सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 291–300

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 291–300

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[ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५२५ ५२६ ] दिया गया - नासमझीकी बात लिखी है । ज्ञानमार्ग तथा भक्तिमार्ग दोनों र तो, चाहिये हैं । भक्तिमार्ग तो ' कर्म ' है । यदि शुद्र किसी कर्मको करना दूरी भिन्न - भिन्न लगाना बाहे; भीर भ्राप उसमें उसका नियन्त्रण करें; उसे दण्ड दें; तत्र क्या ता है, ज्ञान आपसे स्वातन्त्र्य_पाया हुआ वह इसे अत्याचार न मानेगा? यदि उसे ज्ञानपर हो नहीं मानना चाहिये; तब तपस्या - रूप कर्मको कर रहे हुए शम्बूक - शुद्रको यदि श्रीरामने दण्डित किया; क्योंकि वह उस कर्मका अनधिकारी था; उससे चि वह ब्राह्मणका कर्म था; उसका नहीं; और था भी कर्म, ज्ञान भी नहीं क्षति करोंगे था । तत्र प्राप इसपर वायवेला क्यों मचाते हैं? क्यों उसे । इस मानें करनेवाले श्रीरामको दाशरथि - रामसे भिन्न कहते हैं? क्यों श्रीगमको निवालेकी एक तरीके से आततायी प्रसिद्ध करते हैं? शम्बूक शूद्रके बत्रपर यदि वन्धमा प्राप आर्थिक दृष्टिसे देखें; तब भी आप श्रीरामद्वारा उसके वधको युक्त का प्रतिवन ` मानेंगे । देखिये- इसपर ' आलोक ' ( १० ) पृ. ( ५८०-५८३ ) । नी ' को का यदि कर्मपर अधिकारानधिकारका अस्त्र चलानेको तो आप ' ' निर्लज्जता ' नहीं मानते, तब ज्ञानपर भी पात्रापात्रका विचार करके हें इच्छा व उसपर अधिकारानधिकारका प्रतिबन्ध लगानेको ' निर्लज्जता ' कहनेकी नी, बेन घृष्टता कैसे करते हैं? ' अधिकार और अनधिकारको वात ' सबलता और ता है । मे । निर्बलतापर आधृत ' माननेका क्या अर्थ है? जबकि कर्ममें शुद्रका मारी कहे अधिकार आप भी मानते हैं । हैं । कोई " एक बात और जाननी चाहिये । ऋग्वेदके १।११६ वें सूक्तका ऋषि कोई हवामन कक्षीवान् है, वह अङ्गराजकी दासी पटरानी (? ) से उत्पन्न हुना था ॥ इनमें दी वह ब्राह्मण नहीं था, तथापि वेदऋषि बना " । शु यह वादीकी बात सर्वथा निर्मूल है । दासीको वादीने पटरानी बना शूद्राधिकवं मार्ग में ' दिया । कक्षीवानका उत्पादक एक ब्राह्मण ऋषि था; तब कक्षीवान् शूद्र कैसे हो गया? आप जिसपर इस विषयमें श्रद्धा कर रहे हैं, उस श्रीसायण-बात है । ने भी कक्षीवानको ब्राह्मण बताया है । वेदने भी उसे ब्राह्मण बताया कहना तो है । महाभारतने भी उसे ब्राह्मण बताया है । यह हम इस पुष्पमें सप्रमाण ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५२७ पू. ३५२-१६३ में लिख चुके हैं; तव इससे ' शूद्रको वेदाधिकार कैसे सिद्ध हुग्रा? यह शूद्रोंकी हिमायत करनेवाला वादी ही बतावे! " उसी कक्षीवानकी पुत्री घोषा ऋग्वेदके १० म मण्डलके अनेक मन्त्रोंकी ऋषिका है । अगस्त्यस्वसा, श्रदिति, इन्द्रस्नुषा, गोधा, नदी, यमी, सरमा, सूर्या, उवंशी, प्रात्रेयी, इन्द्राणी, शिखण्डिनी आदि अनेक स्त्रियां ऋग्वेद में ऋषिकाएं हैं " । यह मानुषी स्त्रियाँ नहीं हैं । ऋषि तथा ऋषिका वेदाध्ययन करनेवाले नहीं होते; उन्हें स्वतः कई एक प्राध मन्त्र स्वतः, विना श्रध्ययनके-जैसेकि निरुक्तभाष्यमें श्रीदुर्गाचार्यने भी लिखा है- ' अनधीतमेव तत्त्वतो ददृशुः तपोविशेषेण ' ( २।११।१ ) प्रतिभातमात्र हो जाते हैं; इससे स्त्री - शूद्रादिका वेदाध्ययन कैसे सिद्ध हो सकता है? यदि बिना अध्ययनके इन्हें ऋषिका मानो; तो बिना पढ़े ही स्त्रियों को ऋषिका वनने दीजिये, उन्हें पढ़नेका श्रधिकार देनेकी श्रावश्यकता ही क्या है? अपने श्राप ही वे मन्त्रद्रष्ट्रियां बन जायेंगी! क्या आपमें ऐसी शक्ति है? यदि नहीं; तत्र सर्वसाधारण-स्त्रियोंको वेदाधिकारकी निर्मूल चर्चा क्या? " नहुष आदि क्षत्रिय भी ऋग्वेदके ऋषि हैं । कोई वैश्य भी होंगे (? ) जहाँ इस प्रकारका मिश्र - ऋषिमण्डल है; वहीं वेदोंका अमुक ही अधिकारी है - यह कहना निरी जडता और अविवेक है " । पर इसमें कोई शूद्र ऋषि तो सिद्ध न हो सका । और फिर ऋषि-ऋषिकाओंके दृष्टान्त से प्राप सर्वसाधारण स्त्री - शूद्रों को वेदमें अधिकृत कैसे करना चाहते हैं? यदि फिर भी ग्राग्रह है; तो उनको प्राचीन ऋषिकाओं-की भांति बिना वेदाध्ययन किये ऋषि ऋषिका बनने दीजिये 1 । यदि ऐसा सम्भव नहीं हो सकता; तो असम्भव - वस्तुमें किसी अनधिकृतको कैसे अधिकृत करते हो? श्राकाशमें ईटोंका महल कैसे बनाते हो? क्या यह ' जड़ता ' वा ' अविवेक ' नहीं? ( क्षमा कीजियेगा । यह हमारे शब्द नहीं " हैं । आपके ही शब्द आपको लोटाये गये हैं ।

