सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 251–260
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 251–260
पृष्ठ 251
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
I श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४४६ ] = 180 ) उत्तर: ' ( १० ८६ १० ) इसीलिए श्रीसायणाचार्य ने इस वैसे ही विश्वस्माद् इन्द्र प्रकार किया है— व का aer इस ऋतस्य सत्यस्य विधात्री, वीरिणी - पुत्रवती, इन्द्र- पत्नी और ' नारी- स्त्री, सं होत्रं स्म - समी वीनं यज्ञ खलु समनं वा संग्राम भार्या इन्द्राणी इन्द्रस्य स्तोतृभिः स्तूयते च । तस्था मम पतिरिन्द्रो विश्वस्माद् वा, पुरा गच्छति, ने यहां लिखा है – ' सर्वं सूक्तमैन्द्रम् ' ( यह सारा नही उत्तरः श्रीसायणाचार्य है ) तव देवपत्नीका वर्णन होनेसे यहांपर मानुषीका वर्णन सूक्त इन्द्र सिद्ध देवतापरक न हुआ । तब इसमें वादीका प्रयास विफल है । ' समा नने दें, छति ' का स्त्रियां पुरुषके समान यज्ञमें जाती हैं यह अर्थं कपोल-स्याही कल्पित है, निघण्टु - विरुद्ध है । द्विज स्त्रियां यज्ञोंमें उन्हें देखने जावें; क्षित इससे वादीके पक्षकी कुछ भी सिद्धि नहीं । यहां ' यज्ञ कराने मानुषी स्त्री कह जाती हैं -यह यहां कहीं नहीं लिखा । शेष है ' अधः पश्यस्व मोपरि... स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ, मन्त्र, कि-का विद्याभ्याससे प्रतीव विदुषी, सुसभ्य, योग्य आचरण वाली स्त्री ब्रह्मा अन्य तक बन सकती है ' यह वादीका अर्थ बनावटी है, " विद्याभ्यास से अतीव कुछ विदुषों ' आदि शब्द वादीने मन्त्रार्थमें प्रक्षिप्त किये हैं; जिनके पद मन्त्रमें नहीं हैं । खेद! उक्त मन्त्र तो स्त्रीको उपदेश दे रहा है कि - नीचे देख, ऋ. ) ऊपर न देख । पैरोंको ठीक - ठीक रख । तेरे श्रद्रष्टव्य दो अङ्ग न दीखें ' । यस्व यहांपर मध्यम- पुरुष इस अर्थका साक्षी है । बनना जब स्त्रीको उपदेशका प्रकरण चला हुआ है; तब ' विदुषी स्त्री ब्रह्मा-तक बन सकती है ' यह अर्थ यहां असम्बद्ध हो जाता है । क्योंकि - ' तू नीचे लिए देखकर चल, ऊपर न देख ' इससे तू ब्रह्मा बन जावेगी; क्या इसमें कोई जन्त्रके उपपत्ति है? सर्वथा नहीं । प्रतिपक्षी लोग यह अर्थ करते हैं, वा घास जाते काटते हैं? ' स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ ' का अर्थ श्रार्यसमाजी पण्डित उससे श्रीपाददामोदर - सातवलेकरजीने ' आर्यप्रतिनिधि सभा पञ्जाब ' द्वारा यते दयानन्द - शताब्दीके समय ' ऋषितर्पणार्थं प्रकाशित ' वेदामृत ' पुस्तक ' स्त्री हि ब्रह्मा ' का प्रयं [ ४४७ ( प्रथम संस्करण ) जिसे उस समय ' श्रार्य, प्रतिनिधि सभा ' ने स्वीकृत भी किया था, देखिये उसमें ' प्रकाशकका निवेदन ' ) में इस प्रकार किया है-' ब्रह्मा । श्रात्मा ही स्त्रीरूपसे तेरे अन्दर ) प्रकट हुया है ' यह लिखकर वे बताते हैं कि - ' वस्त्रसे अपने अवयव अच्छी प्रकार ग्राच्छादित रखे, ताकि कोई अवयव दूसरेको दिखाई न दे । यह समझे कि अपने अन्दर श्रात्मा ही स्त्रीका रूप धारण करके अवतीर्ण हुआ है । ' आलोक ' पाठकोंने प्रतिपक्षका छल देख लिया । उक्त मन्त्रमें न यज्ञका प्रकरण है, न यज्ञ - शब्द ही हैं; स्त्रीको ' नीचे देखकर चल, ऊपर देखके नहीं, इमसे स्त्री ब्रह्मा वन जाती हैं इसमें उपक्रम एवं उपसंहारकी एकता भी नहीं है? तब वादियोंका अपना इष्ट अर्थ करना श्रुतिसे वलात्कार करना है । तब प्रतिपक्षीने स्त्रीके यज्ञका ब्रह्मा अर्थही कैसे कर लिया? जब स्त्रीको नीची निगाहसे देखनेका प्रादेश दिया गया है; और उसके विशेष अङ्ग न दीखें, यह प्रादेश दिया गया है । तव स्त्री यज्ञका ब्रह्मा भी बन सकती है- यह स्त्री यहां सङ्गत ही कैसे हो सकता है? आश्चर्य है कि - वादी अपने पक्षकी सिद्धिमं गलत अर्थ लिखने में भी परमात्मासे नहीं डरते । वास्तवमें यहां प्राकरणिक अर्थ अन्य है, जिसे श्रीसायणाचार्यने स्पष्ट किया है । प्लायोगि - प्रसङ्ग नामक एक पुरुष जो इस सूक्तके ऋषि ( द्रष्टा ) मेधातिथिको धन देनेवाला था, प्रान्तरिक कारणवश स्त्री बन गया था, उसे इन्द्रकी प्रोरसे यह उपदेश दिया गया है, निमित्त उसीका है, पर उससे अन्य स्त्रियोंको उपदेश दिया जा रहा है । देखिये इसपर श्रीसायणाचार्य के शब्द - ' मेघातियेधनदाता प्लायोगि-रासङ्गः स पुमान् भूत्वा स्त्री अभवत् ' ( ऋ. १३३।१७ ) इसका भाव पहले लिखा जा चुका है । इस बातको प्रतिपक्षी ' गप्प ' भी नहीं कह सकते । ऐसी घटनाएं प्रत्यक्षमें भी घट रही हैं । हम इनमें कुछ घटनाओं-का निरूपण करते हैं-
पृष्ठ 252
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४४८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अयोध्या के ' संस्कृतम् ' पत्र ( के २ | ४ | १ ९ ४६ के अङ्क ) में यह घटना प्रकाशित हुई थी – ' बङ्गस्य मेमनसिह - मण्डलस्य २६ माचस्य समाचारो-स्ति यद् जमालपुर - स्थानवर्ति - श्रीकुमारियाग्रामस्य एकः १८ वर्षीयो-युवकः सन्निपातेन आक्रान्तः । ततो मुक्तश्च स्वशरीरे विचित्रं परिवर्तनं ददर्श । नस्य पुरुषाङ्गानि विलीयन्ते I । श्रयं स्त्रीत्वे परिणतो भवति । श्रयं नन्दिया श्रौषधालये डाक्टरं र्निरीक्ष्यते ' । ( बङ्गालके मेमनसिंह जिलेके कुमारिया ग्रामके एक १८ वर्षके युवकको सन्निपात ( डबल निमोनिया, वा सिरसाम ) हो गया । उससे छूटा; तो उसने अपने शरीरमें विचित्र परिवर्तन होता हुआ देखा कि उसके पुरुषों वाले प्रङ्ग क्रमशः विलीन हो रहे हैं; और वह स्त्री बन रहा है । उसका नन्दिया हस्पताल में डाक्टर लोग निरीक्षण कर रहे हैं । ) एक घटना दैनिक ' विश्वबन्धु ' लाहौर में भी छपी थी । कलकत्ता मेडिकल हस्पतालमें १६ वर्षीय लड़केके लड़की बन जानेकी सूचना मिली. है । गत १०० वर्षमें इस ४६ ) । उक्त मन्त्रकी व्याख्या की एक घटना भी लिखी सुबोधभाग्य में ' मेधातिथि लिखा है – ' इस अन्तिम मन्त्रमें पुरुष स्त्री बनी थी- ऐसा नामकी एक कुमारी थी पुरुषोंका मेल होनेसे पता स्त्रीके समान नहीं हैं । काटकर फेंक दिया । तब अस्पताल में ऐसे पांच केस हो चुके हैं ( १२।२ । में श्रीपाद दामोदर सातवलेकरने भी अपने यहाँ है, हम उसे उद्धृत भी कर देते हैं - ऋग्वेदके ऋषिके दर्शन ' ( पृ. ७२ ) में सातवलेकरजीने ' ब्रह्मा स्त्री बभूविथ ' में ब्रह्माका कार्य करनेवाला कहा है । इस ' ग्रोध ' नगरीमें ' कुमारी गोदावरी ' । उसकी तरुणके साथ शादी हो चुकी । स्त्री-लगा कि श्रीमती ' गोदावरी ' के प्रवयव ठीक-अन्तमें डाक्टरोंने शस्त्र प्रयोगसे ऊपरका भाग पता लगा कि वह अन्दरसे एक उत्तम पुरुष । तब उस पुरुषकी शादी किसी दूसरी कुमारीसे हुई । प्रथम - विवाह दक्षस्मृतिका वचन [ ४४ रद्द हुआ । वह परिवार अब तक जीवित है । और श्रानन्दमें है । जन्मके १८ वर्ष स्त्री रही हुई इस तरहसे बाल - बच्चोंके स साथ उपसं उक्त मन्त्र में पहले पुरुष था, उसकी स्त्री पुरुष बना होगा । वह कैसे हुआ, इसका पता १।३४ मन्त्र देखो, वहां पुनः पुरुषत्वकी प्राप्ति श्रीमातवलेकरजी की यह प्रत्यक्ष घटना ' प्रत्यक्षे कि प्रमाणान्तरेण ' ' नहि दृष्टेऽनुपपन्नम् ' ' आलोक ' ( ६ ) में ' स्त्रीसे पुरुष ' और ' पुरुषसे ७३४ में ' आलोक ' पाठकगण देखें । उसी प्लायोगिको इन्द्र उपदेश देता है । शब्दों में सुनिये -वनी पुरुष हुआ । " ऐसा , और पश्चात् लगाना चाहिये वह । होनेका विधान । ऋ है? है । स्त्री काटी नहीं जा सकती- लगे । इस विषय में पूरी स्पष्टता ली ह स्त्री हो जाना ' | प्रथम पृ. ७१३. इसको श्रीसायणाचार्य के [ स्त्री ' श्रन्तरिक्षाद् ग्रागच्छन् रथस्थ इन्द्रः स्त्रियं सन्तं स्वस्मात् पुंस्व. स्त्रीके मिच्छन्तं प्लायोगि यदुवाच तदाह श्रस्मिन् मन्त्रे - हे प्लायोगे! त्वं स्त्री सती अधः पश्यस्व, एष स्त्रीणां धर्मः । उपरि मा पश्य, उपरिदर्शनं स्पष्ट स्त्रीणां धर्मो न भवति हि । पादावपि संलिपटी यथा भवतः त्रयमः यथा पुरुषो विश्लिष्टपादनिधानो, तथा हर । नाम न भवति, तथा त्वया स्त्रिया न कर्तव्यम् । चञ्चल अथ च ते उभे अङ्ग पुरुषा न पश्यन्तु । तयोरदर्शनं वाससः सुठु परिधानेन भवति । अतः सुष्ठु वाससः परिधानं कुरु । स्त्रियो हि श्रा ज गुल्फात् अभिसंवीता भवन्तीत्यर्थः । हि यस्मात् कारणात् ब्रह्मा [ ज्ञानो हृदया पुरुषः सन ] त्वं स्त्री बभूविथ ' । अर्थात् तुम समझदार पुरुष होते हुए इसीको भी स्त्री बन गई हो; श्रतः कपड़े ठीक - ठीक पहरो, जिससे तुम्हारा पर्दा ' स्त्रीणां बना रहे । लोकश होता अब मध्यम पुरुषका प्रर्थं ठीक घट गया । मन्त्रार्थं समन्वित भी हो स्पष्टता गया । प्रतिपक्षीका क्रिया हुआ मन्त्रायं सर्वथा असम्बद्ध ही है । कहाँ तो धारा ' = मन्त्रके उपक्रममें स्त्रीकेलिए पर्देका उपदेश चला हुआ था; धौर कहां यह सु ०० २ ९ बह्या
पृष्ठ 253
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) LTL ज्योंके प्रतिपक्षीका किया हुआ यह असम्वद्ध अर्थ आ पड़ा कि साथ उपसंहारमें हुआ । ऐसा प्रावरण ( पर्दा ) करनेवाली स्त्री यज्ञका ब्रह्मा तक बन जाती है ' । चात् " यहाँ मन्त्र के उपक्रम तथा उपसंहारमें कोई एकवाक्यता दीख रही | वह? यह है इन लोगोंका हाल कि- अपने गलत पक्षको सिद्ध करनेकेलिए ६ | है ' हि ब्रह्मा ' शब्द देखते ही स्त्रीको यज्ञके ब्रह्मा बनानेके स्वप्न देखने स्त्री सकती- लगे । प्राशा है. विद्वान पाठकोंने उनके मन्त्रार्थकी असम्बद्धता, समझ स्पष्टता ही होगी 1 । व्यापाऱमें ' ब्लैक - मार्कीट ' सुनी जाती थी, पर यह लोग वेदके प्रथमें भी ' ब्लैक - मार्कीट ' करने लगे!!! .७१३. इसके साथ वाले मन्त्रमें ' स्त्रिया अशास्यं मनः । उतो ग्रह ऋतु णाचार्यक [ स्त्री - बुद्धि ] रघुम् [ लघुम् ] ग्रह [ ह ] ( ऋ. ८ | ३३ | १७ ) यहांपर स्त्रीके मनका काबू होना कठिन तथा उसकी बुद्धिको लघु - छोटा बताया है । यहां ' लघु'के ' ल ' को ' र ' हो गया हैं - यह हमने इसी पुष्पमें अन्यत्र त्वं स्त्री स्पष्ट किया है । यहां प्रतिपक्षीका ' रघु ' की तरह ' श्रुतस्य यायाद्-परिदर्शनं अयमर्भकोऽन्तं ' यह श्रर्थ करना भी ठीक नहीं; क्योंकि - मन्त्रमें रघु ' कोई बाहर । नाम नहीं, किन्तु बुद्धिका विशेषण है; तब अर्थ होगा कि स्त्रीकी बुद्धि तंव्यम् । चञ्चल होती है । इससे स्त्रीकी निन्दा हो प्रतिफलित होगी । नः सुठु जैसाकि इस अर्थ में ' न के स्त्रेणानि सख्यानि सन्ति सालादृकाणां हि हृदयानि एता ' ( ऋ. १०१ ९ ५१५ ) इस अन्य मन्त्रकी भी साक्षी है । [ ज्ञानी इसीको अनुसृत करके ' कौटल्यार्थ - शास्त्र ' के चाणक्य सूत्र में भी लिखा है-होते हुए ' स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ' ( ४७६ ) ' न समाधिः ( चित्तस्थिरता ) स्त्रीषु · पर्दा लोकज्ञता च ' ( ३६० ) अर्थात् स्त्रियोंका मन क्षणिक ( अस्थिर, चञ्चल ) होता है । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) ( पृ. २६०-२६३ ) में हमने - श्री हो स्पष्टता की है । यह वेदकी विचारधारा है । इसे ' मध्यकाल की विचार-धारा ' कहना स्त्रियोंके भक्त वादियोंका व्याजमात्र कहां है । यहाँ स्त्रीकी वुद्धिको छोटा वा चञ्चल बताकर उल्टा वेदने उसे ब्रह्मा होनेके अयोग्य सिद्ध कर दिया है । आशा है प्रतिपक्षीगणश्रुति के वेदमें इतिहासका विचार [ ४५१ प्रथमें बनावट करके श्रुतिसे बलात्कार करने के पापभागी न बनेंगे । वेदमें इतिहासका विचार । प्र. ) वेदमें इतिहास नहीं होता; तव सायणाचार्यका उक्त मन्त्रका प्लायोगि- श्रासङ्गका अर्थ करना वेदविरुद्ध है । ( एक सिद्धान्तालङ्कार ) ( उ ) यह ठीक नहीं । इसका निरूपण वेदको स्वयम् इष्ट है । ' यत्परः शब्दः स शब्दार्थ ( शब्द जिस अभिप्रायसे रखा गया होता है, वही शब्दार्थ हुआ करता है ) यह एक प्रसिद्ध न्याय है । उक्त मन्त्रमें मध्य प्रत्यक्ष है, तथा अन्य मन्त्रों में भी यह बात वेदको इष्ट है । आप लोग वेदमें नित्य इतिहास मानते ही हैं । देखिये स्नातक चन्द्रभाग-पालीरत्नमे व्याख्यात ' निरुक्त ' तथा यजुर्वेद भाष्यविवरणभूमिका जिज्ञासुजीका मत । ' में वादीको चाहिये कि वह प्लायोगिको एक पुरुषविशेष न मानकर उसे पुरुष -सामान्य मानले, जो पुरुषसे स्त्री बन गया हो । इसीको नामक अर्थवाद माना जाता है, यह वेदका विषय है । उसीको ब्राह्मणभाग स्पष्ट करता है । सो वैसी स्त्रीका क्या वर्तव्य है, वही यहाँ उक्त मन्त्रमें बताया हुआ मान लीजिये । पुरुषसे स्त्री होना - ऐसी घटनाएं पहले बताई जा चुकी हैं । प्रत्यक्ष बातें कभी कट नहीं सकतीं । ' नहि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम ' । यह बात बेदको भी इष्ट है । जैसे कि - ' जायमान मा पुमांसं स्त्रिय ऋन् ' ( प्रथ. ६६.२५ ) ( पैदा रहा हुआ पुरुष कहीं स्त्री न बन जावे? ) इस मन्त्रमें बताया गया है- कई भूत - प्र ेतादि भी गर्भमें ऐसा परिवर्तन कर दिया करते हैं, उसके उपचारकेलिए गर्भवतीको पीली सरसोंकी माला पहरानी पड़ती है । इस विषय में ' आलोक ' ( ११ ) के ' भूत - प्रेत ' विषयमें पाठकगण देखें । इससे स्पष्ट है कि यह बात सम्भव है । शिखण्डीकी महाभारत प्रसिद्ध घटना याद रखें । वह पहले लड़की उत्पन्न हुआ था; फिर लड़का हो
पृष्ठ 254
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४५२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) गया था । इसी कारण भीष्मी उससे नहीं लड़े थे; मुंह फेर कर ठहर गये थे । तब अर्जुनने भी बाण चलाये; और भीष्मजी बाणशय्या पर पड़ गये । यह महाभारतकी प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना कभी अन्यथा नहीं हो सकती । वेदमें इतिहास । ( प्र. ) सायणाचार्यका मीमांसाके ' प्राख्या प्रवचनात्, परन्तु श्रुति-सामान्यमात्रम् ' ( १।१।३०-३१ ) इत्यादि सूत्रोंके श्राधारपर अपने ऋग्भाष्यके उपोद्घातमें इस सिद्धान्तका प्रतिपादन करके जो कि वेदोंके नित्य और अपौरुषेय होनेके कारण उनमें अनित्य पुरुषोंके इतिहासादि नहीं हो सकते - ' न तु तत्र प्रनित्यो बबराख्यः कश्चित् पुरुषो विवक्षितः; किन्तु बबर इति शब्दानुकृतिः, तथा सति बबर इति शब्दं कुर्वन् वायुरभि -धीयते ' । फिर अनेक स्थानोंपर इतिहासोंकी व्याख्या बतलाना विद्वानोंके-लिए सर्वथा अमान्य है । ( उ ) यह वादीका कथन सर्वथा निस्सार है । मीमांसाका ' बबर ' शब्दसे यह अभिप्राय है कि वहां ' बबर ' जैसे साधारण, अप्रसिद्ध अनृषि अनित्य- पुरुषका वर्णन नहीं, किन्तु जो मेघातिथि आदि ऋषि प्रवाहरूप नित्य हैं; उनका तो वेदमें वर्णन स्वयं इष्ट है । तभी तो ऋ. ८।१।३३ में भी उसी ' प्लायोगि - आसङ्ग ' का वर्णन है । देखिये- ' अध: प्लायोगिरति दासद् प्रन्यान् प्रासङ्गो ' इसमें यह नाम स्पष्ट है । तभी ८।१।३०-३३ मन्त्रका प्रसङ्ग - प्लायोगि ऋषि है । ऋ. ११३४ का ' प्रासङ्गकी पत्नी ' ऋषि है । फिर ॠ. ८११ / ३०-३३ ' प्रासङ्गकी दानस्तुति ' देवता है । ८१११३४ का ' आसङ्ग देवता है ' यह प्रायसमाजकी ॠसं. में देखा जा सकता है । ऋषि तथा देवतांका वेदके साथ नित्य - सम्बन्ध होता है । तब ' आसङ्ग ' ' बवर ' की तरह अनित्य सिद्ध नहीं । बबर किसी मन्त्रका ऋषि न होनेसे नित्य नहीं । वेदमें इतिहास ४५३ तव वेदमें जो ' प्रसङ्ग ऋषि है; वही प्रसङ्ग त्तो देवता ( वर्णनीय विषय ) होनेसे वेदको उसका वर्णन वहां इष्ट ' सिद्ध देवता ' है । ' अध प्लायोगिरतिदासद् प्रन्यान् प्रासङ्गो ( ऋ. ८।११३३ है, या ' प्लायोगि ' का नाम साक्षात् श्रा भी गया है । फिर वादी ) इस वेदमन्त्र | आदि हुए नित्येतिहासका विरोधी बनकर अवैदिक क्यों बनना वेदमें माने । मानी चाहता है? इस वादी पाणिनिको प्रमाण मानता है । वेदाङ्गकार पाणिनि अव्युत्पन्न मान गये हैं, जो वेदमें भी सुलभ है, पर यास्कने कई शब्द गया को धातुज माना है । किन्तु वादी इस अवसरपर पाणिनिको समस्त नामों सपुर मानकर यास्कको प्रमाण मानता है । जैसे वार्तिककार तथा भाष्यकार प्रमाण | इसी दिख बाधक बात होनेपर पाणिनिको बात नहीं मानी जाती, वैसे ही यहांपर मान भी वेद तथा यास्क एवं जैमिनिके गुरु वेदव्यासका कथन ( क्योंकि मीमांसासे उत्तरमीमांसाको अभ्यर्हित माना गया है ) जैमिनिकी अपेक्षा पूर्व-अधिक प्रमाण होगा । उपब श्रीयास्कने स्पष्ट लिखा है - ' तत्र ब्रह्म ( वेदः ) इतिहासमिम् ' तस्म ऋमिश्रं गाथामिश्रं च भवति ' ( निरु. ४।