ऐट ( ' कर्म के अनेक प्रकार हैं । सभी कर्म वैदिक हैं ।... कोई यज्ञ करता इतिहासों = है, यह सभी वैदिक कर्म हैं । इनमें से सभी कर्मो को सभी नहीं कर भारती .संकते । अतः कात्यायनने अपने सूत्रोंमें शूद्रोंको कर्मका अनधिकारों वाई थी— बताया । जैमिनिने मीमांसादर्शनमें अपशूद्राधिकरण बनाया, यह सब किन्तु ज उचित हो सकते हैं ' ( हिन्दी वैदिकमाप्य पृ. ५३ ) । विषय में जव शूद्रकेलिए अधिकरण ही ' यागे शूद्रस्य श्रनधिकाराधिकरण ' है, तो देवा: ' ( ३ उस अधिकरण के सूत्रों का विपरीत अर्थ किया ही कैसे जा सकता है? बिना ' आलोक ' यज्ञोपवीतका यज्ञ भी कभी वैदिक नहीं हो सकता - यह तो अत्यन्त स्पष्ट जैसे हैं । तब स्त्री - शूद्रादिका वेदाधिकार भी सिद्ध न हुया । उनको सेवाकार्य बैठते; तथा शित्पादिकी तथा माता - पिता यादि द्वारा श्राचारकी शिक्षा देना है | परन्तु लो लोकवेदानुगृहीत पक्ष है; जिसमें यज्ञोपवीत तथा वेदकी कुछ श्री उक्त पद्य श्रावश्यकता नहीं । धोती रेऽ सहजाश्च प्रयं है— '
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ४१३ ] ४१४ सिध्यय वेद - विदुषी भारती आदि स्त्रियाँ (? ) ( ३६ ) है । ( क ) मण्डनमिश्रकी पत्नी भारतीदेवीके विषयमें ' शङ्कर-जीने भी पूर्वपक्ष - है- ' सर्वाणि शास्त्राणि षडङ्गवेदान् काव्यादिकान् दिककर्मयें दिग्विजय ' में कहा । तन्नास्ति नो वेत्ति यदत्र बाला, तस्मादभूच्चित्रपदं नचिकार देति परं च सर्वम् ) इस प्रकार वेदविदुषी वेदवती, वयुना और धारिणी नष्ठाच्याये नानाम् ३।१६ स्त्रियोंका भी पुराणों में वर्णन श्राया है । क्या इन न्याय्यमा. प्रादिब्रह्मवादिनी वेदाध्ययन वेदकी आज्ञाका उल्लंघन करके किया था? स्पष्ट ब्राह्मणानि महिलाओंोंने क है कि स्त्रियों का अधिकार है ( एक सिद्धान्तालंकार तेन? ' वार्वदेशिक ' जून ४६ ) में । कात्यायने- उत्तरपक्ष - वैयक्तिक- इतिहाससे विधिनिर्णय नहीं होता । इतिहासमें - शूद्रवजंभ ' कारस्तेषाम् विधिविरुद्ध बातें भी होती हैं । युधिष्ठिरका द्यूत और द्रौपदीके पाँच प्रति ऐतिहासिक होनेपर भी विधि - शास्त्र नहीं । ऐसे सैंकड़ों भी यज्ञ इतिहासों को एक भी विधि वा निषेध वचन वाँध दिया करता हैं । करता नहीं कर भारती, सरस्वतीदेवीका प्रदतार थी, दुर्वासा मुनि के शापसे स्वर्गसे यहां धिकारों भाई थी यह शं. दि. वि. में स्पष्ट है । उसने विद्या किसी गुरुसे नहीं सीखी, यह सब किन्तु जन्मकाल से ही उसे सब ज्ञान था, ' देवा: स्वयंभातवेदा: ' इस विषय में हम पूर्व कह चुके हैं । इसलिए शत में कहा है- ' विद्वा, सोहि ' है, तो देवा: ' ( ३ | ७ | ३ | १० ) ( देवता जन्मसे ही विद्वान् होते हैं इस विषय में ? विना ' आलोक ' ( ४ ) देखिये । यन्त स्पष्ट जैसे नाटकनें पुरुष स्त्रीवेष धारण करके भी अपना पुरुषत्व खो नहीं - सेवाकार्यं बैठते; वैसे ही देवता मनुष्यत्वमें भी अपनी देवत्व खो नहीं बैठते । देना ही परन्तु लोगोंको इसका ज्ञान न होनेसे तदर्थं ' आश्चर्य ' होता है । वादीने कुछ भी उक्त पद्यसे पूर्वका पद्य छिपा लिया है, ' सा [ दुर्वास: - शप्ता भारती ] द्योनतीरेऽजनि विप्रकन्या, सर्वार्थवित् सर्वगुणोपपन्ना । यस्या बभूवुः छड्वाश्च विद्या:, शिरोगतं के परिहर्तुं मीशा: ' ( ३।