सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 281–290
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 281–290
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[ श्री सनातनधमालोकः ( ३-२ ) ५०१ ] ५०६ पाप्त क ' मां वाचं ' में ' वाचं ' से ' परमात्माकी वाणी ' अर्थ नहीं;; इस नीः वादी में २ से ५५ पृष्ठ तक देखिये । वया वादी इस अर्थको मानता है? मकाण्डप विषय वेदको पौरुषेय मानता है; उस वाणीसे किसी पुरुषकी वाणी वेदितव्ये, वह तो परमात्माकी वाणी नहीं । सो पुरुषकी वाणी में यदि शूद्रका सिद्ध हुई, भी सिद्ध हो जावे; तो इससे ' वेद वाणी सर्वाधिकारा ' सिद्ध नहीं प्रधिकार सकती । कहीं वादीने - यदि मैं भूलता नहीं हैं; अपनी किसी पुस्तक में हो शूद्रका वेमां वाचं ' को ' खिल ' मन्त्र माना है; ' खिल ' वह परिशिष्टको मानता होते, तो है; तब यह प्रमाण बेदका न हुआ, किन्तु ' खिल ' ( परिशिष्ट ) होनेसे, गया है । किसी पुरुषसे प्रक्षिप्त होनेसे यह भगवान्की वाणी न होनेसे मान्य भी न तब भी हुशा । तब उक्त मन्त्रमें शूद्रादिको वेदाधिकार देनेकी शक्ति सिद्ध न हुई । से सिद्ध सो यह प्रमाण उसके मतमें भी ठीक न हुआ । ' वेदका अधिकारी कौन है यह वेदको कहना चाहिये ' यह भी चाहिये । श्रावश्यक नहीं; वैसे वेदोंने ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( अ. १६।७१।१ ) गया है । में वेद में द्विजका अधिकार बताया है । ' यथेमां वाचं ' में यदि सभी वर्णों-रमप्राप्त का नाम है; तो वहाँ ' वाच ' लिखा हैं, ' वेदवाचं ' नहीं । अतः वादीका गया है । पक्ष गलत हो गया । स्वाद के सिवाय किसी भी प्राचीन ऋषि - मुनि हटावें; तथा भाष्यकारने उक्त मन्त्रको वेदाधिकारि - विषय में व्याख्यात नहीं किया; कर्ममार्ग बल्कि इस वादीने भी नहीं किया; अतः यह अर्थ माननीय नहीं । यह मन्त्र कर्मकाण्डमें ' दीयतां भुज्यताम् ' इस वाणीकेलिए माना गया है, ( ३ ) वेदाधिकारमें नहीं । सो यह ' दीयतां भुज्यताम् ' वाणी सभी मनुष्यों को शूद्र वर्ज यज्ञान्तमें यज्ञका प्रसाद देनेकेलिए है; इसमें शूद्र भी अनधिकृत नहीं । इस अनधिकार विषयमें इस पुष्पमें पृ. २-५५ तथा १५-१६४ पृ. में हमने ऊहापोहपूर्वक स्पष्टता की है । भी दिया: श्रव वादी ' गौतमसूत्र ' के कर्तापर कहता है - ' शेष है गौतमका कार नहीं EUT? सूत्र; सो वह गौतम कब हुम्रा - यह निश्चित नहीं । ' ( उ. ) वह जबका भी हो; पर श्रीव्याससे पूर्व है; और श्रीव्यासको वह ' गौतम ' सूत्र अभिमत ब्रह्मसूत्र ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५०७ भी है । उसीने शुद्रको वेदश्रवणका निषेध किया है; पर ' श्रवणाध्ययनार्थ-प्रतिषेधात् ' सूत्रके अपने भाष्य में भी वादी कोई गौतम जैसा प्रमाण ही नहीं दे सका, जो ब्रह्मसूत्रके सूत्रसे मेल खाता हो; और जहाँ शूद्रको वेद श्रवण तथा अध्ययनका अधिकार निषिद्ध हो । अतः उसका पक्ष ही प्रसिद्ध है । यह जो वादी कहता है कि गौतम मीमांसादर्शनके भाष्यकार दावर-स्वामी के समय नहीं था, यह भी ठीक नहीं । शवरस्वामीने शूद्रके वेदा-धिकार - निषेधक अन्य प्रमाण तो दिये ही हैं; यदि गौतमका सूत्र नहीं दिया; क्योंकि - साक्षात् जैमिनिकी पुस्तकमें सूत्रानुसारी न होनेसे उसे नहीं दिया; इससे यह आवश्यक नहीं कि वह शवरस्वामीसे पीछेका है । कोई पुरुष एक - दो प्रमाण प्राप्त होनेपर शेष प्रमाणोंको नहीं भी देता । शुद्रको श्मशानकी उपमाका शवरस्वामीका उद्धृत वचन ही पर्याप्त था; क्योंकि - श्मशानमें वेदके अध्ययन, श्रवण तथा उसके अर्थ चिन्तनादिका निषेध है, फिर वहाँ गौतमसूत्रकी पृथक् प्रावश्यकता नहीं थी । आगे शूद्रके वेदाधिकारकी सिद्धिकेलिए वादीने कक्षीवान् तथा उसके पुत्र शवर तया पुत्री घोषाकी शूद्रता लिखी है, श्रीर सायणाचार्यकी भी उसमें सहमति बताई है, यह वादीकी वात सर्वथा असत्य है । इस विषयमें इस पुष्पके पृ. ३५३-३६३ में देखें । सायणाचार्य पूर्वपक्षमें तो कक्षीवनको क्षत्रिय बताते हैं; पर उत्तरपक्षमें उसे ब्राह्मण बताते हैं । श्रीसायणाचार्यने कक्षीवान्को कहीं शूद्र नहीं बताया । जब कक्षीवान्-का उत्पादक दीर्घतमा ब्राह्मण है; तब उसका पुत्र कक्षीवान् शूद्र कैसे हो गया? शेष रहा दासीमें जन्म, उसका भी समाधान हम पूर्वोक्त पृष्ठमें कर ही चुके हैं । वेद भी उसे ब्राह्मण बताता है; अतः वादीका मूल ही निर्मूल हो गया । आगे वादीने अगस्त्यकी वहिन, अदिति प्रादि स्त्रियोंको ऋषिका बताकर स्त्रियोंका भी वेदाधिकार सिद्ध करना चाहा है - यह भी कथन
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५०८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) व्यर्थ है । ऋषि ऋषिकाओंको, बिना ही अध्ययन किये कई एक - दो मन्त्र ( सारे नहीं ) प्रमाधिमें स्वयं प्रतिभात हो जाते हैं । इस विषय में ' वेदक ऋषिकाएं ' निबन्ध इसी पुष्प ( पृ. ७२- ७ ९ ) में देखें । प्रागेवादी कहता है - स्त्री - शूद्रौ नाधीयीयाताम् ' यह वचन भी समाहित हो जाता है ' । वादीने इसका कुछ भी समाधान नहीं दिया । यह कोई श्रुति वचन है- अतः अमान्य नहीं । यदि वादी इस श्रुतिवचनसे स्त्री - शूद्रोंका कर्म में हो अनधिकार बताता है; तो वेदका अध्ययन ' कर्म ' है, वादीके अनुसार भी शूद्र उसमें अनधिकृत रहेगा । शम्बूक शूद्रकी तपस्या भी ' कर्म ' है । उसके भी वादीके अनुसार अनधिकारी शूद्र की तपस्या में प्रवृत्ति करनेसे राजा श्रीरामद्वारा दण्डविधानको भी वादी