सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 261–270
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 261–270
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[ ४६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) III ] नाते हुए शूद्रका विद्या में असामथ्य वा निषेध कहीं नहीं बताया गया । ) दीनामपि वैसे उस श्रीशङ्कराचार्य पूर्वपक्ष देते हुए पूर्वपक्षीसे अन्याय नहीं करते, उसका रम्यते भी वे दृढ करते हैं; युक्तिसे भी, प्रमाणसे भी । अतः श्रागे कहते । पक्ष ही वेद- ' यच्च कर्मसु अनधिकारकारणं शूद्रस्य अनग्नित्वम्, न तद् विद्यासु अधिकार -विषयक अधिकारस्य अपवादकम् । नहि श्राहवनीयादि - रहितेन विद्या इस पलके शक्यते ' । ( जोकि शूद्रके अनधिकारका कारण अनग्नित्व है कि वह यह वैदिक - अग्निहोत्रका अधिकारी नहीं; वह शुद्रके विद्यामें अधिकारका चार पूर्वापर के निषेध नहीं कर सकता । श्रहवनीय आदि वैदिक अग्निसे रहित भी पुरुष बेदविद्याका भी सम्पादन न कर सके – यह बात नहीं हो सकती । ) यहाँ श्रर्थित्व- तक पूर्वपक्ष में प्राचार्य युक्ति देकर व उसे श्रुतिसे भी दृढ करते हैं— भवति च श्रौतं लिङ्ग शूद्राधिकारस्य उपोद्वलकम् - संवर्गविद्यायां .सं. ७ १ हि जानश्रुति पौत्रायणं शुश्रूषु ं ' शूद्र ' शब्देन परामृशति - ' ग्रह हारे स्वा ति बताते शूद्र! तवैव सह गोभिरस्तु ' ( छा. ४१२१३ ) इति । विदुर - प्रभृतयश्च विद्या ] शूद्रयोनिप्रभवा श्रपि विज्ञानसम्पन्नाः स्मर्यन्ते । तस्माद् अधिक्रियते शूद्रो यादिश विद्यासु - इति । ही विद्या ( छान्दोग्यं श्रुति भी शूद्र के अधिकारका समर्थन करती है । संवर्ग-विज्ञामें [ ब्रह्म ] विद्याको श्रवण करनेकी इच्छावाले जानश्रुतिका रेक्व - मुनिने अधिकरण ' अहा रे त्वा ( अरे शूद्र! जानश्रुति! रथ, हार, सुवर्ण मुद्रा और गौएं तेरे ही पास रहें ) इस प्रकार जानश्रुतिको ' शूद्र ' कहा है । अब प्राचार्य - अधिकार इसमें ऐतिहासिक प्रमाण भी देते हैं - ' स्मृति ( महाभारत ) में विदुर-हैर प्रादि शूद्र - योनि ( दासी ) में उत्पन्न होनेपर भी विशिष्ट -ज्ञानसे युक्त थे । सकती है । इसलिए शुद्रका विद्या में अधिकार है ) । बताई है पाऽकोंने देखा होगा कि - श्राचार्यवर्यने पूर्वपक्षीसे अन्याय नहीं किया । तभी तो ' उदारतम आचार्य स्वा.द. ' पुस्तिकामें उसके दयानन्दी लेखकने इस पूर्वपक्षको ' प्रबल और युक्तियुक्त ' बताया; श्रत: उसे · उद्घृत भी ब्रह्मसूत्रका अपशूद्राधिकरण [ ४६७ किया । पर उसका जो उत्तरपक्ष उस पूर्वपक्षसे भी " प्रबलतम तथा प्रतिशयित - युक्तियुक्त " था; उसे छिपा दिया, उसको लिखा ही नहीं, और न ही उसकी कुछ प्रयुक्तता वा अनुपपन्नता बताई, वा दिखलाई? यह क्या? क्या प्रतिपक्षी केवल यों ही पूर्वपक्षको ' प्रवल तथा युक्तियुक्त ' बताता जा रहा है? कदाचित् वह प्राचार्यके दिये उत्तरपक्षको जनदृष्टिसे छिपाकर हो— क्योंकि यह उसकी दुष्प्रकृति रही है कि ग्रन्थोंके स्वविरुद्ध पूर्वापर छिपा देता है | जनदृष्टिमें उत्तरको छिपाकर पूर्वपक्षको प्रतिपक्षी प्रभावशाली बनाया चाहता हो, तो यह भिन्न बात है, पर छिपानेसे तो वह उत्तरपक्ष शिथिल नहीं हो जाता है, बल्कि बहुत ही प्रबल हो उठता है । अब हम उस छिपाये हुए उत्तरपक्षको जनदृष्टिमें रखते है --' न शूद्रस्य श्रधिकारः; वेदाध्ययनाऽभावात् । श्रधीत - वेदो हि विदित-वेदार्थो वेदार्थेषु श्रधिक्रियते । न च शूद्रस्य वेदाध्ययनमस्ति, उपनयन-पूर्वकत्वाद् वेदाध्ययनस्य । उपनयनस्य च वर्णत्रयविषयत्वात् । ( वेदाध्ययन न होनेके कारण ब्रह्मविद्यामें शूद्रका अधिकार नहीं है । जिसने वेदका भली - भांति अध्ययन किया हो, और वेदार्थको जाना हो; उसीका वेदार्थ-विचारमें अधिकार है । पर शूद्र तो वेदका अध्ययन कर ही नहीं सकता; क्योंकि - वेदाध्ययन उपनयन होनेपर ही किया जा सकता है । और उपनयन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्णोंका ही होता है । कितना यह प्रबल उत्तर है । ' छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्त्रम् ' जब मूल ही कट गया हो; तब शाखा एवं पत्ते कैसे हो सकते हैं? त्रिवर्णाधिकृत उपनयनको चतुर्थ - वर्णं प्रदेश न होनेसे कर ही नहीं सकता, तब वह वेदमें चञ्च-प्रवेश ही कैसे कर सकेगा? प्रतिपक्षीकी संस्कारविधिमें भी उपनयन के अधिकारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्णके बालक ही बताये हैं । तब इनमें स्त्री - शुद्रका नाम न आने से वे शूद्रादि वेदमें चञ्चु प्रवेश ही भला कैसे कर सकते हैं? ) यत्तु अर्थित्वम्, न तद् असति सामर्थ्य अधिकारकारणं भवति । सामथ्य.
