सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 241–250
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 241–250
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[ श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ४२५ ४२६ ] इसकी व्याख्या में वादीसे बहुत मान्य प्रसिद्ध टीकाकार ( ११२/१५ ) लिखा है - ' मन्त्ररहिताः क्रिया श्रावृत उच्यन्ते ' ( मन्त्ररहित यहाँ श्रीम श्रीहरदत्तने जाता है ) ( ज ) इसी प्रकार बोधायनगृह्यशेषसूत्र में तब वादी क्रियाको प्रावृत कहा यज्ञविषयक है- ' पुत्राय च दुहित्रे च समानी ब्राह्मण क्रिया । मन्त्रवद् गर्भ भी कहा रहा है । श्राजन्म जन्माद्या आवृतं स्त्रियै ' ( १११२।१० ) यहां भी कुमार तथा कुमारीकी क्रिया समान मानी गई है, पर कुमारीके कृत्य में मन्त्ररहित-क्षिप्त सिद्ध PRINT है । इस प्रमाणराशिसे स्पष्ट हो रहा है कि - स्त्रीका षेध होनेसे मन्त्ररूप - वेदमें अधिकार नहीं है । पानी फिर ( झ ) ' ब्राह्यायणगृ. ' ( २।१।१३ ) ' तूष्णीं स्त्रिया: ' इस सूत्रपर रुद्र-rant वृत्ति देखिये - ' मन्त्रवर्ज स्त्रियाः कुर्यात् । उपनयनं तु नास्ति, नधमंसूत्र- तत् श्रुतिवचनात् ' । यहां भी स्त्रीका कृत्य मन्त्ररहित लिखा है, और भागात्मक. उसका उपनयन नहीं माना गया है । ( ञ ) अब ' खादिरगृ. ' के ' तूष्णीं व्यापस्तम्ब स्त्रिया: ' ( २।३।१५ ) सूत्रपर रुद्रस्कन्दने लिखा है - ' जातकर्मादि - चौलान्तं गया है । मन्त्रवर्ज स्त्रियाः कुर्यात् । मानवेऽप्युक्तम् ' श्रमन्त्रिका तु कार्येयें स्त्रीणा-दि - मन्त्रः । मावृदशेषत: ' । उपनयन तु नास्ति, तत्स्थानापन्नतया विवाहस्य -६ ) बहाँ रमन्य स्मरणात् । अतो विवाहात् प्राग् ग्रनुपनीततुल्यमाचरेत् । ऊर्ध्वं तु भर्तृ तुल्यं ' सह धर्मः चर्यंताम् ' इति वचनात् । उपनयनाऽभावादव्ययनम्, तदभावात् Tन ' ( २ राहा तदर्था जपा नियमाश्च न सन्ति । श्राहत्य विहितास्तु वचन वलाद् जैमिनि । भवत्येव ' । यहाँ तो स्पष्टताकी सीमातीतता कर दी गई है । इससे लड़कोन • प्रतिपक्षी के सारे प्रयासपर पानी फेर दिया गया है । - ' श्रावर्तव । इसका यह आशय है कि- विवाहसे पूर्व स्त्रियां अनुपनीतके समान वनारायण होती हैं । विवाह के बाद स्त्रियां उपनीतके ' कुछ ' सदृश हो जाती हैं । कुमारीश तब वे पति के साथ मिलकर धर्माचरण कर सकती हैं । परन्तु उपनयन न होने से उनका वेदाध्ययन नहीं होता । हाँ, यदि स्त्रीकेलिए क्वाचित्क नास्त्रीय विशेष वचन मिल जाय, तो वचन - बल से कोई मन्त्रविशेष उससे ऋत्विग्- · श्रादिके श्राश्रयसे बुलवाया जा सकता है 1. ' न व कन्या न युवतिः ' का प्रय [ ४२७ इससे स्त्रियों का वध तथा क्रमिक ( मनु. २११७३ ) वेदाध्ययन सब-वेदाङ्ग - उपाङ्गरूप गृह्यसूत्रों तथा स्मृतियोंसे विरुद्ध सिद्ध हुआ । ' बृहत्पराशरस्मृति ' में भी कहा है- ' सर्व स्त्रिया विमन्त्रं तु कार्य काय-' विशुद्धये ' ( ४।१४७ ) ( स्त्रियोंके शरीरकी शुद्धिकेलिए सभी क्रियाएं करो, पर बिना मन्त्रके ) वृहत्पराशर स्मृतिको प्रतिपक्षी बहुत प्रमाणित मानता है । देखिये श्रीनगरकी ' श्री ' पत्रिकामें उसका लेख । ( ४२ ) प्रश्न- ' अर्यमणं तु देवं ' मन्त्र पढ़कर लड़की लाजा - होम करती है; इससे लड़कियोंका वेदाधिकार सिद्ध होता है । ( उत्तर ) - अब ' अर्यमणं तु देवं कन्या ' इस अपने दिये मन्त्रपर जो विवाहमें कन्याओं द्वारा वादीके अनुसार बोला जाता है - प्रतिपक्षी आश्वलायनगृ.के टीकाकार श्रीगार्ग्यनारायणकी व्यवस्था सुने । श्रीगायं यहाँ प्रश्नोत्तर - प्रक्रियासे लिखते हैं-( प्र. ) ' को जुहोति? ' ( यहाँ लाजा- होम कौन करता है? ) ( उ. ) वधूः ( विवाहित हो रही लड़की ) ( प्र. ) ' कस्य एते मन्त्राः? ( यह मन्त्र किसके हैं? ) ( उ. ) वच्चा: ( वधूके मन्त्र हैं यह ) । ( प्र. ) कुतः? ( क्यों ) ( उ. ) ' सा हि जुहोति मन्त्रलिङ्गात् कन्या अग्निमयक्षत इति ( क्योंकि वह लड़की ही हवन करती है । इसमें मन्त्रका लिङ्ग भी है । ' कन्या श्रग्निमयक्षत ' ) । ( सिद्धान्त ) तद् असत् । नहि स्त्रीणां मन्त्रेऽधिकारोस्ति । ( यह बात गलत है । स्त्रियोंका मन्त्रमें अधिकार नहीं होता ) कितने स्पष्ट शब्द हैं ) । ( प्र. ) ननु कथं पत्नी वाचनन्? ( फिर यह मन्त्र पत्नीसे कैसे बोले जाते हैं? ) ( उ. ) तत्र वचनमस्ति; श्रत्र तु सन्दिग्धम् । तम्माद् वरेस्य मन्त्राः । ( जहाँ स्त्रीसे कोई मन्त्र बुलवाया जाता है; वहाँ विशेष ( अपवाद ) -वचन होता है, यह तो सन्दिग्ध वचन है । इसलिए अर्यमणं नू देव ' इत्यादि तीन मन्त्र वरके ही हैं । ) मन्त्राच्च- ' स इमां देव: ' इति परोक्ष निर्देशः । यदि हि वध्वाः स्युः ' स इमां देवः ' इति न स्यात् [ ' स मां