६।१ ) यहांपर यास्कको दे यन्म इतिहास मिश्रित भी अभीष्ट है । तभी तो श्रीयास्क बहुत स्थलोंपर बिना वाह ही ऐतिहासिकोंका नाम दिये अपने मतमें केवल ऐतिहासिक अर्व को इत्य देता है । वेदको स्वयं भी अपनेमें इतिहास इष्ट है; तभी तो वेदने कहा है- क्यो ' तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च अनुव्यचलन ' ( अथर्व १५ ६ १०-१२ ) भाष ' स मन्येत पुराणवित ' ( अथर्व १११८१७ ) तं गायया पुराण्या पुनानम्म्य २७ नूषत ' ( ऋ. CTET | ४ ) इन मन्त्रोंमें वेद अपनेमें पौराणिक इतिहास स ( ७ ) बता रहा है । तभी तो महाभारत में प्रसिद्ध है - ' इतिहास - पुराणाम श्र वेदार्थमुपवृ ंहयेत् । बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ॥ पुराण में वेदके साथ ही थे । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३७७-३८८ देखिरे । वेदो ' इति हास ' शब्दका निर्वचन ही स्पष्ट हैं- ' इति हृ श्रास ' ( ऐसा प्रसिद्ध नही
पृष्ठ 255
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनघर्मालोकः ( ३-२ ) ४५४ ] देवता है । होगा ) । वेद में ' छन्दसि लुलुलिट: ' इस पाणिनिसूत्र से लिट् सिद्ध हुआ है, या था वा तीनों कालोंमें प्रयुक्त होते हैं । श्रीमनुने भी वेदमें त्रैकालिकता वेदमन्त्र । आदि लकार भव्यं भविष्यच्च सर्वं वेदातु प्रसिष्यति ' ( १२/६७ ) वेद माने मानी है- ' भूत वर्तमान या पूर्व या भविष्यत् कालका वर्णन सिद्ध हो है? इस प्रकार वैदमें - गोपथब्राह्मण में भी कहा है-- ' एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिताः कई शब्द गया । अथर्ववेद: ( ११२।१० ) इसमें वेदको इतिहासयुक्त बताया है । स्त नामों इसी सपुराणा कारण: सेतिहासा निरुक्त भी स्थान - स्थान पर इतिहास अपने पक्षमें भी प्रमाण न दिखलाता है, भले ही उसे वैयक्तिक- इतिहास न मानकर नित्य इतिहास व्यकारकी मान लो । क्या वादी श्रीयास्कको प्रज्ञानी मानता है? ही यहांपर कि और देखिये - वादी लोग ब्राह्मणभागको वेदका भाष्य या वेदका पूर्व की अपेक्षा उपबृंहक बताते हैं । जब ब्राह्मणभाग स्वयं मन्त्रभागमें इतिहास बताता है; बल्कि मन्त्रभागमें इतिहास बतलाकर फिर ब्राह्मणभाग कहता है— ' तस्माद् एतद् ऋषिणा ( मन्त्रभागात्मक - बेदेन ) श्रभ्यनूक्तम् -'दध्यङ, ह हासमिश्रण यन्मधु श्राथर्वणों ' ( ऋ. १।११६।१२ ) इत्ययतं तद् उवाच - इति हैक कको बेद पर बिना बाह्वृचा: ' ( ऋग्वेद ऋच. ) प्राहु: ' ( यजुर्वेद शत. ११ | ५ | १ | १० ) पर्य भी इत्यादि । तनवादी मन्त्रभागके भाष्य ब्राह्मणभागसे समर्थित इतिहासको वेद में कहा है- क्यों नहीं मानते? बल्कि स्वयं मीमांसादर्शन ( ३।३।१४ सूत्र ) के शावर-1१०-११ ) भाष्य में शुन शेपका इतिहास माना जो ॠग्वेदके प्रथम मण्डल के सुनानम्म्य २७ सूक्तोंम है, जिसका विवरण ' ऐतरेय ब्राह्मण ' में ' हरिश्चद्रोपाख्यान ' बहास स्पष्ट ( ७/३/१६ ) में है । तब वादी लोग इस समय ब्राह्मणभाग तथा निरुक्त-- पुराणाम आदिको क्यों नहीं मानते? ये इतने व्यक्ति पागल नहीं हो सकते । पुराण इससे स्पष्ट है कि - बबर जैसे साधारण अनित्य- व्यक्तियोंके इतिहास = ८ देखिरे । वेदमें ' इष्ट नहीं । कहीं वेद में ' भोज ' आदि शब्द आ जायें; तो वे वेदके ऐसा प्रसिद्ध ऋषि वा देवता न होनेसे वेदमें आजकल के अनित्य व्यक्ति राजाभोज इष्ट हो जाते वेदमें इतिहास [ ४१५ जैसे कि - दक्षस्मृतिमें ' मूलत्राणे भवेत् स्कन्धः - ( २०६२ ) में प्राये ' मूलत्राण ' शब्दसे दक्षको मूलत्राण ( मुलतान ) नगर इष्ट नहीं होता; परन्तु प्रवाहरूप से नित्य रहनवालोंका वेदमें प्रासङ्गिक इतिहास है ही । ऋषियोंका वेदसे नित्य सम्बन्ध होता है । इसलिए मन्त्रोंमें उन - उनका नाम भी प्रायः मिलता है । इसलिए प्रत्येक कल्पके वेद प्राकट्य में ऋषि भी वही प्रकट होते हैं; उनके सम्बन्धी जन भी वैसे ही प्रकट होते हैं । हाँ, कल्पभेदसे कुछ थोड़ा नामभेदादि हो जावे- यह सम्भव है । पर वेदमें जिनका नाम ऋषि देवताश्वेन गृहीत हैं, उनमें भेद नहीं होता । वादियोंसे प्रष्टव्य है कि श्राप लोग क्या वेदमें इतिहास हटानेके समय ' ववरः प्रावाहणिरकामयत शवराचायेंसे दिये इस बचनको मानते हैं? क्या यह आपके अनुसार वेदका वचन है? यदि ऐसा हो; तो श्रपने वेदोंमें उक्त मन्त्र दिखलाइये | यह कृष्णयजुर्वेद तै.सं. का है, उसे भी फिर वादी वेद माने । यदि नहीं तो उसने ' मीमांसादर्शन ' का प्रामाण्य क्या किया? वादी ब्राह्मणभागमे इतिहास मानता है, या नहीं? तथा उसे वेद मानता है या नहीं? यदि उसमें इतिहास मानता है; और उसे वेद नहीं मानता; यह क्यों? बादीको मालूम हो कि पूर्व - मीमांसा ब्राह्मणों-को वेद मानती है, उसमें इतिहास नहीं मानती; उस इतिहासको भूतार्थ-चाद मानती है; तब वादीने मीमांसाको क्या माना? क्या केवल दिखलावेकेलिए वह ऐसा मानता है? अवसरपर आपके मतमें मीमांसाकार वेदके पण्डित और अवसरपर वेदानभिज्ञ बन जाते हैं । यह है आप लोगोंका दशा । -' बबरः प्रावाहणिरकामयत ' में मीमांसाने ' बबर ' का अर्थ ' वायु ' माना है, और ' प्रावाहणि ' का श्रपत्य - प्रत्ययका अर्थ न करके उसका ' प्रवहणशील ' अर्थ किया है; तब वादी भी क्या ऐसा मानता है; उक्त मन्त्रमें बबरकी ' अकामयत ' से कामना बताई है, तब क्या आप ' वायु ' की ' कामना ' मानते हैं? क्या वायु प्रापके मतमें जड नहीं है? क्य