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४६८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मपि न लौकिकं केवलमधिकारकारणं भवति । शास्त्रीये प्रर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्य अपेक्षितत्वात् । शास्त्रीयस्य च सामथ्यंस्य अध्ययन निराकरणेन निराकृतत्वात् । ( जो कि कहा जावे कि- स्त्री एवं शूद्र वेदको चाह सकते हैं, वा समझ सकते हैं; अतः वे वेदके अधिकारी हो जाएंगे - यह बात ठीक नहीं । केवल इच्छामात्र तो हो, पर यदि सामर्थ्य न हो; तो अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता । केवल लौकिक सामर्थ्य भो अधिकारका कारण नहीं बन पाती । क्योंकि - शास्त्रीय अर्थ में शास्त्रीय सामर्थ्यकी ही अपेक्षा हुमा करती है । पर शास्त्र द्वारा शुद्रके अध्ययन के निराकरणसे शास्त्रीय - सामर्थ्य भी नहीं हो सकती । जिनको सर्विस में कोई अफसर सबमिट कर दे; वह तो उस सर्विसका अधिकारी हो ही जाता है; पर जिसको उसमें अध्यक्ष - द्वारा न चुना गया हो; वह वैसी योग्यता होनेपर भी भला बलात् उस कार्यमें अधिकृत कैसे हो सकता है? यदि वैसा करने लगे; तो उसे बलात् गलहत्था देकर बाहर निकाला जाता है; वा उसे गिरफ्तार किया जाता है । कैसा प्रबल उत्तर है; तभी तो प्रतिपक्षीने अपने ट्रैक्ट में लज्जावश उसे उद्धृत करनेकी धृष्टता नहीं की । वतावे वह कि- जब उसीकी संस्कारविधिमें उपनयन एवं वेदाध्ययनमें त्रैवर्णिकोंके प्रतिरिक्त शूद्रवर्णका तथा अवर्ण- श्रन्त्यजादिका नाम भी नहीं है; तब वह अध्ययन कैसे कर सकेगा? तब ' यथेमां वाचं ' में बिना उपनयन शूद्रान्त्यजादिका प्रतिपक्षीके स्वामीने जो कि वेदाध्ययन बताया है; यह तो स्वयं ही ' यावज्जीवमहं मौनी ब्रह्मचारी तु मे पिता । माता तु मम वन्ध्याऽऽसीद् अपुत्रश्च पितामह: ' ( जैसे कि - ऐसे ही किसी ऐरे गरेने कह दिया कि मैंने प्रतिज्ञा की हुई है कि जब तक कि मैं जीता रहूँगा, नहीं बोलूंगा । इसलिए मैं बोल नहीं रहा हूँ । फिर उसीने कहा कि मेरे पिता ब्रह्मचारी रहे थे; उन्होंने व्याह ही नहीं किया था । फिर वही कहने लगा कि मेरी माता तो बांझ थी, उसे कोई लड़का ही पैदा नहीं हुप्रा । फिर वही कहने लगा ब्रह्मसूत्रका श्रपशूद्राधिकरण [ ४६१ Ygo कि- मेरे दादाका कोई पुत्र ही नहीं था । की तरह ) विरुद्ध यच्चेदम्- ' शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः [ विद्यायां तु नाऽनवक्लृप्तः सिद्ध हुआ । ) उत्पेदे तद् न्यायपूर्वकत्वात् [ तस्य ] विद्यायामपि श्रनवक्लृप्तत्वं ] इति; परोक्ष न्यायस्य साधारणत्वात् । ( यह जो कहा गया है कि- ' शूद्र यज्ञ में द्योतयति, कहता है; पर इससे उसका विद्या ( वेद ) में भला अनधिकार अनधिकृत जाता है? यह भी ठीक नहीं । यह निषेध न्यायानुसार उसको कैसे हो सकता कहना भी अनधिकारी बता रहा है; क्योंकि न्याय बरावर विद्या ( वेद ) में यज्ञमें उसके अनधिकारी होनेसे यज्ञविषयवाले वेदमें हुआ करता है । अधिकार कैसे हो सकता है? ) भी भला उसका सूचित ' यत् पुनः संवर्ग विद्यायां शूद्र - शब्द - श्रवणं लिङ्ग मन्यसे जा लिङ्गम्, न्यायाऽभावात् । न्यायोक्ते हि लिङ्गदर्शनं द्योतकं न त ' क भवति । नचाऽत्र न्यायोस्ति । कामं चाऽयं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायांमेव एकस्यां तदाद्रव शूद्रमधिकुर्यात्; तद्विषयत्वात् न सर्वासु विद्यासु । श्रर्थवादस्यत्वात् दुद्राव न क्वचिदयं शूद्रमधिकर्तुं मुत्सहते ' । ( जो कि ऐ वादी! तुम संवर्गविद्या के दृश्यते शुश्रूषु जानश्रुतिको शूद्रशन्दसे संबोधित देखकर शूद्रको उस विद्यामें हुमा, य श्रधिकृत मानते हो, यह भी ठीक नहीं; क्योंकि उसमें न्याय नहीं । तिङ्ग को अधि न्यायसङ्गत विषयका ही सूचक हो सकता है; पर यहाँ तो न्याय हो यह शोक नहीं आक्रमण सो उसे भले ही तुम्हारे अनुसार ऐ वादी! शुद्रको केवल संवर्ग विद्यामें चूंकि अधिकृत मान लें; परन्तु सब विद्याओं में इससे शूद्र भला अधिकृत कैसे छा हो जावेगा? वहां वस्तुतः ' शूद्र ' शब्द अर्थवाद ( भूतार्थवाद ) - वाक्यमें (? पढ़ा हुआ होनेसे किसी भी विद्या में शुद्रके अधिकारका प्रतिपादन नहीं आर करा सकता । ) शूद्र कह शक्यते चाऽयं ' शूद्र ' शब्दोऽधिकृतविषये योजयितुम् । कथमित्युच्यते- बताते हैं-' कम्वर एनमेतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ? ' ( छा. ४१११३ ) क्ष इत्यस्माद् हंसवाक्याद् आत्मनोऽनादरं श्रुतवतो जानश्रुतेः पौत्रायणस्य सुब् क्षत्रिय है
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४६६ ] ४७० - हुया ऋषी रैक्वः ' शूद्र ' शब्देनातेन सूचयाम्बभूव ग्रात्मनः । ) उत्पेदे । ताम् - इति गम्यते, जातिशूद्रस्य अनधिकारात् । ( सिद्धान्ती [: ] इति परोक्षज्ञता - ख्यापनाय ' ' - शब्द अधिकृत ( द्विज ) के विषय में अन्वित हो द्योतयति, कहता है कि यह हंसके शूद्र ' कम्बर एनमेतत् सन्तं ( रक्वके विषय में जो नधिकृत है । क्योंकि -हो सकता जाता उसे इम साधारण मनुष्य ( जानश्रुति ) के विषय में कैसे ( वेद कहना चाहिये?, इस हंसके वाक्यसे अपना अनादर सुननेसे जानश्रुतिको शुक् रता ) में कहते हो ) इससे प्रतीत हुआ कि रैक्व सुनिने अपने परोक्ष- ज्ञानको है । ( शोक ) हुआ । संकेत किया उसका सूचित करनेकेलिए ' शूद्र ' इस यौगिक शब्दसे उसके शोकका है । जाति शुद्रको तो विद्याका अधिकार ही नहीं । ) न तद् ' कथं पुनः ' शूद्र ' शब्देन शुग् उत्पन्ना सुच्यते - इति? उच्यते-भवति । तदाद्रवणात्, शुचमभिदुद्राव, शुचा