भालोचित नहीं कर सकता; क्योंकि - वादी भी तो शूद्रको कर्म में कात्यायन तथा जैमिनि आदि विद्वानोंके अनुसार अनधिकृत मानता ही है, मौर उसे अनुमोदित भी करता है । आगे वादी लिखता है - ' नहुष प्रादि क्षत्रिय भी वेदके ऋषि हैं; कई वैश्य भी होंगे, इससे वादोके पक्षकी कुछ भी सिद्धि नहीं; वैश्य भी द्विज हैं । पर शूद्र तो कोई भी वेदका ऋषि नहीं । ऋषि भी तो ज्ञानसे ऋषि नहीं बनता, किन्तु उसे विना ही प्रयत्न वा अध्ययनकी चेष्टा के वेदमन्त्र स्वतः ही प्रतिभात हो जाते हैं । फिर वादी लिखता है - ' वेद एककी सञ्चित सम्पत्ति नहीं हैं, वे सभीके ही हैं । फिर एक ही उनका उपभोग क्यों करे? " इसपर उत्तर यह है कि - वेदका अधिकारी ' द्विज ' है; वह एक नहीं है, तीन हैं । वेद उन्हीं तीनोंकी अधिकृत सम्पत्ति है । उसका द्विजेतर उपभोग नहीं कर सकते, क्योंकि - शूद्रादि वादोंके अनुसार भी कर्ममें अनधिकृत हैं । वेदका अध्ययन भी कर्म ही है । यदि वे शूद्रादि वेदादिका उपभोग करें; तो यह वेदादिशास्त्रोंसे विरुद्ध है । वे ' द्विज ' हैं । वेदका अध्ययन यह एक ' कर्म ' है । वादी स्वयं भी शूद्रको कर्म में अनधिकृत मानता ही है; तव शूद्र भला ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५०१ तद्विरुद्ध वेदका अध्ययन कैसे करेगा? न बह वेद पढ़ ५१० ही उसका अर्थ- विचार कर सकेगा । अतः उसकेलिए सकेगा, न दुरर्थक ही है । ज्ञान भी निरक मूर्ति में " कर्ममें कौन अधिकारी है ' यह विचार कर्मियोंके घरमें परन्तु ब्रह्मध्या ( ज्ञा ) नमें सबका अधिकार है " यह वादीका रहा करे, बता है | ज्ञान कर्मसे उच्च होता है; उसमें उच्च हंस- परमहंसादिका कथन निर्मूल ग होता है, सर्वसाधारणका नहीं । वेद भी कर्मकाण्ड हैं अधिकार शुद्रको उनमें ज्ञान भी है; उसमें अधिकार चतुर्थाश्रमी ज्ञानीका ; हां, कहीं - कहीं धर्यवा नहीं । तव भला कर्मके अधिकारसे होन त्रिविध - शुद्धिरहित है; सभोका निषेधक उसमें अधिकार सर्वथा नहीं होगा । जब शूद्र, अध्ययनादि शूद्रादिका - कर्ममें प्रवृत तो ए नहीं हो सकता; तब उसका ज्ञान ही कैसे कर सकेगा? घेउन ' वेदाध्ययनमें भी सभीका अधिकार है यह वादीका कथन अपने उन्होंने कथनसे भी व्याहत है. क्योंकि - वादी कर्म में स्वतः शूद्रको पर्युदस्त बलसे वैसा = ( निषिद्ध ) करता है; वेदाध्ययन भी एक कर्म है; और फिर वेद भी कर्मके ८० प्रतिशत तथा उपासनाके १६ प्रतिशत मन्त्र मिलाकर ६६ प्रतिशत करता कर्मकाण्ड ही है, उसमें अकर्मी शूद्रका वादीके अनुसार भी भला अधिकार उ कैसे हो? इसलिए ९ ६ चप्पे वाले उपनयन तथा उसके फल वाले सभीको वेदमें तथा वैदिक - उपासनामें भी वह अधिकृत नहीं होता । इसलिए साधुके मलाई, उसका उपनयन भी नहीं होता । कहा फिर आता है ज्ञानकाण्ड, उसमें यद्यपि उपनयनकी आवश्यकता नहीं है । होती, तथापि उसमें भी अधिकार शूद्रोंका शास्त्रानुसार नहीं हो सकता । जो संन्यासी तथा ज्ञानी, कर्मियोंसे भी उच्च माना जाता है; वहीं भला प्र कमी प्र कर्मा - शूद्रका अधिकार कैसे हो? ज्ञानियोंको तो वह कर्मकाण्डवाता बीमार जनेऊ भी छोड़ना पड़ता है । शूद्रकेलिए वेदमें कहा है – ' प्रक रोगकी ( ऋ. १०१ २२८ ) ' अदेवयुः ' ( ऋ. ८७०।११ ) अतः उसका देवपूजात्मक यज्ञ एवं उपासना में तथा यज्ञविषयवाले वेदमें और वेदमन्त्र - प्रतिष्ठापिठ घ तकलीप
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[. ५०१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ५१० ] , मोरन नहीं होता । निरर्थक मूर्तिमें भी अधिकार लिखता है - ' गौतमवचन प्रागेवादी रहा करे, बता चुके हैं ' । ३-२ ) तो अवैदिकहै - यह हम ऊपर नि अवैदिकता में वादीने कुछ भी हेतु नहीं लिखा । वह तो अधिकार गोतमवचनकी वेदाधिकारका प्रबल - निषेध करनेवाला एक अर्थवाद वाक्य है । शुद्रको कहीं - कही वादके रोचक भयानक आदि कई प्रकार होते हैं; जिनमें विधि तथा सभीका निषेधका मुख्य तात्पर्य रहा करता है । दिका तो 5 श्रर्यवादका प्रादर्श हम भी दिखलाते हैं । एक पहुंचे हुए साधु में प्रवृत्त थे; उनकी एक एक पुरुषने समुचित सेवा - शुश्रूषा की जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसे वर दिया कि - तुम्हें टट्टी - पेशाब खुला आ जाया करे । अपने वैसा ही हुआ; और उसका स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा हो गया । बरके पदस्त बलसे उसे भूख भी खूब लगती थी; और भोजन भी स्वतः प्राप्त हो जाया भी कर्मके करता था । - प्रतिद्यत उसकी अधिकार सभीको खुला कल वाले स्त्रीने कहा कि - यह भी क्या कोई वर आ जाया करता है, आप यह वर माँगिये है? टट्टी - पेशाब कि - हमें हर रोज । मलाई, खड़ी, बर्फी, गुलाब जामुन, खीर आदि मिला करे । वह उस इसलिए साधुके पास गया, और १५ दिन तक उसकी खूब सेवा की । साधु ने कहा कि - फिर कैसे प्राये हो? उसने कहा कि- वरमें परिवर्तन कराना कता नहीं है । उसने अपना मनोरथ कह दिया । साधुने कहा - तथास्तु । सकता । प्रतिदिन खड़ी - मलाई श्रादि गरिष्ठ पदार्थ मिलने लगे । इससे उसे कमी प्रनपच हो जाती थी, और कभी कब्ज़ हो जाती थी । उससे वह पुरुष ण्डवाला बीमार रहने लगा । कभी कहीं उसे वायुका दर्द होता; कभी कोई अन्य 'प्रकम रोगकी शाखा निकल पड़ती । सुजात्मक नष्ठापिठ घरवालीको वह कहने लगा कि मुझे तुमने यह वर मंगवाकर बड़ी तकलीफ दी है । अब मैं प्राय: अस्वस्थ रहने लगा हूं । पहला वर ठीक ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५११ था, उसमें मुझे अस्वस्थता तो कभी होती ही नहीं थी । यह कहकर वह फिर उस साधुके पास गया । उसकी १५ दिन फिर सेवा - शुश्रूषा की । साधुने कहा कि- फिर कैसे प्राये? उत्तर दिया- इस वरसे तो मैं घबड़ा गया हूँ । रोज मीठा खानेसे में उकता गया हूं, और अस्वस्थ भी रहने लगा हूँ । ग्राप फिर वही वर दीजिये कि - टट्टी - पेशाव खुला श्रा जाया करे । साधुने ' तथास्तु ' कह दिया । अव वह पूरा स्वस्थ हो गया । उस वरकी शक्ति से उसे योग्य भोजन भी स्वतः प्राप्त हो जाता था । इस कहानीको नहीं देखना है । यह तो प्रर्थवाद है - इसका तात्पर्य देखा जाता है कि- टट्टी - पेशाब खुला श्रा जाया करे; तो पुरुष कमी अस्वस्थ नहीं होता । उसकी आयु बढ़ती है । इस प्रकार शूद्रका वेदाध्ययन हटवाना था; तब उस गौतमसूत्र में प्रथंवादसे बड़ा कठोर दण्ड लिखा गया । सो उसका वहाँ वेदाध्ययनका प्रबल निषेध करना ही तात्पर्य-विषय है । तब इसमें श्रवैदिकता क्या? वेदाध्ययनके निषेधसे ही वेदके तीन काण्डों- वैदिक कर्म तथा वैदिक उपासना और वैदिक ज्ञानका स्वतः निषेध हो जाता है । सृष्टिकी आदिसे लेकर स्वा.द.से पूर्व तक किसीने भी शूद्रका वेदमें तथा उसके तीनों वैदिक - काण्डोंमें अधिकार नहीं माना । इसीके फलस्वरूप श्रीरामने वैदिक - द्विजोंवाली उपासना - तपस्या करनेवाले शूद्रको दण्डित किया । उसका परिणाम यह हुआ कि फिर इतिहास में शूद्र - द्वारा इस काण्डकी प्रवृत्ति नहीं आई । पूर्वपक्ष - ' समानो मन्त्रः समितिः समानी... समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः ' ( ऋ. १०।१ १।३ ) इस मन्त्रसे सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्रोंका समान - मन्त्र कहना भी वेदोंके सर्वाधिकारको समर्थित करता है ' ( उत्तरपक्ष ) यह भी ठीक नहीं । यह ऋत्विजोंकेलिए कथन है - चातुर्वर्ण्य-केलिए नहीं । इस विषय में पृ. ३५ ९ -३६१ देखिये ।
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५१२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पूर्व- इससे सिद्ध हुआ कि सभी शूद्रविषयक निषेध कर्मकाण्डके, यज्ञादिकेलिए है; गौतमका वचन तो अवैदिक होने से प्रादर्तव्य नहीं है । इस व्यासदर्शनमें अपशूद्राधिकरण भी नहीं है, उस अधिकरण के गौतम-वचनके प्राश्रित होनेसे और गौतमके व्यासकालसे भिन्नकालीन होने से उस सूत्रका आशय इसमें किसी प्रकार भी नहीं घटता । उत्तरपक्ष — जब वादीके अनुसार सभी शूद्र - विषयक निषेध कर्म-काण्डपरक ही हैं; उनका अध्ययन भी कर्म है । कर्ममें वादी शुद्रको स्वयं अनधिकृत मानता ही है । वेदमें ज्ञानकाण्ड तो क्वाचित्क । तब इनमें शुद्रका अनधिकार तदवस्थ ही रहा । गौतमवचनकी अवैदिकता में कुछ भी प्रमाण वादिद्वारा नहीं दिया गया है । दण्डको कठोरता से वैदिकता नहीं हो जाती । बल्कि शूद्रकी वेदानधिकारिता ही इस दण्डपारुष्यसे सिद्ध हो जाती है । गौतम व्यासकालसे भिन्न भले ही हों; पर श्रीव्याससे पूर्बके हैं; और गौतमवचन वैयासिक - सूत्रके अक्षरोंसे भी निकल रहा है, अतः श्रीव्यासको वह सम्मत ही है । वादीको ' श्रवणाध्ययन ' सूत्रके अपने भाष्य में बलात्कार करनेपर भी ऐसा कोई स्मृतिवचन नहीं मिल सका, जिससे अध्यात्मविद्याके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थं जाननेका शुद्रको साक्षात् निषेध किया गया हो; ऐसा तो गौतमधर्मसूत्रमें उद्धृत उक्त वचन ही है, या श्मशानवाला वचन है । जो ब्रह्मसूत्रके सूत्रसे पूरा मेल खाता है । अन्य सभी भाष्यकार प्राचार्योंने भी उसीको उद्धृत किया है, यह आगे बताया जावेगा; यह वादीकी संस्कृतभाष्यकी प्रापत्तियोंका निरसन हमने कर दिया, अतः वादीका पक्ष प्रसिद्ध हो गया । कई लोग जानश्रुतिको निमूं लतासे शुद्र मानते हैं; पर वादीने उसे इस भाष्य में क्षत्रिय माना है - यह अन्य प्रतिपक्षियोंको जान लेना चाहिये । ( ख ) अब वादीने इस विषय में हिन्दी में भी कुछ लिखा है, हम उसके अपेक्षित अंशपर भी कुछ विचार रखेंगे । वादीके यह शब्द हैं - ' समाधि-ब्रह्मसूत्र के ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५१३ द्वारा भी मैंने इसका पूर्ण विचार किया, परन्तु मुझे यहां अपशूद्राधिकरण . प्रतीत नहीं हुआ ' ( पृ. ५१ ) । ( विचार ) समाधि में श्रीगान्धिजीकी ' हरिजन मन्दिर की आवरण पड़ा हुआ होगा; अतः परम्परासे आया हुआ ' अपशूद्राधिकरण छायाका भी वादीको प्रतीत नहीं हुआ । प्राश्चर्य है कि- फिर श्रीशङ्कराचार्य ' • श्री रामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीवल्ल गचार्य, श्रीनिम्बार्काचार्य, पण्डित भगवत्पादाचार्य यह सब क्या अविद्वान् थे; वा उनकी, यति- ६ कुछ न्यूनता थी, जोकि -मभीने यहाँ ' अपशूद्राधिकरण ' स्वीकृत ग्रहणशक्ति किया । ? " इस प्रकरणमें शूद्रका नाम भी नहीं है " यह कथन गलत है-तदनादरश्रवणात् तदाद्रवणात् सूच्यते हि ' शब्द दहीमें माखनके समान विद्वज्ज्ञेय है, छान्दोग्योपनिषद्के ' जानश्रुति ' के शाब्दिक श्राशङ्का दूर करनेकेलिए प्रतीत हो रहा है । " व्यासके समय तक समाज में शूद्रकी " सुगम्य ( ११३१३४ ) इस सूत्र I और वह ताण्ड्य महाब्राह्मणको अ शूद्रत्वमें वास्तविक शूद्रत्वयं दय है कि यह ' अपशूद्राधिकरण ' य क कोई नियत परिभाषा नहीं घु थी " । ( वि. ) यह भी बात ठीक नहीं । ' पद्भ्यां शूद्रो प्रजायत ' यह वेद-कालसे ही शूद्रकी जन्मसिद्धता स्पष्ट हो रही है । ' तपसे ( कृच्छ्रकर्मणे ) शूद्र ' ( यजुः माध्यं. ३०।५ ) में भी । क " चाहे जो शूद्र हो सकता था; और चाहे जो ब्राह्मण बन सकता था " ( वि. ) यह बात भी वादीकी गलत है । शूद्र तो एक निन्दित वर्ष है; तव वादीके अनुसार ' शूद्र ' बनना भला कौन पसन्द कर सकता था? युधिष्ठिर भीमसेन दोनोंके परस्पर विरुद्ध गुणकर्मा होनेपर भी उन्हें जन्मसे क्षत्रिय कहा गया है । अश्वत्थामाके, ब्राह्मण विरुद्ध गुणकर्म होनेपर भी उसे महाभारतमें ब्राह्मण कहा गया है शूद्र नहीं; धर्मव्याध तथा बिदा वाट यह स ० ध ० ३३ f
