सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 271–280
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 271–280
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[ ४५ 7 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४८६ चतुर्थ वर्ष तपस्या बताई गई है; तब इसमें कुछ भी विरुद्धता नहीं है; मतङ्गकी फिर वह देवता नहीं बनना चाहता था?? स्वर्ग नहीं चाहता था । ही सिद्ध और उसे इन्द्रने वध्य नहीं माना । हाँ, वह ब्राह्मण बनना चाहता था; अतः वह ब्राह्मणत्व भी इन्द्रने मतङ्गको नहीं दिया । यह समाधान हो पर दि शूद्रका चुका । अब आगे हम प्रकरणपर चलते हैं.। '.: लको इन्द्र आगे प्रतिपक्षी लिखता है - ' दन स्मृतिवचनोंपर आज कोई आचरण ददामि ते करने लगे; तो निस्सन्देह वह मृत्युदण्ड पाएगा ' । यह बात वादीकी ठीक हे मत है; क्योंकि यह ' रामराज्य ' थोड़े ही है । ऐसे दण्ड तो आज श्रादिम-वर्णको मिलेंगे, अन्तिमको थोड़े मिलने हैं, वह तो ' हरिजन ' हैं!!! और बघयोग्य फिर शूद्रको उक्त दण्ड विधान करना सर्वसाधारण के लिए नहीं है; जो कि होगा । यह प्राक्षिप्त किया जाता है । यह तो राजाकेलिए है; तब क्या प्रशासक-राजा को भी फांसी दी जावेगी? राजन्! मागे वादी लिखता है - ' वेदमन्त्रों को याद करनेवाले अब हजारों केलिए व्यक्ति स्वा.द. ं जैसे उदारतम श्राचार्यकी कृपासे विद्यमान हैं, जिनको ..क्षत्रिया वेदाध्ययनसे रोकनेका अब कोई साहस नहीं कर सकता । उनकी जीभ ब्राह्मण काटने वा शरीरके टुकड़े - टुकड़े करनेका तो कहना ही क्या है? यह कथन तो व्यर्थ है । आजके धर्मनिरपेक्ष राज्य में ' मनुस्मृति ' के जलाने वाले, ते सवं, श्रीरामको जूतोंका हार पहराने वाले भी तो उच्चपदासीन थे, वा हैं । दिने सेवा बल्कि प्रशासक वा उनके कृपापात्र हैं!! वेदोंकी स्पष्ट निन्दा करनेवाले भी तो यहकि सम्मेलनोंके ' सभापति ' बनते हैं । आज मद्यका प्रयोग करनेवाले ब्राह्मण भी भारत द्वापरखें न करनेवाले भी कर रहा धार्मिक- अव्यवस्था शूद्रयोन्यो धारिता है, इसका युगकेलिए अनुसार मान लेते में परि प्रभी तो आगे भाग्यविधाता हैं । वेदप्रोक्त - धमका स्वप्न में भी प्रयोग आज ' नेता ' हैं । श्राजकी क्या बात है? श्राज जो है, धर्मका जो प्रतिक्रमण वा उल्लंघन है, तथा स्वरा-श्रेय भी आपके ' उदारतम आचार्य पर हम भी वादीके हैं । देखियेगा कि क्या होता हैं, ' ऊंट किस करवट बैठता दण्डकी कढ़ाई स्वा. द. को भी मान्य [ ४८७ है ' पर वादीकी भी प्रशंसा श्रवश्य करनी पड़ती है । श्राज जो भी धार्मिक-उच्छृंखलता जारी हो जाती है, श्राप उसको झट ' वैदिकताका जामा ' पहराकर उसकी ' वैदिकताका फतवा ' दे डालते हैं । श्राप लोग ' तं त्वा सीसेन विध्यामः ' गोवध करनेवालेको गोली मार देना वैदिक मानते हैं न? यह तो स्मार्त वचन नहीं है; सो आप गोवधकर्ता भिन्नधर्मीको गोली मार तो दिखावें; तो क्या श्रापको वर्तमान-शासन मृत्यु दण्ड न देगा? फिर यह आपका क्या उपालम्भ रहा? ' वधीहिं दस्यु धनिनं घनेन ' ( ऋ. १ | ३३ | ४ ) धनी दासको मूसलसे मारना वैदिक ही समझते हैं न; ' दस्यु ' यह स्वाद के अनुसार वेदोंमें दास एवं शूद्रादिका नाम है; आप मार देखिये उनको? तब प्रापको क्या मृत्यु दण्ड न मिलेगा? फिर यह उपालम्भ कैसा मूसल ? यहाँ तो चाहे वैदिक - दण्ड हो, चाहे स्मानं; ' सब धान वाईस पसेरी ' हैं । दण्डकी कडाई तो वादीके ' महर्षि ' भी मानते हैं । देखिये उनके शब्द - ' जो इसको कड़ा दण्ड जानते हैं, वे राजनीतिको नहीं समझते । क्योंकि एक पुरुषको इस प्रकार दण्ड होनेसे सब लोग बुरे [ शास्त्रविरुद्ध ] काम करनेसे अलग रहेंगे; और बुरे [ धर्म - विरुद्ध ] कामको छोड़कर धर्म - मार्ग में स्थित रहेंगे ' ( स.प्र. ६ समुल्लासकी समाप्ति पृ. १०६ में ) वादीने इस सन्दर्भमें ' लाखों व्यक्ति ' तो लिख डाले, पर इनमें शूद्र-अन्त्यजोंका नाम लिखा ही नहीं कि वे कितने हैं? बात तो शूद्रादिकी थी । आगे प्रतिपक्षीने प्राचार्य शङ्करका ' विदुर - विषयक पूर्वपक्ष दिया है, उसका उन्हीसे किया हुआ उत्तरपक्ष भी लिखा; पर उसपर वादीने कोई श्रालोचना नहीं दी; तत्र इस विषयक पूर्वपक्ष स्वतः वाघितं हो गया । यदि स्वा. शङ्क. के उत्तरपक्षमें कुछ भी शिथिलता होती, तो प्रतिपक्षी उसे सहजमें छोड़नेवाला जीव नहीं था । स्पष्ट हो गया कि - विदुर आदिने कहीं भी विद्या नहीं पढ़ी । वह ग्रारूढ - पतन होनेसे उसे स्वतः ही प्राप्त थी । उससे व्यवस्था क्या हो सकती है?