वा अभिदुद्र ुवे; शुचा वा रैक्वमभि-एकस्यां दुद्वाव - इति शुद्रः [ इति ' ] श्रवयवार्थ - सम्भवात् रूढ्यर्थस्य च श्रसम्भवात् । तु दृश्यते चाऽयमर्थोऽस्याम् आख्यायिकायाम् ' । ( प्रश्न – जानश्रुतिको शोक विद्या के हुआ, यह ' शूद्र ' शब्दसे भला कैसे सूचित होता है? ( उत्तर ) जाति - शूद्र-विद्याएँ को अधिकार नहीं होता । सो उसके श्राद्रवणसे उसे ' शूद्र ' कहा गया । वह शोककी ओर अग्रसर हुआ, शोकाक्रान्त हुआ, अथवा शोकने उसपर न्याय हो प्राक्रमण किया, अथवा वह जानश्रुति शोकसे रैक्वके पास दौड़ा गया; सो उसे ' शुचाऽभिदुद्र ुवे ' इस व्युत्पत्त्यर्थसे ' शाब्दिक - शूद्र ' कहा गया । अविद्यायें चूंकि यहांपर ' शुद्ध ' का यौगिक ही अर्थ सम्भव है, रूढि श्रयं सम्भव नहीं कृत कैसे है । छान्दोग्यकी उक्त श्राख्यायिकामें यही अर्थ स्पष्ट प्रतीत हो भी रहा - वाक्यमें है । ( १।३।३४ ) नहीं आगे मूलकार - श्रीव्यासमुनि जानश्रुतिकी क्षत्रियता बताकर उसको शूद्र कहने में स्पष्ट शाब्दिकता है, वास्तविकता नहीं - यह ३५ वें सूत्रसे युच्यते बताते हैं-११ ( ३ ) ' क्षत्रियत्वगतेश्च उत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ' ( १।३।३५ ) ( जनश्रु स्य क्षत्रिय है, ऐसा छान्दोग्यकी श्रुतिसे प्रतीत होता है । इसलिए वह ब्रह्मसूत्रका पशूद्राधिकरण [ ४७१ वास्तविक शूद्र नहीं है । इसमें प्रमाण यही है कि ग्रागे संवर्गविद्या के वाक् शेषमें चित्ररथ क्षत्रियके वंशसे उत्पन्न हुए अभिप्रतारी नामक-क्षत्रियके साथ उसका साहचर्य है ) । इसपर शाङ्करभाष्य इस प्रकार है -' इतश्च न जातिशूद्रो जानश्रुति ' ( इसमें श्रन्य प्रमाण है कि - जान-श्रुति जाति - शूद्र नहीं है, केवल उसे शाब्दिकतासे, उपचारसे, उसकी-निन्दार्थ निन्दार्थवादसे वैसे कहा गया । ' यत्कारणं प्रकरणानिरूपणेन क्षत्रियत्वम् श्रस्य उत्तरत्र चैत्ररथेन श्रभिप्रतारिणा क्षत्रियेण समभिव्याहाराद् लिङ्गाद् गम्यते ' । ( क्योंकि-प्रकरणके निरूपण से आगे चित्ररय क्षत्रियके लड़के अभिप्रतारी क्षत्रियके साथ उसका कथन किया गया है । इस लिङ्गसे जानश्रुतिका क्षत्रिय होना स्पष्ट है । ) इसीको आागे स्पष्ट करते हैं ।— ' उत्तरत्र हि संवर्ग विद्यावाक्यशेषे चैत्ररथिः - प्रभिप्रतारी क्षत्रियः संकीर्त्यते - अथ ह शौनकं च कापेयम् अभिप्रतारिणं च काक्षसेनि सूदेन परिविप्यमाणो ब्रह्मचारो विभिक्षे ' ( छा. ४१३५ ) इति । ( प्रागे संवर्ग-विद्याके वाक्यशेषमें राजा चित्ररथके लड़के अभिप्रतारी नामक क्षत्रियका निरूपण है- ' अथ ह शौनकम् ' ( जवकि शुनकके पुत्र कापेय और कक्षसेनके लड़के अभिप्रतारीकेलिए रसोइया भोजन परोस रहा था । तब उनसे एक ब्रह्मचारीने भिक्षा मांगी ) [ प्राचार्यकुलका ब्रह्मचारी द्विजोंसे भिक्षा मांगता हैं, शूद्रोंसे नहीं ] । चैत्ररथित्वं च अभिप्रतारिणः कापेययोगाद् अवगन्तव्यम्! कापेय-योगो हि चित्ररथस्य प्रवमतः - एतेन वै चैत्ररथं कापेया प्रयाजयन् ' ( ताण्ड्यब्रा. २०११२२५ ) इति । ( अभिप्रतारी चित्ररथके वंशका था, यह कापेयके सम्बन्धसे मालूम पड़ता है । ' एतेन चित्ररथं ' ( इस द्विरात्रयज्ञसे कापेयोंने चित्ररयके लड़केको यज्ञ कराया ) इससे चित्ररथका कापेयके साथ सम्बन्ध प्रतीत होता है । )
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४७२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ब्रह्मसूत्रका प्रपशूद्राधिकरण समानान्वयानां च प्रायेण समानान्वया याजका भवन्ति । तस्मात् चैत्ररथिर्नाम एकः क्षत्रपतिरजायत ' इति च क्षत्रपतित्वावगमात् क्षत्रिय-त्वम् अस्य अवगन्तव्यम् ' ( प्रायः समानकुल वाले समानकुलवालों के याजक ( यज्ञे कराने वाले ) होते हैं । ' तस्मात् चैत्ररथिर्नाम ' ( उस यज्ञ के बाद चैत्ररथि नामका क्षत्रपति चित्ररथसे उत्पन्न हुआ ) इस प्रकार उसके क्षत्रपति ( क्षत्रिय ) प्रतीत होनेसे निश्चय होता है कि वह क्षत्रिय था ) । तेन क्षत्रियेण अभिप्रतारिणा सह समानायां संवर्ग विद्यायां संकीर्तनं जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वं सूचयति । समानानामेव हि प्रायेण समभिव्य हारा भवन्ति । ( उस क्षत्रिय अभिप्रतारीके समान विद्यामें जानश्रुति का सकीर्तन ( नामग्रहण ) भी वह क्षत्रिय है— इस बातको सूचित कर रहा है; क्योंकि - प्रायः समानोंका एक साथ निर्देश किया जाता है [ यह प्राचीन-शैली है ] क्षतृप्रेषणादि ऐश्वर्ययोगाच्च जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः । श्रतो न शुद्रस्य अधिकार: ( सारथि भेजना, धन कन्या यादि दानके साथ जान-श्रुतिकी विद्या लेकी चेष्टा- यह जानश्रुतिका ईश्वरत्व ( ऐश्वर्यं ) उसको क्षत्रिय राजा बता रहा है । [ किसीका दास होनेके कारण निर्धन होनेसे शूद्रमें ऐसा ऐश्वर्य नहीं होता ] अतः जानश्रुति के ' शूद्र ' कहने में प्रयुक्त ' शूद्र ' शब्द यौगिक ही सिद्ध हुआ, जाति - शूद्रता उसकी इससे नहीं सिद्ध हो रही । इससे सिद्ध हुआ कि श्रीतविद्या में शुद्रका अधिकार नहीं होता ) ( ३५ ) । आगे सूत्रमें इससे भी बढ़कर सूत्रकार स्पष्टता करते हैं 1- । ' संस्कार- परामर्शात् तदभावाऽभिलापाच्च ' ( १/३/३६ ) ( तं ह उपनिन्ये ' ( उसका उपनयन किया ) इत्यादि विद्याप्रकरणमें उपनयनादि-संस्कारका वर्णन किया गया है; ' न शूद्र े पातकं किञ्चिद् न च संस्कार-मर्हति ' ( शूद्रमें कोई पाप नहीं है ); क्योंकि- ' न शयानः पतत्यधः ' जो पहलेसे ही नीचे सो रहा है, वह नीचे नहीं गिरता; पर वह सस्कार-उपनयनादिके योग्य नहीं होता है, इत्यादिसे शूद्रकेलिए संस्कारोंका निषेध किया गया है । इस कारण उपनयनारि. शुद्र नह अधिकार नहीं है; इसका कारण स्पष्ट है कि उस विद्याको शूद्रका विद्याएँ विद्याद जानश्रुनि जातिशूद्र नहीं था; उसे शाब्दिक ' शूद्र ' ही बताया ग्रहण करनेवाला प्रविका पर वह क्षत्रिय है । ) गया है इससे = इसपर शाङ्करभाष्य इस प्रकार है- छान्दोग्र ' इतश्च न शूद्रस्याधिकारः, यद् विद्याप्रदेशेषु उपनयनादयः उस बेच परामृश्यन्तै- ' तं ह उपनिन्ये ' ( शत. ११ | ५ | ३ | १३ ) ' अधीहि संस्काराः भगवः! । महिलाक व्यभिचा इति ह उपससाद ' ( छा. ७।