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५२६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) " वेदोंको अग्रजोंने पढ़ा, जर्मनोंने पढ़ा, जैनियोंने पढ़ा, वौद्धोंने पढ़ा, डाक्टर अम्बेडकर - अन्त्यजने भी पढ़ा होगा; और तव भी यह कहते रहना कि वेदों का अधिकार अमुकको है; कितनी निर्लज्जताका सूचक है? " = यह शब्द वादीको ' क्रोधी ' सिद्ध कर रहे हैं । अधिकार प्रनधिकारका नियम तो रखना ही पड़ता । यदि उसमें वैदिक - राज्य न होनेसे उम नियमका कोई उल्लघन कर जाता है; पर विधानमें या जानेसे फिर भी वह अनधिकृत ही रहता है । समयपर प्रनधिकारीको दण्ड मिलता ही है, रामराज्य इसका निदर्शन है; पर आप तो ऐसा ' रामराज्य ' ही नहीं मानते । क्योंकि - प्राप भी अपनेको प्राचार्य मानते हैं? आपकी बातसे विरुद्ध चलनेवालेको श्राप ईश्वर भी नहीं मानते । तब क्या इससे ईश्वरका प्रभाव हो जावेगा? तब उस ईश्वरको वर्णित करना क्या निर्लज्जता हो जावेगी? " हमदाबादकी कथाओंोंमें, संन्यासी और उदासियों की कथाओं में स्त्री - शूद्र सभी वेदों - उपनिषदोंको सुनते - सुनाते हैं । कोई किसीके कान में गोतमके कथनानुसार शीशा ( सीसा? ) गर्म करके नहीं डालता । कोई किसीकी जीभ नहीं काटता । कोई किसीकी छाती नहीं तोड़ता । यदि कोई ऐसा करे; तो उसका रक्षण गोतम नहीं कर सकता । वह फांसीके तख्तेपर लटका दिया जायगा? " फांसी के तख्तेपर तो ' यदि नो गां हंसि... तं त्वा सीसेन विध्यामः ' ( अ. १।१६।१ ) इससे गोवध करनेवाले मुसलमानको गोली मारनेपर भी प्रापको लटका दिया जावेगा; क्योंकि यह वैदिक - राज्य थोड़े ही है, राम राज्य तो नहीं है । वस्तुतः गोतमका वह श्रादेश सर्वसाधारणके लिए नहीं, किन्तु राजाकेलिए है । पर राजा वैसा हो; तब न । वह कठोर दण्ड-विभीषिका भी निम्न लोगोंको डरानेकेलिए है, जिससे वे ऐसी अनधिकृत-हरकत न कर पावें । भला किस इतिहास में शुद्रके कानमें सीसा घोलने तथा ब्रह्मसूत्रके ' वैदिकभाष्य ' पर विचार [ ५२७ जीभ काटने, वा छाती फोड़नेका वृत्तान्त आया है? शम्बूकके कर देनेसे सब व्यवहार स्वतः रुक गये हैं । पर कथाओं में दण्डित किसी वेदमन्त्रकी यदि व्याख्या आ जाती है; तो ' क्रमेण प्रसङ्गगत. ( मनु. २।१७३ ) न होनेसे उसका नाम वेदाध्ययन विधिपूर्वकम् उसी वेदकी कथाको सर्वसाधारणको समझने के लिए नहीं हो जाता । उ ही वेदभाष्य ६० बनाये गये हैं । इसका कहीं भी किसीके लिए भी निषेध नहीं है । - पुराण स " ऐसी वाहियात बातोंसे वेदोंका महत्त्व वढ़नेकी अपेक्षा संगठनका समय है । बहुमत अल्पमतका प्रश्न उपस्थित हैं । जितना घटता व है । उतना अपना पक्ष प्रबल करना प्रत्येक हिन्दुका धर्म है " । पर आप जैसे जहां ' विभीषण ' हों; वहाँ हिन्दु अपना पक्षप्र करेगा? लोहा वृक्ष को नहीं काट सकता था उस लोहेको जब इनके डण्डा दिया; तब उस फरसेने सब वृक्ष काट डाले । सो महाराज! भा भी तो वही हैं । यही है आपका " ब्रह्मसूत्रका प्रमिताधिकरणान्तर्गत मध्वाद्यधिकरणका वैदिक भाष्य "!!! पाठकोंने उसके प्रणेताकी ' सभ्यता ' E तथा ' विद्वत्ता ' देख ली । कौन मुसलमान, कौन शूद्र कह रहा है कि हमें वेद पढ़ाओ; नहीं तो हम आपको काटते हैं । हिन्दु वेद पढ़ता नहीं है । अहिन्दु ही कौन वेद पढ़ता है? जो मैक्समूलरादि वेद पढ़ते दीखते हैं संम वह वेदाध्ययन के शौकसे नहीं, किन्तु वेदके छिद्र देखने के लिए ही । अब हम पूर्वक्रमागत ब्रह्मसूत्रके अपशुद्राधिकरणपर अन्य प्राचार्थः का भाष्य संक्षेपसे उद्धृत करते हैं । उसपर ' उदारतम आचार्य स्वाद दे कर्ता एक दयानन्दीने उसकी आलोचना की है, हम उनकी भी प्रत्यालोचना करते हैं । ' आलोक ' - पाठक उसपर दृष्टि डालें । पहले हम श्रीरामानुजा-चायं स्वामीका मत देते हैं । रख उस स ० ब ० ३४.

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[ ५२७ ५३० ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) के दण्डित ( ५० ) श्री रामानुजाचार्यका ' अपशूद्राधिकरण ' का भाष्य । प्रसङ्गगत. भांगे अपने ट्रैक्ट वादी ' श्रीरामानुजाचार्य और शूद्र ' शीर्षकसे धिपूर्वकम् हो जाता उनका लेख उधृत करता है । श्रीशङ्कराचार्य स्वामीपर वादीने वहुल 1 ष्य । बल लगाया; तब हमें भी उसपर विस्तार करना पड़ा । अब आगे यथा-- पुराण सम्भव संक्षेपसे लिखा जायगा । 1 श्रीरामानुजाचार्य स्वामीके विषयमें बादी लिखता है - ' श्रीरामानुजा-ता है । धायें उदार विचारोंके प्राचार्य माने जाते हैं, किन्तु उनके विचार भी बने द्रों और स्त्रियोंके वेदाध्ययनादि विषयोंमें उदारतापूर्ण प्रतीत नहीं होते ” । या प्रवत जब वादी उनको उदार मानता है; तो स्पष्ट है कि उन्हें भी रम स्त्री - शूद्रोंका वेदाधिकार बहुत देखभाल करनेपर भी शास्त्रीय प्रतीत नहीं ! आप हुधा । ' शास्त्रीय ' बात लिख देना णाम्वत अस्तु! - ' सभ्यता ' वादी १।३।३८ वेदान्तस्त्रका करता है । हम उससे पूर्व सूत्रों का नहीं है खते हैं; संमक्ष संग्रहार्थ उपस्थित करते हैं-' अनुदारता ' नहीं हुआ करती । श्रीरामानुजाचार्यका भाष्य उद्धृत भी उनका अपेक्षित पाठ पाठकोंके 1 ( पूर्वपक्षः ) – ' अनधीत- वेदस्य अश्रुत- वेदान्तवाक्यस्यापि, इतिहास, प्राचार्य पुराणश्रवणेनापि ब्रह्मस्वरूप - तदुपासन- ज्ञानं सम्भवति । अस्ति च स्वा.व. के शूद्राणाम् इतिहास - पुराणश्रवणाभ्यनुज्ञा – ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा न्यालोचन ब्राह्मणमग्रतः ' ( महा. शान्ति. ३०७ ४ ९ ) दृश्यन्ते च इतिहास - पुराणेषु विदुरादयो ब्रह्मनिष्ठाः । रामानुजा-( जिसने वेद नहीं पढ़ा हुआ है, और वेदान्तका वाक्य भी नहीं सुन रखा, उसे इतिहास - पुराण सुनने से भी ब्रह्मका स्वरूप, उसकी उपासना, उसका ज्ञान हो सकता है । उसे इतिहास - पुराणके सुननेकी अभ्यनुज्ञा है । जैसेकि – ' ब्राह्मणको आगे करके सभी ( शुद्र - सहित ) वर्णोंको इतिहास-श्री रामानुजाचार्यका ' पशूद्राधिकरण ' का भाष्य [ ५३१ पुराण सुनावे । इतिहास - पुराणोंमें विदुर श्रादि ब्रह्मज्ञानी भी मिलते हैं ) । ( उत्तरपक्ष ) ' न शूद्रस्य अधिकारः सम्भवति । कुतः? सामर्थ्याऽ-भावात् । नहि ब्रह्मस्वरूप तदुपासन - प्रकारमजानतः तदङ्गभूत - वेदाध्ययन-: ज्ञानादिषु श्रनधिकृतस्य उपासनोपसंहार - सामथ्यं सम्भवति । श्रसमर्थस्य च. प्रर्थित्वसद्भावेपि अधिकारो न सम्भवति । श्रसामथ्यं च वेदाध्ययनाऽभावात् ।... इतिहासपुराणे प्रपि वेदोपवृहणं कुवंती एव उपायमनुभवतो न स्वातन्त्र्येण । शूद्रस्य इतिहासपुराण-श्रवणाभ्यनुज्ञानं पापक्षयादिफलार्थम्, न उपासनार्थम् । विदुरादयस्तु भवान्तराधिगत - ज्ञानाऽप्रमोपाद् ज्ञानवन्तः, प्रारब्धकर्मवशाच्च ईदृशजन्म-योगिनः इति तेषां ब्रह्मनिष्ठत्वम् ' ( १।