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४८८ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) इसकी अत्यन्त संक्षिप्त, परन्तु वहुत महत्त्वपूर्ण स्पष्टता ' अणुभाष्य ' में श्रीमध्वाचार्य स्वामीने की है- ' विदुरादीनां तु उत्पन्नज्ञानत्वाद्न कश्चिदविशेषः ' ( पृ. ६७ ) ' सार्वदेशिक ' में इसे ५६३ पृष्ठम उद्धृतं किया गया है । बात भी ठीक । जन्मसिद्ध - ज्ञा वाले ग्राठा तितका ज्ञान इस अनधिकारका विषय नहीं ।. तथापि विदुर आदिने भी मर्यादाका पूरा - पूरा ध्यान रखा । जब उनसे वैदिक - विषय पूछा गया; तो उनने वहाँ स्पष्टं निषेध कर दिया कि- ' मैं शूद्रयोनि [ दासी ] में उत्पन्न हूं; उसे कह सकने में समर्थ नहीं हूं । प्राप तदर्थ ब्राह्मणको बुलाइये । तब सनत्सुजात ब्राह्मणको बुलाया गया । देखिये विदुरके वे शब्द - ' शूद्र- योनौ ग्रहं जातो नाऽतो वक्तुमिहोत्सहे ' । ( उद्योगपर्व ४१५ ) ब्राह्मीं हि योनिमापन्नः सुमुह्यमपि [ वेदोक्त ] यो वदेत् ' ( ४१।६ ) इससे ज्ञानी भी शूद्रका वेदमं श्रनधिकार ही सिद्ध रहा । श्रागे प्रतिपक्षीने ' श्रीशङ्कराचार्यके स्त्रियोंके विषय में अनुदार - विचार दिखलाते हुए ' विश्वासपात्र न किमस्ति? नारी ' | ' द्वारं किमेकं नरकस्य? नारी ' । कि तद् विषं भाति सुधोपमं यद् नारी ' । ' विज्ञान्महाविज्ञतमोस्ति को वा? नार्या पिशाच्या न च वञ्चितो यः ' यह उनके वचन वादीने प्राचार्य शङ्करकी ' प्रश्नोत्तरमणिमाला ' से दिये; और उन्हें ' शुद्धाः पूता घोषितो यज्ञिया इमाः ' इत्यादि वेदवचनोंसे विरुद्ध बताया ' । इस विषय में इसी पुष्पके २२७-२२८ पृष्ठमें हम प्रत्युत्तर दे चुके हैं कि वे संन्यासी थे; संन्यासियों केलिए ' नारी ' स्पष्टतया ' नरकका द्वार ' हे । संन्यासी तो दूर, यदि गृहस्थी भी ' नारीकीट ' बना रहे; तो वह भी परलोककेलिए नरक ही को उपार्जित कर रहा होता है । गो. तुलसीदास-जी जब तक स्त्रीलम्पट रहे, तब तक वे भी नरकको उपार्जित कर रहे पर जब उन्होंने स्त्रीको उसीके कहे अनुसार उसे ' अस्थिचर्ममय- देह ' नारीविषयक शंकरके मतपर प्रत्यालोचना Ye YEO समझा, तब उनका उद्धार हुआ । इस विषय में २२४-२२७ वादी देखे । पृष्ठ तब नारी संन्यासीके लिए न्यायानुसार ' नरकका द्वार ' सिद्ध तभी स्वा. शङ्कराचार्यने श्रीमण्डनमिश्रको हराकर जब उसे हुई । सन्यासी बना लिया; तब उनका स्त्रीसे सम्बन्ध भी हटवा दिया अपना ; क्योिं मि वह सन्यासी के लिए नरकका द्वार ' तथा अविश्वसनीय और विपसम्पृत अमृत एवं पिशाची है; तभी इस विषय की स्वाद की घटना भी बादी देवे बना ( पृ. २२८ ) तब इसमें प्राचार्य शङ्करकी ' अनुदारता ' हुई? शास्त्र उस अवस्थामें उसपर थोडा विश्वाम किया कि नरकका द्वार ' बुल,, है उस वाडीके स्वा.द.ने भी लिखा है- ' स्त्रियों को प्रिय वह होता है, जो से स्त्रीप भोगमें फसा हो, ( स.प्र. ११ समु. पृ. २३४ ) । ' पुरुष से स्त्रीकी [ कार-कर च चेष्टा ] अधिक होती है ' ( स.प्र. ११ पृ. २३६ ) । स्त्रीपर अविश्वासका उसका कारण उसकी बुद्धिकी अस्थिरता भी है । इसी कारण वादीके स्वामी a मान्य ' मनुस्मृति ' में भी स्त्रीकी साक्षीको प्रशस्त बताया है । जैसे कि-इस ' एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् वह, व्यः शुच्योपि न स्त्रियः । स्त्रीबुद्ध रेस्थिर वाचक त्वात्त ' ( मनु. ८।५ ) । इसपर श्रीतुलसीराम स्वामीने लिखा है - स्त्रीको वैदिक-बुद्धि स्थिर नहीं हुआ करती । और यह वेदानुकूल है - देखो ' उतो छ प्रशुद्ध ऋतु ं रघु ' ( पृ. १६७ - १३६ ) में । जब ऐसा है; तो वह स्त्री ' विश्वासपात्र ' प्रकार सिद्ध न हुई । तभी वादीके स्वामीने भी स्त्री - सम्पर्क नहीं रखा । बहुत जो कि प्रतिपक्षीने ' शुद्धाः पूताः ' यह वेदका वचन दिया है, इसमें गनत ' स्त्रियोंका वर्णन ' नहीं है, किन्तु ' जलों ' का है । इस मन्त्रको बादीने तत्र दय अपूर्ण लिखा है । ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमाः ' के धागे ' आप ' रन्ते ' म यह पाठ था; उसे वादीने छिपा दिया, जनदृष्टिमें नहीं थाने दिया, जैसेकि कि कहीं उसका मत गलत सिद्ध न हो जावे । उदाहर इस मन्त्रमें ' जलोंका वर्णन ' है, स्त्रियोंका नहीं । ' आप ' यह स्त्रो छिपाया लिङ्गान्त शब्द है, ‘ योषितः ' उसीका विशेषण है । विशेषण सदा यौकि
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) YEO ] २७ पृष्ठ है । ' युष्यन्ते सेव्यन्ते इति ' इस मन्त्रका विनियोग चावलोंका हुआ करता कहा है, स्त्रियोंका जलमें डालना नहीं । यह प्रतिपक्षी लोग सिद्ध हुई । जलमें डालना देखते हैं; चाहे वहाँ जलोंका वर्णन हो, जैसे प्रस्तुत मन्त्र में जहाँ स्त्रीलिङ्ग का हो, जैसे देखो - इसी पुष्पके २११-२१५ पृष्ठमें चाहे, T; क्योंकि इष्टकाओं जैसे कि- ' इडे रन्ते ' मन्त्र में । उनका यह लोग बनावटसे, स गौत्रोंका । विपसम्मृद्ध करके स्त्रीपरक अर्थ कर दिया करते हैं, पर यह बात वेदादि-वादी देखे मनात्कार शास्त्रोंसे विरुद्ध है । ? इसमें जलोंका वर्णन बतानेवाला मन्त्र जिसे वादी स्त्रीपरक बताता द्वार खुला, है, उसका समाधान तो हम कर चुके । ' इष्टका ' का मन्त्र जिसे वादीने है, जो सी स्त्रीपरक लगाया था; उसका भी हम समाधान पहले ( पृ. २११-२१८ में ) [ कार- कर चुके । अब हम गायका मन्त्र जिसे वादीने स्त्रीपरक लगाया था; नविश्वासका उसका भी निर्देश कर देते हैं— स्वामी वादी ' इडे! रन्ते! सरस्वति! महि! विश्रुति! ' ( यजु. ८।