१।१ ) इत्यादि प्रदर्शितव उपनयन - प्राप्ति-र्भवति । शुद्रस्य च संस्काराऽभावोभिलप्यते; ' शूद्रः चतुर्थो वर्णं एकजाति ' अघइल ( मनु. १०।४ ) इति एक - जातित्वस्मरणात्, ' न च संस्कारमर्हति ' ( मनु, भावेन १०।६ ) इत्यादिभिश्च । ब्राह्मण ( शूद्रको विद्या में अधिकार नहीं है - इसमें सूत्रकार कुछ और भी सत्वाद् कहते हैं । चू ंकि -'त ह उपनिन्ये ' ( उसका उपनयन क्रिया ) ' अधीहि ( श भगवः ' ( हे भगवन्! मुझे उपदेश दीजिये - यह नारदका सनत्कुमार गोत्रका -प्रति वचन है )... इस प्रकार विद्यायोंके प्रकरणमें उपनयन संस्कारा तो वह वर्णन है । शुद्रके संस्कार नहीं होते, शूद्र एकजाति होता है, द्विज नहीं बाबालक ( मनु. ); शूद्रका उपनयन संस्कार न होनेसे वह विद्यामें अधिकारी क्योंकि-नहीं । ( ३६ ) नहीं कह यह सूत्र तथा उसका शाङ्करभाष्य जो पूर्वपक्षपर गहरी चोट करता कोई बात था, उसे भी प्रतिपक्षीने जनदृष्टिसे चुरा लिया । मनुके उन वचनोंके साथ करूंगा, ' मन्त्रवज्यं न दुष्यन्ति ' [ शूद्राः ] ( १०/११७ ) यह वचन भी शूद्रका वेदों है ) । श्रनधिकार बता रहा है । इसस ' तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ' ( १।३।३७ ) यह ब्रह्मसूत्रका सूत्र छान्दी - कनाचूर ग्यादि - उपनिषदोंके आधारसे बना हुआ है; अतः सूत्रकार फिर छान्दोपके वाता है-उपाख्यानको उसमें प्रमाणित करते हैं । ( यह निश्चय होनेपर कि- जावाल ' श्रवा
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४७४ ] पनयनादि है किन्तु ब्राह्मणकी सन्तान है, तभी श्राचार्य गौतम ज वाल को ० शुद्र नहीं, हुए- इससे भी सिद्ध होता है कि विद्या में शू का करनेवाला विद्यायें विद्या देनेमें प्रवृत्त है ) । प्रपशुद्राधिकरण होनेसे यह अर्थ स्वाभाविक है-प्रधिकार नहीं भी सिद्ध होता है कि सूत्रकार महामुनि - श्रीवेदव्यास भी गया है. इससे यह शूद्र नहीं मानते थे, जैसे कि- जकलके प्रतिपक्षी छान्दोग्यके जाबालको बेचारेको बलात् वेश्यापुत्र तथा उसकी माता बेचारी ज्वालाको उस बताते हैं । अपने गलत पक्षको सिद्ध करनेके लिए एक भद्र-संस्काराः व्यभिचारिणी भगवः महिलाको अपमानित करना — यह प्रतिपक्षियोंका अक्षम्य घोर अपराध है । ! न - प्राप्ति- अब इसपर शाङ्करभाष्य देखिये-एकजाति ' इतश्च न शूद्रस्य अधिकारः, यत् - मत्यवचनेन [ जाब लक्ष्य ] शुद्रत्वाऽ-( मनु. भावे निर्धारिते जाबालं गौतम उपनेतुमनुशामितुं च प्रवदृते —– ' नैतद् प्राह्मणो विवक्तुमर्हति । समिध सोम्य! श्राहर, उप त्वाष्ये, न और भी सत्याद् श्रगाः ' ( छा. ४।४।५ ) इति श्रुतिलिङ्गात् ' ( ३७ ) ' अधीहि ( शुद्रका विद्या अधिकार नहीं है, क्योंकि - सत्य बोलनेसे कि- मुझे नत्कुमार गोत्रका पता नहीं है- जाबालके शूद्रत्वका प्रभाव निश्चित होनेपर [ नहीं संस्कारका तो वह कोई चालाकीसे बनावटी गोत्र बता देता ] श्राचार्य गौतम द्विज नहीं | जाबालका उपनयन करने और उसे विद्याका उपदेश करनेमें प्रवृत्त हुए; अधिकारी | क्योंकि – ' नैतद् अब्राह्मणो ' - ( ब्राह्मणेतर इस प्रकार सरलतासे सत्य - वचन नहीं कह सकता है, वह तो कुटिलतासे - धूर्तता एवं चालाकीसे कोई न मोट करना कोई बात बना देता है । ऐ भले, समिधा ले श्रा, मैं तेरा उपनयन नों के साथ करूंगा, तू सत्यसे विचलित नहीं हुआ । ) ऐसा श्रुतिका लिङ्ग मिलता दका वेदमें है ) । इससे जो लोग जावालको शुद्र बताते हैं- सूत्रकारने उनके पक्षको छान्दो चकनाचूर कर दिया । अब इस अधिकरणका अन्तिम सूत्र उद्धृत किया छान्दोग्य जाता है— -जाबाब ' श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ' ( १ | १ | ३८ ) ( ' अथास्य वेद-ब्रह्मसूत्रका पशूद्राधिकरण [ ४७५ मुपशृण्वतः श्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् ' ( ममीपसे वेदको सुनते हुए शूद्रके कान सीसे वा लाम्बसे भर देने चाहियें ) ' तस्मात् शूद्रसमीपे नाध्येतव्यम् ( इस कारण शुद्रके पास वेद नहीं पढ़ना चाहिये ) ' द्विजातीनामध्ययन-मिज्या च ' ( द्विज ही वेदाध्ययन तथा यज्ञ कर सकते हैं ) इत्यादि स्मृति-वचनोंसे शूद्रकेलिए वेदोंके सुनने, पढ़ने तथा उसके अयं ज्ञान एवं अनुष्ठान-श्रादिका निषेध किया गया है, इससे भी सिद्ध होता है कि - विद्यामें शूद्र-का अधिकार नहीं है ) । यह प्रपशूद्राधिकरणका अन्तिम सूत्र है । इसपर शांकरभाष्य इस प्रकार है— ' इतश्च न शूद्रस्य अधिकारः, यद् अस्य स्मृतेः श्रवणाध्ययनार्थं प्रतिषेधो भवति । वेद - श्रवणप्रतिषेधः वेदाध्ययन - प्रतिषेधः, तदर्थज्ञाना-_नुष्ठानयोश्च प्रतिषेधः शूद्रस्य स्मर्यंते । ( शूद्रका वेदविद्यामें अधिकार नहीं है; क्योंकि स्मृति शूद्रकेलिए वेद सुनने, पढ़ने और अर्थ जानने का निषेध करती है । स्मृतिमें शूद्रका वेद सुनना, वेदमन्त्रको बोलना और वेदार्थके ज्ञान एवं अनुष्ठानका निषेध है । ) श्रवणप्रतिषेधस्तावत्- ' अथास्य वेदमुपशृण्वतः त्रपुजतुभ्यां श्रोत्र-प्रतिपूरणम् ' इति । यद्य, ह वा एतत् श्मशानं यत् शूद्रः, तस्मात् शूद्रसमीपे नाध्येतव्यं भवति, स कथमश्रुतमधीयीत? भवति च वेदोच्चारणे जिल्ह्वा-च्छेदः, धारणे शरीरभेद: ' इति । अतएव च अर्थात् श्रर्थज्ञानानुष्ठानयोः प्रतिषेधो भवति - ' न शूद्राय मति दद्यात् ' इति । ' द्विजातीनामध्ययनमिज्या दानम्, इति च ' ( स्मृति शूद्रको वेद सुननेका निषेध बताती है । जैसे कि- ' प्रयास्य वेदमुप. ( समीपसे वेदका श्रवण करनेवाले शूद्रके कानोंको सीसे श्रीर लाखसे भर दे ) [ यह गौतमधर्मसूत्र ' का सूत्र है । इसमें अर्थवादसे शूद्रको कड़ा दण्ड लिखा है; उसका तात्पर्य केवल इतना है कि - शूद्र वेदको न सुने, न बोले । ]