३।३३ ) शूद्रस्य च उपनयनादि-संस्काराऽभावोऽभिलप्यते ' ( १।३।३६ ) ( शुद्रका अधिकार नहीं हो सकता । उसमें वैसी सामय्यं नहीं । जो ब्रह्मके स्वरूप तथा उसकी उपासनाका प्रकार नहीं जानता; उसके साधनभूत वेदके अध्ययन तथा ज्ञानमें अनधिकारी ( अधिकाररहित ) है; तब उसमें उपासनाकी सामर्थ्य कैसे हो सकती है? जो असमर्थ है, वह भले ही अर्थी ( वैसा चाहता हो, पर वह अधिकारी नहीं हो जाता । श्रसामर्थ्य उसकी यही है कि उसका वेदाध्ययन अनधिकृत होनेसे. नहीं होता ।.... इतिहास - पुराण भी वेदका उपबृंहण करते हुए उपायका अनुभव करते हैं, उपासनाकेलिए नहीं । विदुर आदि तो गतजन्मसे स्वत: -ज्ञान होनेसे [ क्योंकि — वे यमदेवता थे, माण्डव्य मुनिके शापसे शूद्रयोनिमें श्राये ] सो उनका ज्ञान क्षुण्ण नहीं हुआ, [ पर उन्होंने भी लोकमर्यादा नहीं तोड़ी ] प्रारब्धकर्मके कारण ही उनको ऐसा जन्म मिला । इसी श्रारूढ - पतनके कारण ब्रह्मनिष्ठ थे; उन्होंने शूद्रजन्ममें कोई वेदादि नहीं पढ़ा था ( ३३ ) । शुद्रको उपनयन संस्कारका अभाव ही कहा जाता है । ( ३६ ) । यह कहकर ' श्रवणाध्ययनार्थं प्रतिषेधात् स्मृतेश्च ' ( ३८ ) सूत्रका अर्थ करते हुए श्रीरामानुजाचार्य स्वामी कहते हैं-

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५३२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' शूद्रस्य वेदश्रवण - तदध्ययन - तदर्थानुष्ठानानि प्रतिषिध्यन्ते - ' पद्य, ह वा एतत् स्मशानं यत् शूद्रः, तस्मात् शुद्रसमीपे नाध्येतव्यम् ' ( वसिष्ठ-१८१६ ) ' तस्मात् शूद्रो बहु - पशुः, श्रयज्ञियः ' इति । बहुपशुः - पशुसदृशः । अनुपशृण्वतोऽध्ययन - तदर्थज्ञान- तदर्थानुष्ठानानि न सम्भवन्ति, अतः तानि अपि प्रतिषिद्धान्येव । स्मर्यते च श्रवणादि निषेधः - ' अथ हास्य वेदमुप-शृण्वत: त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रपूरणम्, उदाहरणे जिह्वाच्छेदः, धारणे शरीरभेद इति ' । ' नचास्योपदिशेद् धर्मं नचास्य व्रतमादिशेत् ' ( मनु. ४/८० ) इति च । अतः शूद्रस्य अनधिकार इति सिद्धम् ' ( १।३।३८ ) ( गद्रका वेद सुनना, वेद पढ़ना, उसके अर्थ एवं अनुष्ठान निषिद्ध हैं । ' शूद्र जङ्गम- श्मशान है; श्रतः शूद्रके समीप भी वेद नहीं पढ़ना चाहिये । इस कारण शूद्र पशुसदृश है । [ ' बहुपशु: ' मे ' विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात्तु ' ( पा. ५।३।६८ ) इससे ' बहुच् ' प्रत्यय सादृश्य - श्रर्थमें हुआ है । यह प्रत्यय अन्तमें न होकर प्रकृतिसे पूर्व ही होता है ] जव शूद्र कभी वेद सुनेगा नहीं; तब उसका वेदाध्ययनादि निषिद्ध ही होगा । उसके वेदश्रवण-का भी निषेध स्मृत किया जाता है — ' यदि शूद्र वेद सुन ले; तो उसके कान राजा सीसे वा लाखसे युक्त करे - इत्यादि पूर्वकी तरह ) शूद्रको धर्म-वा व्रत न बतायो; उसका वह उपेक्षामूलक अनादर करता है ] अतः शूद्रोंका वेदमें अधिकार नहीं " । श्रीरामानुजाचार्य - स्वामीने भी वही गौतमसूत्र उद्धृत किया है; इससे प्रतीत होता है- यह स्मृतिने किसी श्रुतिका वचन किसी संहिता वा ब्राह्मणसे उद्धृत किया है; अतः यह वचन निर्मूल भी नहीं । श्रुतिका वचन स्मृति में अनूदित कर दिया जावे; तो वह भी स्मार्त हो जाता है । इस बचनमें प्रापाततः कड़ाई प्रतीत हो रही है; पर उसमें प्रर्थवाद समझकर उसका तात्पर्य मात्र लेना चाहिये । ' श्रवणाध्ययनार्थ प्रतिषेधात् स्मृतेश्च ' इस सूत्रका स्मृतिवचन हो भी यही सकता है, जो कि - श्रीव्यासजी के सामने था; अपने भाष्यको ' वैदिक ' कहते हुए एक रामानन्दी सम्प्रदायवाले श्रीरामानुजाचार्यका अपशूद्राधिकरणपर भाष्य महाशय को भी इसके अतिरिक्त कोई स्मृतिवचन न मिल १३४ उतने स्मृतिवचन लिखे हैं, वे इस सूत्र के अक्षरानुसारी सका । जो वेदाधिक वे वादीने बलात् ही थोपे हैं । वास्तविकताको बदलकर नहीं हैं । पत्र जावे; तो उसमें इस प्रकारके दोष होने स्वाभाविक हो जाते कृत्रिमता की । भाष्या किन्तु है । सो उस वचनका ' शूद्र वेदको न सुने, न उसका अध्ययन सूत्रका उसका स्मरण करे ' इतने प्रथमें ' तात्पर्य समझना चाहिये करे, और न किया । कानमें भरने में नहीं । वेदके गलत उच्चारणमें ' मन्त्रो हीनः, सीसा वा लाख ' स स्वरतो वर्णतो मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्जो यजमानं हिनस्ति व प्रध्ययन स्वग्नोपराधात् ' ( पाणिनीय - शिक्षा ) यह वृत्रासुरकाण्डका यथेन्द्रशत्रुः । संस्कार है । पाणिनीय शिक्षाका प्रमाण रामानन्दी - महाशयने भी बचन सुप्रसिद्ध [ उपनय भाव्य ' में दिया है । मो शूद्र वेद न सुने, और अपने ' वैदिक ' पराधम वेद सुनकर बेद उच्चारणका प्रयत्न - धनुकरण न करे, जिससे उसे हानि उठानी पड़े, यही प्रभावस तात्पर्थ उसे वेद श्रवण - अध्ययन - उदाहरण श्रादिके अधिकार न देतेयें