पृष्ठ 256
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४५६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) जडकी भी भाप कामना मानते हैं? वैसे तो ' परं तु श्रुतिसामान्यमात्रम् ' ( १ | १ | ३१ ) इस मीमांसासूत्रका यह भी अर्थ हो सकता है कि— पूर्वकल्पोत्पन्नातामिदानीन्तनानां च श्रुतिसाम्यम् नामसादृश्यम् । तेन पूर्व-कल्पसम्बन्धीनि तानि वृत्तानि वेदेषु उपात्तानि । ईश्वरज्ञाननिष्ठानां वा पदार्थानामुपलभ्यमानैः पदार्थः सह श्रुतिसामान्यम् नाम - सादृश्यम् । तेन च अनित्यसंयोगः परिहृतः ' । इत्यादि पूर्व - कल्पके जो पदार्थ हैं; वे भी इस कल्पके समान हैं; अर्थात् वेदमें लिखे हुए बवर श्रादि सब कल्पोंमें समान-रूपसे हुभ्रा करते हैं । प्रतः प्रवाहरूपसे नित्य हैं ' । तव अनित्य - संयोग हट गया । वस्तुतः वेदमें इतिहास न माननेमें वादीके तथा मीमांसा के दृष्टिकोण-में भारी भेद है । मीमांसा तो वेदमें आदिमत्ता दोष की प्राशङ्कासे उसमें इतिहास नहीं मानती, पर आप लोग पुराणवर्णित होनेसे उसके माननेपर पुराणोंकी विजय मानकर वेदमें इतिहास नहीं मानते; क्योंकि इससे ' वेदों और पुराणोंकी एकवाक्यता ' हो जाती है; पर आपको यह अनिष्ट है । पुराणोंसे तो ठहरा प्रापका ' प्रहिनकुल - सम्बन्ध ', परन्तु प्राचीन लोग वेदमें इतिहास मान गये हैं । उनका तात्पर्य यह है कि - ' भूतं भव्यं भविष्यच्च एवं वेदात् प्रसिध्यति ( १२।६७ ) इत्यादि मनुवचनके अनुसार उसमें भविप्यद् - दृष्टि मानकर प्रादिमता दोषका निराकरण हो जाता है । इससे वेदकी अपौरुषेयता प्रक्षुण्ण रहती है । बृहद् - देवता में भी कहा है- ' भूतं भव्यं भविष्यच्च... एवं प्रकृतयो ' मन्त्राः सर्ववेदेष्विति स्थितिः ' ( १ ९ ४० ) इस प्रकार वृहद्देवताकार भी मनुजीकी भान्ति वेदमन्त्रों में भूत - भविष्यत्, वर्तमान इन सभी कालों को मानते हैं । इसलिए वादिमान्य ' वृहदेवता ' ग्रन्थमें भी वेदमें स्थल - स्थल पर इतिहास दिखलाया है । वेद में इतिहास [ ४५७ जैसे कि - दिङ्मात्र देखिये- ' द्वन्द्व तस्यास्तु तज्जज्ञे मित्रस्य च । तयोरादित्ययोः सस्त्रे दृष्ट्वाऽप्सरसघुवंशीम ' ( ५।१३१ ) रेतः वरुणस्य । कुम्भे तु चस्कन्द वासतीतरे । तेनैव तु मुहूर्तेन वीर्यवन्ती चस्कन मनुष्य ( १३२ ) अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च तत्रर्षी सम्बभूवतुः । बहुधा पतिते तपस्विनों । देवरा Tease जले स्थले ( १३३ ) स्थले वसिष्ठस्तु मुनिः सम्भूत ऋषिसत्तमः शुक कुम्भे त्वगस्त्यः सम्भूतो जले मत्स्यो महाद्युतिः ' १३४- १३५-१३६-१३७ । पितर, ) || यही वात निरुक्तमें भी लिखी है - ' उर्वशी अप्सराः, तस्या के बा दर्शना । मित्रावरुणयो रेतः चस्कन्द । अपि असि मैत्रावरुणो वसिष्ठ! उर्वश्या फिर मनसोऽधिजातः ' ( ५।१३।१, १४११ ) यही बात वेदमें है— होनेप ' उतासि मंत्रावरुणो वसिष्ठ! उर्वश्या ब्रह्मन्! मनसोऽधिजात? तरह! ( ऋ. ५।३।२३।५ अष्टकादि ) । वेदोंक यदि बादी कहे कि वसिष्ठ श्रादि अनित्य हैं; तो उनके वर्णनसे वेद-भी श्रनित्य होगा । पर ऐसी बात नहीं । इस प्रकार तो सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, वेदेषु सोना आदि, स्वा.द. सस्मत रेल, तार, विमान यादि भी अनित्य है; २३२ फिर वेदमें इनके वर्णन श्रा जानेसे भी वेद प्रनित्य हो जावेगा । देखिये- प्रलय रेल, विमान, तार आदि महाभारतके बादसे लेकर अंग्रेजोंके समय दिया पूर्व तक नष्ट रहे, अतः अनित्य हुए । फिर बहुत पीछे वने । यदि कहा ' जावे कि यह सब वस्तुएं प्रवाहरूपसे नित्य हैं; तो इ ' लौकि प्रकार वसिष्ठ आदि ऋषि भी प्रवाहरूपसे नित्य हैं । वेद जब - जब प्रकट नुधाव होंगे; तब तब उसके द्रष्टा वसिष्ठ आदि तथा नियत राजर्षि भी तब त अपने समय पर प्रकट होंगे । वस्तु ' सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे ' ( यजुः ३४।५५ ) यहाँ वसिष्ठ माहि पीछे सात अध्यात्म - ऋषि शरीरमें प्राणरूपसे कहे गये हैं । श्राकाशमें ब नाम सप्तर्षि - मण्डलमें भी वे ही वसिष्ठादि आदि विक रूपमें रहते हैं । इतिहासस्थित सात वेदके वसिष्ठादि वेदद्रष्टा श्राधिभौतिक रूप में पृथिवी लोकमें रहे । यथाप
पृष्ठ 257