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४७६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) प्रतिपक्षी एक - अर्वाचीन भाष्यकार इस वचनको नहीं मानता । पर मूलसूत्रकारको यह वचन इष्ट है । पर उस प्रतिपक्षी - भाष्यकारकों कोई ऐसा स्मृति - वचन नहीं मिला, जिसमें शूद्रका वेद - श्रवणनिषेध लिखा हो । तब उसने ' यमेव विद्याः तस्मै मा ब्रूयाः ' यह वचन देकर उसे ' श्रवण-निषेध ' मानकर अपनी कृतकृत्यता मान ली । पर इसमे श्रवणनिषेध कहाँ कहा है - यह वह बतावे? इसी प्रकार वादीको शूद्र के भवन निषेध तथा अर्थनिषेधका स्मृतिवचन भी नहीं मिल सका । यदि वह उस स्मृति-प्रमाणको प्राप्त करना चाहे; तो वह उक्त गौतमस्मृतिका ही वचन होगा; जो वेदान्तसूत्र के अक्षरोंसे पूरा समन्वित होता है । तब उनसे विरुद्ध वेदान्तसूत्रका भाष्य करते हुए प्रतिपक्षीका उक्त भाष्य वेदान्तके मूलसूत्रसे विरुद्ध ही है । अतः प्रतिपक्षीके वेदान्तदर्शनका ' वैदिक भाष्य ' बलात् गढ़ा गया है - सो वह सूत्राक्षरानुमारी न होनेसे विद्वानोंसे माननीय नहीं । अब प्रागे क्रमागत ब्रह्मसूत्रके सूत्रका अनुवाद देखिये । ( यद्य हवा - शूद्र निःसन्देह जङ्गम - श्मशान है; इसलिए शूद्रके समी वेद नहीं पढ़ना चाहिये, क्योंकि श्मशान में वा उसके पास वेदपाठ-का निषेध होता है । जिसके पास भी वेदका अध्ययन युक्त नहीं; वह न सुने हुएका अध्ययन किस प्रकार कर सकता है? यदि शूद्र वेदका उच्चारण करे; तो उसकी जिह्वा काट देनेकेलिए कहा है । यदि वेदको हृदय में रखे; तो उसके शरीरका भेद कहा है । यह पूर्वोक्त गौतमसूत्रका शेष वाक्य है । यह अर्थवादात्मक है - इसे हम पहले कह चुके हैं । इसी हेतुसे शूद्रकेलिए अर्थज्ञान और अनुष्ठानका भी निषेध होता है - ' न शूद्राय मति ' ( शूद्रको वेदार्थज्ञान न दे ) । ' द्विजातीनां ' ( केवल द्विजोंके लिए ही अध्ययन, यज्ञ तथा दानका विधान है ) । ‘ येषां पुनः पूर्वकृत - संस्कारवशाद् विदुरधर्मव्याध - प्रभृतीनां ज्ञानोत्पत्तिः, तेषां न शक्यते फलप्राप्तिः प्रतिषेद्धम्, ज्ञानस्य ऐकान्तिक- फलत्वात् । ' श्रावयेत् चतुरो वर्णान् ' इति च इतिहास - पुराणाधिगमे चातुर्वण्यंस्य अधिकारस्मरणात् । ( ३८ ) यह पहले के ( परन्तु विदुर, जन्मके संस्कारवश ब्रह्मसूत्रका अपशूद्राधिकरण [ ४७७ ४७८ वेदपूर्वकस्तु नास्ति श्रधिकारः शूद्राणामिति किये पूर्वका उत्तरपक्ष दिया गया है । स्थितम् से बा धर्मव्याध आदि जिनको प्रारूढपतित घटना ज्ञान उत्पन्न हुआ हुआ था, उनके लिए फल होनेसे ग प्राप्तिका निषेध नहीं किया जा सकता; क्योंकि स्वतः उत्पन्न हुआ ज्ञान राजाक चरित फल उत्पन्न करता है । ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् ' ( चारों श्रव्यभि वर्षोंको सुनावे ) इस स्मृतिवचनमें इतिहास एवं पुराण में चारों वर्णोंका अधिकार बताया गया है, इससे सिद्ध हुथा कि- वेदाध्ययनपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेवा । शूद्रको अधिकार नहीं है ) । विचार यह ग्रवशूद्राधिकरणके शाङ्करभाष्यका अनुवाद समाप्त हुग्रा । श्री पृ. यह पूर्वपक्षका उत्तरपक्ष भी प्रबल तथा युक्तियुक्त है । बल्किं यह 4 कहना चाहिये कि -दर्शनकारका यह हृदय है । ' श्रवणाध्ययनार्थ - प्रतिषेधात् कुछ प्र यह सूत्रकारके अक्षर हैं । सो ऐसा स्मृतिवाक्य ' गोतमघमंसूत्र ' का सूत्र हो । उसके । इससे स्पष्ट है कि उक्त गौतमसूत्र श्रीव्याससे धनुमत ही है । तद इससे आचार्य शङ्करपर प्राक्षेप क्यों? सूत्रकारपर प्रक्षेप करते; तो शुद्रक कुछ बात भी थी । क्योंकि - भाष्यकारने अपनी स्वतन्त्र बात कोई नहीं रग्बी । केवल सूत्रकारका हृदय समर्पित कर दिया है । जो श केवल ' गौतमधर्मसूत्र ' ही क्या; वादीकी महामान्य मनुस्मृतिमें भी किन इसका मूल मिलता है- ' एकजातिद्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् । निधनं जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्य - प्रभवो हि सः ' ( ८।२७० ) ' नामजातिग्रहं मापन्नं तेषामभिद्रोहेण कुर्वतः । निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुज्र्ज्वलन् श्रास्ये दशाङनुन ( ८।२७१ ) ' धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः । तप्तमासेचयेत् तं हुआ - म वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ' ( ८२७२ ) इन पद्योंमें जो दण्ड विधान किया है-यह भी कोई कम कठोर नहीं है? तब इसमें श्रीगौतमका दोष से जब यौवनसवह बताया जाता है? इ केवल इतना ही नहीं, बल्कि रामराज्यमें शम्बूक शूद्र अपने अधिकार