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४२८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) देव: ' इति हि स्यात् ] ( इसमें मन्त्रका लिङ्ग भी है कि यह मन्त्र वरके हैं, कन्याके नहीं । यदि यह मन्त्र वधूके ही हों; तो ' स इमां देवः ' यह परोक्षरूपसे न कहा जाता । ' स मां देवः सविता ' ( वह देव सविता मुझ लड़कीको ) यह कहा जाता । यतु उक्तन - सा हि जुनीति, तत्र ब्रूमः - अन्यस्यापि मत्त्रो दृश्यतेा ध्वयुर्जुहोति होता वषट्करोति । ( जोकि कहा गया था कि लड़की लाजाका होम करती है, इसपर यह उत्तर है कि दूसरेका मन्त्र भी दीखता है । अध्वर्यु हवन करता है, और होता मन्त्र पढ़ता है ) । ' यत्तु उक्त ं मन्त्रलिङ्गादिति, तत्र ब्रूमः, नह्यत्र इयं कन्याभिधीयते । ग्रन्या एव कन्याः [ पूर्वकल्पस्था:! यदि इयमभिधीयते, बहुवचनं नोपपद्यते, तथाभूतश्च [ भूतार्थको लुङ्घटितः ] प्रत्ययः [ अपि नोपपद्यते ], तस्माद् वरस्य [ इमे मन्त्राः ] । ( जोकि कहा गया था कि- मन्त्रके लिङ्गसे यह मन्त्र कन्यासे पठनीय है - इसमें हमारा उत्तर यह है कि इस मन्त्र में विवाही जा रही इस कन्या-को नहीं कहा जा रहा, किन्तु अन्य कन्याओं को [ जोकि पूर्वकल्पकी थीं ] । यदि इस विवाह जा रही लड़कीको कहा जा रहा होता, तो यहाँ कन्या में ' कन्या: ' यह बहुवचन न होता, किन्तु एकवचन ही होता, और इस मन्त्रमें वर्तमानकालका प्रत्यय होता; यह लुङ्लकारका भूतकाल न होता । इस कारण यह मन्त्र वरके ही बोलनेके हैं, लड़कीके बोलने के नहीं ) । श्रव वादी बोले, इससे बढ़कर अन्य क्या स्पष्टता हो सकती है? ' इयं नारी उपब्रूतें ' यह प्रथमपुरुष है उत्तम पुरुष नहीं; तब यह वरके मन्त्र हैं, लड़कीके नहीं । प्रतिपक्षीसे यह भी प्रष्टव्य है कि- ' अयंमणं नु देव ' यह मन्त्र तथा ' इयं नारी उपब्रूते लाजान् ग्रावपन्तिका ' यह दूसरा मन्त्र तथा ' इमान् लाजान् प्रावपामि ' यह तीसरा मन्त्र उसके माने हुए वे दमें है कि इनसे. स्त्री - शूद्रोंका वेद में अनधिकार [ ४२१ ४३० स्त्रियोंका वेदाध्ययव सिद्ध कर रहे हो? यदि नहीं; तब कन्याओं का वेदाध्ययन कैसे सिद्ध किया? इन मन्येषि यदि कहो कि प्रत्य वेद शाखामों में है; तब क्या वादी वेदशाखानोंको गार्ग्य वेद मानता है? यदि मानता है; तो उसका सैद्धान्तिक पराजय कुमार क्योंकि आर्यसमाज वेदशाखाश्रोंको वेद नहीं मानता है? यदि हो गया । ' ' सनातनधर्मं तो वेद - शाखानोंको वेद मानता है; तो इससे कहो कि स्त्रियोंका वेदाध्ययन सिद्ध हो गया, इसपर उत्तर यह है कि सनातनधर्मको शास्त्रीय व्यवस्था तो हम पहले लिख ही चुके हैं, ' तूष्णीमेताः ब्राह्मण स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ' पर इससे स्त्रियोंका वैध तथा क्रमिक क्रियाः वेदनं । अधिकार नहीं हो जाता । अतः इनसे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । कि - व यदि कहो कि — ‘ वेदमें ‘ पूल्यानि ' है, और सौत्रमन्त्रमें ' लाजान् ' है; ' ब्राह्म तो इस थोड़ेसे भेदसे ‘ एकदेशविकृतमनन्यवत् ' ( जिसका एकदेश विकृत इसलि हो; वह अन्य नहीं हो जाता ) इस न्याय से यह ' लाजानावनन्तिका ' मन्त्र वचन भी वेदभिन्न न रहा; और इससे स्त्रियोंका वेदाधिकार सिद्ध हो गया । श्वापि इसपर उत्तर यह है कि - व्याकरणकी यह एकदेशीय - परिभाषा वेद प्रतः ज विषयमें लागू नहीं हो सकती । वेदमन्त्र से एक मात्राका भेद होनेपर भी अधिक वह ' अनाम्नातेषु अमन्त्रत्वम् ' ( २ १ ३४ ) ' वाक्य नियमात् ' ( ११२।३२ ) इससे ' इस मीमांसासूत्रानुसार वेदमन्त्र नहीं रहना ' । इसके अतिरिक्त इसके भी वि . श्रागेके ' इयं नारी उपवृते ' ' इमान् लाजान् श्रवपामि ' यह दो मन्त्र भी वेदाङ्ग ' वेदमें नहीं मिलते, यह ' त्रिक ' ( तिजोडी ) है, इस भारी वैषम्यसे सिद्ध हो सक हा कि यह सोत्रमन्त्र हैं, वेदमन्त्र नहीं । इनके पढ़नेसे स्त्रीको वेदाधिकार सिद्ध नहीं हो जाता । स्त्रीको सौत्रमन्त्र निषिद्ध नहीं है । वादी स्त्रीणां जो वृद्धा स्त्रीका होतृत्व मनुके पद्यते बताता था, वह भी अर्थ उसका कट स्त्रियों गया, क्योंकि वह विवाह्यमाना लड़की कन्या भी थी, प्रतिपक्षीके कहा अनुसार युवति भी थी । ( ४३ ) अब गृह्यसूत्रादिके इस विषय में अन्य प्रमाण भी दिये जाने प्रकार
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[ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४२१ ४३० 1 वर्षे ब्राह्मणमुपनयेत ' ( प्राश्व.गृ. १११ ९ 1१ ) यहाँ भी - अष्टमे वृत्ति देखिये - ' जन्मप्रभृति श्रष्टमवर्षे ब्राह्मणमुपनयेत । गानारायणकी वर्तते, कुमारी - निवृत्यर्थ मित्युक्तम् ' ( १ | १५ | १ ) ( अष्टम वर्ष हो कुमारमिति ब्राह्मणका उपनयन होता है । यहाँ कुमारकी अनुवृत्ति या रही है, गया । निवृत्ति हो जाती है । ) वहीं अन्य भी स्पष्टता की गई । कहो कि इससे कुमारीकी - ग्रहणं किमर्थम्? ( उ ) अधिकारार्थम् । श्रष्टमे वर्षे स्त्रियोंका है- ( प्र. ) कुमार घमंत्री ब्राह्मणमुपनयेत इत्युपनयनं कुमारस्यैव यथा स्याद्, न कुमार्या: ' इति क्रियाः ( ' कुमार ' ग्रहण यहाँ किसलिए है? बहू अधिकार ( अनुवृत्ति ) केलिए है वेदम कि वह उपनयन लड़केका ही हो, लड़कीका नहीं । नहीं । इसपर प्रतिपक्षी बहुत मान्य टीकाकार श्री हरदत्तने भी कहा है— नान् है; ब्राह्मणग्रहणं ' चात्र स्त्री - शूद्रादि - निवृत्तये ' ( यहाँ पर ब्राह्मणका ग्रहण विकृत इसलिए है कि - स्त्री एवं शूद्रों का उपनयन नहीं होता ) यहाँपर भारद्वाजका का मन वचन भी है— ' जाताधिका रजननाद् ग्रप्टमेऽब्दे भवेदिदम् । कुमाराधिकृते-गया । श्वापि न स्त्रीणामिदमुच्यते ' ( यहाँ ' जात ' का अधिकार चला हुआ है, पावेद प्रतः जन्मसे उपनयन अष्टम वर्ष में होता पर साथ ही ' कुमार ' का नेपर भी अधिकार भी चला हुआ है, इसलिए यह उपनयन स्त्रिर्योका नहीं होता । ) २।३२ ) इससे अन्य स्पष्टता क्या हो? इस प्रकार स्त्रियोंका उपनयन गृह्यसूत्रोंसे क इसके भी विरुद्ध सिद्ध हुआ । गृह्यसूत्र वेदका ' कल्प ' नामक अङ्ग है; जब मन्त्र भी वेदाङ्ग स्त्रियोंका वेदाध्ययन नहीं बताता, तब वेदमें उसकी व्यवस्था कैसे से सिद्ध हो सकती है? कल्प उसी वेदोक्तको ही वताता है । स्त्रीको ( ४४ ) स्मृतियों में भी यह विषय स्पष्ट है ही । ' तूष्णीमेताः क्रियाः वादी स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रकः ( १।