४३ ) जैसे कि इस मन्त्रमें ' पत्नी देवता ' दिखलाकर ' सरस्वती ' का ' विदुषी स्त्री'-बुद्ध ेरस्थिर. बाचक अर्थ लिखता है । पर वादीको मालूम होना चाहिये कि - अजमेर है - स्त्रीको वैदिक यन्त्रालयके छपे हुए मूल वेदों में बहुत स्थानोंपर ' देवता ' आदि उतो प्रशुद्ध छपे हुए हैं । सर्वानुक्रमणिका, वृहद्देवता श्रादिसे विरुद्ध है । इस-श्वासपा प्रकार यजुवदमें तो विशेषकर स्वाद की यजुर्वेदसं. मैं तो देवता यादिकी II बहुत गड़बड़ी है । प्रकृतमें यजुः ८।४२-४३ मन्त्रोंका देवता पत्नी ' उसमें है, गन्नत छपा है, अतः तदनुसारी स्वाद का किया हुआ अर्थ भी गलत है । कोवादीने तब दयानन्दी - वादीका अर्थ भी गलत है । उसीसे वचने के लिए वादीनं ' इडे गे ' भार ' रन्ते ' मन्त्रका उत्तरार्ध छिपा लिया, उसे जान - बूझकर नहीं लिखा धाने दिया, जैसेकि उसकी सदाकी दुष्प्रकृति रही है । इस प्रकारके उसके बीसों । उदाहरण हम अपने निवन्धों में दिखला चुके हैं । देखिये वह वादीस यह स्त्री- छिपाया हुआ ' उत्तरार्ध-सदा यौकि ' एता ते अन्ये! नामानि ' । गायके मन्त्रका अर्थ ' पत्नी ' कर दिया [ ४ ९ १ यहाँ ' या ' विशेष्य है । सो ' अध्न्या ' को कहा जा रहा है कि-हे घ्या! तेरे डंडा, रन्ता, अदिति, सरस्वती, मही आदि नाम प्रसिद्ध हैं । ' अन्य ' से वेदमें गाय ली जाती है । इसीलिए ' वैदिकनिघण्टु ' ( २।११ ) में ' अघ्न्या उन्ना, उनिया, ग्रही, मही, श्रदिति, इडा, जगती, शत्रवरी ' यह नौ गायके नाम हैं । तब उक्त मन्त्रमें ' गाय ' का वर्णन सिद्ध हुआ, ' पत्नी ' का नहीं? पत्नी के यह नाम कहीं नहीं आये? उक्त मन्त्रमें गायके निघण्टुसे रन्ता, सरस्वती, विश्रुती ये नाम नये प्राये हैं । इनमें विशेष्य ' अघ्न्या ' है । ' सरस्वती ' श्रादि विशेषण हैं । विशेषण सदा यौगिक हुना करता है । मो ' सरस्वती ' भी यहाँ ' विशेषण ' होनेसे ' यौगिक ' हुग्रा । ' सर ' ( निघण्टु १।१२ ) यह जलका नाम है । तवती । यहां ' तसौ मत्वर्थे ' ( पा. ११४११३ ) से ' भ ' संज्ञा होनेसे ' स ' को ' रु ' न हुआ । सो वहाँपर ' सरस्वती ' का ' क्षीरवती ' का भाव है । तब वादीका अर्थ निघण्टु तथा वेदानुसार भी खण्डित हो गया । ' सर्वानुक्रमसूत्र ' में भी स्पष्ट लिखा है- ' प्रजिघृ ' ( यजुः ८४२ ) ' इडे ' ( यजुः ८।४३ ) कुसुरुविन्दः, गव्ये, महापङ्क्ति प्रस्तारपङ क्ती ' ( १/३२ ) अर्थात् ' प्रजिघ्र ', और ' इडे रन्ते ' इन दो मन्त्रोंका ऋषि ' कुसुरुविन्द ' है, देवता ' गौ ' है । ' गव्ये ' शब्द यहाँ स्पष्ट हैं— ' गोपय-सोयंत् ' ( पा. ४ | ३ | १६० ) यह द्विवचनान्त उक्त दो मन्त्रोंकेलिए है । पङक्ति- विशेष छन्द है । तब यहां वादीकी ' पत्नी ' कहाँ गई? यहां तो ' गौ देवता ' श्रा उपस्थित हुई । इधर वेदमें गायको सर्वदेवात्मक माना गया है । इसपर ' आलोक ' का ११ वीं पुष्प देखो । ( पृ. ७४-१२ ) ' वैश्वदेवी वै गौः, यद् गां ददाति, विश्वेषामेतद् देवानां तेन प्रियं घाम उपैति ' ( अथर्व. गोपथब्रा. २।३।१ ९ ) ( गाय सर्वदेवतात्मक है । जो गायका दान करता है, उससे पुरुष सब देवताओंके प्रिय धामको प्राप्त करता ' एतद् वै विश्वरूपं सर्वरूपं गोरूपम् ' ( अथर्व. शौ.सं. ६।७, १1 २५ ) ( गाय सब देवताओंका रूप है ) तत्र गायका नाम ' सरस्वती'-
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४६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) देवताके नामसे भी बोला जा सकता है, तब उक्त मन्त्रमें मनुष्य- स्त्रीका वर्णन सिद्ध न हुआ । विज्ञ पाठकोंने भांपा होगा कि वादी प्रपनी मर्जीका व्यक्ति है । समय प्रानेपर वह निघण्टु तथा श्रीयास्कको ही नहीं, प्रत्युत साक्षात् वेदको भी प्रमाणित नहीं करता । उदाहरण आपके समक्ष है । समय र एक प्रसिद्ध टीकाकारको भी अपना बुजुर्ग बना लेता है । वस्तुतः इनके विषय में हमारी यह बात ' पत्थर की लकीर ' है कि इन लोगों में प्रकरणको छिपा देना, कभी किसी पदको छिपा देना इत्यादि बहुत छल हैं । पर यदि सच्ची बात इन्हें बताई जावे, तो जनताकी दुहाई देने लग पड़ते हैं । इनकी इस प्रकृतिको न जानने वाले और स्वयं अनुसन्धान न करनेवाले लोग ही इनको सच्चा मानकर इनके पक्षमें ' वोट ' दे दिया करते हैं । फलतः इससे वादीका पक्ष सर्वथा सिद्ध न हुआ । इधर वादी इस मन्त्र में ' पत्नी ' देवता मानता है, तब उसके अनुसार ' सरस्वती ' का ' पत्नी ' प्रथं हुमा, फिर ' विदुषी ' शब्द उसने कैसे प्रक्षिप्त कर दिया? वस्तुतः यह सब उसकी कृत्रिमताएं हैं । यह हमारा लेख चैत्र शुक्ला ३ सं. २००३ में ' सिद्धान्त ' काशीमें छपा था । फिर वादीने ' स्त्रियोंका वेदाध्ययनाधिकार ' पुस्तक छपवाई । हकी बात है कि - वादीने स्पष्ट है कि उसे स्वयं भी सत्यके सामने झुकना पड़ा । बेदमन्त्रका उसके देवता के पर जब मन्त्रका देवता ही स्वतः प्रशुद्ध सिद्ध होगा । फलतः चार आश्रमोंमें उसमें ' इडे रन्ते ' यह मन्त्र नहीं रखा; इससे उक्त मन्त्र रखनेमें कृत्रिमता अनुभूत हुई । इससे स्वा. द. जीने यह तो सिद्ध कर दिया कि-अनुसार अर्थ करना चाहिये । यह ठीक है । गलत लिखा गया हो; तत्र मन्त्रका अर्थ भी जब तीन प्राश्रमों केलिए स्त्री ' कण्टक ' है, गृहस्थाश्रमीकेलिए भी ऋतुकालके अतिरिक्त उसमें भी अधिक सेवनीय नहीं; तब प्रश्नोत्तरी में वैसा कहते हुए प्राचार्य एवं संन्यासी शंकराचार्य-आचार्य शङ्कर के स्त्रीविषयक विचार ४६ का कोई दोष सिद्ध न हुआ । इसीलिए यह कथन प्रसिद्ध है ' प्रकाश ' के ४ र्थ उल्लास में उद्धृत है- ' एषा [ स्त्री ] कण्ठतटे , जो ' काव्य. शिला संसारवारां निधौ ' ( वह स्त्री संसाररूप समुद्रमें कृता केव स्नानकेलिए गये एकेलिए कण्ठमें बान्धी हुई एक मणको शिलाके समान स्पा ने वाली है । पुरुषको उर्पा वादी आगे लिखता है - ' स्त्रियोंके वेदाधिकार सम्बन्ध में शं श्रा के ऐसे ही ' अनुदार ' विचार थे, ' बृहदारण्यक ' उपनिषद् भी स्वा. पण्ड भाष्य से यह ज्ञात होता है, जहाँ ' अथ य इच्छेद- दुहिता मे पण्डिता के उनके लिए जाये । नाच ( ६।