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४७८ ] स्थितम् तपस्या करके मृत्युदण्ड प्राप्त कर चुका है यह ऐतिहासिक से बहित इसमें साक्षी है, जिसका उल्लेख रामायण ( उत्तर ७३-७४-डोनेसे गढ़- घटना भी सर्गोंमें ) तथा महाभारत ( शान्तिपर्व १५३।६७ ) में भी है -प्राप्तिश ७५-७६ विशेष कानून तोड़नेवाला श्राज भी फांसी पाता है ॥ श्रव्यभि राजाके वर्षोंको श्रीराम- द्वारा शम्बूक वधपर विचार । - अधिकार त करनेश श्रीरामद्वारा सुबहुचर्चित शम्बूक शूद्रके वधपर यहां प्रासङ्गिक कुछ विचार भी किया जाता है । इसपर ' क्या शवरी शूद्रा थी? ' यह विषय द्या । भी पृ. ३७६- ३६१ में देखें । ' अछूतोद्धार निर्णय ' में उसके प्रणेता श्रीतकरत्नजीने इस विषय में बल्कि यह प्रतिषेधात् कुछ प्राक्षेप किये हैं । लगे हाथ उनपर भी कुछ विचार रखा जाता है । उसके प्रणेता श्रीतकंरत्नजीने पृ. ११५ में लिखा है— का सूत्र ही ( आक्षेप ) – ' अव इसपर सर्वप्रथम यह विचारना है कि - तप करना करते है; । तब तो शूद्रकेलिए धर्मका हेतु है, या अधर्म का? कोई नहीं * जब ब्राह्मणने अपना मरा बच्चा श्रीरामके सामने लाकर रखा; जो शुद्रकी प्रनधिकृत तपस्याके पापसे मरा था; तो वहाँ यह पद्य है-स्मृतिमें ' किं नु मे दुष्कृतं कर्म पुरा सिन् । निधनं गतम् । श्रप्राप्तयौवनं म जातिय मापन्नं मम दुःखाय पुत्रक ' दशाः कि- मैं पाँच हज़ार वर्ष वाले येत् किया है- हुबा - मरा हुआ देख रहा हूं ) दोष कसे जब वह लड़का पाँच सहस्र बौबनसे रहित कैसे था? देहान्तरे कृतम् । यदहं पुत्रमेकं तु पश्यामि बालं पञ्चवर्ष सहस्रकम् । अकाले काल-( वाल्मी. ७।७३।४-५ ) ( ब्राह्मण कहता है इस बच्चेको जिसे अभी यौवन प्राप्त नहीं यहां जनसाधारणको भ्रम हो जाता है कि-वर्षका था; तब वह बच्चा कैसे था; और अधिकार इसपर जानना चाहिये कि - रामायण में ' रामराज्य ' केलिए कहा गया —– ' श्रासन् वर्षं सहस्राणि ' ( ६।१३०।१०१ ) अर्थात् उस समय पुरुषोंकी श्रीराम द्वारा शम्बूक वधपर विचार [ ४७ ( परिहार ) - श्रधर्मका । क्योंकि शूद्र श्रादिकेलिए केवल चातुर्वण्यं तथा उससे शृङ्खलित राष्ट्रकी सेवा ही शास्त्रानुसार धर्म अनुमत है; उससे विरुद्ध तपस्या प्रादि धर्मरूपसे अनुमत नहीं । पृ. ११६ में तर्क-रतजीने स्वयं यह प्रत्रिका पद्य लिखा है- ' आत्मीये संस्थितो धर्मे शूद्रोपि स्वर्गमश्नुते । ( शूद्र अपने धर्म में स्थित हा ही स्वर्गको प्राप्त होता है । ) इससे श्रायु हजारों वर्षकी होती थी; और यह लड़का अभी केवल ५ हजार वर्षोंका है; अतः वच्चा है, टीकाकारोंने यहां वच्चेकी प्रायुके विषयमें वर्ष शब्दका अर्थ ' दिन ' किया है । सो यह लड़का पांच हजार दिनका है । श्रर्थात् यह तेरह साल कुछ महीनोंका लड़का है । इसीलिए कहा है कि-' अप्राप्तयौवनं ' ( इसे युवावस्था प्राप्त नहीं हुई है । सोलह वर्षसे लड़केको युवावस्था मानी जाती है; श्रतः यह बच्चा है । वस्तुतः हमारे विचारानुसार यहाँपर ' अप्राप्त यौवनं बालं पञ्चवर्ष-सहस्रकम् ' यह पाठ गलत चला आ रहा है । यहांपर वास्तविक पाठ ' पञ्चवर्ष सहस्रक: ' है । यह ' अहं ब्राह्मणः ' का विशेषण है कि मैं पांच सहस्र वर्षका हूं । पर यह बच्चा अभी बिना यौवन प्राप्त किये मर गया है । सो पूर्वोक्त रामायण - वचनानुसार पुरुषोंकी आयु सहस्रवर्षकी हुआ करनी थी – सो ब्राह्मण तो कई सहस्र वर्षका था । पर मैं श्रप्राप्त - यौवन अपने बच्चेको मरा हुप्रा देख रहा हूं । यहाँ अन्वय इस प्रकार है-' पञ्चवर्ष - सहस्रकः अहम् प्रप्राप्त यौवनम् एकं पुत्रं मृतं पश्यामि ' अर्थ पूर्व इसका लिखा ही जा चुका है । श्रथवा ' सहस्र ' शब्द अनेकवाचक माननेपर उसका अर्थ कुछ भी नहीं होता । उसे द्वितीयान्त मानकर यह अर्थ निकल रहा है कि- मैं पांच वर्षके इस बच्चेको मरा हुआ देख रहा हूं, जिसे यौवन प्राप्त नहीं हुआ । अर्थात् जवानी आनेसे पूर्व ही यह बेचारा मर गया है । इससे भ्रान्तोंका भ्रम हट जाना चाहिये ।
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४८० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) यह सिद्ध होता है - अपने लिए शास्त्रसे असमर्थित तपस्या प्रादि करने से शूद्र नरकमें गिरता है । इस बातको स्पष्ट करनेवाला अत्रिके पूर्वपद्य का अवशिष्ट भाग यह है - जिसे तकंरत्नजीने यहां जन दृष्टिसे छिपा दिया । वह यह है ' परघर्मो भवेत् त्याज्यः सुरूप - परदारवत् ' ( अत्रि. १८ ) अर्थात् दूसरेका धर्म त्याज्य ही है । जैसे कि सुन्दरी भी दूसरेकी स्त्री त्याज्य ही होती है । सो तपस्या शूद्रका स्वधमं नहीं । ' शमो दमः तपः शौचं... ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ' ( गीता १८१४२ ) तपस्या ब्राह्मणका धर्म है । अयोध्या - राज्यका नियम भी यही था - ' शूद्राः स्वधर्मनिरताः त्रीन् वर्णान् उपचारिण: ' ( १।६।१६ ) ( शूद्र अयोध्या में अपने धर्ममें लगे हुए थे, वे सभी वर्णों की सेवा किया करते थे ) । क्योंकि अयोध्या नगरी मनुजीसे बनाई गई थी । उसमें मनुजीके ही नियम चलते थे ' । ( वाल्मी. ११५२६ ) । श्रीराम भी उन्हीं मनुजीके नियमोंका अनुसरण करते थे ( वाल्मी. ४/८/३० ) । मनुस्मृति में लिखा है - ' तान् सर्वान् घातयेद् राजा शूद्रांश्च द्विज-लिङ्गिन. ' ( ६।२२४ ) ( द्विजोंका लिङ्ग वा द्विजोंका धर्म धारण करनेवाले शूद्रोंको राजा मरवा दे । ) ' नाग्दण्ड्यो नाम राज्ञोस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ' ( मनु. ८ | ३३५ ) ( जो अपने धर्म में स्थित नहीं रहता; ऐसा कोई भी शूद्रादि वर्ण हो, राजा उसे दण्ड दे ही सकता है । रामायण में श्रीराम के लिए लिखा है-' हन्त्येष नियमाद् वव्यान् ग्रवध्येषु न कुप्यति ' ( २।२।