२।१३ ) ' याज्ञवल्क्यस्मृतिके इस वचनसे सका कट स्त्रियोंकी क्रियाएं मन्वरहित कही गई हैं; पर विवाह उसका समन्त्रक-तिपक्षीके कहा है । ' व्यासस्तृति ' में भी कहा है – ' मन्त्रवर्ज क्रियाः स्त्रियाः ” ( १११५ ) ' विवाहो मन्त्रतस्तस्या शूद्रस्याऽमन्त्रतो दश ' ( १।१६ ) इसी दये जाते प्रकार ' अग्निपुराण ' में भी कहा है- ' स्त्रीणाममन्त्रतस्तानि विवाहस्तु स्त्रीका वेदमें अधिकार [ ४३१ समन्त्रकः ' ( १५३।११ ) ' बृहदविष्णुस्मृति ' में भी कहा है – ' एताः क्रियाः स्त्रीणाम् श्रमन्त्रकाः, तासां समन्त्रको विवाहः ' ( २६।१३-१४ ) यहाँ स्पष्ट ही स्त्रियोंकी क्रियाएं मन्त्र - रहित कही गई हैं, केवल विवाह ही समन्त्रक कहा है- जो स्पष्ट अपवाद है । यह क्यों? यह इस तृतीय पुष्पके पृष्ठ २१०-२११ में देखा जा सकता है । स्त्रीके विवाहको समन्त्रकतामें उपपत्ति वादिमान्य ' हारीत ' के वचनमें देखिये - ‘ नहि शूद्रसमाः स्त्रियः । नहि शूद्रासु ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्या जायन्ते, तस्मात् स्त्रियो मन्वतः संस्कार्याः ' ( २१ अ. ) यह वचन ' शूद्रासु न जायन्ते ' इस लिङ्गसे तथा ' मन्त्रैर्यदि न संस्कृता ' ( वसिष्ठ १७६५ ) इत्यादि वचनोंसे स्त्रीके विवाह - संस्कार विषयक है, उपनयनविषयक नहीं । ' पत्नी श्रमन्त्र बलि हरेत् ' ( मनु. ३।१२१ ) यहाँ स्त्रीको वलि करना भी बिना मन्त्रके कहा है । अन्य मनुके प्रमाण पूर्व लिखे ही जा चुके हैं । ( ४५ ) प्रश्न - वेद में ' सरस्वती ' एक उत्तम स्त्रीका नाम है । उसके-लिए मन्त्र श्राता है - ' सरस्वतीं देवयन्तो हवन्तेः सरस्वतीमध्वरे तासमाने । सरस्वतीं सुकृतो ब्रह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वार्यं धात् ' ( ऋऋ. १०।१७।७ ) इसमें उत्तम स्त्रीको यज्ञकार्यमें बुलानेकेलिए कहा गया है । उत्तम स्त्री तो यज्ञमें ब्रह्मा तक बन सकती है । देखिये वेदमें ' ग्रघः पश्यस्व मोपरि, सन्तरां पादको हर । मा ते कशप्लको दृशन् स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ ' ( ऋ. ८ | ३३ | १६ ) ( जो स्त्रियां विद्याभ्यास करके उद्धत नहीं होतीं, नीचे देखकर चलती हैं, और अपने पैर नीचा- ऊँचा देख - देखकर रखती हैं, जो अपने घुटनोंको ढककर चलती हैं कि कोई देख न सकेँ । इस प्रकार प्रतीव विदुषी, योग्य श्राचरणवाली ब्रह्मा तक बन सकती है ' । ( आचार्य गुरुकुल होशङ्गाबाद ) उत्तर - प्रतिपक्षी लोग वेदोंके पूर्वापर - प्रकरणको छिपाकर कृत्रिम अर्थ किया करते हैं - ऊपर कहे हुए अर्थ इसके उदाहरण हैं । यह उन
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४३२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्रतिपक्षियोंका छल है जो कि यज्ञमें सरस्वतीका मानुषी - स्त्री - यह अर्थ कर दिया करते हैं । वस्तुतः सरस्वती एक देवताविशेष है, मानुषी स्त्रीका नाम नहीं । ' यज्ञ ' शब्द ' यजधातुसे नङ प्रत्यय करनेपर बनता है । यज धातुका अर्थ होता है - देवपूजा, मनुष्यपूजा नहीं । सो यज्ञमें द्युलोकमें रहनेवाले देवताओं का आह्वान करके उन्हें हवि गेकर उनकी पूजा की जाती है । ' अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा ' आदि मन्त्रोंसे उन उन देवताओंको हवि दी जाती है । श्रीर वह हवि अग्निमें डाली जाती है । यह अग्नि, सोम यदि कोई मनुष्य नहीं है । यदि परमात्माका नाम मानोगे; तो वादी के अनुसार मूर्तिपूजा था पड़ेगी कि परमात्माका नाम लेकर उसको अग्नि-मूर्ति द्वारा हवि दी गई । देवताकी हविको अग्निमें डालनेका कारण यह है— ' अग्निर्वे देवानां मुखम् ' ( गोपथब्रा. २।१।२३ ) ' अग्निवें देवानां जठरम् ' ( तै. व्रा. २।७।१२ ) ' अग्नी हि सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्वति ' ( शतपथ. ३।११२ १ ) यह वेदके ब्राह्मणभाग के प्रमाण हैं । इनमें कहा गया है कि देवताओंका पेट वा मुख अग्नि हैं । सो सब देवताओंकी हवि जो अग्निमें डाली जाती है; यह देवताओंकी तृप्तिकेलिए होती है । यदि मानुषी स्त्रीका अर्थं होता; तो उनके पेटकी अग्निमें वह हवि न डालकर अर्थात् उनको भोजन न खिलाकर उसकी हवि भला अग्निमें क्यों डाली जाती? क्या इससे उनका पेट भर जावेगा? अब इस विषय में मन्त्रभागके प्रमाण देखिये- अग्ने '! वह हविः अद्याय देवान्... इमं यज्ञं दिवि देवेषु धेहि ' ( ऋशा.सं. ७।११।५ ) ( हे अग्नि, द्यलोकवासी देवनाओं के खिलानेकेलिए यह हवि तू ( अग्नि ) धारण कर । ) ' इमं यज्ञं नो वह [ अग्ने! ] स्वर्देवेषु गन्तवे ' ( ऋ. १५२. १७ ) ( हे अग्नि! यह हमारा यज्ञ स्वर्गके देवताओं को पहुंचानेकेलिए तुं धारण कर ) इसमें अग्निमें हवन करनेसे देवता पूजा तथा तृप्ति बताई सरस्वती क्या मानुषी स्त्री है? [ ४३३ ४३ गई है । यह बातें मानुषी स्त्रियोंमें नहीं घट सकतीं । उन्ही में एक देवता सरस्वती भी है; वह कोई मानुषी स्त्री नहीं देवल भो उस सरस्वती - देवताका प्रह्नान करके उसके नामकी हवि श्रग्निम । डाली जाती है 1 । कोई मानुषी स्त्री यहाँ सरस्वती ' विवक्षित नहीं सर उस मानुषीका हविसे वा लोकसे कोई सम्बन्ध है ।, न हो इस मह्य ' देवी सरस्वती ' ( अथर्व शास. ६।८ ९ ।