है । यथोपन इसी कारण शूद्रों में वेदाध्ययनादिकी परम्परा भी नहीं रही । कभी किसी बातको सर्वथो निषिद्ध करनेके लिए कड़े दण्ड भी विधान में कह दिये ब्राह्मण जाते हैं; पर उनका अनुसरण किसी इतिहासमें भी नहीं सुना जाता । में अग्नि वहाँ निषेध में ही तात्पर्य समझना चाहिये । अन्यथा निम्न- लोग कड़ाई ब्रह्मचय न लिखे होने पर उन निषेधोंको नहीं मानते । कड़ा दण्ड लिखे होनेपर उपनयन तो उनका ध्यान उस निषेधपर पड़ जाता है । ढीला - ढाला निषेथ होनेपर व्यवहा मन्त्रोंम उसकी कोई परवाह नहीं करता । श्रागे श्रीमध्वाचार्य स्वामीकी सुनिये । तो शुद होउन ( ५१ ) श्रीमध्वाचार्य - स्वामीका अपशूद्राधिकरण पर भाष्य माना मागे दमानन्दी - महाशय अपने उस ट्रैक्ट में ' श्रीमध्वाचार्य घोर शूट स्त्रियो तथा स्त्रियां ' शीर्षक रखकर लिखते हैं-- अपने ' द्व'तमत - प्रचारक श्रीमध्वाचार्य ( स्वामी आनन्दतीयं ) ने स्त्रिय बोल द

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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १३४ ] जो विषय में अन्य आचार्योंकी अपेक्षा कुछ उदारता दिखाई है, वेदाधिकारके वेदाध्ययन तथा ब्रह्मविद्या में अधिकारका उन्होंने ब्रह्मसूत्र-मता किन्तु शुद्रोंके प्रतिषेध किया हैं ' यह लिखकर वादीने उनका ११३३८ की भाष्यादि में स्पष्ट भाष्य उद्धृत किया है, ११३।३६ सूत्रका भाष्य उद्धृत नहीं और सूत्रका दोनोंको ही उद्धृत करते हैं-र ffer | हम वालाव ' संस्कार परामर्शात् ' ( १।३।३६ ) ' भ्रष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत इति तो संस्कार [ उपनयन ] - परामर्शात् । ' नाग्निनं यज्ञो न क्रिया न श्रध्ययनार्थं येन्द्रशत्रुः संस्कारो [ उपनयनं ] न व्रतानि शूद्रस्य ' इति पंङ्गिश्रुतौ संस्कारा-सुप्रसिद्ध [ उपनयना ] -भावाभिलापाच्च । उत्तम स्त्रीणां तु न शूद्रवत् ' सपत्नीं मे " वैदिक पराधम ' इत्यादिषु अधिकारदर्शनात् । संस्कारभावेन ( उपनयनेन ) वेदके श्रभावस्तु सामान्येन । अस्ति च तासां संस्कार: - ' स्त्रीणां प्रदानक है, यही यथोपनयनं तथा ' इति स्मृतेः ' । में है । ( माठ वर्ष वाले ब्राह्मणका उपनयन करे, उसे पढ़ावे, इस प्रकार ब्राह्मणको पढ़ानेकेलिए उपनयन कहा गया है । परन्तु “ शूद्रकी न तो कह कभी दिये अग्नि कही है, न वैदिक यज्ञ, न कोई क्रिया, न उपनयन - संस्कार और नमः ता । ब्रह्मचर्य - सम्बन्धी कोई व्रत होते हैं । यह पिङ्गकी श्रुतिमें शूद्रका कड़ाई उपनयनादि निषिद्ध किया गया है । परन्तु उत्तम - स्त्रियोंका शूद्रवाला होनेपर व्यवहार नहीं होता, क्योंकि - ' सपत्नों मे पराधम ' इत्यादि सपत्नीबाधनके होनेपर मन्त्रों में स्त्रियोंका अधिकार देखा जाता है । हां, उनका उपनयनाऽभाव सुनिये । तो शुद्र के समान है । उन स्त्रियोंका संस्कार होता है- ' स्त्रियोंका विवाह-ही उनका उपनयन- जैसा होता है, ऐसा स्मृतिवचन मिलता है । ) यहाँपर श्रीमध्वाचार्यने स्त्रियोंका उपनयन पृथक् संस्कार नहीं भाष्य माना । उपनयनाऽभावमें स्त्रियोंकी उन्होंने शूद्रसदृशता मानी है । उनने स्त्रियोंके विवाहको ही उनका उपनयन संस्कार - जैसा माना है, इसलिए अपने विषयके ' सपत्नीं मे पराधम ' आदि मन्त्रोंको पुरोहितादिके सहारे स्त्रियोंड़ बोल देना उनका माना है । इसमें किसीका विरोध नहीं । क्योंकि साक्षात्-श्रीरामानुजाचार्यका पशूद्राधिकरणपर भाष्य [ २३५ उपनयन न होनेसे वेदमें उनका बंध तथा फमिक अधिकार नहीं होता । जैसे कि - ' मनुस्मृति ' में लिखा है-' कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते । ब्रह्मणो ग्रहणं व क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( २।१७३ ) अर्थात् उपनयन होनेपर माणवकको क्रमसे तथा विधिसे वेटके ग्रहण का अधिकार है । बाजारोंमें उपनयनसे होन भी बच्चे कई वेदमन्त्र लल्टे - सीधे श्रंशतः बोलते दीख रहे होते हैं; इसका नाम स्वाध्याय - अध्ययन होता भी नहीं है । इसी प्रकार स्त्रियो के लिए भी कई स्वमात्रनियत प्रांशिक वेदमन्त्र आदि हैं भी, तो यह उनका क्रमिक एवं वैध वेदाध्ययन नहीं हो जाता । उक्त मनुके पद्य में क्रमेण विधिपूर्वकम् ' यह शब्द साभिप्राय हैं । यह उपनीतकेलिए कहे गये हैं — यह नहीं भूलना चाहिये । श्रीमध्वाचार्यने स्त्रियोंका उपनयन नहीं माना, किन्तु उनके विवाह-को ही उपनयन सदृश माना है, तत्फलम्वरूप कई स्वनियत ' सपत्नी-प्रणुदन ' आदि कम उसका प्रवेश माना है । ऐसा तो सभी सनातनधर्मी प्राचार्योका मत है; तब वादी इसमें श्रीमध्वाचार्यकी कौनसी उदारता मानता है? ग्रागे श्रीमध्वाचार्यका ब्रह्मसूत्र के ११३१३८ सूत्रको भाष्य उद्धृत किया जाता है, जिसे वादीने भी उदधृत किया है । ' श्रवणाध्ययनाऽर्थं प्रतिषेधात् स्मृतेश्च ' । श्रवणे त्रपूजतुभ्यां श्रोत्र-प्रतिपूरणम् अध्ययने जिह्वाच्छेदः, अर्थावधारणे हृदयविदारणम् ' इति प्रतिषेधात् । ' नाऽग्निर्न यज्ञः शूद्रस्य तथैवाध्ययनं कुतः? केवलैब तु शुश्रूषा त्रिवर्णानां विधीयते ' इति स्मृतेश्च । विदुरादीनां तु उत्पन्न ज्ञानित्वाद न कश्चिद् विशेष: ' । ( शूद्रको वेद सुननेमें ' त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् ' आदि वचनके कारण निषेध किया गया है । स्मृतिमें भी लिखा है- ' शूद्रकी अग्नि ही नहीं होती, न कोई यज्ञ ही है । केवल त्रैवर्णिकोंकी सेवा ही नियंत