१५ ) यहाँ ' सहजा ' का श्रयं है — ‘ सहोत्पन्नाः ' कि – जन्मसे ही — बिना गुरुके – उसे विद्याएं स्वतः वेद विदुषी भारती आदि स्त्रियाँ? [ ४१५ श्रा गई । इसमें ' सुप्त - प्रबुद्ध ' न्याय प्रसिद्ध है । उसका किसी पढ़ना नहीं आया । बल्कि ' शिरोगतं ' इससे सिरके बालोंकी भांति गुरुके पास स्वतः विद्या कही गई है । उसकी इसपर अच्युतराय टीकाकारने लिखा है- ' शिरोगतं शिगेन्द्रजात परित्यक्त के ईशा: - शक्तिमन्तो भवन्तीति योजना । शिरोरुहादिकं शरीरस्य अवयवजात श्रयम्भाव: यथा सहजमेव, तथा तस्याः सर्वविद्या-द्य पलक्षितया वच्छन्द ब्रह्मरूपमङ्गजातं स्वभावसिद्धमेवेति शिरके बाल आदि जन्मसे । ' अर्थात् जैसे स्वत: उत्पन्न होते हैं, तदर्थ प्रयत्नकी अपेक्षा नहीं रहती; वैसे ही भारतीको भी विद्या, बिना गुर्वध्ययनके वाल्यसे प्राप्त थी । वादी के दिये पद्य में भारतीकेलिए ' बाला ' लिखा ही सब वेद बाल्य में नहीं आ जाते, अतः वह जनोंका है । माङ्ग स्पष्ट है कि- भारती ' आरूढ पतित ' होनेसे बिना पढ़े प्राश्चर्यविषय थी । थी । वादी भी भारती की भाँति स्त्रियोंको ही जन्मते शास्त्रज्ञ पढ़ाना बन्द कर दें; वे स्त्रिय भी बिना ही गुरुके शास्त्रज्ञ हो जाएंगी । ( ख ) वेदवती भी एक देवता थी- यह वाल्मी. की ' रामाभिराम टीका ' ( ७११७१६ ) में स्पष्ट है । वह तो उत्पन्न होते ही वेदमन्त्र बोलने लग गई थी, यह उसके इतिहासमें स्पष्ट है । इस विषय में हम पूर्व लिख चुके हैं । देवता ' विद्वांसो हि देवा: ' ( शत. ३।७ । ३ । १० ) जन्मसे ही विद्वान् होते हैं, उन्हें मनुष्योंकी तरह गुरुसे पढनेकी अपेक्षा ही नहीं होती । वयुना आदि ब्रह्मवादिनियोंके विषय में हम ' वेदकी ऋषिकाएं ' तथा ' हारीत वचन ' में उत्तर दे ही चुके हैं, तब देवताओं तथा ब्रह्मवादिनी वा ऋषिकाओंके दृष्टान्तसे मानुषी सद्योवधुनोंका बेदाधिकार कदापि सिद्ध नहीं हो सकता । दोनोंके अधिकार पृथक् - पृथक् होते हैं । ( ३७ ) पूर्वपक्ष - पुरुषोंकी तरह कन्याग्रोंको भी ब्रह्मचयं [ वेदाध्ययन ] के व्रतका पालन करना चाहिये, यह ' समानं ब्रह्मचर्यम् ( प्राश्व.श्री. १५
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४१६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २४ ) सूत्र द्वारा बताया गया है । ( एक सिद्धान्तालङ्कार सार्व. अगस्त ४६ ) में | उत्तरपक्ष — यह ' प्राश्वलायन श्रौतसूत्र ' का नहीं; जैसा कि वादीने लिखा है, किन्तु ' आपस्तम्ब श्रीतसूत्र ' का सूत्र है । अतः वादीने इसका पूर्वापर नहीं देखा, यह स्पष्ट । इन लोगोंकी यह प्रवृत्ति देखी गई है, कि कई प्राचीन वचनोंको उसका पूर्वापर छिपाकर साधारण जनता के सामने उपस्थित कर देते हैं; इससे बेचारी अनुसन्धान - विरहित जनता इनके पक्षको ' दूधका घुला ' समझ लिया करती है, अत: उसमें झुक जाती है, पर पूर्वापर दिखलानेसे तब इनकी वह भद्द उठती है कि फिर इन लोगों के पास मुंह छिपानेको भी स्थान नहीं रहता । यही दशा यहांपर भी है । यदि वादी ' समानं ब्रह्मचर्यम् ' इस प्रक्षिप्त सूत्रसे स्त्री - पुरुष दोनोंका समान ब्रह्मचयं वेदाध्ययनादि मानता है, तो फिर ४८ वर्षके ब्रह्मचारी के साथ ४८ वर्षीया ब्रह्मचारिणीका, तथा २५ वर्षके ब्रह्मचारीके साथ २५. वर्षीया ब्रह्मचारिणीका विवाह करावें । यदि वे ऐसा नहीं करते; तव दोनों स्त्री - पुरुषोंका न तो समान वेदाध्ययन होगा, और न समान ब्रह्मचर्यव्रत ही । तव वादी इस सूत्रको प्रमाणित कैसे करते हैं? वस्तुतः यहां श्रौतयज्ञोंमें, जिनका वहाँ प्रकरण है- पत्नी भी पति-की तरह ब्रह्मचर्यसे रहे - यह अर्थ है । अर्थात् पत्नी भी पतिकी भाँति मधु - मांसादि वर्णन, अधः शयन, तथा संयम करे - यही वहाँ ' ब्रह्मचयं ' का अर्थ इष्ट है, वेदाध्ययन नहीं । देखिये उक्त श्रोतसूत्रकी भट्ट रुद्रदत्त - प्रणीत सूत्रदीपिका वृत्ति । जैसे कि - संवत्सर - दीक्षामैं ' तैत्तिरीयारण्यक ' में आता है, ' न उपरि श्रासीत ' ( २८ ) ( खाटपर न सोवे ) अथवा प्राश्वलायन श्रौतसूत्र में श्राता है- अघः ' शयीत ' ( नीचे भूमिपर सोवे ) ( १ २ ।१६ ) आदि ) वैसे ही ' समानं ब्रह्मचर्यन ' में भी वही तात्पर्य इष्ट है । वादियोंको यह गलत अर्थं करके साधारण - जनताको भ्रममें नहीं डालना चाहिये । ( ३८ ) प्रमाण - संग्रह | 885 स्त्रियों वा लड़कियोंको वैध वेदाधिकार नहीं वेद के वचन मिलते हैं । हम उनका यहाँ संग्रह करते हैं—, इस विषयमें बहुत श्री उ ( १ ) मन्त्रभागके प्रमाण तो इस विषय में ' आलोक ' - १/४ लिख चुके हैं । इसपर ' दीर्घश्मश्रु ' के विषय में स्पष्टता,, देखें के इस पुण्पदें ६५-७२ । - पृ. ५३-६५, लड़की ( २ ) अब ब्राह्मणभागकी सम्मति देखें - शतपथत्रा शतपय वेदाध्ययन लिखा है, पर दुहिता ( लड़की ) के लिए नहीं ने पुत्रकेलिए तो यहाँ प य इच्छोत् । जैसेकि - ' प्रद कि - वे पुत्रो मे वेदमनुव्रवीत ' ( १४१६ ४११३ ) पुत्रो मै बेरो वचनक अनुश्रुवीत ' ( १४ ) ' पुत्रो मे त्रीन् वेदान् अनुब्रुवीत ' ( १५ ) महापर प्रचि ' शतपथ ' ने पुत्रकेलिए १,२,३ वेदों का पढ़ना लिखा है, पर लड़कीकेलिए वेदविप वैसा नहीं लिखा है । य फिर अग्रिम कण्डिका में अन्य स्पष्टता की है- ' पुत्रो मे पण्डितो हृदय f विजिगीथः, समितिङ्गमः, भाषिता जायेत, सर्वान् वेदान् अनुद उसके ( १४ || ४ | १७ ) इस वचनमें पुत्रकेलिए पण्डित होना, शास्त्रार्थप्रवीप, बेद = सभाचोंमें भाग लेनेवाला तथा वक्ता होना पृथक् माना है; फिर पुत्रो देख ल सब वेदोंका अनुवचन करनेवाला पृथक् मांगा है, इसमें भी लड़कीन बडा भ नाम सर्वथा नहीं रखा गया । भी प्रक यदि कहा जावे कि - पुत्रसे पुत्रीका ग्रहण भी हो जावेगा; यह शे 1 वादियोंकी प्राशाको -निराशा रूपमें परिणत कर देनेवाला शतपथका वचन स्त्रीभ्यः आगे देखिये- मन्त्र ' अथ य इच्छेद् दुहिता मे पण्डिता मे जायेत ' ( १४१६/४/१६ ) ( बो | अयं क चाहे मेरी लड़की पण्डिता ( सयानी ) हो जावे ) यहाँ एक तो ब्राह्मण- गृह्यसूत्र भागात्मक वेदने ' पुत्र ' से कहीं पुत्रीका ग्रहण नहीं किया है । यदि उसे यह इष्ट होता, तो आगे अलग दुहिता वाला वचन न लिखते । इसते । हरदत्ता स ० ध ० २७ प्रयत्
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श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४१६ J में ' जातिपक्ष ' का खण्डन हो गया । फिर लड़कीको पृथक् रखकर यमे वेद के मत सारे वेद वा तीन वेद, दो वेद, एक वेदका पढ़ना तो दूर रहा; बहुद भी उससे भी अधिकार नहीं दिया गया है । • १/४ वेदके पढ़नेका यदि कहा जावे कि - लड़की को ' पण्डिता ' कहनेसे शतपथके मतमें इस पुष्पदे वेदाध्ययन भी गृहीत हो जावेगा; सो यह बात भी वादियों की .