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] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ५१३ ५१४ ब्राधिकरण प्रादिके ज्ञानी होनेपर भी उन्हें ' शूद्र - योनि कहा गया है । इससे स्पष्ट है कि- वर्णव्यवस्था उस समय भी थी; और जन्मसे थी । गुणकर्मानुसार छायादा नहीं थी । दाधिकरण ' जो, जो बनना चाहे, सो वन सकता था ' यह बात जैसा कि बादी ङ्कराचार्य, कहता है- नहीं थी । उपनिषद् श्रीवेदव्याससे पहले थे । उपनिषद्के यति क्षत्रिय ब्रह्मविद्याभिज्ञ होते हुए भी क्षत्रिय ही कहे गये, ब्राह्मण हणशक्ति नहीं । वे ब्रह्मविद्याऽनभिज्ञ भी जन्म - ब्राह्मणोंको ब्राह्मण ही मानते थे; किया? और उनका सम्मान भी वही ब्राह्मणों वाला करते थे, उनसे घृणा नहीं है - शुगम्य करते थे । उपदेष्टा एवं गुरु होनेपर भी क्षत्रिय उन ब्राह्मणोंका उपनयन सूत्र नहीं करते थे; अर्थात् उनमें शिष्यभाव श्रसञ्जित नहीं करते थे । उन्हें हाब्राह्मणवो अपने गुरु जैसा मानते थे । महाशय, यह कहनेवाले आपके मस्तिष्कपर शूद्रव दयानन्दियोंका कुप्रभाव पड़ा हुआ प्रतीत होता है । आपने आवेशमें श्राकर प्राधिकरण यह अनर्गल बातें लिख दी हैं । आप गम्भीर होकर आलोचना किया करें । क्रोधमें, आवेशमें, तैशमें न श्रा - जाया करें । अपने पुराने सनातनधर्मसे घृणा करना छोड़ दें । भाषा नहीं यह वेद- " यदि महाभारतके यही व्यास हैं, तो उसमें यही लिखा है, जो मैं च्छ्रकर्मणे । कह रहा हूँ " । ( वि ) वादीपर विद्वत्ताको अन्तिम अवधि नहीं है । यह कथन वादीका भ्रमपूर्ण है, पहले हम इसका संकेत दे चुके हैं । बन सकता " जहां - तहां पुराणों में भी ऐसा लिखा है, जैसा मैं कह रहा हूँ " यह निन्दित वर्ष बात ठीक नहीं । ऐसे जो महाभारत वा पुराणके वचन प्रतीत होते हैं; कंता पा! उन सबका समाधान हम ' आलोक ' ( ८ ) में कर चुके हैं । वैसे प्रमाण भी उन्हें । केवल कर्मके प्रशंसार्थवाद हैं; वैसी वर्णव्यवस्था बताने वाले नहीं हैं । कर्म होने " उपनिषदोंमेंभी यही लिखा है, जो मैं कह रहा हूं " यह बात भी तथा वि वाटीकी ठीक नहीं । जो आप कह रहे हैं; वह निर्भ्रान्त सत्य ही हो, यह भी ठीक नहीं । उपनिषदोंमें ही कई ब्राह्मण, क्षत्रियोंके पास ब्रह्म-विद्याध्ययनार्थं गये; वे उपदेशक क्षत्रिय भी क्षत्रिय ही माने गये हैं, ब्रह्मसूत्र के ' वैदिकभाष्य पर विचार [ ५१५ उपदिश्यमान ब्राह्मण भी ब्राह्मण हो रहे हैं । अतः वादीका प्रात्म - विश्वास भ्रान्तिमा का ही दुर्विलास है । " तब व्यास यहाँ ' अपशूद्राधिकरण ' कैसे लिखते? तब तक शूद्र कोई नियत प्राणी नहीं था, तो भी, नियत था, तो भी अपशूद्राधिकरण कैसे • लिखा जा सकता था? " • यह बात भी ठीक नहीं । चार वर्ण वेदकालसे ही चले प्राये हैं । प्रासङ्गिक अधिकारिनिरूपणके अवसरपर शूद्र उसमें प्रनधिकारी ही है-' यह सूचित करना ही ' अपशूद्राधिकरण ' का लक्ष्य है । नहीं तो उक्त प्रकरण में प्रतीत हो रही हुई जानश्रुतिकी शूद्रताका खण्डन न किया जाता । इस खण्डनसे ही इस प्रकरणकी ' अपशूद्राधिकरणता ' सिद्ध हो रही है । ' मैं नहीं मानता, परन्तु लोग कहते हैं कि - व्यासने ही एकके चार वेद किये । वैदिकभाष्य में मैं एक प्रमाण भी महाभारतका लिख प्राया हूँ ' जब आप भी एक प्रमाण ऐसा लिख आये हैं; तब ' लोगोंका कथन ' यह कैसे मानते हैं? और फिर उस प्रमाणको मानते भी क्यों नहीं? पहले मन्त्र - ब्राह्मण ऋचा, यजुः, साम विकीर्ण थे, श्रीव्यासने उनको मन्त्रक्रमसे ही विभक्त कर दिया, बनाया नहीं; अतः इसकेलिए उनका नाम ' वेदव्यास ' प्रसिद्ध हो गया; निर्माणसे नहीं । श्रीपाददामोदर-सातवलेकरने ' दैवत -संहिता ' प्रकाशित की है । जिसमें वर्तमान चार वेद-संहिताओंके प्रत्येक देवताके मन्त्रोंका सङ्कलन है । सो यह सातवलेकर-जीका निर्माण नहीं है; किन्तु एक - एक देवताके पृथक् - पृथक् मन्त्र एक स्थान संगृहीत कर दिये हैं. । " यदि व्यासजी वेदके व्यसिता थे; तो चारों वेदोंके अक्षर एक बार उनकी दृष्टिमें अवश्य आा चुके होंगे । एक भी मन्त्र, श्रधा भी मन्त्र, मन्त्रका कोई भी भाग वह बता सकते थे कि जहाँ वेदोंका अध्ययन शूद्रोंकेलिए निषिद्ध हो ' ।