४।१७ ) इसके ' पाण्डित्य ' का अर्थ करते हुए प्राचार्य शंकर लिखते हुई हैं- ' दुहितुः पाण्डित्यं गृहतन्त्र विषयमेव न तु वेदविषयकम्, वेदे प्रन धिकारात् ' ( इस उपनिषदकी श्रुति में कन्यानोंके पाण्डित्यका जो प्रतिपादन की है, वह गृहकार्य विषयक ही समझना चाहिये, क्योंकि —— वेद में इन अधिकार नहीं । वेदा यह ह इस वचनमें जबकि मूल उपनिषद्को ही स्त्रीका वेदाधिकार इट नहीं, त व्याख्याकार आचार्य शंकर उससे विरुद्ध क्या लिखते? क्या दे मूलकारसे विरुद्ध लिखते? क्या मूलसे विरुद्ध लिखना ही व्याख्या वा T भाष्य हुआ करता है? जैसेकि वादी लोग वैसा करते हैं । इसमे अभिम आचार्य शंकरकी ' अनुदारता ' सूचित नहीं होती । इस विषय में इसी पुष्पके पृ. १२०-१२२ में तथा ४ ९७-४१८ पृ. में देखें । वाचक ६ | ४ | १८ कण्डिका में पुत्रकेलिए पण्डित होना और सारे वेदोंका पढ़ना शंकरा पृथक् - पृथक् कहा है, पर लड़कीकेलिए उपनिषद्ने केवल ६।४।१७ में और पाण्डित्य ही मांगा है । उसकेलिए वेदका नाम तक भी नहीं लिया । ' बाल्यं इससे जहाँ वादीसे सम्मत जातिपक्षको उपनिषदने खण्डित कर दिया है; । श्रानन्द वहां पर स्त्रीकेलिए वेदाध्ययन भी निषिद्ध सूचित कर दिया है । यह प्र कारण यह है कि लड़के के लिए पण्डिताई, तथा व्याख्यानकुशलता, ए मन घि सर्ववेदाध्ययन पृथक् - पृथक् रखे हैं; पर उपनिषदने लड़कीकेनिए इत्याद
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] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४६४ जो ' काव्य कुशलता, सभा - सोसाइटियों में जाना, सर्ववेदाध्ययन न कहकर कृता ' व्याख्यान पाण्डित्य ( बुद्धिमती होना ) मांगा है, जोकि गृहकार्यके लिए स केवल उसका स्नानकेलिए स्पष्ट है । इमसे पण्डितत्वसे वेदाध्ययन गृहीत नहीं हो सकता - यह भी न पुरुषको उपनिषद्ने सूचित कर दिया है । ' पण्डिता ' कहते हैं बुद्धिमतीको । ' पण्डा- वुद्धिः सञ्जाता अस्या इति में भी स्वा. पण्डिता ' । उसके लिए वेदानुवचन न कहने से वह बुद्धि घरके काम - काजके-षट्के उनके लिए स्वत: सिद्ध हो गई । तब ' दुहितुः पाण्डित्यं गृहतन्त्रविषयमेव ' यह ता जावेद arati पादकी व्याख्या न तो निर्मल हुई, और न ही अनुदारता - सूचक कर लिखते हुई; किन्तु मूल उपनिषद्की हृदयप्रकाशिका सिद्ध हुई । तब क्या वादी-वेदे धन. की शक्ति है कि उक्त उपनिषद - वचनका इससे कुछ भिन्न श्रयं अपने प्रतिपादन पक्षका सिद्ध कर दे? बादी ' पण्डिता ' का अर्थ चाहे जो भी करे, वहाँपर दमें इनका ' वेदाध्ययन ' श्रर्थ उक्त उपनिषद् में कभी त्रिकालमें भी नहीं कर सकता । यह हमारी सडिण्डिमनाद घोषणा है । नहीं तो फिर पुत्रवाले वाक्यमें धकार इट पाण्डित्य ' ' से भिन्न ' वेदानुवचन ' का कथन व्यर्थ जावे । वादी इस ? क्या दे विषयमें कितना ही वल क्यों न लगावे; पर उसका पक्ष तो उक्त व्याख्या वा उपनिषद् - वचनसे कभी भी सिद्ध हो ही नहीं सकता । तब बादी से हैं । इसने श्रभिमत श्रीशकराचार्य - स्वामीकी ' अनुदारता ' यहां सिद्ध न हो सकी । 1 षय में इसी प्रागे वादी लिखता है - ' इसी उपनिषद् में ' ब्रह्मवादिनी गार्गी -वाचक्नवी, मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी ' ( ४।५।१ ) का वर्णन आ चुका है, जहां टोंका पढ़ना | शंकराचार्यजीने भी ' ब्रह्मवादिनी ' का अर्थ ' ब्रह्मवदनशीला अर्थात् ४१७ में और ब्रह्मविषयक उपदेश करनेवाली किया है ' । तथा ' पाण्डित्य ' का अर्थ वेद हीं लिया; ' बाल्यं पाण्डित्यं च निर्विद्य ' ( वृ. ३।५।१ ) का अर्थ ' आत्मज्ञान ' किया है - दिया है; श्रानन्दगिरिने ' आचार्य परिचर्या पूर्वकं वेदान्तानां । दिया है! यह अर्थ किया है, किन्तु अनुदारतावा तात्पर्यावधारणं पाण्डित्यम् ' लता एवं प्रनधिकार यहाँ स्त्रियोंका वेदाध्ययनमें ड़कीकेलिए बता दिया है, जो ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( अ. ११।६।१८ ) इत्यादि वैदिक - प्रादेशसे विरुद्ध है ' । वादीके तर्कोंका समाधान [ ४६५ यहांपर वादीने प्राचार्य शंकरके ' ब्रह्मवदनशीला विषयक उपदेश करनेवाली यह अयं ' का ' वेद और ब्रह्म-संवाद करनेवाली ही कैसे कर दिया? ' ब्रह्मविषयक श्रर्थका कोई प्रकरण ' गहू अर्थ तो प्राकरणिक एवं ठीक है; यहाँपर ' वेद'-ही नहीं । जबकि वृहदारण्यक लड़कीकेलिए तो बताता है, पर वेदानुवचन नहीं, यह हम पहले पाण्डित्य वादीकी क्या शक्ति है कि इस उपनि स्पष्ट कर चुके हैं; तब लडकियोंके लिए कर. में उस ' पाण्डित्य ' का ' वेदानुवचन ' जाना सके । और फिर उक्त उपनिषद्ने वादीसे ही खण्डन कर दिया है; यह हम पहले बता इष्ट ब्रह्मविषयक ज्ञान वेदातिरिक्त वेदान्तके चुके हैं; तब अनादिसे सृष्ट्यादिसे ग्रन्थोंसे अथवा पतिसे अथवा है; जैसा कि श्राचार्य चालू पुराणके ज्ञानके श्रवणसे भी स्त्री कर सकती - शंकरने ब्रह्मसूत्रके भाष्य में लिखा है - ' श्रावयेच्च-तुरो वर्णान् ' इति च इतिहास - पुराणाधिगमे चातुर्वण्यंस्य बेदपूर्वकस्तु नास्त्यधिकारः अधिकारस्मरणात् । शूद्राणाम् [ एवं स्त्रीणाम् ] ( ११२१३८ ) । और फिर इसके अतिरिक्त शतपथ एवं वृहदारण्यक वचनमें तथा ' श्राचार्य उपनयमानो उपनिषद् के वेदको भी जातिपक्ष ब्रह्मचारिणं ' ( अ. ११५५६ ) में इष्ट नहीं; तभी ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( श्र. १११५।१८ में कन्याको पृथक् रखा; इससे स्पष्ट है कि - कन्याका ) भिन्नार्थंक - उपस्थसंयमार्थंक ही है । पुत्रसे पुत्रीका ब्रह्मचयं भी जातिपक्ष भी बाधित हो जाता है; जैसा पृथक् - प्रहण करनेसे हैं, वादीसे उद्धृत प्राचार्य कि हम पहले स्पष्ट कर चुके - शंकरके वचन स्त्रीकेलिए नहीं हैं; क्योंकि-स्त्रीका पाण्डित्य इस उपनिषद् में वेदातिरिक्त गृहकार्यो के लिए विवक्षित है - इसपर हम पहले विवेचना दे चुके हैं । वादी शंकराचार्यके पुरुषविषयक वचनको उनके अभिप्रायसे विरुद्ध स्त्री में कैसे लगाता है? शेष रहा ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' इस मन्त्रसे विरोध तथा गार्गी श्रादिका उदाहरण, इसपर उत्तर यह है कि उक्त मन्त्रमें कन्याका ' ब्रह्मचर्य ' ' उपस्थसंयम ' ही है, वेदाध्ययन नहीं; क्योंकि - युवा पतिके वेदन में हेतु