५१-६५, ीका काट दी । शतपथने ' पुत्रो मे पण्डितः सर्वान् वेदान् ग्रनुबुवीत ' शतपथने के यहाँ पण्डित अलग रखा है और वेदाध्ययन अलग रखा है; इससे स्पष्ट है । लिए तो ' क - वेदको ' पण्डित ' शब्दसे वेदोंका अनुवचन इष्ट नहीं । इसलिए इस सेकि - ' प्रथ वचनका हृदय देखकर स्वा. श्रीशङ्कराचार्यजीको भी इसकी व्याख्यामें मे वेदी ) यहाँपर औचित्यवश यही लिखना पड़ा - ' बुहितुः पाण्डित्यं गृहतन्त्रविषयकम्, तु. वेदविषयकम्, वेदेऽनधिकारात् ' । यहां श्रीस्वा.शं.जीकी अपनी कोई भी कल्पना नहीं; उनने श्रुतिका पण्डितो हृदय लिख दिया, यह अत्यन्त स्पष्ट है, क्योंकि पुत्रवाले चार वाक्यों में उसकेलिए बार - बार वेदोंका अनुवचन कहा है, पर दुहितावाले वाक्यमें अनुवी प्रवीण वेदके थोड़े अंशका भी अनुवचन नहीं कहा । यह सूक्ष्मदर्शी पाठकोंने कर पुत्रो देख लिया होगा । हम चैलेञ्ज देकर कहते हैं कि इससे कोई भी बड़ेसे लडकीका बड़ा भी तर्कमनीषी एवं प्रतिपक्षी दुहिताका वेदानुवचन कभी भी, किसी भी प्रकारसे सिद्ध नहीं कर सकता - यह हमारी शतमुखसे धोषणा है । यह भी ( ३ ) अव स्मृति एवं गृह्यसूत्रोंकी साक्षी भी देखिये- ' आवृतश्च प्रा नका वचन स्त्रीभ्यः ' ( प्रापस्तम्बगृ. ११२।१५ ) यहाँ पर लड़कियोंका कर्भ, विना मन्त्रके करना कहा है । वादीके परममान्य श्रीहरदत्ताचार्य ' आवृतः ' का ६ ) ( बो घर्य करते हैं- ' मन्त्ररहिताः क्रिया श्रादृत उच्यन्ते ' ( मन्त्ररहित क्रियाओं को 7 ब्राह्मण- गृह्यसूत्रों में श्रावृत: ' कहा जाता है । यदि उसे ( ४ ) ‘ उपनयनं विद्यार्थस्य ' ( १ | १ | ६ ) इस आपस्तम्बध में श्री-- इस हरदत्ताचार्य लिखते हैं- ' लिङ्गस्य विवक्षितत्वात् स्त्रिया अपि न भवति ' अर्थात् यहाँ पुंलिङ्ग विवक्षित है; श्रतः स्त्रीका उपनयन नहींहोता । ) प्रमाण - संग्रह | [ ४१६ ( ५ ) सकलस्मृतिमूर्धन्य मनुस्मृतिमें तो कहा ही है - ' अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामाहृदशेषतः ' ( २२६६ ) ' वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्नि - परिक्रिया ( २२६७ ) इस विषय में स्पष्टता इसी तृतीय- पुष्पके १७४ पृ. से १८३ पृष्ठ तक देखिये । ' नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति वर्मो व्यवस्थितः । निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थितिः ' ( २१८ ) यहाँ भी स्त्रियोंकी क्रिया मन्त्र - रहित कही गई है । ( ३ ९ ) ' न वै कन्या न युवतिः ' का अर्थ आक्षेप - उक्त मनुवचन ' न वै कन्या न युवति: ' इस मनुपद्यसे विरुद्ध होनेसे प्रक्षिप्त है; क्योंकि - ' न वै कन्या न युवति: ' इस पद्यसे मनुजी कन्या और युवतिसे भिन्न वृद्धा स्त्रीका अनुभवी होनेसे होतृकर्म बता रहे हैं । ( परिहार ) जब यह सृष्ट्यादिमें निर्मित मनुस्मृति ( जैसे कि स्वा.द. जी स.प्र. के ११ वें समुल्लासके आरण्भमें कह गये है ) का स्पष्ट मत है, कि - स्त्रीका वेदाधिकार नहीं; और तात्पर्य निर्णायक लिङ्ग - प्रभ्यास - द्वारा उसमें यह स्पष्ट कर दिया गया है, तब ' न वै कन्या न युवतिः... होता . स्याद् अग्निहोत्रस्य ' ( ११।३६ ) इस वचनमें वृद्धा स्त्रीका होतृकर्म मनुजीको कैसे विवक्षित हो सकता है; जैसेकि प्रतिपक्षी लोग तदर्थं भारी परिश्रम करते हैं कि- मनुजी युवति तथा कन्याका हवन निषिद्ध करते हैं, वृद्धाका नहीं; क्योंकि वह अनुभवी हो जाती है, यह मनुजीको कैसे विवक्षित हो सकता है? जबकि मनुजीके मत में स्त्रीमात्रको वेदका निषेध है | यहाँ ' युवति ' का तात्पर्य ' विवाहित ' तथा कन्या ' का तात्पर्य अविवाहिताका इष्ट है; तव मनुजीके मतमें सभी प्रकारकी स्त्रियोंको होतृकर्म का निषेध सिद्ध हो गया । श्रीकुल्लूकभट्टने भी इसका यही अर्थ