३ ) यहाँपर भी सरस्वती है; एक देवाका नाम है । " शिवा नः शन्तमा भव सुमृडीका सरस्वति! कर मां ते युयोम संदृशः ' ( अथर्व. ७ ७१ ( ६८ ) । ३ ) यहाँपर भी उसी कहा सरस्वती देवीसे प्रार्थना की गई है कि - हे सरस्वती, तू हमें सुख देने. यथा वाली बन । हम तेरी दृष्टिसे पृथक् न होवें । क्या ऐसी बातें परावी स्त्रीसे कही जा सकती हैं? यह तो असभ्यता हो जावेगी । मरस्वती देवी विद्या एव बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवता - विशेष है । डाल बोर्ड मानुषी स्त्री नहीं । तभी ' श सरस्वती सह धीभिरस्तु ' ( प्रथर्व. १२ ) स्त्री १११२ ) यह उस सरस्वती - देवतासे बुद्धि तथा कल्याणकी प्रार्थना की सम्म जाती है । पराई स्त्री भला हमे बुद्धि तथा कल्याण कैसे दे सकती है? ' सरस्वती वीर पत्नी धियं धात् ' ( ६४६७ ) इस ऋस. के मन्त्रमें भी सरस्वती - देवताको बुद्धिदात्री कहा गया है | क्या गुरुकुलके आचार्य, श्री तथा विद्या स्नान कर चुके हुए स्नातक कभी किसी पराई स्त्रीको बुद्धि किंग देनेकेलिए बुलाने जाएंगे? इन प्रकार ' प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिवाजिनीवती । धींनामवित्री श्रवतु ' ( ऋ. ६।६१ । ४ ) यहाँपर भी सरस्वती देवीको बुद्धिकी रक्षिका इस होकर जीवन की रक्षणकर्त्री कहा है । वेदमें या तो सरस्वती नदीका वर्णन हुए ता है, जिसके किनारे तपस्या करनेसे बुद्धिकी प्राप्ति होती है, ( देहा तत्र यजु: ( २६।१५ ); या फिर सरस्वती - देवताका वर्णन आता है, किसी मा बुल स्त्रीका नहीं । तभी निरुक्तकारने भी कहा है - ' सरस्वती - इत्येतस्य नवी देव बिन सं ००२८
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४३३ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४३४ ] निगमा भवन्ति ' ( २।२३।३ ) । नहीं । देवताच्च मे देवी सरस्वती श्रादधातु ( पारस्करगृ. २४/७ ) में भी अग्निमें ' मेघां देवताका बुद्धिदातृत्व स्पष्ट वताया गया है । स्वा. द. जीने भी नही सरस्वती - अपनी संस्कारविधि ' के वेदारम्भके ८६ पृ. में उद्धृत किया इस मंत्र इसे अग्निके आगे पढ़वाया है; किसी मानुषी स्त्रीको निमन्त्रित सरस्वती: और प्रार्थित नहीं किया है । अग्नि, देवताओंका प्रतिनिधि है, यह पूर्व वति! करके कहा जा चुका है । इसीलिए वेदमें कहा है – ' यथा हव्यं वहसि जातवेदः! उसी यथा यज्ञं कल्पयसि प्रजानन् । एवा देवेभ्यः सुमति न आ वह ' ( श्र. ४ । २३ । रख देने • २ ) यहाँ देवताओंकी सुमति चाहते हुए हवि श्रग्निमें डाली जाती है । परावी सो मानुषी स्त्रीका अग्निके आगे कहनेका तथा उसमें उसकी हवि डालनेका क्या सम्बन्ध हो सकता हैं? और न स्वामीने वहाँ किसी मानुषी ष है । स्त्रीको बुलवाकर यह प्रार्थना कहीं कराई है । देवताओंका तो अग्निसे नं. १२ सम्बन्ध होता है । जैसे कि निरुक्तमें भी कहा है – ' अथापि ब्राह्मणं ना की भवति- ' अग्निः सर्वा देवता: ' ( ७ | १७ | ४ ) अर्थात् श्रग्नि सर्व देवतात्मक ती है? होता है; सो उसके आगे सभी देवताओं से प्रार्थना की जा सकती है, में भी और उस देवताकी हवि उस अग्निमें डाली जा सकती । इस प्रकार को बुद्धि श्राश्वलायनगृ. ( १।१५।२ ) में भी सरस्वती देवीको बुद्धि देनेवाली सूचित किया है । मवित्री इस बात को जान लेने से ' सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते ' ( श्र. १८१४१ ) रक्षिका इस मन्त्रका अभिप्राय समझ में श्राजाता है कि- देवताओंको बुलाना चाहते वर हुए एलोग सरस्वती देवताका भी आह्वान करते हैं । जब यज्ञ हो रहा है; ( देखा तब भी सरस्वती - देवीको पुकारते हैं । पुण्यात्मा लोग सरस्वती देवीको मा बुलाया करते हैं - हवि देनेवालेको सरस्वती वर दे । उसी सरस्वती-नग देवताको ' अवा सरस्वत्यै नारि! पितृभ्यश्च नमस्कुरु ' ( अ. १४/१२/२० ) विवाह्यमान नारीके द्वारा नमस्कार भी कराई गई है । वहीं सरस्वती देवता ' प्र वाग्देवी ददातु नः ' ( यजुः ६२६ ) वाणीकी सरस्वतीका परिचय [ ४३५ अधिष्ठात्री देवता मानी गई है । उससे वरदान मांगा गया है । इस कारण शतपथब्रा. में ' वार्ग वं सरस्वती ' ( ५२/५३१३ ) में सरस्वतीको वाणीकी श्रविष्ठात्री देवताका नाम बताया है । ' निघण्टु ' ( २१११ ) में ' सरस्वती ' शब्द ' वाकू ' के नामों में आया है । तब उसका ' मानुषी स्त्री ' प्रर्थ करना वेदादिशास्त्रोंसे विरुद्ध अत्यन्त दुस्साहस है । ' सरस्वती दाशुषे वार्य धात् ' ( ऋ. ) इस पूर्वके कहे मन्त्रका श्री-सायणाचार्यने यह श्रयं किया है- ' हवींषि दत्तवते यजमानाय वार्य-वरणीयं कर्मफलं दात् प्रयच्छन् ' ( हृवि देनेवाले यजमानको सरस्वती वरणीय कर्मका फल है । इस प्रयंका मानुषी स्त्रीसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं । हवि ( ग्राहति ) देवताको दी जाती है, मानुषी स्त्रीको नहीं । नहीं तो उसके मुखमें डाली जाती । निरुक्त लिखता है - ' यस्यं देवतायं हविर्गृहीतं स्यात्; तां मनसा ध्यायेत् ' ( २०११ ) ( जिस देवता को देनेकेलिए छत्रि उठाई हो; उसका पहले मनसे ध्यान करे ) । इस प्रकार सरस्वती देवताका भी मनसे ध्यान कर उसके नामकी प्राहति श्रग्नि में डाली जाती है । अग्निमें आहुति देते हुए किसी पराई मानुषी स्त्रीका मनसे ध्यान नही किया जाता; अन्यथा यह मानसिक व्यभिचार हो जावे? इस प्रकार ' सरस्वती ' शब्दसे वादीकी कुछ भी मानुषी स्त्रीविषयक इष्टसिद्धि नहीं; क्योंकि म नुषी स्त्रीके नाम अग्निमें • हवि नहीं दी जाती । सरस्वती यदि किसी मानुषीका नाम होता; तो वहां हवि उस स्त्रीको खिलाई जाती । पर ऐसा नहीं होता । ( आक्षेप ) - प्रपने ' शिवा नः शन्तमा भव सुमृडीका सरस्वति! मा ते युयो सन्देश: ' ( अ. ७/७१ ( ६८ ) ।२ ) यह मन्त्र जो गत उत्तरमें उद्धृत किया है, वह तो स्पष्टतया ' सरस्वती ' को मानुषी स्त्रीवाच प्रमाणित करता है कि - हे विदुरो स्त्री, तू हमें सुख और शान्ति देनेवा वन; यह तो पति, पत्नीको सम्बोधित करके कहता है - इसलिए वं सरस्वती ' ( शत. २।५१११११ ) इस ब्राह्मणके वचन में ' सरस्व