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४ ६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कन्याका उपस्थसंयमात्मक ' ब्रह्मचयं ' ही होता है; क्योंकि उपस्थसयम न करनेसे वह लडकी युवा पतिके योग्य नहीं रह जाती - इस विषय में ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण ' यह उक्त मन्त्रका दृष्टान्तभूत उत्तराधं भी साक्षी है । बैल घोड़े ब्रह्मचयं अर्थात् उपस्थसंयम न करनेसे घासको नहीं पचा सकते, यहाँ बेदाध्ययनकी कोई बात ही नहीं । इस विषय में विस्तारपूर्वक हम इसी पुष्पके पृ. ५५-७२ में लिख चुके हैं । पहले ' सिद्धान्त ' ( ७३ ९ ) में भी लिख चुके हैं, जिसका प्रत्युत्तर प्रतिपक्षीने कभी भी नहीं दिया । ब्रह्मवादिनी स्त्रियोंके विषयमें भी हम पहले पृ ०-८६ में लिख चुके हैं कि हारीतके अनुसार ब्रह्मवादिनी यावज्जीवन -कुमारी रहती है; परन्तु अथर्ववेदके ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' में लड़की के विवाहका वर्णन है, कौमार्यका नहीं, अतः वादीका पक्ष स्वयं ही खण्डिन हो गया । अन्य यह बात है कि इसी वादीके अनुसार हारीतकी सद्योवधूको विवाह होनेपर बेदका कोई अधिकार नहीं दिया गया; तब उक्त ( ' ब्रह्मचर्येण कन्या ) वेदमन्त्र में भी जब ' सद्योवधू ' का ही वर्णन है, ब्रह्मवादिनीका नहीं, तव उसका वेदाध्ययन कैसे हो सकता है? एक बास अन्य यह है कि- ' आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः ' ( प्र. ११५१३ ) इस ' ब्रह्मचारी ' शब्दसे पुंलिङ्गनावश पुरुयका वेदाध्ययन इष्ट है । यदि कहा जाय कि यहां जातिपक्षवश लडकीका भी ग्रहण इष्ट हो जायगा; तो यह ठीक नहीं । यदि वेदको भी जातिपक्ष इष्ट होता; तो ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' ( १११५/१८ ) इस मन्त्रको वेद पृथक् न कहता । ' मम पुत्राः शत्रुहणो प्रथो मे दुहिता बिराट् ' ( ऋसं. १०११५६।३ ) ' त्वं स्त्री त्वं पुमान् असि त्वं कुमार उत वा कुमारी ' ( प्र. १०।२८।२७ ) इस मन्त्रमें तथा इस प्रकार के बहुतसे मन्त्रोंमें लड़केसे लड़कीका ग्रहण न करके, लड़कीको लड़केसे पृथक् रखकर ' जातिपक्ष ' की कमर ही तोड़ कर रख दी । इससे जातिपक्षका बाघ हो या; तब फिर पुरुषसे कन्याके पृथक् - प्रहणसे यहां लड़कीका ब्रह्मचर्य ' अपशूद्राधिकरण ' का शाङ्करभाष्य YED ४६ वेदाध्ययन न होकर वह केवल उपस्थ - संयम अर्थ में संक्रान्त पशूद्राधिकरणके शंकराचार्य भाष्यका उपसंहार गया । करते लिखता है - ' यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ' इस ' कठोपनिषद् हुए वादी । सकत ' ब्रह्मचर्य ' की व्याख्या श्रीशंकराचार्यजीके ' गुरुकुलवासलक्षणम् ' में स्थित पुरुष ब्रह्मप्राप्यर्थ ' यह की है; ऐसी अवस्थामें उनका ' स्त्रीणां वेदेऽनधिकारात् अन्यद्वा यह लेख न केवल ‘ अनुदारतापूर्ण है; अपितु वेदविरुद्ध भी हैं ' । इसपर यह जानना चाहिये कि एक शब्दका सव स्त्रीलिङ्गादिमें समान अर्थ नहीं हुआ करता, क्या ' रजस्वला स्थान पुलि पुरुष: ' दोनोंका समान प्रथं वादी कभी कर सकता है? ' रजस्वलमनित्यं स्त्री, रजस्वल: च भूतावासम् ' ( ६ ७७ ) इस मनुके पद्यमें पुंलिङ्गान्त ' रजस्वल बादि ' रजस्वला स्त्री ' - वाला अर्थ क्या प्रतिपक्षी कभी कर सकता ' शब्दका निवा है? ' असंस्कृतः नहीं पुरुष:, प्रसंस्कृता स्त्रीका भी समान अर्थ नहीं हो सकता । जबकि - ' असंस्कृतः जाता पुरुष: ' का अर्थ है ' अनुपनीतः ', और ' असंस्कृता स्त्री ' का अर्थ है ' अविवाहिता ' । ' पुरुषः कान्तो भवति, स्त्री कान्ता भवति ' यहाँ भी दोनों है, स शब्दोंका समान अर्थ नहीं हो सकता । इसी प्रकार पुरुष एवं स्त्रीका हीच भी ' ब्रह्मचर्य ' समानार्थक कभी नहीं हो सकता । स्त्रीक ' शुक्रसंयम ' में ' ' ब्रह्मचर्य ' शब्द प्रचलित है । पुरुषका तो वह कहा और जा सकता है, स्त्रीका नहीं । क्योंकि - स्त्रीका तो शुक्र ही नहीं होता । यह ह उसके ' रज ' को ही ' शुक्र ' माना जावे; तो उसका संयम भी नहीं हो सका, सकता; प्रतिमास वह स्रुत होता रहता है । यदि स्त्री उसे रोके; तो 3 बीमार पड़ जावे, फिर तो ' गर्भिणी ' का नाम ही ' ब्रह्मचारिणी ' रहेगा । अत्याच अतः स्त्रीका ' ब्रह्मचर्यं ' ' उपस्थसंयम ' ही माना जाता है. उत्पत्त स्त्रियो पुरुषोंका तो गुरुकुलवास, शुक्रसंयमादि ब्रह्मचर्य सम्भव है, पर स्त्रीका शुक्र न होने से ' कठोपनिषद् ' के ' ब्रह्मचर्य ' की प्राचार्य-इसलि स ० ध ० ३२ RETGL
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ४१७ ४६८ ] गया । की व्याख्या स्त्रीके उसमें अनधिकृत होनेसे उसमें प्रवृत्त नहीं हो. हुए age शुक्र होनेसे ही पुरुषकी मूछें होती हैं, इसलिए ब्रह्मचर्य सूक्त में में स्थित वादी सकती । ' दीर्घश्मश्रुः ' ( १११५५६ ) कहा जाता है, परन्तु स्त्रीमें शुक्र न अन्यद् पुरुपको ' दीर्घश्मश्रु ' भी नहीं हो सकती । इसकी स्पष्टता हम ६५-७२ · वा होनेसे वह धिकारात पृष्ठमें कर चुके हैं; श्रतः स्त्रीका मुख्य - ब्रह्मचर्य वेदाध्ययन न हो सकतेसे पतिवेदनसे पूर्व उसका उपस्थसंयम ' ' ही मुख्य ' ब्रह्मचर्य ' होता है ।. वहाँ ब्रह्मचारिणी ' आदि शब्द भी गौण हैं, अतः वहां ' उपम्थसंयम-पुंलिङ्ग ' कुमारी रजस्वल काली ' यही अर्थ होता है । ' पतिसेवा गुरौ वासः ' ( २।६७ ) वादिप्रति-: बालमनित्यं बादिमान्य मनुके अनुसार स्त्रीका पतिकी सेवा करनी तथा उसके पास ' शब्दका निवास करना ही ' गुरुकुलवास ' होता है । उसमें उसका उपस्थसंयम भी असंस्कृतः नहीं हो सकता । सो उसका ऋतुकालमें पत्युपगमन ही ' ब्रह्मचर्य ' माना... " असंस्कृतः जाता है । ( मनु. ३।५० ) । है इस कारण श्राचार्य -शंकरसे प्रोक्त वादीसे उद्धृत अर्थ पुरुषोंके लिए भी दोनों है, स्त्रीकेलिए नहीं । जातिपक्ष भी यहाँ बाधित है; यह हम पहले कह वं स्वीका ही चुके हैं; अतः वहां स्त्रीका ग्रहण कभी सम्भव ही नहीं । इस कारण स्त्रीका श्रीशंकराचार्य से प्रोक्त वेदाऽनधिकार न तो ' अनुदारता ' पूर्ण है, वह कहा और न वेदविरुद्ध ही है; अपितु वृहदारण्यक उपनिषद् से अनुमोदित है-होता । यह हम पूर्व कह ही चुके हैं । इसपर प्रतिपक्षी कुछ भी प्रत्युत्तर नहीं दे नहीं हो सका, वा दे सकता । तो प्रत्युत उन स्त्रियोंको बड़े कठिन वेदोंकेलिए बाधित करना उनपर रहेगा । प्रत्याचार करना है । क्योंकि - शुक्रकी अल्पता तथा रजकी प्रधानता से उत्पत्ति होनेके कारण लड़की स्वभावसे निर्बल उत्पन्न होती है । इसलिए है, पर स्त्रियोंका पर्यायवाचक भी ' अवला ' शब्द श्राता है । प्राचार्य- कारण यह है कि — रज तीसरी धातु है; और शुक्र सातवीं । इसलिए शुक्रकी सवलता और रजकी निर्बलता स्पष्ट है । इससे शुक्रकी भारतासे उत्पत्तिवश स्त्रियोंमें प्रायः कोमलता होती है; और पुरुषोंमें स्त्रीका ' अबला ' होनेका रहस्य [ ४ सप्तम धातुकी प्रबलता होनेसे प्रायः कठोरता होती है । फिर उस निर्वल ( स्त्री ) पर वेदका भारी भार रखना - जिसके लिए पुरुष भी घबराता है, उस स्त्रीपर अत्याचार करना है । क्योंकि वेद - वेदाङ्गका भारी भार पुरुष ही धारण कर सकता है । पहले लड़की का शरीर ही जन्मसे निर्बल है, फिर उनपर वेद - वेदाङ्ग-श्रादि सारे वैदिक साहित्यका भारी भार रखना उसके मस्तिष्ककी निर्बलता करती है । भावी सन्तानों को कमजोर करना है । फिर उसका उपस्थसंयम हटानेसे अन्य निर्बलता बढ़ेगी, फिर गर्भादि तथा प्रसव-आदिसे उसकी अन्य निर्बलता बढ़ेगी । तब उसके सन्तानके मस्तिष्ककी निर्वलता भी स्वतः होगी । फिर बच्चेको दूध पिलाते रहनेसे स्त्रीकी निर्बलता और बढ़ेगी । इस प्रकार निर्वलता बढ़ते - बढ़ते बहुत दुष्परिणाम सम्भव हैं । ' कुले च कामिनीमूले ' इस प्रकार स्त्रीकी निर्बलतामें उसके बच्चोंकी निर्बलता भी स्वाभाविक ही है । रजस्वलात्वमें एकान्त में बैठना पड़ता है । इससे प्रतिमास चार दिन की स्त्रीकी पढ़ाई छूटेगी । श्रध्यापिका हो, तो प्रतिमास घरमें बैठनेसे चार दिनका वेतन कटेगा । इस उरसे वे स्त्रियां उन दिनोंमें भी फट - फट करती हुई विद्यालयों में जा रही होती हैं । इससे घरमें नौकर प्रादिके जिम्मे दिये हुए बच्चोंकी भी दुर्दशा हो रही होती है । आयुर्वेद इसके परिणाममें हानि बताता है । फिर प्रसव आदिमें होती हैं हानियाँ, पर फिर दोष दिये जाते हैं वाल्यविवाहपर । श्राशा है वादी दूरदृष्टि रखकर इस विषयका प्रग्रहवाद छोड़ देगा । पुरुषको तो आज वेदका अवसर मिलता नहीं; आप लोग स्त्रीको भी बलात् इस रास्ते में लाना चाहते हैं । स्त्री आपकी सभी प्रकारकी रोटी बनाना, कपड़े धोना, प्रापकी वासनापूर्ति करनी, प्रापके बच्चोंको पालना - आदि सेवाएं भी करे, और फिर वेद भी पढ़े- कितना भयकर अत्याचार है — यह उसपर ।
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५०० ] श्रीसनातन धर्मालोकः ( ३-२ ) यदि श्रीशंकराचार्यस्वामीका प्रपशूद्राधिकरणका भाष्य वेदविरोधी होता; तो श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीवल्लभाचार्य, श्रीनिम्बार्का-चार्य, श्रीयति पण्डित श्रीभगवत्पादाचार्य, श्रीसायणाचार्य आदि उनका विरोध करते; शंकराचार्यकी अनुदारता बताते; पर नहीं; उन्होंने भी इस अपशूद्राधिकरणका उन्हीं के अनुकूल भाष्य किया है — यह हम आगे दिखलावेंगे । उससे पूर्व हम पहले ब्रह्मसूत्रके तथाकथित ' वैदिकभाष्य ' पर-जिसमें शंकराचार्यसे विरुद्धता प्रकट की गई है - पर भी कुछ विचार रखना उचित समझते हैं । ( ४ ९ ) ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाष्य ' पर विचार । यह हम पूर्व सूचित कर चुके हैं कि- ' वेदान्तदर्शन ' के ' आधुनिक-वैदिक भाष्य ' में ' अपशूद्राघिकरण ' को जो प्राचीन आचार्योंकी परम्परा-नुसार चला आया था; उसको एक वादीने हटा दिया है, नहीं तो शूद्रको उसके प्रणेता वेदाधिकारी कैसे सिद्ध करते; प्रत: उसे ' मध्वाद्यधिकरण ' बनावटसे बनाकर उन अपशद्राधिकरणके सूत्रों में तोड़ - मोड़ की है, पर यह • ग्रन्थोंके इष्टपक्षको हटाकर स्वेष्टपक्ष रखना, सूत्रोंके अर्थमें अपनी इच्छानुसार तोड़ - मोड़ करनी - यह प्राचीनताकी हिंसा है; और यह ' असत्य ' - व्यवहार है । यह साहित्यकी ' ब्लैकमार्केटिङ्ग ' है, साहित्यकी ' चोरी वा डकंती ' है । एक वादीने ' अपशूद्राधिकरण ' के उक्त सूत्रोंके अर्थोको बलात् उस अधिकरणसे हटाकर अपनी इच्छानुसार सूत्रोंके अर्थ किये हैं । उनपर कुछ न कहकर इसके बाद जो वादीने उसके साररूपसे ' चर्चा ' चर्चित की है; हम भी उस चर्चापर विचार करते । उनकी यह चर्चा संस्कृतमें है, हम उसका हिन्दी रूपान्तर देंगे । ‘ तदुपर्यंपि ' ( १।