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५३६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) की गई है । विदुर मादि उत्पन्न होते ही ज्ञानी थे, अतः उनकी कुछ विशेषता नहीं मानी जाती । ) यहांपर् श्रीमध्वाचार्यस्वामीने भी शुद्रको वेदके निषेधका प्रतिपादक वही गौतम वचन उद्धृत किया है; जिसे अन्य आचार्योंने उद्धृत किया या । इससे उक्त वचन निर्मूल सिद्ध न होकर समूलक सिद्ध हो गया । विदुरकेलिए संक्षेपमें बहुत ही अच्छा उत्तर दिया है कि ' वह पूर्वजन्मके संस्कारवश प्रारूढ - पतित होनेसे जन्मसे ही ज्ञानी था; तव उसमें कोई विशेषता न रही । क्योंकि उसने विद्या पढ़ी ही नहीं थी । तब शूद्रादिका वेदादि पढ़ने में अधिकार सिद्ध न हुआ । श्रीमध्वाचार्यके उक्त - उद्धरणकेलिए वरदीके यह शब्द हैं— ' उन्हों ( श्रीमध्वाचार्य ) ने कुछ कल्पित वेदविरुद्ध स्मृतिवचनोंको उद्धृत करते हुए लिखा है ' । वादी श्रीमध्वाचार्यके उद्धरण बड़े गौरवसे अपने पुस्तकों में दिया करता है; इससे वह उन्हें वेदका एक विद्वान् कहा करता है; पर जब उनके उद्धरणोंसे वादीका पक्ष कटता है, तब उन्हें वेदविरुद्ध और कल्पित कहकर मानी जान छुड़ा लिया करता है । जब वेद ' वेदमाता... द्विजानाम् ' ( श्र. १६१७१११ ) कहकर द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) को अपना अधिकार देता है, तव शूद्रका अधिकार स्पष्ट निषिद्ध हो गया, क्योंकि - प्रद्विज - एकज ही होता है । आगे वादी श्रीमध्वाचार्यके ब्रह्मसूत्रभाष्यसे ' व्योमसंहिता ' का प्रमाण देकर शूद्रकुलोत्पन्नका बंदके अतिरिक्त अन्य शास्त्रोंमें अधिकार मानता है । इससे तो हमारे पक्षकी सिद्धि हुई । वादी ' ब्योमसंहिता ' का यह प्रमाण देता है-' अन्त्यजा ग्रपि ये भक्ता नामज्ञानाधिकारिणः । स्त्री - शूद्र ब्रह्मवन्धूनां तन्त्रज्ञानेऽधिकारिता । प्राहुरप्युत्तमस्त्रीणामधिकारं तु वैदिके । यथोवंशी यमी चैव शच्याद्याश्च तथापराः । ' श्रीरामानुजाचार्यका अपशूद्राधिकरणपर भाष्य[ ५३७ पहले वादी सदा ही उक्त ग्रन्थका ' आहुरप्युत्तमस्त्रीणां देकर उससे स्त्रियोंको वेदाधिकार सिद्ध कर दिया करता वही पक्ष पूर्वके पद्योंको जनदृष्टिमें नहीं आने दिया करता था था; उसके में क्योंकि उसके लेखोंकी आलोचना ' श्री ' तथा ' सिद्धान्त ' आदि । पत्रोंमें पर जबसे हमने वैदाधिकार जबसे उससे छिपाये पूर्व - पद्योंको जनताके सामने रखा तबसे शुरू क विनाऽखिल ; वादी कुछ । परन्तु स्त्रि सम्भल गया है । उस मेरे लेखसे लज्जित होकर उनके स्प लेखोंमें वह परिवर्तन, परिवर्धन तथा संशोधनादि कर लिया अनुसार अपने चायके करता है । वादीने इस एतदर्थं हम अपने परिश्रमकी सफलता समझते हैं । तथा उसे अपने ना चाहि लेखोंमें वैसे संशोधनोंकेलिए बधाई देते हैं; पर खेद है कि - वादी प सो पूरी शुद्धि श्रव भी नहीं कर रहा । फिर भी बीचके कई पद्योंको छिपा । देववा दिया करता है । उदाहरण उक्त - वचनानुसार श्रन्त्यजोंको नामज्ञानका अधिकार माना गया है. भवतार थ वेदादिशास्त्रके ज्ञानका नहीं । इस विषय में स्पष्टता ' आलोक ' पाठकमण आदि स ' श्रीमध्वाचार्यस्वामीके स्पष्ट प्रमाण (? ) ' इस पुष्प के पृ. २४७ से २५२ ( देवता ) पृष्ठ तक देखें । भाव ' उत्तम स्त्रियाँ श्रीमध्वाचार्य - स्वामीने ' देव्यो मुनिस्त्रियश्चैव श्रीमच्या = मरादिकुलजा प्रपि ' इस पद्यमें गिनी हैं, यहाँ प्राचार्यने देवयोनि तथा उनके लिए ऋषियोनिकी स्त्रियोंको ही उत्तम बताया है । इनके नाम के साथ प्राचार्यने तिम् ' एव ' पढ़ा है । ' नरादिकुलजा प्रपि ' में ' अपि ' शब्द पढ़ा है, ' एव ' शब्द क्रिया है-नहीं । यह पाठक न भूलें । श्रीम ' अपि ' शब्दसे वे मानुषी स्त्रियाँ विवक्षित हैं, जो पूर्वजन्म में देवता हो गया वा ऋषिकाएं थीं, और अब मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण होकर भाई हैं मारूढपतित होकर आई हैं, सो उनके देवयोनि के संस्कार इस जन्म में ( ५२ ) भी बने रहते हैं । उन्हीं को ' प्रारूढ पतित ' कहते हैं, सर्वसाधारण मानुषी-आगे स्त्रियोंको श्रीमध्वाचार्यने वेदाधिकार नहीं माना । जैसा कि - श्रीमध्वाचार्य- गोस्वामी स्वामीने ' वेदा ' अप्युत्तमस्त्रीभि: ' इस पद्यसे पूर्व ' महाभारत- तात्पर्य निर्णय भी वह प B

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[ ५३७ श्रीसनातनधर्मालोकः ' ( ३-२ ) -३८ 1 यही प यह वहाँका पद्य है, ब्रह्मसूत्रके माध्वभाष्यका नहीं - स्त्रियोंको उससे क्योंकि किया है । जैसे कि- ' ज्ञेयं सर्व त्रिवर्णस्थैः स्त्रीभिर्वदान हमने वैदाधिकार ' निषिद्ध ( ३६।