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४२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) लिखा है- ' कन्याऽनूढा, ऊढा तरुणी [ युवतिः ] इससे स्त्रीमात्र के होतृत्वका निषेध हो गया । एक प्रार्यसमाजी मनुस्मृतिके टीकाकार ( तु.रा. ) की यह असफल चाल है । तो क्या प्रतिपक्षी वृद्धा स्त्रियोंका उपनयन तथा वेदाध्ययन मानेंगे? क्योंकि मनुजीने कन्या श्रौर युवतिका तो निषेध कर दिया है; और ' नरके हि पतन्त्येते [ युवतिकन्यादयः ] जुह्वतः स च यस्य तत् ' ( १११३७ ) होतृकमंसे उन्हें नियुक्त करने तथा करानेवालोंका नरकपात है । अथवा यदि वादी यहाँ ' वृद्धा ' का ' ज्ञानवृद्धा ' अर्थ करता है कहा ; तब भी ठीक नहीं । वह विवाहिता वा विवाहिता इन दोनोंमें एक तो होगी ही । यदि वादीके मतमें उक्त मनुपद्यस्थित ' कन्या ' और ' युवति ' शब्द अविवाहिता - विवाहितावाचक नहीं; किन्तु यह दोनों शब्द अवस्था - वाचक हैं; तब वादीका ' ज्ञानवृद्धा ' अर्थ तो कपूरकी भान्ति उड ही गया, क्योंकि-‘ ज्ञान - वृद्ध ' अर्थं श्रवस्थावाचक नहीं रहता । नहीं तो यदि मनुजीको यहाँ ' ज्ञानवृद्धा ' अर्थ इष्ट होता; तो फिर ' न वै कन्या न युवतिर्मात्पविद्यो न बालिशः । होता स्याद् अग्निहोत्रस्य ' ( ११1३६ ) इस पद्यमें मनुजी ' अल्प-' विद्य तथा बालिश ' शब्दका पृथक् निषेध न करते; उनकी उसी ' ज्ञान-वृद्धा ' इस प्रर्थापत्तिसे स्वयं ही निवृत्ति हो जाती । यदि ' अल्पविद्यः ' तथा ' वालिशः ' शब्द वैसे पुरुषके नियेधकेलिए है, वैसी स्त्री के लिए नहीं; इसलिए ' कन्या- युवति ' का पृथक् उल्लेख है, तब फिर वादीका प्रिय ' जातिपक्ष ' कट गया । अन्य बात यह है कि- ' न तेन वृद्धो भवति, यो वै युवाऽप्यधीयानः तं देवा: स्थविरं विदुः ' ( मनु. २।१५६ ) ' बालोपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ' ( मनु. २।१५० ) इत्यादि पद्योंसे जब बच्चे तथा जवानको भी ' ज्ञानवृद्ध ' होनेसे वृद्ध कहा जा सकता है, तब कन्या तथा युवतिका भी पृथक निषेध करनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी; क्योंकि - फिर तो ' न वै कन्या न युवतिः ' का श्रयं ' कन्या ' तथा ' युवति ' भी वादीके अनुसार ' ज्ञानवृद्ध ' ४२२ तब वादीका ' ज्ञानवृद्ध ' अर्थ स्वयं ही कट गया; अन्यथा हो सकती है । पत्तियां श्राती हैं, तब श्रार्यसमाजिन लड़कियों वा युवतियोंकें एतदादि ज्ञानवृद्ध होनेसे, और न ही आयु - वृद्ध होनेसे, उनको यज्ञविषयक अनी न १६५ आज्ञा देकर ' नरके - हि पतन्त्येते ' ( कन्यादयः ) ( मनु. ११।३७ बेदी मान्य पूर्वपद्य सहचारी मनुपद्यसे वादी उन्हें नरकमें ही गिरानेवाले ) इस अपने कुमार यदि प्रतिपक्षी इसपर तिलमिलाएं; तव ' न वै कन्या न युवतिः बने । निषेध ‘ वृद्धा - स्त्री ' यह श्रशुद्ध प्रथं स्वयं काट दें, और यहां भी मनुके अन्य पक्षीही इसका मंला भ भान्ति स्त्रीमात्रकेलिए यज्ञ - होतृत्वका निषेध मान लें, तब मनुप्रोक्त नररु. भी उन्हें न मिलेगा । तभी वस्तुतः मनुजीको उक्त पद्यमें ' कन्या ' से कुमारी अर्थात् ' अविवाहिता ' स्मात लड़की इष्ट है, तथा स्त्रीपर्याय ' युवति ' शध्द से ' विवाहिता स्त्री ' इष्ट है । उनक मनुजी लड़कीका ८ वें वा १२ वें वर्ष में विवाह मानते हैं ( । ६४ ) श्रौर ब है । हैं— ' पिता