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ ४५७ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४५८ वरुणस्य आग्नेय प्राणरूप देव तारा मण्डलमें इन्द्रादि- देवरूपसे नः चस्कन इस प्रकार शरीरस्थ देव, दिव्यलोक स्वर्गादिमें रहनेवाले शरीरी चेतन-तपस्विनों मनुष्यादि हैं । बिजली प्रादिरूपमें वे प्राधिभौतिकरूपसे रहते हैं । देव रहते तिते शुक्रे इसी तरह सोम्यप्राण पितर, उनके श्राधारसे होनेवाले ऋतु भी पिसत्तमः । पितर, प्रति - शरीरमें रहते हुए सन्तत्युत्पादक भाव भी पितर, शरीर त्याग-६. १३७ ) | शरीरसे चन्द्रादिलोकमें आनेवाले जोव भी पितर होते हैं । के बाद सूक्ष्म दर्शनाव फिर इन सबके आपसमें सम्बन्ध हुआ करते हैं । प्रलयकालमें इनके नष्ट होनेपर भी फिर अन्य कल्पमें इनकी उत्पत्ति होने से पृथिवी श्रादिक्री तरह प्रवाह - नित्यता के कारण इनके इतिहासों के प्रसङ्गतः वेदमें ना जानेसे ऽधिजात वेदोंकी मनित्यता वा पौरुषेयता कभी नहीं हो सकती । नसे वेद- इसीलिए ही महाभारत में भी कहा है- ' ऋषीणां नामधेयानि यावच न्द्र, पृथ्वी, वेदेषु दृष्टयः । शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यज: ' ( शान्तिपर्व नित्य है २३२ / २५-२६ ) ( परमात्मा ऋषियोंके नाम तथा वेदोंके दर्शन आदि देखिये- प्रलयकाल की रात्रि के अन्तमें प्रकट हुए इन सबको अज ( ब्रह्मा ) को दे के समयले । दिया करता है । इसलिए महाकवि भवभूतिने भी ' उत्तररामचरित ' में कहा है ---- तो इसी ' लौकिकानां तु साधूनामर्थं वागनुवर्तते । ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽ-जब ' नुधावति ' ( १ | १० ) ( लौकिक लोगोंकी तो वाणी पदार्थके पीछे चलती भी तब है । पदार्थ पहले बनता है, उनकी वाणी पीछे चलती है कि यह अमुक वस्तु उत्पन्न हो चुकी है । परन्तु श्रादिम ऋषियों ( वेदों ) की वाणीके सिष्ठ प्रादि पीछे ही पदार्थ चलता है । वेदकी वाणीमें जिन वसिष्ठादि ऋषियोंका काश में रहे नाम पहले आ गया; पर वे वसिष्ठादि अपने समयपर उससे पीछे प्रकट रहते हैं । होते हैं ) । सूर्य - चन्द्रमा नामकी वाणी वेदमें पहले हुई । ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ( ऋ. १०।१६०।१-३ ) और वे सूर्य - चन्द्रादि पदार्थ कुछ अन्य प्रमाण [ YE उस वाणीके बाद ही ब्रह्मा द्वारा वेदकेोंको देखकर बनाये गये । वे ही सूर्यादिलोक हमारे शरीरमें भी रहते हैं । फलत: वेदर्मे भविष्यत् दृष्टिसे इतिहासमें कुछ भी अनुपपत्ति नहीं श्राती । तब प्लायोगि - यासङ्गका इतिहास वेदमें अनुपपन्न न हुआ । ( ४७ ) कुछ अन्य प्रमाण । ( प्र. ) क्या स्त्री - शूद्रादिके वेदानधिकार सूचक अन्य भी कुछ प्रमाण हैं? ( उ ) पूर्व इस विषयमें पर्याप्त प्रमाण वेदादिशास्त्रोंके दिये जा चुके हैं । अब कुछ अन्य भी दिये जा रहे हैं-( क ) ' न वेदे पत्नी वाचयति ' ( सांख्यायन ब्रा. ७।३० ) इसमें स्त्री-को वेदपठनका अधिकार नहीं दिया गया । ब्राह्मणभाग भी वेद है - यह छठे पुष्प में सम्यक्तया सिद्ध किया जा चुका है । ( ख ) ' श्रीमद्भागवत ' का यह कथन तो बहुत ही प्रसिद्ध है - ' स्त्री-शूद्र - द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ' ( १।४।२५ ) ( स्त्री तथा शूद्र और निम्न- जातिवालोंको वेद ( त्रयी ) सुनाये नहीं जाते; अतः उनकेलिए पञ्चम - वेद ' महाभारत ' बनाया गया है ) । ( ग ) गृह्यसूत्रों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका ही उपनयन आता है । उसीसे वे द्विज होते हैं; उसीसे वे वेद पढ़ने के अधिकारी रहते हैं; पर शूद्रोंका नाम उन त्रैवर्णिकोंमें न आने से वे ' एकज ' वा ' एकजन्मा ' रहते हैं; तभी भगवद्गीता में ' ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप! ' ( १८ ४१ ) में ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्यको समस्त किया गया है, पर शूद्रको इस समास से पृथक् किया गया है । इसमें कारण द्विजत्व तथा एकजत्व होनेका भेद है । अतः उनका उपनयन नहीं हो सकता; और उनका वेदाध्ययन
पृष्ठ 258
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) भी नहीं हो सकता । ( घ ) ' तस्मात् शुद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः ' ( ७।१।११६ ) यह कृष्णयजुर्वेद-( तै.सं. ) का प्रसिद्ध वचन है । इसे हम इस पुष्पमें अन्यत्र लिख चुके हैं । इस प्रकार जब शूद्रका यज्ञमें अधिकार नहीं, जैसे कि - यजुर्वेद - शतपथ-ब्राह्मण में भी कहा है- ' ब्राह्मणो वैव, राजन्यो वा, वैश्यो वा, ते हि यज्ञियाः ' ( ३ | १ | १ | ९ ) तब यज्ञ - विषयवाले वेदमें ( देखो इसपर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. १४१-१४६ ) शूद्रका अधिकार कैसे हो सकता है? कृष्ण-यजुर्वेद भी वेद है. इस विषय में ' आलोक ' के भिन्न - भिन्न पुष्पों में ' वेदस्वरूपनिरूपण ' निबन्धोंमें स्पष्टता देखिये । ( ङ ) ' सावित्रीं प्रणवं यजुर्लक्ष्मीं स्त्री - शूद्राय नेच्छन्ति ।... सावित्रीं लक्ष्मीं यजुः प्रणवं चापि यदि जानीयात् स्त्री - शूद्रः; स मृतोऽधो गच्छ । तस्मात् सर्वदा नाचष्टे । यदि प्राचष्टे, स प्राचार्यस्तेनैव मृतोऽधो गच्छति ' ( अथर्ववेद - नृसिंहपूर्वतापिनी उपनिषद् ) में स्त्री एवं शुद्रकेलिए गायत्री -मन्त्र, प्रोङ्कार, तथा यजुः ( यजुः यहां सब वेदोंका उपलक्षण है ) का स्त्री - शूद्रादिको देना आचार्यको निषिद्ध किया गया है । देनेसे शुद्र तथा प्राचार्य दोनोंकी अधोगति बताई गई है । उपनिषदें भी वेदके ब्राह्मणभागान्तर्गत होनेसे वेद हैं- यह हम ' वेदस्वरूपनिरूपण ' निबन्धोंमें तथा ' वेदविषय में भारी भूल ' निबन्धमें ' मालोक ' ( ४ ) पृ. १०५-१२० में सिद्ध कर चुके हैं । अद्वैतवाद प्रतिष्ठापक प्रादि- शङ्कराचार्यंने इस वचनको प्रमाणित करते हुए इसकी इस प्रकार व्याख्या की है— ' सावित्रीं प्रणवं [ श्रोङ्कारं ] यजुर्लक्ष्मीं स्त्री - शूद्राय स्त्री च शूद्रश्च स्त्री - शूद्रम् [ समाहारद्वन्द्वः ] तस्मै