३५ ) ( त्रैवर्णिक वेदादि सभी शास्त्रोंका ज्ञान करें; शुरू विनाऽखिलम् वेदोंके सिवाय अन्य गृहतन्त्रोंका ज्ञान करे । यह श्रीमध्वान कुछ परन्तु स्त्रियां शब्द हैं । स्त्रियोंका वे वेदमें अनधिकार सिद्ध कर रहे हैं । र अपने सायंके वादीने स्पष्ट इस वचनको छिपा लिया है - यह ' नाक ' - पाठकोंको याद रख करता है; स अपने ना चाहिये । दी सो ' महाभारत - तात्पर्य - निर्णयकार ' श्रीमध्वाचार्यको उत्तम - स्त्रिर्यां को िदेव अपरी ऋषि - योनिसे पतित होकर आई हुई इष्ट हैं । उसमें एक वा उदाहरण उन्होंने द्रौपदीका बताया है; वह शत्री ( इन्द्राणी ) का प्रवतार थी । ' भारती ' ( मण्डनमिश्र ) की स्त्री, ' हपंचरित ' की सरस्वती गया है मादि सरस्वती देवताके अवतार है । महाश्वेता तो साक्षात् गन्धवं नाठकगण से २५२ ( देवता ) कन्या थी ही 1 सो यह मानुषी स्त्रियाँ नहीं है । भाव यह है कि- ' आरूढपतिता ' ही यहां उत्तम मानुषी स्त्रियां = त्रयश्चैव श्रीमध्वाचार्यको इष्ट है, सर्वसाधारण मानुषी स्त्रियां नहीं । क्योंकि- ' निता उनके लिए तो उन्होंने वेदका निषेध ही किया है— ' स्त्रीभिर्वेदान् विना-याचार्यने निलम् श्रागे श्रीमध्वाचार्य स्वामीने सत् - शूद्रों को भी वेदका निषेध हो व ' शब्द किया है - ' सच्छूद्र रप्य वैदिकम् ' । श्रीमध्वाचार्य का ब्रह्मसूत्रके ' अपशूद्राधिकरण ' का भाष्य यहाँ समाप्त में देवता हो गया । आई हैं जन्ममें ( ५२ ) श्रीवल्लभाचार्य - गोस्वामीका अपशूद्राधिकरण- भाष्य । मानुषी वाचार्य- आगे प्रतिपक्षीने ' श्रीवल्लभाचार्य और शूद्र ' शीर्षक से श्रीवल्लभाचार्य-बोस्वामीद्वारा शूद्रोंके वेदाधिकारका स्पष्ट शब्दों में निषेध माना है । हम भी बहु पाठ ' आलोक ' - पाठकोंकी जानकारी के लिए तथा उनके लाभार्थ श्रीवल्लभाचार्यका श्रपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५३६. उद्धृत करते हैं-' दूरे हि अधिकारचिन्ता, वेदस्य श्रवणमध्ययनम् अर्थज्ञानं श्रयमपि तस्य ( शुद्रस्य ) प्रतिषिद्धम् तत्सन्निधौ अन्यस्य च । [ यह बहुत महत्त्वपूर्ण वाक्य है ] ' प्रथाऽस्य वेदमुपशृण्वतः त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणमिति । यद्य, ह वा एतत् श्मशानं यत् शूद्रः; तस्मात् शूद्रसमीपे नाध्येतव्यमिति । उदाहरणे जिह्वाछेदो, धारणे शरीरभेदः ' ( गौतमधर्म. १२१४ ) दोहादी शुद्रसम्बन्धे मन्त्राणामभाव एव ( इस महत्त्वपूर्ण वाक्यको वादीने छिपा लिया ) । स्मृतियुक्त्यापि वेदार्थे न शूद्राधिकारः इत्याह । स्मृतेश्च । ' वेदाक्षर-विचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणात् ' ( पराशरस्मृति १।७३ ) इति । स्मार्त-पौराणिक - ज्ञानादौ तु कारणविशेषेण शूद्रयोनी गतानां [ विदुरादीनां ] महतामधिकारः । तत्रापि न कर्मजाति - शुद्राणाम् । तस्माद् नास्ति वैदिके क्वचिदपि शूद्राधिकार इति स्थितम् ' । ( शूद्रकी अधिकारचिन्ता तो दूर; ज्ञान यह तीनों ही उस ( शूद्र ) को हुए दूसरेको भी वेद पढ़नेका निषेध है राजा उसके कान त्रपु - जतुसे बन्द कर श्मशान हैं; अतः शूद्रके पास भी वेद जिह्वाछेद तथा धारणमें शरीरभेद वेदका सुनना, अध्ययन और प्रयं-निषिद्ध हैं । उस शूद्रके पास ठहरे. । शूद्र यदि वेद सुन रहा है; तो दे; जिससे वह सुन न सके । शूद्र नहीं पढ़ना चाहिये । वेद बोलने पर होता है ( गौतमस्मृति ११४ ) यह ब्रह्मसूत्रको इष्ट इतना प्रतिदृढ प्रमाण है कि इसे ही सभी भाष्यकारोंने उद्धृत किया है । दुहने आादिमें शूद्रके सम्बन्धमें मन्त्रोंका अभाव ही है । स्मृतिके प्रयोगसे भी सीधे वेदके प्रथमें शुद्रका अधिकार नहीं है । स्मृति कहती है- ' वेदके अक्षरपर विचार करनेसे शूद्रका उसी क्षण पतन हो जाता है ' । ( पराशर ) स्मृति तथा पुराणके ज्ञान आदिमें विशेष-कारणवश शूद्रयोनिको प्राप्त हुए विदुर आदि बड़े ( आरूढ - पतितों ) लोगोंका अधिकार है । उसमें भी जातिशूद्रोंका अधिकार नहीं है । श्रतः

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५४० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) वेदादिमें कहीं भी शूद्रका अधिकार नहीं है ' । यह हमने प्रतिपक्षीसे लिखा हुआ उद्धरण लिखा है । १।३।३६ सूत्रका अणुभाष्य प्रतिपक्षीने नहीं दिया । उसका उद्धरण हम देते हैं— ' इदानीं शूद्रस्य क्वचिदपि ब्रह्मविद्यायामधिकारश्चेत्, प्रत्रापि कल्प्येत, तत्तु नास्ति; सर्वत्र संस्कारपरामर्शात् । उपनयन संस्कारः सर्वत्र परामृश्यते । ' तं ह उपनिन्ये ' प्रधीहि भगवः! इति ह उपससाद । तान् ह अनुपनीय ' इत्यादि- प्रदेशेषु उपनयन- पूर्वकमेव विद्यादानं प्रतीयते । शुद्रस्य तदभावाभिलापात् । ' चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रः ' इति, ' न शुद्र पातकं किञ्चिद् न च संस्कारमर्हति ' इति शूद्रस्य सस्कारनिषेधात् । चकाराद् ' न शूद्राय मति दद्याद् ' इति निषेध: ' । ( शूद्रका कहीं भी ब्रह्मविद्या में अधिकार होता, तो यहाँ भी कल्पित होता । पर वह नहीं है । सर्वत्र वेदकेलिए उपनयन संस्कार श्रावश्यक होता है । जैसे कि- ' उस ( जाबाल ) का उपनयन किया ' । ( इससे यह भी स्पष्ट हो रहा है कि- जाबाल वेश्यापुत्र ( ब्राह्मण ) नहीं था, किन्तु ब्राह्मण ही था । किसी भी प्राचीन आचार्यने उसे शूद्र नही माता । इस विषय में हमने ' आलोक ' ( ११ ) पृ. १८३-२३१ में विपक्षियोंके सभी प्राक्षेपोंको काटकर उसे ब्राह्मण सिद्ध किया है । पाठक इस विषय में पूरी विचार - माला देखें । ) ' भगवन्! मुझे पढाइये, यह कहकर भ्राचार्यके पास गया ' । ' क्षत्रियने अवर वर्ण होनेसे उन ब्रह्मविद्या पढ़ने प्राये हुए ब्राह्मणोंका उपनयन नहीं किया ' । क्योंकि वे ब्राह्मण थे ' पढानेवाले क्षत्रिय थे; अतः उन्होंने उनका उपनयन शिष्यभाव ) नहीं किया । इत्यादि स्थलोंमें उपनयनके बाद ही विद्या दी जाती है यह प्रतीत हो रहा है । परन्तु शूद्रको तो उपनयनका प्रभाव ही कहा गया है – ' चोथा वर्ण शूद्र एकज होता है, द्विज नहीं होता । ' शूद्र, संस्कार ( उपनयन ) के योग्य नहीं इससे शूद्रको उपनयन संस्कारका निषेध किया गया है । ' शूद्रको बुद्धिमन्त्र ( गायत्री ) का उपदेश न दे ' श्रीवल्लभाचार्यका अपशूद्राधिकरण भाष्य [ 1 ४२ ] यह स्मृति कहती है । ) १३३७ सूत्रका अणुभाष्य यह है- ' इतश्च न शूद्रस्य पूर्व ज्ञात धिकारः, शूद्रत्वाऽभावनिर्धारणे एव गुरुशिष्य भाव - प्रवृत्तेः । सत्यकामों सर्वधाः । जाबालः, सत्यकाममुपनिन्ये ' ' नैतद् अब्राह्मणो विवक्तुमर्हति इति सत्य धातादीनां वचनेन शूद्रत्वाऽभावं ज्ञात्वैव । तस्माद् न शूद्रस्य श्रधिकारः । वैशेषिकर्ता ( शूद्रका अधिकार सर्वथा नहीं है; क्योंकि - ' यह शुद्र नहीं हैं ऐसा भितापाच्च निश्चित होनेपर ही गुरु - शिष्यभावकी प्रवृत्ति देखी गई है । ' शूद्रस जाबालका गौतमने यह निश्चय करके कि- ' यह शुद्र नहीं है ' तभी उसका संस्क उपनयन किया । इस कारण शुद्रका अधिकार नहीं होता ) । इ श्रीवल्लभाचार्य - गोस्वामीने लिखा बहुत सुन्दर - प्रकारसे है; प्रनेकतिर सोपपत्तिक तथा सप्रमाण लिखा है । इसपर प्रतिपक्षी लिखता है - ' इन ( शूद्र प्रकारके स्मृतिवचन ' यथेमां वाचं ' ( यजुः माध्य. २६ २ ) ' समानो मनः किया जाव समितिः समानी ' ( ऋ. १०।१ ९ ११३ ) इत्यादि वैदिक - प्रदेशोंके विश्व वह अध्य होने के कारण सर्वथा अमान्य है " । सातव्य हो ऐसी बात नहीं । ये वादीसे दिये हुए वचन इस विषय में ' सिद्ध ' इसके प्रमाण नहीं, किन्तु ' साध्य ' हैं । अतः श्रमान्य है । इसमें हम ' यथेमां वाचं भी प्राचीन का प्रारम्भसे ५५ पृष्ठ तक तथा ' समानो मन्त्रः ' का पृ. ३५६-३६१६ चिन्हसे त्रा प्रत्युत्तर दे चुके हैं । तब उक्त स्मृतिवचन वेदानुकूल होनेसे मान्य है उपनयन सिद्ध हुए । अनुवादसे श्रीमद्वल्लभाचार्यं - महाराजके उक्त सूत्रोंके भाष्यकी स्पष्टता शास शूद्रक वित्तम श्रीकृष्णचन्द्रकृत ' भावप्रकाशिका ' में सम्यक्तया उसका अपेक्षित अंश उद्धृत करते हैं— १।३।३६ सूत्रकी वृत्तिमें यह लिखा है- ' शूद्रस्य विद्यायामधिकारश्चेद् अत्रापि कल्प्येत, तत्तु नास्ति । की गई है । हर एक हो होता । उपनयन - स क्वचिदपि ब्रह्म-प्रभाव कह कुत:? संस्कार इस परामर्शात् - ‘ तं हृ उपनिन्ये ……. इत्यध्ययनलिङ्गात् । एवमन्यत्र सर्वत्र वैद्धि माना जा

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[ ५४१ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४ ] उपनयन संस्कारः परामृश्यते, तस्मात् । सर्वधा ज्ञातव्ये ' वैश्वानर विद्यायां ' तान् ह अनुपनीय ' इत्यत्रापि प्राचीन-कामोद्द किञ्च - लिङ्गन ब्राह्मणतया उपनयनस्य सिद्धत्वात् ति सत्क हातादीनां महाश्रोत्रियत्व अनुवादात् सर्वत्र तत्परामर्शो निर्वाधः । तदभावा-वैशेषिकतनिषेधस्यैव मिलापाच्च-है ऐसा ' शूद्रस्य तु ' चतुर्थ एकजातिस्तु शुद्रः ' इति, ' न शूद्र े पातकं किञ्चिद् सत्यकाम. मी उसका न च संस्कारमर्हति ' इति संस्काराऽभावकथनात् । चकारो न ' शूद्राय मति वा इति निषेधस्य संग्रहाय । तथाच अत्र शुद्रस्य अधिकार - कल्पने प्रनेकधृतिस्मृति - विरोध: ' इति । यहाँ पर्याप्त स्पष्टता की गई है । रसे है T है- ' ( शुद्रा कहीं ब्रह्मद्य यदि अधिकार हो, तो यहाँ भी कल्पित नानो मन्दः किया जावे; पर वह तो है नहीं । क्योंकि - ' उसका उपनयन किया ' । के विरूद्ध वह अध्ययनका लिङ्ग है । इस प्रकार अन्यत्र सब स्थान वैदिक - अर्थं सातव्य हो, तो उपनयन - संस्कारका वर्णन करना पड़ता है । यमें ' सि • इसके अतिरिक्त - वैश्वानर विद्यामें ' उनका उपनयन न करके ' यहाँ मां वारं भी प्राचीनशाल प्रादिके बड़े श्रोत्रिय ( वेदपाठी संस्कृत - ब्राह्मण ) होनेके -- ३६१ में चिन्हसे ब्राह्मण होनेसे, उनका उपनयन पहलेसे सिद्ध होनेसे उनका पुनः मान्य ही उपनयन नहीं किया गया । विशेष करके शुद्रके ही विद्याके निषेधके धनुवादसे सर्वत्र उपनयनका ही ग्रहण निर्वाध है । टता घास । शुद्रके निषेधका वर्णन भी मिलता है । जैसे कि - चौथा वर्ण शूद्र ई है । झ एकत्र होता है, द्विज नहीं । शूद्रको लहसन आदि खानेसे पाप नहीं । क्योंकि पहले से ही नीचे सोया हुआ नीचे गिर नहीं जाता । ' शूद्र पि उपनयन संस्कारके योग्य नहीं होता ', ऐसा स्मृतिमें उसके संस्कारका ? संस्कार । प्रभाव कहा गया | ' स्मृतेश्च ' यह ' चकार ' ' शूद्रको बुद्धि वा बुद्धिमन्त्र सर्वत्र वैदिले २ इस स्मार्त वाक्य ग्रहणार्थं है । तब यदि शूद्रका वेदमें अधिकार राजा, तो अनेक श्रुति स्मृतियोंका विरोध आता है । ) श्रीवल्लभाचार्यका श्रपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५४३ अव ११३१३८ ब्रह्ममुत्रके सूत्रकी वृत्ति उद्धृत की जा रही है-[ शुद्रकी वेदविद्या में ] अधिकारचिन्ता तव हो सकती है, यदि किसी प्रमाणसे उस अधिकारको सम्भावना हो । जैसे— पतित प्रग्निहोत्रकी प्राप्ति के स्थल में शूद्रका वेदका श्रवण तथा अध्ययन एवं अर्थज्ञान- इन तोनों का निषेध किया गया 1 सूत्रमें जो ' जान ' शब्द नहीं कहा गया, सो शुद्रके निकट दूसरेको भी अध्ययनका निषेध है — यह बात बतानेकेलिए है । शूद्रका निषेध तो ' प्रयास्य वेदमुपशृण्वत: त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपरिपूरणम् ', ' यद्य वा एतत् श्मशानं यत् शुद्रः... ' उदाहरणे जिह्वाच्छेद: ' इत्यादि श्रुतियोंमें देखना चाहिये ।... इसके अतिरिक्त ' वेदाक्षरके विचारने शूद्र उसी क्षण पतित हो जाता है ' ' वेदाक्षर - विचारेण शूद्रः चाण्डालतां