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४३६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' विदुषी ' स्त्रीकेलिए प्राता है । इसमें यदि श्रापको सन्देह हो; तो मानव - गृह्यसूत्र ' के ' सखा सप्तपदी भव, सुमृडीका सरस्वती । मा ते वियोम सन्दृशि ' ( १।११।१८ ) में सप्तपदी के अवसरपर वर, वधूको सम्बोधित करता है, यह वही आपसे उद्धृत किये गये प्रथर्ववेदके मन्त्रका अनुसारी मन्त्र है । इसमें किसी निष्पक्षपात - विद्वान्को प्रणुमात्र भी सन्देह नहीं रह सकता, कि- स्त्रीको ही सरस्वतीके नामसे पुकारा गया है । पक्षपात प्रस्तोंकी तो बात पृथक् है । ( परिहार ) - हम इस विषय में पूर्व कह ही चुके हैं कि उक्त अथर्व. का मन्त्र सरस्वती- देवताके विषयमें है, किसी मानुषी स्त्रीकेलिए नहीं । उक्त अथर्व मन्त्रका विनियोग किसी पतिका पत्नीसे प्रार्थना करनेमें नहीं, किन्तु द्विजपुरुषोंकी, सरस्वती देवीसे- जिसका हम वेदादिशास्त्रों द्वारा पूर्व - निरूपण कर चुके हैं, उस विद्याधिष्ठात्री देवीसे प्रार्थना है । जिसकी आहुति वादीके स्वामी भी अपनी सं. वि. में अग्निमें डलवा गये हैं; नहीं तो उनको वह श्राहुति उस विदुषी स्त्रीके मुख में डलवानी चाहिये थी । आगे जो वादीने मानवगृह्यसूत्रका अथर्ववेदसदृश सप्तपदीके अवसरका मन्त्र दिया है; उसमें सरस्वती शब्दके मानेसे उसे विदुषी-स्त्रीका वाचक वादीने सिद्ध किया है - इसपर जानना चाहिये कि क्या अथर्ववेदके ' सरस्वती ' शब्द वाले उक्तसूक्त ( ७ / ७१।२ ) में सप्तपदी का प्रकरण वा विनियोग है कि - वादीने पतिद्वारा पत्नीको प्रार्थना कराई? यदि ऐसा है, तो सप्तपदीसे पूर्वके छः मन्त्र प्रथर्ववेद के उसी ( ७।७१ ) सूक्तमें वादी दिखलावे? यह उसकी छलकी दुष्प्रकृति है । अथर्व के मन्त्र में जबकि - ' सरस्वति ' विशेष्य तथा सम्बोध्यमान है; तब यहाँ वादीने ' पत्नी ' का अर्थ कैसे कर डाला? शेष रहा मानवगृह्यका ' सखा सप्तपदी ' मन्त्र; यह अवश्य वहाँपर सप्तपदीमें है । पत्नीके छः कदम मन्त्रोंके साथ चलानेके बाद सातवां मन्त्र है । तब यहाँपर सम्बोध्यमान तथा विशेष्य पत्नी है, सरस्वती नहीं । क्या सरस्वती पत्नीका नाम है? न दोनों मन्त्रों में भी भारी वैषम्य है । इसलिए गृह्यके में ४३८ भांन्ति ' सरस्वती ' यह सम्बुद्धिपद नहीं किन्तु पत्नीका मन्त्र प्रथर्व के मन्त्री , यह विधेय है । - विशेषण तात्पर्य वादीने यह बात लोकदृष्टिसे छिपाई है, हम उसे क्योंक हमसे दिये अथर्ववेद के मन्त्र में ' सरस्वति '! सम्बुद्धिपद प्रकट करते हैं डि शब्दक ' वानद्योह्रस्वः ' ( पा. ७।३।१०७ ) से उसे है; तभी ' वादीके दिये गृह्य के मन्त्र में उसने देखा होगा कि ह्रस्व हुआ है । परन्तु शब्देन ह्रस्य नहीं है, अतः वह सम्बुद्धिपद भी नहीं है । वहांपर ' सरस्वती ' में । उपपर जब वह सम्बोधन नहीं; तब वह वहाँपर विशेष्य गुण-विधेय- विशेषण है ॥ सप्तपदीमें सम्बोध्यमान ' पत्नी ' भी नहीं, किन्तु बा है । तब अर्थ हुआ कि— है यह तो स्पष्ट हो हो ' हे पत्नि! त्वं सखा ( यहाँ दीख रहा हुआ पुंस्त्व किन्त ' सख्यशिश्वीति भाषायाम् प्रापं है, क्योंकि-( पा. ४ | १ | ६२ ) इस सूत्र में ' सखि ' इन्द है । को वेदमें स्त्रीत्वमें भी ङीष् नहीं होता, अतः वहाँ स्त्रीत्वमें भी ' सखा ' विशेष ही बनता है ) भव, सप्तपदी भव सुमृडीका भव, सरस्वती भव ' ह वायो पतिकी पत्नीको ऐसा बननेकी प्रेरणा है । अव यहां ' सरस्वती ' यह पत्नी. का विधेय - विशेषण सिद्ध हुआ । प्रथर्व उसका अर्थ यह है - तू ' सरस्वतीवद् भव ' अर्थात् तू ' सरस्वती - देवता- नरख की तरह ' बन । यदि वादी यहां यह प्रश्न करे कि - यहां ' वति ' प्रत्यय पदक तो है नहीं; तव ' सरस्वतीवद् भव ' यह अर्थ कैसे किया गया?! इस में पर वादी ध्यान देकर सुने-वेदाङ्ग - व्याकरणके महाभाष्य में लिखा हैं— ' अन्तरेणापि वतिम् सरस्व अतिदेशो गम्यते । श्रब्रह्मदत्त ब्रह्मदत्त है? इत्याह, तेन मन्यामहे - ब्रह्मदत्तवर स्वतन्त अयं भवति ' ( १।१।२३ ) अर्थात् जब अब्रह्मदत्त ( जो ब्रह्मदत्त को ' ब्रह्मदत्त ' कहा जावे, तब उसका भाव न हो ) शाखा होता है - ब्रह्मदत्त की तरह, होंगे, तब मानुषीको, जो सरस्वती - देवता नहीं, उसे ' सरस्वती ' कहनेका यह
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४३८ ] के मत्व सरस्वतीकी तरह वन ' उसके कई गुण ( सब नहीं; म- विशेषण तात्पर्य होता है कि तू के अर्थ में सर्वसादृश्य कभी नहीं होता ) लेनेमें उस ' वति ' प्रत्यय क्योंकि- पर्यवसान हो जाता है । करते हैं कि शब्दका इसी प्रकार ' न्यायदर्शन ' में भी कहा है- ' प्रधानशब्दानुपपत्तेः, गुण-है; भी निन्दा - प्रशंसोपपत्तेः ' ( ४ | ११६० ) ( जहां प्रधानशब्द परन्तु शब्देन अनुवादः, न हो सके, तो उसको वहां ' प्रधान शब्द ' न मानकर रस्वतों में उपपन्न ( संगत ) समझना चाहिये ' गौणशब्द ' | उस शब्दसे केवल निन्दा -' गुण - शब्द ' ही नहीं वा प्रशंसा ही अभिप्रेत होती है; वह शब्द वास्तविक उस अर्थवाला हीं, किन्तु हो जाता ) । स्पष्ट हो तब यह ' सरस्वती ' शब्द वहाँ उसकी प्रशंसाकेलिए हुम्रा किन्तु समझदार बन; क्योंकि - सरस्वतीका व्युत्पत्त्यर्थं ' ज्ञानवती ' होता क्योंकि- है । विशेषण होनेसे वहां ' सरस्वती ' शब्द योगिक ही होगा; क्योंकि-' विशेषण सदा यौगिक ही हुआ करता है ' । परन्तु विशेष्यमें सदा रूढिता भी ' सखा ' या योगरूढिता ही हुआ करती है, यह वात बहुत ही स्पष्ट है । यहाँपर यह भी जानना चाहिये कि - मानवगृह्यके उक्त स्थलमें उक्त श्रथर्ववेदका मन्त्र गृहीत भी नहीं । दोनों स्वतन्त्र एक - दूसरे से सम्बन्ध न रखनेवाले भिन्न - भिन्न मन्त्र हैं । वेदके मन्त्र नियतानुपूर्वी तथा नियत-वी - देवता- पदक्रम वाले होते हैं । परन्तु वादी स्वयं देखे कि वेद और गृह्यके मन्त्रों-' प्रत्यय में श्रापसमें बहुत भेद है । ' शिवा नः शन्तमा भव सुमृडीका सरस्वति! ' ?! इस ( ७/७११२ ) यह प्रथा मन्त्र है, ' सखा सप्तपदी भव, सुमृडीका सरस्वती ' यह मानवगृह्यका सूत्र है । क्या वादी वेदमें पाठभेद भी मानता वतिम् है? मानवगृह्यका उक्त मन्त्र सप्तपदीमें विनियुक्त है, श्रतः श्रयर्ववेदसे ह्मदत्तवर स्वतन्त्र मन्त्र है, जो कृष्ण - यजुर्वेदको मैत्रायणी- संहिता की किसी सौत्र-नहो शाखासे गृहीत हो सकता है, जिसमें सप्तपदीके उक्त सातों मन्त्र इकट्ठे की तरह होंगे, पर अथर्ववेद में ऐसा नहीं । नेका यह यह हम पहले ही बता चुके हैं कि- विशेषण सदा यौगिक वा ' सरस्वती ' पर विचार [ ४३६ उपमागर्भित होता है, विशेष्य वैसा नहीं हुआ करता । अथर्वके मन्त्रमें ' सरस्वति! ' यह सम्बोध्यमान होनेसे विशेष्य है, पर मानवगृह्यमें ' सरस्वती ' यह विधेय- विशेषण है, इसलिए वहाँ सम्बुद्धि नहीं है; पत्नी वहाँपर विशेष्य है । पत्नीको ' सरस्वति! ' इस प्रकार सम्बोधित भी नहीं किया गया है । प्रथर्व के उक्त मन्त्रमें ' सप्तपदी का कोई प्रकरण नहीं; अतः वहां ' पत्नी ' श्रर्थ भी नहीं, श्रतः वहां ' सरस्वती - देवता ' ही सम्बोधित हो रही है; पर मानवगृह्यके मन्त्रमें सप्तपदीका प्रकरण है; श्रतः वहाँ स्त्री ही सम्बोधित हो रही है; सरस्वती नहीं, अतः वहाँ ' सरस्वती ' यह सम्बुद्धि - पद भी नहीं । तब वेद तथा गृह्यके भिन्न - भिन्न मन्त्रोंका एक श्रर्य करनेवाले वादीको कहा जा सकता है कि ' अहो! साहसम्!!! तब फिर वेदमें विशेष्य ' सरस्वती ' सदा एक देवता ही रही । तो फिर ' यज्ञं दधे सरस्वती ' में विशेष्य ' सरस्वती ' पदवाले मन्त्रमें स्त्रीमात्रका श्रयं करना वाढीका भयङ्कर- छल है । सरस्वती वेदमें एक देवता ही सिद्ध रही । मानुषीको कहीं ' सरस्वती ' कहा जावेगा, तो वह विशेषण होगा; और यौगिक होगा । ' योषा वै सरस्वती ' में भी सरस्वती सर्वसाधारण स्त्री नहीं बताई गई हैं; किन्तु वह विशेष - देवता स्त्री है । इसलिए वहीं ब्राह्मणके वचनमें कहा है – ' योषा व सरस्वती, वृषा पूषा ' ( शत. २५ | १ | ११ ) अर्थात् पूषा देवता पति है, और सरस्वती - देवता उसकी स्त्री है । यहाँ वादी इस प्रकार समझे । यह कहीं आजाए कि - ' प्ररुन्धती वसिष्ठे च वसुदेवे च देवकी । लोपामुद्रा यथाऽगस्त्ये तथा त्वं भव भर्तरि ( विवाहपद्धतिः ) इसकी यह व्याख्या की जावे कि- ' योषा वै श्ररुन्धती, वृषा वसिष्ठः ' । ' योषा वै देवकी, वृषा वसुदेवः । योषा लोपामुद्रा, वृषा अगस्त्यः ' तब क्या प्ररुन्धती प्रादिको वादी स्त्रीका पर्यायवाचक सिद्ध करने लग जायगा? यदि नहीं, तब ' सारस्वतः चरुर्भवति, पौष्णः चरुः ' अर्थात् एक सरस्वती देवताका चरु होता है, तथा दूसरा पूषा देवताका, उन
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४४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) दोनोंका परिचय देनेकेलिए ब्राह्मण में कहा गया- ' योषा वै सरस्वती, वृषा पूषा ' ( शत. २।५।१।११ ) सो ' सरस्वती ' शब्द सर्वसाधारण स्त्रीमात्रका पर्यायवाची यहाँ नहीं बन सकेगा । जब यह बात है; तव ' सरस्वती ' शब्द स्त्रीमात्रका पर्यायवाची सिद्ध न हुआ, किन्तु एक विशेष - देवताका योगरूढ संज्ञा - शब्द सिद्ध हुआ । योगरूढ इसलिए कि - ज्ञानयुक्त अन्य भी देवी - देव होते हैं, क्योंकि- ' विद्वा ँ सो हि देवाः ' ( शत. ) पर ' सरस्वती ' एक ज्ञानाधिष्ठात्री देवताका नाम सिद्ध हुआ, तब वादीका पक्ष गिर गया । यदि ' योषा वं सरस्वती, वृषा पूषा ' इस ब्राह्मण के प्रमाणसे वादी सरस्वतीको स्त्री - पर्यायवाचक सिद्ध करे, तो यह बात गलत होगी । ' व ' शब्दसे पर्यायवाचकता नहीं हो जाती; नहीं तो ' आयुर्वे घृतम् ' ( कृ.य. तै. सं. २।३।२।२ ) में ' प्रायु'शब्द घृतका वा ' घृत ' शब्द आयुका पर्यायवाचक-ब- आवे; पर ऐसा कोई भी नहीं मानता, वैसे प्रकृतमें भी समझ लेना चाहिये । ब्राह्मणभागके इस प्रकारके अन्य वचन भी वादी देखे - ' योषा वै वेदिः, वृषा वेद: - ( कुशका बण्डल ) मिथुनमेव एतत् प्रजनन क्रियते ' ( वेदि - स्त्री है, और वेद ( कुशबण्डल ) उसका पति है । यह दोनोंका प्रजनन - सा हो जाता है । ' वेदि ' वेद ( कुशा ) के रखनेसे यह नाम होता है । ( शत. ११६०२/२१ ) ' योषा वै आपः, वृषा अग्निः, मिथुनमेव एनत् प्रजनेन समर्धयति ' ( शत. २।१।१।४ ) ' योषा वे वेदिः, वृषा श्रग्निः ' ( १/२/३: १५ ) ' वृषा वै प्राणः, योषा पत्नी ' ( ४/४/२/१ ), ' वृषा वै प्रवर्ग्यो, योषा पत्नी ' ( शत १४ । १।४।