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५१६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वादीका यह प्राक्षेप स्वयं उसके अपने कथन से भी व्याहत है । क्योंकि शूद्रोंको वादी भी कर्ममें अन्य श्राचार्योंकी भांति अनधिकृत मानता है । अध्ययन भी कर्म है, सो शूद्र उसमें अधिकृत कैसे हो सकता है? और यह भी बताया जावे कि - वादी क्या इन्हीं चार पोथियों-को चार वेद मानता है? वस्तुतः यह अज्ञान है । ११३१ संहिता, उतने ही ब्राह्मण, उतने धारण्यक, उतनी ही उपनिषदें यह सारा साहित्य ' चार वेद ' है । वादी यह बात यदि नहीं मानता; तो वह बतावे कि - सामवेदकी कौथुमी संहिता सामवेद है, वा राणायनी संहिता? ' स्वा. द. तथा उनके अनुयायी ' कौथुमसंहिता ' को सामवेद मानते हैं, और बादी यदि वेद-विषय में आर्यसमाजको मान्य करता है; तब राणायनी - संहिता सामवेद न रही; तब वादीने उस राणायनी -संहितापर भाष्य कैसे किया? तब वैसा लिखना चाहिये था । आपने उसपर ' सामवेद ' - संहिता कैसे लिख दिया? वादीका मत भ्रान्त है । यदि वेदकी सभी संहिता ' वेद ' सिद्ध हुई; तो ११३१ सभी संहिताएं ही ब्राह्मण सहित ' चार वेद ' सिद्ध हुई; तब केवल ' वर्तमान चार संहिता ही वेद हैं, अन्य नहीं ' यह ग्राजकलका मत भी भ्रान्त सिद्ध हुआ; क्या यह वादी मानता है? यदि हाँ; तो इसी प्रकार उतनी ही मन्त्र - संहिता ( ११३१ ), उतने ही ब्राह्मण, उपनिषदें और धारण्यक भी मिलकर ' चार वेद ' निष्पन्न हुए; क्योंकि - ' मन्त्र - ब्राह्मणयोर्वेद - नामधेयम् ' यह ' प्राचीन-सिद्धान्त ' है; ' समस्त ' होनेसे इसमें केवल मन्त्र वा केवल ब्राह्मणको पृथक् नहीं किया जा सकता । वैसा करनेपर फिर ' ११३१ प्रकारका मन्त्र भी ' चार वेद ' नहीं बनाया जा सकता । यदि वादी इस मतको मान लेता है; तो उसका वेद - सम्बन्धी आर्यसमाजियोंवाला मत भी कि - ' यह वर्तमान च महिता ही वेद हैं ' यह कट गया । और उसका ' राणानीय - संहिता ' पर भाष्य भी ' सामवेद संहिता ' का भाष्य सिद्ध न हुआ । ब्रह्मसूत्र के ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५१७ इसी वादीके प्रभिमत वेदों में भी जिसे व्यासजीने था- " वेदमाता... द्विजानां ( प्र. १६७१११ ) यह शब्द पूर्वसे प्रद्विज ही देख रखा । वेदको निरुद्ध कर रहे हैं । क्योंकि- प्रद्विज - शूद्रका कार्य - शूद्रों के लिए । बिंदु: है कि प्रजा मन्य सेवा, प्रजाके राष्ट्रकी रक्षाकेलिए प्रस्थ शस्त्रादि निर्माण करे धर्मश कृच्छ्र - कर्म है । ' तपसे शूद्र ' ( यजुः ३०१५ ) में श्राजके सभी । यह बड़ा ' तप ' का अर्थ ' कृच्छ्र- कर्म ' सेवा ही माना है; सो शूद्रको सुधारकोरे ( वेद रास्ता दिखा दिया जावे; तो यह उसे उन कृच्छ्र - कर्मोंसे विरत यदि वेदा मुनिर इससे भारी राष्ट्र - द्रोह हो जायगा । यह वेदविरुद्ध मार्ग होगा कर । देगा । विषय “ इतनी मूर्खतापूर्ण बात वेदोंमें हो ही नहीं सकती । यदि हो सकती धर्मश तो वह ईश्वरीय ग्रन्थ ही नहीं है " । देख लिया पाठकगण यह वादीकी वेदमें श्रद्धा है!!! तब क्या प्रत्यर तक जितने प्राचीन प्राचार्य हो चुके हैं, जिन्होंने शूद्रका वेदमेध्यधिकार इ. नहीं माना; वे हो मूर्ख थे! क्या विद्वत्ता की सीमा वादीकी ही अपनी बुद्धि है व्यवह जिसमें उनके वैश्य - गुरुजीका शूद्रको ऊंचा चढानेका कलुषित जंग पहा प्रमुख हुआ है । धौर वादीकी बुद्धि भी तो अस्थिर है । ' दास ' से शुरू करते चे अच ' प्राचार्य ' बन बैठे । इस ९ ३ वर्षकी अवधि में उनके कितने विचार परिवर्तित हुए, विलीन हुए, नये निकले । अभी अन्य उनके नये स्वंय. विषय चारानुसार विचार निकलते रहेंगे । वहुत्तोंको मूर्ख बनाने के बजाय एको लोक ही ' मूर्ख ' क्यों न मान लिया जाय? इति प्रमाण न्यायदर्शनके ४ | १ | ६२ सूत्रके वादिप्रतिवादिमान्य श्रीवात्स्यावर करती भाष्य में संन्यासाश्रमकी सिद्धि करते हुए कहा गया है - ' अप्रामाये | अपने-धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपाद् लोकोच्छेद - प्रसङ्गः ' ( यदि घरे शास्त्रको श्रप्रमाण माना जावे; तो लोकव्यवहारका उच्छेद हो सकत है ) । ' द्रष्टप्रवक्त - सामान्याच्च अप्रामाण्यानुपपत्ति: ' ( वेदादि तथा धर्म- नाक शास्त्रादिके द्रष्टा एवं प्रवक्ता समान हैं; अतः धर्मशास्त्रोंको अप्रमाण में विषय-नहीं माना जा सकता । इसीको ' स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाव्यं भ्राप्यविवे अधिक यज्ञमें
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[ ५१० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) देखरखा भाष्यकी परिभाषासे भाष्यकार स्वयं स्पष्ट करते हैं - ) ये एक -शूद्रोंके लिए विदु: ' इस [ वेदस्य ] द्रष्टारः प्रवक्तारश्च; ते खलु इतिहास - पुराणस्य के - प्रजादी मन्त्रब्राह्मणस्य च [ द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ] ( जिन्हीं ऋषि - मुनियोंने मन्त्र ब्राह्मण यह बड़ा धर्मशास्त्रस्य समाधि में दर्शन एवं मुखसे प्रवचन किया है; उन्हीं ऋषि-सुधारकाने ( वेद ) का [ मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदके भाष्यभूत ] इतिहास - पुराण तथा यदि वेदा मुनियोंने दर्शन एवं प्रवचन किया है कर देगा; धर्मशास्त्रों का ' ( मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद 1 विषयं प्रामाण्यम् धर्मशास्त्रोंकी विषयविभागानुसार अधिक हो सकती वार्तिकको भाष्यकार स्पष्ट करते हैं ) ' प्रन्यश्च इतिहासपुराण - धर्मशास्त्राणामिति क्या व । ' विषयव्यवस्थानाच्च यथा-तथा इतिहास - पुराण तथा प्रमाणता है । इस अपने श्रन्यो मन्त्र- ब्राह्मणस्य विषयः, । धिकार यज्ञो मन्त्र - ब्राह्मणस्य [ विषयः ], लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, लोक-नहीं व्यवहारव्यवस्थापनं च धर्मशास्त्रस्य विषयः । ( मन्त्र- ब्राह्मणात्मक वेदका बुद्धि है; जंग प्रमुख विषय अन्य है, और इतिहास पुराण तथा धर्मशास्त्रका प्रमुख विषय चढ़ा ग्रन्य है । मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेदका प्रमुख विषय यज्ञ है । मन्त्र ब्राह्मणात्मक शुरू करके तने विचार वेदके उदाहरण - प्रत्युदाहरणभूत भूताथवादरूप इतिहास - पुराणका प्रमुख नये स्वेच विषय लोकवृत्तका प्रतिपादन