३।२६ ) सूत्रमें ' तदुपर्यपि ' इस शब्द से ' मनुष्याद् ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाष्य ' पर विचार उपरिष्टाद्ये देवादयः ' यह अर्थ है कि मनुष्यसे को भी ब्रह्मविद्याका अधिकार है । पर इसपर कि- ' मनुष्योंसे श्रेष्ठ कोई देवादि ब्रह्मध्यानका यह विवादका विषय है । किसी देवको ब्रह्मका गया है ' । पर यह गलत है । ब्रह्मा आदि देव ध्यान करते हुए देखे गये हैं, चाहे वे प्रपने ही न करें? मागे वे महाशय लिखते हैं- यदि वैसे कहा [ ५०१ ऊपरके प्रर्थात् पूर्वपक्षी देवादियों. महाशय कहते अधिकारी है है । स्मात ध्यान करते या नहीं । गुरुम तपस्या नहीं देखा । ब्रह्मस्वरूपका हुए तथा प्रति (शत ध्यान क्यों । प्रध्यर जाता है तब कैसा पड़ेगा कि - शूद्रकी भांति देवताका भी वेदाध्ययन नहीं , यह कहना क्योंकि उनका भी उपनयन संस्कार नहीं होता । तब फिर हो ब्रह्मध्यानके सकता, रूपसे अधिकारमें ' देवोंकी प्रवृत्ति कैसे है? यदि उपनयनसे रहित भी देव वैश अपरा पढ़ सकता है, तब बेचारे शूद्रने क्या अपराध किया कि - उपनयनरहित उसे वेदाधिकार नहीं दिया जाता ' । पैदा पाठकोंने देख लिया कि कैसी तुच्छयुक्ति है । ब्रह्मदेवकेलिए कहा है – ' प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् ' ( पारस्कर ) ( यज्ञोपवीत संस्कार ब्रह्माका पृथक् नहीं होता; किन्तु उनका वह उपवीत सहज - सहोत्सव- गंगा स्वाभाविक होता है । ) इससे देवोंका भी उपवीत स्वाभाविक सिद्ध होता । द्विजः है, पृथक नहीं । और देवोंका गुरुमुखादिद्वारा वेदाध्ययन भी नहीं होता; उनको तो वेद स्वयं प्रतिभात हो जाते हैं । यह युक्ति वादीकी नई नहीं है, दुहेन और उसका प्रत्युत्तर भी नया नहीं है । ' वैयासिक -न्यायमाला ' में बहीन वही खिये--' शूद्रोधिक्रियते वेदविद्यायामथवा नहि? अत्रैवर्णिक - देवाद्या इव शूद्रोऽधिकारवान् ' देखिये वहीका वही पूर्वपक्ष ही तो है कि - शुद्र वेदविद्या- मद्य में अधिकृत है; या नहीं? जैसे त्रैवर्णिकेतर देवताओंका वेदविद्यामें तो प अधिकार है, उसी प्रकार त्रैवर्णिकेतर शुद्रका भी वेदविद्या में अधिकार उपत्य होना चाहिये? अब सुनिये इसका उत्तरपक्ष वादीके मुखमुद्रण करनेवाला— वचन
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[ - श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ). ५०१ ५०२ ] देवादियों • ' देवा: स्वयंभात - वेदा: शूद्रोध्ययनवर्जनात् । नाधिकारी श्री य कहते स्वधिकारो न वार्यते ' इसमें यह बताया गया है कि- देवताओं को या है स्मात वेदाध्ययन नहीं करना पड़ता; क्योंकि - " विद्वा " सो हि देवाः ' नहीं, गुरुमुखादिसे नहीं देखा ३ ७ ३ । १० ) देवता जन्मसे ही विद्वान् होते हैं । उन्हें वेद स्वयं हुए तथा ( शत: हो जाते हैं, जैसे कि मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंको । परन्तु शूद्रका वेदमें ध्यान क्यों प्रतिभात विहित नहीं, अतः वह वेदमें भी अधिकारी नहीं हो सकता, प्रध्ययन उत्तर है!!! कैसा मुंहतोड़ यह कहना आगे वादी बलात् छुआछूत पक्ष लाता है - हम उसका प्रश्नोत्तर-सकता, ध्यान के रूपसे उल्लेख नीदेव अपराध है; वेद अर्चित करते नयनरहित पैदा हुएकी ठीक नहीं । केलिए तो तसंस्कार पांवसे निकले करते हैं— ( प्र. ) ' ब्रह्मा के पांव से पैदा होना ही यदि शूद्रका तो ठीक नहीं, सुर, नर आदि सभी ब्रह्मके पाँवोंको हैं । वह ब्रह्मका पाँव निरपराध है, तब उससे भी निरपराधता निर्वाध है । ( उत्तर ) यह युक्ति ब्रह्मका दिव्यपाद तो पूजनीय है - यह ठीक है; पर उस हुए सभी पूजनीय कैसे हो जाएंगे? ब्रह्मपाद से निर्गत गंगा तो पूजनीय है, पर पादसे निर्गत शूद्र पूजनीय नहीं । ' पतितोपि सहोत्पन्न सिद्ध होता द्विजः श्रेष्ठो न शुद्रोपि जितेन्द्रियः । निदुग्धापि च गौः श्रेष्ठा न च हीं होता दुग्धवती खरी । ( सत्यार्थप्रकाश पाठान्तरम् ) कः परित्यज्य गां दुष्टां ई नहीं है । दुहेच्छीलवती खरीम् ' ( इति पूर्वपद्य े - पाठान्तरम् ) ( पराशर. ८।३३ ) में मुख पूजनीय है, पर उससे उत्पन्न थूक, लार, बलगम यादि पूजनीय नहीं । सिरपूजनीय है, पर उससे निर्गत मैल, जू, फोड़ा आदि पूजनीय नहीं; वाद्या व समुद्र पवित्र है, उससे निर्गत अमृत तो सेबनीय है; पर विष नहीं, वेदविद्या- मद्य सेवनीय नहीं । अतः ब्रह्मका पाद तो पूजनीय है; उससे निर्गत गङ्गा वेदविद्यामें तो पूजनीय है, पर पादसे निर्गत शूद्र नहीं । अतः वादीका यह ' विषम अधिकार उपन्यास ' है । ( प्र. ) ' शूद्र यज्ञमें अनवक्लृप्त ( अनधिकारी ) है, इस कृष्णयजुर्वेदके वचनसे शुद्रका यज्ञमें अधिकार भले ही न हो; पर ब्रह्मध्यानमें उसका ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाध्य ' पर विचार [ ५०३ अधिकार क्यों नहीं? ' ( उ. ) जब वादी यज्ञमें शूद्रका श्रनधिकार मान चुका, तव यज्ञोपास्य तथा वेदोपास्य ब्रह्म में भी अनुपनीत शूद्रका वैध अधिकार नहीं । इस बातको वादी स्वयं भी स्पष्ट करता है-( पूर्वपक्ष ) – ' ब्रह्म ध्यान वेदाध्ययनपूर्वक होता है, श्री वेदाध्ययन उपनयनपूर्वक होता है; और शूद्रका उपनयन होता नहीं, अतः उसका ब्रह्मध्यान वा ज्ञानमें अधिकार नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता, श्रनुपनीत देवताका जैसे वेदाध्ययन है, वैसे ही शुद्रका भी हो सकता है । ( उत्तरपक्ष ) इसका हम समाधान वैयासिक न्यायमालाके वचनसे पूर्व कर ही चुके हैं । ( पूर्व ) जोकि - ' शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः ' यज्ञमें शूद्र अनधिकृत माना गया है, वैसे न्यायानुसार विद्यामें भी शूद्र अनधिकृत है, यह ठीक नहीं । यज्ञ ' कर्म ' है । वह संसारसागरसे पार ले जाने में कच्ची नाव है, परन्तु ज्ञान तो उदय होते ही सारे श्रविद्यान्धकारको दूर कर देता है । ज्ञान श्री कर्मका बड़ा अन्तर है । ज्ञान मार्गका प्राचार्यं कर्मप्रयुक्त अनधिकारको ज्ञानमे कैसे लागू कर सकता है? इसके अतिरिक्त इस प्रकरणमें ' शूद्र ' शब्द कहीं भी नहीं सुनाई पड़ रहा । तब इस प्रकार हास्यास्पद और सबसे तिरस्कर्तव्य अधिकरणको ग्रन्थकार कैसे उपनिबद्ध करनेको तैयार हो गया? ( उत्तरपक्ष ) - यह प्राक्षेप भी व्यर्थ है । कर्म जो पहली संशोधक सीढ़ी है उसमें जो अनधिकृत है; वह सबसे उच्च ज्ञानमें भला अधिकृत कैसे किया जा सकता है? पहली सीढ़ी में चढ़नेकी जिसे रोक है; वह अन्तिम - सीढ़ीमें - भला कैसे पहुंच सकता है? वेदके तीन काण्ड प्रसिद्ध हैं- १ कर्मकाण्ड, २ उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड । उसमें ज्ञानकाण्ड अन्तिम सीढ़ी है । जो पहली सीढ़ियोंमें अधिकृत नहीं; वह अन्तिम सोढ़ीमें भला कैसे अधिकृत किया जा सकता है? वादीने कर्मकाण्डमें तो शुद्रका अनधिकारी होना मान लिया । तब अन्तिमकाण्ड ज्ञानमें भला शूद्र अधिकृत कैसे हो
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५०४ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सकता है? संन्यासाश्रम ज्ञानकाण्डका भाग माना जाता है; वादीके अनुसार तो उसमें उपनयनसे हीन शूद्र भी अधिकारी होना चाहिये; पर शूद्र तो दूर, उसमें ब्राह्मणसे अतिरिक्त क्षत्रिय - वैश्यको भी अधिकारी नहीं माना जाता । देखो मनुस्मृति - सन्यासप्रकरण । तब ज्ञानकाण्डमें भला शूद्र अधिकारी कैसे हो जा सकेगा? स्पष्ट है कि - यहाँ प्रतिपक्षीका यह ' विषम - उपन्यास ' है, ' चिन्त्य ' है, ' निरवद्य ' नहीं । ज्ञानका दर्जा परमात्माने भी उच्च माना है, हमारे शरीरमें भी ज्ञानभाग है— सिर, परमात्माने उसे ऊंचा पद दिया है, पांवको नीचेका पद दिया है, इसलिए वेदमें भी ' यो दासं वर्णमधरं गुहाकः ' ( ऋ. २।१३।४ ) ( जिसने निचले वर्ण - शुद्रको नीचे रखा ); इसलिए उसे सबसे नीचे रखा । उसका दर्जा रखा पां; पांव कुछ क्रियाओं को तो कर सकता है, पर ज्ञानमें उसका प्रवेश सर्वथा नहीं हो सकता । दिमाग उसकेलिए जो कर्म अधिकृत करेगा; वही वह करेगा । ज्ञानमें उसका प्रवेश नहीं हो सकता । ( पूर्व ) मीमांसादर्शनमें छठे अध्याय प्रथमपादमें सप्तम प्रपशुद्रा-धिकरणको प्रस्तुत करते हुए जैमिनिने अन्याय्य व्यवहार नहीं किया । क्योंकि वह तो कर्ममीमांसा है । अवश्य कर्म नियत अधिकार वाले होते हैं । सब सभी कमोंको नहीं कर सकते । ज्ञानमें तो बन्धन नहीं हो सकता । जिसका अज्ञानका लव जिस ही समयमें शान्त हो जावे; उसी समयमें उसकी ज्ञानप्रभा उदित हो सकती है । उसको कौन शान्त कर सके? ( उ. ) इसका उत्तर पूर्व दिया जा चुका है । कर्म पहली सीढ़ी होती है; और ज्ञान अन्तिम सीढ़ी । जो पहली सीढ़ी में अधिकृत हो नहीं, वह अन्तिम - सीढ़ीपर कैसे पहुंचेगा? तब उस अन्तिम - सीढ़ी में ब्राह्मण ही श्रधिकृत हो सकता है; पूर्व सीढीमें भी अनधिकृत शुद्र उसमें कभी भी अधिकृत नहीं हो सकता । वेदका अध्ययन ' कर्म ' है, यह तो वादी भी मानेगा ही; जब शुद्र उसमें भी अधिकृत नहीं; यह वादी भी स्वयं ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५०१ मानेगा ही; तब वह शूद्र उसका अन्तिम फल ज्ञान ही कैसे सकेगा? जिस मुण्डकके ( १।२१७ ) वचनसे कर्मको ' अदृढा प्राप्त कर कहना है, वही मुण्डक यज्ञ विषयवाले ऋग्वेदादिको भी कर्मकाण्डरूप नौ बा विपर और ' अपरा विद्या ' ' अहढा नौः ' कहता है । देखिये - ' ' द्व विद्य ' यह ' परा चैव अपग च ' ( १।१।४ ) तत्र श्रपरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽश्वर वेदितव्ये,. सिद्ध वेदः …………….अथ परा यया तदक्षरमवं- घिगम्यते ' ( ५ ) । तब वादीके अनुसार उस कर्मकाण्डात्मक - वैदमें भी शूद्रना I अनधिकार ही सिद्ध हुन । यदि ऋग्वेदादि मुण्डकानुसार ज्ञान होते, तो वेम उन्हें भी परा - विद्यामें शामिल किया जाता, पर अपरामें किया गया है । है; यदि वादी यह नहीं मानता; और वेदोंको ज्ञानकाण्ड कहता है; किसी पूर्वोक्त - रीतिसे उसमें भी शुद्रका अधिकार किसी भी शास्त्र से सिद्ध हुआ नहीं । " सोय ( पूर्वं. ) वेदका अधिकारी कौन है - यह वेदको ही कहना चाहिये । यहाँ तो कहीं भी संकेतसे भी शूद्रोंका अधिकार नहीं रोका गया है । प्रावश में वेद बल्कि - ' यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य: ' इस मन्त्रमें परम - प्राप्त का ना परमात्माकी वाणी ' सर्वाधिकारा ' है - यही उपदेश दिया गया है । पक्ष ग ब्राह्मणभाग यदि शूद्रका वेदाधिकार हटाते हैं; तो भले ही हटावें; तथा इससे क्या? वे तो कर्ममार्गके ही प्रवर्तक हैं । उनका शासन कर्ममार्ग पर ही है, अन्यत्र नहीं । - मन्त्र कात्यायनने भी ' फलयुक्तानि कर्माणि ( २ ) सर्वेषामविशेषात् ( ३ ) वेदाथि मनुष्याणां वाऽऽरम्भ - सामर्थ्यात् ( ४ ) अङ्गहीनाऽश्रोत्रियषण्ठ - शूद्रवर्जम् ' यज्ञान्त इत्यादि सूत्र बनाते हुए परिभाषाध्यायमें कर्म में ही शूद्रों का अनधिकार विषय स्पष्ट उद्घष्ट किया 1 स्पष्टत ( उ. ) इसका प्रत्युत्तर भी पूर्व - जैसा है । कुछ पूर्व पृष्ठों में भी दिया 5 जा चुका है । जब पूर्वकी सीढी कर्ममें उन लोगोंने शूद्रका अधिकार नहीं सूत्र; बताया; तब अन्तिम - सीढी ज्ञानमें भला शूद्रका प्रवेश ही कैसे होगा? भी हो