४६ ). ( श्रीराम के योग्यको कानून के अनुसार मार देते हैं; पर जो वधके योग्य न हो, उसपर क्रोध तक नहीं करते । अयोध्या - राज्यका मन्वनुसारी नियम भी यही था - ' शूद्राः स्वधर्म-4 श्रीराम द्वारा शम्बूक वधपर विचार [ ४ निरता: त्रीन् वर्णान् उपचारिण: ' ( वाल्मी. ११६०१६ वर्णोंकी सेवा करते थे ) उसका कारण यह था कि - ' अयोध्या ) । ( शूद तीनों स्व मनुजीसे बनाई गई थी । उसमें कानून भी मनुजीके ही चलते नगरी भी ११५२६ ) यह पहले हम कई बार कह चुके हैं । श्रीराम उन्हीं थे ( वाल्मी. पालन करते थे ( वाल्मी. ४/६/३० ) ( रामायणमें भी लिखा कानूनका ' पूजां च सर्ववर्णानां शूद्राः चक्रुविशेषतः ' ( ७४१२१ ) ( शूद्रोंका गया है- बारों वर्णोंकी सेवा करना ही स्वधर्म था । ) मनूजीने भी लिखा है- ' वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ( १०/१७ ) ( अपना धर्म खराव भी अच्छा होता है, दूसरे वर्णका धर्म अच्छा होता हुआ भी ठीक नहीं होता । भगवद्गीताका भी यह वचन सुप्रसिद्ध है – ' स्वधर्मे निधन श्रेयः परधर्मो भयावहः ' ( ३१३५ ) ( दूसरेका अच्छा धर्म भी श्रेष्ठ नहीं होता । ) ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ' ( गीता १८१४६ ) ( अपने कर्म करनेसे ही भगवानको पूजा हुआ कथ करती है, अपने वर्णसे भिन्न कर्मसे भगवान् की पूजा कभी नहीं होती । ) बन " एकमेव तु शूद्रस्य प्रभु कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां पर शुश्रूषामनसूया ' ( मनु. १६६१ ) ( प्रभुने शूद्रोंकेलिए केवल एक ही भत कर्मकी आज्ञा दी हुई है कि वह सभी वर्णोंसे कवचित राष्ट्रकी सेवा द्वारा इन्द्र रक्षा करे ) 1 ढके मांगे वादी लिखता है - ' यदि तप करनेसे शूद्रको स्वर्गप्राप्ति होगी; घटन तो इससे तुम्हारी क्या हानि है '? इसपर उत्तर यह है कि इससे राष्ट्रकी बड़ी हानि है । यदि वह ऐसा करने लगे; तो राष्ट्रमें उपप्लव हो जाता है - इसे हम अन्यत्र शम्बूक वध के विवरण में स्पष्ट कर चुके हैं । इससे राष्ट्रके विनाश- तकको, कालमृत्युकी श्राशङ्का हो जाती है । जो अत्रिस्मृतिका शूद्रस वादीने दिया है उसीके पूर्वका यह पद्य भी जनदृष्टिसे उनने छिपा दिया राध है - ' ये व्यपेताः स्वधर्माच्च परकर्मण्यवस्थिताः । तेषां शास्तिकरो राजा स ० ब ० ३१ देवत
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[ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) rel ४८२ ]. महीयते ' ( अत्रि १७ ) ( जो शूद्रादि अपने धर्मको छोड़कर शूद्र नगरी तीनों भी स्वर्गलोके कर्म का आचरण करते हैं, उन्हें दण्ड देनेवाला राजा स्वर्गलोक में दूसरे ( वाल्मी सम्मानित होता है । कानूनका • आगे वादी लिखता है - ' तप करनेसे शूद्रको नरक प्राप्ति ही होगी; यहै- तो ऐसा कह नहीं सकते । क्योंकि उस समय देवताओं ने श्रीरामको कहा है - ' स्वर्गभाङ, नहि शूद्रोऽयं स्वत्कृते रघुनन्दन ' ( हे रघुनन्दन! तुम्हारे ही कारण से हमारे स्वर्ग में यह शूद्र नहीं आ सका " । इस कथनका भाव वनुष्ठितः स्पष्ट है कि यदि भगवान् राम उस शूद्रको नहीं मारते; तो वह श्रवश्य का स्वर्ग जाता ' । यह वचर यह भी तर्करत्नजीका ' तर्क ' थोया ही है । वस्तुतः स्वधर्मविरुद्ध ( दूसरेका चलनेवाले शूद्रको देवता स्वर्गमें नहीं आने देते । देखो इसपर त्रिशंकुकी विन्दति क़था । त्रिशंकु जन्मसे चाण्डाल नहीं था, वसिष्ठ वा उसके पुत्रोंके शापसे पूजा हुमा ( क्योंकि वह पिता पुत्र में कलह कराना चाहता था ) शापवश ' चाण्डाल ' होती । ) बन गया था, विश्वामित्र ने उसे स्वर्ग में भेजने केलिए उससे यज्ञ करवाया, वर्णानां पर वह यज्ञ शूद्रादिके धर्मसे विरुद्ध होनेसे देवताओं को मान्य नहीं था । एक हो अतः जब श्रीविश्वामित्रने यज्ञके बलसे त्रिशंकुको स्वर्ग में भेजा; तव सेवा द्वारा इन्द्र देवता तथा अन्य देवताओं से यह विरुद्ध होनेसे उन्होंने उसे नीचे ढकेल दिया । वह अधर में लटका रह गया । यह इतिहास की सुप्रसिद्ध तहोगी; घटना है । वादीने ब्राह्मणपुत्र मरनेकी कथा भी गलत ढंगसे लिखी है । राष्ट्रकी वाल्मीकि मैं तो सूचित किया गया है कि जब धर्मविरुद्ध चलनेवाले हो जाता शम्बूक शूद्रको श्रीरामने खड्ग से मारा; तो देवताओंने ' ठीक है, ठीक ग है ' कहकर ' श्रीरामकी प्रशंसा की । देखिये वहाँका पद्य - ' भाषतस्तस्य-ताप शूद्रस्य खड्गं सुरुचिरप्रभम् । निष्कृष्य कोशाद् विमलं शिरः चिच्छेद छुपा दिया करो राजा राघव: ' ( ७ | ७४ | ४ ) तस्मिन् शूद्रे हते देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः । साधु साध्विति काकुत्स्थं ते शशंसुर्मुहुर्मुहु: ' ( ५ ) इससे स्पष्ट है कि देवताओंको शूद्रकी तपस्या इप्ट नहीं थी । अतः स्वधर्मंविरुद्ध शूद्रको श्रीराम द्वारा शम्बूक - वघपर विचार [ ४८३ स्वर्गमें जाने देना भी देवोंको इष्ट नहीं था । तभी देवता श्रीरामको कहने लगे-सुरकार्यमिदं देव! मुकृत ते महामते! ( ७ ) अर्थात् प्रापने ऐसे शूद्रको मारकर यह देवकार्य हो किया है । फिर कहा कि - स्वर्गभाङ्ग नहि शूद्रोऽयं स्वत्कृते रघुनन्दन ( ७ ७४१८ ) इसपर रामाभिराम - टीकामें कहा है – हि यतः शूद्रः तपसा स्वर्गानहः सोऽसौ त्वत्कृत तत् - तपोनि वर्तनेन स्वर्गभाक् न जानः; श्रतो देवकार्यं कृतमिति भावः ' ( तपस्यासे शूद्र स्वर्गक- योग्य नहीं होता । श्रतः इसे मारकर उसे तपस्यासे हटवाकर आपने यह देवकार्य ही किया है । ) यदि श्रीरामद्वारा उसे न मारा जाता, तब भी इन्द्र देवता उसे स्वर्गसे त्रिशङ्कुकी तरह गिरा देते, पर मृतक ब्राह्मणकुमार न जी सकता । श्रतः वादीका पक्ष सिद्ध न हुआ । देवताओं-को