स्त्री - शूद्राय नेच्छन्तीति निषेधं... कुर्वन् प्रधान - ( प्रकृति ) उपासनायां स्त्री - शूद्रस्यापि अधिकारं दर्शयति ।... सावित्रीं लक्ष्मीं यजुः प्रणवं यदि जानीयात् स्त्री - शूद्रः; स मृतः अधो नरकं ब्रह्मसूत्रका ' अपशूद्राधिकरण [ ४६१ ४६२ गच्छतीति प्रत्यवायदर्शनेन निषेधमेव द्रढयति । तस्मात् सर्वदा नाचष्टे - इति कदाचिदपि नाचष्टे - इत्याचार्यस्य श्रीशङ्क दर्शयति । यदि प्राचष्टे आचार्य:, तेनैव कथनेन मृतोऽधो निषेषं । पण्डित-प्रत्यवायदर्शनेन निषेध एव ' । गच्छतीदि में श्रीस दर्शन इसमें स्पष्ट किया गया है कि - स्त्री एवं शुद्रको वैदादिका नहीं । वे स्त्री - शूद्रादि प्रकृतिकी उपासनामें प्रथिकृत हैं । अधिकार इन पुष्पका ( ४८ ) ब्रह्मसूत्रका ' अपशूद्राधिकरण ' । होने पाठक ' ब्रह्मसूत्र ' का दूसरा नाम ' वेदान्त दर्शन ' है - यह प्रायः उपनिषदो किये जा श्राधारपर श्रीमान् महामुनि वेदव्यास महाराजने बनाया है । उपनिय भी ब्राह्मणभागान्तर्गत होनेसे ' वेद ' हुआ करती हैं- इस विषय में हम रामान ‘ वेदस्वरूप - निरूपण ' में ' आलोक ' ग्रन्थमालाके ४ र्थ ' ६ ठे, ७ म, हम कृत्रिम १०, ११ वें पुष्पों में विवेचना दे चुके हैं । इसलिए उपनिषद अर्थका ' वेदान्त ' अथवा ' निगमान्तविद्या ' ( भवभूति ) कहा जाता है, उनके दर्शन है । को ' वेदान्तदर्शन ' कहा जाता है । इनमें ब्रह्मविद्या होनेसे इसे ' ब्रह्मसूत्र ' प्रसादम कहा जाता है । प्राचीन विद्वान् इसपर भाष्य करना बड़ा गौरवका कार्य महादेव समझते थे । यहं दर्शन वादिप्रतिवादिमान्य है, अतः इसके ' प्रपशूद्राधिकरण नहीं था उद्धृत करनेसे भी शूद्रके वेदानधिकारपर प्रकाश पड़ेगा । चाहते आजकलका युग स्त्री - समाज एवं शूद्र समाजसे पूरी सहानुभूति रखता । है; अंतः इन शूद्रानधिकार बताने वाले प्राचीन सूत्रीसे विरोध करता है । उ बहुत प्रतिष्ठित होनेसे ऐदंयुगीन व्यक्ति खुलकर तो इन सूत्रोंका विरोध श्रीमहा नहीं कर सकते; अतः उनका अर्थ बदलनेकी विशेष चेष्टा करते रहते हैं । हम भी इस पुष्पमें उसपर कुछ विचार करते हैं । श्रर्य अपने ' ब्रह्मसूत्र ' के प्रथम अध्यायके तृतीय पादमें ३४ सूत्रसे ३८ सूत्र क श्रयं ख पाँच सूत्रोंमें ' अपशूद्राधिकरण ' बहुत प्रसिद्ध है । इसका भाष्य स्वारी- नहीं हैं,
पृष्ठ 259
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ४६१ ४६२ 1 श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीवल्लभाचार्य, श्रीयति-श्रीशङ्कराचार्य, आदि प्राचीन प्राचार्यांने तथा ' वैानन्यायमाला ' नस्य निषेध पण्डित भगवत्पादाचार्य - किया हैं । इस प्रकार श्रीजैमिनि मुनिने भी ' मीमांसा-गच्छतीति में श्रीसायणाचार्यने ' रखा है । दर्शन ' में ' अपशूद्राधिकरण भाष्यों को हम उद्धत करेंगे क्योंकि - ' ग्रालोक ' के तृतीय-अधिकार इनके G भी यही है कि- ' क्या स्त्री - शुद्रादिको वेदादिका अधिकार पुष्पका हमने दिल्लीके ' सन्मार्ग ' ( दैनिक ) में दिया था; अब वह सुलभ है? " इसे होनेसे हम इस निबन्धको यहीं फिरसे ' आलोक ' में देते हैं । सो ‘ आलोक’- -पाठक इधर अवधान दें; इनपर जहाँ वर्तमान प्रतिपक्षियों द्वारा प्रक्षेप पनिषत्रे किये जाते हैं; उनका परिहार भी यथासम्भव किया जावेगा । उपनिषदे ' ब्रह्मसूत्र ' पर एक पूरा तो नहीं, पर प्रथम अध्यायपर एक वर्तमान यम रामानन्दी - महाशय ने भी अपना ' वैदिक भाष्य ' बनाया है, वह सर्वथा मम कृत्रिम है । उसमें कहनेको तो केवल वेदमन्त्र प्रमाणित किये हैं, पर वहाँ. निपदोंचे अर्थका अर्थ किया गया है । वे रामानन्दी श्राधे - आर्यसमाजी विचारवाले नके दर्शन हैं । कुछ कट्टर साम्प्रदायिक भी हैं । श्रीरामायण में ' अत्र पूर्वं महादेवः ' ब्रह्मसूत्र ' प्रसादमकरोद् विभुः ' में रामेश्वरलिङ्गकी स्थापनाका तथा श्रीरामद्वारा का कार्य महादेवका पूजन भी संकेतित होता है; पर उक्त महाशयको यह सह्य धिकरण नहीं था, क्योंकि वे रामानन्दी हैं, और श्रीरामको ही सबसे बड़ा बनाया चाहते हैं । तिरखा उस रामायणीय - पद्यका अर्थ यह था कि श्रीराम सूचित करते करता है । हैं कि यहाँ पहले रामेश्वर - लिङ्गके स्थापनं तथा पूजनके अवसरपर का विशेष श्रीमहादेवने मुझपर कृपा की थी, पर उक्त महाशय यहाँ ' महादेव ' का रहते हैं । प्रर्व ' समुद्र ' करते हैं कि - समुद्रने मुझपर यहाँ कृपा की थी । ऐसे लोग प्रपनेको सत्याग्रही कहते हैं; पर यह स्वैराचार - वृत्तिवाले होनेसे ‘ ऊँटका सूत्र क श्रर्य खरबूजा और खरबूजेका अर्थ बिल्ली ' करते हैं । अतः उनके वे श्रर्थं स्वामी- नहीं हैं, किन्तु ' अर्थंका अनर्थ ' ही है । जो अपने घोड़ेकी चार टाँगें होनेपर ब्रह्मसूत्रका ' अपशूद्राधिकरण ' [ ४६३ भी ' तीन टांगों ' का आग्रह करें; उन्हें क्या मनवाया जा सकता है? श्रीभर्तृग्ने ठीक ही कहा है- अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराव्यते विशेषः: । ज्ञ नलब दुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रज्जयति ' । ( श्रज्ञ - जो कुछ नहीं जानता; उसे तो सुखपूर्वक समझाया जा सकता है, और वह शीघ्र मान भी जाता है । विशेषज्ञ तो बहुत सुख-पूर्वक श्राराधित किया जा सकता है । पर जो ' ज्ञानलव - दुर्विदग्ध ' है, थोड़ा - सा ज्ञान प्राप्त करके ' कुचतुर ' बना हुआ है, उसकेलिए