रक्षति कौमारे, न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ' ( ६३ ) यहाँ मनुशे विवा पिताकी रक्षणीयावस्था ७ वा ११ तककी अवस्थाको कौमार- कुमारावस्या निषेध अर्थात् कन्यात्व कहते हैं । उस लड़की की भर्ताको रक्षणीयावस्था ८-११ वर्षकी अवस्थाको मनुजी युवाबस्था मानते हैं, तभी ८ वर्षके उपनेव स्त्रीम लड़के को भी स्वा. द. जी ' युवा सुवासाः ' मन्त्रमें उपनयनमें युवा कहते हैं । न नव तव उक्त - मनुपद्यमें ' कन्या ' शब्दसे मनुको कुमारी अर्थात् अविवाहित प्रतीप ७ वा ११ वर्ष तककी लड़की, तथा ' युवति ' शब्द से स्त्री अर्थात् विवाहिता । श्रादि ११ वर्षके वादकी स्त्री इष्ट है । तभी श्रीकुल्लूकभट्टने उसकी टीका सत्पुर कहा है- ' कन्या - अनूढा, ऊढा - तरुणी ( युवतिः ) । इसी प्रकार प्रय हम य टीकाकारोंका भी अभिप्राय है । जैसाकि - श्री राघवानन्दने लिखा है- प्रतिक ' कन्या युवतिश्च ऊढाऽनूढे ' । श्री मेधातिथिने - ' न च श्रौतेषु श्रन्ि स्त्र्यादीनां प्राप्तिनं तु अविदुषाम्; विशिष्टानामेव पुंसामार्लिक देखिय विधानात् । ' कभी
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४२२ 7 सकती है के ' महाभारत ' के ' न वै कन्या न युवति: ' ( शान्तिपर्व एतदादिः इसी तरह पद्यकी टीकामें श्रीनीलकण्ठने भी लिखा है- परिवेष्टा-नोकें अमीर १६५/२१ ) इस| कन्या - युवत्योः स्मार्ताग्निहोत्रे ' स्वयं, पत्नी, ग्रपि वा पुत्रः, यकी श्राहुतिप्रक्षेत वा ' इति प्राश्वलायनवचनाद् अधिकृतयोरत्रापि प्रसक्ती ) निवाले इस अपने कुमारी, अन्तेवासी ' यहाँ भी वही हमारा किया हुआ अर्थ है । वादीके मान्य ति: बने । निषेव मैलापुर उक्तः ( मद्रास ) के ' विवाहकाल विमर्श ' में भी यही हमारा किया हुआ इसा न्य पद्यानं. ही अर्थ रखा गया है । कोई वृद्धा स्त्रीके गीत नहीं गाये गये हैं । यहांपर प्रोक्त नरह तभी कुमारी तथा विवाहिता स्त्रीका वैदिक यज्ञमें निषेध किया है । श्रीनीलकण्ठका यह भाव है कि - श्राश्वलायनने कुमारी तथा पत्नीको नविवाहितां स्मार्त - अग्निहोत्रकी रक्षाका भार सौंपा है । कहीं वैदिक - अग्निहोत्र में भी 7 ' इष्ट है । उनकी प्रसक्ति न हो जावे; इसलिए महाभारतने उनका निषेध कर दिया है । इस प्रकार हमारा किया अर्थ ही सिद्ध हुआ, और कन्या और युवति और को विवाहिता - अविवाहिता वाचक इष्ट हुए । तव स्त्रीमात्रका श्रीतयज्ञ में यहाँ मनुशे निषेध सिद्ध हुआ । कुमारावस्था तभी मनुजीने अन्यत्र भी तात्पर्य निर्णायक लिङ्ग ' अभ्यास ' से स्वा ८-११ पंके उपदेश स्त्रीमात्रका यज्ञहोतृत्व में निषेध किया है । देखिये- ' स्त्रिया क्लीवेन च हुते न | यहां ' न ' की गतपद्यसे अनुवृत्ति श्रा रही है ] भुञ्जीत ब्राह्मणः कहते हैं । ववचित् । श्रश्रीकमेतत् साधूनां यत्र जुह्वत्यमी ( स्त्रीप्रभृतयः ) हविः । विवाह प्रतीपमेतद् देवानां तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ' ( ४१२०५ - २०६ ) ( जहाँ स्त्री विवाहिता श्रादि होता हुआ करें; वहाँ ब्राह्मण भोजन न करे । क्योंकि यह टीका सत्पुरुषोंकेलिए अशोभावह कार्य बताया गया है; तथा जिन देवताओंका कार हम यज्ञ कर रहे होते हैं; स्त्री प्रादिका होता होना उन देवताओं से भी लखा है- प्रतिकूल है । अव प्रतिपक्ष के पक्षका पूरा सफाया हो गया । पुि आर्यसमाजी श्रीतुलसीरामस्वामी भी इस पद्यका यही अर्थ करते हैं । मालिंक देखिये- ' जिस यज्ञमें... स्त्री या नपुंसक ' होता ' होते हैं, ऐसे यज्ञमें ब्राह्मण कभी भोजन न करें । जिस यज्ञमें पूर्वोक्त [ स्त्री आदि ] होता ' न वै कन्या न युवतिः ' का अर्थ [ ४२३ ( हवन करनेवाले ) होते हैं; यह सज्जनोंको बुरा लगनेवाला और विद्वानों [ देवताओं ] को अप्रिय है, इससे उसमें भोजन न करें । यहाँ तु.