१६ ) इत्यादि बहुत से उद्धरण दिये जा सकते हैं; परन्तु इससे वेदिः आपः आदि स्त्रीके पर्यायवाचक नहीं बन जाते । ब्राह्मणभागकी अर्थवादसे ऐसा कहनेकी शैली है, जैसे कि निरुक्तमें कहा है- ' बहुभक्ति - वादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति ' ( ७ | २४ | ६ ) अर्थात् ब्राह्मण, भक्तिवाद ( प्रर्थवाद ) से उस - उसको वह वह न होते हुए भी वह-दक्षस्मृतिका वचन [ ४४१ वह कह दिया करते हैं । उससे उन उन शब्दोंकी पर्यायवाचकता ४४२ हो जाती । हम कह दें- ' प्रयं वे प्रतिपक्षी स्वा. दयानन्द: ' इससे नहीं दयानन्दका पर्यायवाचक नहीं वन जाता । आशा है - अव वादी प्रतिपक्षी ' प्रांखों में धूल नहीं झोंक सकेगा । इससे ' सरस्वती ' देवता जनताको तो यह मानुषी स्त्री नहीं । तब उसका पक्ष गिर गया । सिद्ध हुई, कोई देवता कहीं ( दक्षस्मृतिका वचन ) तब इ ( ४६ ) ( आक्षेप ) - विदुषी मानुषी स्त्रीको भी देवताके नामचे 1 कहा जाता है । देखिये - ग्रापकी अभिमत ' दक्षस्मृति ' में ' जानना वाग्दुष्टा दक्षा साध्वी प्रियंवदा । आत्मगुप्ता स्वामिभक्ता अनुकूला देवता स्व. भिन्न-मानुषी ' ( ४ \ ४ ) के अनुसार भी विदुषी स्त्रीको देवता मानना सबंधा सान ४ यं प उचित है । इसी प्रकार ' जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः । नास्ति येषां यशः - काये जरामरणजं भयम् ' यह हितोपदेशका पद्य भी याद रह वनपव लेना चाहिये, जिनमें कालिदासादि कवियों को अमर बताया गया है । बतला ( परिहार ) - यहां वादीने स्वामीजीसे अनभिमत ( क्योंकि वे लिखा स्मृतिके सिवाय अन्य किसी भी स्मृतिको शास्त्रानुकूल नहीं मानते -प्रमाण मनु-मान लिया है । पहले तो यह प्रमाण सब दक्षस्मृतियों में नहीं है । देखिये देवा: ' इसपर ' पूने ' की ' स्मृतीनां समुच्चय: ' की इस स्मृतिकी टिप्पणी । यहाँपर पृथिव वादीसे उद्धृत पद्यकेलिए लिखा है - ग ' पुस्तके एव ' अर्थात् ' अनुकूला लो त्ववाग्— ' यह पद्य ' ग ' संज्ञावाली ' दक्ष स्मृति ' ( कदाचित् श्रीवेङ्कटेश्वर- में रह प्रेस में मुद्रित उक्त स्मृतिकेलिए संकेत हो ) पुंस्तकमें ही है, शेष किसी भी ' दक्षस्मृति ' की पुस्तकों में नहीं है । तभी ' अनुकूला त्ववाग् ' इस बचनको निषेध यहाँ ब्रेकेट में रखा है, जो स्पष्ट प्रक्षिप्तताका चिन्ह है । वास्ता इन लोगों की प्रकृति यह है कि स्पष्ट प्रक्षिप्त - पद्यको तो प्रप्रक्षिप्त गुणश एवं वेदानुकूल मान लेते हैं, और अप्रक्षिप्त भी पद्य को अपने पक्ष से विरुद्ध सङ्गत होनेसे उसे प्रक्षिप्त एवं वेद - विरुद्ध कह दिया करते हैं । अर्थात् यह अपने विचारानुकूल वचनको ही अप्रक्षिप्त और वेदानुकूल मानने लग जाते हैं । ( दक्ष.
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४४१ श्रीसनातनधमालाकः ( ३-२ ) ४४२ ] कता नहीं इटावेकी छपी ' अष्टादशस्मृति ' में भी उक्त पद्य नहीं है । प्रतिपक्षी मेरे पासक होनेसे प्रमाणभूत नहीं । और फिर ' विदुषी स्त्री जनताको सो यह पाठ क्वाचित्क प्रविदुषी स्त्री मानुषी होती हैं । यह भी उस पद्य में हुई, कोई देवता होती है मीर । उक्त पद्य में ' विदुषी ' का तो नाममात्र भी नहीं है; कहीं नहीं लिखा पक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती । तव इससे वादी वादितोष ' ' न्यायसे इस पद्यको मान भी लिया जाय, " तो भी यह नामसे जानना चाहिये कि - देवयोनि तथा मनुष्ययोनि वेदादि - शास्त्रोंके अनुसार कला स्व. भिन्न - भिन्न मानी जाती है । इस विषय में स्पष्टता ' आलोक ' ग्रन्थमालाके सान ४६ पुष्पमें देखिये । सर्वया ' देवो न मर्त्यः ' ( ऋ. ८ | १४ | ४ ) नाऽमर्त्यो विद्यते मर्त्यः ' ( मह.भा. । नास्ति बनपर्व १३५।४७ ) इत्यादि प्रमाणोंसे देवता मनुष्य नहीं होते; तव वादी याद रख बतलावे कि - ' देवता सा न मानुषी ' यह पद्यांश मनुष्ययोनिकी स्त्रीकेलिए है । लिखा गया है, या देवयोनिकी स्त्रीकेलिए? - वे मनु. नेप्रमाण यदि मानुषी के लिए; तो उसे फिर ' न मानुषी ' क्यों कहा? ' दिवि 1 देखिये देवा: ' ( अ. ११।७।२७ ) के अनुसार देवता द्यलोकमें रहते हैं । ' दिवं च ' यहाँपर पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ' ( ऋ. १०११ ९ ०१३ ) इस मन्त्रके अनुसार अनुकूला द्य लोकं, पृथिवीलोकसे भिन्न होता है, पर इस पृथिवीलोक ( मनुष्यलोक ) में रहनेवालीको ' देवता ' क्यों कहा? ङ्कटेश्वर. किसी भी इससे स्पष्ट है कि - वैसी स्त्रीकी देवतात्वकी विधि तथा मानुषीत्वका वचनको निषेध अर्थवाद अर्थात् गोणीवृत्तिसे केवल वैसी स्त्रीके प्रशंसार्थ है, वास्तविक नहीं । जैसेकि ' न्यायदर्शन ' में कहा है- ' प्रधान- शब्दानुपपत्तेः, प्रप्रक्षिप्त गुणशब्देन अनुवादः, निन्दा - प्रशंसोपपत्ते: ' ( ४ | १ | ६० ) ( जहाँ प्रधान - शब्द सविरुद्ध सङ्गत न हो सके, वहाँ उसका गौण शब्दसे अनुवाद होता है; उसमें नह अपने निन्दा वा प्रशंसा ही लक्ष्य होती है । ते हैं । उसी स्थल में ' भतुः प्रीतिकरी या तु भार्या स्यात् सेतरा जरा ' ( दक्ष. ४।११ ) भर्ताकी अप्रीति करनेवाली स्त्रीको जरा ( बुढ़ापा ) कहा दक्षस्मृतिका वचन [ ४४३ गग है । क्यः सचमुच वैसी स्त्री ' वृद्धावस्था ' हो जायगी? द्रव्य भी न होकर गुण हो जावेगी? ' साहित्यसङ्गीतकला विहीनः, साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनं: ' ( नीतिशतक ) इससे क्या असाहित्यिक मनुष्य को ' साक्षात् पशु ' मानकर उसे खली - भूमा खिलाना शुरू कर दिया जावेगा? वस्तुतः जैसे यहां निन्दार्थवादसे असाहित्यिकको साक्षात् ' पशु ' कहा गया है; पर वह वस्तुतः ' पशु ' नहीं हो जाता, वैसे ही उक्त स्थलपर प्रशंसार्थवाद से ' मानुषी ' को गुणवादसे ' देवता ' कहा गया है । वास्तविकता-से नहीं । वास्तवमें वहाँ ' देवतावत् ' अर्थ अभीष्ट होता है । जैसा कि महाभाष्यमें कहा है- ' अन्तरेणापि वतिम् प्रतिदेशो ( सादृश्यं ) गम्यते । यथा - प्रब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह; तेन मन्यामहे ब्रह्मदत्तवद् प्रयं भवतीति ' ( ' मिदचोन्त्यात् ' सूत्रमें ) । ( जो ब्रह्मदत्त नहीं है, उसे ब्रह्मदत्त कहनेका तात्पर्य ' ब्रह्मदत्तकी तरह ' यह हो जाता