श्रीभर्तृहरि कहने हैं कि - ' ब्रह्मापि ( तं ) नर न रज्जयति उस जानलव- दुर्विदन्ध पुरुषको ब्रह्माजी भी समझा नहीं सकते ' । ) यह बात ठीक है । सो उन लोगोंका कुछ भी मूल्य नहीं है । ‘ व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह् कुरुनन्दन! बहुशाखा ह्यनन्ताश्च युद्धयोऽव्य-वसायिनाम् ' ( गीता २/४१ ) व्यवसायात्मिका ( निश्चयात्मिका ) बुद्धि एक ही होती है; पर अव्यवसायी सन्देहके झूले में झूल रहे हुए पुरुषों की वृद्धियाँ अनेक प्रकारकी तथा अनन्त होती हैं, कभी कुछ कह रही होती हैं; कभी कुछ । इतने प्राचीन प्राचार्य महान् विद्वान् थे; उनका ' अपशुद्राधिकरण ' पर ऐकमत्य ही सिद्ध करता है कि यही प्रयं ठीक है; पर आजकल के शूद्र - सेवकों - सुधारकों को यह सह्य नहीं है । वे लोग उनका स्वाभाविक सेवाका कार्य तथा देशरक्षा के लिए अस्त्र - शस्त्र विमान - निर्माणादि कार्य उनसे छुड़वाकर उन्हें वलात् वेदकी ओर घसीटते हैं; सो यह उन लोगोंका देशविघातक बड़ा भारी षड्यन्त्र है । मर्यादा पुरुषोत्तम तथा भारत के संरक्षक भगवान् रामने शूद्रोंका यह देशविघातक षड्यन्त्र जानकर - जिनसे ब्राह्मणकुमार मरने लगे थे, उनके अगुवाको दण्डित किया था; उससे देशमें प्रव्यवस्था होनी बन्द हो गई थी । फिर किसी शुद्रने वैसा दुस्साहस करनेका प्रकाण्ड - ताण्डव नहीं
पृष्ठ 260
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) किया । देशने सुखकी साँस ली थी । देश - शत्रु छिन्न - भिन्न हो गये थे, पर यह देशके छिपे शत्रु पण्डितम्मन्य सुधारकाभास लोग शूद्रोंका जो देश-रक्षार्थ अनिवार्य अस्त्र - शस्त्रादि- निर्माणका कार्य था; उससे उनको अरुचि दिलवाकर ब्राह्मणोंका वेदाध्ययन, तथा यज्ञ - जप - तप आदि कार्य उनसे कराना चाहते हैं; सो यह उन पण्डितम्मन्य ऐदयुगीन व्यक्तियोंका देशविघातक षड्यन्त्र है । ' आलोक ' पाठकोंको उनका यह षड्यन्त्र विफल कर देना चाहिये । इसलिए हम उसे दिखलाते हैं । अब हम उक्त विषयका प्रारम्भ करते हैं । ' प्रालोक ' पाठक इधर अवधान दें । ' शूद्राधिकरण ' का अर्थ है कि - शूद्र इस वेदाध्ययनादि विषयसे पगत है, बहिगंत है । अर्थात् वेदादिमें उसका अधिकार नहीं है । पर एक रामानन्दी - महाशयने इस बात में अपने पक्षकी हानि देखकर उसको बदलकर बलात् उसे ' मध्वाद्यधिकरण ' कर डाला । अस्तु! पहले प्राचीन प्राचार्योंका मत उद्धृत करके फिर उनके न माननेवाले वादीका मत प्रत्यालोचित किया जायगा । ( स्वामी श्रीशङ्कराचार्यका ब्रह्मसूत्रका भाष्य ) ' शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणात् सूच्यते हि ' ( वेदान्तदर्शन. १।३।३४ ) । अपशुद्राधिकरणके आरम्भिक इस सूत्रमें छान्दोग्योपनिषद्के जान-श्रुतिका इतिहास अन्तर्गर्भित किया गया है । इसीसे पूर्वपक्ष उत्तरपक्ष निकाले गये हैं । उक्त सूत्रके पदोंका अर्थ इस प्रकार है-धस्य – इस जानश्रुतिके, तदनादरश्रवणात् - हंससे अपना अनादर सुननेसे ( जैसा कि - उसका प्रोपनिषिदिक इतिहास है ) शुक् ( जो शोक हुमा; सूच्यते हि - उससे जानश्रुतिका यौगिक ' शूद्र ' होना सूचित किया गया, वस्तुत: वह शूद्र नहीं था । ब्रह्मसूत्रका अपशूद्राधिकरण [ ४६५ ४६ -अधिकरण के साथ — इस प्रधिकरणकी सङ्गति बताते श्रीशङ्कराचार्य कहते हैं - ' यथा मनुष्याधिकार- नियममपोद्य देवादीनामपि हुए वैसे विद्यासु अधिकार उक्त, तथैव द्विजात्यधिकारनियमापवादेन । प्रधिकारः स्याद् - इत्येता माशङ्का निवर्तयितुम् इदम् ग्रधिकरणमारभ्यते शूदस्वापि ( जैसे पूर्व के अष्टम देवताधिकरणमें केवल द्विज - मनुष्यका । पक्ष विद्या अधिकार है— इस नियमका बाध करके देवता यादिका ही वेद- हैं-अधिकार । भी बताया गया था, इस प्रकार द्विज - मनुष्य के विद्याधिकार - विषयक अधि नियमके वाधस्वरूप शूद्रका भी विद्या में अधिकार प्राप्त होता है - इस एसके शक्य बाधनकेलिए इस नवम ' अपशूद्राधिकरण ' का प्रारम्भ है ) यह बार वैदि सर्वथा प्रासङ्गिक है, क्रम प्राप्त हैं, और छान्दोग्य श्रुतिक पूर्वापर निषे अनुकूल है । वेर्दा तत्र शूद्रस्यापि श्रधिकारः स्याद् - इति तावत् प्राप्तम् ग्रथित तक सामर्थ्ययोः सम्भवात् । ‘ तस्मात् शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः ' ( क्र.य.तै.सं. ७ १ १६ ) इतिवत् ' शूद्रो विद्यायामनवक्लृप्त: ' इति निषेधाऽश्रवणात् । हि यहाँ प्राचार्यपाद पूर्व - अधिकरणसे इस ग्रधिकरणको सङ्गति बता शूद्र हुए कहते हैं- जैसे ' मनुष्यका ही विद्यामें [ ब्रह्मविद्यामें, वा वेदविद्यामं ] शूद्रय अधिकार है - इस विषय के अपवादमें उपनयनादिसे हीन देवतायादि विद्य भी विद्यामें अधिकार स्थापित किया है, उसी प्रकार ' द्विजोंका ही विद्या अधिकार है - इस नियमके अपवादमें अनुपनीत शूद्रका भी विद्यायें [ ब्रह अधिकार होना चाहिये, इस आशङ्काकी निवृत्ति के लिए यह अधिकरण ' ग्रह शुरू किया जाता है । ) तेरे इसम पूर्वपक्षीकी प्रोरसे आचार्य कहते हैं - ब्रह्मविद्या में शूद्रका भी अधिकार आदि है; क्योंकि वह इस विषयका अर्थी ( इच्छूक ) भी हो सकता है; पोर इसल उसमें बुद्धिमान मनुष्यकी वुद्ध्यनुकूल सामर्थ्य भी सम्भव हो सकती है । और फिर कृष्णयजुर्वेद में जैसे ' शूद्रकी वैदिक यज्ञमें असमर्थता ' बताई है । तभी स ० ध ० ३० इस