रा. स्वामीने ' देवानां ' का ' विद्वानों ' यह अर्थ गलत किया है, यह हम ' आलोक ' ( ४ ) में बतावेंगे । जिन देवताओंक । हम यज्ञ यजन कर रहे होते हैं, उनको स्त्री - शूद्रादिका ' होता ' होना पसन्द नहीं । फलतः मनुजीको ' न व कन्या न युवति: ' इस पद्यमें ' कुमारी ' का तो निषेध करना ही था; पर ' हावयेत् ' इस आश्वलायनके मताग्निहोत्र-में प्रतीत हो रहा विवाहिताका होम भी उन्हें श्रोताग्निहोत्र में निषिद्ध हो गया । यही बात मनुजीने ' गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ' ( २।६७ ) में भी कही है । ' नास्ति स्त्रीणां पृथक् यज्ञः ' ( ५।१५५ ) यहांपर भी मनुजीने स्त्रीमात्रको स्वतन्त्रता से यज्ञ करनेका भी निषेध कर दिया । सो जो ' गायत्री तपोभूमि ' मथुरा में यह काम हुना करता है, यह अशास्त्रीय है । ' वैतानकुशल: ' ( मनु. ११३७ ) से मनुजीको समस्त वेदाध्यायी, श्रीतकर्म - प्रवीण पुरुष इष्ट है । स्त्री कोई भी नहीं । क्योंकि वादिसम्मत वृद्धा स्त्री भी, चाहे वह आयुमें वृद्धा हो, वा ज्ञान वा अनुभव में वृद्धा हो; विवाहिता या अविवाहिता ही होगी । पर मनुजी दोनों ही प्रकारकी स्त्रीका निषेध करते हैं । तत्र मनुजीके मतमें स्त्रीमात्रके होतृत्वका निषेध सिद्ध होनेसे प्रतिपक्षीका बताया गया । ' मनु महाराजका तात्पर्य ' कट गया, तव ' श्रमन्त्रिका तु कायेंय '. ' वैवाहिक विधिः स्त्रीणी ' की वादीसे इष्ट प्रक्षिप्तता भी कट गई । इसी प्रकारका पद्य ' महाभारत ' में भी मिलता है - ' न वै कन्या न युवतिः ' यह कहा जा चुका है, इसका श्रथं श्रार्यसमाजी वा सुधारक श्रीसातवलेकर-जीने यही किया है - कन्या, स्त्री, मन्त्र - ज्ञानसे होन, मूर्ख और यज्ञोपवीत-रहित पुरुष अग्निहोत्र में श्राहुति न दें । ये लोग जिसके होमको श्रग्निमें आहुति देते है, उसके सहित ग्रपनेको नरकमें डालते हैं, इसलिए वेद-जाननेवाले याज्ञिक - पुरुषको होता होना उचित है ' । यहाँपर उन्होंने
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४२४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' वन्यम तथा स्त्री ' लिखकर यहाँ वृद्धा स्त्रीकी जड काट डाली । क्योंकि-' न बवारी, न ब्याही ' इस प्रकार दोनों प्रकारकी स्त्रियोंका निषेध होने से स्त्री मात्रा निषेध हो गया । तब प्रतिपक्षीकी वृद्धा भी गई । ' वृद्धा-कुमारीवर ' महाभाष्यमें प्रसिद्ध है; तब बुढिया कुमारी भी गई, और बुधिया व्याही भी गई । वस्तुत: जहाँपर ' कन्या ' तथा ' स्त्री ' अथवा स्त्रीका पर्यायवाचक-' युवति ' शब्द आ जाय, वहांपर क्वारी तथा व्याही - इस प्रर्थका बोध होता है; वहाँपर वृद्धाकी श्रर्थापत्ति नहीं थाती । जैसे कि - ' क्वाथप्रमाणं प्रसृतं स्त्रिया द्विप्रसृतं भवेत् । कन्येतरस्याः, कन्यायाः तद्वद् वस्ति - प्रमाणकम् ' ( सुश्रुत. चिकित्सितस्थान ३७।