शूद्रका यज्ञ - याग वा तपस्या करना इष्ट नहीं । इमपर ' भविष्य पुराण ' ( प्रतिसर्गपर्व ४ यं खण्डके २० वें श्रव्यायके ६७ आदि पद्य भी देखिये इस प्रकरणको प्रतिपक्षी वहांसे दिया करते हैं ' । वहां शूद्रोंने स्वंर च गनुसार वेदमन्त्रोंसे यज्ञ करना शुरू किया था, जिससे यज्ञके देव इन्द्र प्रसन्न हो जावें; पर इन्द्रदेव वह बात ' देवमत ' न मानकर उसे ' दैत्यमत ' मानते थे, जोकि बलिदैत्य द्वारा देवताओंके निम्तेज करनेका प्रकार था, क्योंकि देवता भी शूद्रका भोजन नहीं स्वीकृत करते; श्रतः तृप्ति न होनेसे देवता निस्तेज हो जाया करते हैं । सो यह देवद्रोह तथा देशद्रोह था । जैसेकि भविष्य में कहा है - इन्द्र कह रहे हैं- -' तथा च शूद्रजनितेयंज्ञः तृप्ति न चाप्नुयाम । मम शत्रुर्वलिदैत्यः कलि पक्ष-मुपागतः । निस्तेजाश्च यथाऽहं स्यां तथा वै कर्तुं मुद्यतः ' ( भँवि. ३।२० । ७४-७७ ) ( मेरा शत्रु वलि दैत्य जिस प्रकार मैं प्रतृप्त और निस्तेज हो जाऊं, क्योंकि- मैं शूद्रोंक यज्ञसे तृप्त नहीं होता, अतः शूद्रों द्वारा यज्ञ करवा रहा है । सो शूद्रों द्वारा ' ज्ञ ' वा तपस्या ' दैत्यमत ' था, ' देवमत ' नहीं ) । '
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४८४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वादिप्रतिवादिमान्य मनु भी कहते हैं-- ' दैवपित्र्यातिथेयानि तत्-( शूद्रा ) प्रधानानि यस्य तु । नाश्नन्ति पितृदेवास्तद् न च स्वर्गं स गच्छति ' ( ३११८ ). ( जिम के देवयज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ, आदि यज्ञ शूद्र - प्रधान होते हैं; देवता आदि उस यज्ञका भोग नहीं करते; उन्हें करनेवाला भी स्वर्ग में नहीं जाता । ) सो सिद्ध हुआ कि देवता शूद्रके स्वधर्म सेवासे भिन्न यज्ञ - याग जप - तप आदि सर्वथा नहीं चाहते । हाँ, स्वधर्मं - सेवा करते हुए शूद्रकेलिए वे उसके मरनेपर स्वर्गका रास्ता बन्द नहीं करते । यह जो वादी कहता है कि- ' तप करे, पाप करे शूद्र, फल मिले एक ब्राह्मण - बालकको - ग्रद्भुत कर्म फिलास्फी है '! यह अद्भुत नहीं है, किन्तु ठीक है । श्राद्ध तो आप भी मानते ही हो न? कर्म अन्य करता है, फल भिन्नको मिलता है । यह तो वादी जानता ही होगा कि प्रजाके पापका फल राजाको वा उसकी प्रजाको मिलता है; यह मनु श्रादि तथा स्वा.द. से भी स्वीकृत है । देखो मनुजी ( ८१८ में ) तथा स.प्र. ( पृ. ६।१०२ ) भी मानते हैं । तब राजाके पापके परिणामसे प्रजाका ब्राह्मण - बालक मरा । इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं प्राती । धागे वादी लिखता है— वेदमें स्पष्ट लिखा है - ‘ तपसे शूद्रम् ' ( यजुः ३०१५ ) तपकेलिए शुद्रको " । महाशय! यहाँ तपस्याका अर्थ कृच्छ्रकर्म- सेवा है, यह सभी वादी-प्रतिवादी मानते हैं, इसपर देखो ' आलोक ' ( ६ ) ( पृ. ८१-८२० ) और मनुजी भी कहते हैं - ' तपः शूद्रस्य सेवनम् ' ( ११।२३५ ) शुद्रकी तपस्या सेवा है, भिन्न तपस्या उसकी नहीं होती । स्वामी-श्रीरामानुजाचार्य आदिके अनुसार भी जातिशूद्रका विद्या आदिमें अनधिकार ही होता है । यह स्वयं तर्करत्नजीने ' अछूतो. ' ( पृ. ६३ ) में लिखा है - ' अतः शोचितृत्वमेव अस्य शूद्रशब्द - प्रयोगेण सूच्यते, न जातियोगः । शूद्र - शब्देन विद्योपदेशयोग्यता- ख्यापनार्थं शोक एव अस्य सूचितः, न तु चतुर्थवर्णत्वम् ' ( ब्र. १।३।३४ ) ( अर्थात् प्रामश्रुति कोई जातिशूद्र नहीं है, किन्तु शोक करके रैक्वमुनिके पास जानेके कारण श्रीराम - द्वारा शम्बूक - बधपर विचार [ ४ ५ YE इसको [ शाब्दिक - ] ' शूद्र ' कहा है । इस तरह यह [ जानश्रुति [ जातिशूद्र ] नहीं माना जा सकता ' । ] चतुर्थ वर्ष फलतः ' तर्करत्नजी ' के तर्क कीटानुविद्ध होनेसे थोषे हुए । ही सिद्ध प्रत अन्त में एक बात तर्करत्नजीकी विचारणीय है कि पर तप करना वधके योग्य होता तो तप करते हुए ' यदि शूदा मतङ्ग चाण्डालको भी कत्ल कर देता; परन्तु उसके पास जाकर इन्द्रने कहा- ' वरं इन्द्र हन्त! वृणीष्व त्वं यदीच्छसि ' ( महा. अनु. २७१२ ९ ) ददामि ते कर चाण्डाल! तुझे वर चाहिये, तो तू वर माँग, देरी न कर ) । " ( हे मत इसपर उत्तर यह है कि जिस रामायणसे शूद्रकी तपस्या बधयोग्य फिरवण मानी गई, इनपर उस रामायणका ही उत्तरपक्ष माननीय होगा । यह रामायण में श्रीनारदने कहा है-राज ' पुरा कृतयुगे राजन्! ब्राह्मणा वै तपस्विनः । श्रब्राह्मणस्तदा राजन्! न तपस्वी कथंचन ' ( ७ | ७४१६ ) यहां कृतयुग में तपस्या ब्राह्मणोकेलिए विहित की गई है; अब्राह्मणकेलिए नहीं । ' ततस्त्रेतायुगं नाम... क्षत्रिया वेदा यत्र जायन्ते पूर्वेण तपसान्विता: ' ( ११-१२ ) यहांपर त्रेतायुगमें ब्राह्मण. काट क्षत्रियकी तपस्या मानी गई है । शेषोंकी सेवा बताई गई है । तों त्रेतायुगे च वर्तन्ते ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च ये । तपोऽतप्यन्त ते सर्व श्रीर शुश्रूषामपरे जनाः ' ( २० ) ( उनके अतिरिक्त शेष वैश्य शूद्रादिने सेवा बल्क सम्भाली । पर वह सेवाकर्म शूद्रोंका विशेष रूपसे रहा ) । तोय ' अस्मिन् द्वापर- संख्याने तपो वैश्यान् समागमत् ' ( २५ ) द्वाप ब्राह्म नक तपस्या वैश्यमें रही । पर इस त्रेतायुगमें शूद्र तद्विरुद्ध तपस्या कर रहा धार्मि है - ' हीनवर्णो ( शूद्रों ) नृपश्रेष्ठ! तप्यते सुमहत्तपः । भविष्यत् शूद्रयोन्यो धारि हि तपश्चर्या कलौ युगे ' ( २७ ) यहाँ शूद्रकेलिए तपस्या कलियुगकेलिए अनुस तो बताई है । सो द्वापरान्त एवं कलियुग के प्रादिमें महाभारतकाल में यरि