है, और धर्मशास्त्रोंका प्रमुख विषय जाय एक् लोकव्यवहारकी व्यवस्था करना है । ) ' तत्र एकेन न सर्व व्यवस्थाप्यते-इति यथाविषयम् एतानि ( मन्त्रब्राह्मण - इतिहासपुराण - धर्मशास्त्राणि ) प्रमाणानि इन्द्रियादिवद् इति ' ( एकसे सारी व्यवस्थाए कभी नहीं हुआ प्रामाण्येर वात्स्यायन- करत; अत: यह मन्त्र ब्राह्मण, इतिहास - पुराण तथा धर्मशास्त्र ( स्मृतियाँ ) ( यदि धर्म- अपने - अपने विषयमें इन्द्रियोंकी भांति अधिक प्रमाण हैं । हो सक · जैसे इन्द्रियां अपने - अपने प्रमुख विषय में अधिक प्रधान होती हैं, जैसे तथा धनं- नाक अपने प्रमुख - विषय - सू ंघने में अधिक प्रमाण हैं, प्रांख अपने प्रमुख-प्रमाण विषय - देखने में अधिक प्रमाण है, जीभ अपने प्रमुख विषय रस लेने में भ्राप्यविके प्रधिक प्रमाण है; वैसे ही मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद अपने प्रमुख विषय यज्ञमें ' अधिक प्रमाण हैं । इतिहास - पुराण ' अपने प्रमुख विषय लोकदृत्त-ब्रह्मसूत्र के ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५१६ बताने में अधिक प्रमाण हैं । धर्मशास्त्र ( स्मृतियाँ ) अपने प्रमुख विषय लोकव्यवहारकी व्यवस्था करनेमें अधिक प्रमाण है । मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेद तो उन सब इतिहासपुराण तथा धर्मशास्त्रोंके मूल देखने में कारण होनेसे सबसे बड़े हैं कि इतिहासपुराणादिमें उस मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेदसे कहीं विरुद्धता न आ जाये । साक्षात् विरोध श्राने-पर वे इतिहास - पुराणादि उतने अंशमें श्रप्रमाण हैं । पर यदि साक्षात् विरुद्धता न हो; और न ही उसका मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदमें अनुमोदन हो; तब ' विरोधे त्वनपेक्षं स्याद् श्रसति ह्यनुमानम् ' ( १ ९ ३३ ) ( यदि स्मृत्यादि वचनका वेदसे साक्षात् विरोध हो; तो वह उतने में श्रप्रमाण होनेसे उपेक्षणीय हैं; यदि वेदसे उनका साक्षात् विरोध न हो; तब उसे प्रमाण ही मानना चाहिये, और यदि उसका अनुमोदन वेदमें न मिले; तो अनुमान कर लेना चाहिये कि यह किसी लुप्तसंहितामें होगा । ) यहाँ यह बात याद रख लेनी चाहिये कि - ' मन्त्र ' से ११३१ संहिताएं, तथा ब्राह्मणसे ब्राह्मणग्रन्थ और उपनिषदें एवं प्रारण्यक लेने चाहियें, क्योंकि यह सारा साहित्य चार वेद हैं । इस वात्स्यायन के वचनको आर्यसमाजके रिसर्च स्कालर श्रीभगवद्दत्तजी बी.ए. ने भी प्रमाण माना है — यह हम ' आलोक ' के किसी पुष्पमें उनके ' भारतवर्षका वृहद् इतिहास ' से उद्धृत कर चुके हैं । कभी प्राप वेदोंको अपौरपेय मानते हैं, कभी पौस्थेय | कभी राम-सीता प्रादि वेदसे निकल पड़ते हैं, कभी वे अवैदिक बन जाते हैं । आपमें चित्तस्थैर्य न होनेसे ' समाधि ' भी नहीं हो सकती । अतः श्रापका मत ही अमान्य है । श्राप वेदको ईश्वरीय ग्रन्थ मानते हो कहां हैं? उसकी त्रुटियां निकालते रहते हैं, देखिये अपनी भाष्य - भूमिकानोंको । " पारसियोंकी पवित्र किताबको, ख्रिस्तियोंकी पवित्र किताबको, मुसलमानोंकी पवित्र किताबको यदि मनुष्यमात्र पढ़ सकता है, तो हिन्दुओं की पवित्र किताब [ वेद ] को कमसे कम प्रत्येक हिन्दु अवश्य
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५२० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पढ़ सकता है? " ( उ. ) वे लोग द्विजेतर हैं, ' न शयानः पतत्यधः ' के मनुसार पहले से ही निम्न हैं, यदि उनमें अधिकागनधिकार - विचार नहीं है, वह ठीक है । पर उच्च वेद में अधिकारानधिकारचिन्ता तो स्वाभाविक है । तभी तो वेदकेलिए उपनयन पहरा जाता है, और वह उपनयन कोंका होता है, प्रत्रैवर्णिकोंका नहीं; तब क्या उन अत्रैवर्णिकोंको प्राचीन प्राचार्योंका अधिकार न देना - यह ' जंगलीपन ' है? वादीके अपने विचार भी ' जंगली ' हुए । क्योंकि जब वादी शूद्रको कर्म में अनधिकृत मानता है; उसमें अन्य कात्यायन- जैमिनि श्रादिकी साक्षी भी बताता है; तब वेदाध्ययन भी तो ' कर्म ' ही है, तब उसमें अनधिकृत ' शूद्रको अधिकृत करना ' क्या वादीका अपना ' जगलीपन ' नहीं: व्याघात नहीं? अव ' आलोक ' पाठकगण वादीका ' नागरिकत्व ' (? ) भी देखें । लिखते हैं--" परन्तु इससे बढ़कर दूसरी जंडता और जंगलीपन नहीं हो सकता, कि- ईश्वरको जगत्स्वामी बनाना और वह जगत् के अमुक - लोगोंकों ज्ञानोपदेश करे, और प्रमुकको मूर्च रखे । उस ईश्वरसे अधिक दुष्ट और प्रयोग्य कोई हो ही नहीं सकता, जो हिन्दुओंोंको ज्ञान - गुटका दे, और १०० वर्ष पूर्ण होने तक मुसलमानों, पारसियों, ख्रिस्तियोंको अन्धेरेमें रखे । ऐसे रागी, द्वेषी, पक्षपाती और कलह करानेवाले ईश्वरकी जगत्को क्या आवश्यकता है? " देखा पाठकगण! यह ईश्वरको कितनी ' भीषण उपाधियां ' (? ) दी गई हैं । जब तक आप भगवान् के ' दास ' थे; तब तक तो ईश्वरको ज्ञान था; जब प्राप उस भगवान्के ही ' प्राचार्य ' ( भगवदाचार्य ) बन बैठे; तब ईश्वर अज्ञानी हो गया; अब उसको गालियां क्यों न मिलें? अरे! भाई! भगवान् की निष्पक्षता देखो, उसने केवल मुसलमानों प्रादिकेलिए अपने पवित्र ग्रन्थका द्वार बन्द नहीं रखा; बल्कि हिन्दुनों में भी त्रैवर्णिकेतरकेलिए; बल्कि ब्रह्मबन्धुकेलिए भी वेदके द्वार बन्द रखे हैं । ब्रह्मसूत्र के ' वैदिकभाष्य ' पर विचार राजाका भवन प्रत्येक नहीं देख सकता; वही देख सकता प्रमाण - पत्र प्राप्त है, ' परमिट ' मिला हुआ है । अन्य नहीं है जिस इसमें कोई विरुद्धता नहीं । कुछ भी जंगलीपन नहीं । देख सकता । सकता वेदाधि • वह प्रमाण - पत्र ( परमिट ) है ' द्विजत्वापादक उपनयन ' । तव ईश्वरक चाहते हुए भी तद्भिन्नोंको वेद उनके गलेमें बलात् मढकर उन्हें प्राप वेद अपने ही लोगोंको दूसरोंसे मरवाना चाहते हैं? यही ग्रापका भ प्रेसके है, यही ' सहिष्णुता ' है । अपने राग - द्वेष, कलहप्रियता क्रोधनत्व ' ब्रह्ममारे ' ऐसा पक्षपातको ईश्वर में संक्रान्त कर रहे हैं? क्या यही ' ब्रह्मसूत्र , प कोई प्र का वैदिक भाष्य है? यह तो श्राप उन ज्ञानलवदुर्विदग्धोंक कुतकोंको अपनाहर उसका स्वयं ' हैतुकी ' बनकर अपनी विद्वत्ताका दिवाला निकाल रहे है!! " या धन " ऐसा ही यदि ईश्वर होता है; तो हिन्दुस्तानमें आज १०० हो जा -२ ॥ साहित्य या ४० करोड़ ईश्वर मौजूद हैं; जिनके सिरपर अग्रजोंने दोसी ब अचल और अकम्प पैर रख छोड़ा है " महाशय, अब वह पांव चल जा रही अकम्प नहीं रहा । अव अंग्रेज भी नहीं रहा । श्रव अंग्रेजोंके दू पठनकाI सस्करण नाप - जैसे पधारे हैं । पता नहीं इन श्रप्रासङ्गिक बातों से दूर जाते ह अमूल्य समयको खराब करना - क्या यही ' वैदिक भाष्य ' है? यही महाशय स्थिरचित्त - व्यक्तियोंका राग (? ) है । ( मनु. " वेदवक्ता जानते ही होंगे कि - ' यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि ' होता है, यजुर्वेदके दयानन्दकाल से प्रसिद्ध मन्त्र के द्वारा आर्य और अनार्य जाता । प्रजाको वेदाधिकार दिया गया है । " रहें होत इससे सिद्ध हुआ कि - दयानन्दसे पूर्व एक अरब सत्तानवे करोड़ वर्षोंसे पूर्व तक उक्त - वेदमन्त्रका यह अर्थ नहीं था; यह तो सं. १६३३ है सुन बाद बलात् गढ़ा हुआ अर्थाभास है । तव दयानन्दका जो यह अर्थ है उपनयन-वह ईश्वरको भी सं. १ ९ ३२ से ही स्वीकार्य है? जब वादीको ही यहां शप्त्यर्थं स्वीकार्य नहीं, नहीं तो वह दयानन्दका नाम न लेता; तब दूसरेको है - नै स्वीकार्य होगा? इस विषयमें इस पुष्पके २ रे पृष्ठसे ५५ पृष्ठतकवादी प्रतिका पूरा पाल
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५२२ ] है मन्त्र से किसी भी प्राचीन प्राचार्यने सभी अन्त्यजान्तको - देख सकता हकता है । देना इस नहीं माना है; तब क्या यह कोई जोर - जबर्दस्ती है कि-| धिकार वही अर्थ माननेकेलिए वाध्य किया जावे? नव श्राप देश ईश्वरको " जिसे भी पढ़ना आता होगा, उसे वेद पढ़नेसे कौन रोकेगा? श्राज उन्हें भहारा ऐसके जमाने में तो वेदाध्ययन रोकनेवाला कोई पैदा ही नहीं हुआ है, नका ' ब्रह्मा ' ऐसा हो ही नहीं सकता " जिसका जिसे अधिकार नहीं होता; उसे यदि को घनत्व तर कोई प्रभुके कथन के खिलाफ हथिया लेता है; तो इसलिए क्या वह ' का वैदिक उसका अधिकार हो जायगा? कोई श्राततायी किसीकी लड़कीको को अपनाहरया धनादिको छीनकर भाग जावे; तब क्या उसमे उसका अधिकार बंध हे है!!! हो जावेगा? आजकल ही यह आपाधापी मची हुई है कि प्राचीन प्रा-ज १००- २० साहित्यका अनुसरण न करके डेढ़ चावलोंकी अलग - अलग खिचड़ी पकाई न दोसो बर्ष जा रही है । आप ही शूद्रका कर्म में अधिकार न मानकर भी उसे वेद-अचल पठनका कर्म देकर व्याघात करते हैं! जोके दू ' सिनेमानोंमें ज्ञानेश्वरके चित्रपटमें भैसके मुहसे वेदमन्त्र बोलाये बातोंसे दूर जाते हैं, श्रीर ब्राह्मण, शूद्र, - मुसलमान, खिस्ती सभी सुनते रहते हैं ", है? यही महाशय! इसका नाम वेदाध्ययन नहीं हो जाता । ' क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( मनु. २।१७३ ) क्रमसे विधिपूर्वक पढ़ने वा सुननेका नाम वेदाध्ययन मावदान होता है, अवैध तथा श्रक्रमसे वेदका पढ़ना वा सुनना वेदाध्ययन नहीं हो अनार्य से जाता । बाजारों में छोटे अनुपनीत वच्चे भी गायत्रीमन्त्रादि वेदमन्त्र बोल रहें होते हैं; इसका नाम वेदाध्ययन नहीं होता । नवे करोड़ की " अतः यह भ्रम टूट ही जाना चाहिये कि वेदोंको श्रमुक ही पढ़ सकता सं. ११३ ) है सुन सकता है, अमुक नहीं " । यदि ऐसा होता; तब उसके लिए त्रैवर्णिकों के ह अर्थ है उपनयन संस्कार को क्या श्रावश्यकता थी; जिसे प्राचीनोंने वेदके अधिकार-को ही यह शप्चर्थ द्विजोंके लिए नियमित कर दिया था ' । यजुर्वेद शतपथब्रा.ने लिखा दूसरेको है- ' नैव देवा प्रतिक्रामन्ति, न पितरो न पशवः । मनुष्या तकबादी मतिक्रामन्ति ' ( २२४१२६ ) ( देव पितर एव एक , पशु आदि तो अपने नियमों को पूरा पालते हैं; पर कई मनुष्य ही अपने लिए नियमित नियमोंका प्रतिक्रमण ब्रह्मसूत्र के ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५२३ कर जाते हैं । मनुष्योंका दो समय भोजन लिखा है, पर ग्राजके मनुष्य पाँच वार खाते हैं ) एक आप भी हैं; जो परमात्माको भी गालियाँ देते हैं; शायद उसे मानते भी न हों । तब वैसे व्यक्तियोंसे तो यही हाल बनेगा कि- ' मर्कटस्य सुरापानं तस्य वृश्चिकदंशनम् । तन्मध्ये भूतसञ्चारो यद्वा तद्वा भविष्यति ' । " गौतमने अपने धर्मसूत्रमें शूद्रोंका अध्ययन निषिद्ध किया है । परन्तु पहले यह बताना और विचारना चाहिये - वेदोंके विधिनिषेधका अधिकार गौतमको किसने दिया? ' ' ( उ. ) धर्मसूत्र, कल्पसूत्र, धर्मशास्त्र यह सव वेदके श्रङ्ग - उपाङ्ग होते हैं । वेदने जिसे संकेतसे लिखा है, उनको ऋषि - मुनियोंने उनमें स्पष्ट किया है; क्या वे आपसे श्राज्ञा लेने आते? और लोकव्यव-हारकी व्यवस्था भी धर्मशास्त्रोंके अधीन होती है, देखिये इसपर न्यायदर्शन ४ । १ । ६२ सूत्रमें वात्स्यायनभाष्य । इसे हम ५१७- ५१६ प्र. में स्पष्ट कर चुके हैं । तब क्या उनकी बात न मानकर अस्थिरमति - वादीको ही बात मानी जावे! जो वादी स्वयं तो शूद्रको कर्म में अनधिकृत मानता पर फिर उमे वेदाध्ययन रूप - कर्म में बलात् श्रधिकृत करता है । यही ' अस्थिरमति ' हुआ करती है । " प्रार्यावर्त में एक अन्धाधुन्धीका समय था, जिसके मनमें जो श्राता था; उसे ही वह लिख देता था; चोर प्रचार किया करता था " यदि यह आक्रमण धर्मशास्त्रोंपर है; तो यह वादीकी धींगाधींगी है । 