११६ ) यह यहाँ पर कन्या तथा कन्येतरा ( विवाहिता ) कहने से बोध हो जाता है । ( ४० ) ( आक्षेप ) - वृद्धा स्त्रीका ही होतृत्व होता है, इसमें ‘ जिव्री विदथमावदासि ' इस मन्त्रकी साक्षी होनेसे ठीक है । इसका श्री हरदत्तने यहाँ अर्थ किया है कि- ' जीण सन्तो वृद्धी सन्तौ श्रौतस्मार्त विषयिकां चर्चा करिष्यावः ' तब यह कैसे कहा जा सकता है कि - मनुजीके ' न वै कन्या न युवति: ' इस पद्यमें वृद्धाका होतृत्व इष्ट नहीं । ' वृद्धा ' से ज्ञानवृद्धा प्रर्थं भी लिया जा सकता है । ( परिहार ) - वृद्धा स्त्रीकी सिद्धिमें प्रतिपक्षीसे दिया हुना । प्रतिपक्षी-का अस्त्र तो अब पुराना वा कुण्ठित हो चुका है । उसका उत्तर दिया जा चुका है । यहाँ कोई स्त्रीके वेदाध्ययन की बात नहीं । यजन तो उपनयन तथा वेदके अधिकारसे वहिर्भूत निषादस्थपतिका भी वचन-विशेषके वलसे कहा गया है । यज्ञमें बैठना शूद्रको छोड़कर अपने अनुपनीत बच्चोंका भी हो सकता है; पर इससे उन्हें यज्ञका अधिकार नहीं हो जाता । ' जिव्री ' में वादीको द्विवचनान्त वृद्ध दम्पती इष्ट होने से पति भी साथ शामिल है । तब वह पति भी जबानीमें वयोवृद्ध न होने से वादीके अनुसार युवावस्थामें यत्र न कर सकेगा । वादीका ' ज्ञानवृद्ध ' अर्थ ' न वै कन्या न पुवतिः ' का अर्थ [ ४२५ ४२१ तो पहले ही काटा जा चुका है । ' जिव्री ' का ' जीण ' अर्थ श्रीहरदत्तने किया है तब ( 21 आयु वाले अर्थात् प्रयुका वृद्ध इष्ट है, ज्ञानवृद्ध इष्ट, उसे यहां क्षीन श्रीह ज्ञान तथा आयुमें न वृद्धा लड़कियोंको अपने इष्ट नहीं; तब वादी क्रिया मनुपद्यसे यज्ञविषयक वेद में प्रवेशकी आज्ञा देकर वह स्वयं उन्हें नरकगामिनी भी तब ' अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृद् ' ' वैवाहिको विधि बना रहा है । ब्राज : स्त्रीणां पद्य ' न वै कन्या न युवति: ' इस मनुपद्यसे विरुद्ध न होनेसे प्रक्षिप्त कुमा न हुए । प्रत्युत तदनुकूल हनिसे; क्योंकि वहाँ स्त्रीमात्रका निषेध सिद्ध क्रिय उक्त पद्य मनुजीके ही सिद्ध हुए; जिससे वादीके प्रयासपर पानी होने मन्त्र फिर गया । ( ४१ ) अव अन्य सूत्रग्रन्थोंकी सम्मति भी देखिये - बोधायनधमंसूत्र-' यद् अमन्त्राः स्त्रियो मता: ' ( १।११।५ ) यहाँ स्त्रियोंका मन्त्रभागात्मक | त कन्ट वेदमें अनधिकार वताया गया है । ( ख ) ' न स्त्री जुहुयात् ' ( श्रापस्तम्ब-. धर्म. २।१५।१७ ). यहाँ स्त्रीमात्रको हवनका निषेध किया गया है । स्त्रिय उसक ( ग ) ' अथास्य [ पुत्रस्य ] मूर्धानमवजिघ्रति ' प्रजायतेष्ट्वा इत्यादि - मन्त्रः । मन्त्र स्त्रियं मूर्धानमेव प्रवजिघ्रति तूष्णीम् ' ( पारस्करगृ. १११८।३-६ ) यहां मावृद पुत्रके संस्कारमें तो मन्त्र पढ़ना बताया गया है, पुत्रीके संस्कारमें मन्त्र- स्मरण पढ़ना नहीं बताया गया है । चुपचाप ही माथा सूंघना कहा है । ' सह ( घ ) गोभिलगू. में देखिये - एतयैव प्रावृता स्त्रियास्तूष्णीम् ' ( २ || तदर्था २३ ) यहाँ भी लड़कीका संस्कार बिना मन्त्रके कहा है । ( ङ ) जैमिनि भवन्त में-- ' प्रवृतैव स्त्रियाः कुर्याद् श्रमन्त्रम् ' ( १ | ११ ) यहां भी लड़की प्रतिप संस्कार मन्त्रके बिना ही कहा है । ( च ) श्राश्वलायनगृ. मैं - ' श्रावृर्तव कुमायँ ' ( १।१५।१२ ) यहाँ पर ' आवृता ' का अर्थ करते हुए गार्ग्यनारायण होती की वृत्ति में लिखा है- ' कुमार्यास्तु श्रमन्त्रकं कुर्यात् ' अर्थात् कुमारीश तब संस्कार बिना मन्त्रके करे । नहो ( छ ) आपस्तम्बगृ. में भी यही कहा है – ' प्रावृतश्च प्रास्त्रीम विशेष आदि