है, वैसे मानुषीको देवता न होने-पर भी उसे ' देवता ' कहने से ' देवतावत् ' श्रर्थ हो जाता है । इस प्रकारके स्थलोंमें ऐसी ही प्रर्यवादात्मक व्यवस्था होती है । इसमें ऋसं. की साक्षी भी देखें - ' स्त्रियः सतीः ता उ मे पुंस प्राहुः, पश्यद् अक्षण्वान् न विचेतद् अन्ध: ' ( शा. सं. ११६४११६ ) यहाँ सती स्त्रियोंको पुरुष कहा है, प्रखवालोंको भी समझदारी न करनेपर ' अन्धा ' कहा गया है । जैसे यहां स्त्रियोंको पुरुष कहना, और प्रांखों वालोंको ' अन्धा ' कहना प्रर्थवादसे है, वास्तविकतासे नहीं, केवल एतदादि स्थलोंपर स्तुति प्रादिमें ही तात्पर्य माना जाता है, वैसे ही दक्षस्मृतिके पद्यमें भी जान लेना चाहिये | इधर ' दक्षस्मृति ' के पद्यमें ' विदुषी ' शब्द ही नहीं है; वादीने ही उसे उसमें छलसे प्रक्षिप्त किया है । तब ' विदुषी ' को ' देवता ' सिद्ध करने के लिए वादीका यह प्रमाण निकम्मा सिद्ध हुआ । वेदमें ' सरस्वती ' मुख्य देवता इष्ट है; तब वहां भार्या - सम्बन्धी ' दक्षस्मृति ' का औपचारिक - पद्य . लागू हो ही नहीं सकता; तब वादीका परिश्रम व्यर्थं है ।
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४४४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' वसिष्ठस्मृति ' में ' स्वतन्त्रा स्त्री प्रनृतमिति विज्ञायते ' ( ५१ ) यहां स्त्रीको ' अमृत ' कहा है । ' अनृतं साहसं माया... स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ' ( २1१ ) स्वा.द. मान्य चाणक्यनीति में ' अमृत ' स्त्रियोंका स्वाभाविकः दोष बताया गया है । ' शुक्रनीति ' में भी कहा है- ' अनृतं साहसं मौख्यं कामाधिक्यं स्त्रियाँ यतः ' ( ३ । १६४ ) यहां भी वही है । शुक्रनीति स्वा. द. से भी मान्य है । ' भारतीय समाज - शास्त्र ' के १७६ पृष्ठ में उसके प्रणेता कट्टर प्रायसमाजी श्रीधर्मदेवजी कहते हैं- शुक्रनीति-' सार ' समाजशास्त्रकी दृष्टिसे एक प्रत्युत्तम और प्रसिद्ध ग्रन्थ है ' । एतदादि स्थलोंमें स्त्रियोंको ' अनृत- प्रकृतिक ' कहा है । तब सत्य-संहिता ' वै देवा: ' ( ऐत. ११६ ) ' सत्यमेत्र देवा श्रनृतं मनुष्याः ' ( शन. १ ) १ | १ | ४ ) वादीसे ' श्री ' पत्रिकामें उद्धृत इस वचनके अनुसार ' अमेध्यो वै पुरुषो यद् प्रनृतं वदति ' ( शत. १ | १ | १ | १ ) इस प्रमाणके अनुसार स्त्री कभी ' देवता ' बन ही नहीं सकती, सदा वह मानुषी ही रहेगी । तत्र वह वादी पक्षके काटनेका निमित्त बन गई । यदि वादीको श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस वाली ' अष्टादशस्मृति ' के अन्तर्गत ' दक्षस्मृति ' सम्यक मान्य है; जैसाकि वादीने ' श्री ' ( ७/४ पृ. ४ ९ ) में लिखा था, उसीमें वादीको उक्त पद्य मिला है, तो उसी प्रेसवाली ' दक्ष-स्मृति ' की भाषाटीका पृ. ४०७ में छपे हुए ' देवता सा न मानुषी ' इस ४ पादका ' वह स्त्री मनुष्य नहीं, किन्तु देवताके समान है । इस अर्थको भी मानकर वादी अपने पक्षको खण्डित हुआ मान ले I तब ' विदुषी ' स्त्री भी वास्तविक ' देवता ' सिद्ध न हुई । परन्तु ' सरस्वती ' तो एक वास्तविक देवता है, जिसका वेदादि - शास्त्रों में स्पष्ट वर्णन है । मानुषी - स्त्रीका नाम किसी भी शास्त्र में ' सरस्वती देवता ' नहीं आया । हां, कहीं मानुषी स्त्रीको औपचारिक ' सरस्वती ' कहा जावे, तो वहां ' सरस्वतीवत् ' अर्थ होगा । जैसे कि - ' अनुकूला त्ववाग्दुष्टा दक्षा साध्वी दक्षस्मृतिका वचन | III पतिव्रता । एभिरेव गुणैर्युक्ता श्रीरिव स्त्री न संशयः ' ( दक्षस्मृति WE यहां उक्त गुणोंवाली स्त्रीको ' श्रीरिव ' ( श्री की तरह ४ ( १० ) वादिदत्त दक्ष - पद्य में भी ' देवतेव सरस्वतीच ) कहा है, वैसे ही विश्व अर्थ है । केवल यह अन्तर है कि यहां ' इव, ' न शाब्द मानुषीव यह ' इव ' का मन्त्र वहां ' इव ' प्रार्थ ( लुप्त ) है । इस प्रकार देवयोनि ( प्रत्यक्ष ) है; और सिद्ध हो गई, जैसा कि सब शास्त्रोंको अभिमत है । मनुष्ययोनिसे भिन्न इन्द्रर बा, सरस्वती - देवता विद्याधिष्ठात्री स्वभावत: है । देवता जन्मसे उत विद्वान् तथा दिव्यदृक् होते हैं, पर मानुषियोंमें यह बात विषम है । नहीं ही सूक्त तो वादी लोग उन्हें भी सरस्वतीकी भांति विना पढ़े विदुषी बनने दें, वर्ण तब वे स्वतः ' सरस्वती ' हो जाएगी । वादीको तदर्थं बोतलकी स्याही ग खर्चनेकी भी आवश्यकता नहीं रहेगी । इधर वेद में देवता वह विवक्षित होता है, जिसको हवि दी जाय । यह हम पहले निरुक्तके प्रमाणसे कह इस चुके हैं । सरस्वती - देवताके प्रसङ्गमें मानुषी स्त्रीको कहीं हवि नहीं दी जाती । तब वादीका सम्पूर्ण कथन निर्मूल सिद्ध हुआ 1. स्त्रियोंका वेदाधिकार सिद्ध न हुआ । इस प्रकारके वादियोंसे दिये जाते हुए अन्य वि सरस्वती आदि विषयक मन्त्रोंका भी समाधान हो गया । ' उनमें तप विशेषता भी तो नहीं । कुछ वि ( ४७ ) ( प्र. ) ' सं होत्रं स्म पुरा नारी समनें वाव गच्छति ' ( ऋ. ) नह इस मन्त्र के अनुसार नारीका यज्ञमें जाना कहा है । ' अघः पश्यस्व मोपरि... स्त्री हि ब्रह्मा वभूविथ ' यहाँ स्त्रीका यज्ञमें ब्रह्मा तक बनना यह सूचित किया है । ( उ ) यह मन्त्र इन्द्रदेवताकी स्त्री इन्द्राणी के लिए है, मानुषीकेलिए त नहीं । यहां ' नृ ' शब्द ' नेता ' अर्थ में है । इसलिए प्रतिपक्षीने इस मन्त्रके देख उत्तरार्धको छिपा दिया है । अपने गलतपक्षको सिद्ध करनेके लिए दिये जाते क हुए प्रमाणोंका पूर्वापर छिपा लेना - यह उसकी भारी दुष्प्रकृति है । उससे छिपाया हुआ वह अंश यह है— ' वेधा ऋतस्य वीरिणी इन्द्रपत्नी महीयते