1 क्या वे वादीकी इच्छा पूछकर ही लिखते? यह ऋषियोंका उनके ऊपर श्राया हुआ उत्तरदायित्व था कि वे समाधिद्वारा मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदको प्रकट करें; और फिर वेदके अङ्ग - उपाङ्गोंको वेदके संकेत देखकर धर्म-शास्त्र तथा इतिहास - पुराणका समाधिद्वारा सङ्कलन एवं सम्पादन करके लोकमें धार्मिक व्यवहार चालू रखें, जिससे वेदसे माई हुई लौकिक-व्यवस्था बनी रहे, उसमें वेदसूत्रोंके अनुसार धर्मशास्त्रोंको तो उन्होंने शासनरूपमें रखा; तथा इतिहास - पुराणको उन सूत्रोंके उदाहरण-प्रत्युदाहरणरूप में रखा । इसपर इतना याद रखना चाहिये कि वेद चार
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५२४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अवश्य हैं; पर उनके ग्रन्थ ११३१ संहिता; उतने ही ब्राह्मण, उतनी ही उपनिषदें, तथा उतने ही प्रारण्यकरूपमें हैं । उन्हींसे प्रङ्ग - उपाङ्ग धर्म-शास्त्र आदि दुहे गये 1 । इसमें किसीसे पूछने पुछाने की बात ही नहीं थी । उन्होंने वेदका आधार रखा था - अन्धाधुन्ध नहीं; पर प्राजके श्राप जैसे व्यक्ति अपनी विद्वत्ताके मदमें मत्त होकर सब गुड - गोवर कर रहे हैं । श्राप भी अन्धाधुन्धीसे जो इच्छा होती है, लिख दिया करते हैं । " लगभग याज भी वैसा ही है, अन्तर इतना है कि - प्राज विवेककी मात्रा बढ़ी हुई है " इसका तात्पर्य पहले अविवेकपूणता थी, प्रर्थात् आप विकासवादी हैं, ह्रास नहीं मानते । फिर वेद भी तो अधिक पूर्ण ही हुआ; जो द्विजोंको पवित्र करता है, ' वेदमाता... पावमानी द्विजानाम् ' ( अ. १६७११ ) द्विजेतरों ( शूद्रादि ) को नहीं । तभी तो सभ्य (? ) वादीकी प्रोरसे बेदके प्रवर्तकको भरपेट गालियां मिलीं (! ) " सब कथनका परीक्षण ग्राज होने लग गया है, अतः निश्चित ही ज्ञानमें कोई प्रतिबन्ध नहीं है । हां, कर्ममें प्रतिबन्ध होना आवश्यक हो सकता है । सब कर्म सब नहीं कर सकते " इसका भाव यह हुआ कि -सब ज्ञान सब कर सकते हैं, बलिहारी है!! अन्धेको रूपका ज्ञान, बहरेको शब्दका ज्ञान, उल्लूको प्रकाशका ज्ञान प्राप ही करा देंगे, धन्य! अरे! भाई! इससे प्रतीत होता है कि - प्रापको तो ज्ञान ही नहीं है । पहले ज्ञानसे कर्मको अवर माना जाता था, अब आप कर्मसे ज्ञानको ' अवर ' बना रहे हैं । ज्ञानको हलका बना रहे हैं । वस्तुतः कहा तो यह जाता है— ' दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय! ' ( ज्ञानसे कर्म श्रवर होता है ) ( गीता २२४६ ) छोटी आयुका छात्र हो; अपना पढ़ाईका कर्म सम्पन्न कर रहा हो; कहते हैं कि अभी इसमें समझ ( ज्ञान ) की कमी है । इससे स्पष्ट है कि - ज्ञानका दर्जा कर्मसे ऊंचा है, इससे ज्ञानके दर्जे सिरको ऊंचा पद दिया गया है; शेष कर्मेन्द्रियोंको क्रम - क्रमसे नीचेका दर्जा दिया गया है । इसी कारण ज्ञानके श्राश्रम - संन्यासको सव आश्रमोंसे ब्रह्मसूत्र के ' ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५५ y { ऊंचा रखा गया; उसमें अधिकार मन्वनुसार केवल ब्राह्मणको क्षत्रिय - वैश्यको भी नहीं; फिर शूद्र अन्त्यजोंका उसमें अधिकार दिया गया, बात रही; पर यह वादी महाशय कर्मपर तो प्रतिवन्ध तो दूर | भि श्रेयस्कर समझते हैं; पर ज्ञानपर नहीं । कर्म सीमित लगाना असीमित होता है; पर यह महाशय असीमित एवं होता है, शार अधिकाराऽनधिकारकी प्रावश्यकता नहीं समझते । अनन्त ज्ञानपर तो असीमित ज्ञानपर यदि पात्रापात्रका विचार नहीं रखोगे तो यदि नधिकृत व्यक्तिको डुबोवेगे ही; उससे भारतीय; उससे कि वह फिर उससे श्रोगान्धिजीके शब्दोंमें पाँव रखकर ' हिमालयसदृश ' भूल श्राप कितनी हानि न करवा बैठोगे! हो; तो वेदाध्ययन भी तो कर्म है कर रना है; तब उस पर वादी चरितार्थं नहीं कर रहा? राष्ट्रकी क्षति करों ॥ घा कहलाओगे ही कि हमने इस मार कर की । उसीके पीछे चलनेवालेकी में एक यदि कर्ममें शूद्रों का प्रतिवन्ध मान प्राप । उसपर प्राचार्योंने शूद्रका प्रतिम मान स्वयं ' यावज्जीवमहं मौनी ' को का ' नि " कर्म इच्छा और श्रावश्यकतापर निर्भर होता है । जिन्हें इच्छा ह आवश्यकता होगी, वे वह कर्म करेंगे । जिन्हें यह दोनों न होंगी, वे म झंझटसे अलग रहेंगे । ब्रह्मज्ञानी भी तो कर्मसे घृणा (? ) करता है । मे इच्छा नहीं है, आवश्यकता भी नहीं है, उसे कोई कर्मानधिकारी कहे में, अना तो उसे क्या दुःख है? कर्मके अनेक प्रकार हैं, सभी कर्म वैदिक हैं । कोई घट बनाता है, कोई पट बनाता है, कोई मठ बनाता है, कोई हजामत कक्ष बनाता है, कोई यज्ञ करता है, यह सभी वैदिक (? ) कर्म हैं । इनमें वह कर्मोंको सभी नहीं कर सकते । अतः कात्यायनने अपने सूत्रोंमें सूत्रों कर्मो er धधिकारी बताया । जैमिनिने मीमांसादर्शनमें ' अपशूद्राधिकल दिय बनाया - यह सब उचित हो सकते हैं, परन्तु ज्ञानमार्ग में, भक्तिमार्ग में मु कैसे को अधिकार देना और अमुकको न देना यह निर्लज्जताकी बात हैं " । ने विद्वान् जन समझ सकते कि- वादीने कितनी - कहना हो र है ।