व्रजेत् ' इत्यादि स्मृतिवचनोंसे भी शुद्रका अधिकार नहीं है । यहाँ ' स्मृते: ' इस शब्दरूपके पष्ठीके सदृश होनेसे यह भी पता लगता है कि मृतियों तथा पुराणोंके ज्ञान एवं कर्म-में भी शुद्र जातिके उत्पन्न करनेवाले पापसे जातिशूद्रका अधिकार नहीं है, किन्तु शापादि कारणविशेषसे शूद्र हुत्रों [ विदुर आदि ] का यह अधिकार है । तव पुराणादिका पाठ भी शूद्रका सङ्कोचने ही जानना चाहिये । इस कारण किसी भी वैदिक कर्ममें शूद्रका अधिकार नहीं है-यह सिद्धान्त है । ) .A इसके संस्कृत शब्द वहाँ यह है-[ शूद्रस्य वेदविद्यायाम् ] अधिकार - चिन्ता तदा स्याद्, यदि केनचित् - प्रमाणेन अत्र स सम्भाव्येत । यथा पतिताग्निहोत्र- प्रतिपत्तिस्थले शूद्रस्य श्रवणम्, अध्ययनम्, अर्थज्ञानं च इति त्रयाणां निषेधात् । सूत्रे ज्ञानपदानुक्तिस्तु शूद्रस्य सन्निधौ अन्यस्यापि अध्ययन निषेध-बोधनार्थम् । शूद्र - प्रतिषेधस्तु ' प्रयास्य वेदमुपशृण्वतः श्रपुजतुभ्यां श्रोत्र-प्रतिपूरणमिति । यद्य वा एतत् स्मशानं यत् शूद्रः, तस्मात् शूद्र - सामीप्ये

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५४४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नाध्येयमिति । उदाहरणे जिह्वाच्छेदो, धारणे शरीरभेद इति श्रुतिषु द्रष्टव्य: ।...... किञ्च - ' वेदाक्षरविचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणात् ' ' वेदाक्षरविचारेण ब्राह्मणीगमनेन च । कपिलाक्षीरपानेन शूद्रश्चाण्डालतां व्रजेत् ' इत्यादि-स्मृतेरिति शब्दरूपस्य षष्ठी - सादृश्याद् इदमपि बोध्यते यत् स्मार्तपौराण-ज्ञानकर्मणोरपि न शूद्रजातिजनकेन दुष्कर्मणा जाति - शूद्रस्य श्रधिकारः, किन्तु शापादिना कारण विशेषेण जातानाम् [ विदुरादीनाम् ] एव अधिकार इति । तेन पुराणादि - पाठोपि सङ्कोचादेव प्रवगन्तव्यः । तस्मात् क्वचिदपि वैदिके शूद्रस्य नाधिकार इति स्थितम् ' । ( इससे शुद्रका वैदिक ब्रह्मविद्यामें अनधिकार बताया है; स्मृति तथा पुराणों में भी प्रधिकार सङ्कोचवश बताया गया 1 इसपर गोस्वामी श्रीपुरुषोत्तमजी महाराजने अपनी बनाई ' भाष्य प्रकाश ' व्याख्यामें कुछ प्रकाश डाला है, उसका उद्धरण भी दिया जाता है । उक्त उद्धरणमें प्रारूढपतित - शूद्रोंकी पुराणोंके कुछ अंशके श्रवणमें श्रभ्यनुज्ञा बताई गई है-" पुराणान्तरे - ' श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ' इति -शूद्रस्यापि सामान्यतः श्रावणविधानात् । स्मृतिकौमुद्यां स्कान्दे - ' अस्ति शूद्रस्य शुश्रूषा पुराणेनैव वेदनम् । वदन्ति केचिद् विद्वांसः स्त्रीणां शूद्र-समानताम् ' इति ।... परन्तु तादृशज्ञाने ' प्रासक्तो भगवानेव शापं दापयति क्वचित् । श्रहङ्कारेऽथवा लोके तन्मार्गस्थापनाय हि ' इत्युक्तरीति केन शापादिना कारणविशेषेण शूद्रयोनिगतानां विदुरवेदवादिदासीसुत - सदृशां फलमुखोधिकारः, तादृशामेव तत्र कृतार्थत्वस्मरणात् । तत्र शूद्रयोनिगत-त्वेपि न कर्मजातिशूद्राणाम् । ज्ञानादी- इति श्रादिपदेन ' जपः तपः तीर्थं-यात्रा प्रव्रज्या मन्त्रसाधनम् । देवताराधनं चैव स्त्री - शूद्रपतनानि षट् इत्येतेषां संग्रहः । विदुरादीनां तीर्थयात्रादिदर्शनात् । इतरेषां [ शूद्रादीनां ] तत्कणां कामक्रोधादय एव दृश्यन्ते, न तु उपशमः ' इति । श्रीवल्लभाचार्यंका अपशूद्राधिकरण - भाष्य [ ५४५ ५४ .. [ हादिभि: पुराग दि or ] ब्रद्यज्ञान भागांश व्यतिरिक पठनीयम् ।...... तथा [ शूद्रादिभिस्तेषु ] प्रणवादिमान् वैदिक मन्त्रयुक्तोषि सव त्याज्यः, ' वेदः प्रणव एवाग्रे ' इति ' स [ प्रणवः ] सर्वोपनिषद् । सनातनम् ' इत्यादिवाक्यैः प्रणवस्य विशेषतो वेदत्वनिश्चयात् - वेदवीजं । मन्त्रस्तु शूद्रस्य ' ' स्वाहाकार - नमस्कारी मन्त्री शुद्रे विधीयेते ।... नाम- स्वय । ताभ्यां । शुद्रः पाकयज्ञैर्यजेत ब्रह्मवान् स्वयम् ' । ( अन्य पुराण में कहा है- ' ब्राह्मणको प्रागे करके चारों वर्णोंको पुरा पुराण सुनावे ' । इससे हृद्रको भी सामान्यतः पुराणादि सुनानेका विधान । होत है । स्मृति - कौमुदीमें स्कन्द्रका प्रमाण यह है— ' शूद्रका बर्न्स सेवा है । पुराणसे ही वहन करना है । कई विद्वान स्त्रियोंको भी शुर समान मानते हैं ।... परन्तु वैसे ज्ञानमें श्रासक्ति में वा ग्रहङ्कारमें कहीं लोकमें उम मार्गके स्थापनकेलिए भगवान् ही शप दिला दिया करते हैं । इस प्रकार शाप आदि कारण- विशेषसे शुद्रयोनि हो प्राप्त राि वेदवादी दामीनोंके समान फलजनक न प्रकार हा करना है । और वैसे ही व्यक्ति सफल माने जाते हैं; जानिशूद्र तो वहां अधिकृत नहीं होते । ' ज्ञानादिमें ' ' आदि ' शब्द से ' जप, तपस्या, तीर्थयात्रा, संन्या पूर्व-मन्त्रसाधन तथा देवताराधन - यह छः स्त्री और शूद्र के पतन के कारण होते हैं [ त्रि. ] इन वचनों का भी संग्रह ( ग्रहण ) हो जाता है । विदुर आदि ' शूद्र 1. पतित - शूद्रोंकी तो तीर्थयात्रा भी देखी गई है । शेष शूद्रोंके लिए तो उनका विद्य निषेध ही है । इसलिए प्राजकलके उन कृत्योंको करनेवाले शूद्रों के काम-sta ही बढ़ने हुए देखे गये हैं, शान्ति आदि नहीं । उपन [ द्रादयों पुराणादिमें भी ] ब्रह्मज्ञानसे व्यतिरिक्त ही भाग पट्टना वह धिक चाहिये । [ शूद्रादियोंको उनमें ] ॐकार प्रादिवाला वैदिकमन्त्र भी छोड़ देना चाहिये । ' आरम्भ में ॐकार वेद ही होता है ' । ' वह ( ॐकार ) शूद्रस .०० ३५ ब्राह ( श